प्रतिलिपि पर पढ़ें – “यह न मिलना दुबारा”

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चेतनामयी मान

” किस बात पर रो रही हुँ? तुम्हारे जाने का गम कर रही हुँ या इस बात का अधिक गम कर रही हुँ कि तुम मुझ से पहले चले गए, मैं पहले जाती तो तुम मुझे याद करते और याद आती वो सब तकलीफें जो तुमने मुझे दीं थी।और शायद पछताते भी, तुम मेरे दर्दों का अहसास जीते फिर रोते, चीखते, चिल्लाते और कहते मुझे माफ कर देना, मैंने तुम्हें बहुत सताया। पर उल्टा हो गया तुम चले गए अब मैं रो रही हुँ, चीख रही हुँ , पछता भी रही हुँ। उन सब बद् दुआओं के लिए जो मेरे मुहँ से अपने आप निकलती थी।जब तुम्हारी दी हुई तकलीफ के दर्द से तङपती थी, तब भी जब मेरी बाँहे पूरे बिस्तर पर तुम्हें ढूँढते हुए बिलख जाती थी और एक श्राप निकलता तुम मरते क्यों नहीं, भगवान तुम्हें उठाता क्यों नहीं। पर ऐसा नहीं हुआ तुम जीए और मैने धीरे-धीरे दर्द के साथ सब स्वीकार करते हुए जीना सीख लिया था। भगवान के आगे सिर नवा कर माफी माँगी और तुम्हारे लिए, अपने बच्चो के पिता के लिए लंबी उम्र की दुआ माँगती।लेकिन जब मैं तुम्हारे लिए दुआ माँगती रही हुँ, तुम चले गए।”

आज वंदना के पति विनय को इस दूनिया से गए 20 दिन हो गए है और वह इन दिनों पूरी हिम्मत के साथ अपने सिवा घर के हर सदस्य को संभाल रही थी। और दोनों बेटों के साथ सारे काम देख रही, क्रिया, चौथा, तेहरवीं।शोक व्यक्त करने आए लोगों के सामने सब वृतांत बार- बार बताना कैसे बुखार आया?हाॅस्पिटल, डाॅक्टर और देखते-देखते उनका चले जाना। यह सभी जिम्मेदारी उसी की तो है, ससुरजी की इतनी उमर उस पर दूसरे बेटे का गम।वह अपने दोनों बेटों को देखती, बङे हो गए, पर उनके हौसलों को दुरस्त रखना उसकी जिम्मेदारी है। अभी तो इन्हें अपने पिता की जिम्मेदारियाँ भी पूर्ण करनी है। दोनो सौतेले भाई-बहन अभी बहुत छोटे हैं, अपनी माँ के साथ, दूसरी माँ की भी जिम्मेदारी है।कितनी मुश्किलों भरी जिन्दगी मिली उसके बच्चों को….। 20 दिन बीत भी गए, आज शोक व्यक्त करने वालों का तांता कुछ कम हुआ है, बाहर से आए रिश्तेदार भी चले गए है। घर में सन्नाटा फैला है। और वह अभी अपने बिस्तर पर आँखें मीचें पङी है। दिल पर बहुत बङा बोझ, आज बहुत भारी लग रहा है, जख्मों को रिसता हुआ महसूस कर रही हैं।रो नहीं पा रही हैं, कराह भी नहीं पा रही हैं।पहले बरसों तक रोती रही, कराहती रही थी फिर आँसु सुख गए।इन्हीं सूने अहसासों को लिए, पिछले एक महीने की थकान ने उसकी आँखों में नींद भर दी।धीरे-धीरे उसकी बाँहे फैलने लगी और हाथ सिर के बाल सहलाने लगे और वह सिहर उठी, यह कैसे इतने वर्ष बाद…वह घबरा गई। तभी आवाज़ सुनाई दी, भाभी!भाभी! क्या हुआ आँख खोलो, उसने आँखें खोली सामने कमला खङी थी। कमला पानी लेकर आई वह तो स्तब्ध पङी थी, कमला ने ही सहारा दे कर पानी पिलाया तब कुछ होश संभले और उसने अपना सिर कमला के कंधों पर रख दिया, रोई तब भी नहीं। कमला बरसों से उसके पास काम कर रही है, उसका दर्द समझती है।

कमला उसके सिर पर तेल लगाने लगी और उसकी आँखे पता नहीं कौन-कौन से, कितने पुराने मंज़र दिखा रहीं थी। दो चोटी करे, हाथ में किताबें लिए घर पहुँची, अरे, वीनु तेरी माँ नहीं रही। माँ….और माँ का मुस्कराता, ममतामयी चेहरा आँखों के सामने..चौंक जाती है।”बुखार बहुत तेज़ है” “अरे! बाबुजी मेरे कमरे में! कमला मेरे सिर पर पल्ला…।” “बेटा, लेटी रहो। बुखार तेज है, कुछ खाकर दवाई ले लो।” बाबुजी कहकर चले गए। निम्मी उसे सूप पिलाने लगी। आज पता नहीं क्यों उसका मन नहीं हुआ, निम्मी के हाथ से उसने कटोरा ले लिया जबकि उसके हाथों में कंपन था पर उसने उन्हें संभाला बरसों के अभ्यास ने उसके भावों को संयमित और दृढ़ता दी है। पर निम्मी भी समझ गई, उसने उसको देखा, निम्मी की करुण नम आँखों का जवाब उसने अपनी स्निग्ध मुस्कान से दिया। नहीं, वह कभी निम्मी से नाराज़ नहीं हुई थी। उसने उसे छोटी बहन जैसा मान दिया है। निम्मी का सच, निम्मी के लिए उचित रहा, अपने को चरित्रवान प्रमाणित करते हुए उसका यही तर्क था कि जिसे एक बार उसने अपना तन मन सौंपा वही उसका पति हुआ।

दवाई से बुखार कुछ कम हुआ, पसीने से बैचेनी हो रही है धीरे से उसने आँखें खोली बगल में, पलंग के दूसरी ओर वह बैठा धीरे-धीरे मुस्करा रहा था, बिलकुल वैसा ही जैसा उससे पहली बार मिलने आया था।हङबङा कर पूरी आँखें खोली, पलंग का उसका भाग वैसा ही रिक्त था। क्या बुखार के कारण?, नहीं तो वर्षों से उसने उसे ठीक से नही देखा था।

उसकी आँखें फिर मुँदने लगी। “हमें डाॅक्टर को बुलाना चाहिए, प्रलभ! डाॅक्टर को फोन कर,और फिर तु खुद जाकर उन्हे ले आना, गाङी ले जाना।” वंदना धीरे से बुदबदायी, “विनय की आवाज़? वह मेरी चिन्ता कर रहे हैं।” पर दूसरे ही क्षण… सांस जैसे गले में अटक गई हो। “माँ! क्या हुआ?”शलभ?” शलभ की आवाज़ अपने पापा जैसी है, उसे पहले कभी महसूस क्यों नहीं हुआ?” फिर उसे याद आया, एक ही घर, एक ही आंगन कैसे उस निर्मोही से दूर रहना असहनीय हो रहा था। उसकी एक झलक देख बेताब हो जाती आँखें, आसपास से उसके गुजर जाने भर से मन में न जाने कितने अहसास जग जाते थे, उसकी आवाज़ कानों पर पङते ही दिल तङप उठता था। कितनी बार उसने उस बेदर्द के सामने अपने प्रेम की दुहाई दी पर उस बेरहम ने….। फिर वंदना ने जगाया था अपना स्वाभिमान और अपनी सभी इंद्रियों को सुप्त कर दिया था। अब न उसे विनय दिखता, न उसकी आवाज़ ही सुनाई देती, जैसे वह उसके लिए था ही नहीं। पर अब वह हमेशा के लिए चला गया तो… उसकी इंद्रियाँ क्यों जागकर उन अहसासों में उसे ले जाकर तङपा रही हैं।

