नए मकान- नए परिवेश ( भाग-चतुर्विशंति:) ( (पंद्रहवां मकान)

घर मेरा है? (माखनलाल चतुर्वेदी )

क्या कहा कि यह घर मेरा है?

जिसका रवि उगे जेलों में,

संध्या होवे वीरानों में,

उसके कानों में क्या कहने

आते हो? यह घर मेरा है?

हो मुकुट हिमालय पहनाता,

सागर जिसक पद धुलवाता,

यह बंधा बेङियों में मंदिर,

मस्जिद, गुरूद्वारा मेरा है।

क्या कहा कि यह घर मेरा है?

मुझे इस स्कूल के बच्चों के साथ समय बिताना अच्छा लग रहा था।मैं इन बच्चों की मौलिक प्रतिभा को विकसित करना चाहती थी।
कुछ बच्चे चित्रकारी अच्छी करते थे, कुछ कहानी व कविता लिखते थे।मैंने उन्हें उनकी रचनाओं में मौलिकता बनाए रखने के लिए प्रोत्साहित किया था। मुझे खुशी थी कि वे बच्चे अपनी रचनाएँ लेकर मेरे पास आते व मेरी सलाह को ध्यान से सुनते थे।
इस स्कूल की अध्यापिकाएँ भी प्रशिक्षित नहीं थी, शिक्षित थी, पर आत्मविश्वास उच्च स्तर का नहीं था, वे सब अधिकांशतः निम्न मध्यम वर्ग से संबंधित थी ,अंग्रेजी की पढ़ाई की थी, पर इस भाषा से कामचलाऊ संबध था। अंग्रेजी तो मेरी भी प्रभावशाली नहीं थी।फिर भी सभी अध्यापिकाएँ मेरे अनुभवों से सीखना चाहती थी।
नए सत्र में जब पिछले चार वर्षों से प्रथम कक्षा को पढ़ाने वाली अध्यापिका को प्रिंसिपल ने दूसरी व तीसरी कक्षा पढ़ाने का मौका देना चाहा, तो वह घबरा गई थी। प्रिंसिपल ने सभी अध्यापिकाओं को नई कक्षाएँ पढ़ाने का सुझाव दिया था।प्रिंसिपल का उद्देश्य तो इन अध्यापिकाओं का भी विकास करना था।
वे अध्यापिकाएँ मुझ से मिलीं व अपनी झिझक मेरे सामने रखी थी।जिन कक्षाओं को वे पूर्व दो या तीन वर्षों से पढ़ा रही थी, उसमें उनका अनुभव गहरा व सहज था।उस सहजता को छोङ नई कक्षा को पढ़ाने का अनुभव लेने में वह सब असहज हो रही थी। ये सब वैसा ही था, जैसे किसी छात्र को नए कोर्स को पढ़ने में घबराहट होती है।
मुझे खुशी थी कि वे मेरे पास आईं, उन्हें मैंने याद दिलाया कि वे सब शिक्षित, बुद्धिमान व ज्ञानी है। यह भी अहसास दिलाया कि हम सिर्फ सिखाते नहीं, सीखते भी है।
उन्होंने मुझे विश्वास में लेते हुए कहा कि नया काम करने में उन्हें यदि कोई कठिनाई हुई तो क्या मैं सहायता करूँगी?
मुझे उस समय आनंद की प्राप्ति हुई, जब वे सब अपनी कक्षाओं को पढ़ाने में सिर्फ़ सफल ही नहीं थी अपितु आनंदित भी थीं।
मुझे इस स्कूल में काम करके बहुत खुशी हो रही थी, कुछ नया करने के मौके थे परंतु रीढ़ की हड्डी की समस्या हो गई थी।प्रिंसिपल ने मुझे पुरा सहयोग दिया था।

फिर एस. के. रिटायर हो गए थे । हमें सरकारी आवास छोङना पङा था।
आज मुझे यह स्वीकार करने में संकोच नहीं है कि जीवन में मुझे अच्छे और नए काम करने के अवसर बहुत मिले हैं व मैंने उन पर काम भी किया है, परंतु मैं किसी न किसी कारणवश उस पर स्थिर नहीं रही हुँ। मुझे लगता हैं कि परिस्थितियां सिर्फ बहाना होती हैं, यह आप पर निर्भर करता है कि आप किस परिस्थिति में क्या फैसला लेते हैं?

हम सेक्टर -7 हाउसिंग बोर्ड में एक किराए के मकान में शिफ्ट हो गए थे।मेरे तीनों बेटे अपने-अपने क्षेत्रों में सफल हो रहे थे।सेतु एक अच्छी नौकरी कर रहा था, हम उसकी शादी की योजनाएँ बना रहे थे।

सेक्टर-7, हाउसिंग बोर्ड

सेक्टर-7 हाउसिंग बोर्ड के इस मकान का पिछला भाग रोड पर था व आगे का मुख्य द्वार एक गली में था। चूंकि मकान का पिछला द्वार भी था, हमारा आना-जाना पिछले द्वार से ही होता था।
आगे के द्वार से प्रवेश करते ही एक बङा खुला आंगन था, एक तरफ से सीढ़ियाँ ऊपर जाती थी।नीचे का भाग किराए पर दिया जाता था। ऊपर की दो मंजिलें मकान मालिक श्री सिंह के पास ही थी। अथार्त हम फिर मकान मालिक के साथ रह रहे थे।

अब स्वतंत्र मकानों में स्वतंत्र रूप से रहने की आदत हो गई थी।यह मकान हमने क्यों चुना था? मैं अब किस्मत को मानने लगी थी। किस्मत हमें हमारे पूर्व निश्चित द्वार तक पहुंचा देती है।

आगे का आंगन पार कर दो दरवाजे दो कमरों में खुलते थे। बिलकुल सामने के कमरे को पार कर एक छोटी गैलरी थी, वहीं शौचालय व स्नानाघर था। वह गैलरी चौङी थी, जहाँ हम अपना फ्रिज व वांशिग मशीन रख सके थे।उस गैलरी को ही हमने सेतु की शादी में सब्जी भंडार बनाया था।

उस गैलरी से ही एक दरवाजा किचन में खुलता था। किचन लंबी परंतु पतली थी, पर उसी किचन में सेतु की शादी का काम हुआ था।किचन का दूसरा दरवाजा एक अन्य गैलरी में खुलता था, उस गैलरी से सीढ़ियाँ ऊपर की मंजिलों व छत पर जाती थी व गैलरी के अंत का दरवाजा ही मकान का पिछला द्वार था।

उस द्वार के बाद भी एक चौङा बङा आंगन या दालान था। जहाँ गाड़ियाँ खङी की जाती थी।सेतु की शादी में यहाँ मेहंदी रात की पार्टी बहुत अच्छी हुई थी। सभी रिश्तेदारों की गाङियाँ भी खङी हो सकी थी। सिंह साहब के हम आभारी है। पहले यहाँ एक सुंदर बगीचा भी बनाया था, बाद में उसका पक्का फर्श कर दिया था।

आगे के आंगन से दूसरा दाएं तरफ का दरवाजा, दूसरे कमरे में खुलता था, उस कमरे से दूसरी तरफ के दरवाजे से निकलते ही एक छोटा चौङे भाग के साथ एक अन्य कमरे का दरवाजा था।उस कमरे के पीछे का एक दरवाजा सिंह साहब के ऑफिस का था, जिसे हम बंद रखते थे व उसके साथ ही एक अन्य शौचालय व स्नानाघर था।

सिंह साहब का यह ऑफिस मकान के पिछले भाग में था। सिंह साहब प्रापर्टी डीलर का काम करते थे, लोग उनसे मिलने इस ऑफिस में आते थे। सिंह साहब का एक अन्य ऑफिस शहर के डी. एल. एफ काॅलोनी में था। वह अधिकांशतः अपना काम उसी ऑफिस से करते थे। उनके घर के इस ऑफिस में अब एस. के. बैठने लगे थे। रिटायरमेंट का खाली समय भी व्यतीत हो जाता था।

इस मकान की एक अन्य विशेषता थी कि इस घर की सभी दीवारों में टाइल्स लगी थी। इस मकान में सीलन बहुत थी, अतः टाइल्स लगाकर सीलन को छिपाया गया था।

मकानमालिक सिंह साहब पहली मंजिल पर रहते थे। श्रीमती सिंह बहुत समझदार महिला थी। न वह हमारी जिन्दगी में दखलंदाजी करती थी, न हम उनकी जीवनशैली से मतलब रखते थे। उनसे दोस्ती नहीं हुई थी, पर एक दूसरे के लिए मन में बहुत सम्मान था।

श्री मती सिंह एक कर्मठ महिला हैं। उनकी एक शादीशुदा बेटी थी व बेटा बाहर पूना में नौकरी कर रहा था। इस मकान में रहते हुए ही सेतु की शादी हुई थी, उसके एक साल बाद उनके बेटे की शादी हुई थी।
यह बहुत ही खुशदिल परिवार था, परिवार के सभी सदस्यों से हमें उचित सम्मान व प्रेम मिला था।

मैं इस मकान में आने से पहले बहुत चिंतित थी, जब से गुडगांव आई हुँ, स्वतंत्र मकानों में ही रह रही थी, अब तो सरकारी आवास छोङा था। हम मकान मालिक की टोका-टाकी व दबाव से मुक्त थे। अतः चिन्ता थी कि अब कैसे मकान मालिक के साथ रहना होगा? पर खुशी हुई है, यहाँ समय पूर्णतः शांति से बीता था।

सेतु की शादी के लिए उन्होंने अपनी दूसरी मंजिल भी हमें दी थी। शादी के बाद भी सेतु व जया उसी मंजिल में रहे थे। जब उनके बेटे की शादी हुई तब सेतु को द्वारका शिफ्ट होना पङा था।आज भी हमारे सिंह साहब व उनके परिवार के साथ मधुर संबंध बने हुए हैं ।
इस मकान में भी मेरा ट्यूशन का काम चल रहा था। पर हमेशा वही किया जो सबसे उचित लगा था। हमने इस मकान से भी शिफ्ट होने का फैसला लिया था।

हमारे इस मकान के एक तरफ एक होम्योपैथिक डाक्टर अपने पिता व परिवार के साथ रहते थे। उन्होंने अपने मकान का निचला भाग नितिश के परिवार को दिया था।

नितिश के पिता माली हैं । वह डाक्टर साहब के बगीचे की देखभाल तो करते ही हैं । उनके घर की भी देखभाल करते हैं । नितिश की माँ उनके बच्चों को संभालती हैं व खाना बनाती हैं ।डाक्टर साहब व उनकी पत्नी उनके साथ बराबरी का व्यवहार करते हैं ।

नितिश जब दूसरी कक्षा में था, तब से उसने मेरे से पढ़ना शुरू किया था।वह मेरा प्रिय छात्र था।

मकान के दूसरी तरफ एक बुजुर्ग दंपत्ति रहते थे, इनके तीन बेटे हैं , तीनों विदेश में रहते थे।दो साल में एक बार वह भी बच्चों के पास जाते थे, बच्चे भी मिलने आते रहते थे।यह एक विचारणीय विषय है कि बच्चों की उन्नति के लिए उन्हें कितनी उङान भरने देनी चाहिए । अगर विदेश में बसना ही उन्नति है!

प्रत्येक को अपने जीवन के फैसले लेने का अधिकार है, बच्चों के फैसले पर माता-पिता बाधा नहीं बनते हैं । जीवन में कठिनाई तो है, अकेलापन भी है, पर जीवन में खुशियाँ पाने के रास्ते अनेक हैं ।यह दंपत्ति खुशमिजाज थे।आंटीजी तरह-तरह के पकवान बनाकर खुश थीं और अंकल जी अपने बगीचे को संवारने में खुश रहते थे।हमारे साथ उनके भी संबध अच्छे बने थे।

खुशी कितनी अपनी, कितनी पराई,

जीवन का सार ढूँढ लो,

जीवन का सुख अपने हाथ में,

एक ढर्रे से तो सब सुख पाते,

चलो तुम कोई नया ढर्रा ढूँढ लो,

बच्चों सा मन हो, तो खुशी ही खुशी।

(नए मकान – नए परिवेश) (भाग- त्रयोविशंतिः) चौदहवां मकान (सेक्टर- 4, गुङगांव )

अधिकार (महादेवी वर्मा )

वे मुस्काते फूल, नहीं

जिनको आता है मुर्झाना,

वे तारों के दीप, नहीं

जिनको भाता है बुझ जाना,

ऐसा तेरा लोक, वेदना

नहीं, नहीं जिसमें अवसाद,

जलना जाना नहीं, नहीं

जिसने जाना मिटने का स्वाद!

क्या अमरों का लोक मिलेगा

तेरी करूणा का उपहार ?

रहने दो हे देव! अरे

यह मेरा मिटने का अधिकार।

सरकारी क्वार्टर भी बङा मकान था।दो बैडरूम, एक ड्राईंग कम डाइनिंग रूम था, किचन भी बङी थी।
यह मकान पहली मंजिल पर था, सीढ़ियों से ऊपर जाते ही दो क्वार्टर थे। बाएं तरफ का क्वार्टर हमारा था।
मुख्य दरवाजे के साथ ही लंबी बाॅलकोनी थी। बाॅलकोनी से ही पहला दरवाजा ड्राइंगरूम में खुलता था और दूसरा दरवाजा बैडरूम में खुलता था, बाॅलकोनी में ही उसके आगे एक छोटा स्टोर था।
इस लंबी बाॅलकोनी में हम धूप व शाम की छांव का सुख लेते थे।
ड्राइंगरूम से ही जुङा डाइनिंग व उससे जुङी एक बङी किचन भी थी। किचन में स्लेब इत्यादि सब अच्छे बने थे।
डाइनिंग के एक तरफ से छोटे बैडरूम में जाते हुए, स्नानाघर व शौचालय थे। छोटे बैडरूम के साथ एक छोटी बाॅलकोनी भी थी। छोटे बैडरूम के साथ एक बङा बैडरूम था। जिसका एक दरवाजा गैलरी से भी था।

यह दो मंजिला मकान ही थे, अतः हमारी पहली मंजिल से सीढ़ियाँ छत पर जाती थी। छत भी बहुत बङी थी, उस पर पानी की टंकियां रखी थीं।

मुझे शाम का समय छत पर बिताना बहुत अच्छा लगता था। अभी तक गुङगांव के जितने मकानों में रहे थे, छत का सुख मिला था।
यह एक सरकारी काॅलोनी थी, अतः यहाँ सभी सरकारी बाबू, इंजीनियर, ऑफिसर इत्यादि रहते थे।

घर के साथ के क्वार्टर में स्थायी रूप से रहने कोई नहीं आया था, पर जिस वर्ष हम उस मकान से निकले थे, उस वर्ष एक परिवार रहने आया था, उनसे थोङा मेलजोल हुआ था।
हमारे ठीक नीचे क्वार्टर में एक इंजीनियर साहब रहते थे। पति-पति-पत्नी दोनों ही भारी बदन के थे। शादी के 12-15 वर्ष बाद संतान की प्राप्ति हुई थी।अब बेटा 10 वर्ष का था।

