सीखने सिखाने की कोशिश-भाग-(11)

प्रशिक्षित अध्यापक बनने के लिए एन.टी .टी, जे.बी.टी और बी.एड. जैसे कोर्स करने होते हैं। सभी अध्यापकों को बाल- मनोविज्ञान की पूर्ण जानकारी दी जाती है। अध्यापकों के साथ बच्चे जीवन का कुछ समय बिताते हैं, परंतु माता-पिता का साथ तो पूरा जीवन होता है।
प्रश्न यह है कि क्या अपने बच्चों की परवरिश के लिए माता-पिता को प्रशिक्षण की आवश्यक्ता नहीं है?

हमारे देश में आज भी कई पिछङे स्थानों में बाल- विवाह हो रहे हैं, छोटी आयु में ही वे माता-पिता बन जाते हैं । इन अभिभावकों को उनके बच्चों के लालन- पालन के लिए शिक्षित करने के लिए कई सामाजिक संस्थाएँ काम करती हैं, जिसमें बच्चों के स्वास्थ्य व शिक्षा संबधी ज्ञान दिया जाता है।

छोटे शहरों व बङे शहरों के शिक्षित माता-पिता को भी बच्चों के परवरिश के लिए प्रशिक्षित करना आवश्यक है। ये वे माता-पिता होते हैं जो अपने बच्चों को दुनिया की दौङ में शामिल करने के लिए बेताब व बैचैन होते है, साथ ही इस घबराहट के साथ कि क्या हमारा बच्चा दुनिया की दौङ में सफल हो पाएगा?

मेरी मनोवैज्ञानिक मित्र प्राची का कहना है कि ” कई बार जब माता- पिता मेरे पास अपने बच्चे को एक समस्या बच्चे के रूप में लाते हैं तो मैं हैरान होती हुँ कि बच्चे का व्यवहार स्वाभाविक है। समस्या तो माता-पिता के अपने व्यवहार और समझ में होती है। बच्चे का जिद करना व गुस्सा करना एक स्वाभाविक व्यवहार है पर अधिकांशतः माता-पिता बच्चे के गुस्से व जिद को गलत मानते हैं।वे उसे एक आदर्श बच्चा बनाना चाहते हैं। वे स्वयं अपने व्यवहार और स्वभाव को भूल जाते हैं।”
बाल- मनोवैज्ञानिक प्राची का मानना है कि, “प्रत्येक दंपति को माता-पिता बनने से पहले प्रशिक्षित होना आवश्यक है, उन्हें बाल-मनोविज्ञान की गहरी समझ होनी चाहिए। चूंकि बच्चे की परवरिश एक बहुत बङी जिम्मेदारी है।”

प्रत्येक बच्चा एक स्वतंत्र व्यक्त्तित्व लेकर इस दूनिया में आता है ।दूनिया में उसके आस-पास का वातावरण, परिवेश, परिस्थितियाँ व उसके साथ रहने वाले लोगों का स्वभाव और बच्चे के प्रति उनका व्यवहार उसके व्यक्तित्व के नव निर्माण के लिए उसे एक सांचा देते है।
सबसे महत्वपूर्ण बच्चे के प्रति उसके अभिभावक का व्यवहार, उनका अपना सामाजिक व्यवहार और स्वभाव, एक बच्चे के व्यक्तित्व पर प्रभाव डालता है। अभिप्राय यही है कि बच्चे सबसे अधिक अपने अभिभावकों का अनुसरण करते हैं।

लेखक मायाराम पतंग ने अपनी पुस्तक ‘अभिभावक कैसे हो’ में इस तथ्य को विशेष महत्व दिया है कि अभिभावकों का भी प्रशिक्षण आवश्यक है। यह हिन्दी साहित्य में पहली अनूठी पुस्तक लिखी गई है जो अभिभावकों को सिखाती है । इस पुस्तक में लिखा है कि “माता – पिता बच्चों के प्रथम गुरू होते हैं। माता-पिता तो बन ही जाते हैं, पर अच्छे माता- पिता बनना कठिन कार्य है। अच्छे अभिभावक बनने के लिए भी मेहनत करनी होती है। अच्छे अभिभावक वे ही हो सकते हैं जो अपने बच्चे के सर्वागीण विकास पर ध्यान देते हैं।”

प्यार तो सभी अपने बच्चों से करते हैं पर उनके प्रति आप की संवेदनशीलता और उन्हें समझने की कोशिश आपको अच्छा अभिभावक बना सकती है।
लक्ष्य की माँ बहुत महत्वाकांक्षी थी, वह चाहती थी कि उनका बेटा प्रत्येक क्षेत्र में अव्वल आए, जिसके लिए वह बहुत मेहनत करती थी। चूंकि वह एक महत्वाकांक्षी महिला थी अतः उनकी अपने प्रति भी कुछ अभिलाषाएँ थी। इसके लिए उन्होंने स्वयं भी एक छोटा व्यापार करना आरंभ किया था।महत्वाकांक्षी और मेहनती ये दोनो ही गुण सफलता के लिए आवश्यक होते हैं जो उनमें मौज़ूद थे।

पर लक्ष्य अभी मात्र छः वर्ष का था, जब मेरे पास आया था, वह महत्वाकांक्षा और मेहनत दोनो से अंजान था । वह सिर्फ खुश रहना जानता था, और अपनी माँ को खुश देखना चाहता था। अतः माँ की अपेक्षाओं में खरा उतरने के लिए पूरी कोशिश करता व कामयाब भी हो रहा था।

उसकी माँ को अपनी व्यस्तता की मजबूरी में लक्ष्य को मेरे पास पढ़ने भेजना पङा था, लेकिन उन्हें सिर्फ अपने पर विश्वास था। जिस कारण वह लक्ष्य को क्या पढ़ाई करानी है, उसकी एक लिस्ट मेरे पास भेजती थी। यह मेरे काम करने का तरीका नहीं था। लक्ष्य अभी दूसरी कक्षा में आया था, लंबे-लंबे वाक्य लिखना अभी सीख रहा था, अतः लिखने की गति अभी धीमी थी।
आरंभ में लक्ष्य मेरे पास चहकता हुआ आता था, उसे मुझे बहुत कुछ बताना होता था। पर धीरे-धीरे उसका उत्साह कम होता दिखने लगा था।अब लक्ष्य बहुत सहमा होता था और सिर्फ पढ़ाई पर ध्यान देने लगा था । किसी दिन ऐसा लगता कि घर पर शायद उसकी पिटाई लगी हो। लक्ष्य मानव के ही पङोस में रहता था अतः दोनो साथ आते थे। एक दिन मानव अकेला आया और बोला,” आज लक्ष्य देर से आएगा क्योंकि उसकी पिटाई लग रही है।”

मानव ने बताया कि लक्ष्य जब स्कूल से घर पहुँचता है तो उसकी माँ सर्वप्रथम उसकी काॅपियाँ देखती हैं और कक्षा कार्य में हुई गलतियों के कारण उसकी पिटाई होती है। ट्यूशन से जाकर भी वह हम बच्चों के साथ खेलने नहीं आता हैं, पढ़ाई करता है?
लक्ष्य स्कूल की सभी प्रतियोगिताओं में भाग लेता था, प्रतियोगिता की तैयारी में भी पूरी मेहनत की जाती थी, यह प्रसन्नता की बात है कि लक्ष्य सभी प्रतियोगिताओं में अव्वल आता था । परंतु इन प्रतियोगिताओं में खेल प्रतियोगिता नहीं थी।

एक दिन लक्ष्य आया तो उसका मुहँ लाल था, उसका बदन गरम था ।मुझे लगा उसे बुखार है, मानव बोला,” आज भी पिटाई हुई है।”
इस स्थिति में वह पढ़ने में मन लगाएगा, यह सोचना भी व्यर्थ था। मैंने उसकी माँ से बात की, समझाने की कोशिश भी की, ” अभी लक्ष्य बहुत छोटा है, पढ़ाई के लिए इतना दबाव डालना ठीक नहीं है।”
पर उन्हें मेरा सुझाव पसंद नहीं आया था, अपितु यह उनको मेरी दखलअंदाजी लगी थी। अगले दिन से उसने मेरे पास पढ़ना छोङ दिया था।

रिचा की माँ स्वयं बहुत अच्छी अध्यापिका थी। वह पहले अध्यापन कार्य भी करती थी, पर अपने बच्चों के कारण छोङ दिया था। वह रिचा को प्रत्येक पाठ बहुत अच्छी तरह समझाती थी । पेङ-पौधों के विषय में बताने के लिए उसे बगीचे में ले जाती थी। अक्सर पाठों को समझाने के लिए वह उसके साथ प्रेक्टीकल करती थी। रिचा भी होशियार थी, बहुत जल्दी सब समझती थी।

जब मेरे पास आई तब उसकी तीसरी कक्षा का आरंभ था । लिखने की गति धीमी थी और लिखाई भी अच्छी नहीं थी। लेकिन जल्दी ही इसमें सुधार आया था। उसकी छोटी बहन बहुत छोटी थी, अतः माँ उसे कम समय दे पाती थी। तीसरी कक्षा की पढ़ाई उसने बहुत मन से की थी, वह हमेशा खुश रहती थी। रिजल्ट भी अच्छा आया था।

पर चौथी कक्षा में धीरे-धीरे वह क्षुब्ध रहने लगी, पढ़ाई से ध्यान उचटने लगा था। मुझे लगा कि इस आयु में बच्चे खिलाङी होने लगते हैं। कुछ दिन बाद तो जैसे वह मेरे पास पढ़ने नहीं खेलने आती थी। उसका कहना होता, ” आंटी, आप मुझे ज्यादा नहीं पढ़ाओ, घर जाकर फिर पढ़ना तो पङेगा ही, मम्मी स्कूल से आकर पढ़ाती है, फिर आपके पास पढ़ो और घर जाकर दूबारा पढ़ो”

मैंने कहा,” यहाँ सब काम अच्छा करोगी तो घर पर मम्मी को नहीं पढ़ाना पङेगा”
वह बोली,” नहीं, आंटी, मम्मी सिर्फ पढ़ाई की बात करती हैं।”
यहाँ भी समस्या नंबरों की थी । प्रत्येक सप्ताह होने वाली कक्षा परीक्षा का बोझ उसकी माँ ने अपने ऊपर ले रखा था। रिचा में प्रश्न समझ कर उत्तर देने की क्षमता बहुत अच्छी थी। पाठ पर आधारित प्रत्येक प्रश्न के उत्तर बहुत अच्छे देती थी। माँ चाहती थी कि रिचा परीक्षा में प्रत्येक प्रश्न का उत्तर सही लिखकर दें।इस कारण वह उसे पाठ बार-बार समझाती थी। यह समझाना वास्तव में रटाना बनता जा रहा था, यह उन्हें समझ नहीं आ रहा था।

एक दिन रिचा की माँ ने कहा, ” मैंने यह पाठ इतनी बार इसे समझाया था फिर भी रिचा कक्षा परीक्षा में एक प्रश्न का उत्तर नहीं लिख कर आई है।”
मैने उनसे कहा,” यह पाठ रिचा की अध्यापिका ने भी समझाया होगा, आपने भी कई बार समझाया। तो एक बात पर ध्यान दें जब आप पाठ समझा रहीं थी क्या उसका ध्यान आपकी बात पर था? ”
“बच्चें जब बङे हो रहे होते हैं, वह खिलाङी भी हो रहें होते हैं। ऐसा नहीं कि उसे पाठ समझ नहीं आया था, सिर्फ उसका ध्यान बँट रहा है।”
मैंने उनसे उसकी सारे दिन पढ़ने की शिकायत के विषय में बताया था। उन्होंने इसे स्वीकार नहीं किया था।अभिभावकों को बुरा लगता है जब बच्चे उनकी शिकायत किसी अन्य से करते हैं।

मैंने उन्हें कहा कि “शायद वह अपनी छोटी बहन को खेलता देख भी परेशान होती है”
वह बोली, ” हाँ, मुझ से कहती है कि आप छोटी को नहीं पढ़ाती हो।”
मैंने उनसे कहा,” आप उसके अंदर अहसास जगाए कि वह बङी है और अधिक समझदार है। छोटी बहन की कुछ देखभाल उससे कराएँ।अपने को बङा समझेगी तो अपनी पढ़ाई को भी उससे बङा समझेगी।”

छोटी बेटी अब कुछ समय के लिए स्कूल जाने लगी थी और माँ के पास बङी बेटी की चिन्ता करने का अधिक समय हो गया था।
मैंने उन्हें इसका अहसास भी कराना चाहा कि वह स्वयं रिचा को पढ़ाने में समर्थ है। उस पर ट्यूशन का बोझ न डाला जाए।

मुझे अफसोस होता है कि अभिभावक बच्चे के बालपन पर ही पढ़ाई का इतना बोझ डाल देते हैं कि किशोरावस्था तक उनकी पढ़ाई से रूचि समाप्त हो जाती है। फिर भी अभिभावक नहीं समझते और बच्चों को ही दोष देते हैं।

आज का अभिभावक अपने बच्चों को हर गतिविधि में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित तो करता है पर बहुत कुछ सिखाने की चाह में बच्चों से उनका बचपन छीन लेता है।

एक बार प्रसिद्ध भरतनाट्यम नृत्यांगना हेमामालिनी ने कहा कि मैं अच्छी नृत्यांगना अपनी माँ के कारण बनी हुँ। उनके अनुशासन और मेहनत ने मुझे इस मंजिल तक पहुँचाया है। पर आज मैं अपना बचपन याद करती हुँ, जो मुझे कभी मिला ही नहीं था, गुङियों का खेल नही खेला, बाहर मैदान में दौङ नहीं लगाई, दोस्तों के साथ मस्ती नहीं करी, मुझ से मेरा बचपन छीन गया था।

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समीक्षा

नाटक -‘मुगल- ए- आज़म

निर्देशक – फिरोज़ अब्बास

1960 में प्रदर्शित फिल्म ‘मुगल-ए – आज़म मेरी पसंदीदा फिल्मों में से एक है।यह भव्य फिल्म अपने समय की ही नहीं आज भी कलात्मकता की अनूठी मिसाल है।

इस फिल्म का नाट्य मंचन हुआ है, ऐसा जानने पर यही प्रश्न मन में आया कि क्या फिरोज़ अब्बास खान ने इस अनमोल कला को एक नया आयाम दिया होगा?

नाटक देखने से पूर्व फिल्म के संवाद, संगीत व गाने न केवल कानों में गूँज रहे थे अपितु पूरी फिल्म ही आँखों के सामने चल रही थी।

मंच पर नाटक आरम्भ हुआ और शीघ्र ही हम नाटक में खो चूके थे । संवाद तो वही थे जो कुछ देर पहले कानों में गूँज रहे थे।गीत भी वही जो दिल में बसे थे। परंतु यह फिल्म नहीं थी, नाट्य मंचन था।

यह नाटक कला की सच्चाई का प्रतिरूप बन कर उभरा है। नाट्य मंचन की दूनिया में एक सफल अनोखा अनूठा प्रयास है। हम एक देखी- सुनी कहानी के प्रस्तुतिकरण से हतप्रभ थे। अभिनेताओं द्वारा संवादों को बोलने की शैली उस कहानी को नए रूप में हम तक पहुँचा रही थी।

प्रत्येक गीत व नृत्य का मंचन ह्र्दय को गदगद कर रहा था। शकील बदायुनी लिखित गीत ‘ प्यार किया तो डरना क्या’ मंच पर देख हम अभिभूत थे। अगर के. आसिफ साहब ने इस नृत्य को फिल्माने के लिए कोई भी त्रृटि नहीं छोङी थी, तो निर्देशक फिरोज़ अब्बास साहब ने इस गीत- नृत्य के मंचन में कला को एक नई ऊँचाई में पहुँचा दिया है।

के. आसिफ साहब ने इस गाने के लिए शीशमहल का विशेष सेट तैयार कराया था और फिर गीत के बोलो की गुंज व मधुबाला के नृत्य ने उस शीशमहल में उस दृश्य को जीवंत किया था।

उसी खूबसूरती को फिरोज साहब को इस मंच में बिखेरनी थी, हमारी आँखें भी इस गीत व नृत्य का नाट्यमंचन देखने के लिए बैचेन थी।

दृश्य आरम्भ हुआ, अनारकली के रूप में प्रियंका बर्वे की मधुर आवाज व नृत्य तथा अन्य नृत्यांगनाओं के नृत्य मंच पर अद्भूत छटा बिखेर रहे थे। मंच सज्जा, लाइटों के प्रयोग ने उस दृश्य को इस तरह जीवंत बनाया कि हम फिल्म के फिल्मांकन को भूल गए थे। दृश्य के अंत में सलीम के चारों ओर गुजंता गीत,’ प्यार किया तो डरना क्या’ व नृत्यांगनाओं का अद्भूत नृत्य तथा मंच का सुदंर प्रयोग, रोशनी का सटीक संयोजन सबने मिलकर जैसे के. आसिफ के शीशमहल को मंच पर उतार दिया था। और मुहँ से निकला, ‘वाह!’