फिर उसने सुना माँ! ठीक हो जाओ, तुम्हारे बिना कैसे?आँखें खोली, शलभ, प्रलभ दोनो थे।धीरे धीरे आराम आने लगा पर कमजोरी बहुत थी, उस पर यादों का तांता लगा था।वंदना के लिए बहुत अच्छा रिश्ता आया है। पर अभी बहुत छोटी है। बिन माँ की बेटी को कैसे संभालोगे। लङके और उसकी माँ ने हमारे रजत की शादी में वंदना को देखा था। तब से उनके कितनी बार फोन आ चूके है। अच्छे संपन्न लोग है।माँ तो इतनी अच्छी कि वंदना अपनी माँ का गम भूल जाएगी। वंदना को भगवान ने जैसे फुर्सत से बनाया था। नयन नक्श ऐसे कि देखते रह जाओ छवि भी इतनी प्यारी कि मन मुग्ध हो जाए।विनय तो उसका दीवाना था। ससुराल में सास-ससुर लाड करते तो वंदना भी उनके सम्मान में कोई कमी न रखती थी।उसकी खूबसूरती और स्वभाव प्रसिद्धि पा रहे थे कि ननद मंजु की शादी में सारे रिश्तेदार वंदना को परखने ही आए थे। शलभ अभी दो महीने का ही था पर वंदना ने किसी की आवभगत में कोई कसर नहीं छोङी थी। उसकी खुशमिजाजी ने सबका दिल जीत लिया था। विनय भी उस पर निहाल हुआ जाता था। विनय रिश्ते की भाभियों से चुहल करता तब वंदना मायुस हो जाती पर अपने पर और विनय पर पूरा विश्वास था।फिर वह जानबुझकर रुठती ताकि वह उसे मनाए। शलभ के दो साल बाद प्रलभ हुआ था, वंदना अपने विवाहित जीवन मे पूरी तरह डूबी थी। पर न जाने किस दुख ने देवर विपिन को आत्मघात करने को मजबूर कर दिया था।विपिन की आकस्मिक मृत्यु ने सारे परिवार पर दुख का वज्रपात कर दिया था।वंदना सास ससूर के दुःख का सहारा बन रही थी, विनय भी विपिन के जाने से टूट गया था, अपने को बहुत अकेला महसूस करता था। वंदना उसे संभालती। वही थी जो सबकी हिम्मत बन रही थी। समय पंख लगाकर उङ रहा था, वंदना कुशलता से सब संभाल रही थी, उसे महसूस होता उसके और विनय का रिश्ता, प्रेम और गहरा होता जा रहा है कि तभी एक दिन जैसे उसे पहाङ से नीचे गिरा दिया हो उसके विश्वास का ऐसा हश्र! विनय उसे निम्मी के विषय मे बता रहा था और वह अचंभित सुन्न बैठी रह गई थी।वह चला गया ।तब बाबुजी और माँ ने उसे अपना भरोसा दिया था। पर बेटा ऐसे घर छोङ जाए असहनीय था।

माँ-बाबूजी अपने नालायक बेटे पर बहुत नाराज़ हुए, समझाया भी कि अपनी गृहस्थी मत खराब कर। ननद मंजु और ननदोई राजेश ने भी कोशिश करी पर वह टस से मस नहीं हुआ।और एक दिन मंजु आई बताया उसने शादी कर ली है, मंजु बोली,” वह तो आपके पैर की धूल भी नहीं है।” वह बोली, “बता मंजु क्या मैं पहले जैसी सुंदर नहीं रही? दोनो बच्चों के बाद मोटी हो गई हुँ, बोल क्या प्रेम सिर्फ शारीरिक सौंदर्य तक सीमित रहता है? फिर अपने आप बोली, पर सुना है वह सुंदर नही है, तो क्या कमी आई मुझ में?” वह तो पगला ही गई थी।मंजु बोली,”भाभी, आप में कोई कमी नहीं है, हमारा भाई ही नालायक निकला। उस लङकी ने ही कोई जादू किया है।”

वह तो टूटती जा रही थी कि एक दिन माँ आई और बोली,”बेटा, तेरा दुःख समझती हुँ, फिर झोली फैलाकर बैठ गई, बोली, मुझे मेरा बेटा ला दे, एक तो पहले ही असमय चला गया, अब इसे भी देखे बिना कैसे जीऊँ?” वह हतप्रभ-सी बोली, “मैं कैसे? मेरे पास क्यों वापिस आएँगे?” माँ ने कुछ झिझकते हुए कहा,”अगर विनय के साथ निम्मी भी आ जाए…” “क्या कहती हो माँ? और मैं कहाँ जाऊँगी? मेरे बच्चे?” तब बाबूजी की आवाज़ आई,” बेटा, आज से तु हमारी बहु नहीं, बेटी है, तेरी और पोतो की जिम्मेदारी हमारी है, तेरा कोई हक मारा नहीं जाएगा।” उसने मन में कहा हक?वह तो मारा जा चूका है।’

माँ बाबूजी के दुख के सामने उसने अपना मान नीचा कर, चल दी अपने पति और उसकी पत्नी को लेने, मंजु और राजेश ने बहुत मना किया, कहा, “आप अपने साथ अन्याय कर रही हो।” पर वंदना को सिर्फ माँ-बाबुजी का ध्यान था। फिर माँ ने कहा,” वह तुझी से सच्चा प्यार करता है, अभी भटक गया है। तु सामने होगी, तो फिर तेरे पास होगा और मर्द तो दो-दो पत्नियाँ रखते है। तुझे भी हम तेरा हक दिलाएँगे। वह उन दोनो को अपने साथ ले कर आई, मन रो रहा था पर चेहरे पर मुस्कान थी।”

समय बीतता गया पर विनय उसके पास नहीं आया, कभी वह सामने से पूछती कि उसका क्या होगा? “मेरे साथ भी बिताओ कुछ समय।” पर उस निर्मोही ने उससे जो मुहँ मोङा तो फिर उसकी ओर नहीं आया। उसे लगता क्यों बेशरम सी पङी हुँ यहाँ? कई बार अपनी जान लेने का मन हुआ पर बेटों का मुहँ देखकर सोचती इन्हें कैसे सौतेली माँ के पास छोङ जाऊँ। यूँ भी इन मासूमों को भी तो घर से बाहर निकलते ही दूनिया के सवालों का जवाब देना पङता है। घर से पिताजी का फोन आया था बोले,”तु यहाँ आ सकती है, पर तुझे और बच्चों को अपना हक लेने में कठिनाई आएगी।” वह थक गई थी, इस ‘हक’ शब्द को सुन सुनकर।कैसा हक? जमीन जायदाद? अपने बच्चों को मेहनत मजदूरी कर पाल लेगी, पर इस तरह अपमनित होकर जीना..। उन दोनों के हँसी ठठ्ठे की आवाज़े, उसके दिल में हथौङे बजते थे।

