नए -मकान – नए परिवेश (भाग-अष्टविशंति) ( हाऊसिंग सोसाइटी के अनुभव

कविता- अंतिम ऊँचाई (कुँवर नारायण)

दुर्गम वनों और ऊँचे पर्वतों को जीतते हुए

जब तुम अंतिम ऊँचाई को भी जीत लोगे-

जब तुम्हें लगेगा कि कोई अंतर नहीं बचा अब

तुममें और उन पत्थरों की कठोरता में

जिन्हें तुमने जीता है-

जब तुम अपने मस्तक पर बर्फ का पहला तूफ़ान झेलोगे

और काँपोगे नहीं –

तब तुम पाओगे कि कोई फ़र्क नहीं

सब कुछ जीत लेने में

और अंत तक हिम्मत न हारने में ।

मीशु की सगाई से दो दिन पहले, एक छोटी-सी दुर्घटना में मेरा दायां कंधा चोटिल हो गया था।
दर्द डाक्टरी इलाज़ से भी ठीक नहीं हो रहा था। मुझे चिन्ता थी कि इतनी तकलीफ़ में मैं मीशु की शादी का काम कैसे संभालुंगी।जया भी गर्भवती थी, फिर भी वह मेरा बहुत बङा सहारा बनी रही थी।हमने मिलकर बहुत आराम से सब संभाल लिया था।

फिर मीशु की शादी के तीन महिने बचे थे। और मुझे एक नोटिस मिला कि सोसाइटी के कम्यूनिटी हाॅल में योगा क्लास शुरू हो रही है। मैंने भी योगा कक्षा में जाने का फैसला लिया था।

तब मेरी पहली मुलाकात अपनी योगा गुरू स्मिता से हुई।आयु +35 की होगी। इस बंगाली कन्या में मुझे एक गुरू के साथ, एक मित्र भी मिल गई थी। जब दिल- दिमाग मिल जाएं, तो आयु- भेद कोई अर्थ नहीं रखता है।

स्मिता से मैंने योगा सीखना शुरू किया था,उसने मेरी आयु व शारीरिक कष्टों को समझते हुए, योगासन कराए। मेरी मांमांसपेशियों में बहुत तनाव था, मुझे बहुत कठिनाई आ रही थी।

स्मिता मेरी कठिनाई देख, मेरे लिए आसान रास्ते निकालती, जिससे मैं आराम से आसन कर सकती थी। उद्देश्य एक ही था कि मेरी मांसपेशियों का तनाव कम हो ।
धीरे-धीरे कामयाबी मिलने लगी थी, मुझे लगने लगा, मेरा शरीर हल्का हो रहा है।अब मैं सब काम आसानी से कर रही थी, मेरा दायां कंधा बहुत काम कर सकता था।

जैसा मैंने पहले भी बताया है कि सोसाइटी का माहौल बहुत शांत था, सभी परिवारों का आपसी संबध मित्रतापूर्ण सहयोगी था।
मीशु की शादी में हमने मेहमानों के लिए दो-तीन फ्लैट सोसाइटी में ही लिए थे। मेहमानों के रहने का प्रबंध उनमें अच्छा हो गया था।
खाने-पीने, हलवाई , मेहंदी व लगन कार्यक्रम का आयोजन भी हमने सोसाइटी के प्रांगण में किया था। सभी कार्य बहुत शांति से पूर्ण हुए थे।

मीशु की शादी हुई और श्रीष्टी अपने शुभ कदमों से हमारे घर में प्रविष्ट हुई।
कुछ लोगों से हमारे पिछले जीवन का संबध होता है और वे इस जन्म में भी मिलते हैं।ऐसा मेरा निजी अहसास है।
श्रीष्टी की मम्मी परिमला जी को मैं जानती थी, पर पहचानती नहीं थी। वह सेक्टर-7 में ही रहती थी, पर मेलजोल नहीं हुआ था।वह मीशु के स्कूल के प्रशासनिक विभाग में काम करती थीं, मैं उनके व्यक्तित्व से प्रभावित थी।

यह कुदरती करिश्मा है कि जिन्हें हम बरसों से जानते हैं, उनसे एक दिन करीबी रिश्ता जुङता है।
यह रिश्ता अथार्त उत्तर और दक्षिण का मिलन है। एक-दूसरे की संस्कृति को सम्मान देने में ही रिश्तों की सार्थकता है।

परिमला जी के कारण, शादी में, मीशु के स्कूल के प्रबंधक, प्रिंसिपल के साथ पूरा स्कूल आया था और मीशु व श्रीष्टी को अपने गुरूओं का आशीर्वाद प्राप्त हुआ था।
क्योंकि हम दोनों ही परिवार कई वर्षों से सेक्टर -7 में रह रहे थे, अतः मैं देख रही थी कि, हमारे जीवन सफर के सहभागी हमारे बच्चों को अपनी शुभकामनाएं दे रहे थे।

स्मिता ने योगा क्लास, विशेष रूप से घरेलू महिलाओं के लिए ही शुरू की थी। पर अफसोस की बात है कि भारतीय महिलाएं अपने स्वास्थ्य के लिए जागरूक नहीं है।
योगा में मेरे अतिरिक्त किसी महिला ने रूचि नहीं ली थी।
शनिवार- रविवार की कक्षाओं में भी सिर्फ तीन-चार महिलाएं ही आती थीं। उसमें जया भी जाती थी।

महिलाएं अपने घर के कार्यों व जिम्मेदारियों से फुर्सत नहीं पाती हैं। ऐसा नहीं कि महिलाओं ने रूचि नहीं ली थी, महिलाओं ने मुझ से योगा व स्मिता की जानकारी प्राप्त की थी।वे स्मिता से मिलने भी आईं थी, योगा भी करना चाहती थीं, पर नहीं कर सकी थीं ।
इसका एक मुख्य कारण फीस भी थी, घरेलू महिलाएं अपने लिए कब पैसे खर्च करना चाहती हैं ?

वे घर खर्च से बचत करके, किट्टी पार्टी तो करती हैं, पर अपने स्वास्थ्य पर खर्च करना, उन्हें अपव्यय लगता है।
हमारी सोसाइटी में शिक्षित व संपन्न परिवार रहते थे, पर न तो महिलाओं को स्वयं, न उनके परिवार को उनके स्वास्थ्य के प्रति चेतना थी।

स्मिता ने मेरा बौद्ध धर्म से भी परिचय कराया था।मैं उसके साथ ग्रुप की मीटिंग में भी दो बार गई थी। मुझे बहुत अच्छा लगा था। वे सब सिर्फ अपने दुःखों व कष्टों के लिए ही नहीं , दूसरों के लिए, समाज में नित नई आपदाओं से मुक्ति के लिए भी प्रार्थना करते हैं। मैंने समझा कि प्रार्थना में बहुत शक्ति है और उसे मैंने व्यक्तिगत रूप से भी अनुभव किया है।
कोरोना के कारण, अब स्मिता ऑनलाइन योगा क्लास लेती है, इस तरह योगा और स्मिता से मेरा अटूट संबध बन गया है।

मीशु की शादी के दो महीने बाद ज़विका का जन्म हुआ था। हम सब खुश थे, हमारे सभी परिचित, हमें विशेष बधाई दे रहे थे चूंकि एक लंबे समय बाद हमारे खानदान में कन्या का जन्म हुआ था।

हमारा सेक्टर-7 का फ्लैट भी लगभग तैयार था। परंतु कोरोना नामक गंभीर बीमारी ने सारे देश- विदेश के वातावरण में एक नए संकट का प्रादुर्भाव कर दिया था।
ज़विका अभी एक महीने की ही थी और लाॅकडाउन ने, घर के सभी सदस्यों को, घर के अंदर कैद कर दिया था।

अब सब ऑफिस घर से कर रहे थे। कोई कामगार नहीं आ सकता था।हम सब मिलकर घर के काम कर रहे थे।

हमारे मकान का निर्माण कार्य भी रूक गया था। ये दिन बहुत बैचेनी और दर्द भरे हैं ।
धीरे-धीरे स्थिति में कुछ समय के लिए सुधार हुआ, लाॅकडाउन खुला, परंतु बंदिशें थी। कोरोना से बचाव रखना था।
अभी भी मींटू के अतिरिक्त सभी घर से ऑफिस कर रहे थे।

परंतु यह अच्छा हुआ कि मकान का निर्माण कार्य फिर शुरू हुआ व दीपावली से पहले, हमने अपने नए मकान का गृहप्रवेश किया था।

एक सपना साकार हुआ था और हम अपने मकान में शिफ्ट हुए थे।

जीवन क्या है ?

जीवन एक दर्शन है,

अनगिनत सवालों का जवाब है,

उमङते उफानों का सैलाब है।

मुठ्ठी में बंद लम्हों का हिसाब है।

दुखों में भीगे सुखों का ख्याल है।

न पूछें, यह क्या है?

यह तो महज एक उलझी किताब है

नए मकान-नए परिवेश (भाग-सप्तविशंति) ( हाऊसिंग सोसाइटी के अनुभव)

(इशारे जिंदगी के) अज्ञेय

जिंदगी हर मोङ पर करती रही हमको इशारे,

जिन्हें हमने नहीं देखा।

क्योंकि हम बाँधे हुए थे पट्टियाँ संस्कार की

और, हमने बाँधने से पूर्व देखा था-

हमारी पट्टियाँ रंगीन थीं ।

एक नीरव नदी बहती जा रही थी,

बुलबुले उसमें उमङते थे,

रहः संकेत के: हर उमङने पर हमें रोमांच होता था,

फूटना हर बुलबुले का, हमें तीखा दर्द होता है।

हम कभी फ्लैट में नहीं रहे थे, हमेशा छत अपनी मिली थी।हाउसिंग सोसाइटी में भी रहने का पहला अनुभव था। फ्लैट जहाँ आगे-पीछे कोई आंगन या बेङा नहीं होता है।

यह सोसाइटी साफ व शांत थी। पानी व बिजली की भी समस्या नहीं थी। मुझे सोसाइटी में रहना अच्छा लगने लगा था।पीछे रेलवे लाइन थी, दिन भर उसमें रेले गुजरती थी और बनी के लिए यह एक अचंभा था, वह किसी ट्रेन की आवाज सुन उत्साहित हो जाता और उसे देखने के लिए दौङ पङता था।अपने पोते के बचपन में अपना बचपन भी मुस्काता था, कितनी मीठी यादें गुनगुनाती थी।

ऐसा नहीं कि रेल की आवाज़ हमें परेशान नहीं करती थी, मगर बनी के उत्साह को देख, यह परेशानी उल्लास में बदल जाती थी।कुछ महिनों में हमें इसकी आदत हो गई थी, बनी को भी नए उत्साही खेल मिल गए थे।

मैं सर्दियों में दोपहर में व गर्मी में शाम को बनी के साथ, नीचे पार्क में चली जाती थी, वहाँ कई महिलाओं से कुछ जान-पहचान हो गई थी।

सोसायटी में बहुत सुरक्षा थी, मैं रात को अकेले ही सैर करने के लिए नीचे कम्पाउंड में सैर कर सकती थी। कोरोना और लाॅक डाउन के दिनों में भी, जब रात को नीचे कोई नहीं होता, हम सैर के लिए नीचे जाते थे, कभी- कभी छत पर भी जाते थे। उन दिनों आकाश बहुत साफ और नीला ही दिखता था।

यहाँ मैंने टयूशन के काम के लिए कोशिश नहीं की थी, संपूर्ण समय बनी के साथ खेलने व पढ़ने-लिखने में बिताने लगी थी।

पढ़ने-लिखने का शौक तो बचपन से था, पर लेखन को कभी गंभीरता से नहीं लिया था। लेकिन 2016 में जब सेतु ने मुझे टैब दिया, और मिंटू ने मुझे वर्ड प्रेस से परिचित कराया, मेरी जिंदगी ही बदल गई थी, अपने विचारों और मन के भावों को दूसरों तक पहुँचाने का एक अच्छा और सरल माध्यम मिल गया था, मेरी लिखने में रूचि बढ़ने लगी, मैं सरलता से नए और प्रतिष्ठित लेखकों को न केवल पढ़ रही थी अपितु उनसे लिखना सीख भी रही थी

सेक्टर-23 से ही मैने अपनी रचनाएँ ब्लॉग में लिखनी शुरू कर दी थी।सेक्टर -9 में भी मैं अपने आस-पास के परिवेश से, अपनी कल्पनाओं को मूर्त्त रूप दे, उसे अपनी लेखनी में उतारने का प्रयास करने लगी थी। लेखनी की प्रक्रिया में नित नए सुधार करने की कोशिश बरकरार थी । सीखना-सिखाना ज़ारी था।

हमारे घर के ठीक नीचे फ्लैट में एक कश्मीरी परिवार रहता था, उनके दो बेटे थे, बङा बेटा विवाहित था, उसके दो बेटे थे। बहु भी नौकरी करती थीं । वह भी मेरी तरह व्यस्त रहती थीं। कुछ दिनों में छोटे बेटे का भी विवाह हो गया था। उनके इस सोसाइटी में दो फ्लैट थे। उन्होंने दोनों बेटों को एक-एक फ्लैट दे दिया था।

अक्सर उनसे मुलाकात होती थी।, जब भी मिलती मुस्कराकर मिलती थीं ।हम अपने-अपने परिवारों को संभालने में व्यस्त थे, तो मिलना और बैठकर बात करने का समय कम होता था।