नाटक के प्रत्येक दृश्य को स्वाभाविक बनाने के लिए मंच सज्जा पर बहुत बारिकी से काम किया गया था। दरबार का दृश्य, बाग का दृश्य हो अथवा महल का दृश्य देखते हुए मंच आपको निराश नहीं करता है, अपितु उत्साहित करता है।

युद्ध के दृश्य की प्रस्तुति आपको युद्ध में पहुँचा देती है दृश्य को सफल बनाने के लिए रोशनी के प्रयोग के साथ कुछ प्रतीकों का भी सफल प्रयोग किया गया है , फिर अकबर और सलीम के बीच के युद्ध का दृश्यांकन मन द्रवित कर देता है, यह सिर्फ मंच पर दृश्य के प्रस्तुतिकरण का प्रभाव था।

नाट्य मंचन में मंच का सफल उपयोग आवश्यक है और यह तो फिल्म मुगल – ऐ – आज़म का नाट्य मंचन था, यह खुशी की बात है कि फिरोज साहब ने इसमे कोई कमी नहीं छोङी है, तभी यह नाटक भी बना है कला की अनोखी मिसाल।

कलाकारों का अभिनय व संवाद शैली इस नाटक को एक नए अंदाज़ में प्रस्तुत करता है।सभी मुख्य व सहकलाकारों के अभिनय की प्रशंसा के साथ नृत्यांगनाओं के नृत्य की सराहना बहुत आवश्यक है , जिनसे दृश्य सुंदर और प्रभावशाली बने थे।

महारानी जोधा के आदेश पर बहती तानसेन की रागनियाँ व कत्थक नृत्यांगनाओं के घूघँरूओं की झंकार हमारे हृदय को भी संगीत मय कर देती है। और अंत में वह गीत व नृत्य ‘खुदा निगहबान हो तुम्हारा।’ दृश्य को इस खूब सूरती से प्रस्तुत किया गया है कि ‘ उठे जनाज़ा….’ पर आह निकलती है।

अभिनेताओं और अभिनेत्रियों की प्रशंसा मात्र उनके अभिनय के लिए नहीं की जा सकती है उनके गाए गीत उसी प्रकार दिल में प्रभाव छोङते गए जैसे फिल्म के गीत । कलाकारों द्वारा स्वयं मंच पर ही अभिनय और नृत्य के साथ गीत गाए गए हैं। मंच के पीछे से कोई रिकाॅर्ड नहीं बजता हैं। हम प्रत्यक्ष रूप से कलाकारों को गाते हुए देखते व सुनते हैं।कलाकारों का प्रत्यक्ष गायन दृश्यों को देखने का आनंद बढ़ा देता है।

‘ तेरी महफिल में किस्मत आज़माकर हम भी देंखेगे।’ इस कव्वाली की प्रस्तुति कलाकारों के गान व कत्थक नृत्यांगनाओं के नृत्य से बहुत रोचक बन गई थी।

अंत में यही कहना होगा कि सच्चे कलाकार जो अपनी कला के साथ समझौता नहीं करते है, उनकी कला इतिहास रचती है। फिरोज अब्बास खान ने भी इस नाट्य मंचन से नाटक के इतिहास को नया आयाम दिया है।

सीखने-सिखाने की कोशिश-(भाग-10)

एक ही परिवार में पले- बढ़े बच्चों के स्वभाव व प्रवृतियों में भिन्नता पाई जाती है। प्रत्येक बच्चा अपनी जन्मजात प्रवृति व स्वभाव लेकर आता है ।एक समान शिक्षा- दीक्षा को वे अपनी – अपनी प्रवृति के अनुकुल ग्रहण करते हैं और भिन्न-भिन्न व्यक्तित्व का विकास होता है।

लव,कुश और मेघा ये एक ही परिवार के तीन बच्चे हैं। तीनों ही मेरे छात्र रहे हैं परंतु कुश दूसरी कक्षा से आठवीं कक्षा तक मेरे पास पढ़ा था।लव और मेघा एक ही वर्ष पढ़े थे।

सात वर्ष का कुश आरम्भ में बहुत शर्मीला था। पर उसकी आखें उसकी चंचलता और होशियारी बयां करती थी। उसे पढ़ना अच्छा लगता था पर खेलना भी चाहता था । यह खुशी की बात थी कि वह दोनो के लिए समय का तालमेल बना लेता था। काम करने की गति तीव्र थी और चूंकि मन से पढ़ता था तो काम समझने में देर नहीं लगाता था। उसने मुझ से यह निश्चित करा लिया था कि वह काम अच्छा और जल्दी पूरा कर लेगा तो उसकी जल्दी छुट्टी कर दूँगी जिससे उसे खेलने का अधिक समय मिल सके।

कुश का बङा भाई दस वर्षीय लव भोला, मितभाषी और विनम्र था। लव को पढ़ना बिलकुल पसंद नहीं था।उसे पढ़ने का उद्देश्य समझ नहीं आता था। मेरे पास सिर्फ 2 महीने ही पढ़ा था। ऐसा लगता था कि वह पढ़ना ही नहीं चाहता था, काम बहुत धीमी गति से करता था। खेलना उसे पसंद था पर उसमें यह भावना नही थी कि उसके लिए पहले पढ़ाई अच्छी और जल्दी कर ले।

लव, कुश की बहन मेघा अपने भाईयों से बङी थी।वह आठवीं कक्षा में पढ़ती थी। जैसा कि अधिकांशतः परिवारों में होता है कि लङकी को बाहर पढ़ने तो भेजते हैं पर इस भय के साथ कि कहीं उसके साथ कुछ गलत न हो जाए या वह स्वयं न भटक जाए। मेघा के परिवार में भी ऐसा ही था। लव का ध्यान इसी में रहता कि मेघा किस से बात कर रही है और फिर पूरी खबर घर जाकर माँ को देता था । मेघा बहुत तनाव में रहती थी।

एक ही पारिवारिक, आर्थिक व सामाजिक परिस्थिति में रहते हुए भी उनके व्यक्तित्व का विकास भिन्न ही रहा था। मेघा का विवाह 19 वर्ष में कर दिया गया था, वह अपने परिवार का दायित्व पूर्ण जिम्मेदारी से अवश्य निभा रही है पर उसमें घर से बाहर कोई काम करने का आत्मविश्वास नहीं है।

लव बहुत कम पढ़ाई कर सका था, वह अपने पिता का बिजनेस संभाल रहा है।
कुश ने ही पढ़ाई करी, ग्रेजुएशन करके होटल मैनेजमैंट का कोर्स किया व नौकरी कर रहा है।
प्रसिद्ध शायर निंदा फाजली ने लिखा है-
” पंछी, मानव,फूल, जल अलग-अलग आकार
माटी का घर एक ही, सारे रिश्तेदार।

पायल, हिमांशु और मानव तीनों भाई-बहन मेरे ही पास पढ़ते रहे थे। पायल ने स्कूल की पढ़ाई मेरे पास नहीं करी थी। पर मैंने उसके बचपन से उसे देखा था। हमेशा हँसती दिखती पायल के मन में बहुत दुख था। अपनी बीमारी के कारण वह बहुत चिङचिङी और गुस्सैल हो गई थी ।घर से बाहर वह जितनी खुश दिखती थी घर में उतनी ही परेशानी का सबब थी
बीमारी ने उसे दिमागी समझ से कुछ पीछे जरूर कर दिया था, पर उसकी मेहनत और निरंतर कोशिश व लगन से उसने बारहवीं तक पढ़ाई कर, जे.बी.टी का कोर्स किया व अब ग्रेजुएशन भी कर रही है।मुझे पूरी उम्मीद है कि नौकरी की कोशिशों में भी वह सफलता अवश्य पा लेगी।बीमारी आज भी उसके साथ है, जिसे उसने स्वीकार कर लिया है और एक जिद के साथ उसकी आगे बढ़ने की कोशिश ज़ारी है।

एक लङकी को घर से बाहर भेजने का भय इस परिवार में भी दिखता है,फिर पायल की बीमारी के कारण भी अनचाही अनहोनी घटने की कल्पना से प्रभावित हो, वे उसे घर से बाहर भेजना नहीं चाहते हैं।

लेकिन पायल सब समझते हुए भी अपने पाँव पर खङे होने के इरादे को डिगने नहीं देती है।
सोहनलाल द्विवेदी ने यह कविता पायल के समान हार न मानने वालों के लिए लिखी है-
लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती,………
असफलता एक चुनौती है, स्वीकार करो………
संघर्ष का मैदान छोङ मत भागो तुम…….
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती।

पायल हमेशा अपनी पढ़ाई के लिए या अन्य समस्याओं के समाधान ढूँढने मेरे पास आती है। यह कहना कठिन है कि वह मुझ से कुछ सीखती है या मुझे सिखाती है। सच, यही है कि वह ही मेरी गुरू है।

पायल का छोटा भाई हिमांशु प्रथम कक्षा से आठवी कक्षा तक मेरे पास पढ़ा था। हिमांशु बहुत ही मनोयोग से पढ़ाई करता था ।उसके लिए अध्यापक के शब्द ही पत्थर की लकीर थे। समस्या यही थी कि उसकी माँ कभी उसके नंबरों से संतुष्ट नहीं होती थी। हिमांशु को बिलकुल पसंद नहीं था कि उसकी माँ मुझ से आकर मिले। कारण था कि हिमांशु जितना शरीफ बन कर मेरे पास पढ़ता था, उतना ही वह घर पर शैतानी करता व माँ को परेशान करता था।

हिमांशु नहीं चाहता था कि उसकी माँ मुझ से उसकी शिकायत करे,यह बात तो कोई पसंद नहीं कर सकता है। मेरे बहुत समझाने पर भी उसकी माँ ने अपना स्वभाव नहीं बदला था। मानव के साथ भी वह यही करती थी, मानव हिमांशु का आठ साल छोटा भाई था, वह के. जी. कक्षा से मेरे पास पढता रहा था ।

हिमांशु मेरे पास सीधा बच्चा था पर घर में शरारती था, उसके घर व बाहर दो व्यक्त्तित्व दिखते थे, पर मानव जैसा घर में था वैसा ही बाहर था थोङा जिद्दी व गुस्सैल भी था। मानव मुझ पर अपना बहुत अधिकार समझता था। किसी अन्य बच्चे के सामने मैं उसे कुछ नहीं कह सकती थी।

हिमांशु और मानव दोनो बच्चे दिमाग के तेज थे। नए-नए काम करने में, प्रश्नों को भिन्न-भिन्न तरीके से हल करने में, ये आनंद लेते थे। हिमांशु पढ़ाई के प्रति हमेशा गंभीर रहा था, अपना काम हमेशा पूरा रखता था। उसका ध्यान कभी भटकता था पर फिर पढ़ते समय पूरा ध्यान देता था। इस समय उसने इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूर्ण कर ली है।

मानव को पढ़ाने में बहुत आनंद आता था क्योंकि वह प्रश्न बहुत करता था और बहुत जल्दी सब समझता था।घर में सबसे छोटा होने के कारण उसकी परवरिश बहुत लाड में हो रही थी जिसका वह पूरा लाभ उठा रहा था।जब वह सातवी कक्षा में आया तो मैंने महसूस किया कि वह अधिक खिलाङी हो रहा है अतः पढ़ाई को कम महत्व दे रहा है। पर मैं समझ सकती थी यह दौर कुछ ही समय का है। मानव अब दसवीं कक्षा की पढ़ाई कर रहा है।
पायल , हिमांशु और मानव तीनों ही बच्चे तीव्र दिमाग के होशियार बच्चे हैं। ये तीनों जन्मजात लगन के पक्के हैं।

दोनों परिवार लङकियों को पढ़ाने के लिए विशेष उत्साही नहीं थे। मेघा की शादी छोटी आयु में ही कर दी गई थी। लङकियों को पढ़ाई कोई नौकरी या व्यवसाय कराने के उद्देश्य से नहीं कराई जाती है।उन्हें आत्मनिर्भर बनाने का विचार भी उनके मन में नहीं होता है।

जिन घरों में व्यापार या व्यवसाय करने की परंपरा चल रही हो, वहाँ लङकों को भी पढ़ने के लिए विशेष उत्साहित नहीं किया जाता है।इसीलिए लव के मन में आरम्भ से ही पढ़ाई के प्रति जिम्मेदारी का अहसास नहीं था।फिर भी कुश ने अपनी रूचि से पढ़ाई करी थी। प्रत्येक बच्चा अपनी रूचि से अपने जीवन पथ का चुनाव करता है।

पायल को पढ़ने के लिए बहुत संघर्ष करना पङ रहा है। वह भी अपने भाईयों की भांति आत्म निर्भर होना चाहती है। वह हमेशा से नौकरी करने का सपना देखती रही है जिससे वह अपने माता-पिता पर निर्भर न रहे।
परंतु माता-पिता व भाई भी उसे एक आराम का जीवन देना चाहते हैं,वे नहीं समझ पा रहे हैं कि वह घर का आराम छोङ कर बाहरी दूनिया के धक्के खाना क्यों चाहती है।यदि यह सच है कि वे पायल की बीमारी के कारण भी उसे घर से बाहर नहीं भेजना चाहते है पर यह भी कङवा सच है कि वह स्वस्थ होती तो उसका विवाह कर दिया जाता ।

समझना कठिन है कि इन्हें अपनी बेटियों और बहनों के लिए सुख घर की चहार दीवारी में ही क्यों नज़र आता है? क्या वाकई घर में रह कर ही सुख है? नौकरी को संघर्ष का पर्याय क्यों माना जाता है ? इसीलिए पुरूष यह कहते दिखते हैं कि हम संघर्ष कर रहे है तो तुम लङकियों को क्यों परेशान होना है, तुम आराम से घर देखो।
आत्मनिर्भर होने में स्वाभिमान तो हो सकता है पर संघर्ष कैसे? समाज बदल रहा है, आज लङकियों की शिक्षा के लिए हर वर्ग जागरूक हो रहा है। लङकियाँ आत्म निर्भर भी हो रहीहै, पर कठिनाई के साथ…..। परिवर्तन हो रहा है और समाज विकास की ओर बढ़ रहा है।
हिमांशु और मानव के पिता भी व्यवसायी है, पर दोनों बच्चों की पढ़ाई को भी महत्व दिया गया है, जिससे उनकी सूझ-बूझ बढ़े और अपनी पसंद का व्यवसाय या नौकरी का चुनाव करने के लिए वे सक्षम हो।

सीखने- सिखाने की कोशिश – (भाग-9

जिन विद्यार्थियों को मैं लिखना पढ़ना नहीं सिखा सकी, उनके लिए मैं उतनी ही गुनहगार हुँ, जितनी सरकार की नीतियाँ व स्कूल प्रबंधक इत्यादि। कोई भी स्पष्टीकरण मेरी कमी को भर नहीं सकता है। हम सभी अध्यापिकाओं या अध्यापकों ने चाहे कितना भी अच्छा काम किया हो, यदि हम से पढ़े बच्चों में से कोई एक भी ठीक से पढ़- लिख न सके तो हमें अपनी कमी स्वीकार करनी चाहिए।

