(नए मकान नए परिवेश) (भाग- त्रयोदश) (लखनऊ)

हम एक ही वर्ष लखनऊ रहे थे। समय बहुत अच्छा बीता था। पर वहाँ एक दुखद घटना घट गई थी।

हमारे घर के ठीक सामने प्रोफेसर साहब का मकान था। वह लखनऊ विश्वविद्यालय में इंग्लिश के प्रोफेसर थे। परंतु ग्रामीण परिवेश के कारण उनकी पत्नी कम पढ़ी-लिखी थी। प्रोफेसर साहब में अपने ज्ञान का बहुत दंभ था । अपनी पत्नी को वह सम्मान की दृष्टि से नहीं देखते थे। पैसे की कोई कमी नहीं थी, फिर भी उनकी पत्नी इधर-उधर पैसे मांगती नज़र आती थी। अपने पति से क्षुब्ध होने के कारण उनका व्यवहार बहुत अजीब व अटपटा दिखता था। फिर भी वह अक्सर मेरे पास आती थी और अधिकांशतःअपने पति व बङे बेटे के विषय में बात करती थी।

उनके दो बेटे और एक बेटी थे।बङा बेटा 16 साल का था, दसवीं में पढ़ता था, बेटी 10 वर्ष की थी, छोटा बेटा सिर्फ 3वर्ष का था।
श्रीमती प्रोफेसर का कहना था कि प्रोफेसर साहब को जितना अपनी बेटी व छोटे बेटे से प्यार हैं,उनसे आधा भी वह अपने बङे बेटे से प्रेम नहीं रखते हैं ।

वहाँ सभी पङोसनों का यही विचार था कि श्रीमती प्रोफेसर के कारण उनका घर बर्बाद हो रहा था।मुझे उनसे दूर रहने की सलाह दी गई थी । अतः मैं सिर्फ उनकी श्रोता थी। प्रोफेसर ज्ञानी पुरूष थे(अथार्त दुनियावी ज्ञानी)। पूरे मोहल्ले में उनका बहुत मान था, यह जानते हुए भी कि प्रोफेसर साहब अपने बङे बेटे के साथ बहुत सख्त है, लोगों को कमी श्रीमती प्रोफेसर में ही लगती थी।

श्रीमती प्रोफेसर की कहानी तो उन्होंने स्वयं सुना ही दी थी, परंतु जो कुछ भी उन्होंने बताया था और जो कुछ भी वहाँ घटा था, उसके बाद और आज भी जब विचार करती हुँ तो ऐसा मानती हुँ कि अपने बेटे की मृत्यु के लिए अगर कोई जिम्मेदार थे तो वह प्रोफेसर ही थे।

श्रीमती प्रोफेसर तो प्रोफेसर साहब के सख्त व्यवहार व अनुशासन से विद्रोही हो गई थी, पर बङे पुत्र के साथ जो भी बीतता था, उसका विरोध करते हुए भी रोक नहीं पाती थी, प्रोफेसर साहब के लिए उनकी पत्नी अनपढ़ समान थी। बङे पुत्र को बचपन से वह स्वयं पढ़ाते थे, छोटी से छोटी गलती पर भी कङी से कङी सजा देते थे।

उन्होंने बताया था कि बेटा 9-10 वर्ष की आयु में पिता की सख्ती से घबराकर घर से भाग गया था, पर किसी प्रकार ढूँढ लाया गया था।

प्रोफेसर साहब की सख्ती में विशेष फर्क नहीं पङा था। बाद में छोटे भाई-बहन का अधिक लाड होता देख वह और भी क्षुब्ध हो गया था।पिता को अपने बङे बेटे से इतनी उम्मीदें थी कि उसके प्रति उनका प्रेम कहीं दलदल में फंस गया था और साथ ही बेटा भी उसमें धंसता जा रहा था।

पिता की सख्ती ने लङके को बहुत सहमा दिया था, ऊपर से सहमापन उसे अंदर से विद्रोही बना रहा था। पर काश यह विद्रोह सही राह पकङ पाता।

उसने माँ से कह दिया था कि पिता की सख्ती ऐसी ही रही तो वह चिन्ता न करें,वह घर से भागेगा नहीं , चूंकि वह जानता है, पिता उसे ढूंढ लाएंगे ।

माँ को बिना बताए आने वाला संकट शंकालु कर देता है।
माँ का मन आशंकित तो हुआ था । शायद इसीलिए वह सबको अपनी कहानी सुनाती थी, पर कौन समझता है? कौन किसके पचङे में पांव फंसाता है। एक औरत का यूं दर-दर पति की आलोचना करना अच्छा गुण नहीं माना जाता है।

वह पढ़ाई में मन नहीं लगा पा रहा था, प्रोफेसर साहब की जिद कि उन जैसे ज्ञानी का पुत्र पढ़ाई में पीछे कैसे रह सकता है? नतीज़न अर्धवार्षिक परीक्षा में फेल होने पर उसने अपने को घर में ही खत्म कर लिया था। माँ ही नहीं पिता भी हाथ मलते रह गए थे।

इस घटना ने सभी को हिला दिया था, पर लोग नहीं बदले थे, दो महीने बाद होली पर, श्रीमती प्रोफेसर ने बेटी को होली खेलने भेज दिया था, शाम को भी वह बच्ची जब अपने नए वस्त्र पहन, सहेलियों के साथ घूमने निकली तो आस-पङोस उस माँ पर प्रश्न उठा रहा था, कैसे वह बङे बेटे के गम को अनदेखा कर, अपने छोटे बच्चों का मन पूरा कर सकती हैं।
लोगों के उलाहने व दुनियावी परंपराएं कहाँ किसी का दर्द समझ पाते हैं ?

जो ऐसे ही चले जाते हैं

वो सब जो चले जाते हैं,
कितना दर्द छोङ जाते हैं ,
वो सब जो ऐसे ही चले जाते हैं
छटपटाती आत्माएँ , बिलखते दर्द ,
क्या वो देख पाते हैं ?
नासूर बनते हैं , जख्म उनके,
जिन्हें वो पीछे छोङ जाते हैं ।

(नए मकान नए परिवेश) (द्वादश) (पांचवा मकान) (लखनऊ)

लखनऊ को नवाबों का शहर कहा जाता है। प्राचीन काल में इसे लक्षमणपुर कहा जाता था। माना जाता है कि अयोध्या के श्रीराम ने अपने छोटे भाई लक्ष्मण को लखनऊ भेंट किया था।
लखनऊ के वर्तमान स्वरूप की स्थापना नवाब आसफद्दौला ने 1775 में की थी।1850 में अवध के अंतिम नवाब वाजिदअली शाह को ब्रिटिश की अधीनता स्वीकार करनी पङी थी।
यह भारत के सर्वश्रेष्ठ आबादी वाले राज्य उत्तर प्रदेश की राजधानी है। इस शहर के बीच गोमती नदी बहती है।
लखनऊ शहर अपनी खास नज़ाकत और तहज़ीब वाली बहु सांस्कृतिक खूबी के लिए जाना जाता है।यहां संगीत और साहित्य को हमेशा संरक्षण दिया गया है।कत्थक नृत्य का यही केंद्र है। हिंदी कवि गोष्ठियाँ और उर्दू के मुशायरे दोनों ही इस शहर की पहचान है।
मोतीमहल, बङा इमामबाङा, हजरतगंज मार्केट यात्रियों के आकर्षण बिंदु है। इसे पूर्व का स्वर्ण नगर और शिराज़-ए-हिंद भी कहा जाता है । टूंडे कबाब और मक्खन मलाई मिष्ठान विशेष लजीज है
यह दशहरी आम के बागों तथा चिकन की कढ़ाई के काम के लिए भी जाना जाता है।
यहां की हिंदी का लखनवी अंदाज़ विश्व प्रसिद्ध है। मेरी ताई लखनऊ में जन्मी थी। पर बरसों दिल्ली
में रहने के पश्चात भी उन्होंने अपनी लखनवी बोली को अपनी ज़ुबान से मिटने नहीं दिया था। मैं हमेशा उनकी भाषा से प्रभावित रहती थी।

लखनऊ एच. ए. एल काॅलोनी में श्री श्रीवास्तवा के मकान को हमने किराए पर लिया था। वह अपनी पत्नी सहित हमसे मिलने आए थे। हम भी एक बार उनके घर गए थे। उनके चार बेटियाँ थी, उनकी पत्नी बहुत चुप और तनाव में रहती थीं ।
अधिकांशतः देखा गया है कि औरतें ही पुत्र न होने का दुख पालती हैं। इसके विपरीत श्रीवास्तवजी खुश रहते थे। अपनी बेटियों को उच्च शिक्षा दिला रहे थे।
सिर्फ एक माँ को नहीं सुनना पङता पिता को भी समाज पुत्र न होने के ताने देता है। मुझे एक परिचिता ने बताया था कि उसे पुत्र का दबाव न पति की ओर से था, न सास-ससुर की ओर से था। पर पति के दोस्त उनका मज़ाक बनाते कि वह एक भी पुत्र पैदा नहीं कर सका है। एक सामाजिक मिथ है कि पुत्र जन्म भी पुरूषत्व की पहचान है। पति परवाह नहीं करते थे व ऑपरेशन करने की सलाह देते थे । परंतु अब वह अपनी जिद और पुत्र की आशा में पांच बेटियों की माँ थी।
पति का नाम पुत्र से ही चलेगा, ऐसी उसकी तमन्ना थी। अपने नाम की चिन्ता नही , पर पति का नाम पीढ़ियों तक चले वाह री, परंपरा !

लखनऊ के मकान में मैं बहुत खुश थी। स्वतंत्र मकान ( कोई अन्य परिवार साथ नहीं )। दो कमरे, साथ में किचन, बाथरुम ,बीच का स्थान डाइनिंग के लिए प्रयोग में आता था। चारों तरफ लाॅन, पीछे की ओर हमने कुछ सब्जियां उगाई थी।आगे टमाटर, गुलाब, गेंदे के पौधे, पपीते का पेङ भी था। हरी-हरी घास पर बैठना अच्छा लगता था। शाम को सेतु बाहर खेलता, मैं वहीं बगीचे में मिंटू के साथ बैठती थी। मिंटू घूटनों चलता और लाॅन में बहुत खुश रहता था, टमाटर तोङ कर खाता था। सर्दियों में भी धूप में बहुत आनंद आता था। सुबह-शाम पेङ पौधों में पानी डालना बहुत अच्छा लगता था।

वहाँ सभी मकान एक – समान बने थे, सभी ने बहुत सुंदर लाॅन बनाए थे । हमारे मकान में किराएदार ही रहते रहे थे, इसीलिए लाॅन एरिया का फर्श अच्छा नहीं बना था। हमारा मकान जैसा अलाॅट किया गया था, वैसा ही था, उसमें कुछ सुधार नहीं किया गया था। बाकी सभी मकानों में सुधार हुआ था। किसी-किसी का लाॅन तो बहुत सुंदर था, कुछ ने माली रखा था और कुछ महिलाएं स्वयं संभालती थी। हमारे सामने श्रीमती सिंह ग्रामीण परिवेश से संबंध रखती थी, बागबानी की अच्छी जानकारी रखती थी। वह प्रतिदिन अपना कुछ समय बागबानी में लगाती थी। एच. ए. एल के सभी कर्मचारी सुबह 7 बजे ऑफिस चले जाते थे। उसके बाद महिलाएं अपना घर व बगीचा संभालती थी।

सिंह भाभी के दो लङके व एक लङकी थी। लङकी का नाम डौली था, सबसे पहले वह ही हमसे मिलने आई थी।सेतु मिंटू को उसका साथ अच्छा लगता था। वहाँ आसपास अधिकांशतः लङकियाँ थी, आरंभ में सेतु को उनके साथ खेलना अच्छा नहीं लगता था। बाद में वे सब लङकियाँ उसे अपने साथ ले जाती थी। सेतु का बातचीत का लहजा भी लखनवी हो गया था। कुछ समय बाद सेतु को एक हमउम्र दोस्त मिला था ‘करण’।