सिर्फ हम दो ही नहीं, हम जैसी और भी नानी- दादी थीं जो मुस्कराती हुई, गर्व के साथ, समाज में आए इन परिवर्तनों को स्वीकार करते हुए, अपने कर्तव्यों को जी रहीं थी।ऐसा नहीं कि किसी को भी अपनी बहु या बेटी के नौकरीपेशा या महत्वाकांक्षी होने से उज्र था, अपितु वे सब प्रसन्न थी। कुछ ये दादी- नानी अपने समय में स्वयं नौकरीपेशा रहीं थीं ,कुछ वे भी, जिन्होंने परिवार के हित को सर्वोपरि मान, अपनी महत्वाकांक्षाओं को अनदेखा किया था, इन सबका, निरंतर हो रहे इस सामाजिक विकास में पूर्ण सहयोग व सहर्ष सहमति थी।

फिर भी कुछ द्वविधा थी, अपनी भूमिका, अपना जीवन, अपना भविष्य और उससे भी अधिक वे तमन्नाएँ, जो आज भी उनका मुँह ताक रहीं है। अभी भी अपने लिए जीने की इच्छा दबी हुई ही है और यह भी कि पौरूख भी अब थक गए हैं ।

मुझे ऐसी भी युवतियां मिली, जिन्होंने इस भागदौड़ के जीवन को न चुनकर, घर-परिवार का सुरक्षित जीवन चुना है।
और मैंने सोचा कि बेशक भाग दौङ न चुने पर सपने तो चुने।मुझे एक ऐसी युवती भी मिली, जिसने बताया उसे कला में , पेंटिंग, संगीत में रूचि है।वह शादी से पूर्व इसी में अपना समय सार्थक करती थी। संगीत की भी शिक्षा ली थी।यह सब बतातें हुए, उसकी आँखें उल्लास से चमक रहीं थी।
पर अब क्यों नहीं ?
मेरे इस सवाल के जवाब पर वह नैराश्य मुख से बोली,” अब कहाँ समय मिलता है!”
मैं हैरान थी, जो मुझे दिखता था…परिवार में, वह, उसका पति व एक चार साल का बेटा— घर के काम की मदद के लिए, एक कामवाली भी थी।

शायद ऐसा भी हो जो मुझे न दिखता हो, जिसने प्रयास में भी नाउम्मीदी का पर्दा डाला हुआ था।
बाद में मुझे वह सोसाइटी की भजन मंडली में अपने संगीत का शौक पूरा करते दिखती थी।

सोसाइटी की महिलाओं ने मिलकर एक ग्रुप बनाया था, वे सब मिलकर प्रत्येक बृहस्पतिवार को भजन-पाठ करती थीं । सावन के महीने में व नवरात्रि के दिनों में भी उनके विशेष कार्यक्रम होते थे।

हमारा मकान बनना शुरू हो गया था, एस. के. और सेतु प्लॉट पर जाते थे, भजन-पाठ के लिए मैं बनी को लेकर नहीं जा सकती थी। आरंभ में एक दिन गई भी थी, भजन-पाठ अच्छा भी लगा था, अन्य महिलाओं से मिलना भी खुशनुमा था। परंतु मैं धार्मिक मिज़ाज भी नहीं हुँ। अतः उसके बाद कभी समय भी हुआ, तब भी मैं भजन-पाठ के लिए नहीं गई थी। इस कारण भी हम दो वर्ष उस मकान में रहे थे, पर मेरी किसी महिला से गहरी जान- पहचान नहीं हो सकी थी, यूं अभिवादन योग्य जान-पहचान सबसे थी। हमारे फ्लोर पर भी दो फ्लेट के परिवारों से परिचय स्नेहपूर्ण नमस्कार तक ही सीमित था।

पर फिर भी मेरी दोस्ती स्मिता से हो गई थी। वहाँ रहते हुए, हमें नौ महीने हो गए थे, और हमारे घर दो खुशियों का आगमन हो रहा था, लक्ष्मी दो स्वरूपों में हमारे घर प्रवेश कर रही थी। मीशु ने विवाह का फैसला किया था और उसका विवाह श्रृष्टि से निश्चित कर दिया गया था।बनी भी बङा भाई बनने जा रहा था, और हमारा विश्वास लक्ष्मी स्वरूपा के लिए अभिनंदित था ।

कल एक परिंदा बैठा था खिङकी पर,

मैंने उसे देखा, उसने भी मुझे,

वह कुछ बोला नहीं,

पर मानों कहता था-

आवाज तो सुनते हो मेरी, क्या पुकार भी सुनते हो?

बात दाना- पानी की ही क्यों सदा?

कभी मेरी पुकार भी सुनो!

उसमें मेरा हाले-दिल छिपा है,

कभी ध्यान तो लगाओ उसमें ।

वह उङ गया,

मैंने सोचा, क्या वह कुछ कहने आया था?

पर मैंने नहीं सुनी उसकी आवाज़ ।

नए मकान-नए परिवेश (भाग-षष्ठविशंति) (सत्रहंवा मकान)

वक्त (गुलज़ार )

वक्त को आते न जाते

न गुजरते देखा

न उतरते हुए देखा

कभी इल्हाम की सूरत

जमा होते हुए इक जगह

मगर देखा है।

यह मकान अन्य सभी मकानों से भिन्न था, बङा व खुला मकान (तीन बैडरूम ) था।
यहां अहसास भी भिन्न थे, पोते के जन्म ने बुजुर्ग होने की प्रक्रिया पर मुस्करा कर मोहर लगा दी थी। यहाँ मैं ट्यूशन कर रही थी, पर अब मेरी दिनचर्या बनी के चारों ओर बँधी थी सिर्फ मैं ही नहीं, परिवार का प्रत्येक सदस्य ही जैसे बनी के अनुकुल चल रहा था।
यहाँ हम बनी के दादा- दादी के रूप में ही जाने जाते थे। अब मैं तो जैसे सबकी दादी बन गई थी।

हमारे दाएं तरफ के मकान में ममता व पुनीत जी ( मेरी छोटी बहन के देवर- देवरानी) रहते थे। हमारे पूर्व परिचित व रिश्तेदार होने के कारण हमें बहुत हौसला था। सेक्टर-23 की सब्जी मंडी, बाजार तक हमारी पहुंच उनके कारण ही सरल हो गई थी।

पुनीत जी का अपना बिजनेस है, ममता एक प्रतिष्ठित स्कूल में अध्यापिका है। उनके दो बेटे हैं, उस समय बङा बेटा मुम्बई में और छोटा बेटा गुङगांव में ही उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहा था।

इस मकान में पानी की बहुत समस्या थी। कई बार पानी आता ही नहीं था, कभी बहुत कम आता था।मोटर लगी थी, पर पानी का प्रवाह कम होने के कारण, टैंक में पानी भर नहीं पाता था।

यहाँ आने के बाद पता चला कि पानी की समस्या बहुत पुरानी है।स्थानीय वासियों ने सरकारी दरवाजे बहुत खटखटाये, पर समस्या का समाधान नहीं किया गया था।
एस. के. ने सभी पङोसियों को प्रोत्साहित किया था व सबने मिलकर इस समस्या का समाधन करने की पुरजोर कोशिश की थी।समस्या का समाधान आसानी से नहीं हुआ था, लगभग डेढ़ वर्ष में हम पुर्णतः इस समस्या से निबट पाए थे।

हमारे बाएं तरफ के मकान में किराएदार ही रहते थे, पर पानी की समस्या के कारण, वे जल्दी मकान खाली कर देते थे।
उस मकान के साथ के मकान में गुप्ता जी का परिवार रहता था । मिस्टर गुप्ता व मिसेज गुप्ता मिलनसार दंपत्ति थे।उन्होंने भी पानी की समस्या सुलझाने में अपना बहुत सहयोग दिया था।

उनके एक बेटा व एक बेटी थे। बेटा सोनु मानसिक रूप से कुछ कमजोर था।सोनु तब 13-14 वर्ष का था, उसकी छोटी बहन काव्या उससे चार वर्ष छोटी थी।

सोनु को जन्म के तुरंत बाद पीलिया हो गया था। डाक्टर की लापरवाही से उसे इलाज मिलने में देर हो गई थी। ईश्वरीय कृपा से वह बच तो गया पर उसके दिमाग पर असर पङा था।दिमाग की एक ऐसी नस प्रभावित हुई थी, जिसके कारण उसे कम दिखता था। दिमाग की कमी के कारण वह अपने व्यवहार में अपनी आयु से पिछङा दिखता था।एक डॉक्टर की लापरवाही ने उस बच्चे के जीवन में संघर्ष, दुख व तकलीफ़ लिख दी थी।

कुछ व्यवसायों में लापरवाही का कोई स्थान नहीं होता है। हम डाक्टरों की लापरवाही के कारण बहुत लोगों की जिंदगी बर्बाद होते देखते हैं।

सोनु के माता-पिता उसके जीवन को संवारने के लिए बहुत मेहनत कर रहे थे।उसे एक विशेष विद्यालय में पढाया जा रहा था। वह अपनी आयु से पीछे अवश्य था, पर उसकी बुद्धि बहुत तीव्र थी। वह बहुत ध्यान से चीजों को देखता समझता था। तकनीकी समस्याओं को और उनके हल को वह शीघ्र समझ लेता था। उसे चलने में हल्की-फुल्की कठिनाई अवश्य थी, पर वह फुर्तीला था। अपने विद्यालय की ओर से वह स्केटिंग में पारंगत था व उसने जिला प्रतियोगिता जीती थी।

वह मेरे पास पढ़ने आता था।सिर्फ उसे पाठ याद करने में कठिनाई थी, अन्यथा वह पाठ के सभी तथ्य भली-भांति समझ लेता था।ऐसे बच्चों के लिए कोई विशेष पाठ्यक्रम नहीं बनाया जाता है। किताबें भी भिन्न नहीं होती हैं ।हां, पढ़ाने की तकनीक भिन्न होती है।
सोनु एक संवेदनशील बच्चा था।वह बनी से बहुत प्यार करता था।

हमारे घर के सामने एक परिवार रहता था, पिता अपने गांव में रहते थे,और माँ व दो बेटे उस मकान में रह रहे थे।बङे बेटे को गुङगांव में एक अच्छी नौकरी मिल गई थी, इसीलिए माँ अपने दोनों बेटों के साथ यहाँ रहती थी। छोटा बेटा तब आठवीं कक्षा का विद्यार्थी था।
आरंभ में गांव से आकर यह परिवार हमारे इस मकान में रहा था, पर इस मकान की पानी की समस्या व सभी बैडरूम ऊपरी मंजिल में होने के कारण, उन्होंने मकान बदल लिया था।

पहले ही दिन वह स्वयं अपने बङे बेटे के साथ आईं व बेटे ने हमें पानी व पानी की मोटर के सिस्टम को समझाया था।हमें वह कुछ अस्वाभाविक तो लगा था, पर उस समय व्यस्तता के कारण ध्यान नहीं दिया था।

बाद में वह एक बार मुझ से मिलने आई, तब उन्होंने अपने परिवार की गंभीर जेनेटिक बिमारी के विषय में बताया था। इस बिमारी का नाम मुझे याद नहीं , पर इस बिमारी में एक स्वस्थ व्यक्ति धीरे-धीरे नेत्रहीन हो जाता है उनके ताऊ ससुर व देवर भी इसी बिमारी के कारण दृष्टिहीन थे। ।इस दृष्टिबंधता की बिमारी ने उनके बङे बेटे को नेत्रहीन कर दिया था ।उनके पति पूर्णतः स्वस्थ थे।

जब उनका बेटा 10वर्ष का था, उसकी दृष्टि कमज़ोर होने लगी थी। डाक्टर ने उन्हें बता दिया था कि इस बिमारी में धीरे-धीरे दृष्टि कमज़ोर होती है और फिर पूर्णतः दृष्टिहीन हो जाते हैं। 18 वर्ष की आयु तक वह दृष्टिहीन हो गया था। बेटा होनहार था, अपनी स्थिति को समझते हुए, उसने हमेशा अपनी शिक्षा पर ध्यान दिया था। उसने एम.बी.ए. किया था , अब एक अच्छी नौकरी कर रहा था।वह अपने कामों के लिए किसी पर निर्भर नहीं था।

उनके छोटे बेटे पर भी इस बिमारी ने अपना प्रभाव दिखाना शुरू कर दिया था।
विज्ञान ने अभी बहुत खोज करनी हैं , जिससे संसार से लाइलाज बिमारियों का निदान हो सके।
जब हम दूसरों के दुःख व कष्ट देखते हैं, तब हम ईश्वर को धन्यवाद देते हैं कि हम सुखी है, और इतने दुःख के बाद भी वे लोग खुश ही नहीं रहते, अपितु नित हौसले से बढ़ते हुए, अपने संघर्ष के रास्ते पर हँसते-हँसते चलते जाते हैं, यही हमारे सच्चे प्रेरक होते हैं ।

सेक्टर -7 एक्सटेंशन में हमने एक प्लॉट खरीदा था और अब उस पर मकान बनाने का काम शुरू करना था। सेक्टर -23 में हम दो वर्ष रहे थे।सेक्टर 23 से प्रतिदिन मकान बनाने की प्रक्रिया को संभालने में कठिनाई थी, अतः हमने सेक्टर -7 के पास सेक्टर-9 में एक फ्लैट किराए पर ले लिया था।

यह फ्लैट एक हाउसिंग सोसाइटी में था। जम्मू- कश्मीर बैंक ने अपने कर्मचारियों के लिए सोसाइटी बनाई थी।इस सोसाइटी में कश्मीरी, बंगाली, तमिल व पंजाबी इत्यादि प्रदेशवासी रहते थे। सोसाइटी छोटी थी पर फ्लैट अच्छे बने थे।