मैंने इस कमी को दूर करने के लिए ट्यूशन में बच्चों पर विशेष ध्यान देने की कोशिश की थी। मेरा ट्यूशन का सफर भी लंबा रहा है और निरंतर चल रहा है। ट्यूशन में पढ़ने आए विद्यार्थी तो मेरे अपने बच्चे होते हैं, मेरी कोशिश होती है कि मेरे पास वे किसी दबाव का अनुभव न करें, वे मेरे विद्यार्थी न हो कर मेरे सहयोगी होते है हम मिलकर सीखने-सिखाने की कोशिश करते हैं। ये मेरे नन्हें- किशोर सहयोगी मुझ से खुलकर अपने मन का हाल कहते है।
प्रत्येक बच्चे के विषय में लिखना तो कठिन होगा पर जिन बच्चों से विशेष सीखने को मिला उनकी चर्चा अवश्य करूँगी।
कुछ लङकियाँ बचपन से ही बहुत कोमल व नाजुक होती हैं, पांच साल की नैन्सी भी ऐसी ही थी, बहुत कम बोलती थी, जितना पूछो उतना जवाब मिलता था। आवाज भी बहुत शांत धीमी निकलती थी। अपना काम बहुत तन्मयता से व सुंदर करती थी।

उसकी दादी ने बताया कि वह घर में भी चुप रहती है, सिर्फ मतलब की बात करती है। अपनी तकलीफ व परेशानी भी नहीं बताती है। उसकी दादी ने कहा,” हम इसे आपके पास इसीलिए लाए हैं कि यह बोलना सीखे, बातें करना सीखें।”

मैं उसे कहानियाँ सुनाती, उसके साथ खेलती थी, पर वह उतना ही बोलती थी, जितना जरूरी होता था। कहानी ध्यान से सुनती, उस पर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर भी ठीक देती थी।अपने मन से कोई बात नहीं करती थी। कक्षा-प्रतियोगिता के लिए कहानी व कविता याद करती व सुनाती भी थी, पर आवाज बहुत धीमी थी वैसे स्पष्ट थी । बहुत समझाने से थोङा ऊँचा तो बोलने लगी थी, पर बातें करना पसंद नहीं था।

दो दिन के लिए उसका चार साल का छोटा भाई कपिल मेरे पास पढ़ने आया था। कपिल बहुत शरारती था, वह नैन्सी की हर वस्तु लेता पर नैन्सी उससे भी नहीं लङती थी।पता चला कि घर पर भी जब बहुत परेशान हो जाती है तब बोलती है उसे लङना पसंद नहीं था।इसी बात से घर वाले उसके लिए चिंतित थे।

यह चिंता की बात भी थी इतना शांत रहना, अपने अधिकार के लिए भी नहीं बोलना! घर का माहौल भी अच्छा था, परिवार में सभी उसे बहुत प्यार करते थे।यह उसका जन्मजात स्वभाव था उसे बदलना कठिन था,समय के साथ स्वभाव में परिवर्तन आएगा।पर यह चिंता की बात भी है क्योंकि यदि उसके साथ कुछ भी गलत होगा तब भी वह अपनी तकलीफ अपने पास रखेगी। परिवार उसके प्रति बहुत सचेत था,लेकिन बहुत ध्यान रखने पर भी चूक हो सकती है।

हम उस पर इस छोटी आयु में स्वभाव बदलने के लिए दबाव नहीं डाल सकते हैं। हम धीरे- धीरे उसे बिना डराए समाज की बुराईयों से परिचित करा सकते हैं । कहानियों द्वारा अपने अधिकार के लिए लङना व विद्रोह करना सिखाया जा सकता है।

नैन्सी को एक अच्छा शिक्षित परिवार मिला था जो उसके व्यक्त्तित्व के विकास के प्रति सजग था। अधिकांशतः ऐसे बच्चों को बहुत कठिनाई का सामना करना पङता है। असामाजिक तत्व ऐसे बच्चों को आसानी से अपना शिकार बना लेते हैं।

महान साहित्यकार अज्ञेय ने अपनी पुस्तक ‘ शेखर एक जीवनी’ में लिखा है कि किसी में भी विद्रोह के गुण जन्म से होते हैं और वे प्रत्येक में नहीं होते है। अतः क्रांतिकारी बनाए नहीं जाते हैं, वे जन्मजात होते हैं। जिस कारण कुछ व्यक्ति यह समझते हुए भी कि गलत हो रहा है, पर उसका विरोध नहीं करते हैं, बेशक जो भी हो रहा हो वह उनके लिए भी हानिकारक हो, तब भी वह चुप रहने और सहने में विश्वास करते है। जबकि विद्रोही कुछ भी गलत हो, चाहे वह उनके लिए हानिकारक न हो, पर दूसरे के लिए हो तब भी आवाज़ उठाते हैं, विद्रोह करते हैं।

नैन्सी का शांत स्वभाव उसका जन्मजात गुण था तो अनन्या का स्वभाव विद्रोही था। चार साल की अनन्या को जब बङे बच्चे तंग करते तो वह तुरंत उनका जवाब देती थी। मैं यह देखकर खुश थी कि उसे किसी के साथ भी गलत होना सहन नहीं था।और जब किसी को आवश्यकता होती तो सबसे पहले वह सहायता के लिए आगे बढ़ती थी।

वह जब मेरे पास आती तो बहुत शांत दिखती थी, लेकिन उसकी शरारती आँखे बताती थी कि वह किसी से कम नहीं थी, वह अपने आस-पास के वातावरण के प्रति बहुत सजग थी। जबकि उसका ‘आई क्यू’ अपनी आयू के बच्चों से कुछ कम था पर सिर्फ पढ़ाते समय ही प्रतीत होता था कि उसे देर से समझ आता है परंतु व्यवहारिक ज्ञान में उसे किसी भी रूप में पीछे नहीं कहा जा सकता था।

वह उस छोटी आयु में भी सबकी मित्र बनना चाहती थी और मित्रता निभाना भी जानती थी, इसीलिए सबके कष्ट समझती थी। विद्रोही स्वभाव के बच्चे अधिक भावुक और संवेदनशील होते है।

मंथन दूसरी कक्षा में पढ़ता था, उसे अपने पर पूर्ण विश्वास था और अपनी बूद्धि व समझ से दूसरों को परख कर वह व्यवहार करता था।आरम्भ में वह कुछ नहीं बोलता था पर उसके व्यवहार से उसकी सजगता प्रकट हो रही थी। जैसे वह बता रहा था कि उसे अभी हम पर विश्वास नहीं है । मेरी बातों को सुनते हुए वह भाव शुन्य रहता था ।पहले दिन उसकी किताबों को जैसे ही मैंने हाथ में लिया वैसे ही तपाक से उसने अपनी किताबें मुझ से ले ली और बोला,” आपको नहीं पता मुझे क्या और कैसे पढ़ना है?” उसने स्वयं एक किताब निकाल कर पढ़ना शुरू किया था।

मैं समझ गई थी कि उसे कुछ समय देना होगा और उसका विश्वास जीतना होगा वह न केवल शक्की अपितु स्वाभिमानी बच्चा भी था। अपने सम्मान के प्रति बहुत सतर्क था। कठिनाई यह थी कि कुछ अभिभावक ट्यूशन में बच्चे को भेजकर समझते हैं कि तुरंत बच्चे के रिजल्ट में सुधार हो जाएगा। पर मंथन तो अभी बात भी नहीं करना चाहता था।

दूसरों को परखना या जल्दी विश्वास न करना, क्या उसका जन्मजात स्वभाव था ? अथवा सामाजिक परिस्थतियों व बङों ने यह सिखाया था। वैसे थोङे शक्की सभी बच्चे होते हैं और यह होना भी चाहिए।

जैसे हमारे व्यक्तित्व के दो रूप होते हैं, हम घर के अंदर जो होते हैं वह घर के बाहर नहीं होते है। उसी प्रकार एक बच्चा जैसे घर पर व्यवहार करता है वैसे बाहर नहीं करता है। माता-पिता को उसके बाहरी स्वरूप का ज्ञान भी नहीं होता है।

मंथन की माँ को भी जल्दी थी पर दादी को समझ थी, उन्होंने बताया कि मंथन बहुत जिद्दी है व घर पर तो बहुत शोर मचाता है व जिद न मानने पर चिल्लाता भी है। यहाँ भी वह जिद् तो दिखा रहा था पर अपना गुस्सा दृढ़ता से चुप रहकर व रूखाई से दिखा रहा था।

मंथन ने शीघ्र ही समझ लिया था कि मेरे पास पढ़ने आए अन्य बच्चों में से पांचवीं कक्षा के मानव से उसकी नहीं पटेगी। मानव नर्सरी कक्षा से मेरे पास पढ़ रहा था अतः मेरे पर अपना अधिक अधिकार समझता था। मंथन जब मेरी बात नहीं सुनता तो मानव को अच्छा नहीं लगता था। इस पर मानव भी मंथन से रूखा व्यवहार करता था। मैंने मानव को समझाया कि उसे मंथन के व्यवहार को अनदेखा करना होगा, थोङे दिन में ठीक हो जाएगा। दस वर्षीय मानव के लिए यह समझना व करना कठिन था। क्योंकि उसने सामान्यतः बच्चों को ऐसा व्यवहार करते नहीं देखा था।

मंथन की स्कूल डायरी से पता लगा कि उसने कक्षा के किसी विद्यार्थी की किताब फाङ दी थी । मैंने प्यार से पूछा कि कक्षा में क्या हुआ तब वह गुस्से में बोला,” उसने मुझे मारा था।”
मेरे पुछने पर कि टीचर ने क्या कहा?, उसने बताया,” मैडम ने मुझे मारा था। मैं सबके साथ नहीं बैठता ज़मीन पर सबसे अलग बैठता हुँ।” मुझे अभिषेक की याद आई थी।

मंथन का कक्षा कार्य बहुत खराब और गंदा था। शायद इसीलिए वह अपनी काॅपियाँ नहीं दिखाता था। मैंने देखा कि उसने काॅपी में गलतियाँ रबङ से मिटाने के स्थान पर ऊँगली व थूक से मिटाई थी।

उससे पूछने पर बहुत रूखाई व नाराज़गी से उसने उत्तर दिया, “मम्मी रबङ नहीं देती व पैंसिल भी आधी देती है जो खो जाती है।”
मंथन का कष्ट समझ आ गया था। उसकी माँ का उत्तर था, ” मै क्या करूँ? यह प्रतिदिन पैंसिल रबङ खो देता है।मैं चाहती हुँ यह जिम्मेदार बने।”
मन में आया कहुँ कि ‘पहले आप स्वयं तो जिम्मेदार बने।’ पर नहीं कहा क्योंकि यह सीखने सिखाने में नहीं आता है।
मैंने उन्हें मंथन की स्कूल की काॅपियाँ दिखाई, जिसे उन्होंने शायद ही पहले देखा था। (माँ नौकरी करती थी)
उन्हें दिखाया कि रबङ के बिना वह कैसे मिटाता है और पैंसिल जो पहले ही आधी थी घिस कर छोटी होने पर वह कैसे लिख पाता होगा? खो जाने पर बिलकुल नही लिख पाता होगा और कक्षा में सबके सामने जिल्लत भी सहनी पङती होगी।
मुझे समझ नहीं आया कि अध्यापिका ने मंथन की शरारत की शिकायत तो डायरी में लिख भेजी थी परंतु उसकी पैंसिल- रबङ की समस्या को महत्व क्यों नहीं दिया गया था।
उन्हें कहा कि ‘ कक्षा में मंथन को अलग बिठाया जा रहा है, इस विषय में उसकी अध्यापिका से चर्चा करें कि ऐसे तो वह तनाव में होकर और विद्रोही हो रहा है।

मंथन उस दिन बहुत खुश था क्योंकि अब वह जमीन पर नहीं डेस्क पर बैठने लगा है।
हमारा बच्चा ही शरारती है, यह सोच कर, अनदेखा नहीं करना चाहिए, उसकी बात सुननी चाहिए व अध्यापिका के संपर्क में रहना चाहिए।

मंथन की समस्याएँ सुलझी, साथ ही मैंने उसका विश्वास भी जीत लिया था।
अब प्रश्न यह है कि क्या बच्चे को जिम्मेदारी का पाठ पढ़ाना चाहिए?

जिम्मेदारी का अहसास बच्चे में अवश्य जगाना चाहिए। लेकिन सजा के माध्यम से हम कोई पाठ नहीं सिखा सकते हैं।सजा से बच्चे के मन में आक्रोश ही पैदा होता है।बच्चे को कुछ सिखाने से पहले हमें उस माध्यम व मार्ग को अच्छी तरह परख लेना चाहिए, जिससे बच्चे को सिखाने जा रहे हैं। साथ ही यह नहीं भूलना चाहिए कि हम सिर्फ सिखा नहीं रहे हैं अपितु सीख भी रहे हैं। अतः अपनी सिखाने की प्रक्रिया को जाँचते रहना जरुरी है।

सीखने- सिखाने की कोशिश- (भाग-8)

हम यह जानते हैं कि देश में भ्रष्टाचार की बीमारी व्यापक रुप से फैली हुई है। हम सब के खून में भ्रष्टाचार बसा हुआ है। हम इच्छा से या अनिच्छा से भ्रष्टाचार के शिकार होते भी हैं और दूसरों को इसका शिकार बनाते भी है। कोई कितना भी सदाचारी हो वह भी मुसीबत पङने पर कमजोर पङ ही जाते हैं।
परंतु दुख तब होता है जब लोग समाजसेवा के नाम पर गरीबों को ठगते है, मुर्ख बनाते हैं।मुझे इनकी कङवी सच्चाई से रूबरू होने का भी अवसर प्राप्त हुआ था।

अक्सर अध्यापकों और गायकों को अधिक बोलने या गले में आवाज़ की नली पर अधिक जोर देने के कारण, आवाज नली में उपस्थित गाठें उभर आती है, जिससे उनकी आवाज़ तो ख़राब होती ही है साथ ही दर्द भी होता है। मैं इस तकलीफ की शिकार हो गई थी अतः डाक्टर की सलाह से स्कूल में पढ़ाना छोङ दिया था।स्वस्थ होने के बाद दो सामाजिक संस्थाओं में काम किया था।

इन सामाजिक संस्थाओं में वे बच्चें पढ़ने आते जो सरकारी स्कूलों में पढ़ते थे, शाम को डेढ़ दो घंटे के लिए यहाँ ट्यूशन पढ़ते थे। इन संस्थाओं का उद्देश्य था कि चूंकि सरकारी विद्यालयों में ठीक से पढ़ाया नहीं जाता है अतः उन कमियों को यहाँ दूर किया जाए।
जिसके लिए उनके पास कार्यकर्ता थे, जो इन बच्चों को पढ़ाते थे। पर दुख हुआ यह देखकर कि इस उद्देश्य की मात्र खानापूर्ति हो रही थी। एक कार्यकर्ता के पास 30-40 अलग-अलग आयू वर्ग व अलग-अलग कक्षाओं के विद्यार्थी थे। यह कार्यकर्ता इन बच्चों की पढ़ाई में आने वाली कठिनाईयाँ को दूर करना तो दूर वह तो उनकी कठिनाईयाँ समझ भी नहीं पाते थे।

इनमें से एक संस्था ने बच्चों की नियमित उपस्थिति के लिए, प्रत्येक बच्चे को मासिक 100रूपये देने का प्रावधान किया था, अतः बच्चें लालच में नियमित आते लेकिन उन्हें पढ़ाने के लिए न तो उनके पास अच्छे व पर्याप्त शिक्षक थे न अच्छी शिक्षण सुविधाएँ थीं। यहाँ भी एक कार्यकर्ता के पास 40 से अधिक बच्चे थे।जिनमें से किसी के पास फटी काॅपी थी तो किसी के पास वह भी नहीं थी । कार्यकर्ता व बच्चे समय बिताकर चले जाते थे ।
बच्चों के लिए यहाँ आना खेल था और अभिभावकों के लिए भी कुछ आर्थिक सहायता चूंकि एक परिवार में अगर 5-6बच्चे हैं तो थोङी आय ही सही पर उनके लिए यह भी सहारा था।