नीचे का मकान होने के कारण, उन्हें आगे-पीछे बहुत खुले आंगन मिले थे, आगे उन्होंने अच्छे पेङ-पौधे लगा रखे थे। वह कई वर्ष से इसी मकान में रह रहे थे, अतः मकान में अपनी सुविधानुसार कुछ परिवर्तन भी किए थे।

इंजीनियर साहब का अच्छा रूतबा था। पत्नी भी आधुनिक थी।
उनके दाएं तरफ भी एक अन्य इंजीनियर साहब का परिवार था।दोनों ही परिवार ग्रामीण परिवेश से संबंधित थे, व अपने-अपने गाँवों में भी इनके परिवार अच्छे रूतबेदार थे। जमींदारी तो कब की बीत गई, पर उसका प्रभाव अभी भी उनके व्यवहार और रहन-सहन में दिखता था।

परंतु जैसा कि हम जानते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति का व्यक्तित्व व व्यवहार अलग होता है। अतः हमारे नीचे के मकान के पङोसी के व्यवहार में शालीनता व सज्जनता मिलती थी।
अन्य इंजीनियर साहब पर अभी ग्रामीण रूतबा हावी था, उनका रहन-सहन भी पूर्णतः ग्रामीण ही था।उनके दो बेटे थे, उन्होंने अपने 10 वर्षीय बेटे को बोर्डिंग स्कूल भेजा था, चूंकि दोनों बेटे बहुत शरारती थे, उन्हें अलग-अलग रखना ही उचित लगा था।

यूं भी ग्रामीण लोग अपने बच्चों को हाॅस्टल या बोर्डिंग स्कूल में ही पढ़ाते हैं। चूंकि गांव में अच्छे स्कूल व काॅलेज का अभाव होता है।
परंतु वह बालक सिर्फ एक वर्ष ही बोर्डिंग में रहा था।दोनों भाई घर में आपस में बहुत लङते थे, पर आपसी प्रेम भी बहुत था। बङे भाई का मन हाॅस्टल में नहीं लगा था व छोटा भाई बङे भाई के बिना बैचेन था। माँ के लिए आठ वर्षीय छोटे बेटे को संभालना अब अधिक कठिन था, वह बङे बेटे के बिछोह में भी बहुत दुखी थी।अतः एक वर्ष बाद बेटे को वापिस बुला लिया था।

हमारे सामने के मकानों या क्वार्टरों का डिजाइन अलग था। उन्हीं में सामने का मकान श्री रस्तोगी का था। श्री रस्तोगी एस.के. के ऑफिस में ही काम करते थे। उनके परिवार से हमारा अच्छा मेल-जोल हुआ था।

कभी-कभी पति-पत्नी मानों एक ही स्वभाव के होते है अथवा दोनों एक-दूसरे के अनुसार ऐसे ढल जाते हैं कि भिन्नता दिखती नहीं है।
यह रस्तोगी दंपत्ति भी इसी श्रेणी में आते थे।दोनों खुशमिजाज व व्यवहारिक थे।उनके एक बेटा व एक विवाहित बेटी थी, उसके एक दो वर्षीय बेटा था।
श्री रस्तोगी का बेटा कम्प्यूटर ठीक करने का काम करता था।श्रीमती रस्तोगी सिलाई का काम करती थीं ।
श्री रस्तोगी, एस.के. से एक साल पहले रिटायर हो गए थे। उन्होंने गुङगांव में ही एक काॅलोनी में अपना मकान बना लिया था, रिटायरमेंट के बाद वे उसी मकान में शिफ्ट हुए थे।
श्री रस्तोगी खाली बैठना नहीं चाहते थे, अतः अपने सरकारी ऑफिस में ही पार्ट टाइम काम करना शुरू किया था।
पर दुःख हुआ था, उन्हें कैंसर हुआ था, दो-तीन वर्ष पहले उनका स्वर्गवास हो गया था।

यही एक आम आदमी का आम जीवन होता है।एक सामान्य पर महत्वपूर्ण जीवन संघर्ष, और जब संघर्ष पूर्ण हो ,तब जीवन लीला ईश्वर को समर्पित हो जाती है।

कई बार कुछ लोग ऐसे मिलते हैं, जैसे आपको वर्षों से जानते हो,श्रीमती रावत एक गढ़वाली महिला थी।
हमें इस क्वार्टर में शिफ्ट हुए दो दिन ही हुए थे, मैं दोपहर के समय अपनी बाॅलकोनी में खङी थी। किसी ने मुझे जोर से नमस्ते करी, मैंने देखा, एक लंबी-पतली महिला हाथ हिलाती हुई चली गई थी ।मैं उन्हें नहीं जानती थी, सोचा, उन्होंने किसी अन्य को अभिवादन किया होगा।

परंतु एक दिन वह श्रीमती रस्तोगी के साथ मुझसे मिलने घर पर आ गईं थी।वह मुझ से संबध बनाने की इच्छुक थी।
उन्होंने तुरंत मेरी कामवाली के काम करने के तरीके पर आलोचनात्मक टीका- टिप्पणी का अधिकार तो लिया ही था, पर साथ ही मेरी दिनचर्या पर भी तीखी हैरानी दर्शाती रही थी।

ये ग्रामीण परिवेश से संबंधित महिलाओं के लिए, कामवाली बाई रखना ऐयाशी का सूचक होता है तथा उन्हें यह समझना कठिन होता है कि कैसे कोई कामवाली का काम पसंद कर सकता है?

एक घरेलू महिला, जो नौकरी पर नहीं जाती है, वह अगर कामवाली रखती है(जिसको इसका अधिकार नहीं है ), तो अपना पूरा दिन खाली कैसे बिताती हैं? और जैसा कई बार यह भी देखा है कि कामकाजी महिलाएं भी कामवाली के नखरे उठाना पसंद नहीं करती है।

ये ग्रामीण महिलाएं सुबह-सवेरे अपने घर के काम करके, सिलाई-कढ़ाई अथवा बाहर के अन्य कार्य (बिल जमा करना, राशन इत्यादि काम) भी करती हैं ।और मैं तो यह सब भी नहीं करती हुँ।आस-पङोस में भी गपशप करने नहीं निकलती हुँ।

मुझे लगा कि वाकई जब दूसरे की निगाह से देखो तो पता लगता है कि ईश्वर हम पर कितना मेहरबान है। मैं उनकी बातें सुनकर मुस्करा रही थी।सोच रही थी कि ये दुनिया को सिर्फ अपनी परिपाटियों के दायरे में देखती रही हैं, यही देखना भी चाहती है।और हमें (उनके दायरे से जो बाहर है) एक कटघरे में खङा करने की साधिकार चेष्टा भी करना जानती है।

वह अक्सर मिलने आती थी, धीरे-धीरे मैं जान गई थी कि वह किसी गुरू के पास जाती थी और मुझे भी वहाँ ले जाना चाहती थी। परंतु मैं गुरु पर विश्वास नहीं करती हुँ। एक बार मेरे बाल झङने की समस्या के समाधान के लिए, लाल-हरी बोतले देकर गई थीं कि उसमें पानी भर कर पिया करूं। वे बोतले बियर या शराब की खाली बोतले थी । जिन्हें देखकर ही उबकाई आ रही थी। घर पर सब मुझे उनसे दूर रहने की सलाह दे रहे थे।

तीन वर्ष का समय हमने इस सरकारी मकान में बहुत अच्छा बिताया था।यह मकान मुझे बहुत अपना लगता था, जबकि जानती थी यह भी छूट जाएगा।

इन तीन वर्षों में मैंने अपनी शिक्षण यात्रा का भी एक अन्य पङाव बिताया था। ट्यूशन का काम तो यहाँ भी अच्छा चल रहा था। मैंने यहाँ पास ही एक मानसिक व शारीरिक अपंग बच्चों की सामाजिक संस्था में काम किया था। प्रशासनिक कार्य था, इन बच्चों के साथ बहुत समय नहीं बिताती थी पर एक संबध बन गया था।

मेरे लिए प्रशासनिक कार्य का नया अनुभव था, मैं कुछ नया सीख रही थी।मुझे खुशी हुई कि इस सामाजिक संस्था में अर्थपूर्ण काम हो रहा था। बच्चों की शारीरिक व मानसिक अवस्था को नज़र में रखते हुए ही कार्यप्रणाली का संचालन किया जा रहा था।

एक वर्ष इस संस्था में काम करने के बाद, मैने एक प्राइवेट स्कूल में पढ़ाना शुरू किया था।इस स्कूल में गरीब तबके या ग्रामीण मजदूरों के बच्चे पढ़ने आते थे। ऐसे किसान जिनके पास वर्ष के किसी-किसी मौसम में काम नहीं होता था, उस समय ये किसान शहर आकर मजदूरी करते हैं ।

शहर में रहते हूए बच्चों को अंग्रेजी शिक्षा में शिक्षित करने की प्रबल अभिलाषा मन में रखते हुए, इन छोटे स्कूलों में, जिसमें फीस कम होती थी, अपने बच्चों को पढ़ाते हैं ।

इन किसान मजदूरों का शहर आने का कारण भूख ही नहीं होता है।वे कहते हैं कि गाँवों में खाने को अनाज तो मिल जाता है, पर अन्य जरूरतों के लिए, जैसे-कपङा, दवाई, शिक्षा आदि के लिए नकद पैसा जमा करना जरूरी होता है, इनके पास गाँवों में अपने कच्चे-पक्के मकान भी होते हैं।

कुछ अपने मन की राह भी पकङ राहगीर,

ईश्वर ने जो दी डगर, उसे तुने अपनाया है।

उसे देख और मुस्करा, कुछ लाड दिखा!

अब मनचाही राह पर चलने का वक्त आया है।

रास्ते तो वे भी कठिन थे,

थामी उसने उंगली , तो बने सुगम थे।

डगर तो यह भी पथरीली होगी,

अभी तो खुलकर जीने का दिन आया है।

देख वह भी मुस्करा रहा है,

रास्ता तु चुन अपना, मंजिल वह बना रहा है।

(नए मकान – नए परिवेश) (भाग-द्वाशीति:) (तेरहवां मकान) (गुडगांव, सेक्टर-7)

कवि- हरिशंकर परसाई

कविता- आखिर पाया तो क्या पाया

जब तान छिङी, मैं बोल उठा

जब थाप पङी, पग डोल उठा

औरों के स्वर में स्वर भर कर

अब तक गाया तो क्या गाया?

जिस ओर उठी अंगुली जग की

उस ओर मुङी गति भी पग की

जग के अंचल से बंधा हुआ

खिंचता आया तो क्या आया?

जो वर्तमान ने उगल दिया

उसको भविष्य ने निगल लिया

है ज्ञान, सत्य ही श्रेष्ठ किंतु

जूठन खाया तो क्या खाया?

अब जिस मकान में आए, यह भी एक बैडरूम था, पर खुला मकान था, आगे-पीछे आंगन थे, कमरे खुले बने थे। ड्राइंगरूम से जाते हुए, एक गैलरी थी, उसके पीछे दरवाजे से आंगन था। आंगन में ही स्नानाघर व शौचालय था।

गैलरी के बीच से एक दरवाजा बैडरूम में खुलता था व बैडरूम का दूसरा दरवाजा किचन में खुलता था।बैडरूम में तीन दरवाजे थे, तीसरा दरवाजा पीछे आंगन में खुलता था, किचन का भी दूसरा दरवाजा ड्राइंगरूम में खुलता था।कमरे में अलमारी थी व छत से जुड़े गहरे स्टोर थे।

गैलरी भी इतनी बङी थी कि वह बच्चों का स्टडी रूम हो गया था। आगे के आंगन के एक तरफ से सीढ़ियाँ ऊपर छत पर जाती थी व सीढ़ियों पर भी एक स्टोरनुमा जगह थी। पिछले मकान में छत के लिए सीढ़ियाँ नहीं थी।यह मकान मुख्य सङक पर ही था, अतः बंधा हुआ नहीं लगता था।

यह मकान एस. के. के एक मित्र का था, दोनों पति- पत्नी सरकारी नौकरी करते थे, वे सेक्टर पांच में अपने दूसरे मकान में रहते थे।इस मकान में धीरे-धीरे मेरे पास ट्यूशन के बच्चे बढ़ गए थे। अतः व्यस्त थी।

हमारे मकान के बाएं तरफ गर्ग परिवार था। श्री गर्ग सरकारी स्कूल में गणित के अध्यापक थे व श्रीमती गर्ग एक सरकारी बैंक में कार्यरत थीं ।वह स्वयं अपनी स्कूटी चलाकर बैंक जाती थी।

गुडगांव के अंदर सरकारी ट्रांसपोर्ट नहीं चलता है। अभी दो-तीन वर्षों में कहीं-कही बसें चलने गई हैं। तब कहीं आने-जाने के लिए सिर्फ रिक्शा का सहारा था, ऑटो भी नहीं चलते थे।अधिकांशतः लोगों के पास अपने दो पहिए वाहन थे। तब अपनी कारों का प्रचलन भी बहुत नहीं था। यहां लङकियाँ व महिलाएँ अपने लिए स्कूटी रखती हैं व अपने सभी कार्य स्कूटी से करती हैं।

मुझे यह पहले गणित के अध्यापक मिले थे, जो कोचिंग नहीं करते थे।वह स्कूल से आकर अपने दो बच्चों के साथ व्यस्त रहते थे। वह और बच्चे दोपहर में ही स्कूल से आ जाते थे व मिसेज गर्ग शाम को आती थीं ।

एक बेटी जिसका आगरा के मेडिकल काॅलेज में एडमिशन हो गया था व बेटा भी बारहवीं में था और इंजिनियरिंग के लिए कोंचिग कर रहा था। एक आदर्श परिवार था।

श्रीमती गर्ग बहुत अनुशासन प्रिय थीं ,वह बच्चों को घर से बाहर निकलने नहीं देती थीं । परंतु बच्चों का भी अपना स्वभाव होता है। माँ के दबाव के बाद भी बेटी चुस्त व वाचाल थी। छुट्टियों में जब हाॅस्टल से आती थी तो उसमें आए परिवर्तन दृष्टिगत होते थे।

बेटा सीधा था, माँ के कहने पर था, घर से बाहर नहीं निकलता था। हमारे बच्चे जब शाम को आंगन में टेबिल टेनिस खेलते थे, तब वह कभी-कभी उनके साथ खेलता था, जो उस की माँ को बिलकुल पसंद नहीं आता था। वह मुझे कहतीं कि आपके बच्चे बाहर टेनिस खेलते हैं, तो लोगों की निगाह पङती है, उन्हें नज़र लगती है।( तब मेरे बेटों को डेंगु हुआ था) पर मैं नज़र नहीं मानती हुँ।

मिसेज़ गर्ग व्यवहार कुशल व तेजतर्रार महिला थी। बहुत स्पष्ट व खरी बात बोलती थीं । एक बार उनके पैर पर गहरी चोट लगी थी। डॉक्टर ने कुछ दिन का आराम बताया था, पर वह तीन दिन बाद ही बैंक जा रहीं थीं ।

बोली,” हम औरतों को घर पर कहाँ आराम मिलता है? ऑफिस वाले तो आराम दे देंगे, पर घर के काम तो हमें ही करने हैं । जब काम ही करना है तो… ऑफिस की सीट पर, सामने स्टूल पर पैर रखकर आराम से बैठूँगी, चपरासी ही पानी देगा, अन्य सहकर्मी भी मदद कर देंगे। ऑफिस में घर से ज्यादा आराम है।”