माँ-बाबुजी को तो दो बहुओं की सेवा-टहल मिल रही थी, जब माँ निम्मी का भी वैसा लाड करती तो उसका दिल और टूट जाता था।सोचती,” इन्होंने अपना सुख देखा, मेरी तङप नही समझी।” पर अंतिम समय में माँ उसका हाथ पकङ कर बोली,” मुझे माफ करना बेटा, अपने स्वार्थ के सामने, मैने तेरी तङप और मान को अनदेखा किया। एक औरत होकर भी, तेरी माँ बनकर भी….। मुझे उसे लाने को तुझे नहीं कहना था।मैं जानती थी, एक पुरुष की प्रवृति… फिर भी मेरे अंदर की औरत एक माँ की ममता के आगे हार गई। वह अनाचारी पुरुष, माँ के कंधों का सहारा पा कर जीत गया।आदिकाल से चली आ रही पुरुष की ऐसी भूमिका को बढ़ावा दिया। कोई नया इतिहास नहीं बनाया, अगर तेरे मान के साथ अपना भी मान जोङ देती, उसने एक माँ के दिए संस्कारों का अपमान किया था।उसे घर से बेदखल रखती,और तुझमें व पोतों में अपना सुख देखती। पर तु ही इस घर का मान है, मैने तेरे बाबुजी से कहा है कि वंदना की इच्छा बिना इस घर का पत्ता भी नहीं हिलेगा” माँ के जाने के बाद बाबुजी उसकी ही सलाह लेते है, वह भी घर की बङी बहु की समस्त जिम्मेदारी निभा रही है।

तबियत में अब बहुत सुधार था, इसलिए शाम को छत पर टहलने लगी, टहलते-टहलते उसकी निगाह दरवाज़े पर पङी, “कौन है?” धीरे-धीरे गरिमा बाहर आई, “अरे,वहाँ क्यों खङी है? मेरे पास आ और गरिमा दौङ कर आकर उससे लिपट कर रोने लगी,” नहीं, रोते बेटा, मै अब ठीक हुँ।” “बङी मम्मी मुझे लगा आप भी मर जाओगी।” नमन की आवाज़ सुनकर, मुङ कर देखा, वह भी बहुत उदास व मायुस था। दोनो बच्चों को गले लगा कर बोली, नहीं मेरे बच्चों मैं तुम्हें छोङ कर कहीं नहीं जाऊँगी। कमला से बोली, “चाय यहीं छत पर ले आ, निम्मी को भी बुला लेना साथ ही चाय पी लेंगे। निम्मी ने चाय पकङाते हुए , झिझकते हुए उसे देखा चेहरे पर वही तेज और निश्चछलता, आँखों में बच्चों के लिए माधुर्यपूर्ण झलकता वात्सल्य। निम्मी ने निश्चितता और सुरक्षा का उसांस भरा, नही तो, विनय के जाने बाद कैसी असुरक्षा की भावना मन को घेर रही थी।

समय के पाँव नहीं होते है, अब यादें तो ताज़ा हैं, पर मान-अभिमान, अपमान सब धूँधले पङ गए हैं।शलभ की 10वर्षीय बेटी निकिता एकाएक पूछने लगी, “दादी माँ, सुनाओ न अपनी शादी की कहानी, कैसे बङी दादी माँ ने आपका घुघंट खोला?और चाचू बाबा और बुआ दादी ने आपको खीर में डालने के लिए चीनी की जगह नमक पकङा दिया था” “अरे, कितनी बार सुनेगी लङकी!” हँसते हुए वंदना ने फिर पुराने किस्से सुनाने शुरू किए। तभी गरिमा आई, बोली, आपके यह किस्से सुनने में तो हमें भी बङा मज़ा आता है।”उसकी गोद में नमन का एक वर्षीय बेटा था, उसके जन्मदिन के उपलक्ष्य में ही आज वंदना का पूरा कुनबा इकठ्ठा हुआ था।गरिमा से पोते को उसने अपनी गोद में लिया और प्यार से उसे निहारने लगी। तभी निम्मी आई ,उसकी खुशी छलकी जा रही थी, उत्साहित होकर बोली,”देखो, बिलकुल नमन से मिलती है इसकी शक्ल।” वंदना धीरे से बोली,” पर आँखे और यह लुभावनी मुस्कान बिलकुल अपने दादा पर हैं।” निम्मी भी धीरे से बोली,”आप उनसे कितना प्रेम करती हो! मेरा प्रेम तो आपके आगे….”बीच में ही उसे रोक बोली वंदना,”पगली! प्रेम की क्या तुलना?” वंदना अब जल्दी थक जाती है, इसलिए गरिमा ने सहारा दे कर उसे लिटा दिया । फिर अपनी बङी माँ से बोली, ” माँ एक सवाल उठता है मन में पुछुँ?” वंदना धीरे से मुस्कराई। गरिमा की बोलने और सवाल करने की आदत से वह परिचित है।उसके सवाल शुरू हुए, “आप कैसे रुक पाई यहाँ? मेरी माँ और पापा को कैसे माफ किया? आप चली क्यों नहीं गई? यूँ ये सवाल अनुचित हैं, आप चली जाती तो आपका प्यार हमें कैसे मिलता? पर फिर सोचती हुँ,मेरे साथ ऐसा हो तो मैं कभी न रुकु अपनी ससुराल में।” “बस कर लङकी!कुछ भी बोलती है। भगवान न करें, तेरी किस्मत मेरे जैसी हो, पर हाँ यह प्रश्न कई बार अपने से करती हुँ, क्या मुझे चले जाना चाहिए था? फिर तुम सबका प्यार पाती हुँ, अपनी हरी-भरी फुलवारी देखती हुँ तो सभी दर्द भूल जाती हुँ और यह प्रश्न बेमानी लगता है।”

फिर आगे बोली, ” मैंने तो अपने जीवन के सुख दुख भोग लिए, पर अन्य किसी लङकी को ऐसा अपमान और दर्द सहने की सलाह नहीं दूँगी।” एकाएक उठी और गरिमा का हाथ पकङ पूछा,”कोई तकलीफ तो नहीं न बेटा? अपनी बङी माँ से कभी कुछ न छिपाना। मैं हमेशा तेरे साथ हुँ और हल्के से बोली, सिर्फ बेटी ही नहीं बहुओं के साथ भी हुँ, अब इस घर में किसी बहु-बेटी के साथ अनाचार न हो पाएगा।” आँखों से आँसु छलक आए, गरिमा ने उनके आँसु पोंछे और बोली, ” मै सुखी हुँ माँ, आप जैसी माँ पाकर कौन सुखी न होगा। वंदना ने सुख शांति की अनुभूति लेते हुए जीवन का सत् पा लिया था।

सहयात्री

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वह चुपचाप सूने कमरे को देखती रही, अभी थोङी देर पहले वह मीतु को एयर पोर्ट छोङ कर आई है। सही अर्थों मे तो मीतु आज विदा हुई है। एक महीना पहले उसकी शादी हुई थी, दामाद दुबई में काम करते हैं। वीज़ा इत्यादि औपचारिकताओं में एक महीना बीत गया। ससुराल पास में ही है इसलिए मीतु का आना जाना बना रहा। अच्छी गहमा-गहमी रही। एक महीने का समय पंख लगा कर उङ गया। अब उसका कब लौटना होगा। नही, उसे मीतु की चिन्ता नही है।रंजन और मीतु बचपन के मित्र रहे हैं। जब मीतु ने रंजन से विवाह का अपना विचार बताया तभी वह निश्चित हो गई थी। रंजन से ही नही उसके परिवार से भी उनका अच्छा परिचय था।पर फिर भी रूलाई मुँह को आ रही थी, लेकिन आँसुओं को जब्त कर लिया। माँ कहती थी कि बेटी को विदा करके आँसू नही बहाते, अपशगूनी होती है,बेटी अपने नए जीवन की ओर बढ़ी है।