इस काॅलोनी में सभी लोग बहुत मिलनसार थे। कई लोग हमसे मिलने स्वयं आए थे। त्योहारों का आनंद तो हमने लखनऊ में ही जाना था। दीपावली की शाम को सभी लोग समय से तैयार हो कर अपने घरों से बाहर निकल आए थे। हम नए थे, तो सभी हमें विशेष रूप से मिलने आए थे, बाहर बुला कर ले गए थे।सबके साथ दीवाली मनाने में बहुत आनंद आया था। कोई औपचारिकता नहीं थी, न ही दिखावटी आवभगत और चमकदमक थी, सिर्फ अपनापन था।
होली पर भी सभी महिलाएं मुझे बुलाकर ले गई थी। मैं पहली बार महिला टोली के साथ घर-घर होली मनाने गई थी। सेतु बच्चों की टोली में था और एस. के. पुरूषों की टोली में गए थे। मुझे बहुत आनंद आया था।ऐसी होली मैंने कहीं नहीं खेली थी। कोई व्यर्थ का छिछलापन नहीं था, एक अत्यंत सुरक्षित व स्वस्थ वातावरण में सिर्फ गुलाल से खेली थी होली।
शाम को भी सेतु को सब बच्चे अपने साथ ले गए थे। हर घर में बच्चे जाते खाते- पीते मस्ती कर रहे थे। सेतु भी बहुत खुश था। मम्मी-पापा के बिना मित्र टोली में घूमने का उसका अनुभव बहुत आनंददायक था।

थोङे समय में ही कुछ परिवारों के साथ मेरा अच्छा मेलजोल हो गया था। सामने श्रीमती सिंह, उनके पङोस में एक हिमाचली परिवार था, नाम याद नहीं, पर उनसे बहुत ही स्नेहिल संबध बने थे।

हमारे साथ श्रीमती कानपाल रहती थी। अध्यापिका थी, उनके व्यक्तित्व से मैं बहुत प्रभावित थी। उनके बच्चे भी छोटे थे। उनका संयुक्त परिवार था। वह बच्चों के बालपन से ही उनके स्वतंत्र व्यक्तित्व विकास को महत्व देती थीं बच्चों को स्वयं पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करती थी। बच्चे अपने होमवर्क स्वयं करें, अपने काम स्वयं करें।मुझे भी सही लगा था कि बच्चों को आरंभ से जिम्मेदार बनाना आवश्यक है। सेतु और उनके बच्चे शाम को बाहर साथ खेलते थे। मैं तब भी उन पर ध्यान देती थीं। वह कहती थी मै आपके कारण निश्चित रहती हुँ।

यह शहर अलग था,
इसकी नज़ाकत, नफासत अनोखी थी।
इसकी संस्कृति अपनत्व से भरी थी।
एक नई तहज़ीब भरी जीवन सीख थी।

क्रमशः

(नए मकान नए परिवेश) (भाग- एकादशम्) (मामी जी)

गुङगांव जीवनयात्रा मामी जी के बिना पूर्ण नहीं हो सकती है।
अपितु यूं कहना चाहिए कि मामीजी के बिना मेरा जीवन वृतांत अधूरा है।
कुछ रिश्तों का संबध आपके पूर्वजन्म से होता है।मामीजी से मेरा रिश्ता भी हमारे पूर्वजन्म से जुङा है।
हमें छाबङा साहब के मकान में शिफ्ट हुए अधिक समय नहीं हुआ था, छाबङा साहब भी तब दिल्ली शिफ्ट नहीं हुए थे।

उस उतरती शाम को जब अंधेरा धीरे-धीरे गहराने लगा था, मैं रसोई में रात के खाने की तैयारी में लगी थी, तभी एक आवाज़ मीठी पर जोरदार थी, मेरे कानों तक पहुँची थी। मैं हैरान थी, कोई मेरा नाम पुकार रहा था।

“क्या यहाँ कोई शिखा रहती हैं?” मेरा नाम! स्पष्ट उच्चारण !साथ में सम्मान की महक भी थी। मैं सोच रही थी कि गुङगांव में कौन मुझे मेरे नाम से पुकार रहा है? मेरा नाम तो पतिदेव भी नहीं पुकारते थे!

रसोई से बाहर आई, देखा एक सांवली महिला आयु लगभग 35-40 की होगी, गैलरी में खङी थीं। हँसते हुए उन्होंने पुछा,” आप शिखा? शांति जीजी की बेटी हो न!” मैंने उत्तर दिया “हाँ” और तुरंत याद आया कि गोपाल मामा (मम्मी का मायका जयपुर का है।) की ससुराल गुङगांव की है और मम्मी कह रही थी कि मामा से उनकी ससुराल का पता पूछकर मुझे बताएंगी।

यानि यह महिला गोपाल मामा की सरहेज (साले की पत्नी) थी। नाम- मीरा। हमारे लिए तब से मामी जी हो गई थी।वह अपने ननद और ननदोई के आदेश पर मेरी खैर खबर लेने आई थी।रिश्ता दूर का है, पर वह अपनों से भी बढ़कर है।

गुङगांव में जब भी मायके की याद आए, तो पहुंच जाती थी, ‘मामीजी के घर’। तब उनके पति अथार्त मामाजी(गोपाल मामा के साले) से अधिक परिचय नहीं हो पाया था। मामीजी की सास जो अब मेरी नानी थी, हम से बहुत प्यार से मिलती थी और हम से मिलकर बहुत खुश होती थी।

मिंटू के जन्म की कहानी भी मामीजी के बिना अधूरी है। मेरी तबियत अचानक खराब हो गई थी।टेलिफोन के साधन भी बहुत सुगम नहीं थे, अतः मम्मी भी तुरंत नहीं आ सकती थीं ।
उस वक़्त मामीजी सारी रात मेरे पास रही थी, दिलासा देती रहीं थी।
सुबह-सुबह अपने घर जाकर बच्चों को स्कूल भेज कर वापिस आई थीं और मेरे पास हास्पिटल में रहीं थी, दर्द के समय ऐसा लग रहा था, मेरी माँ मेरे पास है। मिंटू को सबसे पहले उन्होंने ही गोद मेें लिया था।

आज भी उनका टेलिफोन आ जाए, तो लगता है, मन की सारी चिन्ताएं दूर हो गई हैं ।वह जीवन की अनमोल सीखें बातों-बातों में समझा जाती हैं ।

हम दोनों ने ही एक- दूसरे के जीवन- संघर्ष को बहुत करीब से जाना व समझा है। मैं बहुत कम बोलती हुँ, फिर भी मामी जी बिना कहे मेरे मन की व्यथा समझ जाती हैं । अब मिलना इतना सरल नहीं रह गया है, फिर भी जब संभव होता है,हम फोन पर अपना हाल सुन समझ लेते हैं। सेतु की शादी में मामीजी का सहयोग ऐसा था कि जैसे मम्मी की कमी पूरी कर दी हो।

ऐसा लगता है कि पिछले जन्म में वह अवश्य मेरी माँ या बङी बहन होगी।

रिश्ते अनाम होते हैं,
रिश्ते पहचान होते है,
हमारे मन की साध के,
हमारे दिल के अरमान के,
यह तो जन्मांतर होते है।

1990 अगस्त में हम गुङगांव से लखनऊ की ओर बढ़ चले थे। मामीजी व सभी पङोसियों से भावभीनी विदाई ली।

आज फिर अपनी कुछ निशानियाँ, अजनबियों के लिए छोङ,
यह खानाबदोश आगे बढ़ चले हैं।

(नए मकान नए परिवेश) भाग-दशम् (हमारे पङोसी-2)

ये चाँद बीते ज़मानों का आईना होगा,
भटकते अब्र में चेहरा कोई बना होगा,
उदास राह कोई दास्ताँ सुनाएगी,
करोगे याद तो, हर बात याद आएगी।

सेठी साहब की बङी बेटी दिल्ली रहती थी, अक्सर छुट्टियों में आती तो उसकी बेटी हनी हमारे घर भागी आती थी।सेतु और हनी हमउम्र थे। दोनों में बहुत अच्छी दोस्ती थी।
उनके किराएदारों से भी हमारे अच्छे संबध थे।

उस समय हम इसी मकान में नए आए थे, तब एक दिन एक पतली- दुबली सांवली 18-19 साल की लङकी एक बच्चे को ढूंढते हुए, हमारे घर आई थी, उसकी गोद में एक 2 वर्षीय बेटी भी थी, मैंने पुछा, ” कितना बङा बेटा है?” वह बोली,”चार साल” और मुझे हैरानी में छोङ चली गई थी।

पर उससे अधिक अचंभित छाबङा आंटी के वक्तव्य ने कर दिया था, बोली,” सौतेली माँ कहाँ बच्चों का ध्यान रख पाती हैं।” 18वर्षीय बच्ची और सौतेली माँ! बहुत अजीब लगा।

छाबङा आंटी ने कहानी बताई , ” यह तो इन दोनों बच्चों की मौसी है। इसकी बङी बहन बहुत सुंदर थी, जैसे पहाङी लोग होते हैं । यह तो सांवली है, कैसे भी हिमाचली नहीं लगती है।
एक बारिश के दिन इसकी बङी बहन अपनी बेटी को घर पर सुलाकर, अपने बेटे को स्कूल लेने गई थी। रास्ते में बिजली के खंभे से लटकते तार से उसका छाता टकरा गया और करंट के कारण उसकी तुरंत मृत्यु हो गई थी।

बङी बहन की मृत्यु के बाद, इसके जीजा से इसका विवाह कर दिया गया था। माता- पिता नहीं है और भाई- भाभी ने अपना बोझ इस तरह उतार दिया था। ”

पर जीजा जो अब उसके पति थे, अच्छे थे। उन्हें संध्या (सौतेली माँ) से शादी का गिल्ट भी था। गांव का रिवाज़ और बच्चों की परवरिवश की समस्या भी थी। फिर सोचा, मौसी ही सौतेली मां होगी तो बच्चों को प्यार मिलेगा।

यह -छोटी-सी सौतेली माँ, को बङी बहन से ही माँ का प्यार मिला था।वह भी उसके बच्चों के प्रति संवेदनशील थी।

थोङे दिनों में वह मेरी अच्छी दोस्त बन गई थी।
वह बच्चों को लेकर मेरे पास आ जाती थी। और अपने मन का हाल कह जाती थी।
यह पहाड़ी ग्रामीण कन्या थोङी-बहुत शिक्षित थी।पर शहरी रिवाजों से परिचित नहीं थी।मेरा भी उससे स्नेहपूर्ण लगाव हो गया था।

उसने बताया कि जब बङी बहन की शादी हुई, उस समय वह बहुत छोटी थी।जीजा को अब इसे पत्नी के रूप में स्वीकार करने में हिचक थी, दिवंगत पत्नी का शोक और उसकी यादें इतनी जल्दी कैसे मिट सकती थी।

वह बताती कि आरंभ में उसे सब संभालने में बहुत कठिनाई आ रही थी। पर पति उससे कोई शिकायत नहीं करते थे व स्वयं सब संभालते लेते थे। उससे कहते, ” तु भी तो बहुत छोटी है।”

पर संध्या खुश थी, गांव का वातावरण खुला होने पर भी बंदिशे थी। धीरे-धीरे वह सब सीख रही थी।