अंडरग्राउंड पार्किंग स्थल था। चार विंगस में यह सोसाइटी बनी थी। प्रत्येक विंग पांच मंजिला थी। प्रत्येक मंजिल में तीन फ्लैट बने थे। दो फ्लैट तीन बैडरूम के थे, एक फ्लैट दो बैडरूम का था।

हमारा तीन बैडरूम का फ्लैट पहली मंजिल में था। सीढ़ियाँ चढ़ते ही हमारा फ्लैट था। सीढ़ियों के सामने स्टोरेज स्थान था, जहाँ पर्दा डालकर हमने बहुत सामान रखा था।

फ्लैट में एक चैनल गेट व एक लकङी का दरवाजा था, दोनों दरवाजों के बीच एक चौङा ब्लाॅक था, जिसमें एक अलमारी बनी थी।मुख्य दरवाजा पार करते ही, दाएं तरफ एक छोटा बैडरूम था, उसके सामने सिर्फ दो सीढ़ी चढ़कर डाइनिंग हाॅल था व किचन थी।
डाइनिंग हाॅल व किचन के साथ बाॅलकोनी थी।

डाइनिंग हाॅल लंबा व बङा था, जिसमें एक छोर पर किचन थी तो उसके ठीक सामने दूसरे छोर पर एक बङा बैडरूम था। इस बैडरूम में एक छोटा स्टोर भी था व दो खिङकियाँ थी। डाइनिंग हाॅल में भी दो बङी खिङकियाँ थी।

यह फ्लैट हवा की आवाजाही की दृष्टि से खुला फ्लैट था।
डाइनिंग हाॅल के अंत में, इस बैडरूम से पहले फिर दो सीढ़ी थीं ।
यहाँ सीढ़ी से उतरते ही बाथरूम व एक बैडरूम था। इस बैडरूम में भी दो खिङकियाँ थी।सभी कमरों में खिङकियाँ थीं।

मुख्यगेट से प्रवेश करते ही व आरंभ के बैडरूम के पास से गुजरते ही ड्राइंगरूम था। ड्राइंगरूम के साथ एक बाॅलकोनी थी।। मकान बङा व खुला बना था। किचन भी बहुत अच्छी बनी थी, सामान रखने के लिए डाइनिंग हाॅल में भी शेल्फ बने थे।

बनी लगभग पौने दो साल का था, उसे इस फ्लैट में बहुत आनंद आ रहा था।हमारे फ्लैट के ठीक नीचे पार्क था। बनी वहाँ खेलने, झूला झूलने में बहुत खुश होता था।वह बाॅलकोनी से भी नीचे की रौनक देख बहुत खुश होता था।

कुछ मसले जो लिखे जा न सके,

कुछ ऐसे भी जो पढ़े जा न सके।

इन मसलों में न फंस तू प्राणी!

यह मसले नहीं, यह ज़हर है,

इसमें न उलझ!

तू आगे बढ़, तू आगे बढ़ !

नए मकान-नए परिवेश (भाग-पंचविशंति) (सोलहवां मकान)

कविता ( हरिवंशराय बच्चन)

‘पथ की पहचान’

पूर्व चलने के बटोही, बाट की पहचान कर ले,

पुस्तकों में है नहीं छापी गई इसकी कहानी,

हाल इसका ज्ञात होता है न औरों की ज़बानी,

अनगिनत राही गए इस राह से,उनका पता क्या,

पर गए कुछ लोग इस पर छोङ पैरों की निशानी,

यह निशानी मूक होकर भी बहुत कुछ बोलती है,

खोल इसका अर्थ, पंथी, पंथ का अनुमान कर ले।

पूर्व चलने के बटोही, बाट की पहचान कर ले।

हमारे मकान के सामने राखी अपनी चार वर्षीय बेटी मौली के साथ रहती थी।राखी उस गली की रौनक भी थी और शोर भी थी। सारे दिन उसकी आवाज़ गली में गूंजती थी। जितनी तेज माँ की आवाज़ थी, उतनी ही शैतान व नटखट मौली थी।राखी की आवाज़ से ही प्रतीत होता था कि उसका जीवन खुशियों से भरा है।

पर कभी-कभी उसकी आवाज़ दो- तीन दिन तक सुनाई नहीं देती थी । एक दिन मैंने स्वयं देखा कि उसका पति उसे मार रहा था, सिंह साहब के बेटे देवा ने भी देखा और उसने टोका व रोका भी था।

तब पता चला कि राखी दो- तीन दिन तक कैसे गायब हो जाती है।फिर दो तीन दिन बाद हँसती-बोलती दिखती थी। एक औरत अपने जीवन से इस तरह समझौता करती है कि उसे पता ही नहीं चलता कि सुख किसमें, दुःख किसमें ?

मैंने कई बार राखी से उसके मन के हाल जानने का प्रयास भी किया व सहायता करने का आश्वासन देने का अनुमान भी दिया था।

पर राखी ने कभी मन के हाल नहीं दिए थे।उसका मायका पंजाब में था, उसने म्यूजिक में बी.ए. किया था। मैंने उसे म्यूजिक क्लास लेने का सुझाव भी दिया था।

परंतु शायद पति को पसंद नहीं था, पर वह ट्यूशन पढ़ाने लगी थी। उसने नौकरी करने की कोशिश भी की थी, फिर वही कि पति की अनुमति के बिना वह कुछ नहीं कर सकती थी।एक औरत के लिए आर्थिक स्वावलंबन आवश्यक है, पर अपने लिए स्वतंत्र फैसले का स्वावलंबन भी आवश्यक है।

क्या आर्थिक स्वावलंबन के साथ अपने लिए आत्मविश्वास जग जाता है? नहीं, कुछ सीमा तक आत्मविश्वासी तो बनती है, पर घर की चहारदीवारी के लिए दिए गए संस्कार, एक अकेली औरत के लिए बने सामाजिक तंबू, उसे कोई भी गंभीर फैसला लेने से रोक देते है।
औरत घर के अंदर सुरक्षित या बाहर असुरक्षित ? विचार का विषय है?

हमारा समाज उस (तथाकथित अपने) घर में रहते हुए, अपनी दुष्कर स्थिति को सुधारने का सुझाव तो देता है, पर अलगाव की सहमति सहज ही नहीं मिलती है।

राखी से ही मुझे आस-पङोस की जानकारी मिलती थी, श्रीमती वाजपेयी के ससुर अपने आॅपरेशन के लिए आए हैं, उनके पङोसी के बेटे की शादी पहले गुर्जर की बेटी से हुई थी। बाद में दूसरी शादी अपनी ही जाति की लङकी से हुई है।

सबके समाचार देने वाली राखी अपनी कोई बात नहीं बताती थी।पर….

राखी के सास ससुर कई वर्ष पहले विदेश चले गए थे।राखी के पति उस समय बहुत छोटे थे।दादा-दादी के लाडले थे, अतः वह भारत में ही रह गए थे। दो बङी बहनों के साथ माता- पिता चले गए थे, कभी-कभी मिलने आते थे। दादा-दादी ने ही उसकी परवरिश की थी, वह लाड में बहुत जिद्दी व बिगङैल बने थे।राखी की एक ननद विवाह के बाद भारत में पंजाब में रहती थी।

जहाँ राखी को अपने विदेशी सास-ससुर पर गर्व था, वहीं वह कभी उनके साथ रहना नहीं चाहती थी, उसका पति भी भारत छोङना नहीं चाहता था।

पर इस बार सास-ससुर भारत आए तो वह राखी के साथ ही रहे थे। राखी की सास को केंसर था, स्थिति खराब थी, वह अपना अंत समय, भारत में ही बिताना चाहती थीं ।
राखी और उसके पति ने उनके रहने के प्रबंध किए थे। मुझे लगा था कि राखी और उसके पति उनकी सेवा कर रहे होंगे, विशेषकर राखी अवश्य मन से सेवा सत्कार करती होगी। लेकिन एक सप्ताह बाद वह अपनी बेटी के पास चले गए थे।

फिर बात समझ की ही होती है न! सही, गलत को समझना कठिन होता है। एक स्त्री अपने घर के पुरूषों को ही सही मानती रही है, और उसे यही ठीक लगता है। या अपनी सुविधा में उसे यह आसान लगता है। घर के पुरूषों को गलत कहना, मतलब विद्रोह करना और जितना सहन कर रहे हैं , उससे कहीं अधिक झेलना। इसलिए यही सही कि स्वयं सहन करों, दूसरों को भी यही सिखाओ, क्योंकि यही सबसे सरल है, अपने हालातों को अनदेखा करना ही सीखा है, परिवर्तन से डर लगता है ।और बहाना यह कि जो इनके जैसा जीवन नहीं जीते, वे इनके हालात नहीं समझ सकते हैं ।

ऐसा भी है कि न वह अपने प्रति संवेदनशील रहती है न दूसरों के प्रति संवेदनशील होती है।वह अपने जीवन के सुख दुख सिर्फ पति और अपने बच्चों के सुख-दुख में ही पाती है, उस दायरे में रहते हुए कोई रूकावट नहीं चाहती है, इतनी स्वार्थी हो जाती है कि उसे न अपने पर होते अन्याय महसूस होते है न दूसरों पर हो रहे अन्याय ।अपितु वह असंवेदनशील हो कर आततायी का सहयोग भी करती है।

इन स्त्रियों के लिए वे औरतें अजीब होती हैं जो अपने अधिकारों की लङाई लङती हैं।
राखी जिसने कभी अपनी तकलीफ़ को जग जाहिर नहीं किया था, उसने अपनी सास की बात बताई, राखी के शब्दों में,”मम्मी (सास) बहुत जिद्दी हो गई हैं, बहुत चिल्लाती है।कल तो पापाजी(ससुर) को बहुत गुस्सा आया और उन्होंने एक झापङ लगा दिया, मेरे पति ने भी पापा से कहा, एक ओर लगाओ पापा!, बहुत तंग करती है । तब वह चुप हुई।”
मेरे मुँह से तत्काल निकला,” क्या एक बिमार औरत को मारा? तुम्हें लगता है, मारना ठीक था?

मेरी बात सुन राखी घबरा गई थी, उसे यह तो समझ आया कि उसे घर की इतनी बङी बात मुझसे नहीं कहनी चाहिए थी, पर यह समझ नहीं आया कि यह दुर्व्यवहार गलत है। उसे अपनी सास का पक्षधर होना चाहिए था, पर वह तो आततायियों की पक्षधर बनी थी।
ऐसा क्यों ? एक औरत का सम्मान दूसरी औरत का सम्मान क्यों नहीं है? राखी उसी घर में रहेगी, उसकी बेटी बङी होगी, शायद उसके अनुभव कुछ बदलाव लाएं ।

इस गली में मेरी ट्यूशन के कारण, अधिक जान-पहचान हो गई थी। हमेशा की तरह,इस बार भी, मैं अपना काम छोड़, जीवनपथ पर आगे बढ़ गई, यह विश्वास अटूट है कि सीखना- सिखाना ही तो जीवन उद्देश्य है और यह निरंतर चलता रहेगा।

नए नन्हें मेहमान (सदस्य) का स्वागत सत्कार हम सब मिलकर करना चाहते थे।हमने सेक्टर 23 में एक तीन बैडरूम का तीन मंजील मकान किराए पर लिया था।सेतु द्वारका से और हम सब सेक्टर 7 हाऊसिंगबोर्ड से उस मकान में पहुंचे थे, हम सब फिर एक साथ रह रहे थे। एक साथ रहने की खुशी दूगनी हो गई थी, जब बनी का जन्म हुआ था। इस मकान में भी मैंने ट्यूशन करना ज़ारी रखा था और बनी का साथ भी था, उसकी नित नई गतिविधियां हमारे उल्लास को नया रंग देती थी।

सेक्टर 23 के मकान के बङे गेट से घूसते ही एक छोटा आंगन था।आंगन के एक तरफ मोटर लगी थी, व पानी का टेंक था।घर के दरवाजे में प्रवेश करते ही ड्राइंग रूम था और सीधे जाते ही डाइनिंग स्पेस था।ड्राइंग रूम के साथ ही सीढ़ियाँ ऊपर जाती थीं ।सीढ़ियों के नीचे का भाग स्टोर का काम देता था। एस. के. ने उसे ही पूजा स्थल बनाया था।

डाईनिंग के सामने एक लंबी रसोई थी। रसोई में सामान रखने के लिए, शेल्फ इत्यादि अच्छे बने थे। एक तरह से यह एक आधुनिक किचन था। डाइनिंग में एक खिङकी थी, एक खिङकी किचन में थी, जो पीछे आंगन में खुलती थीं ।पीछे आंगन में हमने वाशिंग मशीन रखी थी एक तरफ बाथरूम भी बना था, वह अधिकांशतः हमारे लिए स्टोर का काम करता था।

ऊपरी पहली मंजिल में पहुंचते ही एक खुली चौङी गैलरी थी, जिसमें अलमारियाँ बनी थी। गैलरी के दोनों तरफ एक-एक बैडरूम थे।दोनों बैडरूम में बाॅलकोनी भी थीं। कमरों में ही बाथरूम थे।दूसरी मंजिल में भी एक तरफ बङा बैडरूम था, चौङी गैलरी में सामने अलमारियाँ थी, साथ में एक तरफ बाथरूम था,फिर खुली चौङी छत थी।

यह मकान खुला बना था, सबको इस मकान का नक्शा बहुत पसंद आया था। बनी के जन्म के बाद सेक्टर 7 एक्सटेंशन में सेतु ने एक प्लॉट खरीद लिया था और उसका नक्शा इस मकान से मिलता-जुलता ही बनाया था।

ऐ मेरे बेकल मन! तु कुछ तो समझ,

जीवन के है इंद्रधनुषी रंग, उन्हें तु समझ,

मिलेंगे तुझे सब रंग, तु धीरज धर।

ऐ मेरे बेकल मन! तु कुछ तो समझ,

जीवन बहता, समय की धारा में, उसे तु समझ,

उस बहाव में बहता बहुत कुछ, तु अधीर न बन,

कभी तिनके, तो कभी मोती भी मिलेंगे, तु सब्र कर।

सभी रंगों, मोतियों और तिनको को भी,

तु झोली में भर, कोई न बेअसर।

ऐ मेरे बेकल मन! तु कुछ तो समझ।

नए मकान- नए परिवेश ( भाग-चतुर्विशंति:) ( (पंद्रहवां मकान)

घर मेरा है? (माखनलाल चतुर्वेदी )

क्या कहा कि यह घर मेरा है?