मैंने एक दिन देखा कि सभी बच्चों को अच्छे कपङे पहन कर आने के लिए कहा गया था। शायद वह 14 नवंबर का दिन था बालदिवस, फिर दीवाली का त्योहार भी आने वाला था। अतः उस दिन संस्था में कई प्रतियोगिताएँ आयोजित की गई थी। मुझे रंगोली प्रतियोगिता का निरीक्षण करना था। लङकियों की रंगोलियों से प्रांगण जगमगा उठा था।उन छात्राओं ने बताया कि उन्होंने रंगोली बनाना अपने-अपने विद्यालयों में सीखा है। इस संस्था में कला या संगीत शिक्षा की कोई व्यवस्था नहीं है ।

कुछ समय मिलने पर मैं उस स्थान पर गई जहाँ संगीत व नृत्य प्रतियोगिता हो रही थी। बच्चे अपनी पसंद के फिल्मी गीत गा रहे थे व नृत्य कर रहे थे। एक कमरे में चित्रकला प्रतियोगिता हो रही थी और नन्हें कलाकार अपना कला कौशल अपने चित्रों में बिखेर रहे थे। इसके अतिरिक्त एकल नाट्य प्रतियोगिता को देखते हुए मैं सोच रही थी, ये कलाकार स्वयं पारंगत हैं, यदि इन्हें प्रशिक्षण दिया जाए तो इनकी कला सोने की तरह चमक सकती है।
पर इस संस्था में यह सब एक दिन का तमाशा था, यहाँ इनके इन गुणों को विकसित या निखारने की सोच भी नज़र नहीं आ रही थी।

हम कार्यकर्ताओं ने ही मिलकर प्रतियोगिताओं का परिणाम तैयार किया, फिर संस्था के संचालकों और अधिकारियों ने विजेताओं के नामों की घोषणा करते हुए उन्हें पुरस्कार भी दिए। कई फोटो लिए गए।
यह समझा जा सकता था कि ये सब किसलिए किया जा रहा है।इन सभी फोटो को दिखाकर व रजिस्टर में सभी छात्रों की नियमित उपस्थिति गिनाकर, संस्था सरकार से अनुदान प्राप्त करेगी। विदेशी दानकर्ता भी इनकी इन झूठी तस्वीरों की सच्चाई जाने बिना इन संस्थाओं को प्रसन्नता से दान करेंगे। इस तरह संचालक अपने खातों को तो भर लेंगे, पर इन गरीब बालकों के लिए वे कुछ सार्थक कार्य करेंगे ऐसी दृष्टि नहीं नज़र आई थी।

ये सामाजिक संस्थाएँ किसी राजनीतिक दल या मंत्री के सरंक्षक में फल-फूल रही थी।
दुख इस बात का है कि ये लोग गरीबो को झूठी दिलासाएँ देकर इन्हें मूर्ख बनाते हैं और बच्चों का भविष्य निखारने के स्थान पर उनका मजाक बनाते हैं।

परंतु ऐसा नहीं कि सभी सामाजिक संस्थाएँ धोखा हैं, कुछ लोग बहुत मन से काम कर रहें है। बाद में मैंने जिस संस्था में कार्य किया था, वह संस्था विकलांग व मानसिक दृष्टि से पिछङे विशेष बच्चों के लिए कार्य कर रही है। यहाँ काम करके खुशी मिल रही थी।
अपना विद्यालय खोलने के शुरूआत के दिनों में मेरे पास ऐसे विशेष एक- दो बच्चे पढ़ने आए थे पर कई कठिनाईयों के कारण मैंने उन्हें अपने विद्यालय में प्रवेश के लिए मना कर दिया था। अब मुझे इन बच्चों को जानने का अवसर मिला था।

इस संस्था ने इन विशेष बच्चों के लिए सभी सुविधाओं का प्रबंध किया था। समस्त चिकित्सा सुविधाओं के अतिरिक्त, इनकी शिक्षा के लिए प्रशिक्षित अध्यापिका व तकनीकि शिक्षा का भी प्रबंध था।
चूंकि इन बच्चों को पढ़ाने के लिए मैं प्रशिक्षित नही थी इसलिए मैं इस संस्था में ऑफिस का काम देख रही थी। पर जब समय मिलता मैं बच्चों के साथ समय व्यतीत करती थी। इन बच्चों से मिला इनका निश्छल प्रेम आज भी मन को खुशी देता है।

ऐसे विद्यालय भी होते हैं जो गरीब और निम्न तबके के बच्चों के लिए खोले जाते हैं।फीस बहुत कम होती है। ऐसे भी एक विद्यालय में पढ़ाने का अवसर मिला था। मैंनें देखा कि कुछ परिवारों के लिए कम फीस देना भी कठिन था। इसका मुख्य कारण था कि पिता के पास काम नहीं होना या काम करने की इच्छा भी नहीं होना अथवा उनका शराबी होना । कारण जो भी हो पर फीस न देने के कारण कुछ बच्चों को स्कूल में अपमानित होना पङता था। इन परिवारों में बच्चों की परवरिश के लिए कोई गंभीर सोच नहीं होती है।

जो अपने बच्चों के लिए सपने देखते हैं, वे मेहनत मी करते हैं। इन बच्चों के अच्छे भविष्य के लिए वे उन्हें इन स्कूलों में भेजते है। इस स्कूल में अध्यापिकाएँ बहुत मन से पढ़ाती थी। पर पढ़ाई में कमज़ोर बच्चों के लिए कोई विशेष कार्यक्रम नहीं बनाया गया था।

मैं यहाँ 6th से 8th कक्षाओं को इंगलिश पढ़ा रही थी । यहाँ कक्षाओं में 20-25 बच्चे ही थे, इसीलिए हम सभी विद्यार्थियों पर ध्यान दे सकते थे। मैं छठी कक्षा की कक्षा अध्यापिका थी, यह मेरी ख़ास कक्षा भी थी क्योंकि यह विद्यालय की सबसे अनुशासित कक्षा थी। मै इन्हें इंगलिश पढ़ा रही थी, वे सब बहुत रुचि व शौक से इंगलिश पढ़ रहे थे, जो समझ नहीं आता तो प्रश्न भी करते थे, तब पढ़ाने में आनंद भी आता था।

मुझे संतुष्टि थी कि यहाँ विद्यार्थियों की नींव अच्छी थी, पर सिर्फ उन्हीं विद्यार्थियों की नींव मज़बूत थी जो यहाँ आरंभ से पढ़ रहे थे। पर जो विद्यार्थी दूसरे स्कूलों से या सरकारी स्कूलों से आए थे, उनकी स्थिति बहुत ख़राब थी। उनके अभिभावकों ने पिछले स्कूलों से निकाल कर उन्हें इस स्कूल में प्रवेश इसीलिए कराया होगा कि इन विद्यार्थियों की पढ़ाई में सुधार आएगा । मुख्याध्यापिका ने उन बच्चों को पैसे के लिए प्रवेश दे तो दिया पर उनकी कमियाँ दूर करने के लिए विशेष प्रयास नहीं करे ।

ये छठी से दसवी कक्षा के विद्यार्थी थे, जो मात्र इसीलिए पास होते आए थे कि सरकारी नीतियों के अनुसार आठवीं कक्षा तक सभी विद्यार्थियों को पास किया जाए।
आरंभ में मैं बहुत हैरान रह गई थी, पहले सत्र की परीक्षा ली गई थी और सातवीं से दसवीं तक सभी कक्षाओं के एक- दो विद्यार्थी ऐसे थे जिन्होंने पेपर में कुछ नहीं लिखा था या लिखा भी था तो वो जिस भाषा में लिख रहे थे वह किसी की भी समझ के बाहर था । मैंने मुख्याध्यापिका को वे पेपर दिखाए, उन्होंने कहा, ” आप इन्हें नंबर मत दीजिए व इनके पेपर अभिभावकों को दिखाएँगे।”

मेरे लिए यह अत्यंत हताशा का दिन था, जब रिजल्ट में मुख्याध्यापिका ने ज़ीरो से पहले चार लिखकर उसे चालीस बना दिया और विद्यार्थी को पास कर दिया था। उनका तर्क था, ” क्या करें सरकारी नीति के अनुसार इन्हें फेल नहीं कर सकते और इनके अभिभावक इस नीति के आधार पर हम से लङाई करेंगे कि उनके बच्चे को फेल क्यों किया?”

सब कुछ स्पष्ट था कि ये विद्यार्थी बिलकुल निश्चित है कि वे कभी फेल नहीं हो सकते, अतः पढ़ना समय की बरबादी है,वे स्कूल सिर्फ इसीलिए आते कि उनके अभिभावक जबरदस्ती भेजते थे, यहाँ वे समय बिताने और अध्यापिकाओं की डाँट या मार बेशरमी से सहते पर मन में किसी के लिए सम्मान भी नहीं रखते थे। और क्यों रखते क्या हम उनके भविष्य के लिए कुछ कर रहे थे?

पहली बार जब उन्होंने शायद किसी बहुत छोटी कक्षा में पेपर में कुछ नहीं लिखा होगा और रिजल्ट पास का आया होगा, उसी दिन उन्हें यह खेल मज़ेदार लगा होगा। बङे होने तक यह खेल खेलने की आदत बन चूकी थी।

हम किसे बेवकूफ बना रहे थे, इन बच्चों को, इनके अभिभावकों को या स्वयं अपने को….। हम क्या स्वयं शिक्षा का अर्थ जान सके हैं? हमने शिक्षा को पास-फेल का खेल बना दिया है।

नीति निर्धारकों ने ऐसी नीति बनाते समय, किस सोच को आधार बनाया था? क्या यह ख्याल बनाया कि हमारे देश के प्रत्येक नागरिक के पास आठवी कक्षा का सार्टिफिकेट होगा? अगर यही सोच थी तो जिसने भी आठवी कक्षा तक पढ़ाई की उसको आठवीं का सार्टिफिकेट तो मिल ही गया है, पर ज्ञान? क्या उन्हें जो कक्षा में पढ़ाया गया उसका ज्ञान है, जो किताबें उन्हें दी गई वे उन्हें पढ़ सके उसमें दिए गए ज्ञान को ग्रहण कर सके?

ऐसे विद्यार्थी क्या आठवी के बाद आगे की कक्षाओं को पढ़ सके? नहीं, आगे की कक्षाओं को पास करने के लिए पढ़ना जरूरी था और पढ़ना उन्हें आता नहीं था। बेसिक शिक्षा का ज्ञान भी उन्हें नहीं था।

अब नीति में परिवर्तन आया है कि पांचवी कक्षा तक किसी विद्यार्थी को फेल नहीं किया जा सकता है ।आठवीं से नीचे पांचवी तक पास होने की छूट दी गई है पर उसका लाभ?
क्या बदलेगा? एक पांच साल का विद्यार्थी परीक्षा में कुछ लिख कर नहीं आता हैं, वह जानता है उसने कुछ नहीं किया पर वह अगले साल दूसरी कक्षा में पढ़ाई करेगा, फिर तीसरी….। उसे पहली कक्षा की भी पढ़ाई नहीं आएगी और वह पांचवी कक्षा में होगा। उसके लिए स्कूल क्या होगा?
क्या यह मासूमों की ज़िन्दगी से खिलवाङ नहीं है?

पास- फेल का ज्ञान से मतलब नहीं हैं, पर शिक्षा का तो ज्ञान से मतलब है । क्या नीति- निर्धारकों को सभी शिक्षकों और विद्यालयों के संस्थापकों को इस नीति का स्पष्ट उद्देश्य नहीं समझाना चाहिए। प्रत्येक विद्यार्थी पर पास- फेल का बोझ नहीं डालना है, पर उसे शिक्षा तो देनी है, यदि किन्ही कारणों से वह अपनी कक्षा की पढ़ाई नहीं सीख सका है तो इसका अभिप्राय यह नहीं है कि उसे अगली कक्षा की किताबें पकङा दी जाए।

ऐसे विद्यार्थियों के लिए कोई विशेष व्यवस्था की जाए, कारणों पर ध्यान दिया जाए और उनकी मदद की जाए। शिक्षा का अर्थ ज्ञान है जो बोझिल नहीं हो सकता है। हमारा कर्तव्य है कि किसी के लिए भी ज्ञान को बोझिल न बनने दें।

यह बात समझ नहीं आती कि सरकार का डंडा है कि सभी बच्चों को पास करना है और इसी कारण सभी को पास कर दिया जाता है, यह जानते हुए भी कि उस विद्यार्थी को अभी इस कक्षा की पढ़ाई नहीं आई है, उसे अगली कक्षा में भेज कर अपना कर्तव्य पूर्ण कर दिया जाना कैसे ठीक है?
यह गरीब व अनपढ़ माता- पिता कैसे समझे कि इनके बच्चे सिर्फ कागजों में पास होते हैं ?।

मुख्याध्यापिका जो स्कूल प्रबंधक की ही बेटी थी, अपनी शादी की तैयारी में व्यस्त रहीं, फिर नई ससुराल की समस्याओं से घिरी थी।
फिर भी इन कम आयु की मुख्याध्यापिका से इस विषय पर चर्चा करने की कोशिश की पर उन्होंने मुझे डंडा पकङा दिया और कहा, ” यहाँ जो विद्यार्थी आते हैं वह डंडे की भाषा समझते हैं।”

यह पहला स्कूल देखा जहाँ अध्यापिकाएँ स्कूल में डंडा लिए घूमती थी। पर मैं ऐसा नहीं कर सकती थी। अन्य अध्यापिकाओं से बात करने पर पता चला कि इन एक-दो विद्यार्थियों का सभी विषयों में ऐसा ही हाल था।

मैंने ही इन छात्रों से बात करने का प्रयास किया और कहा पेपर खाली दिया तो दूबारा पेपर कराऊँगी। उन्हें समझाया कि सभी प्रश्न का उत्तर दें, रटा हुआ नही है तो भी प्रश्न समझ कर स्वयं उत्तर बना कर लिखने का प्रयास करें।
इंगलिश में उत्तर देना कठिन था पर मेरे विचार से रट कर लिखना अधिक कठिन था। उन्हें कहा कोशिश करने पर नंबर दिए जाएंगे। अब जो कोशिश कर सकते थे उन्होंने कोशिश शुरू कर दी, कम से कम परीक्षाओं को खेल समझना बंद किया। यूँ ये विद्यार्थी विशेष रूप से लङके बेहद लापरवाह हो गए थे और पढ़ाई में बहुत पिछङ चुके थे, पर मेरी कोशिश ज़ारी थी।

आठवी कक्षा का सामाजिक ज्ञान हिन्दी में था, यह भी मैं पढ़ा रही थी, अतः सभी विद्यार्थियों को मैंने प्रोत्साहित किया कि वे रट कर न लिखे, अपनी भाषा में उत्तर दें। स्वयं उत्तर तलाशे, अन्यथा उन्हें तो गाइडे पकङा दी गई थी। मैंने गाइडे हटा दी और कहा कठिनाई हो तो मेरी सहायता लें।
जो बच्चे रट नहीं सकते थे वह खुश हुए, मुझे खुशी थी कि आठवी कक्षा के सभी विद्यार्थी सामाजिक ज्ञान में रूचि ले रहे थे। अपने शब्दों में उत्तर न केवल लिख रहे थे अपितु स्वयं विचार कर भी अपना तर्क या तथ्य जोङने लगे थे।

मैं चाहती थी कि उनका दिमागी व्यायाम हो,और यह धीरे- धीरे शुरू हो गया था। कठिन था, चूंकि बच्चों को स्वयं विचार कर अपने शब्दों में लिखने की आदत नहीं थी, पर उन्हें कोशिश करना अच्छा लग रहा था।
मैं खुश थी कि कुछ विद्यार्थी अपनी स्वयं लिखी कहानी, कविताएँ मुझे पढ़ाते और मेरा प्रोत्साहन उन्हें खुशी दे रहा था।

सीखने-सिखाने की कोशिश- (भाग-7)

मैंने इस प्रतिष्ठित स्कूल में कक्षा प्रथम को पढ़ाया था। यह एक पुराना व प्रसिद्ध स्कूल था। फ़ीस भी अधिक नहीं थी। मध्यम व निम्न मध्यम वर्गीय परिवारों के बच्चे यहाँ पढ़ने आते थे। स्कूल में बच्चों की संख्या का अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि प्रत्येक कक्षा के 9 सेक्शन थे। प्रथम कक्षा के ही सेक्शन A से सेक्शन I तक थे। तब भी एक सेक्शन में 40-45 विद्यार्थी थे।