कुछ दिनों के बाद उसके पति का स्थानांतरण हो गया था। मुझे उसके जाने का दुःख था तो खुशी भी थी, उसका परिवार अपने दुखद अतीत की गली से निकल गया था। इस गली में उसकी तुलना बङी बहन से की जाती थी और उसकी पहचान सिर्फ एक सौतेली माँ के रूप में ही थी।

मुझे खुशी थी कि उसने अपने इस नए जीवन को अपना लिया था और उसे समझदार पति से एक अच्छी समझ मिली थी।

उनके जाने के बाद सेठी अंकल ने उस हिस्से को वधवा भाभी को दिया था। उनके दो बच्चे थे, इंदू 10 वर्ष की और अमित 8 वर्ष का था। इस मकान में आते ही वह फिर गर्भवती थी। वह बहुत शर्म व झिझक महसूस कर रहीं थी। हमने उन्हें समझाया था कि वह अपने तीसरे बच्चे का स्वागत प्रसन्न मन से करें ।

वह बहुत सुघङता से घर संभालती थी।सरकारी कर्मचारी के वेतन में घर चलाने के लिए बहुत सुझ-बुझ चाहिए। सीमित आय में खर्चे भी सीमित रखने होते है। एक गृहणी के लिए आवश्यक नहीं कि वह नौकरी करे, एक गृहणी भी नौकरी कर सकती है। पर अपने घर व बच्चों पर पूर्ण ध्यान देने के लिए वह नौकरी का विचार त्याग देती है। बहुत कम होते है, जो महिलाओं के इस त्याग का सम्मान करते हैं।

मिसेज वधवा सभी काम स्वयं करती थी, शिक्षित थी, बच्चों को ट्यूशन न भेजकर स्वयं पढ़ाती थी। वधवाजी अपनी पत्नी के सहयोग का सम्मान करते थे व घर के कामों में उनकी मदद भी करते थे।
वह मुझे भी घर संभालने की सीख देती थी।

अभी उनका सबसे छोटा बेटा अजय एक वर्ष का भी नहीं हुआ था कि एक दुर्घटना में वधवा साहब के दिमाग में चोट लगी थी, वह अपनी याददाशत भूल गए थे, कई दिन अस्पताल में रहे थे। मिसेज वधवा ने मुस्कराते हुए, हिम्मत के साथ इस कठिन परिस्थिति का सामना किया था।

1990 में जब हम लखनऊ गए तो उनसे बिछुड़ने का वाकई दुख था। बाद में गुङगांव लौटने पर उनसे मुलाकात हुई थी। वही सादगी, वही अपनापन, जीवन की जद्दोजहद को इतनी सरलता से स्वीकार किया था कि चेहरे को देखकर लगता था, आयु वहीं ठहर गई हो।

हम1986-1990 तक छाबङा अंकल के मकान में ही रहे थे। गली में सभी से अच्छा मेलजोल हो गया था। हम प्रति वर्ष जून मास में रामायण पाठ करते थे, तब सभी गली के लोग आते थे। सेतु के चौथे जन्मदिन पर भी पूरी गली आई थी। ये सभी पङोसने आयु में मुझ से बङी थी, इन सभी ने मुस्कराते हुए यह आशीर्वाद दिया कि “अब सेतु का कोई भाई- बहन आना चाहिए।”
आशीर्वाद फलीभूत हुआ और मिंटू प्रसाद स्वरूप मिला था।

आज भी सबके स्निग्ध चेहरे आँखों के सामने से गुजर रहे हैं ।

बरसता-भीगता मौसम धुआँ-धुआँ होगा
पिघलती शमों पे दिल का मेरे गुमां होगा।
हथेलियों की हिना, याद कुछ दिलाएगी,
करोगे याद तो, हर बात याद आएगी।

आस्था की मम्मी से भी मधुर संबध बने थे। उनके बगल में वह विधवा अध्यापिका, मिसेज मेहरा सादगीपूर्ण सुंदर व सौम्य चेहरा। सिर्फ मैं नहीं सभी कहते सुंदरता इसे कहते हैं ।

उनके साथ के घर में थी मिसेज खन्ना, दोनों पति- पत्नी अध्यापक थे। विद्यालय से आकर थोङा आराम करके, वह घर के सभी काम करती थी। कहती, ” कामवाली आप लोग रखे, हम अगर इनका इंतजार करती रहीं, तो नौकरी नहीं कर सकते हैं ।
उनके सामने बुजुर्ग चौपङा दंपत्ति थे, जब भी मिलते आशीर्वाद की वर्षा करते थे। हमारी धार्मिक निष्ठा की प्रशंसा करते थे।

हमारे घर के ठीक सामने मास्टर जी का मकान था। उनका मकान बहुत सुंदर बना था। उनके एक बेटा व एक बेटी थे। बेटा आर्मी में था, फिर दामाद भी आर्मी आॅफिसर ही ढूंढा था। इन हरियाणवी माता-पिता का दिल बहुत बङा होता है। इनके कारण ही हम देशवासी सुरक्षित रह पाते हैं।

बहुत साल बाद जब हम उस गली में गए, तब देखा, उनके घर का लाॅन एरिया उजाङ पङा था। घर के वीरानेपन को देख मन द्रवित हो गया था। मिसेज सेठी ने बताया कि मास्टरसाहब का बेटा आतंकवादियों की मुठभेड़ में शहीद हो गया था।

अपने आंगन को कर उजाङ,
करते हैं देश को आबाद,
इन शहीदों को हमारा सलाम।
अपने मन को कर वीरान,
गर्व से करते हैं, अपने सपूतों का बलिदान,
इन माता-पिता को हमारा शत-शत प्रणाम।

क्रमशः

(नए मकान नए परिवेश) भाग-नवम (हमारे पङोसी-1)

जीवन में पङोस और पङोसियों के महत्व पर एक बङा लेख लिखा जा सकता है। भारतीय संस्कृति में यह माना जाता है कि अगर पङोस अच्छा है तो कोई चिन्ता की बात नही है क्योंकि आपके सुख-दःख में रिश्तेदार बाद में आते हैं, पहले पङोसी ही खङे होते हैं ।

आज के दौर में भी जब लोग मिलनसार नही रहे हैं, अपनी प्राईवेसी पर अधिक जोर रहता है, तब भी बुरे वक्त पर पङोसी याद आते हैं व पङोसी भी अपना धर्म निभाते हैं ।
यह मेरी खुशकिस्मती रही कि हमें हमेशा पङोस अच्छा मिला है।
अतः गुङगांव से लखनऊ निकलने से पहले उस गली के सभी पङोसियों पर एक नजर तो डालनी ही होगी।

‘ करोगे याद तो हर बात याद आएगी,
गुजरते वक्त की हरमौज ठहर जा आएगी’

हम इस मकान में चार वर्ष रहे थे, आस-पड़ोस में सभी से हमारे संबध अच्छे बन गए थे। पङोसियों से अच्छे सबंध बनाने का श्रेय मैं हमेशा एस.के को
देती हुँ। उनका मिलनसार स्वभाव शीघ्र ही सबको प्रभावित करता था

हमारे दाएं तरफ का मकान एक सरदार परिवार का था, 1984 के दंगों ने उन्हें गुङगांव से निकलने को विवश कर दिया था।
उन्होंने अपना मकान एक अग्रवाल परिवार को किराए पर दिया था।
अग्रवाल परिवार संयुक्त परिवार था, सास, तीन बेटे, दो बहुए, एक छोटी कुआंरी ननद थी।
ससुर नहीं थे तो घर की सारी जिम्मेदारी बङे बेटे ने संभाल रखी थी। अपने पति की इस जिम्मेदारी को गरूर सहित निभाते हुए, परिवार पर अपना दबदबा बङी बहु ने अपने सहज अधिकार के तौर पर लिया था।
घर का सभी काम दोनों बहुएं मिलकर करती थी,पर छोटी बहु अधिक दबी नजर आती थी, उसी के दो बच्चे थे। बङी बहु नि:संतान थी।
सास और छोटी ननद से मेरी दोस्ती हुई थी। सास समझदार थी, उन्होंने फैसला ले रखा था कि बेटी की शादी के बाद बेटों को अलग कर देगी और स्वयं छोटे बेटे के साथ रहेगी।

अग्रवाल परिवार के जाने के बाद यह मकान मिस्टर तनेजा ने खरीद लिया था। मिस्टर तनेजा का परिवार मैनपुरी से शिफ्ट हो कर आया था। मिस्टर तनेजा मुलतः गुङगांववासी थे। बच्चों की उच्च शिक्षा के लिए, उन्हें एक जगह स्थापित करने के उद्देश्य से यह मकान खरीदा गया था। परिवार यहाँ शिफ्ट हो गया था पर उनकी नौकरी मैनपुरी में थी, वह स्वयं महीने में एक बार परिवार से मिलने आते थे।

मिसेज तनेजा के लिए पति के बिना परिवार की देखभाल करना एक चुनौती थी, अतः वह हमेशा तनाव में रहती थी। उनके दो बेटी व एक बेटा था। बङी बेटी बारहवीं कक्षा में पढ़ रही थी, बेटा आठवीं कक्षा और छोटी बेटी दूसरी कक्षा में पढ़ रही थी।

मिसेज तनेजा के हमेशा तनाव में रहने के कारण, उनके घर में अशांति बनी रहती थी ।गली में कोई उन्हें पसंद नहीं करता था। मेरे पास वह बेझिझक आती थी ,हम अपना सुख-दुख बांटते थे। पर फिर याद नहीं किस कारण हमारे बीच बात-चीत बंद हो गई थी। शायद मेरी रिश्ते बढ़ाने की अपनी सीमा रेखा थी, जिसे मैं किसी को लांघने नहीं देती थी।

लेकिन तभी एक घटना ने मेरे दिल मेें उनके लिए सम्मान बढा दिया था। यह मेरे दूसरे बेटे मिंटू के जन्म के बाद की बात है। सेतु को बुखार आ रहा था।तेज बुखार उसके दिमाग में चढ़ गया और वह बेहोश हो गया था।हम तुरंत उसे लेकर डाक्टर के पास भागे थे। हमें परेशान जाता देख मिसेज तनेजा ने मिस्टर तनेजा (उस समय गुङगांव में थे) को हास्पिटल भेजा था, मिस्टर तनेजा ने एस. के. को कुछ रूपये पकङाते हुए कहा,” हमने सोचा आप घबराकर भागे हैं , पता नहीं अचानक इस समय पैसे है कि नहीं । संकोच न करें और अन्यथा न लें ।”
मैंने हमेशा मिसेज तनेजा का आभार माना है, हम फिर मित्र बन गए थे।
बुरे वक्त पर जो काम आए वह ही सच्चे मित्र होते हैं।

मिसेज तनेजा ने अपने मकान में आगे के भाग में एक कमरा किराए पर दिया था। उस कमरे में वंदना व राकेश रहने आए थे। उनका बेटा मनु सेतु से छोटा था। कपिल, सेतु और मनु एक साथ खेलते थे। यह महज इत्तफाक था या इसके पीछे कोई मनोवैज्ञानिक कारण भी हो सकता है। हमारे बाएं तरफ के मकान में वधवा भाभी ( इंदू की मम्मी) ने बेटे को जन्म दिया था और उसके लगभग एक साल बाद उषा ने बेटी को और तीन महीने बाद वंदना ने बेटे को जन्म दिया था। फिर हमारे घर मिंटू आया था।

कहा जाता है कि छोटे भाई-बहन के माँ की गोद में आने से बङे बच्चों पर मनोवैज्ञानिक प्रभाव पङता है, पर कपिल, मनु और सेतु पर बहुत ही सकारात्मक असर हुआ था। वे अब अपने को अधिक आजाद महसूस कर रहे थे। जब हम माएँ अपने नवजात शिशुओं के साथ व्यस्त रहते तब ये बच्चे अपना मनमाना जीवन जीते थे। उसी आजादी ने कपिल को एक चोट दी थी। गेट पर खेलते हुए कपिल गिर गया था और सिर फट गया था, कपिल को लेकर एस. के. डाक्टर के पास भागे थे, साथ बदहवास उषा गई थी। कपिल के सिर पर टांके आए थे। दो दिन बाद फिर कपिल खेलने के लिए मैदान में था। बच्चे जल्दी ही तकलीफ भूल जाते है।