जिसका रवि उगे जेलों में,

संध्या होवे वीरानों में,

उसके कानों में क्या कहने

आते हो? यह घर मेरा है?

हो मुकुट हिमालय पहनाता,

सागर जिसक पद धुलवाता,

यह बंधा बेङियों में मंदिर,

मस्जिद, गुरूद्वारा मेरा है।

क्या कहा कि यह घर मेरा है?

मुझे इस स्कूल के बच्चों के साथ समय बिताना अच्छा लग रहा था।मैं इन बच्चों की मौलिक प्रतिभा को विकसित करना चाहती थी।
कुछ बच्चे चित्रकारी अच्छी करते थे, कुछ कहानी व कविता लिखते थे।मैंने उन्हें उनकी रचनाओं में मौलिकता बनाए रखने के लिए प्रोत्साहित किया था। मुझे खुशी थी कि वे बच्चे अपनी रचनाएँ लेकर मेरे पास आते व मेरी सलाह को ध्यान से सुनते थे।
इस स्कूल की अध्यापिकाएँ भी प्रशिक्षित नहीं थी, शिक्षित थी, पर आत्मविश्वास उच्च स्तर का नहीं था, वे सब अधिकांशतः निम्न मध्यम वर्ग से संबंधित थी ,अंग्रेजी की पढ़ाई की थी, पर इस भाषा से कामचलाऊ संबध था। अंग्रेजी तो मेरी भी प्रभावशाली नहीं थी।फिर भी सभी अध्यापिकाएँ मेरे अनुभवों से सीखना चाहती थी।
नए सत्र में जब पिछले चार वर्षों से प्रथम कक्षा को पढ़ाने वाली अध्यापिका को प्रिंसिपल ने दूसरी व तीसरी कक्षा पढ़ाने का मौका देना चाहा, तो वह घबरा गई थी। प्रिंसिपल ने सभी अध्यापिकाओं को नई कक्षाएँ पढ़ाने का सुझाव दिया था।प्रिंसिपल का उद्देश्य तो इन अध्यापिकाओं का भी विकास करना था।
वे अध्यापिकाएँ मुझ से मिलीं व अपनी झिझक मेरे सामने रखी थी।जिन कक्षाओं को वे पूर्व दो या तीन वर्षों से पढ़ा रही थी, उसमें उनका अनुभव गहरा व सहज था।उस सहजता को छोङ नई कक्षा को पढ़ाने का अनुभव लेने में वह सब असहज हो रही थी। ये सब वैसा ही था, जैसे किसी छात्र को नए कोर्स को पढ़ने में घबराहट होती है।
मुझे खुशी थी कि वे मेरे पास आईं, उन्हें मैंने याद दिलाया कि वे सब शिक्षित, बुद्धिमान व ज्ञानी है। यह भी अहसास दिलाया कि हम सिर्फ सिखाते नहीं, सीखते भी है।
उन्होंने मुझे विश्वास में लेते हुए कहा कि नया काम करने में उन्हें यदि कोई कठिनाई हुई तो क्या मैं सहायता करूँगी?
मुझे उस समय आनंद की प्राप्ति हुई, जब वे सब अपनी कक्षाओं को पढ़ाने में सिर्फ़ सफल ही नहीं थी अपितु आनंदित भी थीं।
मुझे इस स्कूल में काम करके बहुत खुशी हो रही थी, कुछ नया करने के मौके थे परंतु रीढ़ की हड्डी की समस्या हो गई थी।प्रिंसिपल ने मुझे पुरा सहयोग दिया था।

फिर एस. के. रिटायर हो गए थे । हमें सरकारी आवास छोङना पङा था।
आज मुझे यह स्वीकार करने में संकोच नहीं है कि जीवन में मुझे अच्छे और नए काम करने के अवसर बहुत मिले हैं व मैंने उन पर काम भी किया है, परंतु मैं किसी न किसी कारणवश उस पर स्थिर नहीं रही हुँ। मुझे लगता हैं कि परिस्थितियां सिर्फ बहाना होती हैं, यह आप पर निर्भर करता है कि आप किस परिस्थिति में क्या फैसला लेते हैं?

हम सेक्टर -7 हाउसिंग बोर्ड में एक किराए के मकान में शिफ्ट हो गए थे।मेरे तीनों बेटे अपने-अपने क्षेत्रों में सफल हो रहे थे।सेतु एक अच्छी नौकरी कर रहा था, हम उसकी शादी की योजनाएँ बना रहे थे।

सेक्टर-7, हाउसिंग बोर्ड

सेक्टर-7 हाउसिंग बोर्ड के इस मकान का पिछला भाग रोड पर था व आगे का मुख्य द्वार एक गली में था। चूंकि मकान का पिछला द्वार भी था, हमारा आना-जाना पिछले द्वार से ही होता था।
आगे के द्वार से प्रवेश करते ही एक बङा खुला आंगन था, एक तरफ से सीढ़ियाँ ऊपर जाती थी।नीचे का भाग किराए पर दिया जाता था। ऊपर की दो मंजिलें मकान मालिक श्री सिंह के पास ही थी। अथार्त हम फिर मकान मालिक के साथ रह रहे थे।

अब स्वतंत्र मकानों में स्वतंत्र रूप से रहने की आदत हो गई थी।यह मकान हमने क्यों चुना था? मैं अब किस्मत को मानने लगी थी। किस्मत हमें हमारे पूर्व निश्चित द्वार तक पहुंचा देती है।

आगे का आंगन पार कर दो दरवाजे दो कमरों में खुलते थे। बिलकुल सामने के कमरे को पार कर एक छोटी गैलरी थी, वहीं शौचालय व स्नानाघर था। वह गैलरी चौङी थी, जहाँ हम अपना फ्रिज व वांशिग मशीन रख सके थे।उस गैलरी को ही हमने सेतु की शादी में सब्जी भंडार बनाया था।

उस गैलरी से ही एक दरवाजा किचन में खुलता था। किचन लंबी परंतु पतली थी, पर उसी किचन में सेतु की शादी का काम हुआ था।किचन का दूसरा दरवाजा एक अन्य गैलरी में खुलता था, उस गैलरी से सीढ़ियाँ ऊपर की मंजिलों व छत पर जाती थी व गैलरी के अंत का दरवाजा ही मकान का पिछला द्वार था।

उस द्वार के बाद भी एक चौङा बङा आंगन या दालान था। जहाँ गाड़ियाँ खङी की जाती थी।सेतु की शादी में यहाँ मेहंदी रात की पार्टी बहुत अच्छी हुई थी। सभी रिश्तेदारों की गाङियाँ भी खङी हो सकी थी। सिंह साहब के हम आभारी है। पहले यहाँ एक सुंदर बगीचा भी बनाया था, बाद में उसका पक्का फर्श कर दिया था।

आगे के आंगन से दूसरा दाएं तरफ का दरवाजा, दूसरे कमरे में खुलता था, उस कमरे से दूसरी तरफ के दरवाजे से निकलते ही एक छोटा चौङे भाग के साथ एक अन्य कमरे का दरवाजा था।उस कमरे के पीछे का एक दरवाजा सिंह साहब के ऑफिस का था, जिसे हम बंद रखते थे व उसके साथ ही एक अन्य शौचालय व स्नानाघर था।

सिंह साहब का यह ऑफिस मकान के पिछले भाग में था। सिंह साहब प्रापर्टी डीलर का काम करते थे, लोग उनसे मिलने इस ऑफिस में आते थे। सिंह साहब का एक अन्य ऑफिस शहर के डी. एल. एफ काॅलोनी में था। वह अधिकांशतः अपना काम उसी ऑफिस से करते थे। उनके घर के इस ऑफिस में अब एस. के. बैठने लगे थे। रिटायरमेंट का खाली समय भी व्यतीत हो जाता था।

इस मकान की एक अन्य विशेषता थी कि इस घर की सभी दीवारों में टाइल्स लगी थी। इस मकान में सीलन बहुत थी, अतः टाइल्स लगाकर सीलन को छिपाया गया था।

मकानमालिक सिंह साहब पहली मंजिल पर रहते थे। श्रीमती सिंह बहुत समझदार महिला थी। न वह हमारी जिन्दगी में दखलंदाजी करती थी, न हम उनकी जीवनशैली से मतलब रखते थे। उनसे दोस्ती नहीं हुई थी, पर एक दूसरे के लिए मन में बहुत सम्मान था।

श्री मती सिंह एक कर्मठ महिला हैं। उनकी एक शादीशुदा बेटी थी व बेटा बाहर पूना में नौकरी कर रहा था। इस मकान में रहते हुए ही सेतु की शादी हुई थी, उसके एक साल बाद उनके बेटे की शादी हुई थी।
यह बहुत ही खुशदिल परिवार था, परिवार के सभी सदस्यों से हमें उचित सम्मान व प्रेम मिला था।

मैं इस मकान में आने से पहले बहुत चिंतित थी, जब से गुडगांव आई हुँ, स्वतंत्र मकानों में ही रह रही थी, अब तो सरकारी आवास छोङा था। हम मकान मालिक की टोका-टाकी व दबाव से मुक्त थे। अतः चिन्ता थी कि अब कैसे मकान मालिक के साथ रहना होगा? पर खुशी हुई है, यहाँ समय पूर्णतः शांति से बीता था।

सेतु की शादी के लिए उन्होंने अपनी दूसरी मंजिल भी हमें दी थी। शादी के बाद भी सेतु व जया उसी मंजिल में रहे थे। जब उनके बेटे की शादी हुई तब सेतु को द्वारका शिफ्ट होना पङा था।आज भी हमारे सिंह साहब व उनके परिवार के साथ मधुर संबंध बने हुए हैं ।
इस मकान में भी मेरा ट्यूशन का काम चल रहा था। पर हमेशा वही किया जो सबसे उचित लगा था। हमने इस मकान से भी शिफ्ट होने का फैसला लिया था।

हमारे इस मकान के एक तरफ एक होम्योपैथिक डाक्टर अपने पिता व परिवार के साथ रहते थे। उन्होंने अपने मकान का निचला भाग नितिश के परिवार को दिया था।

नितिश के पिता माली हैं । वह डाक्टर साहब के बगीचे की देखभाल तो करते ही हैं । उनके घर की भी देखभाल करते हैं । नितिश की माँ उनके बच्चों को संभालती हैं व खाना बनाती हैं ।डाक्टर साहब व उनकी पत्नी उनके साथ बराबरी का व्यवहार करते हैं ।

नितिश जब दूसरी कक्षा में था, तब से उसने मेरे से पढ़ना शुरू किया था।वह मेरा प्रिय छात्र था।

मकान के दूसरी तरफ एक बुजुर्ग दंपत्ति रहते थे, इनके तीन बेटे हैं , तीनों विदेश में रहते थे।दो साल में एक बार वह भी बच्चों के पास जाते थे, बच्चे भी मिलने आते रहते थे।यह एक विचारणीय विषय है कि बच्चों की उन्नति के लिए उन्हें कितनी उङान भरने देनी चाहिए । अगर विदेश में बसना ही उन्नति है!

प्रत्येक को अपने जीवन के फैसले लेने का अधिकार है, बच्चों के फैसले पर माता-पिता बाधा नहीं बनते हैं । जीवन में कठिनाई तो है, अकेलापन भी है, पर जीवन में खुशियाँ पाने के रास्ते अनेक हैं ।यह दंपत्ति खुशमिजाज थे।आंटीजी तरह-तरह के पकवान बनाकर खुश थीं और अंकल जी अपने बगीचे को संवारने में खुश रहते थे।हमारे साथ उनके भी संबध अच्छे बने थे।

खुशी कितनी अपनी, कितनी पराई,

जीवन का सार ढूँढ लो,

जीवन का सुख अपने हाथ में,

एक ढर्रे से तो सब सुख पाते,

चलो तुम कोई नया ढर्रा ढूँढ लो,

बच्चों सा मन हो, तो खुशी ही खुशी।

(नए मकान – नए परिवेश) (भाग- त्रयोविशंतिः) चौदहवां मकान (सेक्टर- 4, गुङगांव )

अधिकार (महादेवी वर्मा )

वे मुस्काते फूल, नहीं

जिनको आता है मुर्झाना,

वे तारों के दीप, नहीं

जिनको भाता है बुझ जाना,

ऐसा तेरा लोक, वेदना

नहीं, नहीं जिसमें अवसाद,

जलना जाना नहीं, नहीं

जिसने जाना मिटने का स्वाद!

क्या अमरों का लोक मिलेगा

तेरी करूणा का उपहार ?