कमरे से बाहर निकल दो कप चाय बनाई और पति के पास ले गई, कहते कुछ नही पर घर का सूनापन उन्हें भी छू रहा होगा।लेकिन वह तो अपना हिसाब किताब खोले बैठे थे।शादी और अभी तक मीतु की विदाई का खर्च, सारा लेखा-जोखा….चाय का कप हाथ में ले वह उससे उन सभी खर्चों की मालुमात करने लगे जो उसके हाथ से हुए थे।उसकी इच्छा अभी इन बातों को करने की नही थी, पर वह जानती थी कि मुक्ति नही है। वह अनमने मुड से उनके साथ उस काम में लग गई। पति का या तो उसके अनमनेपन पर ध्यान नही था या अनदेखा कर दिया था। यूँ भी अपने मन को हल्का करने का सबका अपना ढंग होता है, पर उस ढंग में वह उसे क्यों घसीटते हैं। इस सब में कितना समय बीत गया, पता ही नही चला और उसका मन भी अब दैनिक कार्यों की ओर मुङ गया था। तभी उनकी आवाज आई आज नीलू स्काइप पर बात करेगा, यह सुनते ही वह नए उत्साह में भर गई। नीलू से बहुत बातें करनी है। नीलू की शादी को तो दो साल हो गए है, पर कनाडा गए चार साल। आया भी बस दो बार एक बार अपनी शादी पर दूसरी बार मीतू की शादी पर। करिश्मा बहु अच्छी तो है पर साथ रहने का मौका कहाँ मिला। वह तो नही चाहती थी कि बेटा दूर जाए,पर पति बहुत गर्व महसूस करते हैं, जब सबको बताते हैं कि बेटा विदेश में है अब दामाद भी।

एक महीना बीत गया, यह महीना बहुत बुझा -बुझा और डूबा -डूबा गया। उसने सोचा थोङे दिन की बात है, वह मीतू के बिना रहना सीख जाएगी। जब उसकी शादी हुई थी, तब माता-पिता, भाई-बहन, सहेलियाँ, आस-पङोस सबके बिना उसने जीना सीख लिया था। तब भी कभी उदासी, कभी नए उत्साह के साथ जीवन के नए रूप को अपनाना शुरू किया था। अकेलापन कभी-कभी बहुत थका देता और वह चुपचाप पलंग पर लेटी, छत को ताकती रहती थी। और क्या हो गया है उसे? बिलकुल शादी के शुरुआत के समय की तरह….माँ या दीदी के पत्र आते तो पढने से पहले रोने लगती..जबकि ससुराल अच्छा था। और अब बच्चों से स्काइप पर खूब खुश-खुश बात करती और बाद में तकिए में मुँह दबा खूब रोती है। फिर भी उसे विश्वास था कि कुछ दिन में सब ठीक होगा, सब आदत की बात है। पर दूसरा महीना बीत रहा था और वह अकेलेपन के भयावह जंगल में घूम रही थी। अब तो बच्चे टोकने लगे थे, क्या हो गया? तबियत ठीक है? अपना ध्यान नही रख रही हो, फिर से सिर दर्द शुरू हो गया क्या? नीलू तो नाराज ही होने लगा कि जरूर सारी कामवालियाँ हटा दी होगी। “अरे, नही किसी को नही हटाया, तुम दोनो को यूँ ही लग रहा है”, उसने हँसते हुए कहा कि “मै बिलकुल ठीक हूँ, और थोङा खुल कर हँसते हुए कहा पूछ ले अपने पापा से… ।जी हाँ, उन्हे जैसे सब बताती हो।मीतू चिन्ता के साथ बोली। वे बाद में बोले कि तुम भी तो जैसे उनके सामने बैठती हो, किसी को भी बीमार लगो। उसे लगा बात सही है, बच्चे दूर बैठे हैं, फिर स्काइप पर बहु और दामाद भी होते हैं, थोङा तैयार होकर बैठना चाहिए। 

पर फिर मीतू की बात दिमाग में घूम गई, ‘उन्हे जैसे सब बताती हो’।

हाँ, सच ही है कि कभी मन की बात उनसे नहीं करी। उन्होने करी? वह तो चाहती थी कि वह कुछ अपने मन की कहे, कुछ उनकी सुने। पर नहीं उनके बीच यह रिश्ता कभी बन ही नही पाया। ऐसा नही कि कोशिश नही करी, आरम्भ में की थी बहुत उत्साह के साथ पर एक कठोर दृढ रुखाई ने उसे वहीं रोक दिया। एक रेखा उनके बीच हमेशा खींची रही। फिर एक साल के अंदर नीलू का जन्म।वह नीलू और ससुराल के अन्य नए रिश्तों को संभालने मे व्यस्त हो गई। अपना मन किसी से बाँटे यह सोचने का समय भी न था। पति से बात होती तो सिर्फ इन्ही विषयों में कि नीलू को डाक्टर के ले जाना है या फिर नीलू ने पहला कदम रखा…. इस तरह की खुशियाँ बाँटने पर उनकी हल्की सी मुस्कान उसे मिल जाती। कभी वह इसीलिए भी नीलू की बातें उनसे करती कि उनसे बातचीत का कुछ आदान प्रदान तो होता, कभी वह उससे नीलू के लिए बुने अपने सपने  बाँट लिया करते थे, पाँच साल बाद मीतु हुई थी। इतने समय में वह ससुराल के सभी रिश्तों में अच्छे से रच बस गई थी, पर पति के साथ…. कुछ ठीक से समझ नही पा रही थी। युँ उसकी सभी जरुरतें पूरी हो रही थी, बिमार पर होने पर समय से इलाज… यहाँ तक कि बच्चों के बहाने से घूमने भी जाते थे।उसकी दूनिया भी अब बच्चे ही थे, बच्चों की पढाई, बच्चों के काॅमिक्स, कार्टूनस। कब वे स्कूल से लौटे और उसका सूनापन भर दें। और उनके ऑफिस से लौटने पर उनसे बच्चों की बातें करें….नीलू के रिजल्ट, खेल, शरारतें, मीतू की नित नई मीठी-मीठी बातें, शैतानियाँ…यह वे क्षण थे जब साथ मिलकर थोङा हँसते थे, कुछ खुशियाँ, कुछ चिन्ताओं को बाँटते थे। उसे पता ही नही चला वह कब अपनी आत्मिक खुशियों के लिए अपने बच्चों पर निर्भर हो गई थी। बच्चे जब और जैसे-जैसे बङे होते गए, वह उनसे भिन्न-भिन्न विषयों पर बात करने लगी। वह खुश रहने लगी कि उसकी ज्ञान और उसकी जिज्ञासा की भूख वापिस लौट रही थी।पर फिर भी एक कसक….। तब सासू माँ बहुत बिमार थी और नीलू की आठवी कक्षा, उसने उनसे कहा “नीलू की ट्यूशन लगानी पङेगी मै आजकल उसकी पढाई नही देख पा रही हुँ।” बिना पूरी बात सुने वह तपाक से बोले, “मैने एक पढी-लिखी लङकी से इसलिए शादी की थी कि वह बच्चों की पढाई देख सके। तुम्हारे पढे-लिखे होने का क्या फायदा?” पता नही कैसे उस दिन उसकी भी तल्खी बाहर आ गई, बोली,” क्या!आप जानते हो कि मै पढी-लिखी हुँ?कभी तुम किसी छोटे-बङे फैसले पर मेरी सलाह नहीं लेते। कभी किसी विषय पर हम बात नही करते, किसी समाचार पर भी मैं अपनी राय प्रकट करूँ तो तुम्हे मेरा बोलना पसंद नही आता है” उनका18वीं सदी का जवाब सामने आया,”पढे-लिखे होने से कोई समझदार नहीं हो जाता, फिर मैं बङा हुँ, बाहरी दूनिया देखी है, मुझे तुम क्या सलाह दोगी। और बाते! इतने वर्ष क्या हमने बिना बात किए काट दिए? विभिन्न विषयों में तुम क्या…. छोङों बिना बात की बहस मत करों।”उसे याद आया कि अपनी शादी के कुछ शुरुआती दिनों की बात है जब परिवार के सभी सदस्य  बातचीत कर रहे थे तो वह भी अपने नए परिवार के साथ खुशी-खुशी बातचीत में हिस्सा ले रही थी कि अचानक पति की कठोर आवाज ने चौंका दिया था, “चुप बैठो, तुम्हे बोलने की आवश्यकता नहीं है।” जबकि सास ने कहा अब यह भी घर की सदस्य है, उसे भी बोलने का हक है।” क्या वह तभी उनके 18वीं सदी के दिमाग को नही समझ गई थी? पर शादी तो निभाने के लिए होती है, फिर जब रोटी, कपङा… सब मिल रहा हो तो शादी तो निभ गई न!