हमारे मकान के बाएँ तरफ सेठी साहब का मकान था । मिसेज सेठी एक सरकारी विद्यालय में अध्यापिका थी। बहुत हल्के- हल्के चलती थी, पैरों में तकलीफ थी। प्रतिदिन रिक्शे से स्कूल जाती थी। मुझे वह बहुत अच्छी लगती थी, जब भी मिलती बहुत प्यार से मिलती थी। उनके दो बेटी और एक बेटा था।

गुड़गांव के इन मकानों की विशेषता थी कि यहाँ आंगन बङे होते थे। फ्लेटवासी, आजकल की पीढ़ी तो आंगन शब्द से परिचित भी नहीं हो सकती है।

मुझे अपनी दादी का पुरानी दिल्ली का मकान याद आ जाता है।घर का दरवाजा खुलते ही आंगन होता था। उसी आंगन में बङे-बङे कार्यक्रम होते थे। मेरे और छोटी बहन के फेरे उसी आंगन में हुए थे।
गुड़गांव के बङे खुले आंगन देख, दिल खुश हो जाता था। हमने भी इसी मकान के बङे आंगन में देवीजागरण किया था।

सेठी साहब के मकान के आंगन के बाएं तरफ एक कमरा और किचेन था। जिसे वह किराए पर उठाते थे। आंगन के दूसरी तरफ उनके कमरे थे।कमरों के आगे दालान भी था पहले ऐसे ही मकान बनते थे, आंगन उसके बाद दालान फिर कमरे होते थे। आजकल तो कहा जाएगा कि खाली जगह छोङ कर, जगह बेकार कर दी है।
अभी भी HUDA के नियम अनुसार आगे- पीछे बेङे (आंगन) बनाना अनिवार्य है।

यह महज इत्तफाक ही था कि चार साल में सेठी साहब के दो किराएदार आए और उनकी पत्नियों से मेरे गहरे सबंध बने थे।

कुछ भूली- बिसरी यादें,
जब मन को छूकर जाती है,
मन भीग जाता है,
कितने अनाम रिश्ते,
तब जग जाते हैं,
यादें गिली हो, मुस्काती है।

क्रमशः

(नए मकान नए परिवेश) भाग अष्टम ( एक नई जीवन दृष्टि )

सेतु ढाई साल का हो गया था, वह मेरी गोद से बाहर निकलने को बेकल हो रहा था। उसे दोस्त चाहिए थे, जिनके साथ वह अपने जैसे खेल खेलता, शैतानी करता, नई- नई खोज करता।
लेकिन घर के आसपास बच्चें नहीं थे । पङोस की आठ वर्षीय इंदु और उसका सात वर्षीय भाई अमित अक्सर सेतु के साथ खेलते थे। पर उनके लिए सेतु एक छोटा मनभावन खिलौना था।
मुझे लगता कि उसके हमउम्र साथी होने चाहिए।

मैं अभी उसे स्कूल के अनुशासन में बाँधना नहीं चाहती थी।स्कूल में उसे हमउम्र साथी तो मिलते पर उन्मुक्त वातावरण नहीं मिल सकता था।
और मेरी मुराद पुरी हुई, जब कपिल आया था।

उन बुजुर्ग दंपत्ति के जाने के बाद, उन कमरों में कपिल अपनी माँ उषा के साथ रहने आया था।

कपिल सेतु का हमउम्र बहुत प्यारा व शरारती बच्चा था। कपिल के पिता डॉक्टर थे और माँ हाउस वाइफ थी। यह परिवार गुड़गांव के ही पास किसी गाँव से आया था। डॉ. साहब की डाॅक्टरी गांव में अच्छी चलती थी, या यूं कहें कि उन्होंने अपना जीवन अपने गांव को समर्पित किया था। अतः वह अपने परिवार के साथ शहर में शिफ्ट नहीं हुए थे।

मैंने एक कहानी पढ़ी थी, जिसमें नायिका अपने परिवार के विरोध को अनदेखा कर, अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा देने के लिए, बच्चों को लेकर अकेली शहर आ जाती है।
इस कहानी में भी कपिल की माँ उषा, अपने बेटे के व्यक्तित्व के विकास के लिए,अकेली गुडगांव आकर रहने लगी थी।
अंतर यही था कि उसे अपने पति व परिवार का पुरा समर्थन व सहयोग प्राप्त था । डॉ. साहब सप्ताह में एक बार उनसे मिलने आ जाते थे। अक्सर रात के ग्यारह बजे आते और सुबह पांच बजे चले भी जाते थे।
डाॅ. साहब का परिवार, अपने गाँव का एक प्रतिष्ठित परिवार था, गांव में उनका बहुत मान था। डाॅ. साहब ने कभी शहर आकर प्रेक्टिस करने की नहीं सोची थी, वह बहुत मन से अपने गाँव के लोगों की सेवा कर रहे थे।
गाँव में इनका संयुक्त परिवार था। परिवार के सभी सदस्य मिलकर सभी काम संभालते थे। एक- दूसरे की योग्यता का सम्मान व आपसी अटूट विश्वास अद्वितीय था। उसके ताया ससुर -खेती-बाड़ी संभालते थे। उसके पिता ससुर हिसाब-किताब देखते थे। चाचा ससुर के जिम्मे बाहर के काम थे।
चाचा ससुर ही समय- समय पर आते और उषा और कपिल की जरूरतें संभालते थे।

एक चचेरी ननद गुङगांव में ही रहती थी, वह और उसके पति हर समय उसकी कठिनाई में उसके सहारे थे। अतः डॉ. साहब उषा और कपिल की ओर से पुर्णतः निश्चित थे।। वे इत्मीनान से अपनी डाक्टरी सेवा पर ध्यान दे पा रहे थे।

उषा कोई ग्रामीण महिला नहीं थी। वह दिल्ली शहर में पली बङी थी। उसके पिता का तबादला होता रहता था, अतः उसकी परवरिश में अनेक शहरों की संस्कृति का प्रभाव था। उसने ग्रामीण जीवन शादी के बाद ही जाना समझा था।

उषा ने Home science में डिग्री प्राप्त की थी। उषा सुंदर व स्मार्ट थी। दिल्ली शहर की लङकी के लिए ग्रामीण ससुराल ही क्यों चुनी गई थी ? हम दुनिया है, जो सीधी बात को भी भेदना चाहते हैं ।

सोचा प्रेम में सब संभव है, अगर उषा सुंदर थी, तो डाॅ.साहब भी कम न थे, इस पर सज्जनता चेहरे पर चमकती थी। भावुक प्रेमिका अपने प्रेमी के साथ कहीं भी रहना पसंद करती हैं।

पर यह प्रेम विवाह नहीं था। अब माता-पिता ने क्यों कर अपनी बेटी के लिए ग्रामीण परिवेश व उसकी कठिनाइयों को चुना था ?

इन सवालों के उत्तर जो उषा से मिले उसके सार में समाज की परिपाटियाँ ही थी और कुछ नहीं ……।

विवाह की अनिवार्यता और वह भी सही उम्र में होना आवश्यक है । सही उम्र निकल गई तो उत्तम जीवनसाथी मिलना कठिन हो जाएगा, विशेषकर लङकियों के लिए. …… लङकियों के जन्म के साथ ही उसका विवाह …. उसके लिए उचित घर- वर की तलाश, एक बहुत बङी जिम्मेदारी, माता-पिता के लिए होती है।

हिन्दुस्तानी माता-पिता यह बहुत दृढ़ता से मानते है कि अपने बच्चों के वे ही भाग्य निर्माता हैं और फिर भी कमी हो जाए तो माना जाता है , ‘ ईश्वर की यही इच्छा होगी।’ पर बच्चों को अपने भविष्य निर्माण में भागीदार नहीं बनाते हैं।

उषा सुंदर थी, पर सुंदरता के मापदंड से ही विवाह सही उम्र में हो जाए, यह आवश्यक नही है। माता-पिता के पास धन की कमी न थी । पर उचित घर-वर नहीं मिल पा रहा था, फिर छोटी बेटी का कद भी बङा होता जा रहा था। उस पर रिश्तेदार ! उनके पास बात करने के लिए एक ही विषय या यूं कहें फिक्र… उनके अपनों के बच्चों का विवाह . ..।

डॉ. साहब व उनके परिवार की सज्जनता व शराफत प्रसिद्ध थी।
यह सोचा कि हमारी संस्कारी लङकी ग्रामीण जीवन की कठिनाइयों को पार कर लेगी। लङकी भी क्यों न करेगी? वह संस्कारी लङकी भी अपने लिए थक चुके माता-पिता को अपनी जिम्मेदारी से मुक्त करना चाहेगी।

एक सुंदर ख्याल यह भी रखा गया कि डॉ. साहब भी कब तक गाँव में ही प्रेक्टिस करेंगे, शहरी आमदनी उन्हें आकृषित करेगी ही और वह शहर आ जाएंगे।
उसने चार साल ग्रामीण जीवन को समझा व पति के मन को भी समझा और अपनी नियति को भी जाना…. फिर गुङगांव अकेले रहने का फैसला लिया।

उसे ससुराल वाकई अच्छी मिली थी। कुएँ से पानी भरना हो या मसाले पीसने हो….. घर में अन्य सदस्यों की सहायता तत्परता से मिलती थी। उसके इस फैसले पर खुशी-खुशी स्वीकृति मिलने में कठिनाई तो हुई पर अंततः सबने एकजुट हो उसको अपना सहयोग और मान दिया था ।

अपने माता-पिता व भाई-बहन सबको उसने अपने इस एकाकी घर में निमंत्रित किया था। अपनी माँ की दी हुई सुंदर कीमती क्राकरी पहली बार निकाली, “गांव के बुजुर्ग ऐसी क्राकरी में खाना नहीं खाते हैं । वे तो व्यंजन भी देसी पारंपरिक ही खाना पसंद करते हैं “।अक्सर ऐसे वाक्यांश उसके मुहँ से सुने जाते थे।

इसका अर्थ यह भी नहीं कि वह खुश नहीं थी, उसने अपने वैवाहिक जीवन को सच्चे दिल से स्वीकार किया था।
वह तो कभी ऐसे ही कोई क्रीच जाग जाती थी। अपने शहरी आधुनिक शहरी रिश्तेदारों के सामने जब अपने ग्रामीण ससुरालवालों की तुलना भी अनजाने ही कर जाती थी।इन ग्रामीणों की सज्जनता व मानवता पर उसे गर्व भी कम नहीं था।

अब उसके मायके से कोई न कोई उसके एकाकी जीवन के संघर्ष को समझने आ ही जाता था। यह तसल्ली भी करता कि डॉ. साहब भी जल्दी ही शहर शिफ्ट हो जाएंगे। पर ऐसा नहीं हुआ, वह अपने गाँव को छोङ नही सके थे।
उषा ने भी अपने इस संघर्ष को स्वीकार कर लिया था।यह कहना अधिक उचित होगा कि उसने अपने पति के जीवन उद्देश्य को गहराई से समझा था।

गुङगांव शिफ्ट होते ही उसने कपिल को पास ही एक play school में प्रवेश करा दिया था। कपिल जब रोता हुआ स्कूल जाता तब मैं सेतु को देख खुश होती कि वह अभी आजाद है।