हम सभी अध्यापिकाओं को एक समान कार्य कराने की हिदायत थी। मैं और कान्ता मैडम नई अध्यापिकाएँ थी। हमें अपनी सीनियर अध्यापिकाओं के कार्यों की नकल ही अपनी कक्षा के बच्चों को करानी होती थी, कोई भी मौलिक कार्य नही करा सकते थे। सभी सेक्शनस की अध्यापिकाओं के बीच प्रतियोगिता रहती थी कि किस की कक्षा का विद्यार्थी सभी प्रथम कक्षाओं मे उच्चतम स्थान प्राप्त करेगा।

प्रथम कक्षा में सभी विषय कक्षा अध्यापिका को ही पढ़ाने थे, पर कंप्यूटर की अध्यापिका अलग थी। नैतिक शिक्षा जैसा कोई विषय नहीं था। दुख की बात थी कि कोई खेल का पीरियड नहीं दिया था। बाद में हम सभी अध्यापिकाओं के बार-बार अनुरोध करने पर प्रथम कक्षा को खेल व ड्राइंग पीरियड भी मिले व उनके लिए खेल व ड्राइंग अध्यापिकाएँ भी मिलने से हम कक्षा अध्यापिकाओं का कार्य आसान हो गया था।

मेरा पहला दिन था उस स्कूल में और मैं अपना कार्यभार संभालने से पूर्व कुछ औपचारिकताएँ पूर्ण कर रही थी। हमारी इंचार्ज ने मुझे कुछ फार्म भरने के लिए दिए व बताया कि कल से आप ‘प्रथम जी’ की कक्षाध्यापिका का पद संभालेंगी। मैं स्टाफ रूम में बैठी, वे सब फार्म भर रही थी कि वहाँ उपस्थित एक अध्यापिका ने प्रश्न किया कि “आप को कौन सा सैक्शन मिला?”
मेरे जवाब देते ही “जी” वहाँ बैठी सभी अध्यापिकाएँ एक साथ ही बोली,” अरे! अभिषेक की क्लास, फिर तो बहुत मुश्किल आने वाली है।” बाद में ऐसी प्रतिक्रिया सभी दे रहे थे, मानों वह पांच-छः साल का बालक कोई आफत का परकाला हो। जिस अध्यापिका से मैं अपने कार्य की जिम्मेदारी ले रही थी, वह बोली, ” मैंने तो अभिषेक से मुक्ति पाई, अब आप संभालें ।” फिर मुस्करा कर बोली,” वैसे बाकी क्लास तो ठीक है पर एक अभिषेक पूरी क्लास के बराबर है।”

अगले दिन मैं अभिषेक से मिलने के लिए उत्सुक लिए कक्षा प्रथम जी में पहुँची, पूरी क्लास में नज़र दौङाई कि अभिषेक कौन हो सकता है? कक्षा के आगे भाग के कोने में एक तरफ एकमात्र डेस्क था, वह खाली था। मैंने विद्यार्थियों से बात करना शुरू करी व उनसे उनका परिचय लेना आरम्भ किया तभी दरवाजे पर एक बालक आकर खङा हुआ और वह कक्षा में आने की अनुमति मांग रहा था, कक्षा में फुसफुसाहट हुई कि अभिषेक आ गया….। मैंने देखा सिर पर अच्छी तरह तेल लगाए, व बाल भी ढंग से बने थे, कपङे भी साफ, जूते भी चमकते हुए थे, कहीं कोई कमी नहीं थी। आँखों में शरारत थी व चेहरे पर उद्दंडता थी या मेरे पुर्वाग्रह के कारण मुझे उसमें शैतानियत नज़र आ रही थी।

वह अंदर आया और मुझे गुडमाॅर्निग भी कहा व उसी कोने के एकमात्र डेस्क पर जाकर बैठ गया था, बिलकुल अकेला। मैंने देखा और कहा,” सबसे अलग क्यों बैठे हो? कक्षा में किसी दूसरे विद्यार्थी के साथ क्यों नहीं बैठते हो?” कहते हुए मैंने कक्षा में नज़र दौङाई कि उसे कहाँ किसके साथ बैठा सकती हुँ कि उससे पहले ही सभी बच्चे बोल उठे कि ” नहीं! हम इसे अपने पास नहीं बैठा सकते हैं।”

कक्षा माॅनिटर रूबी बोली,” मैडम यह बहुत गंदा बच्चा है, सभी मैडम इसे यहाँ अलग बिठाती हैं।” अभिषेक भी शैतानियत भरी हँसी लिए मुस्करा रहा था।

मुझे यह प्रबंध पसंद तो नहीं आया था पर जिस तरह सभी बच्चों की प्रतिक्रिया थी, उसे देखते हुए मैंने उस समय चुप रहना ही ठीक समझा था। काम कराते समय मैंने पाया कि उसकी काॅपियाँ फटी हुई थी। कोने में बैठा होने के कारण उसको ब्लैक बोर्ड से काम उतारने में भी कठिनाई थी। अवसर मिलते ही उसने कक्षा के एक लङके को जाकर एक घूँसा मारा अर्थात अलग बैठने के बाद भी वह अन्य बच्चों को परेशान कर रहा था।
लंच के बाद मैंने उसे रूबी के पास बैठा दिया, रूबी को अच्छा नहीं लगा, पर मैंने कहा, ” अभिषेक सबसे अलग नहीं बैठेगा, सबके साथ बैठेगा।”
अभिषेक से भी कहा कि वह रूबी को तंग नहीं करेगा। उस समय तो वह भी खुश था और शांत बैठा रहा था।

छुट्टी के समय मुझे उसकी माँ मिली तब मैंने उनसे अभिषेक की सभी काॅपियाँ फटी होने के विषय में बताया व नई काॅपियाँ कवर लगा कर भेजने को कहा। लेकिन उनकी प्रतिक्रिया व जवाब से बहुत दुःख हुआ।

वह हँसते हुए बोली,” अरे, फिर फाङ दी काॅपियाँ, कोई बात नहीं मैडम कोई दिक्कत नहीं हैं, नई खरीद देंगे। क्या करे बहुत शैतान है? हमने पहले वाली मैडम को भी बोला था कि काॅपियाँ फट जाए तो बता दिया करे, पैसे की कोई समस्या नही है।”

उनके इस गैरजिम्मेदारना जवाब से हैरान हो कर मैंने उन पर ठीक से निगाह डाली, देहाती परिवेश, शायद बहुत कम शिक्षित, लेकिन इससे क्या फर्क पङता है क्योंकि शिक्षा का जिम्मेदारी से कोई संबध नहीं होता है। उस समय मेरे पास उन्हें समझाने का समय नहीं था, पर मैंने उन्हें अगले दिन मिलने के लिए बुलाया था।

उनके बारे में पता लगा कि कई वर्षों की प्रतीक्षा के बाद उन्हेँ संतान प्राप्ति हुई है, संतान वह भी पुत्र, अतः अभिषेक के लिए सब कुछ न्योछावर कि उसका भला बुरा भी नहीं सोचना है। पिता कोई कारोबार करते थे, पैसे की कोई कमी नहीं थी। यह भी सुना कि वह एक बदलिहाज व्यक्ति है कि कोई अध्यापिका उनसे बात करना पसंद नहीं करती है ,बच्चे की शिकायत पर वह उल्टा अध्यापिकाओं को कङे ज़वाब देते है।यह भी कि फिर उन्हें इतना गुस्सा आता है कि वह अपने लाडले की जूते-चप्पलों से पिटाई लगा देते है।पर आँख के तारे की सभी जिदे व मांगें भी पूरी करते है।
मुझे बिलकुल समझ नहीं आते ये माता-पिता, बच्चों के लाड-प्यार में भी आगे और मारने में भी पीछे नहीं है।

माँ से मिलने पर उन्हें काॅपी, कागज और उस पर किए गए काम का महत्व समझाया यह भी कि बच्चे को मार कर नहीं संभालते व दृढ़ता पूर्वक कहा कि कक्षा में हम ध्यान रखेंगे और घर पर आप ध्यान रखें कि काॅपी- किताबें न फटे।

कक्षा में मैंनें अभिषेक को बारी-बारी से हर बच्चे के साथ बिठाना शुरू किया था, अभिषेक को समझाया कि सबके साथ बैठना है तो किसी को तंग नहीं करना है। पर एक दिन में ऐसे उद्दंडी बच्चे को बदला नहीं जा सकता था। उसके कारण मुझे भी सचेत रहना पङता था कि वह कक्षा में परेशानी न खङी कर दे।गालियाँ तो ऐसी देता था, वो उसके परिवेश का ही परिणाम था। कहा जाता है कि बच्चे की प्रथम पाठशाला उसका परिवार होता है। अतः उसके माता-पिता से मिलना जरूरी था।

उसके पिता से भी P.T.M(parent-Teacher meeting) में बात हुई थी। देखने में ही वह उज्जड और अक्खङ दिखते थे, पर उन्होंने मेरी बातों को ध्यान से सुना था और व्यवहार में भी लिहाज था। शायद इसीलिए कि मैं अभिषेक की शिकायत नहीं कर रही थी, सिर्फ समस्या बता रही थी। वह गाली दे रहा है नहीं ‘वह सीख रहा है।’ सीख रहा है इस पर मैंने ज़ोर दिया था। और यह भी कि समस्या घर से आ रही है, इस सच्चाई को उन्होंने समझा था।

कक्षा में मैंने ध्यान किया कि वह सीधे बच्चों को कम परेशान करता है। उसकी परेशानी दूसरे शरारती बच्चों के साथ अधिक थी, अतः उसकी शिकायतों पर भी ध्यान दिया था।
काफी कोशिशों के बाद मुझे यह समझ आया कि जो पढ़ाया जाता है, उसे समझ आता है व अब प्रश्न करने पर वह उत्तर भी उत्साह पूर्वक देता था। अब काॅपियाँ नहीं फटती थी, इसीलिए उसकी ट्यूशन टीचर उसे पढ़ा पाती थी, जिससे परीक्षा में सही नंबर प्राप्त करता था। कक्षा में सभी बच्चों के बीच बैठकर वह खुश था।

जैसा मैंने पहले भी बताया था कि शैतान बच्चे दुःसाहसी होते हैं, अभिषेक इसका सबसे अच्छा उदाहरण था। हमारी कक्षा ऊपरी मंजिल में थी। एक दिन नीचे मैंदान में कोई खेल खेला जा रहा था, अभिषेक पानी पीने कक्षा के बाहर गया था। तभी वह खेल देखने के लिए सीधे रेलिंग से ही कूदना चाहता था, यदि किसी बङी कक्षा के विद्यार्थी ने उसे न देख लिया होता तो मैं उसके माता-पिता को अपना मुँह नहीं दिखा सकती थी। अब मैं उसे कक्षा से बाहर कभी अकेले नहीं भेजती थी।

सत्र के अंत तक वह बहुत संभल चूका था। वह दूसरी कक्षा में पहुँचा । उसकी दूसरी कक्षा की अध्यापिका मुझे मिली और एक प्रकार से मेरे काम में कमी निकालते हुए बोली कि “आपने अभिषेक की लिखाई पर ध्यान नहीं दिया था, अब मैं सिखा रही हुँ तो बहुत अच्छा लिख रहा है।
मैंने उन्हें जवाब नहीं दिया क्योंकि मेरे लिए यही कामयाबी थी कि वह काम कर रहा है और अब कोई अभिषेक से परेशान नहीं है। मुझे अभिषेक के लिए खुशी हो रही थी कि उसे एक अच्छी अध्यापिका मिली है जो उसके साथ मेहनत कर रही हैं।

हमने कई वर्षों की परतंत्रता से कङे संघर्ष के बाद मुक्ति पाई है। उस गुलामी ने हमें कई तरह से अपमानित और प्रताङित किया था। लेकिन इसके बाद भी हम आज भी अपनी सोच और संस्कारों के इतने गुलाम है कि हम बिना विचारे गर्व के साथ दूसरे का जातिगत, छुआ-छुत के आधार पर अपमान करते हैं। दुःख तब बहुत होता है जब यह भेद रंग के आधार पर किया जाता है। हम हिन्दूस्तानी गोरे कब हुए? सिर्फ थोङा- बहुत रंग के शेड में अंतर मिल सकता है। अगर हम इस थोङे अंतर पर आपस में एक दूसरे का अपमान कर सकते हैं तब अंग्रेजों को बुरा क्यों कहा जाता है? वे तो विदेशी थे, हम पर राज करने आए थे। ऐसी सच्ची घटनाएँ व कहानियाँ पढ़ने व सुनने को मिलती है जिनमें गोरों द्वारा रंग के कारण हमारे लोगों को प्रताङित किया गया था और अंग्रेज़ों के विरूद्ध हमारा खून खौल उठता है । पर हम स्वयं अपने ही लोगों के साथ भेद-भाव का कैसा व्यवहार कर जाते हैं? यह सोचा है?

कबीर जी ने कहा है,” दोस पराए देखि करि, चला हसन्त हसन्त,
अपने याद न आवई, जिनका आदि न अंत।”

मैं अपनी प्रथम कक्षा ले रही थी तभी मेरे पास एक नोटिस आया कि हमें एक कार्यक्रम के आयोजन के लिए अपनी प्रथम कक्षा में से एक छात्रा का चुनाव करना है। छात्रा का उच्चारण शुद्ध व स्पष्ट हो, उसमें आत्म विश्वास हो, स्मरण शक्ति अच्छी हो व आवाज भी अच्छी होनी चाहिए। छात्रा को तितली या परी की भूमिका मिलेगी।

मेरी कक्षा में 40-42 बच्चों में से छात्राएँ सिर्फ 10 ही थी। यह हमारा दुर्भाग्य है कि इतनी जनसंख्या के बाद भी लङकियों की संख्या बहुत कम है, उस पर उन्हें शिक्षित करने की दिशा में सोच निराशाजनक है।

मैंने सभी छात्राओं पर निगाह डाली, सभी परी व तितली दिख रही थी। मुझे ऐसी छात्रा का चुनाव करना था जो इन सब योग्यताओं में खरी उतरे। और मैंने संध्या को देखा, सांवली सलोनी संध्या जब अपनी मधुर आवाज़ में कविता पाठ करती थी, तो उच्चारण में एक-एक नुक्ता और बिंदू भी पता लगते थे और पूरी कक्षा आनंद लेती थी। मुझे उससे योग्य कोई न दिखी और मैंने उसका नाम भेज दिया।

रिहर्सल का पहला दिन था संध्या भी संगीत अध्यापिका के पास रिहर्सल के लिए गई थी। अन्य बच्चे मेरे द्वारा दिया कक्षा-कार्य कर रहे थे। तभी प्रथम कक्षा इंचार्ज संध्या के साथ आईं और मुझ से हैरानी से सवाल किया ,” आपने इसे अपनी कक्षा से चुना है? कोई और योग्य छात्रा नहीं मिली?”
मैंने प्रत्युत्तर में पूछा, ” क्यों क्या हुआ, संध्या ने क्या किया? ” उन्होंने मुझ से इस तरह से देखा जैसे मैं नासमझ हुँ और धीरे से बोली,” शक्ल तो देख ली होती?”
मैंने संध्या को उसकी सीट पर भेजा और उनसे पुछा, ” क्या संध्या के उच्चारण, आवाज़ या आत्मविश्वास में कमी है?”
उनका जवाब था,” नहीं, पर हम इन्हें परी या तितली बनाना चाहते है और यह सांवली है, आपकी कक्षा में अन्य कोई गोरी सुंदर छात्रा होगी?”
उनसे बिना बहस किए मैंने कहा कि “मेरी कक्षा में से तो संध्या को ही लिया जाएगा अन्यथा किसी को भी नहीं लिया जाए।”
कार्यक्रम में संध्या ने भाग लिया और अच्छी प्रस्तुति दी थी। और मैं आज तक सोचती हुँ कि क्या तितली या परी सांवली नहीं होती क्या ?