रहने दो हे देव! अरे

यह मेरा मिटने का अधिकार।

सरकारी क्वार्टर भी बङा मकान था।दो बैडरूम, एक ड्राईंग कम डाइनिंग रूम था, किचन भी बङी थी।
यह मकान पहली मंजिल पर था, सीढ़ियों से ऊपर जाते ही दो क्वार्टर थे। बाएं तरफ का क्वार्टर हमारा था।
मुख्य दरवाजे के साथ ही लंबी बाॅलकोनी थी। बाॅलकोनी से ही पहला दरवाजा ड्राइंगरूम में खुलता था और दूसरा दरवाजा बैडरूम में खुलता था, बाॅलकोनी में ही उसके आगे एक छोटा स्टोर था।
इस लंबी बाॅलकोनी में हम धूप व शाम की छांव का सुख लेते थे।
ड्राइंगरूम से ही जुङा डाइनिंग व उससे जुङी एक बङी किचन भी थी। किचन में स्लेब इत्यादि सब अच्छे बने थे।
डाइनिंग के एक तरफ से छोटे बैडरूम में जाते हुए, स्नानाघर व शौचालय थे। छोटे बैडरूम के साथ एक छोटी बाॅलकोनी भी थी। छोटे बैडरूम के साथ एक बङा बैडरूम था। जिसका एक दरवाजा गैलरी से भी था।

यह दो मंजिला मकान ही थे, अतः हमारी पहली मंजिल से सीढ़ियाँ छत पर जाती थी। छत भी बहुत बङी थी, उस पर पानी की टंकियां रखी थीं।

मुझे शाम का समय छत पर बिताना बहुत अच्छा लगता था। अभी तक गुङगांव के जितने मकानों में रहे थे, छत का सुख मिला था।
यह एक सरकारी काॅलोनी थी, अतः यहाँ सभी सरकारी बाबू, इंजीनियर, ऑफिसर इत्यादि रहते थे।

घर के साथ के क्वार्टर में स्थायी रूप से रहने कोई नहीं आया था, पर जिस वर्ष हम उस मकान से निकले थे, उस वर्ष एक परिवार रहने आया था, उनसे थोङा मेलजोल हुआ था।
हमारे ठीक नीचे क्वार्टर में एक इंजीनियर साहब रहते थे। पति-पति-पत्नी दोनों ही भारी बदन के थे। शादी के 12-15 वर्ष बाद संतान की प्राप्ति हुई थी।अब बेटा 10 वर्ष का था।

नीचे का मकान होने के कारण, उन्हें आगे-पीछे बहुत खुले आंगन मिले थे, आगे उन्होंने अच्छे पेङ-पौधे लगा रखे थे। वह कई वर्ष से इसी मकान में रह रहे थे, अतः मकान में अपनी सुविधानुसार कुछ परिवर्तन भी किए थे।

इंजीनियर साहब का अच्छा रूतबा था। पत्नी भी आधुनिक थी।
उनके दाएं तरफ भी एक अन्य इंजीनियर साहब का परिवार था।दोनों ही परिवार ग्रामीण परिवेश से संबंधित थे, व अपने-अपने गाँवों में भी इनके परिवार अच्छे रूतबेदार थे। जमींदारी तो कब की बीत गई, पर उसका प्रभाव अभी भी उनके व्यवहार और रहन-सहन में दिखता था।

परंतु जैसा कि हम जानते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति का व्यक्तित्व व व्यवहार अलग होता है। अतः हमारे नीचे के मकान के पङोसी के व्यवहार में शालीनता व सज्जनता मिलती थी।
अन्य इंजीनियर साहब पर अभी ग्रामीण रूतबा हावी था, उनका रहन-सहन भी पूर्णतः ग्रामीण ही था।उनके दो बेटे थे, उन्होंने अपने 10 वर्षीय बेटे को बोर्डिंग स्कूल भेजा था, चूंकि दोनों बेटे बहुत शरारती थे, उन्हें अलग-अलग रखना ही उचित लगा था।

यूं भी ग्रामीण लोग अपने बच्चों को हाॅस्टल या बोर्डिंग स्कूल में ही पढ़ाते हैं। चूंकि गांव में अच्छे स्कूल व काॅलेज का अभाव होता है।
परंतु वह बालक सिर्फ एक वर्ष ही बोर्डिंग में रहा था।दोनों भाई घर में आपस में बहुत लङते थे, पर आपसी प्रेम भी बहुत था। बङे भाई का मन हाॅस्टल में नहीं लगा था व छोटा भाई बङे भाई के बिना बैचेन था। माँ के लिए आठ वर्षीय छोटे बेटे को संभालना अब अधिक कठिन था, वह बङे बेटे के बिछोह में भी बहुत दुखी थी।अतः एक वर्ष बाद बेटे को वापिस बुला लिया था।

हमारे सामने के मकानों या क्वार्टरों का डिजाइन अलग था। उन्हीं में सामने का मकान श्री रस्तोगी का था। श्री रस्तोगी एस.के. के ऑफिस में ही काम करते थे। उनके परिवार से हमारा अच्छा मेल-जोल हुआ था।

कभी-कभी पति-पत्नी मानों एक ही स्वभाव के होते है अथवा दोनों एक-दूसरे के अनुसार ऐसे ढल जाते हैं कि भिन्नता दिखती नहीं है।
यह रस्तोगी दंपत्ति भी इसी श्रेणी में आते थे।दोनों खुशमिजाज व व्यवहारिक थे।उनके एक बेटा व एक विवाहित बेटी थी, उसके एक दो वर्षीय बेटा था।
श्री रस्तोगी का बेटा कम्प्यूटर ठीक करने का काम करता था।श्रीमती रस्तोगी सिलाई का काम करती थीं ।
श्री रस्तोगी, एस.के. से एक साल पहले रिटायर हो गए थे। उन्होंने गुङगांव में ही एक काॅलोनी में अपना मकान बना लिया था, रिटायरमेंट के बाद वे उसी मकान में शिफ्ट हुए थे।
श्री रस्तोगी खाली बैठना नहीं चाहते थे, अतः अपने सरकारी ऑफिस में ही पार्ट टाइम काम करना शुरू किया था।
पर दुःख हुआ था, उन्हें कैंसर हुआ था, दो-तीन वर्ष पहले उनका स्वर्गवास हो गया था।

यही एक आम आदमी का आम जीवन होता है।एक सामान्य पर महत्वपूर्ण जीवन संघर्ष, और जब संघर्ष पूर्ण हो ,तब जीवन लीला ईश्वर को समर्पित हो जाती है।

कई बार कुछ लोग ऐसे मिलते हैं, जैसे आपको वर्षों से जानते हो,श्रीमती रावत एक गढ़वाली महिला थी।
हमें इस क्वार्टर में शिफ्ट हुए दो दिन ही हुए थे, मैं दोपहर के समय अपनी बाॅलकोनी में खङी थी। किसी ने मुझे जोर से नमस्ते करी, मैंने देखा, एक लंबी-पतली महिला हाथ हिलाती हुई चली गई थी ।मैं उन्हें नहीं जानती थी, सोचा, उन्होंने किसी अन्य को अभिवादन किया होगा।

परंतु एक दिन वह श्रीमती रस्तोगी के साथ मुझसे मिलने घर पर आ गईं थी।वह मुझ से संबध बनाने की इच्छुक थी।
उन्होंने तुरंत मेरी कामवाली के काम करने के तरीके पर आलोचनात्मक टीका- टिप्पणी का अधिकार तो लिया ही था, पर साथ ही मेरी दिनचर्या पर भी तीखी हैरानी दर्शाती रही थी।

ये ग्रामीण परिवेश से संबंधित महिलाओं के लिए, कामवाली बाई रखना ऐयाशी का सूचक होता है तथा उन्हें यह समझना कठिन होता है कि कैसे कोई कामवाली का काम पसंद कर सकता है?

एक घरेलू महिला, जो नौकरी पर नहीं जाती है, वह अगर कामवाली रखती है(जिसको इसका अधिकार नहीं है ), तो अपना पूरा दिन खाली कैसे बिताती हैं? और जैसा कई बार यह भी देखा है कि कामकाजी महिलाएं भी कामवाली के नखरे उठाना पसंद नहीं करती है।

ये ग्रामीण महिलाएं सुबह-सवेरे अपने घर के काम करके, सिलाई-कढ़ाई अथवा बाहर के अन्य कार्य (बिल जमा करना, राशन इत्यादि काम) भी करती हैं ।और मैं तो यह सब भी नहीं करती हुँ।आस-पङोस में भी गपशप करने नहीं निकलती हुँ।

मुझे लगा कि वाकई जब दूसरे की निगाह से देखो तो पता लगता है कि ईश्वर हम पर कितना मेहरबान है। मैं उनकी बातें सुनकर मुस्करा रही थी।सोच रही थी कि ये दुनिया को सिर्फ अपनी परिपाटियों के दायरे में देखती रही हैं, यही देखना भी चाहती है।और हमें (उनके दायरे से जो बाहर है) एक कटघरे में खङा करने की साधिकार चेष्टा भी करना जानती है।

वह अक्सर मिलने आती थी, धीरे-धीरे मैं जान गई थी कि वह किसी गुरू के पास जाती थी और मुझे भी वहाँ ले जाना चाहती थी। परंतु मैं गुरु पर विश्वास नहीं करती हुँ। एक बार मेरे बाल झङने की समस्या के समाधान के लिए, लाल-हरी बोतले देकर गई थीं कि उसमें पानी भर कर पिया करूं। वे बोतले बियर या शराब की खाली बोतले थी । जिन्हें देखकर ही उबकाई आ रही थी। घर पर सब मुझे उनसे दूर रहने की सलाह दे रहे थे।

तीन वर्ष का समय हमने इस सरकारी मकान में बहुत अच्छा बिताया था।यह मकान मुझे बहुत अपना लगता था, जबकि जानती थी यह भी छूट जाएगा।

इन तीन वर्षों में मैंने अपनी शिक्षण यात्रा का भी एक अन्य पङाव बिताया था। ट्यूशन का काम तो यहाँ भी अच्छा चल रहा था। मैंने यहाँ पास ही एक मानसिक व शारीरिक अपंग बच्चों की सामाजिक संस्था में काम किया था। प्रशासनिक कार्य था, इन बच्चों के साथ बहुत समय नहीं बिताती थी पर एक संबध बन गया था।

मेरे लिए प्रशासनिक कार्य का नया अनुभव था, मैं कुछ नया सीख रही थी।मुझे खुशी हुई कि इस सामाजिक संस्था में अर्थपूर्ण काम हो रहा था। बच्चों की शारीरिक व मानसिक अवस्था को नज़र में रखते हुए ही कार्यप्रणाली का संचालन किया जा रहा था।

एक वर्ष इस संस्था में काम करने के बाद, मैने एक प्राइवेट स्कूल में पढ़ाना शुरू किया था।इस स्कूल में गरीब तबके या ग्रामीण मजदूरों के बच्चे पढ़ने आते थे। ऐसे किसान जिनके पास वर्ष के किसी-किसी मौसम में काम नहीं होता था, उस समय ये किसान शहर आकर मजदूरी करते हैं ।

शहर में रहते हूए बच्चों को अंग्रेजी शिक्षा में शिक्षित करने की प्रबल अभिलाषा मन में रखते हुए, इन छोटे स्कूलों में, जिसमें फीस कम होती थी, अपने बच्चों को पढ़ाते हैं ।

इन किसान मजदूरों का शहर आने का कारण भूख ही नहीं होता है।वे कहते हैं कि गाँवों में खाने को अनाज तो मिल जाता है, पर अन्य जरूरतों के लिए, जैसे-कपङा, दवाई, शिक्षा आदि के लिए नकद पैसा जमा करना जरूरी होता है, इनके पास गाँवों में अपने कच्चे-पक्के मकान भी होते हैं।

कुछ अपने मन की राह भी पकङ राहगीर,

ईश्वर ने जो दी डगर, उसे तुने अपनाया है।

उसे देख और मुस्करा, कुछ लाड दिखा!

अब मनचाही राह पर चलने का वक्त आया है।

रास्ते तो वे भी कठिन थे,

थामी उसने उंगली , तो बने सुगम थे।

डगर तो यह भी पथरीली होगी,

अभी तो खुलकर जीने का दिन आया है।

देख वह भी मुस्करा रहा है,

रास्ता तु चुन अपना, मंजिल वह बना रहा है।

(नए मकान – नए परिवेश) (भाग-द्वाशीति:) (तेरहवां मकान) (गुडगांव, सेक्टर-7)

कवि- हरिशंकर परसाई

कविता- आखिर पाया तो क्या पाया

जब तान छिङी, मैं बोल उठा

जब थाप पङी, पग डोल उठा

औरों के स्वर में स्वर भर कर

अब तक गाया तो क्या गाया?

जिस ओर उठी अंगुली जग की

उस ओर मुङी गति भी पग की

जग के अंचल से बंधा हुआ

खिंचता आया तो क्या आया?

जो वर्तमान ने उगल दिया

उसको भविष्य ने निगल लिया

है ज्ञान, सत्य ही श्रेष्ठ किंतु

जूठन खाया तो क्या खाया?