कपिल संयुक्त परिवार से आया था। अतः वह बहुत जिद्दी था । वह अपने परिवार की कमी महसूस करता था।
उषा कपिल के सभी खिलौने ताले में बंद रखती थी और कपिल को उन खिलौनों से कमरे के अंदर ही खेलने देती थी। क्यों ?
मैं सेतु को बाँधकर रखना नही चाहती थी, फिर वह इसी मकान में ही बङा हो रहा था। सिर्फ कमरे में ही खेलना उसका स्वभाव नहीं था ।
सेतु कपिल के साथ अपने खिलौनों से खेलना चाहता था, पर कपिल ने छीनना और शेयर न करना सीखा था। मैं सेतु को दबाना नहीं चाहती थी और न बच्चों की बात पर झगङा करना पसंद था।
कुछ दिनों बाद सेतु और कपिल का गुङगांव के एक प्रतिष्ठित स्कूल में प्रवेश हो गया था।दोनों एक साथ स्कूल जाते थे। आरंभ में घर से जाते हुए कपिल बहुत रोता था और सेतु खुश- खुश जाता था। हम बहुत खुश थे कि हमारा बेटा बिलकुल नहीं रोता है। परंतु जब P.T.M में गए तो पता चला कि स्कूल में कपिल तो खुश रहता था पर सेतु रोने लगता था और बार- बार कपिल के पास बैठने की जिद करता था।
धीरे-धीरे सेतु और कपिल अच्छे दोस्त बन गए थे। दो साल बाद अगस्त 1989 में कपिल को एक छोटी बहन मिली और दिसंबर में सेतु को एक छोटा भाई मिला । सेतु और कपिल अब और शरारती हो रहे थे।
उषा अपनी इस नई जिम्मेदारी को खुशी-खुशी निभा रही थी। आस-पङोस और चचेरी ननद का परिवार उसकी कठिनाइयों में सहायक थे।डाक्टर साहब का वह ही रूटीन था। उषा और बच्चों को भी अब उसकी आदत हो गई थी।
1990 में हमारा स्थानांतरण लखनऊ हो गया था । हमने सोचा था कि हमारा गुङगांव वापिस लौटना नहीं होगा। पर नियति सात साल बाद फिर गुङगांव ले आई थी तब पता चला उषा ने वहीं पास ही एक मकान खरीद लिया था।

जब समझ लिए हो मन,
तब क्या चिंता करना,
तुम जियो अपना जीवन सार,
मैं हुँ तुम्हारे साथ,
पर मुझे भी पूरा करना है,
अपना जीवन साध।
जो तेरा सार वो मेरा सार,
जो मेरा साध वो तेरा साध।

हम भिन्न नहीं अभिन्न है,
यही जाना जीवन थार।

नए मकान नए परिवेश ( भाग- सप्तम) ( कुछ नए अजनबी )

एक वक्त आता है जब बच्चे माता-पिता के प्रेम की छांव से निकल कर, उस सुरक्षित दहलीज़ को त्याग कर, जीवन के सत् को समझने के लिए, नए रास्तों पर निकलते हैं।
मैं अभी तक अपनों के बीच रहती आई थी।पङोसी भी इतने अपने कि पता नहीं था कि वे पङोसी थे या रिश्तेदार।अपनों का अपनत्व ही जाना था। अजनबियों के साथ व्यवहारिकता की समझ नहीं थी। शादी के बाद ससुराल अजनबी, पति अजनबी और साथ ही आस-पड़ोस भी अजनबी था।

शादी को तीन वर्ष हो गए थे, कुछ-कुछ व्यवहारिकता की समझ बनने लगी थी।अजनबी जिन्दगी, जीवन को नई समझ देने लगी थी।यह स्वीकृति मन और दिमाग को हो गई थी कि माता-पिता की ऊंगली छूट गई है। तब स्वतः जीवन के प्रति अपनी मौलिक दृष्टि बनने लगी थी।

मैं दिल्ली से एक महीने बाद लौटी थी। घर का नक्शा बदला हुआ था। सामने दो अजनबी बुजुर्ग थे। प्रत्येक व्यक्तित्व के प्रभाव से परिवेश भी प्रभावी होता है। अतः घर में प्रवेश करते ही परिवेश में आए बदलाव को महसूस किया था। छाबड़ा परिवार की तरह चहकता हुआ परिवेश अब शांत और थका हुआ महसूस हो रहा था।

आंगन में छाबङा जी के बङे कमरे के सामने एक फोल्डिंग बैड पर एक उम्रदराज बुजुर्ग बैठे थे।और हमारी छोटी रसोई के सामने एक कमर झुकी, पतली कमजोर उम्रदराज बुजुर्ग महिला बैठी अपना काम कर रही थी। इन दोनो के बीच एक पांच वर्षीय कन्या अचंभे से मुझे और सेतु को देख रही थी।

इन अम्माजी का कद बहुत छोटा था और बाबुजी उनसे दुगने लंबे थे।
मुझ से और सेतु से मिलकर दोनों बुजुर्ग बहुत खुश हुए थे। थोङी देर में अम्माजी मेरे लिए पानी व बिस्कुट नमकीन ले आई थी,उन्हें पता था कि चाय मेरे लिए नुकसानदायक है, इसलिए ठंडा शरबत बना लाई थी। उनके इस सदव्यवहार से मैं नि:शब्द थी।

मैं अम्माजी से बहुत प्रभावित थी, कमर झुकी थी,पर धीरे-धीरे सभी काम करती थी, कपङे धोना, खाना बनाना, बर्तन व सफाई सभी काम स्वयं करती थी। वह बहुत कम पानी में साफ और झकाझक कपङे धोती थी, जैसे किसी डिटर्जेंट पाउडर का विज्ञापन होता है। सबसे बङी बात थी कि वह खुश रहती थी, दिखता था कि थक जाती हैं पर कभी उफ करते नही देखा था।

मेरे से उनकी दोस्ती हो गई थी। वह अपने मन की बात मुझसे कह देती थी। ये सिंधी पंजाबी थे, रेवाड़ी के किसी गांव से आए थे। भाषा भी वैसी बोलते थेl मुझसे हिन्दी में बात करती थी पर अधिकांश शब्द हरियाणवी सिंधी होते थे।

अम्माजी के दो बेटियाँ और एक बेटा था, बङी बेटी सोनीपत रहती थी, छोटी बेटी गुङगांव में ही रहती थी।वह ही जब समय मिलता सुबह-शाम माता-पिता से मिलने आती थी व अपनी माँ के काम में मदद भी कर जाती थी।

अम्माजी का बेटा दिल्ली में रहता था, अक्सर सपरिवार उनसे मिलने आता था। उसके एक बेटी थी, जो अम्माजी के साथ रहती थी। दो जुङवां बेटे थे जो तीन साल के थे। शायद जुङवा बच्चों को संभालने की परेशानी को देख पोती दादी-बाबा के पास रहने लगी थी।
बहु मार्डन थी, मैंने उसे कभी अम्माजी की मदद करते नहीं देखा था। अम्माजी भी उसके साथ मेहमानों की तरह व्यवहार करती थी।

अम्माजी- बाबुजी बच्चों के आने से बहुत खुश हो जाते थे।बेटा बहु पोती दीक्षा को अब अपने पास रखना चाहते थे।इस बात पर बाबुजी बहुत दुखी व नाराज़ थे। पांच वर्षीय दीक्षा हमेशा दादा-दादी के साथ ही रही थी, अतः वह भी जाना नहीं चाहती थी। जब भी बेटा आता तब वह बाबुजी को समझाता कि “दीक्षा का अब हमारे साथ रहना जरूरी है।”

बाबुजी को लगता कि ” बेटा स्वार्थी है जब उसे जरूरत थी उसने दीक्षा को उनके पास छोङ रखा था, अब जब वे दीक्षा के मोह में बंध चुके हैं, तब वह उसे हमारे पास से ले जा रहा है। उन दोनों के अकेलेपन का दीक्षा ही सहारा थी।”

कई बार औरतें जो बात व्यावहारिक रूप से समझ पाती है, उसे मर्द समझना नहीं चाहते हैं या समझ नहीं पाते हैं।शायद मैं गलत भी हो सकती हुँ, यह औरत- मर्द की बात नहीं है, अपितु प्रत्येक के व्यक्तिगत व्यक्तित्व की बात हो सकती है।

अम्माजी ने मुझे कहा था,” मुझे भी दीक्षा से उतना ही मोह व प्रेम है, जितना तुम्हारे बाबुजी को है, मैंने ही उसे गोद में रखा संभाला है।
पर एक दिन तो उसे अपने माता-पिता के पास जाना ही है, हम कब तक रहने वाले हैं, अभी उसे बुरा लगेगा पर और बङा होने पर अधिक बुरा लगेगा। हमारी पोती अवश्य है पर अमानत तो बेटे-बहु की ही है न! फिर अब मुझ से भी कहां इतना काम संभलता है। इसके माता-पिता इसकी अच्छी परवरिश कर सकते हैं ।”

हमारे सामने उनकी बङी बेटी व बच्चे उनके पास छुट्टियां बिताने आए थे। उसकी विदाई के समय, उन्होंने रिवाज़ के अनुसार उसे कुछ उपहार दिए थे।उसके उपहार देख, उनकी छोटी बेटी उनसे नाराज हो गई थी।

अम्माजी ने दुःखी हो मुझे बताया था,” बहुत मुश्किल है, बङी बेटी सोचती है कि छोटी बेटी हमारे करीब रहती है तो उसे हम अक्सर कुछ न कुछ देते रहते होंगे, जिससे वह वंचित रह जाती है।
छोटी बेटी इसलिए नाराज़ है कि इतने गिफ़्ट एक साथ हम कभी उसे नहीं देते हैं।”

अम्माजी अपने आर्थिक सामर्थ्य के कारण दुःखी नहीं थी ।उनके मन के संताप का कारण, उनकी बेटियों की नासमझी थी। जिन्हें अपने माता-पिता का प्रेम आज भी धन व उपहार में दिखता था।

इन बेटियों के व्यवहार से जो अशांति मिलती थी, उसने उनकी अपनी बेटियों से मिलने की इच्छा को मंद कर दिया था।

इस बुजुर्ग दंपत्ति को अब किसी से कुछ नहीं चाहिए था। अब अपने बच्चों के लिए एक ही आशीर्वाद था, ‘ अपने-अपने परिवार के साथ सुखी रहें।’
वे अपने जीवन के अंतिम पड़ाव में सिर्फ शांति चाहते थे।

समझ नहीं आता कि हिंदूस्तानी संतानें हमेशा अपने माता-पिता से लेना ही क्यों चाहती हैं। तभी तो कई-कई बीघा जमीनें छोटे-छोटे टूकङों में बंट जाती है।

अम्माजी व बाबुजी सिर्फ छः महीने हमारे साथ रहे थे, दीक्षा अपने माता-पिता के पास चली गई थी तो वे लोग अपने गाँव वापिस चले गए थे । रविन्द्र भी दिल्ली चला गया था।

बीता वक्त गुजर गया,
जो करना था वो कर दिया,
जो होना था वो हो गया,
न कोई उथल-पुथल, न कोई उलझन है,
न कोई नाराजगी, न कोई शिकायत है,
अब तो शांति पथ पर बढ़ना है,
समय है अब थोङा,
तो अब अपने लिए भी है जीना।