जैसे हम होते है वैसे ही हमारी कल्पनाएँ होती है तो परी भी हमारी जैसी होगी और तितली? उसके रंग तो किसी विशेष रंग से बंधे नहीं होते है।

कारण जो भी हो यह एक बच्चे के मन में हीन भावना का अहसास भरना था। हम इस तरह जाने-अनजाने बच्चों के अंर्तमन को कलुषित करके उनके विकास को बाधित करते हैं।

कबीर जी यह भी कहते है,” कबीर गर्व न किजीये, देहि देखि सुरंग,
बिछुरै पर मेला नहीं, ज्यों केंचुली भुजंग।”

हमें चूंकि अपनी सीनियर अध्यापिका के कार्यों का ही अनुसरण करना था तो मैं वैसा ही कार्य करा रही थी। लेकिन एक दिन कक्षा में तोते के विषय में पाठ पढ़ा कर उसका अभ्यास कार्य करा रही थी। प्रश्न था कि तोता किस रंग का होता है? पाठ के अनुसार सीनियर अध्यापिका ने उत्तर में सिर्फ हरा रंग ही लिखाया था। परंतु मेरी कक्षा के सचिन ने मुझ से कहा कि उसने तो चिङियाघर में लाल और नीले रंग के भी तोते देखे हैं। उसकी बात में सच्चाई थी, पाठ लिखने वाले को इस बात का ध्यान रखना चाहिए था। कक्षा के अन्य विद्यार्थी भी अब सचिन की बात का समर्थन कर रहे थे। अतः यहाँ मैंने उत्तर थोङा बदल कर लिखा दिया था।

अन्य घटना इससे मिलती-जुलती घटी कि पाठ था परिवार के सदस्य क्या-क्या काम करते है। पाठ के अनुसार माता खाना बनाती है व घर के अन्य काम करती हैं। पिता नौकरी या पैसा कमाने के लिए अन्य कोई कार्य करते है और बाजार से फल, सब्जी इत्यादि लाते हैं।
अब उसी के अनुसार अभ्यास प्रश्न था कि” आप के घर में बाजार का सामान कौन लाता है?
उत्तर लिखाया गया था,”पिता”
नवीन लिखते हुए रुक गया , क्योंकि उसने उत्तर दिया,” मेरे पापा कुछ नहीं करते, सब काम माँ करती है।”
साथ ही अङ भी गया” मैं उत्तर में पिता नहीं लिखूँगा।”

उसके साथ कुछ दूसरे विद्यार्थियों की भी यही प्रतिक्रिया थी।
यही नही फिर उनसे पाठ पर चर्चा करी तो जो उत्तर मिले उसने मुझे सोचने के लिए मजबूर किया।
कुछ विद्यार्थी मुझे बता रहे थे कि उनकी माँ भी नौकरी करती है या अन्य कार्य करती है और पैसा घर लाती हैं। यह 5-6 वर्ष के बच्चे मुझे याद दिला रहे थे कि समाज बदल रहा है और वह इसी बदले समाज को जानते है।

जो तथ्य बच्चे देख रहे थे उसे किताब लिखने वाले ने क्यों नहीं देखा?
मैंने उन्हें उत्तर लिखने के लिए चुनाव करने दिया कि वे जैसा अपने परिवार में देख रहे है उसके अनुकुल उत्तर दे सकते हैं।

परीक्षा में विद्यार्थियों के पेपर जाँचने का नियम था कि कक्षा अध्यापिका अपने विद्यार्थियों के पेपर नहीं जाँचती थी अन्य सैक्शन की कक्षा अध्यापिका जाँचती थी। अतः मैंनें अन्य अध्यापिकाओं को बताया कि” मैने उत्तरों में क्या बदलाव किए है?” वे सब मुझ से सहमत होते हुए भी हैरान थी कि “आपकी कक्षा के विद्यार्थी इतने सवाल क्यों करते है?” शायद मै उन्हें अपनी बात कहने की स्वतंत्रता दे रही थी।

मेरे विचारों से हमें बच्चों से अवश्य सभी विषयों पर चर्चा करनी चाहिए, जिससे उनमें सोचने- विचारनें के प्रति रुझान विकसित हो सके, साथ ही अपने विचार प्रकट करने की झिझक दूर हो। हमें उन्हें सुनना चाहिए और यह विश्वास देना चाहिए कि आप उन्हें समझ रहे हैं।
लेकिन इसके लिए आवश्यक है कि कक्षा में छात्रों की संख्या कम हो, जिससे अध्यापक आसानी से चर्चा के लिए समय दे सके व प्रत्येक बच्चे को सुन सके। अन्यथा जैसा होता है कि रटे रटाए तरीके से पाठ पढ़ाया गया और काम करा दिया गया। न अध्यापक कुछ विचारे न बच्चे अपने मन के सवालों को सुलझा सकें।

सीखने-सिखाने की कोशिश- (भाग-6)

हम अपने जीवन से हर पल कुछ सीख रहें होते हैं।समय आगे चलता जाता है, उसके साथ हमारा जीवन भी बढ़ता जाता है इसीलिए कहते है कि इस जीवन सफर में अतीत के पीछे न भाग कर आज पर ध्यान देते हुए भविष्य की ओर बढ़ते चलना चाहिए।

किन्हीं परिस्थितियों वश हमें अपना यह स्कूल बंद करना पङा था। उस समय बुरा लगा था, पर धीरे-धीरे समझ आया कि परिस्थितियाँ भी हमें आगे बढ़ने, कुछ नया सीखने की प्रेरणा देने के लिए आती हैं।

मैंने अपना ट्यूशन कार्य कभी बंद नहीं किया था, जब स्कूल चल रहा था तब भी शाम को मेरे पास बच्चे ट्यूशन पढ़ने आते थे और यह कार्य मैं निरंतर आज तक कर रही हुँ। मैं अपने ट्यूशन कार्य के विषय में अपने अगले भागों में लिखूँगी, क्योंकि ट्यूशन के बच्चे तो जैसे मेरे घर के सदस्य हैं । वे तो मेरे घर आकर मुझे नित नया पाठ सीखा जाते हैं।
मैंने उसके बाद एक प्रतिष्ठित स्कूल में काम किया था। उस विद्यालय के अपने अनुभवों के विषय में लिखने से पूर्व मैं कक्षा प्रथम के पाठ्यक्रम की विस्तार से विवेचना करने जा रही हुँ।

मैं यहाँ प्राइवेट स्कूल(अंग्रेजी माध्यम) के प्रथम कक्षा के विषयों की ही बात करूँगी। इसलिए भी कि लोगों का अमीर या गरीब सबका सरकारी विद्यालयों पर से विश्वास उठा हुआ है, उनकी भरसक कोशिश रहती है कि उनका बच्चा अंग्रेजी माध्यम के स्कूल में पढ़े।जिस कारण शहरों में अंग्रजी माध्यम के प्राइवेट स्कूल बहुत मिलेंगे और कई गाँवों में भी ऐसे प्राइवेट स्कूल मिल जाते हैं।

यहाँ प्रथम कक्षा में हिन्दी व अंग्रेजी दो भाषाएँ पढ़ाई जाती हैं, गणित के अतिरिक्त पर्यावरण संबधी(E.V.S) व सामान्य ज्ञान (G.K) भी पढ़ाए जाते है।
नर्सरी से कक्षा प्रथम तक बेसिक भाषा सीखा दी जाती है। भाषाओं का अक्षर ज्ञान व शब्द ज्ञान भली-भांति सीखने से ही आगे की कक्षाओं में लाभ होता है। चूंकि पढ़ाई का माध्यम अंग्रेजी हैं, तो यह आवश्यक है कि अंग्रेजी भाषा के शब्द निर्माण व वाक्य- विन्यास उन्हें समझ आए और वह उसमें निपुण हो जाएं। उन्हें दोनों भाषाओं के व्याकरण का बेसिक ज्ञान देना आवश्यक है।

यह खुशी की बात है कि किताबें बहुत अच्छी व ध्यान पूर्वक लिखी गई हैं, परंतु विद्यालयों में पाठ्यक्रम निबटाने की जल्दी होती हैं। यह समझे बिना कि कक्षा के प्रत्येक विद्यार्थी ने पाठ ग्रहण किया है या नहीं, अध्यापक अगला पाठ आरम्भ कर देते हैं। ऐसे लगता है कि जैसे वे किसी काॅलेज में सिर्फ लेक्चर देने जाते हों।

मेरे विचार से भाषा को मात्र एक विषय न समझ कर उसे शिक्षा के विटामिन समझा जाना आवश्यक है। जैसे अच्छे स्वास्थ्य के लिए विटामिन आवश्यक है।वैसे शिक्षा के लिए भाषा आवश्यक है। अगर कोई विद्यार्थी पढ़-लिख कर भी अपने को किसी भी भाषा में लिख कर व्यक्त नहीं कर सकता तो इससे अधिक दुःख की बात क्या हो सकती है। भाषा ही तो अभिव्यक्ति का साधन है।

अंग्रेजी तो विदेशी भाषा है जो हमारे देश के परिवारों में बोली नहीं जाती है, अतः विद्यार्थी को कठिनाई हो सकती है। परंतु ऐसा होना नहीं चाहिए क्योंकि विद्यार्थी नर्सरी कक्षा से इंगलिश पढ़ता है अर्थात 3-4 वर्ष की आयु से भाषा सीखता है, यह वह आयु होती है जब बालक आसानी से भाषाएँ सीख सकता है। परंतु अधिकांश विद्यालयों में भाषाएँ भी इतनी जल्दबाजी में पढ़ाई जाती है कि एक बच्चा छोटे वाक्य बनाना सीख नहीं पाता है और बङे वाक्य कक्षा में सिखाने शुरू कर दिए जाते हैं।

हिन्दी भाषा सीखने में भी बङी कठिनाई आती है। हिन्दी भाषायी प्रदेशों में जहाँ प्रत्येक घर की भाषा हिन्दी होती है, वहाँ भी एक शब्द के उच्चारण व लहजे में भिन्नता पाई जाती है। बच्चे घर में जो बोली बोलते हैं वह स्कूल में नहीं सिखाई जाएगी यहाँ वह भाषा सीखते हैं, अतः अध्यापक का कर्तव्य है कि वह शब्दों का सही उच्चारण व प्रत्येक शब्द का प्रयोग करना अपने विद्यार्थियों को सिखाएँ।

परंतु अध्यापक बहुत जल्दी में होते हैं। कारण पाठ्यक्रम में दो अन्य विषय भी होते है-E.V.S &G.K. इन अतिरिक्त विषयों की किताबों और दिए हुए ज्ञान में कोई परेशानी नहीं है। यह आवश्यक भी है कि विद्यार्थियों को पर्यावरण संबधी व सामान्य ज्ञान मिलना चाहिए। लेकिन क्या यह दोनो विषय एक नहीं हो सकते हैं?

परंतु इन विषयों के पाठों को न केवल पढ़ाया जाता है, अपितु उनके प्रश्न- उत्तर लिखाए जाते हैं, रटाए जाते हैं और फिर उनकी परीक्षा भी ली जाती है। परीक्षा क्यों? अभी विद्यार्थी भाषा की कक्षा में छोटे शब्दों और वाक्यों को ही बनाना लिखना सीख सका है। पर इन विषयों के बङे-बङे शब्दो का उसे न केवल उच्चारण सीखना है अपितु उसकी spelling भी समझनी हैं, रटनी है और फिर परीक्षा भी देनी है।

हम उन्हें इन विषयों का ज्ञान, चर्चा द्वारा, कहानी और चित्रों द्वारा भी दे सकते हैं ।छोटी-छोटी टेली फिल्मस के माध्यम से भी सिखाया जाता है, आजकल स्कूलों में स्मार्ट क्लास में इसी विधि से पढ़ाया जाता है।अगर संभव हो तो उन्हें व्यावहारिक ज्ञान दिया जाए जैसे पेङ- पौधों के ज्ञान के लिए उन्हें बगीचें में ले जाएं । पर मेरी समस्या यह है कि उसके बाद परीक्षा क्यों? जो देखा-समझा, वो कितना-देखा समझा का सवाल क्यों?

मेरा अनुभव है कि बच्चों से चर्चा करते हुए, उन्हें अपने से जोङते हुए, यदि पाठ समझाया जाता है तो प्रत्येक बच्चा उस पाठ को ग्रहण कर पाता है। जैसे- खरगोश और कछूए की कहानी से सभी बच्चे समझते है कि खरगोश तेज दौङता है और कछुआ धीरे। पेङों व फूलों के भागों के विषय में तथा वे अपना भोजन कैसे बनाते है उन्हें व्यावहारिक प्रयोगों के माध्यम से आसानी से सीखा सकते हैं। यह सिर्फ मेरे विचार नहीं है अपितु सभी विद्वान शिक्षाविदों के विचार हैं, मैं तो उन विचारों को पुनः स्मरण कर रही हुँ।

परीक्षा के लिए पाठ पढ़ाना और उसे रटाना यही शिक्षण विधि की अहम भूमिका बन गई है। कोई भी विषय जब परीक्षा के उद्देश्य से पढ़ाया जाता है तो उसमे से ज्ञान विलुप्त हो जाता है। परीक्षा शब्द में इतना बोझ है कि अध्यापक और अभिभावक दोनो ही भयभीत हो उस बोझ को बच्चों पर डालने लगते हैं। उनकी एक ही कोशिश होती है कि बच्चे पाठ का अभ्यास कार्य अच्छी तरह रट लें कि परीक्षा में सभी उत्तर अच्छे लिख सके व नंबर मिलने पर अध्यापक खुश कि उसने अच्छा पढ़ाया और अभिभावक भी खुश कि वे बच्चे को पाठ अच्छी तरह रटा सके थे ।

लेकिन परीक्षा में लिखने के लिए बच्चे का भाषा ज्ञान अच्छा होना आवश्यक है, पर चूंकि प्रथम कक्षा में छात्रों की भाषा में उतनी प्रवीणता नहीं होती हैं कि वह स्वयं अपने ज्ञान के अनुसार उत्तर लिख सके इसीलिए उन्हें उत्तर रटाए जाते हैं।
कई स्कूलों में परीक्षा नहीं ली जाती पर छोटे-छोटे class test लिए जाते हैं और उनके आधार पर रिपोर्ट कार्ड जरूर बनती है ताकि माता-पिता अपने बच्चे की प्रगति जान सके। रिपोर्ट कार्ड में अब छोटी कक्षाओं के लिए ग्रेड पद्धति भी है।अभिभावक की मानसिक समझ वही रहती है और वे A+ व B+ की तुलना में फंसे रहते हैं।

एक अन्य विषय बच्चों पर लादा जाने लगा है । कंप्यूटर आज के युग की प्राथमिक आवश्यकता है तो बच्चों को उसका ज्ञान होना चाहिए।कक्षा प्रथम से एक कंप्यूटर की किताब लग जाती है और फिर कंप्यूटर लैब में तो बच्चे कम जाते हैं पर उन्हें किताब के पाठ रटाए जाते हैं, फिर उसकी भी परीक्षा ली जाती है।

एक विद्यालय के प्रथम कक्षा के छात्र को पढ़ाते हुए मैं परेशान थी कि मुझे उसे सात विषय पढ़ाने थे और इन सभी विषयों की परीक्षा भी होनी थी।
विषय थे-1: गणित
2: हिन्दी
3: इंगलिश
4: ई.वी.एस
5: जी.के.
6: नैतिक शिक्षा
7: कंप्यूटर
ड्राइंग भी आठवाँ विषय था, जिसमें उसकी बहुत रूचि थी।
अब फिर यह प्रश्न कि नैतिक शिक्षा की परीक्षा क्यों ? इस विषय की किताब में रोचक कहानियाँ थी, जिन्हें वह खुशी से सुनता था। अभी उसकी इंगलिश इतनी अच्छी नहीं थी कि वह स्वयं पढ़ सके व समझ भी सके। पर कठिनाई यह थी कि इसकी भी परीक्षा होनी थी।