अब जिस मकान में आए, यह भी एक बैडरूम था, पर खुला मकान था, आगे-पीछे आंगन थे, कमरे खुले बने थे। ड्राइंगरूम से जाते हुए, एक गैलरी थी, उसके पीछे दरवाजे से आंगन था। आंगन में ही स्नानाघर व शौचालय था।

गैलरी के बीच से एक दरवाजा बैडरूम में खुलता था व बैडरूम का दूसरा दरवाजा किचन में खुलता था।बैडरूम में तीन दरवाजे थे, तीसरा दरवाजा पीछे आंगन में खुलता था, किचन का भी दूसरा दरवाजा ड्राइंगरूम में खुलता था।कमरे में अलमारी थी व छत से जुड़े गहरे स्टोर थे।

गैलरी भी इतनी बङी थी कि वह बच्चों का स्टडी रूम हो गया था। आगे के आंगन के एक तरफ से सीढ़ियाँ ऊपर छत पर जाती थी व सीढ़ियों पर भी एक स्टोरनुमा जगह थी। पिछले मकान में छत के लिए सीढ़ियाँ नहीं थी।यह मकान मुख्य सङक पर ही था, अतः बंधा हुआ नहीं लगता था।

यह मकान एस. के. के एक मित्र का था, दोनों पति- पत्नी सरकारी नौकरी करते थे, वे सेक्टर पांच में अपने दूसरे मकान में रहते थे।इस मकान में धीरे-धीरे मेरे पास ट्यूशन के बच्चे बढ़ गए थे। अतः व्यस्त थी।

हमारे मकान के बाएं तरफ गर्ग परिवार था। श्री गर्ग सरकारी स्कूल में गणित के अध्यापक थे व श्रीमती गर्ग एक सरकारी बैंक में कार्यरत थीं ।वह स्वयं अपनी स्कूटी चलाकर बैंक जाती थी।

गुडगांव के अंदर सरकारी ट्रांसपोर्ट नहीं चलता है। अभी दो-तीन वर्षों में कहीं-कही बसें चलने गई हैं। तब कहीं आने-जाने के लिए सिर्फ रिक्शा का सहारा था, ऑटो भी नहीं चलते थे।अधिकांशतः लोगों के पास अपने दो पहिए वाहन थे। तब अपनी कारों का प्रचलन भी बहुत नहीं था। यहां लङकियाँ व महिलाएँ अपने लिए स्कूटी रखती हैं व अपने सभी कार्य स्कूटी से करती हैं।

मुझे यह पहले गणित के अध्यापक मिले थे, जो कोचिंग नहीं करते थे।वह स्कूल से आकर अपने दो बच्चों के साथ व्यस्त रहते थे। वह और बच्चे दोपहर में ही स्कूल से आ जाते थे व मिसेज गर्ग शाम को आती थीं ।

एक बेटी जिसका आगरा के मेडिकल काॅलेज में एडमिशन हो गया था व बेटा भी बारहवीं में था और इंजिनियरिंग के लिए कोंचिग कर रहा था। एक आदर्श परिवार था।

श्रीमती गर्ग बहुत अनुशासन प्रिय थीं ,वह बच्चों को घर से बाहर निकलने नहीं देती थीं । परंतु बच्चों का भी अपना स्वभाव होता है। माँ के दबाव के बाद भी बेटी चुस्त व वाचाल थी। छुट्टियों में जब हाॅस्टल से आती थी तो उसमें आए परिवर्तन दृष्टिगत होते थे।

बेटा सीधा था, माँ के कहने पर था, घर से बाहर नहीं निकलता था। हमारे बच्चे जब शाम को आंगन में टेबिल टेनिस खेलते थे, तब वह कभी-कभी उनके साथ खेलता था, जो उस की माँ को बिलकुल पसंद नहीं आता था। वह मुझे कहतीं कि आपके बच्चे बाहर टेनिस खेलते हैं, तो लोगों की निगाह पङती है, उन्हें नज़र लगती है।( तब मेरे बेटों को डेंगु हुआ था) पर मैं नज़र नहीं मानती हुँ।

मिसेज़ गर्ग व्यवहार कुशल व तेजतर्रार महिला थी। बहुत स्पष्ट व खरी बात बोलती थीं । एक बार उनके पैर पर गहरी चोट लगी थी। डॉक्टर ने कुछ दिन का आराम बताया था, पर वह तीन दिन बाद ही बैंक जा रहीं थीं ।

बोली,” हम औरतों को घर पर कहाँ आराम मिलता है? ऑफिस वाले तो आराम दे देंगे, पर घर के काम तो हमें ही करने हैं । जब काम ही करना है तो… ऑफिस की सीट पर, सामने स्टूल पर पैर रखकर आराम से बैठूँगी, चपरासी ही पानी देगा, अन्य सहकर्मी भी मदद कर देंगे। ऑफिस में घर से ज्यादा आराम है।”

हमारे साथ उनके संबंध अच्छे थे। बाहर सङक पर पानी इकठ्ठा न हो, इसके लिए उनकी हमारी कामवाली से झङप हो जाती थी।

वह स्वयं ऊपर के भाग में रहते थे, नीचे के भाग में किराएदार रहते थे। उनके अपने किराएदारों के साथ संबध अच्छे नहीं बन पाते थे, उनके किराएदार टिकते नहीं थे। मकान मालिक अपने किराएदारों को पानी की सुविधा पर्याप्त नहीं देते हैं । जबकि पानी एक अनिवार्य जरूरत है।

हमारे मकान के दाएं तरफ लेखक महोदय रहते थे । हम उन्हें इसी नाम से जानते थे। वैसे वह श्री जैन थे।

श्री जैन किसी समय इंग्लिश के प्रोफेसर रहे थे। पर अब कई वर्षों से स्कूल के विद्यार्थियों के लिए कुंजी या गाइड लिखते थे। एक वर्ष मैंने भी उनके साथ गाइड लिखने का कार्य किया था।

उनके पास राजस्थानी बोर्ड के हिन्दी व सामाजिक विषयों की गाइड लिखने का कार्य आया था। उन्हें इंग्लिश विषय की गाइड भी लिखनी थी। अतः हिन्दी व अन्य विषयों पर गाइड लिखने का कार्य मुझे दे दिया था।यह कार्य मैंने उनसे सीखा था।

इतने वर्षों में यह सीखा है कि किसी काम को न नहीं कहना है। हमारा जीवन सीखने के लिए है, अतः जब मौका मिले सीख लेना चाहिए।

उनकी पत्नी श्रीमती जैन डी. ए. वी.पब्लिक स्कूल में संस्कृत की अध्यापिका थी। उनके एक बेटा था, जिसने दिल्ली विश्वविद्यालय से एम. बी. ए किया था व फिर मुम्बई में नौकरी कर रहा था। उसने अपने माता-पिता की रजामंदी से अपनी पसंद की लङकी से शादी की थी। यह एक अंतर्जातीय विवाह था, जिसमें दोनों पक्षों के परिवार खुशी-खुशी उपस्थित हुए थे।

लेखक महोदय सारे दिन लिखने का काम करते थे।घर से बहुत कम बाहर निकलते थे, घर पर एक कार थी, पर उन्हें चलानी नहीं आती थी, कहीं आने-जाने के लिए ड्राइवर बुलाते थे।बाहर के सभी कार्य श्रीमती जैन ही करती थीं। स्कूल से आकर, घर व बाहर के सभी कार्य करती थीं । अतः मदद के लिए कामवाली बाई रखी थी, जो खाना बनाने में भी सहायता करती थी।पर यह सहायता भी कुछ वर्षों से ही ले रहीं थीं ।

एक बार श्रीमती जैन से मैंने पुछा कि सभी काम स्वयं करने पर कैसा लगता है ? उनका जवाब था,” दैनिक कार्य करने की आदत है, हो जाता है, लेखक महोदय की ओर से कोई दखलंदाजी भी नहीं है। पर कभी खास खरीदारी में चाहती हुँ कि वह साथ हों, उनकी भी सलाह हो।या यूं ही रात के खाने के बाद, साथ चहलकदमी हो। पर वह निकलते ही नहीं है। जब उम्र थी तब कभी जबरदस्ती व जिद कर उन्हें बाहर निकालती थीं । फिर हँसते हुए बोली, अब तो मेरी भी उम्र हो गई है। न शौक रहे, न उमंग।”

एक पुरूष के लिए आसान होता है, अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाङना। क्या एक विवाहित लेखिका अपने कामों से पल्ला झाङ सकती है?

हमारे इस मकान के आस-पास सभी बच्चे पढ़ाई में होशियार व टाॅपर थे।ये सभी बच्चें मिन्टू व मीशु के बराबर थे। मिन्टू – मीशु को खेलते देख, उनके साथ खेलने आते थे। उन्हें खेलने का एक माहौल मिला था। मिंटू – मीशु टाॅपर नहीं थे, हम उनकी प्रगति से संतुष्ट थे।

एस.के. की गुङगांव के डी.सी.ऑफिस में पोस्टिंग हो गई थी। हमें सेक्टर-4 में एक सरकारी क्वार्टर मिल गया था। अब सेतु एक अच्छी कंपनी में नौकरी कर रहा था, मिंटू की ग्रेजुएशन व कंपनी सेक्रेटरी की पढ़ाई चल रही थी। मीशु भी बारहवीं कक्षा की परीक्षा दे रहा था।एक लंबा सफर किराए के मकानों में व्यतीत कर हम सरकारी मकान में पहुंच गए थे।

मौसम बदलते गए

पतझङ में पत्ते झङते रहे,

बसंत मे फूल खिलते रहे,

बारिश में धरती महकती रही,

मुसाफिर अपनी यात्रा करते रहे।

(नए मकान नए परिवेश) (भाग- एहेतुंशतिः) (बारहवां मकान) गुड़गांव सेक्टर-7

तू, मत फिर मारा मारा(काव्य) (रविन्द्रनाथ टैगोर )

निविङ निशा के अंधकार में,

जलता है ध्रुव तारा,

अरे मूर्ख मन, दिशा भूलकर,

मत फिर मारा-मारा-

तू मत फिर मारा-मारा।

चिर आशा रख, जीवन-बल रख,

संसृति में अनुरक्ति अटल रख,

सुख हो, दुख हो, तू हँसमुख रह,

प्रभु का पकङ सहारा-

तू मत फिर मारा-मारा।

हमारे मकान के बाएं तरफ एक पङोसन से जान-पहचान हुई थी। कुछ लोग स्वयं ही पहल करके दोस्ती का हाथ बढ़ाते हैं व आपकी इच्छा को अनदेखा कर आपसे गहरी जान- पहचान बनाने की पुरज़ोर कोशिश करते हैं।

वह अपने पति की दूसरी पत्नी थी।नाम याद नहीं सुविधा के लिए सुशीला कर देती हुँ।सुशीलाजी के दो सौतेले बच्चे थे। एक बेटा व एक बेटी थे। जब वह विवाह करके इस घर आईं थी, तब वे दोनो बच्चे विवाह योग्य थे। पति चाहते तो गृहस्थी संभालने के लिए बेटे का विवाह कर सकते थे, चूंकि वह एकाकी जीवन नहीं काटना चाहते थे, अतः उन्होंने दूसरा विवाह किया था।सुशीलाजी का भी यह दूसरा विवाह था।

सौतेले बेटा व बेटी का विवाह भी शीघ्र कर दिया था। बेटा अपनी सौतेली माँ से कोई सरोकार नहीं रखता था, बहु सम्मान देती थी।

सुशीला जी अक्सर अपनी रामकहानी सुनाने मेरे पास आ जाती थी। सिर्फ इसी मकान में नही, इसके बाद के मकानों में भी खोजते हुए पहुंच जाती थीं।
सुशीलाजी की सौतेली बेटी मंद बुद्धि थी, यूं देखकर प्रतीत नहीं होता था।
कभी समझ नहीं आया कि विवाह ही हर समस्या का समाधान कैसे समझा जाता है। उनकी इस मंदबुद्धि लङकी के दो विवाह टूट गए थे।

बेटी भी अक्सर मेरे पास आती थी व अपनी ससुरालों की कहानियाँ सुनाती थी।
माँ-बेटी की बातों से यह निष्कर्ष निकला था कि मंदबुद्धि लङकी का विवाह पैसे के बल पर कर तो दिया जाता था पर वह स्थायी नहीं रह पाता था।

एक जवान लङकी की जिम्मेदारी पिता व भाई नहीं ले सकते थे। एक ही बात कही जाती है कि ऐसी लङकी का पूरा जीवन कैसे कटेगा?
अपनी जिम्मेदारी दूसरे के कंधों पर डालना ही एकमात्र उपाय समझा जाता है।पुत्री या बहन के प्रति जब इनका प्रेम इतना ही होता है, तो दूसरा गैर क्योंकर उनसे प्रेम कर सकता है।

सुशीलाजी की भी यही कहानी थी, पहले पति की मृत्यु के बाद वह मायके में भाई भाभी के लिए बोझ थी। वह निःसंतान थी, शिक्षित व तेज तर्रार थी। वह आर्थिक दृष्टि से किसी पर निर्भर नहीं थी। पर एकाकी जीवन कैसे कटेगा? अतः एक ही उपाय रहता है कि विवाह कर दिया जाए।

व्यक्ति अकेले खुश रहता है या किसी के साथ, वाकई खुश रहना भी मनःस्थिति ही है। इस दूसरे विवाह में भी सुशीलाजी खुश नहीं थी, पर जीवन कट रहा था।

भसीन साहब के मकान से निकले थे, इस सपने के साथ कि स्कूल आगे बढ़ेगा। पर श्री श्याम के इस मकान से स्कूल बंद करके निकले थे।
किस्मत और अक्ल कब धोखा दे जाए, पता नहीं लगता है।

मैंने अब एक प्रतिष्ठित स्कूल में नौकरी शुरू कर दी थी।

बारहवां मकान

स्कूल बंद हो गया था, पर मेरा अध्यापन कार्य चल रहा था, समय की गति के साथ हम चल रहे थे, मैं स्कूल जाती थी व ट्यूशन भी चल रहा था। अतः व्यस्तता में अंतर नहीं था, वस्तुतः कार्यप्रणाली में भिन्नता थी। अपनी इस स्कूल की नौकरी में बहुत कुछ नया सीखने को मिल रहा था। प्रतिभावान अध्यापिकाओं के साथ काम करते हुए बारीकी से उनके गुणों को आत्मसात करने का प्रयास भी हो रहा था। किसी के लिए काम करते हुए, अपना काम करने का सुख व स्वतंत्रता के अभाव को महसूस कर रही थी।