हमारे साथ उनके संबंध अच्छे थे। बाहर सङक पर पानी इकठ्ठा न हो, इसके लिए उनकी हमारी कामवाली से झङप हो जाती थी।

वह स्वयं ऊपर के भाग में रहते थे, नीचे के भाग में किराएदार रहते थे। उनके अपने किराएदारों के साथ संबध अच्छे नहीं बन पाते थे, उनके किराएदार टिकते नहीं थे। मकान मालिक अपने किराएदारों को पानी की सुविधा पर्याप्त नहीं देते हैं । जबकि पानी एक अनिवार्य जरूरत है।

हमारे मकान के दाएं तरफ लेखक महोदय रहते थे । हम उन्हें इसी नाम से जानते थे। वैसे वह श्री जैन थे।

श्री जैन किसी समय इंग्लिश के प्रोफेसर रहे थे। पर अब कई वर्षों से स्कूल के विद्यार्थियों के लिए कुंजी या गाइड लिखते थे। एक वर्ष मैंने भी उनके साथ गाइड लिखने का कार्य किया था।

उनके पास राजस्थानी बोर्ड के हिन्दी व सामाजिक विषयों की गाइड लिखने का कार्य आया था। उन्हें इंग्लिश विषय की गाइड भी लिखनी थी। अतः हिन्दी व अन्य विषयों पर गाइड लिखने का कार्य मुझे दे दिया था।यह कार्य मैंने उनसे सीखा था।

इतने वर्षों में यह सीखा है कि किसी काम को न नहीं कहना है। हमारा जीवन सीखने के लिए है, अतः जब मौका मिले सीख लेना चाहिए।

उनकी पत्नी श्रीमती जैन डी. ए. वी.पब्लिक स्कूल में संस्कृत की अध्यापिका थी। उनके एक बेटा था, जिसने दिल्ली विश्वविद्यालय से एम. बी. ए किया था व फिर मुम्बई में नौकरी कर रहा था। उसने अपने माता-पिता की रजामंदी से अपनी पसंद की लङकी से शादी की थी। यह एक अंतर्जातीय विवाह था, जिसमें दोनों पक्षों के परिवार खुशी-खुशी उपस्थित हुए थे।

लेखक महोदय सारे दिन लिखने का काम करते थे।घर से बहुत कम बाहर निकलते थे, घर पर एक कार थी, पर उन्हें चलानी नहीं आती थी, कहीं आने-जाने के लिए ड्राइवर बुलाते थे।बाहर के सभी कार्य श्रीमती जैन ही करती थीं। स्कूल से आकर, घर व बाहर के सभी कार्य करती थीं । अतः मदद के लिए कामवाली बाई रखी थी, जो खाना बनाने में भी सहायता करती थी।पर यह सहायता भी कुछ वर्षों से ही ले रहीं थीं ।

एक बार श्रीमती जैन से मैंने पुछा कि सभी काम स्वयं करने पर कैसा लगता है ? उनका जवाब था,” दैनिक कार्य करने की आदत है, हो जाता है, लेखक महोदय की ओर से कोई दखलंदाजी भी नहीं है। पर कभी खास खरीदारी में चाहती हुँ कि वह साथ हों, उनकी भी सलाह हो।या यूं ही रात के खाने के बाद, साथ चहलकदमी हो। पर वह निकलते ही नहीं है। जब उम्र थी तब कभी जबरदस्ती व जिद कर उन्हें बाहर निकालती थीं । फिर हँसते हुए बोली, अब तो मेरी भी उम्र हो गई है। न शौक रहे, न उमंग।”

एक पुरूष के लिए आसान होता है, अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाङना। क्या एक विवाहित लेखिका अपने कामों से पल्ला झाङ सकती है?

हमारे इस मकान के आस-पास सभी बच्चे पढ़ाई में होशियार व टाॅपर थे।ये सभी बच्चें मिन्टू व मीशु के बराबर थे। मिन्टू – मीशु को खेलते देख, उनके साथ खेलने आते थे। उन्हें खेलने का एक माहौल मिला था। मिंटू – मीशु टाॅपर नहीं थे, हम उनकी प्रगति से संतुष्ट थे।

एस.के. की गुङगांव के डी.सी.ऑफिस में पोस्टिंग हो गई थी। हमें सेक्टर-4 में एक सरकारी क्वार्टर मिल गया था। अब सेतु एक अच्छी कंपनी में नौकरी कर रहा था, मिंटू की ग्रेजुएशन व कंपनी सेक्रेटरी की पढ़ाई चल रही थी। मीशु भी बारहवीं कक्षा की परीक्षा दे रहा था।एक लंबा सफर किराए के मकानों में व्यतीत कर हम सरकारी मकान में पहुंच गए थे।

मौसम बदलते गए

पतझङ में पत्ते झङते रहे,

बसंत मे फूल खिलते रहे,

बारिश में धरती महकती रही,

मुसाफिर अपनी यात्रा करते रहे।

(नए मकान नए परिवेश) (भाग- एहेतुंशतिः) (बारहवां मकान) गुड़गांव सेक्टर-7

तू, मत फिर मारा मारा(काव्य) (रविन्द्रनाथ टैगोर )

निविङ निशा के अंधकार में,

जलता है ध्रुव तारा,

अरे मूर्ख मन, दिशा भूलकर,

मत फिर मारा-मारा-

तू मत फिर मारा-मारा।

चिर आशा रख, जीवन-बल रख,

संसृति में अनुरक्ति अटल रख,

सुख हो, दुख हो, तू हँसमुख रह,

प्रभु का पकङ सहारा-

तू मत फिर मारा-मारा।

हमारे मकान के बाएं तरफ एक पङोसन से जान-पहचान हुई थी। कुछ लोग स्वयं ही पहल करके दोस्ती का हाथ बढ़ाते हैं व आपकी इच्छा को अनदेखा कर आपसे गहरी जान- पहचान बनाने की पुरज़ोर कोशिश करते हैं।

वह अपने पति की दूसरी पत्नी थी।नाम याद नहीं सुविधा के लिए सुशीला कर देती हुँ।सुशीलाजी के दो सौतेले बच्चे थे। एक बेटा व एक बेटी थे। जब वह विवाह करके इस घर आईं थी, तब वे दोनो बच्चे विवाह योग्य थे। पति चाहते तो गृहस्थी संभालने के लिए बेटे का विवाह कर सकते थे, चूंकि वह एकाकी जीवन नहीं काटना चाहते थे, अतः उन्होंने दूसरा विवाह किया था।सुशीलाजी का भी यह दूसरा विवाह था।

सौतेले बेटा व बेटी का विवाह भी शीघ्र कर दिया था। बेटा अपनी सौतेली माँ से कोई सरोकार नहीं रखता था, बहु सम्मान देती थी।

सुशीला जी अक्सर अपनी रामकहानी सुनाने मेरे पास आ जाती थी। सिर्फ इसी मकान में नही, इसके बाद के मकानों में भी खोजते हुए पहुंच जाती थीं।
सुशीलाजी की सौतेली बेटी मंद बुद्धि थी, यूं देखकर प्रतीत नहीं होता था।
कभी समझ नहीं आया कि विवाह ही हर समस्या का समाधान कैसे समझा जाता है। उनकी इस मंदबुद्धि लङकी के दो विवाह टूट गए थे।

बेटी भी अक्सर मेरे पास आती थी व अपनी ससुरालों की कहानियाँ सुनाती थी।
माँ-बेटी की बातों से यह निष्कर्ष निकला था कि मंदबुद्धि लङकी का विवाह पैसे के बल पर कर तो दिया जाता था पर वह स्थायी नहीं रह पाता था।

एक जवान लङकी की जिम्मेदारी पिता व भाई नहीं ले सकते थे। एक ही बात कही जाती है कि ऐसी लङकी का पूरा जीवन कैसे कटेगा?
अपनी जिम्मेदारी दूसरे के कंधों पर डालना ही एकमात्र उपाय समझा जाता है।पुत्री या बहन के प्रति जब इनका प्रेम इतना ही होता है, तो दूसरा गैर क्योंकर उनसे प्रेम कर सकता है।

सुशीलाजी की भी यही कहानी थी, पहले पति की मृत्यु के बाद वह मायके में भाई भाभी के लिए बोझ थी। वह निःसंतान थी, शिक्षित व तेज तर्रार थी। वह आर्थिक दृष्टि से किसी पर निर्भर नहीं थी। पर एकाकी जीवन कैसे कटेगा? अतः एक ही उपाय रहता है कि विवाह कर दिया जाए।

व्यक्ति अकेले खुश रहता है या किसी के साथ, वाकई खुश रहना भी मनःस्थिति ही है। इस दूसरे विवाह में भी सुशीलाजी खुश नहीं थी, पर जीवन कट रहा था।

भसीन साहब के मकान से निकले थे, इस सपने के साथ कि स्कूल आगे बढ़ेगा। पर श्री श्याम के इस मकान से स्कूल बंद करके निकले थे।
किस्मत और अक्ल कब धोखा दे जाए, पता नहीं लगता है।

मैंने अब एक प्रतिष्ठित स्कूल में नौकरी शुरू कर दी थी।

बारहवां मकान

स्कूल बंद हो गया था, पर मेरा अध्यापन कार्य चल रहा था, समय की गति के साथ हम चल रहे थे, मैं स्कूल जाती थी व ट्यूशन भी चल रहा था। अतः व्यस्तता में अंतर नहीं था, वस्तुतः कार्यप्रणाली में भिन्नता थी। अपनी इस स्कूल की नौकरी में बहुत कुछ नया सीखने को मिल रहा था। प्रतिभावान अध्यापिकाओं के साथ काम करते हुए बारीकी से उनके गुणों को आत्मसात करने का प्रयास भी हो रहा था। किसी के लिए काम करते हुए, अपना काम करने का सुख व स्वतंत्रता के अभाव को महसूस कर रही थी।

अब हम जिस मकान में आए थे, यह भी एक 100गज का मकान था। पर पिछला मकान चूँकि बङा था, दुबारा से छोटे मकान में थे तो यह मकान अधिक छोटा लग रहा था।
इस मकान का नक्शा भी भिन्न था। आगे आंगन फिर एक दरवाजे से किचन खुलती थी और दुसरा दरवाजा ड्राईंगरूम में खुलता था। ड्राइंगरूम से एक छोटी गैलरी अंदर जाती थी, जिसके एक तरफ बैडरूम था व दूसरी तरफ शौचालय व स्नानाघर थे। गैलरी से पीछे का दरवाजा पीछे आंगन में खुलता था।

इस मकान में कोई अलमारी नहीं थी, भसीन साहब के मकान में हमें एक स्टोर मिला था और पिछले श्याम जी के मकान में अलमारियाँ बहुत अच्छी बनी थी व एक छोटा स्टोर भी था। इस मकान में सामान रखने की समस्या थी।

यह मकान एक गली में, गली के अंत में था।गली के दूसरे छोर पर गुर्जरों का मैदान था।गली बंद नहीं थी, दोनों छोर से लोगों की आवाजाही थी।
इस गली में 10-12 मकान थे, सभी पङोसी बहुत अच्छे थे व आपसी मेल-जोल भी अच्छा था।
हमारे मकान के ठीक सामने श्रीमती मेहरा का मकान था। श्रीमती मेहरा अपने दो विवाहित बेटों के साथ रहती थीं । दोनों बहुएँ कामकाजी महिलाएँ थी। बङा बेटा परिवार सहित मकान के ऊपरी भाग में रहता था। उसके एक दस वर्षीय बेटी व एक आठ वर्षीय बेटा था।बच्चे स्कूल के बाद किसी क्रेच में चले जाते थे।शाम को आते थे, फिर ट्यूशन चले जाते थे। बङे बेटा-बहु रात को ही घर आते थे।
छोटे बेटा का विवाह को अभी एक वर्ष भी नहीं हुआ था, वह माँ के साथ नीचे के भाग में रहता था।
श्रीमती मेहरा के पति का देहांत कई वर्ष पहले हुआ था, उन्होंने बहुत मेहनत से अपने बच्चों को योग्य बनाया था।

उन्होंने जीवन में खाली बैठना नहीं सीखा था, अतः बेटों के मना करने पर भी घर से कोई न कोई काम करती थीं ।पङोस के मकान में कुछ लङके किराए पर रहते थे, उन लङकों के लिए वह टिफिन बनाती थीं, अक्सर अचार-पापङ भी बना कर पङोस में सबको देती थीं । स्वभाव बहुत अच्छा था। बहुत सुंदर, सौम्य चेहरा व मुख पर बहुत शांति थी। प्रतिवर्ष पति की पुण्यतिथि पर गरीबों के लिए लंगर करती थीं ।

हमारे मकान के बाएं तरफ के मकान में एक अन्य सचदेवा परिवार रहता था। उनके दो बेटे व एक बेटी थे। बेटी विवाहित थी, पास ही रहती थी। बङे बेटे का विवाह हमारे सामने हुआ था। बङा बेटा योग्य था, उसकी नौकरी अच्छी थी, बहु भी नौकरीपेशा थी। पर छोटा बेटा न कोई स्थायी नौकरी करता था, न किसी व्यापार में मन लगाता था।हर दिन व्यापार बदलता था।

बच्चों के सपने जो भी हो,पर वे यदि दुनियावी तरीके से अपने जीवन को नहीं ढालते हैं , तो माता-पिता परेशान होते हैं ।श्रीमती सचदेवा स्वयं किसी सरकारी स्कूल में पढ़ाती थी। श्री सचदेवा सरकारी विभाग में काम करते थे।

उन्होने अपने बेटे के विवाह से पूर्व अपने मकान का ऊपरी भाग किराए पर दिया था। उनकी किराएदार श्रीमती शर्मा थी, उनके दो छोटे -छोटे बच्चे थे।एक तीन वर्षीय बेटा व एक वर्षीय बेटी ।श्रीमती शर्मा सुंदर, सुशील व सर्वगुणसंपन्न थी।वह उत्तर प्रदेश के एक छोटे शहर से संबंधित थीं।

गुङगांव शहर छोटा होने पर भी आधुनिक है। कई विदेशी कंपनियों के यहाँ होने से लोगों के रहन-सहन व पहनावे में आधुनिकता झलकती है।यहाँ अधिकांशतः लङकियाँ नौकरीपेशा, आत्मनिर्भर हैं ।

श्रीमती शर्मा को आरंभ में इस शहर में तालमेल करने में कठिनाई का अनुभव होता था। वह उस मकान से जाने के बाद भी अक्सर मेरे पास आती थीं, वह नौकरी करना चाहती थीं, मै उन्हें प्रोत्साहित करती थी। तब उन्होंने एन.टी. टी का कोर्स किया था व एक अच्छे स्कूल में नौकरी करने लगी थीं । उनके आत्मविश्वास व पहनावे में अंतर दिखने लगा था।

हमारे मकान के सामने गली का दूसरा या तीसरा मकान श्री गांधी का था, वह गणित के अध्यापक थे, स्कूल में तो अध्यापिकी करते ही थे, घर पर भी सारे दिन कोचिंग करते थे।उनके दो छोटे बच्चे थे।

उनकी पत्नी मधुर स्वभाव की थी। अक्सर मुझसे बहुत बातें करती थीं, कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं कि आप उनसे बेझिझक मिल सकते हैं व सिर्फ़ उनसे मिलकर ही, उनके प्रसन्नचित चेहरे को देखकर , आपके मन की समस्त चिन्ताएं दूर हो जाती हैं।
ऐसी थी श्रीमती गांधी, हमेशा खुश रहती थीं, अपने पति पर गर्व व अपने बच्चों की शरारतें सबसे अनमोल थी।एक ऐसी औरत जिसका जीवन व दुनिया यहीं तक सिमटी थी।

क्यों मन करता है कि इन औरतों को जोर से हिला दूं, जगा दूं, उन्हें ले जाकर शीशे के सामने खड़ी कर दूँ और उनसे उनकी पहचान करा दूँ।

अन्य जितने भी परिवार वहाँ रहते थे,सब एक कुटुंब की तरह रहते थे। यहाँ पङोसियों से अच्छा मेल-जोल हो गया था।

हमने उस मकान को छोङा था चूँकि हमें मकान घुटा-घुटा लगता था। इस स्कूल की नौकरी में पहले मेरे सीधे हाथ का, फिर दोनों पैरों का फ्रेक्चर हुआ व फिर गले की तकलीफ के कारण उस स्कूल की नौकरी छोङ दी थी। अब सिर्फ ट्यूशन ही करती थी।

क्या हारा, क्या जीता,

उसका क्या हिसाब करूँ,

परिपाटियों को तोङने में,

ज़ोर तो लगाना होगा,

फिर कुछ अनचाहा टूटेगा भी,

चाहा कुछ छुटेगा भी।

हार-जीत के फेर में, न पङू,

यही अच्छा होगा।

(नए मकान नए परिवेश)(भाग- विशंतिः ) (ग्यारहवां मकान) सेक्टर -7 गुड़गांव

कविता ( हरिवंशराय बच्चन)

” जीवन की आपाधापी में कब वक्त मिला,

कुछ देर, कहीं पर बैठ, कभी यह सोच सकूँ,

जो किया, कहा, माना, उसमें भला बुरा क्या?