विद्यार्थी जिसे सब ज्ञान है,पर वह परीक्षा में प्रश्न समझ नहीं सका, या पढ़ नहीं सका है क्योंकि वह सभी अक्षरों व शब्दों को पढ़ नहीं पाता या समझ नहीं पाता है( बात कक्षा प्रथम की ही हो रही है)।अतः उत्तर नहीं लिख सकता है।
एक विद्यार्थी जिसे सब ज्ञान है व पढ़ व समझ भी सकता है परंतु लिखने में कठिनाई है या लिख पाता है परंतु spelling mistake करता है अथवा speed कम है, दी गई निश्चित अवधि तक वह पेपर पूरा नहीं कर पाता है, तब नंबर तो कम ही आएँगे।
इन बच्चों पर लिखने का इतना बोझ डाला जाता है कि वे सपने में भी अपने को शब्दों में घिरा महसूस करते होंगे।

मेरी एक मित्र ने अपने स्कूल में जहाँ वह एक काउंसिलर के पद पर कार्यरत थी, ऐसे बच्चों के लिए उस स्कूल के मुख्याध्यापिका व अध्यापिकाओं से विवाद किया और उन्हें सहमत किया कि जिन बच्चों को सब ज्ञान है व वे परीक्षा में पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दे सकते हैं, पर लिखने में कमज़ोर है उन्हें भी उनके ज्ञान के आधार पर नंबर दिए जाएं।

नंबर न मिलने पर व उस पर भर्त्सना झेलने के कारण उनका पढ़ाई से, व नित कुछ नया सीखने से रूचि खत्म हो जाती है।
मेरे विचारों का आधार बङे प्रतिष्ठित प्राइवेट विद्यालयों और छोटे प्राईवेट विद्यालयों में सामान्यतः अपनाई गई शिक्षण विधियाँ है।

निष्कर्ष में कह सकते है कि कक्षा तीन तक बच्चों की भाषाओं पर विशेष ध्यान दिया जाए । उनके शब्दों के उच्चारण व लिखने में उनके वाक्य विन्यास को मज़बूत किया जाए।प्रत्येक अध्यापिका का कर्तव्य है कि भाषा सीखने में प्रत्येक बच्चे को जो कठिनाई आ रही हैं उसे समझे व दूर करें। यदि अध्यापकों पर भी कार्य बोझ कम हो, पाठ्यक्रम पूरा करने का दबाव न हो तो वह स्वतंत्र रूप से अपने कार्य को पूर्ण निष्ठा से निभा सकते हैं।
गणित को भी खेल-खेल में सिखाने का अधिक प्रयत्न किया जाए, अन्य विषयों को भी रूचिकर विधियों से पढ़ाया जाए। बच्चे ज्ञान स्वयं सहजता से प्राप्त करें। सभी बच्चें ज्ञान प्राप्त करें यह आवश्यक है पर वह ज्ञान कितनी मात्रा तक ग्रहण करें इसका दबाव नहीं डाला जाना चाहिए। तथ्य उन्हें समझाएँ जाए व रटाए न जाए उन्हें स्वतः रूचि अनुसार समझने की स्वतंत्रता भी देनी आवश्यक है।

सीखने-सिखाने की कोशिश-(भाग-5)

जैसा कि मैंने पहले ही बताया है कि उस समय नर्सरी कक्षा में प्रवेश के लिए बच्चों का साक्षात्कार होता था और हमें अपने प्री-नर्सरी स्कूल में बच्चों को इसी साक्षात्कार के लिए तैयार करना होता था। माता-पिता बहुत तनाव में होते थे व बच्चों पर भी दबाव होता था।

मलाईका बहुत तेज दिमाग की व नाज़ुक बच्ची थी। वह कक्षा की सभी गतिविधियों में उत्साहपूर्ण भाग लेती थी। वह कक्षा की एक बातुनी छात्रा थी, ऐसा कोई कारण नज़र नहीं आता था कि वह साक्षात्कार के समय जवाब नहीं दे पाएगी। परंतु वह तभी खुल कर बात करती थी जब उसे परिचित वातावरण मिले। अजनबियों से वह बात नहीं करती थी।

इसके विपरीत अपूर्वा बहुत शांत छात्रा थी, वह भी सभी गतिविधियों में भाग लेती थी व बहुत जल्दी सब सीखती थी। वह सभी कार्य इत्मीनान व आत्मविश्वास से करती थी पर कम बोलती थी।
अतः साक्षात्कार के समय नई जगह व नए लोग, उस पर बच्चे को माता-पिता के बिना एक अलग कमरे मे ले जाया जाता था। मलाईका जैसे संवेदनशील बच्ची ने तो कोई भी जवाब देने से व किसी भी अन्य गतिविधि में भाग लेने से इंकार कर दिया था।

लेकिन अपूर्वा को कठिनाई नहीं हुई थी क्योंकि स्वभावतः उसमें सहजता थी अतः अजनबी लोगों के बीच भी उस वातावरण में उसका आत्मविश्वास बना रहा था। प्रत्येक बच्चे का अपना स्वभाव होता है, एक समान वातावरण में समान शिक्षा पाकर भी वे भिन्न व्यवहार करते हैं।

अपूर्वा और मलाईका दोनो ही बहुत होशियार थी। परंतु अपने प्राकृतिक स्वभाव के कारण एक विशेष वातावरण में दोनों का व्यवहार भिन्न था।
यह खुशी की बात है कि अब इस प्रक्रिया को बंद कर दिया है।

पढ़ाई समझने की आयु से पहले ही हम बच्चों को इतना डरा देते हैं कि पढ़ाई उन्हें किसी भयंकर जानवर जैसी प्रतीत होती है।

सभी बच्चे सामान्यतः रंगों की पहचान आसानी से कर लेते हैं पर खुशी नहीं कर पा रही थी, मैं और मेरी सह-अध्यापिकाएँ प्रतिदिन उसके लिए नए प्रयास करते थे। चित्रों में रंग भरना उसे पसंद था, अक्षरों की पहचान भी सीख रही थी। चित्रों में अपनी पसंद से अलग-अलग रंग भरती थी, सिर्फ रंगों के नाम बताने में गङबङ कर रही थी। उसकी दादी आती वह एक ही शिकायत करती कि हम उसे रंगों की पहचान नहीं करा पा रहे हैं।

मैं नहीं चाहती थी कि उस पर रंगों के नाम सीखने के लिए दबाव डालू।फिर रंग ही तो प्रतिभा की एकमात्र पहचान तो नहीं है।बाद में स्वयं उन्होंने यह स्वीकार किया कि खुशी के पिता को colourblindness है, व घर के अन्य सदस्यों को भी है। जो समस्या जेनेटिक है उसका क्या किया जा सकता है? पर मैंने उन्हें समझाया कि अभी बहुत छोटी है थोङा अधिक समय लग सकता है पर बेसिक रंग पहचान लेगी। यह भी कि वह किसी विशेषज्ञ की सलाह ले सकते हैं।

अक्सर लोग बच्चों की भिन्न विशेषताओं के लिए विशेषज्ञों के पास नहीं जाते हैं, मेरे विचार से उन्हें विशेषज्ञों से मिलना चाहिए।

हम सभी अपनी कमियों से इतने परेशान होते हैं कि हमें डर होता है कि हमारे बच्चे में वह कमी न हो। हमारा यह डर हमारे बच्चे के अंदर प्रवेश कर रहा है, इसका हमें ज्ञान नहीं होता है। जबकि आप उस कमी के बावजूद अपने क्षेत्र में सफल हैं। अपनी कमी को एक भिन्न विशेषता के रूप में स्वीकार करेंगे तो अपने बच्चे की भिन्न विशेषता को समझेंगे और जानेंगे कि यह इतनी भी भिन्न विशेषता नहीं है। एक समान विशेषताओं के लोग भी अनेक मिलते हैं, आप इतने भी अज़ूबे नहीं होते हैं। फिर भी यह सच है कि हर व्यक्ति या हर बच्चे का अपना निजी व स्वतंत्र व्यक्तित्व होता है।

एक अन्य समस्या सामने आई जब एक संयुक्त परिवार के दो बच्चों ने मेरे विद्यालय में आना शुरू किया था। जिठानी-देवरानी के बीच की प्रतिद्वंदिता के शिकार बच्चे हो रहे थे। जिठानी का बेटा अश्विन और देवरानी की बेटी कनिका दोनों बहुत प्यारे बच्चे थे। कनिका बोलने में होशियार थी जैसा कि माना जाता है कि लङकियाँ बोलने में तेज़ होती हैं। (हालांकि यह भी जरुरी नहीं है।) कनिका का उच्चारण भी बहुत सही व स्पष्ट था। वह कक्षा में बोली सभी कविताओं और कहानियों को सुनकर, घर पर जाकर ज्यों का त्यों सुनाती थी, यकीनन वह तो घर पर खिलौना होती होगी।

इसके विपरीत अश्विन की भाषा अभी साफ नहीं थी, वह कनिका से दो महीने छोटा भी था। उसे खेल-कूद बहुत पसंद था। उसे घर जाकर स्कूल की बातें करना पसंद नहीं था, फिर कनिका तो सब बताती ही थी।

जिठानी को यही महसूस होता कि हम कनिका पर विशेष ध्यान देते हैं।वह बार-बार एक ही बात कहती कि अश्विन कोई कविता नहीं सुनाता था। जबकि कनिका कक्षा में सिखाई प्रत्येक नई कविता को तुरंत घर जाकर पूरे अभिनय के साथ सुनाती थी। मैंने उन्हें समझाना चाहा कि-

“इसमें हमारी कोई योग्यता नहीं है, यह कनिका की अपनी योग्यता है। उन्हें दोनो बच्चों की तुलना नहीं करनी चाहिए। अश्विन भी प्रतिभाशाली है, सिर्फ वह आपको कविताएँ नहीं सुनाता है, तो इस कारण से पीछे नहीं है। वह समूह में कविताएँ बोलता है व आनंद लेता है और एकल में भी कोशिश करता है।”

क्योंकि उसकी भाषा तब तक उतनी स्पष्ट नहीं थी, अतः घर पर सुनाने में झिझकता था, बच्चे बहुत संवेदनशील होते हैं, वह जानते हैं कि उन्हें अभी शब्दों का उच्चारण करने में सफलता नहीं मिली है। जैसे हम बङों के लिए कहते हैं कि सबके अपने भेद (secret) होते हैं वैसे बच्चों के अपने भेद होते है।

कविताएँ याद करने या न करने से किसी की याददाशत की शक्ति को परखा नहीं जा सकता है। मुझ जैसे तो बहुत मिलेंगे जिनके लिए कविता या गाना याद करना पहाङ पर चढ़ाई चढ़ने जैसा था।

मैंने उन्हें समझाने का प्रयास किया कि “आपके बच्चे की आयु अभी पूरी तीन वर्ष भी नहीं है।इस छोटी आयु के बच्चों की ऐसी प्रगति ( जैसे-भाषा की स्पष्टता) की तुलना नहीं की जानी चाहिए । बच्चा अपनी आयु के बढ़ने के साथ धीरे-धीरे सब सीख जाता है। बच्चे सही उच्चारण 4-5 वर्ष की आयु तक भी सीख पाते हैं, परंतु इससे बच्चे के बौद्धिक विकास का अनुमान लगाना उनके साथ अन्याय करना है।”

मैंने उन्हें कहा कि वह अश्विन की अन्य योग्यताओं पर ध्यान दें व उसकी बिना तनाव के परवरिश करें।
अश्विन की माँ एक उच्च शिक्षित 25 वर्षीय युवती थी। मुझे नहीं पता उन्होंने मेरी सलाह कितनी समझी?

प्री- नर्सरी में बच्चे 2 से 4 वर्ष की आयु के होते है। इस आयु-वर्ग के बच्चों की प्रगति में बहुत भिन्नता पाई जाती है। बच्चे अपने स्वभाव के अनुसार प्राकृतिक रूप से अपनी मानसिक व शारीरिक प्रगति करते हैं। कुछ बच्चे शारीरिक गतिविधियों में तेजी से प्रगति करते हैं, कुछ बच्चों में बौद्धिक गतिविधियों की प्रगति स्पष्ट नज़र आती हैं।हमें सिर्फ इस पर ध्यान देना चाहिए कि प्रत्येक बच्चा सभी गतिविधियों में प्रगति कर रहा हो।पर प्रगति की गति पर विशेष ध्यान नहीं देना चाहिए, क्योंकि गति कम या अधिक हो सकती है।

परंतु यदि एक बच्चा बहुत सुस्त हो वह शारीरिक क्रियाकलापों में बहुत धीमा हो या रूचि नहीं ले रहा हो, अथवा उसकी बौद्धिक प्रगति नहीं हो रही हो तो हमें विशेषज्ञों की सलाह लेनी चाहिए।

हमें ध्यान रखना चाहिए कि हमारी चिन्ताएँ बच्चों पर प्रकट न हो। यह हमेशा याद रखना आवश्यक है कि शारीरिक व बौद्धिक दृष्टि से भिन्न होते हुए भी बच्चों की संवेदनाएँ जागृत होती है, वे आपका दर्द समझते हैं, जिसका प्रभाव उनके विकास में पङता है।

महान वैज्ञानिक थाॅमसन एडिसन को उनके बचपन में ही यह कह कर स्कूल से निकाल दिया गया था कि ‘उनकी बौद्धिक क्षमता बहुत कम है, अतः उन्हें पढ़ाया नहीं जा सकता है।’ एडिसन की माँ ने अपने बालक से इस निराशाजनक तथ्य को छिपाया व उसे प्रोत्साहित करते हुए स्वयं पढ़ाया और एडीसन की योग्यता पर विश्वास करते हुए उन्हें अपना पूर्ण सहयोग भी दिया था।

‘तोतोचान’ को भी मात्र इसीलिए विद्यालय से निकाल दिया गया था कि उसे कक्षा की गतिविधियों से अधिक कक्षा से बाहर की गतिविधियाँ रोचक लगती थी। परंतु तोतोचान की माँ को अपनी पुत्री पर विश्वास था और उसके नए विद्यालय के मुख्याध्यापक ने उसे अपना पूर्ण भरोसा दिया था।

जब बात माँ की हो रही है, तो मैं एक माँ का जिक्र करना चाहुँगी। मेरे प्री-नर्सरी विद्यालय के शुरुआती दिन थे, मैं और एक आया, यही स्टाफ था। सिर्फ 10 विद्यार्थी थे। एक दिन मुझसे मिलने वह आईं और उन्होंने कहा कि उनकी आठ वर्षीय बेटी किसी दिमागी बिमारी के कारण सामान्य बच्चों की तरह नहीं है। वह एक विशेष स्कूल अथवा संस्था में जाती है पर डाॅक्टर की सलाह थी कि वह सामान्य विद्यालय में भी जाए ।

मैं उनकी बेटी नम्रता से मिली नहीं थी पर मैंने उन्हें सहयोग करने का आश्वासन दिया था । लेकिन जब मैं नम्रता से मिली तो पाया वह स्वयं चल नही सकती थी, स्वयं खा- पी नहीं सकती थी…। बोलने में भी बहुत कठिनाई थी। मुझे लगा कि कठिन होगा क्योंकि मेरे पास वे सुविधाएँ नहीं थी, मैं उस तरह प्रशिक्षित नहीं थी। पर मैं एक अध्यापिका व माँ थी, मैं उन्हें मना नहीं कर सकी थी, मुझे लगा कम से कम नम्रता खुश रहेगी और मैंने कहा कि वह आरम्भ में उसे मेरे पास सिर्फ एक घंटे के लिए ही भेजे।

दो दिन नम्रता खुश रही अन्य बच्चें भी उसे स्वीकार कर रहें थे, पर तीसरे दिन किसी बच्चें के साथ हुई छोटी अनबन से वह बहुत उत्तेजित व क्रोधित हो गई थी । मैं इन बच्चों के मनोविज्ञान व व्यवहार से परिचित नहीं थी । मैं कुछ समझती इससे पूर्व उसे दौरा(fit) पङ गया था। मेरे पास डाॅक्टरी सुविधा नहीं थी, सिर्फ एक प्राथमिक चिकित्सा का डिब्बा था, क्योंकि उसका घर पास था अतः उसकी माँ को ही बुलाया था।

उन्होंने कहा कि ” क्योंकि नम्रता जानती थी कि उसने गलती की है इसीलिए यह फिट नहीं पङा है अपितु उसका नाटक है। आप दूसरे बच्चों की तरह उसे डाँट व प्यार से समझा सकती है। वह सब समझती है। नम्रता भी सामान्य बच्चों जैसी ही है।”

पर मैं बहुत घबरा गई थी, मेरे पास अन्य मासूम बच्चें भी थे, जिनकी जिम्मेदारी मेरी थी। मैंने उन्हें बहुत अफसोस के साथ मना किया था।मैं संवेदनशील थी पर हिम्मती नहीं थी। मैं कोई ऐसा प्रयोग नहीं करना चाहती थी, जिससे मैं पूर्णतः अपरिचित थी।

मैं जानती हुँ कि उन्होंने बुरा नहीं माना था, क्योंकि उन्हें तो अपनी बेटी को दूनिया की समस्त खुशियाँ देने के लिए बहुत संघर्ष करना था। मैं हमेशा इन माँओं के सामने नतमस्तक हुँ जो अपने इन विशेष बच्चों को समाज के सभी अधिकार दिलाने के लिए अग्रसर रहती हैं।

सीखने- सिखाने की कोशिश ( भाग-4 )

कुछ समय बाद मैंने अपना एक छोटा विद्यालय खोलने का फैसला लिया । ‘Rose Garden Pre Nursery School’ का बोर्ड बन गया और मेरा विद्यालय शुरू हुआ, पर बिना विद्यार्थियों के कैसा विद्यालय?