स्काइप पर आज वह और मीतु ही बात कररहे थे।दोनो की कोशिश रहती है कि कभी अकेले में बात हो जाए। बेटी माँ के मन का हाल जानना चाहती है और माँ बेटी का….। “अभी भी आपने अंधविद्यालय जाना शुरू नही किया न!जाने लगोगी तो मन बदलेगा।” मीतु बोली, “अरे कई महिनों से नही गई, अब पता नही उनके पास मेरे लिए कुछ काम होगा या नही?” उसने कुछ उलझे हुए स्वर में जवाब दिया। “एक बार जाकर बात तो करो, फिर तुम्हारा काम उन्हे पसंद आ रहा था, बच्चे भी खुश थे।कुछ  नहीं तो इतने दिनों बाद सबसे मिलोगी तो तुम्हें अच्छा लगेगा।” मीतु ने इस बार थोङा जोर देकर भी कहा।

मीतु ठीक कह रही थी, वह अंधविद्यालय में बच्चो को कहानियाँ  सुनाया करती थी।यह भी उसने मीतु के कहने से ही शुरू किया था।तब नीलू कनाडा उसी साल गया था और वह इसी तरह उदास रहने लगी थी। चूँकि मीतु थी इसीलिए वह बेहाल नहीं थी, पर बहुत अजीब हरकते करने लगी थी, यानि मीतु की ओर से अधिक संवेदनशील हो गई थी कि मीतु परेशान हो गई थी तब मीतु ने ही रास्ता निकाला था। उसी ने उसे अंधविद्यालय भेजा था और उसके खोए हुए आत्मविश्वास को जगाया था। विद्यालय में वह बच्चों को कहानियाँ सुनाती और छोटी-छोटी नाटिकाएँ भी कराती थी।मीतु की शादी के कारण उसने वहाँ जाना बंद कर दिया था, अब इतने लंबे अंतराल के बाद….

वाकई वह भी क्यों खुशियाँ एक ही जगह ढूढँती है। मीतु के जाने के बाद उसने कोशिश की, यह सोचकर कि अब उन्हें भी अकेलापन खलता होगा,बातचीत करने की कोशिश की,उनके साथ टी वी पर उनकी पसंद का ही देखती, उस पर टिप्पणी करती ताकि बातचीत बढ़े,साथ मे चाय पीती और बातों मे अपने बचपन या काॅलेज की बात करने की कोशिश करती और कुछ नही तो शादी के शुरु के दिन याद करती, पर पति होने का गरूर आङे  आ जाता। उसे पापा की बात याद आती कि “अपने दामादजी बहुत ज्ञानी और समझदार है।”और वह सोचती कैसे ज्ञानी जो किसी का मन ही न समझ सके। फिर उसने पाया कि वे अकेले नही है,उनकी मित्र मंडली है, जिनके साथ वह अपना समय व्यतीत करते थे। पहले भी घर हमेशा उनके लिए समय से खाने पीने और सोने की जगह रही है।उनसे फिर से दोस्ती की कोशिश से वह और अकेली हो गई है।

अंधविद्यालय जाने का लाभ हुआ और वह फिर उनसे जुङ गई है। बच्चों को आगे बढ़ना था, वे बढ़  गए तो उसे भी तो आगे बढ़ना है। आज भी बच्चे उसके संबल है और वह हमेशा उनके साथ…

पिछले दिनों उसे वायरल हो गया था, पति उसके माथे पर पट्टी रखते रहे, उसे समय पर दवाईयाँ देते रहे। और उसने सोचा हम अच्छे सहयात्री है।

 

एक गुमशुदा का जवाब !

​गुमशुदा ज़िन्दगी से पूछा मैने, कहाँ गुम हो गई हो?

जवाब जैसे किसी खोह से आया हो, कुछ घुटा, कुछ दबा।

“वहीं जहाँ तुमने मुझे छोङा, जल्द ही लौटने और मिलने का आश्वासन देकर,

अब तो मुझ पर समय की गर्त, धूल और मिट्टी से बढ़ती जा रही है।

यह सवाल तो मेरा होना चाहिए कि कहाँ हो तुम?

किस जीवन ने भुलाया है, तुम्हे? क्यों आत्महीन हो? 

क्यों अपने को समझा कमज़ोर और निस्सहाय?

आओ और कुछ कष्ट करो, लौटो और मुझ तक पहुँचो,

अब बंद करो यह हारी हुई बाजी का नाटक।

 हटाओ इस मिट्टी के ढेर को, समय की गर्त धो दो,

पा लो मुझे, तुम्ही ने तो छोङा था, अब अपना लो मुझे।

देर न करो गर अब न आ पाए तो यह ढेर मिट्टी का शिला बन जाएगा। 

क्या ढूँढ पाओगे तब मुझे तुम?

बनने न देना मुझे तुम किसी दबी हुई सभ्यता का अंश,

कोशिश करो और मुझ तक पहुँचो।”

एक और नया साल

फिर आया नया साल और मैं फिर पहुँची अपने अतीत में

मुझे याद नहीं कब मैनें नव वर्ष को जाना,

मेरे लिए पहले नव वर्ष क्या था?

वो दिन याद है मुझे जब अपनी नन्ही दूनिया के खेल में मग्न,

मैनें सुनी माँ की आवाज़, “आज हमारी बिटिया का जन्म दिन है,

पर अभी उसे इसका अहसास नहीं”फिर मैं जब भी पाती सिर्फ मेरा विशेष दिन-

नई पोशाक, मेरी पसंद के पकवान और हाँ विशेष रूप से सभी का प्यार व दुआएँ।

तब उसे ही मानती नया साल।

तब तारिखों, वर्षों का कहाँ तक ज्ञान।

फिर आया एक ओर विशेष दिन- मिला पहली कक्षा का परिणाम,

किसी ने बताया अब शुरू हुआ  तुम्हारा पढ़ाई का नया साल।

फिर नई किताबों-काॅपियों की खुशबू के साथ मनाते नया साल।

यूँ बङे भाई साहब खूब चिढ़ाते,”न बदला तुम्हारा कक्षा कमरा, न बदले सहपाठी(हमारी तो पहली से तीसरी तक अध्यापिका भी नहीं बदली थी)

फिर बोलो, कैसा तुम्हारा नया साल? तुम तो रही वहीं अभी भी पुराने साल।”