मैं कितना ही भूलूँ भटकू या भरमाऊँ,

है एक कहीं मंजिल, जो मुझे बुलाती है,

कितने ही मेरे पांव पङे, ऊँचे-नीचे,

प्रतिपल वह मेरे पास चली ही आती है,

मुझ पर विधि का आभार बहुत-सी बातों का,

पर मैं कृतज्ञ उसका इस पर सबसे ज्यादा-

नभ ओले बरसाए, धरती शोले उगले,

अनवरत समय की चक्की चलती जाती है।”

मेरा काम अच्छा चल रहा था, अतः अब बङे स्थान की भी आवश्यकता थी।पार्क के ठीक सामने हमें एक बङा मकान मिल गया था।दो बङे कमरे( बैडरूम ) एक बङा हाॅल था।आगे-पीछे बङे आंगन थे।
उस हाॅल को हमने स्कूल बना दिया था।बाहर की तरफ के बैडरूम को छोटा ड्राइंग रूम या स्कूल का ऑफिस बना दिया था।
अब मैं छात्रों के माता-पिता से अलग ऑफिस में मिल सकती थी।हाॅल और ऑफिस के प्रवेश-द्वार अलग- अलग थे।

यह मकान भी सेक्टर-7 में ही था,अतः छात्रों को आने में कठिनाई नहीं थी। फिर हमने रिक्शा भी लगा दी थी। यहाँ भी छात्रों में वृद्धि हो रही थी। हम बच्चों को सामने पार्क में खिलाने ले जाते थे।यहाँ हमने फैंसी ड्रेस शो व खेल दिवस भी किया था।
हमारे मकान-मालिक श्री श्याम न्यू काॅलोनी में रहते थे, उन्हें हमारे द्वारा उस मकान में स्कूल चलाने से कोई एतराज नहीं था।

लेकिन फिर हुडा(हरियाणा ऑथॉरिटी) की ओर से यह नियम बनाया गया कि रिहायशी घरों से कोई व्यापारिक कार्य नहीं किया जा सकता है। घर के समीप ही एक अन्य प्री- नर्सरी स्कूल की संचालिका को भी हमारे स्कूल से परेशानी थी, जबकि उसका स्कूल कई सालों से अच्छा चल रहा था व हमारे स्कूल से उसके लाभ में कोई अंतर भी नहीं पङा था। पर उसके मन की शंका और भय ने उसे हमारे विरूद्ध कर दिया था। हमारे लिए भी एक सीख थी, कोई भी व्यापारिक काम करने पर प्रतिद्वंद्वी भी मिलते हैं।

उसने श्री श्याम को भङकाया व हुड्डा का नियम भी था। अतः श्री श्याम ने हमसे रातोंरात मकान खाली करा दिया था। हम लगभग 2साल उस मकान में रहे थे।

हमारे इस मकान के साथ दाएं मकान में सचदेवा परिवार रहता था और उनके साथ के मकान ( जो उस लाइन का कोने का मकान था) में वशिष्ठ परिवार रहता था। मैं वशिष्ठ परिवार की सदा आभारी हूँ ।

जब मैंने अपने प्री- स्कूल की नींव रखी थी। तब आरंभ में मकान पर, स्कूल के नाम का एक बोर्ड लगा दिया था। आस-पास सभी स्थानों में स्कूल के पर्चे बांट दिए थे। कुछ खिलौने और सामान लगा कर, बच्चों के लिए एक दरी बिछा दी थी।
अभी यह सब प्रबंध किए, 15 दिन हो गए थे, पर कोई एडमिशन तो दूर की बात, कोई पता करने भी नहीं आया था।मेरा स्कूल वीरान पङा था।

वशिष्ठ साहब की छोटी बहु घर पर ही एक प्री नर्सरी स्कूल चलाती थी।
लेकिन वह आंगनबाड़ी के प्रशासन विभाग में नौकरी भी करती थी।स्कूल के लिए उसने एक आया व एक अध्यापिका रखी थी।स्कूल ठीक चल रहा था, पर प्रबंधन में कठिनाई आ रही थी।अतः उनके मन में स्कूल बंद करने की इच्छा हो रही थी।सेशन का आरंभ था, उनके पास स्कूल में सिर्फ पांच छात्र थे।

उन्हें पता लगा कि हमने स्कूल खोला है, तब उनकी बहु ( नाम याद नहीं, शायद किरण) मुझसे मिलने आई थी। उसने अपने स्कूल का सब सामान व वे पाँच छात्र मुझे देने की पेशकश की थी।

स्कूल खोलने के विचार के साथ, मैंने स्कूल प्रशासन, प्रबंधन व शिक्षण शैली पर विचार किया था, उसकी ट्रेनिंग भी ली थी। परंतु व्यापारिक गुणों को अभी सीखना था।

किरण का आत्मविश्वासी व प्रभावशाली व्यक्तित्व देख, एक बार मैं असमंजस में थी, अपने आत्मविश्वास पर भी एक बार दृष्टिपात किया था।

यह व्यापारिक लेन- देन था, पर साथ ही यह भी तुरंत अहसास हुआ कि यह ईश्वरीय कृपा बरसी है।अतः मन में यह विचार बना लिया था कि यह मौका हाथ से नहीं जाने दूंगी।

अपने आत्मविश्वास पर विश्वास नहीं, अपने मन की सच्चाई पर विश्वास था।कहा जाता है कि ‘ईश्वर भी उनकी मदद अवश्य करता है, जो अपनी मदद स्वयं करते हैं ।’
सभी लेन- देन शांतिपूर्वक हुआ था और मेरे स्कूल में उन ईश्वरीय प्रदत पांच बच्चों ने अपने पवित्र कदम रख कर मेरे स्कूल को रौनक किया था।

अब छात्रों के लिए दरी के स्थान पर कुर्सियाँ थीं । खेलने के लिए झूले थे। उनके स्कूल की आया उषा ने मेरे साथ काम करना स्वीकार किया था ।आज हम उनके पङोसी थे, वे हमारे स्कूल की प्रगति देख बहुत खुश थे।

किरण की जिठानी दुबई में नौकरी करती थी, पर जेठजी की नौकरी यहीं किसी सरकारी विभाग में थी, वे यहीं रहते थे।पत्नी का तबादला जब दुबई हुआ तो उसकी उन्नति में बाधा नहीं बने थे।जेठजी साल में एक बार दुबई जाते थे व एक बार पत्नी आ जाती थी, उनके दो बेटियाँ थी, जो माँ के साथ रहती थी।बाद में पत्नी का स्थानांतरण भारत हो गया था।
किरण के दो बेटे थे, उस समय वे दोनो 7-8 वर्ष के थे। किरण अपने सास-ससुर के साथ बहुत खुश थी।

सचदेवा परिवार के मकान की दीवार और हमारी दीवार एक थी।वहीं खङे हो कर हम दोनों पङोसनें बातें करते थे।
इस मकान में दो भाईयों के परिवार रहते थे। बङे भाई के तीन बेटियाँ थी, वह नीचे के भाग में रहते थे।छोटा भाई मकान के ऊपरी भाग में रहता था। उसके एक बेटा, एक बेटी थे।
बहुत पहले मेरी जान-पहचान देवरानी रेखा सचदेवा से हुई थी, जब हम एक ही स्कूल में पढ़ाते थे। इस समय भी वह किसी स्कूल मेें संस्कृत की अध्यापिका थी।

रेखा के पति किसी हरियाणवी सरकारी विभाग मेें काम करते थे।रेखा शाम को ट्यूशन भी पढ़ाती थी। उसका ट्यूशन का काम भी अच्छा चलता था।ईश्वरीय कृपा से उसके जीवन में मेहनत थी तो उसका फल भी अच्छा था।

परंतु उनकी जिठानी की कहानी उसके विपरीत थी। इस मकान में रहते हुए, मेरी जिठानी श्रीमती सचदेवा से अच्छी घनिष्ठता हो गई थी।मैं अक्सर उनसे उनकी संघर्ष की कहानी सुनती थी।

पति-पत्नी मेहनती थे, पर कभी-कभी किस्मत देर से फल देती है। उनके पति ने कई काम किए थे, पर कभी सफल रहे, पर अधिकांशतः असफलता देखनी पङी थी। किसी न किसी कारण काम ठप्प हो जाते थे। कभी किसी से धोखा मिला या कभी बाजार में मंदी आ गई थी।

दोनों भाइयों में छोटा भाई पढ़ाई में होशियार था, अतः सरकारी नौकरी प्राप्त कर ली थी। बङा भाई इस श्रेत्र में भी सफल नहीं हुए थे।अतः परिवार को अक्सर तंगी के दिन देखने पङे थे।

श्रीमती सचदेवा पूर्णतः घरेलू महिला थी। शिक्षा भी सामान्य ली थी। ससुराल दिल्ली की थी,ससुर तो अभी भी दिल्ली के अपने मकान में रहते थे और गुड़गांव का यह मकान भी ससुर का था।

लेकिन जब हम उनके पङोसी बने थे, उनकी स्थिति बेहतर थी। श्री सचदेवा कोई प्राइवेट नौकरी कर रहे थे, श्रीमती सचदेव क्रेच चलाती थी, और क्रेच अच्छा चल रहा था। वह हिन्दी माध्यम के छोटी कक्षा के बच्चों को ट्यूशन पढ़ाती थीं।बङी बेटी ने नर्सिंग का कोर्स किया था, अब वह एक अस्पताल में नर्स का काम करती थी।

पर वह उन दिनों की बात बताती थी जब उनके बच्चे छोटे थे। वह इतनी घरेलू थी कि स्वयं कोई काम करने का विचार भी मन में नहीं आया था।फिर मध्यम वर्ग की महिला कोई भी काम करने से पहले दुनिया की सोचती है। ससुराल व मायके के रिश्तेदार संपन्न थे।

पर संसार में सबका जीवन भिन्न होता है, दूसरों की परवाह करके अपने जीवन का उद्धार नहीं कर सकते हैं।

इस बात की शिक्षा उन्हें अपनी एक पङोसन से मिली थी। जब तंगी के एक दिन, वह बहुत परेशान थी, अपनी छोटी बेटी के लिए घर में दूध भी नहीं था।उस समय उस पङोसन ने उनकी आर्थिक मदद तो करी ही थी, पर साथ ही स्वयं अपना कोई काम करने का सुझाव भी दिया था।
उसने उनके स्वाभिमान व आत्मविश्वास को जगाया था व हौसला दिया कि वह स्वयं भी कोई काम कर सकती हैं ।

उन्होंने मुझे बताया,” सबसे पहले मैंने अपने अंदर की झिझक को दूर किया था, व क्रेच खोला तथा सिलाई का काम भी शुरू किया। उसके बाद पति का काम चला या नहीं, मेरे बच्चों को खाने की कमी नहीं हुई है।”

यह उनकी मेहनत का फल था कि तीनों बेटियाँ पढ़ाई में होशियार थी। मंझली बेटी इंजीनियर बनी व एक अच्छी कंपनी मेें काम करती थी। सबसे छोटी बेटी सेतु के बराबर थी, उसने एम. सी. ए. किया था व साफ्टवेयर इंजीनियर बनी थी।

तीनों बेटियों के विवाह भी बिना दहेज़ व सादगी से हुए थे।तीनों बेटियों को अच्छे जीवन साथी मिले है।
अब बहुत समय से मुलाकात नहीं हुई है,पर कुछ वर्ष पहले अपनी नातिन के साथ मिलने आई थीं ।

ईश्वर ने सबकी किस्मत में अच्छा लिखा होता है, उसे पहचानना ही हमारी सिद्धि है।
श्रीमती सचदेवा ने बहुत कठिनाइयों के साथ अपनी बेटियों को उच्च शिक्षित किया था, कठिनाइयों के बावजूद उनकी शिक्षा में रूकावटें नहीं आने दी थी। जब आप लगन से कर्म करते हैं तो सहायता भी आती है।

भविष्य के गर्त में क्या छिपा होता है? हमें पता नहीं होता है। हम भविष्य के काल्पनिक भय को सच मानकर अपने वर्तमान कर्म को प्रभावहीन बना देते हैं ।

घरेलू महिलाएँ जो घरेलू आर्थिक कार्य करके, अपने परिवार को आर्थिक मजबूती देती हैं , उनका कोई सरकारी रिकॉर्ड नही मिलता है। दुख की बात यह है कि उनके आत्मसम्मान को भी सम्मान नहीं मिलता है, दया अवश्य मिल जाती है ।

दोनों भाईयों ने मिलकर उस मकान को बेच दिया था।श्री व श्रीमती सचदेवा ने उस पैसे से एक छोटा मकान खरीद लिया था, व कुछ पैसा बैंक में डिपोजिट करके अपना भविष्य सुनिश्चित कर लिया था।

जो बीत गया वो याद नहीं,

पर मीठा सुख वो देता है,

वो रंगबिरंगा अतीत था,

जो आज भी मन को,

रंगीन कर देता है।

(नए मकान नए परिवेश) ( भाग-नवदश) (दसवां मकान) गुड़गांव सेक्टर -7

सुख-दुख (सुमित्रानंदन पंत)