हमने यथासंभव प्रचार किया था और मैं नित विद्यार्थियों की प्रतीक्षा करती, पुछताछ करने तो लोग आते पर अभी दाखिले नहीं हो रहे थे। ईश्वरीय कृपा से यह इंतज़ार खत्म हुआ, जब समीप के एक छोटे विद्यालय की प्रबंधक मुझे मिलने आई और कहा कि किन्हीं कारणवश उन्हें अपना विद्यालय बंद करना पङेगा । उन्होने अपने विद्यालय का फर्नीचर हमे बेच दिया । सत्र का आरम्भ ही था अतः उनके पास सिर्फ पाँच विद्यार्थी थे, वे सब मेरे पास आ गए थे। अब मैंने पाँच विद्यार्थी और एक आया ऊषा के साथ अपना प्री-नर्सरी विद्यालय शुरू किया था ।

मेरा पहला स्वतंत्र कार्य और अपनी रचनात्मकता व कार्यक्षमता को परखने व निखारने का यह मेरा प्रथम स्वावलंबी कदम था। अभी तक दूसरे के आधीन व निर्देशानुसार कार्य किया था । इन मासूमों के कोमल मन को समझते हुए, इन्हें दूनियावी नियमों के अनुकुल ढलना सिखाना था । लेकिन वास्तविकता में इन बच्चों ने मुझ से मेरा परिचय कराया था। यह पाँच बच्चे मेरे अन्वेषण के आधारस्तंभ थे।

सोमी, चंचल, अभिषेक, पीयूष और गीतांजलि के साथ मेरी नित सीखने-सिखाने की प्रक्रिया मुझे एक नया पाठ पढ़ा जाती थी।
पीयूष बहुत ही होशियार और आत्मविश्वासी बच्चा था। प्रत्येक नया पाठ अथवा खेल उसकी जिज्ञासु बुद्धि को तुरंत जागृत करता था।ऐसे बच्चे कम होते हैं जो हर कार्य पूर्ण मनोयोग से करते हो और शीघ्रता से सीखते हो ।

चंचल गोलु-सी प्यारी बच्ची थी।रंगों की पहचान उसने इतनी बारिकी से समझी थी कि तीन वर्ष की उस आयु में भी चित्र में रंग भरते समय उसके रंगों का चुनाव देखते बनता था। इस आयु में आकृतियाँ बनाना आसान नहीं होता पर चंचल बहुत आसानी से सीख जाती और फिर बहुत तन्मयता से उसमें रंग भरती थी। कुछ साल बाद उसके पिताजी मिले थे, बहुत खुशी के साथ उन्होने जानकारी दी थी कि चंचल चित्रकारी में इनाम जीतती रहती है।

सोमी एक सरदार परिवार की बेटी थी, आरंभ में सिर्फ पंजाबी बोलती थी, उसकी पंजाबी मेरी समझ के बाहर थी। ऊषा ही बताती कि वह क्या बोल रही है? सोमी जब कक्षा में प्रवेश करती तब ही लगता जैसे वह नृत्य करती हुई चल रही हो। उसे नृत्य करना, कविता व poem बोलना बहुत पसंद था।धीरे-धीरे वह इंगलिश और हिन्दी बोलने व समझने लगी थी।

गीतांजलि बहुत चुप रहती थी। वह स्वयं अभी साढ़े तीन वर्ष की थी और उससे छोटे एक बहन और भाई भी थे। वह घर की बङी बेटी बनने से बङप्पन के दबाव में थी। सोमी और चंचल कक्षा में आते ही मुझ से बोलना शुरू कर देते थे। कई बार तो वे अपनी बातें बताने के लिए बहुत ही बेताब होती थीं। इसके विपरीत गीतांजलि से बात करने के लिए मुझे कोशिश करनी होती थी, कोई भी कहानी व कविता सुनाते समय उस पर विशेष ध्यान देना होता था। वैसे गीतांजलि सब बहुत शीघ्रता से सीख लेती थी। उसे कक्षा में आनंद आने लगा था पर वह पहल कम करती थी । बाद में धीरे से वह अपनी बात मुझ से कहने लगी थी।

अभिषेक इन सभी बच्चों में सबसे बङा था उसकी आयु 5 वर्ष थी। उसे बोलने में परेशानी थी, उसकी स्पीच थैरेपी चल रही थी। इसी कारण अभी वह किसी विद्यालय में पढ्ने नहीं जाता था। पर उसे शब्द ज्ञान था। वह कोशिश करता और किताबों में से कहानी कविता पढ़ कर सुनाता था। सभी बच्चे उसकी बात (जो कठिनाई से समझ आती थी) बहुत ध्यान और धीरज से सुनते थे।सभी बच्चे अभिषेक को प्यार करते थे।

धीरे-धीरे नए विद्यार्थियों का आना शुरू हुआ, मेरी कक्षा भरने लगी थी। बाद में मैंने अपनी सहायता के लिए दो अन्य अध्यापिकाएँ रखी थी। प्री नर्सरी स्कूल में विद्यार्थी सिर्फ एक वर्ष के लिए प्रवेश लेते हैं, एक वर्ष बाद उनका एडमिशन बङे विद्यालयों में हो जाता है। हमारे पास नए विद्यार्थी आते उन्हें दूनियावी वातावरण के अनुकुल अभ्यस्त करते हुए हम भी कुछ नया सीखते जाते थे।

मुझे अपने इस छोटे विद्यालय में बहुत आनंद आता था। बच्चों के साथ नई-नई गतिविधियाँ करते, उन्हें तरह-तरह के खेल खिलाते थे । मैंने प्रत्येक शनिवार खेल का दिन रखा था, उस दिन हम मैंदान में खेलने वाले खेल ही खेलते थे।उन्हें दौङ प्रतियोगिता में आनंद आता था। गेंद से भी कई खेल खेलते थे। म्यूजिकल चेयर खेलने में सभी बच्चे आनंद लेते थे।

इसके अतिरिक्त उनकी कविताओं और कहानियों पर हम उनसे अभिनय कराते थे। सभी बच्चें उसमे भाग लेते थे, समूह में भी भागीदारी होती व व्यक्तिगत तौर पर भी प्रत्येक बच्चा कुछ न कुछ अभिनय अवश्य करता था। हमारा उद्देश्य उनके संकोच को दूर करना होता था व उनकी वाकशक्ति को स्पष्ट करना व बढ़ावा देना होता था।

कहानी, कविता के अतिरिक्त हम उन्हें उनके आसपास के लोगो का अभिनय करने के लिए प्रेरित करते थे। उनकी कल्पना शक्ति लाजवाब होती थी। उन्हें हम संवाद नहीं देते थे वे स्वयं अपने सीमित शब्द भंडार से चुन कर संवादों की गढ़ना करते थे। अपने आसपास के परिवेश से जो भी सीखा व समझा था, वे खुल कर सामने आता था। कुछ बच्चे संकोची होते है उन्हें खुलने में समय लगता था पर कुछ का अभिनय देखकर व संवाद सुनकर हम दाँतों तले ऊँगली दबा लेते थे।

कुछ बच्चें स्वाभाविक ही वाचाल और खुले होते है, पर ऐसे बच्चें भी होतें जिनका स्वभाव शर्मीला और संकोची होते है। उन्हें अगर शुरु से प्रोत्साहन मिले तो वे भी खुल सकेंगे और अपने को अभिव्यक्त करने में झिझकेंगे नहीं, कम बोलना किसी का चुनाव हो सकता है, पर सबको आत्मविश्वासी होना आवश्यक है।

यह सच है कि पुत के पाँव पालने में नज़र आते हैं, हम चाहे तो उनकी प्रतिभा को परख कर उन्हें निखारने का प्रयास कर सकते हैं।पारस, संदीप, कनिका व वंशिका का अभिनय के प्रति रूझान स्पष्ट नज़र आता था। चंचल, पीयूष, कुणिका व देवेन्द्र के चित्र प्रभावशाली होते थे तो वीणा, महक, सोमी की नृत्य के साथ भावभंगिमा बहुत दिल मोहने वाली थी।

यूँ तो सभी बच्चे खेलों में रुचि रखते हैं, पर कई आरम्भ से ही सराहनीय प्रदर्शन कर हमारा ध्यान आकृषित कर लेते हैं।

खेलों के प्रति रूझान के विषय में यह ध्यान देने योग्य बात है कि प्रत्येक बच्चा न केवल खेलना पसंद करता है बल्कि वह किसी न किसी खेल में विशेष रूझान रखता है अतः प्रत्येक बच्चे को न केवल खेलने दिया जाए अपितु उसे उसकी पसंद व प्रतिभा के अनुकुल खेल में प्रशिक्षित भी किया जाना चाहिए।

सीखने- सिखाने की कोशिश (भाग-3)

कुछ समय बाद मैंने एक अन्य विद्यालय में पढ़ाना शुरू किया था। इस विद्यालय में मुझे L.K.G कक्षा पढ़ाने को मिली थी। एक कक्षा में 45 विद्यार्थी थे । यहाँ भी सिलेबस का बोझ अध्यापिका और विद्यार्थियों दोनो पर था। इस कक्षा में 4वर्ष से 5वर्ष की आयु तक के बच्चे पढ़ते थे। आरम्भ में एक सप्ताह मैंने उस कक्षा की पुर्व अध्यापिका के साथ पढ़ाया था।

बच्चें अपनी अध्यापिका से बहुत गहरे जुङे होते हैं, विशेष रुप से छोटी कक्षाओं के बच्चे घर से बाहर विद्यालय के वातावरण में अपनी अध्यापिका के सानिध्य में सुरक्षित महसूस करते हैं। अपनी अध्यापिका से बिछोह उनके लिए कष्टदायी होता है। इस कक्षा की भी ज्योति मैडम विद्यालय छोङकर जा रही थीं, जिसका दुख सभी बच्चों को था और वे सभी मुझे संदिग्ध दृष्टि से देख रहे थे।

कुछ ही दिनों में कक्षा के सभी विद्यार्थी मेरे अभ्यस्त हो गए थे। लेकिन चारू मुझे स्वीकार नहीं करना चाहती थी। ज्योति मैडम के सामने ही यह महसूस हो गया था कि वह भावनात्मक रुप से उनसे बहुत जुङी हुई है। इस बात को स्वयं ज्योति मैडम ने भी स्वीकार किया था कि चारू का उनसे विशेष लगाव है।

ज्योति मैडम के जाने के बाद वह बहुत उदास व चुप रहती थी। वह मुझ पर विश्वास करना नहीं चाहती थी। वह बहुत अनमनेपन से कक्षा में होने वाले कार्यकलापों में भाग लेती थी। मैंने शुरू में उससे बिना उसकी इच्छा के बात करना उचित नहीं समझा व उसकी गलतियों को अनदेखा भी किया। मुझे खुशी हुई जब उसकी माँ मुझ से मिलने आई क्योंकि कई बार अभिभावक अपने बच्चों के मानसिक तनाव को समझ नहीं पाते हैं।

मैंने उनसे कहा,” चारु पढ़ाई तो सीख ही लेगी, परंतु अभी आवश्यक है कि उसे भावनात्मक रुप से मज़बूत किया जाए।” हमें समझना चाहिए कि बच्चों के भी अपने मानसिक कष्ट हो सकते है।
जिनसे हम अधिक जुङाव महसूस करते हैं कभी हम उनसे दूर भी होते है। ऐसी व्यवहारिक बातें भी सीखनी आवश्यक होती है। मुझे खुशी हुई कि घर व विद्यालय में अनुकुल वातावरण मिलने से वह थोङे समय पश्चात अपनी स्वाभाविक चंचलता को पा सकी थी।

इसी कक्षा में नेहा के लिए सीधी लाइनों में लिखना कठिन था। उसे अक्षरों की पहचान व बनावट का ज्ञान था पर काॅपी में लिखते समय लाइनें उसे समझ नहीं आती थी। वह प्रार्थना के समय, अपनी पंक्ति से बाहर आ जाती थी व आँखे बंद करे उल्टी घूम जाती थी, उसके कारण पंक्ति बिगङ जाती थी। वह यह शरारत में नहीं करती थी, अपितु उससे अनजाने में यह होता था, क्योंकि वह सीधी पंक्ति समझ नही पाती थी। इसकी एकमात्र वज़ह थी कि कोई बच्चा देर से बोलना सीखता है अथवा किसी बच्चे को रंगों का भेद समझने में कठिनाई होती है। इन बच्चों पर गुस्सा करना गलत है।

मैं नहीं चाहती थी कि नेहा के आत्मविश्वास में कमी आए, जबकि वह स्वयं जानती थी कि उससे गङबङी होती है । हम अक्सर यह सोचते हैं कि बच्चे अपने इस अलग गुण को समझ नहीं पा रहे हैं, पर सच है कि बच्चों को भिन्नता का अहसास होता है, हमें उनके अहसास को सकारात्मक मोङ देना होता है, हमारी थोङी नकारात्मकता उसके आत्मविश्वास को सोख सकती हैं। यहाँ भी खुशी है कि नेहा की माँ ने मेरे सुझावों को समझा व उस पर काम किया जिसके अनुकुल परिणाम प्राप्त हुए थे। मेरी सलाह पर वह उसे खेल -खेल में वस्तुएँ पंक्ति में रखना सिखाती और कक्षा में भी उसको काॅपी में लिखाते समय विशेष ध्यान कराते व ऐसे खेल खेले जाते जिससे सभी बच्चों की शारीरिक व मानसिक क्षमता का विकास हो ।

इस विद्यालय में पढ़ाते हुए, मुझ से गलती हुई, उसका जिक्र मैं अवश्य करना चाहुँगी। मैं अपनी L.K.G कक्षा के सभी बच्चों को अक्षर ज्ञान कराने में सफल हो रही थी पर एक विद्यार्थी मुकुल के सामने मै असफल थी। कारण सिर्फ मेरी लापरवाही ।

मुकुल अक्सर अनुपस्थित रहता था व बहुत शैतान था। उसके माता-पिता शिक्षित नहीं थे, वे कभी उसकी प्रगति जानने के लिए मुझ से मिलने नहीं आते थे। (यह तथ्य बहुत महत्वपूर्ण रहा होगा उसके प्रति मेरी लापरवाही के लिए) मैं उसकी प्रगति नहीं होने से क्षुब्ध तो थी, पर कोई कोशिश नहीं कर रही थी। मैंने यह धारणा बना ली थी कि उसकी कक्षा में कम उपस्थिति ही उसका कक्षा में पिछङने का कारण है। अतः उसके उपस्थित होने पर भी मैं उसकी कमियों को दूर करने का विशेष प्रयास नही करती थी। जब इसके लिए मुख्याध्यापिका ने आगाह किया तब ही मैं सचेत हुई थी।

एक अध्यापिका को लापरवाह नहीं होना चाहिए। जबकि यह ज्ञात था कि यह छोटी कक्षा बच्चों के मानसिक विकास की नींव होती है । मैंने अपनी अध्यापिका की भूमिका को निभाने की प्रक्रिया को और गहराई से समझा था।