फिर काॅपियो में तारिखें  बदलते-बदलते जान गए नया साल।

अब इंतज़ार होता एक जनवरी का, सुबह सभी को देनी है नव वर्ष की बधाई।

और फिर जब आया टी.वी., तब से 31 दिसम्बर की रात कटती टीवी के साथ।

 लगा समझदार हो गए है, हम भी सभी की तरह करते अपने से एक नया कुछ कर गुजरने का वायदा।

फिर एक साल याद कर आती है, अपने पर हँसी,। इस मिथ को जानकर कि जिस काम को करते हुए नववर्ष की शुरुआत करोगे, वह काम पूरे वर्ष करोगे।

हमने भी उस वर्ष दी टी.वी. को तिलांजलि, ले बैठे किताबें, सारी रात पढ़ने की ठान ली। पर  टी.वी. की आवाज़ हमारे कानों तक पहुँचती थी, उससे भी अधिक सभी के ठहाकों की आवाज़े हमारे कानों को चुभती थी।(तब टी.वी. कार्यक्रम मनोरंजक होते थे)कैसे पहुँचे उस साल नववर्ष तक यह  हम जैसे सभी अंधविश्वासी समझ सकते है।

अब न रहे हम मिथो के घेरे में, किया है अपने को सभी अंधविश्वासों से आज़ाद।अपने से न कर कोई वायदा, ज़िन्दगी खुल कर जिया करते हैं।

इस इंटरनेट की दूनिया में अपना 60वाँ नववर्ष सभी जाने, पहचाने और अंजानों  के साथ मना रहे हैं।

‘आप सभी के लिए नव वर्ष मंगलमय हो।’

सूखे विचारों की गीली खुशबू

​कुछ सूखे पत्ते और सूखी लकङियाँ

कुछ सूखी उम्मीदें और सूखी उलझने

निराशाएँ भी सूखी और मन भी सूखा

यह तो मानों अकाल हो गया।

कहाँ से मिलेगी आद्रता?

कब भीगेगा मन?

सूखी धरती हुई सख्त,

मन भी हुआ कठोर,

कहाँ मिलेगी गीली धरती?

कैसे भीगेगा मन?

आसमान भी फीका पङ गया,

तारें भी हुए बेचमक,

कहाँ होगा नीला आसमान

जिसमें हो टिम-टिम तारे, 

कहाँ मिलेंगे जलभरे बादल?

जैसे ही वे बरस जाएँगे,

वैसे ही खिल उठेंगे सूखे पत्ते और सूखी लकङियाँ,

चमक उठेंगी उम्मीदें और जागेंगी उलझने

निराशाएँ भी मारेगी हिलोरें और मन भी होगा भरा-भरा

 जैसे मानों आएगा बसंत।

पर अभी तो-

कुछ सूखे पत्ते…………मन भी सूखा।

​  एक सच्चाई-एक सोच (भाग-3)

यह दुःख की बात है कि संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार विश्व में बाल विवाह के मामले मे भारत का दूसरा स्थान है। विश्व में होने वाले बाल विवाह में 40% भारत के बाल विवाह है। उसमें भी 49% लङकियों का बाल विवाह होता है। जरूरी नही कि लङकी अभी छोटी है तो उसका वर भी छोटा होगा वह आयु में उससे दुगना या तिगुना बङा भी हो सकता है। यदि वर व वधू दोनो की आयु छोटी होती है तब तो संभव है कि वधू  की विदाई उसके बङे होने पर की जाए परंतु यदि वर वयस्क है तब वधू की आयु  कितनी भी कम क्यों न हो उसकी विदाई तभी कर दी जाती है और वह तभी शारीरिक यौन प्रताङनों से गुजरने लगती है।
लङकी बाल विवाह के आंकङे राज्यानुसार इस प्रकार है:-

             मध्य प्रदेश-75%

             राजस्थान- 68%

               उत्तर प्रदेश-64%

              आंध्र प्रदेश-64%

               बिहार-    67%

देश के लङकी बाल विवाह में 72% लङकियाँ ग्रामीण प्रदेश की होती है। हमारे देश में 1.2 करोङ बच्चों की 10वर्ष से कम आयु में शादी कर दी जाती है।78.4लाख लङकियों की शादी 10 वर्ष से कम उम्र में हो जाती है।अतः ये 12वर्ष से कम आयु मे ही गर्भ धारण कर लेती हैं। सरकारी सूचनाओं के अनुसार बाल विवाह रोकने के लिए कानून बने हैं तथा सख्ती भी बरती जाती है।परंतु ये लोग छिपते-छिपाते बालक – बालिकाओं का विवाह कर ही देते है।राजस्थान में अक्षय तृतीया तिथि को बहुत शुभ दिन माना जाता है,अतः इस दिन अधिक विवाह संपन्न किए जाते है, बहुत रोकथाम व सख्ती के बावजूद विवाह हो जाते है।

अर्थात कहने का अभिप्राय यही है कि कानून बनाने व सख्ती करने के बाद भी सफलता नही मिल रही है, क्योंकि हम ग्रामवासियों की सोच बदलने में सफल नहीं रहे हैं।माना कि सोच बदलना आसान नही है पर 70वर्ष तो बहुत होते है। हमे दुःख है कि हमारा देश सोच के आधार पर कितना पिछङा देश है। क्या देश की प्रगति बङे-बङे उद्योगों, बङे बाजारों, बङे-बङे माॅल,मेट्रो इत्यादि से दिखती है।

हमारे देश के गाँव तो आज भी अविकसित है, फिर कैसे कहा जा सकता है कि देश की प्रगति हो रही है।आज भी हमारे देश की 68.84% जनसंख्या गाँवों में बसती है। हमारे देश की आत्मा यहीं है। परंतु दुःख के साथ कहना होगा कि हमारे देश की सरकारे  देश के ग्रामीण क्षेत्र के सुधार के लिए विशेष कार्य नही कर सकीं है।हमारे देश में 6लाख 49 हजार 4सौ 81 गाँव है। सबसे अधिक उत्तर प्रदेश में व सबसे कम चंडीगढ़ में है।

कहने को कहा जाता है कि हमारे देश के गाँवों में आधुनिक सुविधाएँ पहुँच चुकी हैं, वे बीती सदियों के गाँव नही हैं, परंतु यह पूर्णतः सच नही है। राजस्थान के गाँवों की औरतों को अभी भी दूर-दूर स्थानों से पानी लेने जाना पङता है। आज भी गाँवो में आधुनिक चिकित्सा सुविधाएँ उपलब्ध नही है। अगर चिकित्सालय खोल दिए गए हैं तो चिकित्सक नही है साथ ही दवाइयों और उपकरणों का भी अभाव पाया जाता है।गंभीर मरीजों को शहर ले जाना पङता है, जिसके लिए पर्याप्त साधन नही है, अस्पतालों मे एम्बुलेंस नही है जिससे मरीजों को सुरक्षा पूर्वक शहर के किसी सरकारी अस्पताल तक पहुँचाया जा सके। सही समय पर सही चिकित्सा न मिलने के कारण मरीज की मृत्यु भी हो जाती है।  कोई भी डाॅक्टर, डाॅक्टर बनने के बाद सिर्फ पैसा कमाना चाहता है, अतः वे गाँवों में जाकर चिकित्सालयों में काम करना पसंद नही करते है।ग्रामीणों के लिए सरकार जितना कार्य कर रही है, वह पर्याप्त नही है, परंतु क्या हम उनके लिए कुछ कर सकते हैं?