‘मैं नहीं चाहता चिर-सुख,

मैं नहीं चाहता चिर-दुख,

सुख दुख की खेल मिचौनी

खोले जीवन अपना मुख।’

भसीन सा. के इस मकान के ठीक सामने राजपाल क्लोथ हाउस था। अपने मकान में ही राजपाल साहब ने अपनी कपङों की दुकान खोली थी। वह किसी सरकारी विभाग में काम करते थे। दिन में उनकी पत्नी व शाम को पति- पत्नी मिल कर दुकान संभालते थे। उनके तीन बेटे थे, बङा बेटा बारहवीं में पढ़ रहा था, उसका मन पढ़ाई में नहीं था। उसी के भविष्य को ध्यान में रख कर, यह दुकान खोली गई थी। दुकान में भीङ होने पर तीनों बेटे भी काम संभालते थे।काॅलोनी में व घर पर ही दुकान होने के कारण आस-पड़ोस में सबको लाभ था।अतः देर रात तक ग्राहक आते थे।

शुरू-शुरू में मैंने उस परिवार को देखा तो बङा अज़ीब लगता था, क्योंकि किसी भी बेटे की सूरत अपनी माँ से नहीं मिलती थी। वह उस परिवार से भिन्न दिखती थीं ।उनकी भाषा में न पंजाबी लहज़ा था न स्पष्ट हिंदी थी । यही समझ आया कि अंर्तजातिय विवाह है।

शीघ्र ही पता लगा कि वह बच्चों की दूसरी माँ है। कुछ वर्ष पहले बच्चों की माँ की मृत्यु
हो गई थी। गृहस्थी व बच्चों की देखभाल के लिए राजपाल साहब ने दूसरी शादी कर ली थी। बङा बेटा तो उन्हें माँ मानने को तैयार नहीं था। पर माँ तन-मन से बच्चों व घर की देखभाल करती थी।

मुझे उस परिवार का बहुत सहारा था।छः साल के मीशु को सिर पर चोट लगी थी।खून बह रहा था।वह स्कूल का समय था, मेरे स्कूल में भी बच्चें पढ़ रहे थे।सेशन का आरंभ था, अतः सिर्फ आठ बच्चे थे। उस दिन आया नहीं आई थी। टी.वी. चलाकर, बच्चों को टी. वी. के सामने बिठाया और श्रीमती राजपाल से संभालने के लिए प्रार्थना करी थी।फिर उन पर स्कूल के बच्चे व घर छोङ ,मैं मीशु को डाक्टर के पास ले गई थी। मीशु के सिर पर टाँके आए थे, मैं लगभग एक घंटे बाद लौटी थी।अपने स्कूल के बच्चों व घर की बहुत चिंता हो रही थी।पर श्रीमती राजपाल ने सब संभाला था।

एक दिन स्कूल की एक नन्हीं छात्रा मलाईका झूले से गिर गई थी, उसके भी सिर पर चोट लगी थी, खून बह रहा था। तब मेरे स्कूल में 25 छात्र थे।मेरी सहायता के लिए एक आया व एक अध्यापिका थी।उनकी सहायता से मलाईका को प्राथमिक चिकित्सा दी थी। श्री मति राजपाल ने तुरंत अपने बङे बेटे को मेरे पास भेज दिया था। उसके स्कूटर पर मैं मलाईका को उसके घर छोङने गई थी। उनका बेटा मलाईका को डाॅक्टर के पास ले जाने के लिए भी तैयार था।

एस.के. का स्थानांतरण चंडीगढ़ हो गया था, इस बार हम चंडीगढ़ नहीं गए, वह अकेले ही गए थे।तब मुझे राजपाल परिवार का बहुत सहारा था।उस परिवार ने मुझे बहुत सम्मान दिया था। बाद में भी श्रीमती राजपाल कहीं मिलती थी, तब बहुत प्रेम व मान देती थीं।
अब कई वर्ष बीत गए हैं, तीनों बेटों ने अपने पिता से मेहनत करना सीखा है, तीनों के अपने पृथक पृथक काम हैं । तीनों बेटों के विवाह के बाद, राजपाल साहब का भी स्वर्गवास हो गया है। माँ अपने सबसे छोटे बेटे के पास रहती है।

हमारे मकान मालिक भसीन साहब अक्सर आते और देख जाते कि मेरा काम कैसा चल रहा है। हमसे पहले उन्होंने अपना यह मकान किसी को किराए पर नहीं दिया था। पर हमारी प्रार्थना पर भसीन साहब ने अपने बङे भाई की अनुमति लेकर, हमें यह मकान किराए पर दिया था।

भसीन साहब की पत्नी की इच्छा, मकान किराए पर देने की नहीं थी।हर वर्ष भसीन साहब हमारा किराया बढ़ा देते थे, मेरा काम अच्छा चल रहा था, अतः मैं यह मकान खाली करना नहीं चाहती थी, चुनांचे वह जितना चाहते थे, हम उतना किराया बढ़ा देते थे।

भसीन साहब के अपनी कोई संतान नहीं थी। भसीन साहब पाँच भाई थे, सभी भाईयों में आपस में बहुत प्रेम व एकता थी। इस सेक्टर में इस खानदान का बहुत सम्मान था, सभी भाई प्रतिष्ठित पदों पर आसीन थे, सभी भाई एक ही मकान में रहते थे, परंतु जब भाईयों के बच्चे बङे होने लगे तब मकान छोटा पङने लगा था।

इन भाईयों की एक छोटी बहन भी थी, जिसे बचपन से हड्डियों की बिमारी थी, जिस कारण अविवाहित थी। फिर उनकी माँ का स्वर्गवास हो गया था, कुछ समय बाद बहन की भी मृत्यु हो गई थी। तब भाईयों ने अलग -अलग होने का फैसला लिया था।

भसीन साहब की कुछ वर्ष पहले एक गंभीर सङक दुर्घटना हुई थी, उनकी कुछ समय के लिए याददाश्त चली गई थी। अब पुर्णतः स्वस्थ थे, पैर में थोङी लचक रह गई थी।
जब भाई अलग होने लगे, तब फैसला लिया गया कि भसीन साहब के साथ उनका सबसे छोटा भाई रहेगा।

अब भसीन साहब ने अपने छोटे भाई के लिए इस मकान के ऊपर एक मंजिल बनानी शुरू की थी और हमें भी मकान खाली करने का नोटिस दिया गया था। यूं इस खानदान से हमारे अच्छे संबंध बन गए थे। उनकी मंजिल पूरी होते ही हम शिफ्ट हो गए थे।
बाद में श्रीमति भसीन ने उस कमरे में अपना क्रेच खोला था।

रास्ते बदल रहे थे,

मंजिल की तलाश में,

राहगीर भटकते रहे,

कारवाँ चलता रहा,

मुसाफिर बदलते रहे।

(नए मकान नए परिवेश) (भाग-अष्टदश) (दसवां मकान) गुड़गांव सेक्टर -7

कविता (बंधन-मैथिलीशरण गुप्त)

सखे,मेरे बंधन मत खोल,

आप बंधा हुँ, आप खुलूँ मैं,

तू न बीच में बोल।

जूझूंगा जीवन अनंत है,

साक्षी बन कर देख,

और खींचता जा तु मेरे,

जन्म- कर्म की रेख।

सिद्धि का है साधन ही मोल,

सखे मेरे बंधन मत खोल।

मिसेज बाली के मकान के सामने मीनु रहती थी। मीनु हंसमुख, खुशदिल लड़की थी। आठवीं कक्षा में पढ़ती थी।उसकी माँ ने कहा कि मैं उसे गणित पढ़ा दूं।मुझे ट्यूशन का कार्य आरंभ करना था, पर आठवीं कक्षा का गणित, हरियाणा बोर्ड की पढ़ाई, कुछ संकोच था, फिर सोचा पढ़ाने से पहले, स्वयं भी पढ़ लूंगी। उन्हें भी अपनी द्वविधा स्पष्ट कर दी थी।पर उन्होंने मुझ पर विश्वास प्रकट किया, कैसे? पता नहीं।

मीनु पढ़ाई में होशियार थी, अपना कक्षा कार्य पूर्ण करती थी। उसकी अध्यापिका कक्षा में पाठ जल्दी- जल्दी खत्म कर देती थी, जिस कारण छात्राओं को गणित के पाठ समझने में कठिनाई होती थी। उसने मेरे पास पढ़ने आना शुरू किया और मेरा ट्यूशन कार्य आरंभ हुआ था। हमने मिलकर गणित की समस्याओं को सुलझाना शुरू किया था।

मीनु की दो बङी बहनें व एक बङा भाई था। उसका बङा भाई उससे एक वर्ष बङा था । वह हमेशा अपने भाई की प्रशंसा करती थी। स्वभावतः लङकियाँ बातुनी होती हैं, मेरी छात्राएँ अपने मन का हाल मुझे नि:संकोच कह देती थीं । मीनु भी बहुत उत्साही लङकी थी, अपनी हर बात व महत्वकांक्षा व्यक्त करती थी।

उसकी माँ व बहनों का बहुत अच्छा स्वभाव था। पिता किसी सरकारी विभाग में कार्य करते थे। वेतन परिवार के खर्चों के अनुसार कम था और मीनु अपनी पारिवारिक आर्थिक स्थिति के प्रति संवेदनशील थी। फिर भी परिवार में खुशनुमा रौनक थी।

इस नई जगह में इस परिवार का मुझे बहुत सहारा था।जब हमने यह मकान छोङा था,तब भी अक्सर मीनु मेरे पास आती थी। कुछ वर्षों बाद मुझे पता चला कि मीनु के भाई की एक सङक दुर्घटना में मृत्यु हो गई थी। कुछ समय से मीनु से भी मुलाकात नहीं हुई थी। पर वह मुझे सपने में दिख रही थी, मुझे उसकी याद आ रही थी, सोचा वह इस समय बहुत दुखी है। मैं शोक प्रकट करने उनके घर गई थी।

घर पर नीरव सन्नाटा था, जबकि माता-पिता व दोनों बङी बहने थी, मुझ से बात भी कर रहे थे।उनका दु:ख गहन था। मैंने मीनु के लिए पुछा,” वह मुझ से मिलने क्यों नहीं आई?” वे हैरानी से बोले,” आपको कैसे नहीं पता, एक वर्ष पुर्व उसकी भी असामयिक मृत्यु हो चुकी है व उसके पंद्रह दिन बाद उसकी दादी का भी स्वर्गवास हो गया था।”
वह नीरव सन्नाटा दो जवान व एक उम्र दराज मौतों का था। दुःख गहन ही नहीं था उसमें जीवन के प्रति स्तब्धता भी थी।

उसके बाद मीनु सपने में नज़र नहीं आई। मैं समझ नहीं पाई कि मैं कहाँ व्यस्त थी कि उसका जाना जान नहीं पाई थी। मीनु आज भी मुझे बहुत याद आती है।

हमें श्री भसीन का दो कमरों का 100 गज में बना मकान मिल गया था।स्वतंत्र मकान था व भसीन साहब को उनके मकान में मेरा अपना काम करने से कोई परेशानी नहीं थी।

हम उन्हीं दो कमरों में से एक कमरे को स्कूल व ड्राइंगरूम की तरह उपयोग में लाते थे।आगे-पीछे खुले आंगन व बेङे थे। इस मकान के पीछे आंगन में भी गेट था, यह उस गली का कोने का मकान था।दो तरफ गेट से लाभ था, तो नुक्सान भी था। लाभ था कि स्कूल के बच्चे व मेहमान आगे के गेट से आते थे और हमारे बच्चे पीछे के गेट से आते थे।
पर मेरे बच्चे अक्सर स्कूल से आते हुए या वहाँ खेलते हुए पीछे का गेट बंद करना भूल जाते थे, जिस कारण बेटे की नई साईकिल चोरी हो गई थी।

पीछे के बेङे से ही सीढ़ियाँ छत पर जाती थी। छत पर सर्दियों में धूप का व गर्मियों में सांझ की ठंडक का आनंद मिलता था। बिजली न होने पर छत पर ही सो जाते थे।

इस मकान में लगभग 4 साल रहे थे और इन चार सालों में मेरा नन्हा विद्यालय बढ़ने लगा था। मैं बहुत व्यस्त रहती थी।यह हमारा यादगार मकान बना था।

भसीन साहब के इस मकान के साथ का मकान श्रीमती गांधी का था। श्रीमती गांधी गुजराती नहीं थी, महात्मा गांधी को ही हम जानते हैं तो सभी गांधी को हम गुजराती समझ लेते हैं । श्रीमती गांधी हरियाणवी सिंधी ही थी, चूंकि दिल्ली में ही पली बढ़ी थी तो भाषा हरियाणवी कम थी। यह बात इंगित करने की है कि हिंदूस्तान में अलग -अलग प्रांतों में व जातियों में कुछ उपनाम या कुलनाम एक समान पाए जाते हैं।

श्री मति गांधी जितनी खुशमिजाज थी उनके पति उतने ही खुश्क स्वभाव के व्यक्ति थे।कभी उनके चेहरे पर मुस्कान नहीं देखी थी।

पति-पत्नी दोनों सरकारी नौकरी करते थे। श्रीमती गांधी दिल्ली यूनिवर्सिटी की पढ़ी हुई थी और दिल्ली के ही किसी सरकारी विभाग में काम करती थी। उनके पति गुड़गांव में ही किसी सरकारी विभाग में थे।

मिसेज गांधी का यह नया मकान था, दो वर्ष पहले ही इस मकान में आए थे। इस मकान में आते ही उनके बचपन की पैर की चोट उभर आई थी। तकलीफ इतनी बढ़ी थी कि उनके दो ऑपरेशन भी हो गए थे। फिर भी नौकरी नहीं छोड़ी थी। कष्ट तो आते-जाते हैं, हिम्मत और हौसले छोङे नहीं जाते हैं ।

मैंने एक बार कहा,”आपके अपने मकान में आते ही तकलीफें शुरू हुई हैं।”
उन्होंने तुरंत मुझे रोक दिया और बोली, ” मेरी तकलीफों के लिए मेरे मकान को दोष न दें । अपने मकान में आना तो लाभप्रद रहा था, पहले किराए के मकान में रहते थे तो हज़ार दिक्कतें थीं ।यह कष्ट तो आना ही था, पर अपने मकान में आया तो सुविधाजनक रूप से इस कष्ट को संभाल पा रही हुँ।”

यह सकारात्मक सोच बहुत कम लोगो की होती है। वह हमेशा खुश रहती थी।
वह निःसंतान थीं । एक मकान छोङकर उनके देवर रहते थे। उनके बच्चों के साथ ही वह अपना मन लगाती थीं ।

अपने मकान को बच्चे की तरह संभालती थीं। ऑफिस से लौटते ही सबसे पहले झाङू उठाकर बाहर बेङे को साफ करती थीं । शनिवार को मशीन लगती, सुबह-सुबह उनके कपङे धुलने शुरू हो जाते थे। कामकाजी स्त्रियाँ कामवाली बाई नहीं लगाती हैं कि इन बाईयों के चक्कर में काम नहीं होते हैं ।