नए मकान- नए परिवेश – षष्ठम भाग

चौथा मकान

पराया शहर बनता गया अपना।

यह काॅलोनी पहली काॅलोनी से साफ काॅलोनी थी। वैसे हमारे मकान के सामने एक खाली प्लॉट था, हम हिंदूस्तानियों की समझ हमेशा कचरे के समान ही होती है। आस-पङोस के सभी लोग अपने घर का कचरा इस प्लाॅट पर डालते थे। यूँ सभी के घर जमादार भी कूङा उठाने आते थे, फिर भी न जाने ऐसा कौन सा और कितना कचरा निकलता था कि कुछ बेगार कचरा इस प्लाॅट में भी डाला जाता था।
हम भी भेङचाल की तरह दूसरों का अनुसरण करते थे। बुद्धि में इतनी समझ थी कि घर के अंदर ही नहीं घर के बाहर भी सफाई आवश्यक है। इस गंदगी से न जाने कितनी बिमारियाँ जन्म ले रही थी। पर बुद्धि की इस समझ को व्यवहार में लाने से न जाने क्यों कतराते थे। शायद बुद्धि के उपयोग से अधिक, आदत की गुलामी पसंद होती है।

हमारे मकान मालिक छाबङा अंकल थे। वह दिल्ली में किसी सरकारी विभाग में काम करते थे।

उनकी बङी लङकी चंचल आयु में मुझ से कुछ छोटी थी। चंचल भी दिल्ली में सरकारी नौकरी करती थी। बङा बेटा रविन्द्र काॅलेज में पढ़ता था और सबसे छोटा बेटा यानि छोटू लाॅटरी बेचता था।
यह मकान अम्माजी के मकान से छोटा था पर बहुत खुला बना था।
घर में प्रवेश करते ही एक छोटा आंगन था, यहाँ मुझे पता चला कि आंगन को बेङा भी कहते हैं । इस छोटे आंगन में शहतूत का पेङ लगा था, जिसमें हर दूसरे वर्ष बहुत मीठे शहतूत आते थे।
आंगन के एकतरफ पत्थर की टंकी बनी थी, उसमें भी नल था। छाबङा आंटी स्वयं टंकी में पानी भर देती थी। आंगन के दूसरी तरफ दो शौचालय बने थे, एक मकान मालिक का, दूसरा किराएदार का था। स्नानघर एक ही था।
यहाँ भी मकानमालिक किराएदारों का पूरा ध्यान रखते थे, वे नहीं चाहते थे कि हमें किसी प्रकार की कठिनाई हो।
इस छोटे आंगन से होते हुए एक गैलरी थी, गैलरी के दोनों तरफ एक- एक कमरा था। यह दोनों कमरे हमारे पास थे। दाएं तरफ के कमरे का एक दरवाजा छोटे आंगन में भी खुलता था, दूसरा गैलरी में था। हमने इसी कमरे को अपना ड्राइंग रूम बनाया था।
गैलरी के शुरू में एक चैनल लगा था। जिसे दोपहर में और रात में बंद कर देते थे।
उन्होंने बताया था कि पहले गुड़गांव में बहुत शांति और सुरक्षा थी। परंतु 1984 के दंगों ने स्थिति बदल दी थी। तब पङोस के सरदार परिवार को छाबङा अंकल ने अपने घर शरण दी थी, फिर वे गुड़गांव छोङ कर चले गए थे। वे बहुत भयावह दिन थे। अतः सुरक्षा की दृष्टि से गैलरी में चैनल लगाना पङा था।
गैलरी के बाद एक बङा आंगन था। आंगन के एक तरफ एक छोटी रसोई थी, जो हमारे पास ही थी। उसमें एक सर्विस विंडो भी थी जो हमारे ड्राइंग रूम में खुलती थी।
इस बङे आंगन के दूसरी तरफ एक छोटा स्टोर और उसके बाद एक बङी रसोई थी। आंगन के दूसरी ओर दो बङे कमरे थे। एक कमरे के अंदर एक छोटा स्टोर था, यह कमरा छाबङा परिवार का बैडरूम था और दूसरा ड्राइंगरूम था।
आंगन से ही सीढ़ियाँ छत की ओर जाती थी, इन्हीं सीढियों के नीचे हमारी छोटी रसोई थी। छतें भी दोनों तरफ बहुत बङी-बङी थी।
चंचल व रविन्द्र ने मुझे आंटी कहने से मना कर दिया था । वे मुझे भाभी कहते थे, मुझे भी अच्छा लगा था। अन्यथा गुङगांव में आकर लगा था कि यहाँ आंटी कहने का ही रिवाज़ है।
छाबङा आंटी का नाम सुदेश था और अंकल जब तक घर पर रहते थे, सुदेश- सुदेश की ही पुकार लगाए रहते थे। उनकी आवाज़ तेज थी। सुबह आंख खुलते ही छाबङा अंकल की आवाज़ पूरे मकान में गुँजने लगती थी।

वह अपने छोटे बेटे छोटू से परेशान थे, जिसका मन पढ़ाई में नहीं लगा था और आठवीं के बाद पढ़ाई छोङ दी थी। सुदेश आंटी ने बताया कि उसे आठवीं तक भी पढ़ाई कैसे कराई हम ही जानते हैं ।वह कहती कि यह पढ़ाई तो नहीं कर सकता पर इसकी जिन्दगी तो बनानी है। छोटू यूं बहुत तेज था, उसे कोई बेवकूफ़ नहीं बना सकता था।

सुदेश आंटी सुबह सबसे पहले मंदिर जाती थी, फिर रसोई में घुसती थी। अतः छाबङा अंकल सुबह-सुबह मंङी से ताजी सब्जी लाते, काटते व बनाते थे, साथ-साथ तेज आवाज में छोटू को जगाते थे। उनकी रोज ही छोटू से चिकचिक होती थी। शायद ही छोटू अपने पिता की परेशानी समझ रहा था। वह लाॅटरी से पैसा कमाकर, जीवन की खुशी समझ रहा था। पता नहीं क्यों, मुझे अच्छा लगा था कि यह बच्चा कोई तनाव सिर पर नहीं ले रहा है।

पंजाबी परिवार कामवाली बाई रखना पसंद नहीं करते हैं । सुदेश आंटी सभी काम स्वयं करती थी और यह अच्छी बात थी कि पूरा परिवार उसमें अपना सहयोग करता था।
पंजाबियों को सफाई का भी बहुत ध्यान होता है, अतः सुबह ही चंचल पूरे घर की सफाई कर जाती थी। दोनों आंगन व गैलरी भी पानी से धोकर , पौछा लगा देती थी। उन्होंने मुझे एक दिन भी नहीं कहा कि आपको भी गैलरी और आंगन साफ करना होगा।

सुदेश आंटी बहुत चुस्त थी, सबके घर से जाने के बाद वह शीघ्र ही सारे काम समाप्त कर , कपङे बदल कर तैयार हो जाती थी। कभी – कभी बिजली व पानी का बिल भी भरने जाती थी।

वह भैंस के दूध की मलाई से मक्खन निकालती थी।उन्होंने मुझे भी मक्खन निकालना सिखाया था।

सुदेश आंटी मेरे रिजर्व स्वभाव से परेशान थी, वह मेरे साथ समय व्यतीत करना चाहती थी पर मैं स्वभाव से ही रिजर्व, बाकि इन दिनों कमरे में बंद रहने की आदत जो डाल ली थी।

फिर भी जब समय मिलता वह मुझ से बहुत बातें करती थीं। अपनी तकलीफों की कहानियाँ भी ऐसे हँसते-हँसते सुनाती थी कि जैसे उनके कष्ट की दास्तान न सुनकर ज़िन्दगी का कोई मज़ाक सुन रहे हो।

सेतु का चंचल और रविन्द्र के साथ मन लगता था। मेरी भी चंचल से दोस्ती हो गई थी, एक दिन वह मुझे गुङगांव के सदर बाजार घूमाने ले गई थी। यूं मैं पहले भी इस बाजार में आई हुई थी पर चंचल के साथ घूमते हुए लगा था, बहुत दिन बाद किसी सखी के साथ घूम रही हुँ।

चंचल के लिए एक अच्छे वर की तलाश जोर-शोर से हो रही थी। यूं तो सभी लङकियों के लिए देखने- दिखाने की प्रक्रिया बहुत कष्टदायक होती है। पर यदि लङकी शिक्षित, नौकरीपेशा, आत्मविश्वासी भी है और तब कोई लङका अपने परिवार के साथ उसे मिलने आता और उससे ऐसे प्रश्न पूछे जाते हैं कि जैसे वह सिर्फ शादी की कोई उम्मीदवार ही नही अपराधी भी हो।
सुदेश आंटी की यही प्रमाणित करने की कोशिश रहती कि उनकी बेटी शिक्षित व नौकरीपेशा ही नही है अपितु घर संभालने में भी निपुण है।

ये लङके वाले भी चाहते तो नौकरीपेशा वधु ही है, पर उनके प्रश्न ऐसे होते कि चंचल जैसी आत्मविश्वासी लङकी भी उलझ जाती थी, समझ नहीं आता कि उसे कटघरे में क्यों खङा किया जाता है । मतलब सिर्फ इतना होता कि लङकी नौकरी भी करे और घर संभालने में भी निपुण हो। और उनका बेटा? वह सिर्फ नौकरी करेगा।

लेकिन अपने पर अब हँसी भी आ रही है, और समाज पर दुख और अफसोस भी होता है। आज से सात साल पहले, मैं भी क्या कर रही थी, जब हम सेतु के पीछे पङे की अब वह शादी कर ले। और इसी धुन में लङकी देखने भी चले गए, सेतु के मना करने पर भी उसे कसम देकर ले गई, लङकी उच्चशिक्षित, एक अच्छी कंपनी में, एक अच्छे पद पर आसीन थी।

हमने सोचा था कि हम अपने जमाने के लङकेवाले नहीं है अपितु बहुत उदार व आधुनिक हैं। पर मेरी उदारता ढह गई थी, वे किसी उत्त्तरप्रदेश के शहर से आए थे।हमारा स्वागत ऐसे किया जैसे हम कोई भगवान हो। उस कन्या को जिस प्रकार लाया गया मुझे पुराना ज़माना याद आ गया था।बेटी को पढ़ाया और नौकरी भी सिर्फ इसलिए कराई कि लङका अच्छा मिल जाए। लङकी की इच्छा का कोई महत्व वहाँ नज़र नहीं आया था। हमारी स्वीकृति ही सर्वोपरि थी। पापा याद आ गए, अपनी बेटियों के लिए जब लङकेवालों की स्वीकृति आती तो ऐसे खुश हो जाते, जैसे उन पर एहसान कर दिया हो। मैं तब इसलिए नहीं रोई थी कि इस स्वीकृति के साथ, मेरी विदाई के दिन आ गए थे। अपितु अपने थके और मजबूर पिता को देख रो रही थी…. जिन के जीवन का उद्देश्य मात्र अपनी बेटियों का विवाह करना था।

सेतु ने समझदारी दिखाई और मुझे फिर कोई लङकी देखने से सख्त मना किया था। ज़माना नहीं बदला, पर बदल रहा था, हमारे इस फैसले के साथ कि बच्चे अपने जीवन साथी स्वयं चुनेगे। यूं मेरी बेटी नहीं है, पर जिन घरों से मेरे घर बेटियाँ आई हैं, उन्होंने अपनी बेटियों के चुनाव को सम्मान दिया है। मेरी अपनी बहु- बेटियों ने अपने सबसे गहरे मित्र को अपने जीवन साथी के रूप में चुना है। ये अंतरर्जातिय संबध बने, जिन पर परिवारों की सहर्ष स्वीकृति थी।

समाज लोगो के विचारों में बदलता है, लोग बदलाव चाहते हैं पर व्यवहार में लाने में बहुत समय लगाते हैं।

उन्हीं दिनों अंकल-आंटी जी ने एक महत्वपूर्ण फैसला लिया था। छाबङा अंकल के भाई की दिल्ली सरोजनीनगर मार्कट में एक कपङे की दुकान थी। छोटू को अपने भाई के साथ व्यापार सिखाने के उद्देश्य से अंकल ने सपरिवार दिल्ली शिफ्ट होने का फैसला लिया था।