खेती से पर्याप्त आय न होने के कारण कृषक परिवार शहरों की ओर आ रहे है, जहाँ उनके परिवार का पालन ठीक से हो सके, वे एक शांति पूर्ण सुखमय जीवन का  सपना  ले कर आते है। परंतु  इन परिवारों के मर्द शीघ्र ही शराबखोरी की आदत के शिकार हो जाते है। नशा उनकी बुद्धि और सपना दोनो भ्रष्ट कर देते है। तब इन परिवारों की औरतें घर से बाहर मेहनत मजदूरी करने निकलती है। दिन भर मेहनत के बाद रात को नशेबाज पतियों की मार खाती है, फिर भी उसे भरपेट भोजन कराती है, जो सपना मिलकर देखा था, उसे पूर्ण करने की जिम्मेदारी  अकेले अपने कंधों पर उठाती हैं।

अब प्रश्न यह उठता है कि यदि हमारे गाँव आधुनिक गाँव है तो क्यों परिवारों को शहर की ओर पलायन करना पङता है? अगर गाँवों में ही सुरक्षित भविष्य हो तो किसान क्यों शहर आकर मजदूरी करें और गलत आदतों के शिकार बने।कभी बाढ़, कभी सूखा,ऐसी स्थिति में ये पुरूष किसान या तो आत्महत्या करते हैं या शहर आकर बुरी आदतों के शिकार होते हैं।हर स्थिति में किसान औरत ही परिवार की जिम्मेदारी उठाती है। वह अपने बच्चों को यूँ बेसहारा या भूखा नही रख सकती है।आज इतने सहस्त्रों वर्षों से क्यों हमारी कृषि वर्षा पर निर्भर है, ऐसे उपाय क्यों नही किए गए कि यह निर्भरता कम हो पाती।

          पर मेरा यही विषय है कि ये सब इन कमज़ोर औरतो को सहना पङता है।छोटी आयु में विवाह फिर हर वर्ष एक बच्चा या गर्भपात, उस पर भूख, कमजोर शरीर तो आत्महत्या नहीं पर इनकी हत्या तो हो ही जाती है।जिसके लिए सिर्फ सरकार नहीं, समाज भी जिम्मेदार है। समाज में सदियों से चली आ रही परंपराएँ ही इन्हें घूटती जिन्दगी देती है।

इन औरतों को मै दलित नहीं कहुँगी न कमज़ोर कहुँगी। बंगाल की रेवा व अंजलि के अपने गाँवों मे इनके परिवारों के अपने खेत है, चावल, धान की खेती होती है। अपने मकान भी है, परंतु इनके बच्चों का भविष्य वहाँ नहीं है, अच्छे विद्यालय, चिकित्सा सुविधाएँ कुछ भी उपलब्ध नही है।

मध्यप्रदेश की राजकुमारी, कमला, मीना इन सबके गाँवों में अपने खेत है, अपने मकान भी है, किसी के कच्चे, किसी के पक्के मकान है, पर रहने के लिए अपने स्थान है।जब गाँवों में काम नहीं होता, ये शहर आते है, कुछ धन कमाकर फिर कुछ समय के लिए गाँव जाते है, वहाँ अपनी खेती संभालते हैं। जिनके गाँवों मे विद्यालय हैं, उनके बच्चे वहीं पढ़ते हैं, पर उच्च शिक्षा के लिए शहर जाना पङता है। चिकित्सा सुविधा नाममात्र की है, अतः बच्चों की बीमारी की सूचना मिलने पर राजकुमारी गाँव को भागती है।गाँव में बङे बुज़ुर्ग है जो बच्चों को संभालते हैं। इन्हें शहर काम करने आना ही पङता है सिर्फ खेती से गुज़ारा नहीं हो सकता है।अगर पति भी मेहनतकश है, नशे से दूर रहता है, समझदार है तब तो पति-पत्नी मिलकर परिवार को संभाल पाते है।पर यदि नहीं तो………

बिहार की अनीता के गाँव में अपने खेत व पक्का मकान है, परंतु बच्चों का भविष्य नहीं है।कई वर्षों से शहर में रह रही है तो उसका राशन कार्ड व आधार कार्ड है, इसलिए बच्चों को सरकारी विद्यालयों में दाखिला मिल गया है। तीन बच्चों के बाद और बच्चे नहीं! वह अपने फैसले पर मजबूती और हिम्मत से दृढ़ रही। पति भी मेहनती है, अतः जीवन सही चल रहा है।

अब एक प्रश्न फिर कर रही हुँ जो न केवल आप सबसे अपितु अपने से भी कर रही हुँ। जब सरकारी तंत्र इन कमज़ोर असहाय स्त्रियों की एक सशक्त तरीके से सहायता नहीं कर पा रहा है, सामाजिक संस्थाओं के कार्य भी अच्छे परिणाम नहीं दे रहे हैं, तब हम क्या करें?   हम हमारे पास आने वाली इन कमज़ोर स्त्रियों की सहायता कर सकते हैं। हमें इनकी सहायता पैसे से नही करनी है क्योंकि ये आत्मनिर्भर व स्वाभिमानी औरतें हैं।हमें उनके जीवन में उन्हें नैतिक रूप से सहयोग देना है, उन्हें शिक्षित और जागरूक बनाना है।हमें इनकी सोच बदलने का प्रयास करने चाहिए। चूंकि यह समस्या गरीबी से अधिक अशिक्षा की है।अतः सर्वप्रथम इन लोगों को शिक्षित और जागरुक बनाना है। हमें अपने व्यस्त समय से अपने इन देशवासियों के लिए थोङा समय निकालना है।

​ किसकी चोट

किसका दर्द गहरा? तुम्हारा या मेरा?
किसकी तकलीफ अधिक गहन?

तुम्हारी या मेरी?

किसने किसको अधिक चोट पहुँचाई?

तुमने या मैंने?

जो भी कहो- 

दर्द में तो हम दोनो ही है।

लेकिन तुम तो सांमतवादी रहे,

चोट पहुँचाना तो सिर्फ तुम्हारा अधिकार रहा ।

मैंने तो बस अपना बचाव किया, और!

तुम इसी में चोटिल हो गए,

 ऐसे क्या देखते हो?

ओह! तुम तो अपने को प्रगतिवादी कहते रहे।

पर मेरे सामने तो तुम सामंतवादी ही रहे न!

जब भी जिस रूप में आए-

पिता, बङा भाई, छोटा भाई, पति और पुत्र भी।

तुम्हारे अधिकार,सिर्फ अधिकार

मेरे अधिकार भी मेरे कर्तव्य,

तुम्हारे प्रति मेरे कर्तव्य,

चाहे जिस रुप में तुम मिलो।

कर्तव्य में हो जाए कमी तो?

तो तुम मुझे प्रताङित करते रहे-

(सामाजिक, आधिकारिक व वैयक्तिक प्रताङना भी।)

चाहे जिस रुप में मैं तुम्हें मिली-

पुत्री, बङी बहन, छोटी बहन, पत्नी और माँ भी।

तो फिर किसका दर्द गहरा?

मैं? जो सदियों से प्रताङित होती रही।

या तुम?

मैंने तो सिर्फ अपना बचाव ही किया था।

और तुम चोटिल हो गए।

​           यादें

आज फिर यादों ने जगाया मुझे,
मुझ से मेरे बचे बकायों का हिसाब मांगा,

कैसे दूँ हिसाब? अभी तो चुकाने का सोचा भी नहीं,

कहाँ से करूँ हिसाब? बकायों की लिस्ट लंबी जो रही।

समय गुजरता जाता है, मैं डर से आँखें मीचे पङी हुँ,

ये यादें भी ना जाने कौन-कौन से बकायें ढूंढ  के सामने ला रही है,

वो जिन्हें मैंने अपना बचपना समझा था,

वो जो लगा था, यह तो अधिकार था मेरा

पता नहीं किस-किस से रुठी मैं,

पता नही कब-कब, किस- किस को नाराज़ किया मैने,

मैने सवाल किया, वो बचपना था मेरा, बकाया कैसे बन गया?