अब हम जिस मकान में आए थे, यह भी एक 100गज का मकान था। पर पिछला मकान चूँकि बङा था, दुबारा से छोटे मकान में थे तो यह मकान अधिक छोटा लग रहा था।
इस मकान का नक्शा भी भिन्न था। आगे आंगन फिर एक दरवाजे से किचन खुलती थी और दुसरा दरवाजा ड्राईंगरूम में खुलता था। ड्राइंगरूम से एक छोटी गैलरी अंदर जाती थी, जिसके एक तरफ बैडरूम था व दूसरी तरफ शौचालय व स्नानाघर थे। गैलरी से पीछे का दरवाजा पीछे आंगन में खुलता था।

इस मकान में कोई अलमारी नहीं थी, भसीन साहब के मकान में हमें एक स्टोर मिला था और पिछले श्याम जी के मकान में अलमारियाँ बहुत अच्छी बनी थी व एक छोटा स्टोर भी था। इस मकान में सामान रखने की समस्या थी।

यह मकान एक गली में, गली के अंत में था।गली के दूसरे छोर पर गुर्जरों का मैदान था।गली बंद नहीं थी, दोनों छोर से लोगों की आवाजाही थी।
इस गली में 10-12 मकान थे, सभी पङोसी बहुत अच्छे थे व आपसी मेल-जोल भी अच्छा था।
हमारे मकान के ठीक सामने श्रीमती मेहरा का मकान था। श्रीमती मेहरा अपने दो विवाहित बेटों के साथ रहती थीं । दोनों बहुएँ कामकाजी महिलाएँ थी। बङा बेटा परिवार सहित मकान के ऊपरी भाग में रहता था। उसके एक दस वर्षीय बेटी व एक आठ वर्षीय बेटा था।बच्चे स्कूल के बाद किसी क्रेच में चले जाते थे।शाम को आते थे, फिर ट्यूशन चले जाते थे। बङे बेटा-बहु रात को ही घर आते थे।
छोटे बेटा का विवाह को अभी एक वर्ष भी नहीं हुआ था, वह माँ के साथ नीचे के भाग में रहता था।
श्रीमती मेहरा के पति का देहांत कई वर्ष पहले हुआ था, उन्होंने बहुत मेहनत से अपने बच्चों को योग्य बनाया था।

उन्होंने जीवन में खाली बैठना नहीं सीखा था, अतः बेटों के मना करने पर भी घर से कोई न कोई काम करती थीं ।पङोस के मकान में कुछ लङके किराए पर रहते थे, उन लङकों के लिए वह टिफिन बनाती थीं, अक्सर अचार-पापङ भी बना कर पङोस में सबको देती थीं । स्वभाव बहुत अच्छा था। बहुत सुंदर, सौम्य चेहरा व मुख पर बहुत शांति थी। प्रतिवर्ष पति की पुण्यतिथि पर गरीबों के लिए लंगर करती थीं ।

हमारे मकान के बाएं तरफ के मकान में एक अन्य सचदेवा परिवार रहता था। उनके दो बेटे व एक बेटी थे। बेटी विवाहित थी, पास ही रहती थी। बङे बेटे का विवाह हमारे सामने हुआ था। बङा बेटा योग्य था, उसकी नौकरी अच्छी थी, बहु भी नौकरीपेशा थी। पर छोटा बेटा न कोई स्थायी नौकरी करता था, न किसी व्यापार में मन लगाता था।हर दिन व्यापार बदलता था।

बच्चों के सपने जो भी हो,पर वे यदि दुनियावी तरीके से अपने जीवन को नहीं ढालते हैं , तो माता-पिता परेशान होते हैं ।श्रीमती सचदेवा स्वयं किसी सरकारी स्कूल में पढ़ाती थी। श्री सचदेवा सरकारी विभाग में काम करते थे।

उन्होने अपने बेटे के विवाह से पूर्व अपने मकान का ऊपरी भाग किराए पर दिया था। उनकी किराएदार श्रीमती शर्मा थी, उनके दो छोटे -छोटे बच्चे थे।एक तीन वर्षीय बेटा व एक वर्षीय बेटी ।श्रीमती शर्मा सुंदर, सुशील व सर्वगुणसंपन्न थी।वह उत्तर प्रदेश के एक छोटे शहर से संबंधित थीं।

गुङगांव शहर छोटा होने पर भी आधुनिक है। कई विदेशी कंपनियों के यहाँ होने से लोगों के रहन-सहन व पहनावे में आधुनिकता झलकती है।यहाँ अधिकांशतः लङकियाँ नौकरीपेशा, आत्मनिर्भर हैं ।

श्रीमती शर्मा को आरंभ में इस शहर में तालमेल करने में कठिनाई का अनुभव होता था। वह उस मकान से जाने के बाद भी अक्सर मेरे पास आती थीं, वह नौकरी करना चाहती थीं, मै उन्हें प्रोत्साहित करती थी। तब उन्होंने एन.टी. टी का कोर्स किया था व एक अच्छे स्कूल में नौकरी करने लगी थीं । उनके आत्मविश्वास व पहनावे में अंतर दिखने लगा था।

हमारे मकान के सामने गली का दूसरा या तीसरा मकान श्री गांधी का था, वह गणित के अध्यापक थे, स्कूल में तो अध्यापिकी करते ही थे, घर पर भी सारे दिन कोचिंग करते थे।उनके दो छोटे बच्चे थे।

उनकी पत्नी मधुर स्वभाव की थी। अक्सर मुझसे बहुत बातें करती थीं, कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं कि आप उनसे बेझिझक मिल सकते हैं व सिर्फ़ उनसे मिलकर ही, उनके प्रसन्नचित चेहरे को देखकर , आपके मन की समस्त चिन्ताएं दूर हो जाती हैं।
ऐसी थी श्रीमती गांधी, हमेशा खुश रहती थीं, अपने पति पर गर्व व अपने बच्चों की शरारतें सबसे अनमोल थी।एक ऐसी औरत जिसका जीवन व दुनिया यहीं तक सिमटी थी।

क्यों मन करता है कि इन औरतों को जोर से हिला दूं, जगा दूं, उन्हें ले जाकर शीशे के सामने खड़ी कर दूँ और उनसे उनकी पहचान करा दूँ।

अन्य जितने भी परिवार वहाँ रहते थे,सब एक कुटुंब की तरह रहते थे। यहाँ पङोसियों से अच्छा मेल-जोल हो गया था।

हमने उस मकान को छोङा था चूँकि हमें मकान घुटा-घुटा लगता था। इस स्कूल की नौकरी में पहले मेरे सीधे हाथ का, फिर दोनों पैरों का फ्रेक्चर हुआ व फिर गले की तकलीफ के कारण उस स्कूल की नौकरी छोङ दी थी। अब सिर्फ ट्यूशन ही करती थी।

क्या हारा, क्या जीता,

उसका क्या हिसाब करूँ,

परिपाटियों को तोङने में,

ज़ोर तो लगाना होगा,

फिर कुछ अनचाहा टूटेगा भी,

चाहा कुछ छुटेगा भी।

हार-जीत के फेर में, न पङू,

यही अच्छा होगा।

(नए मकान नए परिवेश)(भाग- विशंतिः ) (ग्यारहवां मकान) सेक्टर -7 गुड़गांव

कविता ( हरिवंशराय बच्चन)

” जीवन की आपाधापी में कब वक्त मिला,

कुछ देर, कहीं पर बैठ, कभी यह सोच सकूँ,

जो किया, कहा, माना, उसमें भला बुरा क्या?

मैं कितना ही भूलूँ भटकू या भरमाऊँ,

है एक कहीं मंजिल, जो मुझे बुलाती है,

कितने ही मेरे पांव पङे, ऊँचे-नीचे,

प्रतिपल वह मेरे पास चली ही आती है,

मुझ पर विधि का आभार बहुत-सी बातों का,

पर मैं कृतज्ञ उसका इस पर सबसे ज्यादा-

नभ ओले बरसाए, धरती शोले उगले,

अनवरत समय की चक्की चलती जाती है।”

मेरा काम अच्छा चल रहा था, अतः अब बङे स्थान की भी आवश्यकता थी।पार्क के ठीक सामने हमें एक बङा मकान मिल गया था।दो बङे कमरे( बैडरूम ) एक बङा हाॅल था।आगे-पीछे बङे आंगन थे।
उस हाॅल को हमने स्कूल बना दिया था।बाहर की तरफ के बैडरूम को छोटा ड्राइंग रूम या स्कूल का ऑफिस बना दिया था।
अब मैं छात्रों के माता-पिता से अलग ऑफिस में मिल सकती थी।हाॅल और ऑफिस के प्रवेश-द्वार अलग- अलग थे।

यह मकान भी सेक्टर-7 में ही था,अतः छात्रों को आने में कठिनाई नहीं थी। फिर हमने रिक्शा भी लगा दी थी। यहाँ भी छात्रों में वृद्धि हो रही थी। हम बच्चों को सामने पार्क में खिलाने ले जाते थे।यहाँ हमने फैंसी ड्रेस शो व खेल दिवस भी किया था।
हमारे मकान-मालिक श्री श्याम न्यू काॅलोनी में रहते थे, उन्हें हमारे द्वारा उस मकान में स्कूल चलाने से कोई एतराज नहीं था।

लेकिन फिर हुडा(हरियाणा ऑथॉरिटी) की ओर से यह नियम बनाया गया कि रिहायशी घरों से कोई व्यापारिक कार्य नहीं किया जा सकता है। घर के समीप ही एक अन्य प्री- नर्सरी स्कूल की संचालिका को भी हमारे स्कूल से परेशानी थी, जबकि उसका स्कूल कई सालों से अच्छा चल रहा था व हमारे स्कूल से उसके लाभ में कोई अंतर भी नहीं पङा था। पर उसके मन की शंका और भय ने उसे हमारे विरूद्ध कर दिया था। हमारे लिए भी एक सीख थी, कोई भी व्यापारिक काम करने पर प्रतिद्वंद्वी भी मिलते हैं।

उसने श्री श्याम को भङकाया व हुड्डा का नियम भी था। अतः श्री श्याम ने हमसे रातोंरात मकान खाली करा दिया था। हम लगभग 2साल उस मकान में रहे थे।

हमारे इस मकान के साथ दाएं मकान में सचदेवा परिवार रहता था और उनके साथ के मकान ( जो उस लाइन का कोने का मकान था) में वशिष्ठ परिवार रहता था। मैं वशिष्ठ परिवार की सदा आभारी हूँ ।

जब मैंने अपने प्री- स्कूल की नींव रखी थी। तब आरंभ में मकान पर, स्कूल के नाम का एक बोर्ड लगा दिया था। आस-पास सभी स्थानों में स्कूल के पर्चे बांट दिए थे। कुछ खिलौने और सामान लगा कर, बच्चों के लिए एक दरी बिछा दी थी।
अभी यह सब प्रबंध किए, 15 दिन हो गए थे, पर कोई एडमिशन तो दूर की बात, कोई पता करने भी नहीं आया था।मेरा स्कूल वीरान पङा था।

वशिष्ठ साहब की छोटी बहु घर पर ही एक प्री नर्सरी स्कूल चलाती थी।
लेकिन वह आंगनबाड़ी के प्रशासन विभाग में नौकरी भी करती थी।स्कूल के लिए उसने एक आया व एक अध्यापिका रखी थी।स्कूल ठीक चल रहा था, पर प्रबंधन में कठिनाई आ रही थी।अतः उनके मन में स्कूल बंद करने की इच्छा हो रही थी।सेशन का आरंभ था, उनके पास स्कूल में सिर्फ पांच छात्र थे।

उन्हें पता लगा कि हमने स्कूल खोला है, तब उनकी बहु ( नाम याद नहीं, शायद किरण) मुझसे मिलने आई थी। उसने अपने स्कूल का सब सामान व वे पाँच छात्र मुझे देने की पेशकश की थी।

स्कूल खोलने के विचार के साथ, मैंने स्कूल प्रशासन, प्रबंधन व शिक्षण शैली पर विचार किया था, उसकी ट्रेनिंग भी ली थी। परंतु व्यापारिक गुणों को अभी सीखना था।

किरण का आत्मविश्वासी व प्रभावशाली व्यक्तित्व देख, एक बार मैं असमंजस में थी, अपने आत्मविश्वास पर भी एक बार दृष्टिपात किया था।

यह व्यापारिक लेन- देन था, पर साथ ही यह भी तुरंत अहसास हुआ कि यह ईश्वरीय कृपा बरसी है।अतः मन में यह विचार बना लिया था कि यह मौका हाथ से नहीं जाने दूंगी।

अपने आत्मविश्वास पर विश्वास नहीं, अपने मन की सच्चाई पर विश्वास था।कहा जाता है कि ‘ईश्वर भी उनकी मदद अवश्य करता है, जो अपनी मदद स्वयं करते हैं ।’
सभी लेन- देन शांतिपूर्वक हुआ था और मेरे स्कूल में उन ईश्वरीय प्रदत पांच बच्चों ने अपने पवित्र कदम रख कर मेरे स्कूल को रौनक किया था।

अब छात्रों के लिए दरी के स्थान पर कुर्सियाँ थीं । खेलने के लिए झूले थे। उनके स्कूल की आया उषा ने मेरे साथ काम करना स्वीकार किया था ।आज हम उनके पङोसी थे, वे हमारे स्कूल की प्रगति देख बहुत खुश थे।