कुछ भुला हुआ जब आया याद, मन हुआ कितना उदास,
कुछ क्षण खुशी के थे,
संजो के रखे थे, मन में,
गुज़रे ज़माने की खुशी,
क्यों करती मन उदास,
यह जीवन एक नदी है,
यह तो बहती जाएगी,
अपने साथ सुख- दुख बहाती जाएगी,
तु भी निर्बाध गति से तैर,
मंजिल को है अभी देर।

(नए मकान नए परिवेश) भाग – सप्तदश, (नवां मकान)(गुड़गांव)

चाँद और कवि (रामधारी सिंह दिनकर)

‘रात यों कहने लगा मुझसे गगन का चाँद,
आदमी भी क्या अनोखा जीव होता है ,
उलझनें अपनी बनाकर आप ही फँसता,
और फिर बैचेन हो जगता, न सोता है।’

एस. के. का स्थानांतरण दिल्ली हो गया था, अतः हम आगरा से निकले। एस. के. को दिल्ली का वायुदूषित वातावरण व कोलाहल पसंद नहीं था। अतः हमने गुड़गांव को ही अपना रिहायशी स्थल चुना था। आज भी हम गुड़गांव में ही रह रहे हैं।

इन सात सालों में गुड़गांव और भी विकसित हो गया था। सेक्टर-7 के 250गज की एक कोठी में हमें दो कमरे किराए पर मिले थे। अब मैं मकान मालिक के साथ नहीं रहना चाहती थी। चूंकि मकान मालकिन श्रीमति बाली को परिवार सहित अमेरिका जाना था, अतः हमें तसल्ली थी कि कुछ दिन में हम इस मकान में अकेले रहेंगे।

श्रीमती बाली के चार बेटियाँ थी, सबसे बङी बेटी फिजियोथेरेपिस्ट थी, अब अमेरिका में ही काम कर रही थी।उसी ने सबको अपने पास बुलाया था।पहले श्री बाली वहाँ गए थे। वे सब टूरिस्ट वीज़ा पर वहाँ गए, फिर धीरे-धीरे सब वहीं बस गए थे। यहाँ भी माँ अपनी बेटियों के भविष्य के लिए अधिक चिंतित थी और बेटियाँ विदेशी जीवन के सपने देख रहीं थी।
इस मकान का महत्व मेरे लिए इसलिए आवश्यक है कि मैं अब दृढ़निश्चयी थी कि अब अपने जीवन को एक नया अर्थ व मोङ दूंगी।

गुड़गांव आने के कुछ समय बाद मैंने पहले एक प्री-नर्सरी स्कूल में काम किया, फिर एक मिडिल स्कूल में पढ़ाया था उसके बाद अपना एक प्री नर्सरी स्कूल खोलने का साहस किया था।

मैथिलीशरण गुप्त की कविता मन में घूमा करती थी।-

‘नर हो, न निराश करो मन को,

संभलो कि सुयोग न जाए चला,

कब व्यर्थ हुआ सदुपाय भला,

समझो जग को न निरा सपना,

पथ आप प्रशस्त करो अपना,

अखिलेश्वर है अवलम्बन को।’

नर हो, न निराश करो मन को।

मैंने देखा, इन महिलाओं द्वारा इन पंक्तियों को सार्थक करते हुए, जिन्होंने अपने परिश्रम से अपने काम को एक ऊँचाई तक पहुँचाया था। ये सब मेरी प्रेरणा स्रोत बनी थी।

मैंने जिस प्री-नर्सरी स्कूल में काम किया था, उसे दो क्रिश्चियन बहनें चला रही थी। छोटी बहन के मकान के एक कमरे में स्कूल चल रहा था। छोटी बहन किसी सरकारी स्कूल में अध्यापिका थी, अतः पढ़ाने का कार्य बङी बहन ही देखती थी।स्कूल शुरू किए अभी दो वर्ष ही हुए थे, दोनों बहनें बहुत मेहनत कर रहीं थीं । मैंने उन दोनों से शिक्षण पद्धति व स्कूल प्रशासन संबधी तथ्यों को बहुत गहराई से समझा था।

बाद में मैंने उस स्कल मेें अध्यापन कार्य किया, जिसमें मीशु पढ़ रहा था । यह स्कूल आठवीं कक्षा तक था । मिसेज कटारिया ही स्कूल की प्रधानाध्यापिका व प्रशासिका थीं ।
वह गुड़गांव गांव की रहने वाली थीं और गांव में उनका परिवार एक सम्मानित परिवार था। अतः स्कूल में बच्चे उसी गाँव से आते थे। मिसेज कटारिया बहुत मेहनत व लगन से काम कर रही थीं । उनकी कार्य पद्धति भी मेरे लिए प्रेरणादायी बनी थी।

मैने बाद में नौकरी छोङ अपना प्री- नर्सरी स्कूल खोला था। स्कूल मिसेज बाली के मकान में ही खोला था । अपने दो कमरों में से एक कमरा, मैंने अपने शिक्षण कार्य के लिए व्यवस्थित किया था।

स्कूल खोलने के लगभग एक वर्ष बाद मिसेज बाली आईं थी। उन्हें बहम हुआ था कि हम उनके मकान में स्कूल खोल कर उनके मकान में कब्जा करना चाहते हैं। अतः हमें वह मकान छोङने का नोटिस मिल गया था।

मिसेज बाली के मकान के साथ वाले मकान में डब्बू रहती थी।उसका वास्तविक नाम क्या था? किसी को पता नहीं था। चूंकि सब आसपास उसे डब्बू कहते थे। बच्चों की वह डब्बू दीदी थी । आयु में लगभग मेरे ही बराबर थी। वह अविवाहित थी। सरकारी स्कूल में नवीं-दसवीं कक्षा की साइंस व गणित की अध्यापिका थी। बाद में वह प्रिंसिपल बन गई थी। अब तो सुना है कि शिक्षा विभाग में डाइरेक्टर के पद पर आसीन है।

घर में भी बच्चो को कोचिंग देती थी।सुबह पाँच बजे से उसकी कोचिंग शुरू हो जाती थी और रात ग्यारह बजे तक चलती थी । बीच में स्कूल जाती थी, अपने शिक्षण कार्य को बहुत मेहनत व रूचि से अंजाम देती थी।

रहन-सहन, बोल-चाल सब में क्रेनबेदी अथार्त किरण बेदी (आई. पी. एस. आॅफिसर) लगती थी। एक आँख मेें मामूली सी कमी थी, जिसका बाद मेें ऑपरेशन करा लिया था।

पिता की मृत्यु के बाद डब्बु ने ही घर संभाला था।अपनी बङी बहन व छोटी बहन की शादी उसी ने करा दी थी। एक छोटा भाई था जिसका भविष्य डब्बू ने ही संवारा था। वह विवाह के बाद अलग हो गया था।कभी-कभी मिलने आता था।

एक बूढ़ी माँ और डब्बू ही इस मकान में रहते थे। मकान का पीछे का भाग किराए पर उठाया था। ऊपर छत पर कोचिंग के लिए कमरे बने थे।
माँ की इच्छा थी कि किसी प्रकार डब्बू का घर भी बस जाए। पर माँ की इच्छा पूर्ण नहीं हुई थी।

डब्बू का जीवन अध्यापन कार्य के लिए समर्पित था। वह किसी भी काम के लिए दूसरों पर निर्भर नहीं थी।कोचिंग में बहुत कम फीस लेती थी, सबके मन में उसके लिए बहुत आदर था।सेतु मिंटू भी उससे पढ़े थे।

जब तक हम उस मकान में रहे थे, मेरी उसकी माँ से बहुत बातें होती थी। डब्बू से बात करने के अवसर कम ही मिलते थे, पर उसके मन में घरेलु महिलाओं के लिए कोई सम्मान नहीं था।

एक बार जब मैंने डब्बू से कहा, “आप तो बहुत व्यस्त रहती हो।” तो उसने मेरी प्रशंसा को सही अर्थों में न लेकर, तपाक से जवाब दिया था, “तो क्या करूं ? आप लोगों की तरह इधर उधर की बुराईयाँ करूँ।” ( तब मैं घर पर ही रहती थी, अपना शिक्षण कार्य शुरू नहीं किया था।)

इस तरह के व्यक्तित्व की महिला से इससे अच्छे जवाब की उम्मीद करना बेवकूफी थी। ऐसी आचार- विचार की महिलाओं को समाज से इतनी टीका-टिप्पणी मिलती है कि वह सामान्य टिप्पणी से भी उद्धेलित हो जाती हैं।

मैं तो उससे प्रभावित ही थी कि किस प्रकार अकेले ही वह इस समाज का सामना करती है। अपने अध्यापन कार्य के लिए उसकी प्रतिबद्धता प्रशंसनीय है। बाद में बच्चों की पढ़ाई के लिए मैं उसके पास जाती थी, तब वह बहुत प्यार व इज्जत से बात करती थी।

राह में सहयात्री बहुत मिले,

उनसे मिली अब सीखों को,

एक नई दिशा हमने देनी है,

यहीं से तो आरंभ होनी है,

सीखने सिखाने की कोशिश।

(नए मकान नए परिवेश) भाग – षष्ठदश, (आठवां मकान , आगरा।)

आदमी मुसाफिर है, आता है, जाता है।
आते-जाते रस्ते में यादें छोङ जाता है,
क्या साथ लाए, क्या तोङ आए,
रस्ते में हम क्या क्या छोङ आए,
मंजिल पे जाके याद आता है।

अब हम विभवनगर पहुंच गए थे। अभी तक मकान मालिकों के साथ रहने का अनुभव बहुत सुखद नहीं रहा था।
परंतु विभवनगर के इस मकान में हमारा सबसे सुखद अनुभव था। मकान मालिक के व्यवहार में बहुत अपनापन था।यहाँ दो साल बहुत शांति से बीते थे।गुड़गांव में भी मकान मालिक किराएदारों को अधिक सुविधा देते थे और अब अग्रवाल परिवार के साथ रहकर लगा कि आगरा में भी किराएदारों को भिन्न नहीं समझा जाता है।
यह दो मंजिला मकान था। नीचे की मंजिल में मकान मालिक रहते थे। ऊपर हमारे दो कमरे थे, दोनों कमरे बङे थे। दोनों कमरों के बीच में किचन थी।किचन भी बङी थी।
वास्तव में यह एक छोटा कमरा या बङा स्टोर था। हमारे लिए एक स्लेब और सिंक लगा कर उसे किचन बना दिया था। उसी में हमने अपना फ्रिज रखा था।घर बहुत साफ था, उसे सजाने संवारना अच्छा लगता था।कमरों में अलमारियों थी।ऊपर पहुँचते ही पहले छत थी व छत के एक तरफ ड्राइंग रूम, फिर किचन व उसके साथ बैडरूम था। तीनों एक- दूसरे के साथ जुङे थे। एक कमरे में प्रवेश करके, अंदर ही अंदर किचन व दूसरे कमरे में जा सकते थे।
तीनों के दूसरे दरवाजे बाहर छत पर खुलते थे, बैडरूम के दूसरा दरवाजे के खुलने पर जाल था, जिससे नीचे रहने वालों को रोशनी मिल सके। जाल के ठीक नीचे उनका आंगन था।इसी जाल से हम आशा भाभी (श्रीमती अग्रवाल से बातें करते थे।) ऊपर जाल के एक तरफ शौचालय था, दूसरी तरफ स्नानघर था।

अग्रवाल परिवार खानदानी बिजनेसमैन थे। उनकी आगरा के सदर बाजार में दो दुकानें थी। तभी एक अन्य दुकान विभवनगर के पास शहीद नगर में अपने बेटे के लिए खुलवा दी थी। गर्मियों में गुलाब का शरबत नीचे आंगन में ही बनता था व दुकानों पर बिकता था।
पुरानी परंपरा के अनुसार बङे भाई यानि अग्रवाल साहब ने अपने परिवार के व्यापार को संभाला था।
उनका छोटा भाई भी हमारे घर के ठीक सामने रहता था। छोटा भाई बङे भाई का बहुत सम्मान करता था। बिजनैस साझा था तो दोनों परिवारों का खर्चा बङे भाई ही देखते थे।

दोनों भाईयों में जितना प्रेम था, उतना ही जिठानी देवरानी एक- दूसरे से दूर भागती थीं आशा भाभी अपनी देवरानी पूष्पा भाभी को नीचा दिखाने का कोई मौका नहीं छोङती थीं पुष्पा भाभी भी अपनी जिठानी से दूर रहना पसंद करती थीं।
यूं सभी त्योहार-पूजा एक साथ होता था। पता नहीं, आशा भाभी को पुष्पा भाभी से क्या परेशानी थी? वह पुष्पा भाभी के हर काम में नुक्ताचीनी निकालती थीं ।उनके अनुसार उनकी देवरानी को घर-बच्चे संभालने नहीं आते थे।

पुष्पा भाभी इससे बहुत परेशान रहती थीं। पति घर की राजनीति में पङना नहीं चाहते थे। सुबह जल्दी जाकर रात देर से घर आते थे।
दोनों भाइयों की आयु में बहुत अंतर था। पुष्पा भाभी के बच्चे छोटे थे। तीन बेटियाँ और एक बेटा। तीनों बेटी स्कूल में पढ़ रही थी। बेटा बहुत छोटा था, मीशु की आयु का था।मीशु और उसने एक साथ एक छोटे स्कूल में जाना शुरू किया था।
आशा भाभी के दो बेटे और एक बेटी थी। बेटी की शादी हो गई थी, उसके भी एक बेटी थी। बङा बेटा पूना में इंजीनियरिंग पढ़ रहा था। छोटा बेटा भी काॅलेज में था, उसके पैर में पोलियो के कारण लचक थी। उसी के लिए उन्होंने शहीद नगर में एक दुकान खोली थी।
इस नई दुकान के लिए पूरा घर-खानदान मेहनत करता था। आशा भाभी भी जाकर बैठती थी।

आशा भाभी की मेहनत व अक्ल से मैं लाजवाब थी।घर में एक कामवाली रखी थी, परंतु वह स्वयं घर में हर तरह के स्वादिष्ट पकवान बनाती थीं । सर्दियों में तो प्रतिदिन भिन्न-भिन्न स्वादिष्ट पकवान बनते थे।
मुझ से कहती कि कैसे सरदी मनाती हो? जो बाजरा व मक्का के पकवान बनाना नहीं जानती हो। हर त्योहार पर उनके घर से आने वाली खुशबू से मन सुगंधित हो जाता था, फिर जब प्लेट लग कर हमारे पास आती तो हम उनके कायल हो जाते थे।

इसके अतिरिक्त वह घर से सिलाई का छुटपुट काम भी पति से छूपकर करती थी या पति अनदेखा करते थे।
वह कहती थीं, ” अरे ये मर्द लोग तो हिसाब से पैसे देते हैं, मैं अपना काम करती हुं तो मेरा हाथ खुला रहता है। बेटी-दामाद व नवासी के लिए, कुछ करने का मन होता है, तो कर पाती हुँ।