कई दिनों की कोशिश के बाद उन्हें सरोजनीनगर में एक सरकारी मकान अलाॅट हो गया था। रविन्द्र का काॅलेज का अंतिम वर्ष था और वह समझदार था, वह जानते थे कि वह गुङगांव में अकेले संभल कर रह लेगा। अतः रविन्द्र के लिए अपना ड्राइंगरूम का कमरा छोङ दिया था।बैडरूम व हमारी छोटी रसोई किराए पर एक अन्य किराएदार को दी थी। अब हमने उनकी बङी रसोई ले ली थी।

छोटू पर पढ़ाई का बोझ न डालकर व समय के साथ उसके लिए उसके तेज दिमाग के अनुकुल एक सुनिश्चित भविष्य बना दिया था।

मेरी तबियत में सुधार नहीं हो रहा था, यहाँ डाक्टर ने आॅपरेशन भी बता दिया था। तब मैं कुछ दिन के लिए दिल्ली अपने मायके चली गई थी। होम्योपैथिक इलाज से आराम होने लगा था। एक महीना बाद गुङगांव लौटी तो घर का नक्शा बदल गया था।
जब मै दिल्ली थी, तब ही छाबङा परिवार दिल्ली शिफ्ट हुआ था ।

देखो और समझो, महसूस भी करो,
बदलते मौसम को, बहती हवा को,
बदलते हुए अहसास को जियों,

जो दिखता है, इन चिडियों की आवाज़ में ।
जो समझ सके, इस बदलाव को,

तो सुख दे पाओगे, सुख ले पाओगे।

नए मकान- नए परिवेश – पंचम भाग

तीसरा मकान
नया शहर – नए लोग – 2

अम्मा जी हमेशा खुश नज़र आती थी, उनकी कङक आवाज पूरे मकान में गुंजती रहती थी, आस -पङोस में उनका बहुत मान था, कोई न कोई उनसे मिलने आता रहता था।

अम्मा जी के जीवन का दुःख नज़र नहीं आता था, अनुभवी अम्मा जी अपने दुख और परेशानी में भी सहज दिखती थी।

जब हम शिफ्ट हुए थे, तब उनका चौथा बेटा घर से चार महीने से गायब था। किसी से पता चला था कि वह हरिद्वार में है।वह पहले भी दो बार भागा था, फिर कुछ दिन में लौट आया था। पर इस बार समय अधिक हो गया था।

आरम्भ में चूंकि मैंने उसे देखा नहीं था और न ही उनके परिवार के किसी सदस्य ने उसका जिक्र किया था, तो मुझे पता नहीं था कि अम्माजी के चार बेटे हैं ।
एक दिन मैंने देखा कि अम्माजी और उनकी छोटी बेटी शमा बहुत खुश थे। दुख छिपाने में कितने भी प्रवीण क्यों न हो, जब खोई खुशी मिलती है, तो वह छलक ही जाती है।
वैसे तो शमा मुझ से कम बात करती थी, पर उस दिन बहुत खुश थी, उसी ने बताया, ” बहुत दिन बाद भाई आ रहा है, उसे बैगन का भर्ता बहुत पसंद है, मैं स्वयं बनाऊँगी ।” बहनें ही भाई के लिए हमेशा ढाल बनी रहती
हैं । उसके हर सुख-दुख में सच्ची साझीदार होती है।

उसके आने के बाद बाबुजी ने उसके लिए एक आर्टिफिशियल ज्वैलरी की दुकान खुलवा दी थी। उद्देश्य यही था कि काम जमेगा तो स्वयं जमेगा, परंतु उसकी प्रवृति ऐसी न थी। पता चला था जब तक पिता रहे, वह आता- जाता रहा था और उनकी मृत्यु के बाद वह गया तो वापिस नहीं आया था। पता नहीं कौन गलत होता है, वह बच्चा जो अपना जीवन अपनी मर्जी से जीना चाहता है, किसी मोह या बंधन में बंधना नहीं चाहता या उसके माता-पिता . …

अम्माजी की तीन बेटियाँ थी, बङी बेटी दिल्ली में रहती थी, उसका रहन- सहन सबसे भिन्न था। दूसरी बेटी किसी गांव में रहती थी। सबसे छोटी बेटी ही सबसे छोटी संतान थी। शमा का मन पढ़ाई में नहीं लगा था। उसकी बङी बहन की बेटियों और उसकी आयु में विशेष अंतर नहीं था। अतः उसका मन दिल्ली में ही लगता था। यहाँ भाभियों की खिचपिच में उसका मन नही लगता था।
जब हम वहाँ पहुँचे थे, तब वह अपनी बङी बहन के साथ दिल्ली में थी। जब आई तो मुझ से मिलने कमरे में आई थी।

मकान मालिक की बेटी थी तो व्यवहार में वह ठसक झलक रही थी। पतली- दुबली, सांवली -सलोनी व माडर्न भी थी। यह ननदों को पता होता है कि उन्हें अपनी भाभियों पर रौब रखना चाहिए इसलिए वह भी अपनी भाभियों के साथ गरूर के साथ रहती थी। दोनों बङी भाभियों के साथ फिर भी कुछ लिहाज था, पर सबसे छोटी भाभी मीना के साथ उसका व्यवहार कठोर था।
उसने स्कूली शिक्षा भी पुर्ण नहीं की थी पर घर के काम में होशियार थी। लङकियाँ पढ़ाई नहीं करती तो माता – पिता को फर्क नहीं पङता है, उन्हें सिर्फ उनके लिए अच्छा घर- वर मिलने की चिंता होती है।
शमा घर की सबसे छोटी संतान व बङे भाई-बहन अपने-अपने जीवन में मसरूफ थे। उसके विवाह की जिम्मेदारी कोई लेना नहीं चाहता था।
अपितु बङी बहन की बेटी व बङे भाई की बेटी का प्रेम विवाह बहुत खुशी-खुशी कर दिया गया था। उनके लिए अपने बच्चों की जिम्मेदारी अधिक महत्वपूर्ण थी।
अम्माजी – बाबुजी के पास दहेज देने के लिए धन नहीं था। बाद में पता चला था कि उसका विवाह किसी विधुर से कर दिया गया था, जिसके दो या तीन बच्चे थे, शादी के बाद वह सुखी थी। दहेज प्रथा के कारण न जाने कितनी लङकियों को ऐसे समझौते करने पङते हैं। यूं सुख-दुख कैसे मिलने होते हैं , किसे पता होता है?

सेतु ने घुटनों चलना शुरू कर दिया था, बाहरी दुनिया उसे आकर्षित करती थी। अपने कमरे के दरवाज़े अब मैं बंद नहीं रख सकती थी। इस प्यारे बच्चे से मिलने, उसके साथ खेलने के लिए सभी आस-पड़ोस के बच्चे आते थे।

सर्दियाँ भी आ गई थी, इस सर्द मौसम में उसे धूप में ले जाना आवश्यक था। लेकिन अब भी मैं अपने दुख के साथ अपने में बंद थी, अतः सेतु को लेकर छत पर जरूर जाती थी, पर उस समय जब कोई छत पर नहीं होता था।

पर सेतु इंदू भाभी को देखते ही हँसने लगता था। इंदू भाभी भी अक्सर मेरे पास आ जाती थी और मेरी चुप्पी को अनदेखा कर सेतु के साथ खेलती, हँसती थी और मेरे मन की उदासी दूर कर मेरा मन तरोताजा कर देती थी।
मैं जान ही नहीं पाई थी कि उनके यह प्रयास मेरे लिए ही थे अगर उस दिन उन्होंने मुझ से न कहा होता, ” मैं आपके मन का दुःख समझ सकती हुँ।”
मैं आश्चर्य से उन्हें देख रही थी, इंदू भाभी, प्रेमा भाभी और अम्माजी भी कितने अपनेपन से मेरा दुख समझ ही नहीं रहे थे,अनकहे शब्दों के साथ बांट भी रहे थे।
अम्माजी तो हमारे दूसरे मकान में जाने के बाद भी उतने ही प्यार से मिलने आती थी।

किसी से कैसा अपनत्व भरा रिश्ता जुङता है, हमें पता ही नहीं चलता है। इसी अपनत्व भरे रिश्ते में एक नाम और था।पिंकी और उसकी मम्मी ‘भाभीजी’ के साथ बना रिश्ता । इन रिश्तों की उम्र समय के साथ देखा जाए तो बहुत लंबी नहीं होती है पर भावनाओं की दृष्टि से देखें तो यह रिश्ते सदा हमारे दिल में बसे रहते है।

अम्माजी के मकान के पास ही रहती थी, ‘ भाभी जी’ । सभी उन्हें भाभी जी ही कहते थे, विधवा थी, आयु 40 भी नहीं थी। बेटा दीपु 14 वर्ष और बेटी पिंकी 10 वर्ष की थी। पारिवारिक व्यापार था, जिसमें उन्हें उनका हिस्सा मिलता था, पुश्तैनी मकान में अपने हिस्से में रहती थी। परंतु व्यापारिक शेयर पर्याप्त नहीं मिलता था, अतः वह स्वयं घर से कुछ न कुछ काम करती थी। दीपु भी स्कूल से आकर प्रेमा भाभी के साथ बाइडिंग का काम करता था।

पिंकी और भाभीजी अक्सर मेरे पास आते थे, पिंकी के साथ सेतु बहुत खुश रहता था। पिंकी अपने साथ अपनी सहेलियों को भी ले आती थी। वे सब मिलकर मेरे कमरे में नाचती- गाती और कमरे में रौनक भर देंती थी। मुझे तब पता नहीं था कि मेरा मन बच्चों के साथ लगता है।

भाभी जी की बातों में जहाँ संघर्ष की कहानी थी, वहाँ हँसी मजाक की बातें भी थी। शायद वह मुझे बताती थीं कि जीवन में दुख ही नहीं संघर्ष भी है और संघर्ष के लिए हिम्मत चाहिए । तो जीवन पथ में आगे बढना है तो दुःख से ऊपर उठना होगा।

एक वर्ष बीतते -बीतते मेरी तबियत खराब रहने लगी थी। दुःख और सदमे का प्रभाव शरीर में दिखने लगा था। डॉक्टर अधिक से अधिक आराम करने को कहते थे। यहाँ पानी भरी बाल्टी उठा कर बाथरुम तक ले जानी पङती थी।

उस घर में आते ही दो महीने में दो गहरे आघात लगे थे। अतः उस घर के लोग कहने लगे थे कि ‘यह मकान आपको suit नहीं किया है। जबकि मैं सहमत नहीं थी। जो हमें छोङ गए, वो उस मकान में नहीं रहते थे। सुख-दुख तो जीवन का हिस्सा है, इसमें किसी मकान का क्या दोष?