किरण की जिठानी दुबई में नौकरी करती थी, पर जेठजी की नौकरी यहीं किसी सरकारी विभाग में थी, वे यहीं रहते थे।पत्नी का तबादला जब दुबई हुआ तो उसकी उन्नति में बाधा नहीं बने थे।जेठजी साल में एक बार दुबई जाते थे व एक बार पत्नी आ जाती थी, उनके दो बेटियाँ थी, जो माँ के साथ रहती थी।बाद में पत्नी का स्थानांतरण भारत हो गया था।
किरण के दो बेटे थे, उस समय वे दोनो 7-8 वर्ष के थे। किरण अपने सास-ससुर के साथ बहुत खुश थी।

सचदेवा परिवार के मकान की दीवार और हमारी दीवार एक थी।वहीं खङे हो कर हम दोनों पङोसनें बातें करते थे।
इस मकान में दो भाईयों के परिवार रहते थे। बङे भाई के तीन बेटियाँ थी, वह नीचे के भाग में रहते थे।छोटा भाई मकान के ऊपरी भाग में रहता था। उसके एक बेटा, एक बेटी थे।
बहुत पहले मेरी जान-पहचान देवरानी रेखा सचदेवा से हुई थी, जब हम एक ही स्कूल में पढ़ाते थे। इस समय भी वह किसी स्कूल मेें संस्कृत की अध्यापिका थी।

रेखा के पति किसी हरियाणवी सरकारी विभाग मेें काम करते थे।रेखा शाम को ट्यूशन भी पढ़ाती थी। उसका ट्यूशन का काम भी अच्छा चलता था।ईश्वरीय कृपा से उसके जीवन में मेहनत थी तो उसका फल भी अच्छा था।

परंतु उनकी जिठानी की कहानी उसके विपरीत थी। इस मकान में रहते हुए, मेरी जिठानी श्रीमती सचदेवा से अच्छी घनिष्ठता हो गई थी।मैं अक्सर उनसे उनकी संघर्ष की कहानी सुनती थी।

पति-पत्नी मेहनती थे, पर कभी-कभी किस्मत देर से फल देती है। उनके पति ने कई काम किए थे, पर कभी सफल रहे, पर अधिकांशतः असफलता देखनी पङी थी। किसी न किसी कारण काम ठप्प हो जाते थे। कभी किसी से धोखा मिला या कभी बाजार में मंदी आ गई थी।

दोनों भाइयों में छोटा भाई पढ़ाई में होशियार था, अतः सरकारी नौकरी प्राप्त कर ली थी। बङा भाई इस श्रेत्र में भी सफल नहीं हुए थे।अतः परिवार को अक्सर तंगी के दिन देखने पङे थे।

श्रीमती सचदेवा पूर्णतः घरेलू महिला थी। शिक्षा भी सामान्य ली थी। ससुराल दिल्ली की थी,ससुर तो अभी भी दिल्ली के अपने मकान में रहते थे और गुड़गांव का यह मकान भी ससुर का था।

लेकिन जब हम उनके पङोसी बने थे, उनकी स्थिति बेहतर थी। श्री सचदेवा कोई प्राइवेट नौकरी कर रहे थे, श्रीमती सचदेव क्रेच चलाती थी, और क्रेच अच्छा चल रहा था। वह हिन्दी माध्यम के छोटी कक्षा के बच्चों को ट्यूशन पढ़ाती थीं।बङी बेटी ने नर्सिंग का कोर्स किया था, अब वह एक अस्पताल में नर्स का काम करती थी।

पर वह उन दिनों की बात बताती थी जब उनके बच्चे छोटे थे। वह इतनी घरेलू थी कि स्वयं कोई काम करने का विचार भी मन में नहीं आया था।फिर मध्यम वर्ग की महिला कोई भी काम करने से पहले दुनिया की सोचती है। ससुराल व मायके के रिश्तेदार संपन्न थे।

पर संसार में सबका जीवन भिन्न होता है, दूसरों की परवाह करके अपने जीवन का उद्धार नहीं कर सकते हैं।

इस बात की शिक्षा उन्हें अपनी एक पङोसन से मिली थी। जब तंगी के एक दिन, वह बहुत परेशान थी, अपनी छोटी बेटी के लिए घर में दूध भी नहीं था।उस समय उस पङोसन ने उनकी आर्थिक मदद तो करी ही थी, पर साथ ही स्वयं अपना कोई काम करने का सुझाव भी दिया था।
उसने उनके स्वाभिमान व आत्मविश्वास को जगाया था व हौसला दिया कि वह स्वयं भी कोई काम कर सकती हैं ।

उन्होंने मुझे बताया,” सबसे पहले मैंने अपने अंदर की झिझक को दूर किया था, व क्रेच खोला तथा सिलाई का काम भी शुरू किया। उसके बाद पति का काम चला या नहीं, मेरे बच्चों को खाने की कमी नहीं हुई है।”

यह उनकी मेहनत का फल था कि तीनों बेटियाँ पढ़ाई में होशियार थी। मंझली बेटी इंजीनियर बनी व एक अच्छी कंपनी मेें काम करती थी। सबसे छोटी बेटी सेतु के बराबर थी, उसने एम. सी. ए. किया था व साफ्टवेयर इंजीनियर बनी थी।

तीनों बेटियों के विवाह भी बिना दहेज़ व सादगी से हुए थे।तीनों बेटियों को अच्छे जीवन साथी मिले है।
अब बहुत समय से मुलाकात नहीं हुई है,पर कुछ वर्ष पहले अपनी नातिन के साथ मिलने आई थीं ।

ईश्वर ने सबकी किस्मत में अच्छा लिखा होता है, उसे पहचानना ही हमारी सिद्धि है।
श्रीमती सचदेवा ने बहुत कठिनाइयों के साथ अपनी बेटियों को उच्च शिक्षित किया था, कठिनाइयों के बावजूद उनकी शिक्षा में रूकावटें नहीं आने दी थी। जब आप लगन से कर्म करते हैं तो सहायता भी आती है।

भविष्य के गर्त में क्या छिपा होता है? हमें पता नहीं होता है। हम भविष्य के काल्पनिक भय को सच मानकर अपने वर्तमान कर्म को प्रभावहीन बना देते हैं ।

घरेलू महिलाएँ जो घरेलू आर्थिक कार्य करके, अपने परिवार को आर्थिक मजबूती देती हैं , उनका कोई सरकारी रिकॉर्ड नही मिलता है। दुख की बात यह है कि उनके आत्मसम्मान को भी सम्मान नहीं मिलता है, दया अवश्य मिल जाती है ।

दोनों भाईयों ने मिलकर उस मकान को बेच दिया था।श्री व श्रीमती सचदेवा ने उस पैसे से एक छोटा मकान खरीद लिया था, व कुछ पैसा बैंक में डिपोजिट करके अपना भविष्य सुनिश्चित कर लिया था।

जो बीत गया वो याद नहीं,

पर मीठा सुख वो देता है,

वो रंगबिरंगा अतीत था,

जो आज भी मन को,

रंगीन कर देता है।

(नए मकान नए परिवेश) ( भाग-नवदश) (दसवां मकान) गुड़गांव सेक्टर -7

सुख-दुख (सुमित्रानंदन पंत)

‘मैं नहीं चाहता चिर-सुख,

मैं नहीं चाहता चिर-दुख,

सुख दुख की खेल मिचौनी

खोले जीवन अपना मुख।’

भसीन सा. के इस मकान के ठीक सामने राजपाल क्लोथ हाउस था। अपने मकान में ही राजपाल साहब ने अपनी कपङों की दुकान खोली थी। वह किसी सरकारी विभाग में काम करते थे। दिन में उनकी पत्नी व शाम को पति- पत्नी मिल कर दुकान संभालते थे। उनके तीन बेटे थे, बङा बेटा बारहवीं में पढ़ रहा था, उसका मन पढ़ाई में नहीं था। उसी के भविष्य को ध्यान में रख कर, यह दुकान खोली गई थी। दुकान में भीङ होने पर तीनों बेटे भी काम संभालते थे।काॅलोनी में व घर पर ही दुकान होने के कारण आस-पड़ोस में सबको लाभ था।अतः देर रात तक ग्राहक आते थे।

शुरू-शुरू में मैंने उस परिवार को देखा तो बङा अज़ीब लगता था, क्योंकि किसी भी बेटे की सूरत अपनी माँ से नहीं मिलती थी। वह उस परिवार से भिन्न दिखती थीं ।उनकी भाषा में न पंजाबी लहज़ा था न स्पष्ट हिंदी थी । यही समझ आया कि अंर्तजातिय विवाह है।

शीघ्र ही पता लगा कि वह बच्चों की दूसरी माँ है। कुछ वर्ष पहले बच्चों की माँ की मृत्यु
हो गई थी। गृहस्थी व बच्चों की देखभाल के लिए राजपाल साहब ने दूसरी शादी कर ली थी। बङा बेटा तो उन्हें माँ मानने को तैयार नहीं था। पर माँ तन-मन से बच्चों व घर की देखभाल करती थी।

मुझे उस परिवार का बहुत सहारा था।छः साल के मीशु को सिर पर चोट लगी थी।खून बह रहा था।वह स्कूल का समय था, मेरे स्कूल में भी बच्चें पढ़ रहे थे।सेशन का आरंभ था, अतः सिर्फ आठ बच्चे थे। उस दिन आया नहीं आई थी। टी.वी. चलाकर, बच्चों को टी. वी. के सामने बिठाया और श्रीमती राजपाल से संभालने के लिए प्रार्थना करी थी।फिर उन पर स्कूल के बच्चे व घर छोङ ,मैं मीशु को डाक्टर के पास ले गई थी। मीशु के सिर पर टाँके आए थे, मैं लगभग एक घंटे बाद लौटी थी।अपने स्कूल के बच्चों व घर की बहुत चिंता हो रही थी।पर श्रीमती राजपाल ने सब संभाला था।

एक दिन स्कूल की एक नन्हीं छात्रा मलाईका झूले से गिर गई थी, उसके भी सिर पर चोट लगी थी, खून बह रहा था। तब मेरे स्कूल में 25 छात्र थे।मेरी सहायता के लिए एक आया व एक अध्यापिका थी।उनकी सहायता से मलाईका को प्राथमिक चिकित्सा दी थी। श्री मति राजपाल ने तुरंत अपने बङे बेटे को मेरे पास भेज दिया था। उसके स्कूटर पर मैं मलाईका को उसके घर छोङने गई थी। उनका बेटा मलाईका को डाॅक्टर के पास ले जाने के लिए भी तैयार था।

एस.के. का स्थानांतरण चंडीगढ़ हो गया था, इस बार हम चंडीगढ़ नहीं गए, वह अकेले ही गए थे।तब मुझे राजपाल परिवार का बहुत सहारा था।उस परिवार ने मुझे बहुत सम्मान दिया था। बाद में भी श्रीमती राजपाल कहीं मिलती थी, तब बहुत प्रेम व मान देती थीं।
अब कई वर्ष बीत गए हैं, तीनों बेटों ने अपने पिता से मेहनत करना सीखा है, तीनों के अपने पृथक पृथक काम हैं । तीनों बेटों के विवाह के बाद, राजपाल साहब का भी स्वर्गवास हो गया है। माँ अपने सबसे छोटे बेटे के पास रहती है।

हमारे मकान मालिक भसीन साहब अक्सर आते और देख जाते कि मेरा काम कैसा चल रहा है। हमसे पहले उन्होंने अपना यह मकान किसी को किराए पर नहीं दिया था। पर हमारी प्रार्थना पर भसीन साहब ने अपने बङे भाई की अनुमति लेकर, हमें यह मकान किराए पर दिया था।

भसीन साहब की पत्नी की इच्छा, मकान किराए पर देने की नहीं थी।हर वर्ष भसीन साहब हमारा किराया बढ़ा देते थे, मेरा काम अच्छा चल रहा था, अतः मैं यह मकान खाली करना नहीं चाहती थी, चुनांचे वह जितना चाहते थे, हम उतना किराया बढ़ा देते थे।

भसीन साहब के अपनी कोई संतान नहीं थी। भसीन साहब पाँच भाई थे, सभी भाईयों में आपस में बहुत प्रेम व एकता थी। इस सेक्टर में इस खानदान का बहुत सम्मान था, सभी भाई प्रतिष्ठित पदों पर आसीन थे, सभी भाई एक ही मकान में रहते थे, परंतु जब भाईयों के बच्चे बङे होने लगे तब मकान छोटा पङने लगा था।

इन भाईयों की एक छोटी बहन भी थी, जिसे बचपन से हड्डियों की बिमारी थी, जिस कारण अविवाहित थी। फिर उनकी माँ का स्वर्गवास हो गया था, कुछ समय बाद बहन की भी मृत्यु हो गई थी। तब भाईयों ने अलग -अलग होने का फैसला लिया था।

भसीन साहब की कुछ वर्ष पहले एक गंभीर सङक दुर्घटना हुई थी, उनकी कुछ समय के लिए याददाश्त चली गई थी। अब पुर्णतः स्वस्थ थे, पैर में थोङी लचक रह गई थी।
जब भाई अलग होने लगे, तब फैसला लिया गया कि भसीन साहब के साथ उनका सबसे छोटा भाई रहेगा।

अब भसीन साहब ने अपने छोटे भाई के लिए इस मकान के ऊपर एक मंजिल बनानी शुरू की थी और हमें भी मकान खाली करने का नोटिस दिया गया था। यूं इस खानदान से हमारे अच्छे संबंध बन गए थे। उनकी मंजिल पूरी होते ही हम शिफ्ट हो गए थे।
बाद में श्रीमति भसीन ने उस कमरे में अपना क्रेच खोला था।

रास्ते बदल रहे थे,

मंजिल की तलाश में,

राहगीर भटकते रहे,

कारवाँ चलता रहा,

मुसाफिर बदलते रहे।