फिर नई दुकान खुली है, नए काम को जमने में कम से कम एक वर्ष तो लगता है और मेहनत व किस्मत मिलाकर दो वर्ष और लग जाते हैं ।कम से कम 2-3 वर्ष का धैर्य रखना पङता है, नए काम का अच्छा रिजल्ट मिलने में……।”
उनकी इस बात को मैंने गांठ में बाँधा था।
आशा भाभी जितना अच्छा खाना बनाती थी, उतना अच्छा बोलती भी थी व जो बोलती वो खरा होता था।वह सबकी मदद करती थी, हर मौके पर वह सबके साथ मौजूद रहती थी, पूरी गली में उनका सम्मान था।

वह आयु में मुझ से बङी थी इसीलिए तो मेरे मन में उनके लिए सम्मान था ही पर उनके स्वभाव और व्यवहार ने मेरे मन पर अमिट छाप छोङी थी।
उन्होंने संयुक्त परिवार का हर सूख दुख झेला था। घर की बङी बहु के सभी दायित्व खुशी-खुशी निभाए थे। कभी-कभी वह मेरे पास आकर बैठती थी या जबरदस्ती मुझे अपने पास बुला लेती थी, हम सीढ़ियों पर बैठ जाते थै।वह सबसे नीचे सीढ़ी पर मैं सबसे ऊपर सीढ़ी बैठते थे। वह अपने जीवन संघर्ष की कहानी सुनाती, जिन पर कभी वह हँसती और कभी मन खराब होने पर उन यादों पर कङवी भी हो जाती थी।

मुझे बातो-बातों में घर चलाने की शिक्षा भी देती थी। बच्चों की परवरिश पर भी उनकी छोटी-छोटी सीख बहुत याद आती है। उन्होंने समझाया,” माँ की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण होती है, जहाँ कभी पिता पीछे हो तब माँ को अपने बच्चों के लिए खङा होना पङता है। उन्हें दुनिया को समझने के लिए, संघर्ष क्षेत्र में कूदने के लिए, माँ का ही विश्वास और हौसला मिलना चाहिए ।

जब मेरे करंट लगा, मेरे लिए काम करना कठिन था।बिना कहे वह मेरी तकलीफ समझ गई थीं, बोली,” धीरज रखो, हिम्मत मत हारना, यह समय निकल जाएगा।” उनके इस वाक्यांश ने मेरा आत्मविश्वास बढ़ाया था।

आशा भाभी जितनी मीठी सबके साथ थी, न जाने क्यों उतनी ही कङवी वह अपनी देवरानी पुष्पा के साथ थी। दोनों भाइयों का रिश्ता राम-भरत के समान था तो जिठानी – देवरानी का रिश्ता कुनैन की गोली था।
पुष्पा भाभी यूं तो अपनी जिठानी की बुराई नही करती थी पर उनकी नुक्ताचीनी से परेशान थी।
वह कहती, “मैं अपनी जिठानी जैसी होशियार नहीं हुँ,पर अपने घर के काम मैं ही करती हुँ। उनके देवर तो सुबह-सवेरे जाकर रात देर घर लौटते हैं । घर-बाहर मैं ही संभालती हुँ।”
न जाने क्यों आशा भाभी को अपनी देवरानी की कमियों को दुनिया में बखान करने की आवश्यकता थी। आशा भाभी के गुण तो सर्वसिद्ध थे। उन दोनों के बीच किसी प्रतिस्पर्धा का अर्थ नहीं था।
मेरे साथ तो पुष्पा भाभी का व्यवहार भी बहुत अच्छा था, आशा भाभी को कोई परेशानी नहीं थी , यदि मैं पुष्पा भाभी के पास चली जाती या पुष्पा भाभी मेरे पास आ जाती थीं। आशा भाभी आत्मविश्वासी व अनुभवी महिला थीं, वह मेरे स्वभाव की निष्पक्षता और तटस्थता को समझती थीं। अतः उन्हें मुझ से कोई खतरा नहीं था।

पुष्पा भाभी के तीन बेटियाँ थी। सबसे छोटी तो अक्सर सेतु और मिंटू के साथ खेलती थी। एक बेटा था, जो मीशु के बराबर था।
बेटे का नाम सारांश था, पूरे परिवार का लाडला था, अपने ताई-ताऊ के आँखों का तारा था। वे सब ही जब सारांश के लिए कोई चीज़ लेते तो मीशु के लिए भी लेते थे।
दोनों परिवार के बच्चों में आपस में बहुत प्यार था। आशा भाभी अपने देवर के बच्चों को व पुष्पा भाभी अपनी जिठानी के बच्चों पर अपना स्नेह अर्पण करतीं थी । सिर्फ द्वेष जिठानी-देवरानी के बीच ही था।यह कोई नई बात नहीं थी, इतिहास के पन्नों पर जिठानी – देवरानी के ऐसे रिश्तों के किस्से लिखे मिल जाएंगे ।
धीरे-धीरे मुझे पता लगा कि सारांश पुष्पा भाभी का अपना बेटा नहीं है, सारांश को गोद लिया गया था।शायद इसी कारण ताई-ताऊ सारांश पर अधिक ही लाड दिखाते थे। दुनिया-समाज को यह दिखाना आवश्यक था कि गोद लिए बच्चों को अपने बच्चों से कम नहीं समझना चाहिए ।
पर कभी-कभी जेठ- जिठानी के स्वाभाविक वाक्यांश भी पुष्पा भाभी को तीर की तरह चुभ जाते थे।जैसे-” सारांश, तु हमारे पास रह, तेरी माँ तुझे मारेगी, वह तुझे प्यार नहीं करती है।”
मैं हैरान थी कि तीन बेटियाँ थी, फिर एक बेटा क्यों गोद लिया है? क्या बेटे की लालसा इतनी बङी होती है या फिर कोई और बात?
एक दिन मौका मिला, तो पुष्पा भाभी ने अपना दर्द-ए-हाल बयां कर दिया था। उन्होंने जो बताया, उसके अनुसार उन्होंने तीन बेटियों के बाद चौथे बच्चे के लिए मना कर दिया था। उन्होंने कहा,” बेटे की लालसा में चौथा बच्चा! मेरे में तकलीफ़ उठाने की हिम्मत नहीं थी।”

जब उनकी छोटी बेटी 6 वर्ष की थी, तब अपने छोटे भाई का वंश और नाम चले, इसके लिए अग्रवाल साहब ने कोशिश कर एक नवजात शिशु (लङका) लाकर, पुष्पा भाभी की गोद में डाल दिया था पुष्पा भाभी की इच्छा के विरुद्ध हुई इस घटना ने पुष्पा भाभी को क्षुब्ध कर दिया था। उनके लिए तो बेटियाँ ही बेटे समान थी।

उन्होंने स्वीकार किया कि आरंभ में तो उन्हें बहुत गुस्सा था, परंतु बेटियों ने अपने इस छोटे भाई को खुशी-खुशी अपनाया था, बङी बेटी जो अपने भाई से 13-14वर्ष बङी थी, अपने भाई का बहुत ध्यान रखती थी। उस समय शायद ही बेटियाँ अपनी माँ के तर्क व व्यवहार को समझ सकती थी।
धीरे-धीरे उन्होंने इस बच्चे को अपना लिया था। इस समाज में एक स्त्री को अपनी खुशी से माँ बनने का अधिकार भी नहीं होता है। कानून एक औरत को गर्भ धारण करने, न करने का हक देता है, पर कानून को समाज कब समझता है? औरत की बेबसी और ममता पर यह घटना कुठाराघात थी।

पता नहीं कब और किसने शुरू किया कि वंश बेटे से चलता है।जवाहर लाल नेहरू का नाम इंदिरा गाँधी से ही चला है, उनके वंशज नेहरू परिवार ही माने जाते हैं।
फिर वंशवाद , जातिवाद इत्यादि मनुष्य की मानसिकता को संक्रीण बना रहें है।
पुष्पा भाभी को समझ आ गया था कि यह दूसरे का बच्चा है, उसका लाड-प्यार और ध्यान नहीं करेंगी तो, अवश्य दुनिया उसे उनसे पराया कर देगी।

हमारे दाएं व बाएं तरफ गुप्ता परिवार ही थे।दोनों परिवार परस्पर रिश्तेदार थे।दाएं तरफ गुप्ता जी दो भाई थे। बङे भाई ऊपर के भाग में रहते थे, छोटे भाई नीचे रहते थे।उनके बङी उम्रदराज माता-पिता भी थे। दोनों भाई अपने माता-पिता का बहुत ध्यान रखते थे, सास के बहुत नखरे थे, इसीलिए एक समय का खाना बङी बहु बना कर खिलाती थी, दूसरे समय का छोटी बहु बनाती थी।सास का अपने बेटे-बहुओं पर बहुत रौब था।पोते – पोती बङे थे। बङे भाई के बच्चों की तो शादी भी हो गई थी और छोटे भाई के बच्चे भी शादी योग्य थे।

यूं तो दोनों बहुएं सास की बुराई तो न करतीं परउनके किस्से हँस कर सुनाती थी। जो समय गुज़र गया, उसमें कष्ट भी था, तो भी क्या? अब तो बीत गया तो उसे हँस कर याद करना चाहिए।

बाएं तरफ के पङोसी गुप्ता जी, इन्हीं बुजुर्ग सास के छोटे भाई थे।अतः वह अपना रौब अपने भाई और उसके परिवार पर भी रखती थीं ।

इन गुप्ता अंकल के तीन बेटे थे। दो बेटे विदेश में थे व एक बेटे की असमय मृत्यु हो गई थी। गुप्ता अंकल अपने स्वर्गवासी पुत्र के परिवार को संभाल रहे थे।स्वर्गीय पुत्र के दो बेटे थे, जो उस समय दसवीं , आठवीं में पढ़ते थे।गुप्ता अंकल की पेंशन आती थी।स्वर्गवासी पुत्र किसी प्राइवेट कंपनी में काम करता था अतः उसकी पत्नी को कोई पेंशन या नौकरी का लाभ नहीं मिला था।विदेश में रहने वाले बेटे, अपने भाई के परिवार के लिए खर्चा भेजते थे, उन्हें विश्वास था कि इन बच्चों की जिंदगी उनके चाचा-ताऊ बना देंगे। बच्चे भी विदेश जाने के सपने देख रहे थे।

विधवा बहु ने शायद समाज के लिए, अपनी विधवा माँ को अपने पास रख लिया था। बहु के कोई भाई नहीं था, पर चाचा के लङके बहुत मानते थे व माँ को खुशी-खुशी अपने पास रखना चाहते थे।लेकिन परिस्थिति देख, उन्होंने माँ को बेटी के पास छोङ दिया था।माँ को बेटी के घर कोई परेशानी न हो तो माँ को खर्चा भी देते थे। समाज की यह भी रीत है कि बेटी के घर का खाना नहीं होता है। गुप्ता अंकल अपनी बूढ़ी विधवा समधिन से कुछ लेना नहीं चाहते थे।अतः माँ बेटी को पैसा देती थी।

आशा भाभी ने बताया कि विजया (विधवा बहु) के पास भी यही पैसे होते थे। चूँकि गुप्ताजी घर का सब खर्चा संभालते थे और जरूरतों का भी ध्यान रखते थे, पर बहु के हाथों में कुछ पैसा नहीं देते थे, कभी समझते भी नहीं थे कि उसकी भी कुछ व्यक्तिगत जरूरतें या शौक हो सकते हैं ।

गुप्ता अंकल इंसान तो बहुत अच्छे थे, इस बुढ़ापे में जवान बेटे का गम और फिर उसके परिवार की जिम्मेदारी, बहुत हिम्मत के साथ उठा रहे थे। कहीं छोटी नौकरी भी करते थे।घर में किसी प्रकार की कमी नहीं होने देते थे।

परंतु मर्द कहाँ समझ पाते है कि घर में रह रही औरत को भी पैसा चाहिए। शौक तो दूर की बात जरूरत भी नही समझते है। कुछ भी कहे, पर पैसा भी आत्मविश्वास और हिम्मत देता है।

विजया भाभी बहुत सीधी महिला थी, अपने ससुर का बहुत एहसान मानती थी, पर एहसान की आवश्यकता ही क्यों पङी? गुप्ता अंकल अपनी बहु से अर्थोपार्जन के लिए कोई काम करा सकते थे।परंतु पुरानी सोच कि घर की बहु कोई काम क्यों करें ?

आशा भी विजया भाभी की परेशानी समझती थी, अतः सिलाई-बुनाई का काम जो वह स्वयं करती थी, विजया भाभी को भी गुप्ता अंकल से छिपाकर देती थीं ।

औरत को अपनी स्थिति संभालने के लिए, घर में ही लङाई लङनी पङती है।आपको अपना हक, आपके अपनों से ही लेना पङता है।
जब हम गुड़गांव शिफ्ट हुए, तब गुप्ता जी ने हमें खाने पर बुलाया था। यहाँ भी आस-पङोस में सबसे अच्छा रिश्ता बना था।आने से पहले मैं सभी परिवारों से मिलकर आई थी, लखनऊ की तरह यहाँ से भी विदाई भाव-भावभीनी थी।

फिर से गुड़गांव पहुँचने से पहले मुझे बुदकी परिवार के विषय में अवश्य लिखना चाहिए । बुदकी साहब कश्मीर एम्पोरियम के मैनेजर थे। जब उनका परिवार कश्मीर से आया, तब गलती से वह हमारे घर पहुंच गया था। तभी उनकी पत्नी का स्वभाव व अपनापन बहुत अच्छा लगा था। कश्मीर से विस्थापित पंडितों का दर्द इनसे मिलकर गहरा जाना था।

परिवार में उनके दो बेटे व एक बेटी थी। वे शहीद नगर में किराए के मकान में रहने लगे थे। शहीद नगर व विभव नगर पास-पास थे। उनकी सलाह पर ही हमने अपने बच्चों का एडमिशन विभव नगर के इस स्कूल में कराया था। उनके बच्चे भी उसी स्कूल में पढ़ते थे।
जब हमारा मन होता था, हम उनसे मिलने जाते थे। उनसे उनकी संस्कृति, परंपराओं का ज्ञान हुआ था। शिवरात्रि उनका विशेष पर्व होता था।

मिसेज बुदकी बहुत प्यार से मिलती थी, बहुत सादा रहन-सहन, दिखावटीपन बिलकुल नहीं था। बैठने के लिए जमीन पर ही गद्दे होते थे, उस पर सफेद चादरें बिछी होती थी।
हमारे बच्चों का उनके घर बहुत मन लगता था। मिंटू-मीशु का तो मिसेज बूदकी विशेष लाड करती थी। वह मुझे कश्मीर की बातें बताया करती थीं । कश्मीर छोङने का दर्द उनकी बातों से झलकता था, अपना मकान, अपनी ज़मीन छोङने का दर्द…….