यादें हँस कर बोली, भूल गई? तब भी तो दिल दूखा था किसी का।

जब भी तुम से किसी दिल को चोट पहुँची, वो चोट तुम्हारी बकाया बन गई।

मैं सिर पकङे बैठी थी, फिर पूछा, और मेरा दिल? वो भी तो टूटा कई बार,

 ये तो सब करते न! फिर मेरे बकाए इतने क्यों?

यादें फिर जोर से हँसी, बोली, यादें हम तुम्हारी है किसी और की नही।

तुमने ही हमें अपने दिल में बसाया 

आज फिर यादों ने जगाया मुझे।

एक सच्चाई- एक सोच (भाग-2)

कुछ दिन पहले खबर आई कि सुमन अब इस दूनिया में नहीं रही है। सुमन? वही सुमन जिसकी 12 वर्ष की आयु में शादी हो गई थी और उसने 14 वर्ष की आयु में पहली संतान को जन्म दिया था। अब उसकी आयु 34 वर्ष की थी, पांच बच्चे है, बङी दो लङकियों का विवाह उनकी 16-17वर्ष की आयु में कर दिया था, उसके बाद वह दो बेटे और एक बेटी को बेसहारा छोङ गई है। 

मृत्यु का कारण? वह गर्भवती थी, तीन महीने के गर्भ को गिराना चाहती थी, अतः बिना डाक्टर की सलाह के उसने कोई भी दवाई खाली, बच्चा तो पेट में ही मर गया जिसके ज़हर से सुमन भी नहीं बच सकी थी। पिछले 20 वर्ष से वह यही कर रही थी या तो बच्चों को जन्म देती या गर्भपात कराती थी। पता नही सुमन किसी डाक्टर के पास क्यों नही गई, कोई गर्भनिरोधक उपाय क्यों नही करें? आजकल तो मुफ्त ही सरकारी चिकित्सा व्यवस्था मिलती है। सुमन गाँव की लङकी थी, पर शहर में रहती थी, अच्छे पढ़े-लिखे लोगों के घर काम करती थी। ऐसा तो हो नहीं सकता कि उसे गर्भ निरोधक उपायों के विषय में पता नहीं हो,अवश्य पता होगा, लेकिन फिर भी ऐसा क्यों हुआ होगा? इस मृत्यु को क्या कहें? दूर्घटनावश मृत्यु, मुर्खतापूर्ण कदम, आत्महत्या या हत्या।

इन सब का फैसला करने से पहले हम सरकारी आंकङों पर एक नज़र डालते है? मातृ मृत्यु दर व शिशु मृत्यु दर कितनी है और बाल विवाह के आंकङो को भी समझ लेते है।

WHO की रिपोर्ट के अनुसार हमारे देश मे प्रतिवर्ष 1.36 लाख महिलाओं की मृत्यु होती है। हर साल 4लाख शिशुओं की मृत्यू 24 घंटे के अंदर हो जाती है। शिशु मृत्यु दर में भारत का विश्व में स्थान पांचवाँ है भारत इस स्तर में अफ्रीकी देशों से भी पीछे है।भारत में सबसे ज्यादा मातृ मृत्यु दर वाले प्रदेशों में सबसे अग्रणी असम, उत्तरप्रदेश व उत्तराखंड है। भारत विश्व के उन 10देशों मेः आता है जहाँ मातृ मृत्यु दर बहुत अधिक है।

मातृ मृत्यु दर और शिशु मृत्यु का मुख्य कारण है कि लङकी का छोटी आयु में विवाह व छोटी ही आयु में गर्भधारण करना। उसके पश्चात जल्दी-जल्दी गर्भवती होना, जिससे लङकी का कच्चा शरीर और कमज़ोर होता जाता है। इसके कारण गर्भपात भी होते हैं। अधिकांशतः ग्रामीण व आदिवासी क्षेत्रों में पूर्णतः व सुचारू रूप में चिकित्सा सुविधा न होना भी माँ व शिशु की मृत्यु के कारण होते है। माना यह जाता है कि देश में पहले से मातृ मृत्यु दर और शिशु मृत्यु दर में कमी आई है। परंतु हम जानते हैं  कि अभी भी स्थिति बहुत दयनीय ही है। हम अभी भी अपने ग्रामीण वासियों और आदिवासियों की सोंच में बदलाव लाने में असफल रहे हैं। अभी भी वहाँ घर पर दाई द्वारा प्रसव कराने को महत्व दिया जाता है तथा वे सरकारी सुविधाओं का भी लाभ नहीं उठाते हैं। हमारे प्रचार तंत्र में अभी बहुत कमी है, लोगों को जागरूक करने में हम असफल रहे हैं, लोग अपनी परिपाटियों की सोच को बहुत गहरे पकङे है।सिर्फ कानून और योजनाएँ बनाने से फर्क नहीं पङ सकता है। सरकार व सामाजिक संस्थाओं को अपने प्रचार व जागरूकता अभियान में तेजी लाने की आवश्यकता  है।

वे ग्राणीण दलित स्त्रियाँ जो जीवनयापन के लिए शहरों में आती हैं, उन्हें तो समस्त चिकित्सा सुविधा सरकारी अस्पतालों में प्राप्त हो सकती है। फिर भी वह प्राप्त नहीं करती हैं, जैसे सुमन। सच्चाई यह है कि सरकारी तंत्र व सामाजिक संस्थाएँ इन स्त्रियों की मानसिकता को बदलने में असफल रहे हैं। ये स्त्रियाँ घर से बाहर आकर काम भी करती है अर्थात ये औरते आत्मनिर्भर होती हैं, पर इनके पति शराबी व कामचोर होते हैं। पूरे परिवार का पालन पोषण इन स्त्रियों पर ही निर्भर होता है।इस सबके पश्चात भी स्त्री पुरूष की मानसिकता का सामना नहीं कर पाती है। यह जानते हुए भी कि बार-बार गर्भ धारण करना उनके स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है अतः उसके लिए उपाय किए जा सकते है, वे ऐसा नहीं कर पाती हैं क्योंकि उनके पति व परिवार के अन्य सदस्य(सास-ससुर) उन्हें ऐसा नहीं करने देते हैं, ये औरते अपने लिए लङते-लङते मर जाती हैं। अतः इन स्त्रियों के साथ इनके पति व परिवार के अन्य सदस्यों को जागरूक करना बहुत जरूरी है।इन औरतों में इतनी हिम्मत नहीं होती कि पति की अनुमति के बिना गर्भनिरोधक उपाय अपना सकें। इनके परिवारों भें घरेलू हिंसा साधारण बात है,पर यह बात इतनी भी साधारण नहीं है, ये कभज़ोर औरतें स्वास्थ्य से कमज़ोर होने के साथ-साथ पतियों से मार खाते हुए, शारीरिक चोटें खाती हुई और कमज़ोर होती जाती है साथ ही अपना मनोबल भी खोती जाती हैं, अतः पति का विरोध नहीं कर पाती व गर्भनिरोधक उपाय नहीं अपना पाती हैं।पतियों को फर्क नहीं पङता उनके कितने भी बच्चे पैदा हो जाए क्योंकि उनकी परवरिश की जिम्मेदारी से उन्हें सरोकार नहीं होता है।