हम छोङ आए उस ज़मीं को,
जो हमारा आशियाँ था।
आज इस नई ज़मी को,
हमने अपना जहां बना लिया है।
हमारे दर्द को कोई क्या समझे,
हमने तो इस दर्द को अपना बना लिया है।
आज उस विराने स्वर्ग में,
हमारे बचपन, हमारी जवानी की,
दास्ताने गूंजा करती है।
वो दिन भी आएगा,
कोई पुरातत्वविद खोद उस ज़मीं से,
पाएगा हमारे पुर्वजों की कहानियां ।

(नए मकान नए परिवेश) (भाग-पंचदश) सातवाँ मकान (आगरा)

चलो अभिष्ट मार्ग में सहर्ष खेलते हुए,
विपत्ति विप्र जो पङे उन्हें ढकेलते हुए।
घटे न हेल मेल हाँ, बढ़े न भिन्नता कभी,
अतर्क एक पंथ के सतर्क पंथ हो सभी।
तभी समर्थ भाव है कि तारता हुआ तरे,
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।
(मैथिलीशरण गुप्त)

यह नया मकान श्री पम्बु का था। उनके दो बेटियां थी। बङी बेटी रमा का विवाह जयपुर में हुआ था। छोटी बेटी उमा एम.ए. इकनॉमिक्स पढ़ रही थी। पम्बू साहब भी आर्म्स फैक्टरी में काम करते थे। यह परिवार एक आदर्श परिवार था। परिवार के सभी सदस्य अपने फर्ज धर्म समझकर निभाते थे। हमारी परिस्थिति व समस्या को समझ कर, उन्होंने हमें अपना मकान किराए पर दिया था। अतः मेरे उस कठिन समय में उन्होंने मेरा ध्यान अपना धर्म समझ कर रखा था। आज सोचती हुँ तो लगता है कि उनका कर्ज मैं उतार ही नहीं सकती थी। ईश्वर ने ही देवस्वरूप लोगों के करीब मुझे रखा था।

श्री पम्बू बुद्धिमान व मेहनती व्यक्ति थे। जितने मेहनती पम्बू साहब थे उतनी ही मेहनती उनकी पत्नी थी । वह एक धर्मनिष्ठ कर्तव्यपरायण गृहणी थीं।

परिवार के सभी सदस्य -एक-दूसरे के सुख दुख व पसंद-नापसंद का ध्यान रखते थे। रात को घर आते ही पम्बू साहब अपनी पत्नी व पुत्री से पूछते कि आज उन दोनों के पसंदीदा
सीरियल में क्या हुआ। वह स्वयं सीरियल नही देखते थे। सिर्फ यही नहीं रात को सभी मिलकर उनकी पसंद के ज्ञानवर्धक या अन्य कार्यक्रम देखते थे।

उनका भी एक दरवाजा पीछे आंगन में खुलता था, जहाँ से वह मोटर चलाने आती थी। माँ- बेटी अक्सर मेरे पास आकर गप्प लगाती थीं ।वे दोनों उनके यहाँ जितने किराएदार रह कर गए थे, उनकी पूर्ण दास्तान सुनाती थीं । कुछ तो मुझे अब भी याद है।वे भी चाहती तो मेरी तरह एक किताब लिख सकती थी। या शायद उनकी दास्तानों ने मुझे अपनी इन यादों की पोटली खोलने को प्रेरित किया हो।

परंतु मिसेज पम्बू को संभवतः अपने से या समाज से नाराजगी थी। उनके दो बेटियाँ थी और उनकी बेटी के भी बेटी थी।अतः वह लङकों से चिढ़ रखती थी। पर साथ ही उन्हें चिन्ता थी कि उनकी बेटी रमा के दूसरी संतान बेटी न हो जाए।

वह एक बहुत ही संकीर्ण बात बार-बार कहती थी, सुनकर दुःख होता था, जवाब इसीलिए नहीं देती थी कि जानती थी, इनकी बङी बेटी रमा व उसके पति समझदार हैं ।मुझे उनकी सोच पर दया आती थी।
वह कहतीं, “जब भ्रुण जांच की वैज्ञानिक पद्धति है, तो क्यों दो बेटियों को जन्म दिया जाए। पहली बेटी तो ठीक है, परंतु दूसरी संतान के समय मैं रमा की जांच करा दूंगी।(तब भ्रुण जांच पर कानून नहीं बना था और लोग इसी तरह मनमानी कर रहे थे।) लङका होगा तो ठीक और जांच में लङकी पता लगी तो उसे दुनिया में क्यों लाया जाए।”
वह एक दयावान, नेक स्त्री थी, पर औरतों पर सामाजिक बंदिशों व तकलीफों ने उनके विचारों को कलुषित कर दिया था।

मीशु ने जब घुटने के बल चलना शुरू किया, तब मौका मिलते ही वह उनकी तरफ निकल जाता और उनके सामान से छेड़छाड़ करता था। वह मीशु को पसंद नहीं करती थी, एक तो लङका दूसरे वह उन्हें एक नंबर का शैतान व बदमाश दिखता था।
जब उनकी नातिन आती जो मीशु से कुछ महीने बड़ी थी, तब मिसेज पम्बू का व्यवहार बहुत अजीब हो जाता था।

मीशु थोड़ा बङा हुआ तो वह और उनकी नातिन साथ खेलते थे। दोनो ही अपने-अपने खिलौनों से मिलकर खेलते थे। परंतु पम्बू आंटी को चिन्ता रहती कि मीशु कहीं उसका खिलौना अपने पास न रख ले। तब मीशु सिर्फ 11/2साल का था।

एक दिन उनकी नातिन का कोई खिलौना नहीं मिल रहा था, तब पम्बू आंटी का व्यवहार बहुत भिन्न था। मैं आंटीजी की बहुत इज्जत करती थी और उनके व्यवहार का उतावलापन समझ में आ रहा था। कई बार दादी-नानी, दादा-नाना अपने पोते- नातिन के प्यार में इतना डूब जाते है कि भूल जाते हैं कि वह दूसरों का अपमान कर रहे हैं । मीशु तो छोटा था पर…..।

खिलौना तो उन्हें अपने घर मिल गया था। पर अब हमारे बीच एक कङवी दीवार बनने लगी थी। अब इस मकान को बदलने का समय आ गया था।
यह मकान मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण था, मीशु का जन्म यहाँ हुआ था और पम्बू परिवार से बहुत कुछ सीखने को मिला था। आस-पड़ोस में भी हमारा अच्छा मेलजोल हो गया था।

जब इस मकान में शिफ्ट हुए तब सेतु का आर्मी पब्लिक स्कूल में एडमिशन हो गया था। मीशु के जन्म के कुछ समय बाद मिन्टू भी पास ही एक स्कूल में जाने लगा था।
हमारे घर के ठीक सामने बत्राजी का मकान था, बत्रा जी का पोता सुमित भी आर्मी स्कूल में सेतु के साथ पढ़ता था।

मीशु के जन्म के समय कानपुर से बङी दीदी व डौली आए थे। डौली ने सब काम संभाला था। डौली की दोस्ती उमा से हुई थी। आसपास में सभी उसे जान गए थे। डौली और एस. के. के मिलनसार स्वभाव के कारण आसपास में सभी मुझे भी जान गए थे।

सुमित की मम्मी से मेरी अच्छी दोस्ती हो गई थी। सुमित और सेतु व मिंटू और उनकी बेटी सोनल साथ में खेलते थे। सोनल मिन्टू से एक साल बङी थी।
मिसेज पम्बू व अन्य मिन्टू और सोनल की दोस्ती का मज़ाक भी बनाते थे।माना कि मज़ाक ही होता था, पर यही हमारी सामाजिक सोच को दर्शाता है। एक लङका व एक लङकी की दोस्ती पर निगाह उठाना समाज का बहुत गहरा व गंभीर स्वभाव है। इस तरह हम अनजाने ही बच्चों के मन में ऐसी दोस्ती व लङके व लङकी के आपसी रिश्ते पर कई प्रश्न छोङ देते हैं।

सुमित के पापा से एस. के. की अच्छी मित्रता हो गई थी। इस तरह हम दोनों परिवार का बहुत घनिष्ठ संबंध बन गया था।

बत्राजी के पङोस में सरदारजी रहते थे, उनके चार बेटियाँ थी, सुना था कि बेटियों की शादी की चिन्ता में सरदारनी बिमार रहती थी। हमारे समाज में विवाह ही जीवन का उद्देश्य मान लिया गया है।वाहे गुरु की कृपा से हमारे सामने ही तीनों बङी बेटियों का विवाह हो गया था। सबसे छोटी सेतू से बङी थी व आस-पड़ोस के सभी बच्चों की नेता थी, सेतु को यहाँ भी बहुत अच्छा लगता था।

सरदारजी के किराएदार श्रीवास्तवजी थे। उनके बेटे का नाम ‘बाघा’ था। मैंने मिसेज श्रीवास्तवा से पूछा था कि उन्होंने अपने बेटे का नाम ‘बाघा’ क्यों रखा? उन्होंने बताया ” मैं उसे प्यार से बाघा पुकारती हुँ, पर उसका नाम आकाश है। बंगाल के क्रांतिकारी जतिन्द्रनाथ मुखर्जी को लोग ‘बाघा जतिन’ कहते थे। बिहार में भी ‘बाघ बहादुर’ की एक सच्ची कहानी प्रसिद्ध है।”
बाद में मैंने ‘बाघ बहादुर’ नाम की एक पिक्चर देखी थी।

बत्रा जी के चार बेटे थे, सुमित की माँ दूसरे नंबर की बहु थी। बङे दो बेटे यहाँ रहते थे, दोनों छोटे आगरा से बाहर थे। बाद में सबसे छोटा बेटा भी आ गया था।सुमित की मम्मी की किचन अलग थी। बङी बहु व छोटी बहु सास के साथ ही थी।ससुर की मृत्यु के बाद छोटी बहु की भी किचन अलग कर दी थी।

घर की सबसे बङी बहु टीचर थी। सुंदर व समझदार थी, ऐसा सब वहाँ कहते थे। परंतु मुझे सुमित की मम्मी ही अधिक समझदार दिखती थी, जो यह देखते, समझते हुए कि सास बहुओं में भेदभाव करती हैं, यहाँ तक कि बच्चों में भेदभाव करती है, चुप रहती थी।
सास के कोई बेटी नहीं थी, इसलिए बङी बहु को तो बेटी ही माना व वैसे ही लाड किया था।बङी बहु को तो पानी का गिलास भी भरकर देती थी।

पर दूसरी बहु को बहु ही माना था और बहु पर पूर्ण सख्ती की थी।यह बहु नौकरी नहीं करती थी तो घर का सारा काम भी बहु से कराया जाता था।
फिर ससुरजी ने समझदारी से दूसरे बेटे को उसी घर में अलग कर दिया था। अब दूसरी बहु सास की सभी सहेलियों के लिए एक तेज बहु थी। मिसेज पम्बू को मेरी व सुमित की मम्मी की दोस्ती पसंद नहीं थी। हमारे बीच मनमुटाव का यह भी एक कारण था।

मकान मालिक का यह भी एक रवैया होता है। वह नहीं चाहते कि उनके किराएदार आस-पड़ोस में अधिक व्यवहार करें। या फिर उतना या उनसे व्यवहार करें जिन्हें वे पसंद करते हैं ।
मेरा स्वभाव तो अभी भी रिजर्व था, फिर तीन बच्चें, इतना काम…. बाहर निकलने का समय नही था, पर सुमित की मम्मी को मैं पसंद आ गई थी। वह सभी कार्यों में बहुत चुस्त थी। अतः सभी काम शीघ्र निबटा कर मेरे पास आ जाती थीं ।मैं काम करती रहती थीं और वह अपनी बातों से मेरा मन बहलाती थी। जब मिंटू और बुलबुल के स्कूल से आने का समय होता तब वह घर जाती थी, बच्चों की पढ़ाई वह स्वयं देखती थी।

हमारे घर की दाएं दीवार के साथ एक बनिया परिवार का मकान था, सभी बेटे बहु साथ रहते थे।बिजनेस भी साझे में था। बनिया परिवार में एक विशेषता होती है, पूरे परिवार का या कहीं एक खानदान का बिजनेस साझे में होता है, तथा यह संयुक्त परिवार में ही रहना पसंद करते हैं ।इन्हें न एकल व्यापार पसंद होता है, न ही एकल रहना अच्छा
लगता है।

घर के मर्दो को घर की किचन राजनीति से कोई मतलब नहीं होता है। यह स्पष्ट होता है कि लङकर रहो या शांति से, पर रहना सबको संयुक्त ही है। यह घर भी ऐसा ही था, घर की सर्वेसर्वा सास ही थी। सास या माँ को घर के फैसले लेने का अधिकार होता है उसमें पुरूषों का कोई दखल नहीं होता है।

घर के दूसरी तरफ झांई जी का मकान था। झांईजी का स्वभाव बहुत अच्छा था, उन्होंने अपने सनकी पति के सख्त व्यवहार को बहुत बर्दाश्त किया था।
उनके तीन बेटे थे, बङा बेटा चंडीगढ़ में व दूसरा बेटा धनबाद रहता था। सबसे छोटे बेटे की शादी नहीं हुई थी, पिता की मृत्यु के बाद घर के एक भाग में उसने दैनिक जरूरतों की एक दुकान खोल ली थी।

झांईजी के पति का स्वर्गवास हमारे उस मकान में शिफ्ट होने के बाद हुआ था। पति की मृत्यु के कुछ समय बाद उन्होंने आस- पङोस में जाना शुरू किया था। काका(छोटा बेटा) की दुकान खुलने के बाद वह दुकान पर भी बैठती थी।

मिंटू को बहुत प्यार करती थी। अक्सर मेरे पास आती थी, उन्हें मेरे हाथ की चाय बहुत पसंद थी। मुझे अपने पति की बातें बहुत गर्व से सुनाती थी, कभी उनकी बुराई नहीं करती थी।
मिसेज पम्बू से मुझे उनके जीवन का दुख पता चला था।
पति के जीवित रहते वह अपने मायके से संबध नहीं रख सकी थी।पति के स्वर्गवासी होने पर ही भाईयों ने आना शुरू किया था व वह भी कई वर्षों के बाद अपने मायके गई थी।अब मायके में माता-पिता नहीं रहे थे।

मुझे लगा कि पति की मृत्यु ने उनकी अनकही इच्छाओं को पुरा कर दिया था। काका का विवाह हुआ और तीसरी बहु का सुख पाया था। चंडीगढ़ गई , फिर धनबाद भी गई, अपने दोनों बेटों के सुख को देख आत्मा संतुष्ट हुई। पर धनबाद से लौटी तो बिमार थी, लीवर के केंसर ने उनकी जीवन लीला को समाप्त किया था। ऐसा लगा मानों ईश्वर ने उन्हें दो वर्ष खुली हवा में सांस लेने व आज़ादी को महसूस करने के लिए दी थी।

आर्मी पब्लिक स्कूल का अनुभव अच्छा नहीं रहा था। मिन्टू और सेतु का विभवनगर के एक स्कूल में दाखिला करा दिया था। और हम विभव नगर शिफ्ट हो गए थे।

नारी तु तो शक्ति है,
क्यों तु अपना अस्तित्व मिटाने चली है?
नारी तु तो दुर्गा है, नारी तु तो योद्धा है,
क्यों पङी कमज़ोर तु अपने लिए?
चल अब अस्त्र उठा अपने लिए।
यह तेरा मान नहीं, यह तेरा स्वाभिमान नहीं ।
यह निरकुंशता खोखली है।
अपनी शक्ति को पहचान।
क्यों तु अपने अस्तित्व पर संदेह करती है।
नारी तु तो शक्ति है।