महत्वपूर्ण उस मकान में रहने वाले सदस्य थे, जिनसे मिले अपनेपन के कारण वो कठिन समय बीत सका था।

जिन्हें समझे थे हम पराए,

वे ही थे हमारे अपने,

दर्द से जब निकले,

तब याद उनकी आई,

वे ही थे हमारे हमदर्द ,

यह बात समझ में आई।

नए मकान- नए परिवेश – चतुर्थ भाग

तीसरा मकान

नया शहर- नए लोग

सेतु का हमारे जीवन में आना अथार्त गृहस्थी के एक अगले सुंदर पङाव में कदम रखना था।

हम सामान ट्रक में भर कर गुड़गांव की ओर चले और दिल्ली को अलविदा कहा, कहीं मन में उम्मीद जगाने की कोशिश तो की थी कि कभी दिल्ली वापिस लौटेंगे …… पर नहीं लौटे….
हम गुडगांव पहुँचे और हमारा ट्रक एक बङे मकान के सामने रूका, उस मकान के भारी दरवाजे को देख, मुझे अपने मायके के मकान के मुख्य द्वार की याद आई थी।
मकान का दरवाजा खुलते ही एक बङा आंगन था, आंगन के शुरू में ही बाए तरफ हमारी एक छोटी रसोई , उससे लगकर एक कमरा और उससे जुङा दूसरा कमरा था।पहले कमरे से हो कर दूसरे कमरे में जाना था। परंतु दोनो कमरे में दूसरे दरवाजे भी थे जो बाहर गली में खुलते थे।

यहाँ हमें शौचालय व स्नानघर मकान मालिक के बङे बेटे के परिवार के साथ शेयर करना था। शुरू में चिंता हुई कि बहुत कठिनाई आएगी, परंतु बङी भाभीजी यानि घर की बङी बहु के मधुर स्वभाव व समझदारी ने सब आसान कर दिया था।

यहाँ भी मकान मालिक ‘गुप्ता जी’ थे। यह गुप्ता जी एक छोटी दुकान के मालिक थे , जिसमें वह दैनिक प्रयोग की वस्तुएं रखते थे। हरियाणा के किसी सरकारी विभाग से रिटायर हुए थे। अब अपना समय इस दुकान में काटते थे । अपने समय में इनके पास पैसा था पर अब कठिनाई में थे। बहुत मन से यह बङा मकान बनाया था। इनके चार बेटे और तीन बेटियाँ थी। अभी एक बेटा- बेटी कुआंरे थे।

दो बङे बेटे इसी मकान में अपने-अपने भाग में स्वतंत्र रहते थे।तीसरा बेटा माता-पिता के साथ उनके भाग में रहता था। गुप्ताजी का अपना भाग बहुत सुंदर बना था।

मेरी सबसे पहली मुलाकात दूसरे बेटे की पत्नी प्रेमा से हुई थी। उसका कमरा हमारे कमरे के साथ ही था। अतः जब तक ट्रक से सामान उतरा मैं सेतु को लेकर उसी के कमरे में बैठी थी।

प्रेमा का मुझ से पहला सवाल था, ” क्या नाम है, तेरा?” यूं तो हम दिल्ली वासियों के लिए तु करके बोलना आम बात है, परंतु पहली मुलाकात में यह बेतकल्लुफी अजीब लगी थी। उसके हरियाणवी अंदाज़ ने बता दिया था कि मैं हरियाणा में बैठी हुँ।

मैं जानती थी कि गुडगांव एक गांव नहीं अपितु एक छोटा शहर है, जो दिल्ली के सामने तो देहात ही था।

1985 में गुडगांव के नए भाग बसने शुरू ही हुए थे। किसान अपने खेत- खलिहान सरकार को बेच रही थी और सरकार वहाँ नए सेक्टर बना रही थी।इसके साथ सरकारी मकानों के अतिरिक्त प्राइवेट कोठियां भी बननी शुरू हो गई थी।

हम पुराने गुडगांव में रह रहे थे।इधर रहने वाले लोग लोकल लोग कहलाते थे अथार्त जिनके पुर्वज सदियों से यही रहते आए थे। इनमें सभी जातियों के लोग थे। बनिया, कायस्थ , पंजाबी, सिंधी, गुर्जर और मुसलमान भी थे।

यह माना जाता है कि पांडवों ने गुरू द्रोणाचार्य को यह गांव भेंट स्वरूप दिया था। इसीलिए इस को गुरूग्राम कहते थे, बाद में धीरे-धीरे इसका नाम बिगङ कर गुड़गांव पङ गया था । अब फिर सरकारी तौर पर इसका नाम गुरूग्राम हो गया है।

आर्य , गुप्त व मौर्य साम्राज्य का शासन देखने के बाद इस शहर ने मुगलों , राजपुतों व अंग्रेजों का शासन भी भोगा है। यह 1947 में स्वतंत्रता के बाद पंजाब के प्रमुख जिलों में से एक था, 1966 में हरियाणा पंजाब से अलग हुआ और गुडगांव हरियाणा का हो गया । यह भी कहा जाता है कि यहाँ की भूमि खेती की दृष्टि से ऊपजाऊ नहीं थी। अतः धीरे-धीरे यहाँ नए- नए उद्योग खोलने के लिए लोगों को प्रोत्साहित किया गया था।

1985 के गुडगांव ने विकसित होकर गुरूग्राम की शक्ल ही बदल दी है। शहर का औद्योगिकीकरण हुआ, नए-नए-नए माॅल खुल गए हैं । बङी-बङी बिल्डिंग बन गई है। इस देहाती शहर का नाम पूरी दुनिया में प्रसिद्ध हो गया है। तब जब मैं किसी को बताती कि मैं गुडगांव में रहती हुँ, लोग सोचते, ” बेचारी दिल्ली की लङकी देहात में जा बसी है।” वहीं वे आज सोचते है कि ” मैं एक आधुनिक शहर में रहती हुँ।”

आज गुरूग्राम हरियाणा का दूसरा सर्वाधिक जनसंख्या वाला शहर है और भारत का यह चंडीगढ़ और मुंबई के बाद तीसरा पर कैपिटा इनकम वाला नगर है।

यह परिवार गुड़गांव के स्थानीय बनिया थे। इनके आस-पास भी सभी स्थानीय लोग रहते थे। अतः इनकी भाषा में स्थानीय हरियाणवी ठेठपना होते हुए भी हिन्दी अच्छी थी।
मेरी मुलाकात मकान मालकिन से उस दिन शाम को हुई थी। उन्हें देखकर तो उन्हें हरियाणवी नहीं कहा जा सकता था, पर बोली में रौब और तेजी थी। वह छोटे कद की सख्त मिजाज़ की महिला थी। उन्हें देखकर मुझे अपनी मामी नानी की याद आती थी। बिलकुल नारियल के समान, ऊपर से सख्त अंदर से कोमल थी। सेतु का बहुत ध्यान रखती थी, उसके रोने की आवाज सुन तुरंत आ जाती थी, बोलती, ” अरी, बहु, क्या हुआ छोरे को?”

हम किराया मकानमालिक को ही देते थे। फिर एक दिन अम्मा जी(मकान मालकिन) मेरे पास आई और बोली, “तुम भविष्य में किराया मुझे दिया करना, गुप्ता जी के हाथ में मत देना।”

मैंने एस. के. को बताया तो उन्हें यह सुझाव अजीब लगा और बोले, ” बाबुजी ( गुप्ताजी) बुरा मानेंगे।”

आदमियों को कहाँ औरतों की बात समझ आती है और उन्होंने किराया बाबुजी को ही दिया था तब अम्मा जी बोली तो कुछ नहीं पर उनके व्यवहार में बदलाव आ गया था।
मुझे जो बात समझ आई उसकी पुष्टि उनकी बहु ने भी की थी।बाबुजी घर का पुरा खर्च उठाते थे पर अम्मा जी को एक पैसा नहीं देते थे।अपने खर्च वह हमारे किराए से पुर्ण करती थी।

समाज में सभी जगह औरतों की तकलीफे एक जैसी होती है। पुरुष अपने को अक्लमंद समझते हैं , उन्हें लगता है कि पैसा संभालने की समझ उन्हीं के पास है। औरतों की निजी जरूरत , सुरक्षा- असुरक्षा, आत्मसम्मान की भावना को तो कोई बिरले ही समझ पाते हैं ।
ऊपर से दबंग दिखने वाली अम्माजी भी अपने पति के सामने कमजोर पङ जाती थी।
उसके बाद मैं स्वयं अम्माजी के हाथ में किराया देने लगी थी।बाबुजी ने भी बुरा नहीं माना था। यानि बाबुजी सब जानते थे, फिर एक बार किराये के पैसे उनके पास आ जाते थे तो वह स्वयं उन पैसों को अम्माजी के हाथ में क्यों नहीं देते थे?

अब अम्माजी हम से खुश रहने लगी थी, गुङगांव में पानी की समस्या थी पर उनकी कोशिश रहती थी कि हमें परेशानी न हो।

हमारे कमरे के सामने थोङा आंगन पार कर दो स्नानघर थे, उनमें से एक स्नानघर हमें उनके बङे बेटे के पांच सदस्यों के परिवार के साथ शेयर करना था। हमें स्नान के लिए अपनी रसोई के नल से पानी भर कर ले जाना होता था। पानी की दिक्कत थी पर यह भी सच है कि कई बार पानी सिर्फ हमारी रसोई में ही आता था और उन सबको हमारी रसोई से पानी लेना पङता था।

समस्याएं थी, जब गुङगांव रहने का फैसला करा था तो इन समस्याओं को कबूल भी करना था। फिर दिमाग में था कि यह जिला गांव जैसा होगा , पर खुशी थी कि यह छोटा सही शहर तो है।

अम्माजी का बङा बेटा दिल्ली के किसी सरकारी विभाग में काम करता था, नौकरी अच्छी थी पर उसकी शराब पीने की आदत से बङी भाभी बहुत तनाव में रहती थी। इसी कारण उन्होंने अपने 18 वर्षीय बेटे को अपने मायके छोङा हुआ था।उनका मायका रेवाङी में धनी व्यापारी का था। दिल्ली के गुप्ताईन व इंदू भाभी (बङी भाभी) में इसी बात में समानता थी। दोनों का अपने बेटों को अपने मायके (यानि उनके नाना-नानी की देख-रेख ) में छोङना अजीब था। जहाँ तक मुझे याद है दोनो लङके पढ़ाई में पिछङे हुए थे।

इंदू भाभी के 15 व 12 वर्ष की दो बेटियाँ भी थी। दोनों पढ़ाई में होशियार थी। जबकि दोनों माता – पिता के साथ रहती थी।

अम्माजी इंदू भाभी को पसंद नहीं करती थी।कई बार माता-पिता अपने लङके की गलत आदतों के लिए अपने बेटे को दोष न दे कर अपनी बहु को ही दोष देते हैं कि उनकी बहु उनके बेटे(अपने पति) को संभाल नहीं सकी है।

मेरा मन इंदू भाभी के साथ ही लगता था। गुङगांव शिफ्ट होने के डेढ़ महीने बाद मेरा छोटा भाई आशु चला गया और उसके एक महीने बाद मम्मीजी का स्वर्गवास हो गया था। तब उस संताप में मुझे बाहर की रोशनी और लोगों से बात करना अच्छा नही लगता था।मैं अपने सब काम जल्दी खत्म कर, सेतु को लेकर कमरा बंद कर रहती थी।तब इंदू भाभी ने मेरा दुख समझा था।

यहाँ मकान में कई लोग रहते थे, पर दिल्ली के पहले मकान की तरह नियम -कानून नहीं थे। सिर्फ सप्ताह के दो दिन शौचालय की टंकी में पानी भरना होता था।पानी का दबाव कम आता था, अतः ऊपर टंकी तक पानी स्वयं नहीं पहुँचता था व किसी पाइप से भी नहीं भर सकते थे। तो बाल्टी भर कर ही टंकी में पानी डालते थे।

लेकिन मैंने एक दिन भी यह काम नहीं किया था, चूंकि अम्माजी की बहुएँ मेरा साथ देती थी।वे मुझ पर हँसती और कहती,” आपको तो देखने से ही लगता है कि आपने ऐसे भारी काम कभी नहीं किए हैं ।”

अम्मा जी की बङी बहु इंदू अमीर घर की थी, जिससे अम्माजी की निभती नहीं थी। दूसरी बहु प्रेमा गरीब घर की थी, वह ही सास की प्यारी थी। तीसरी बहु मीना दूर कानपुर की थी।

प्रेमा थोङे भारी बदन की थी, पर सुंदर थी। शायद दो बच्चों के होने के बाद मोटी हो गई थी, चूंकि उसकी शादी की फोटो में वह पतली दिख रही थी।

प्रेमा अपने पति के साथ बाइडिंग का काम करती थी। उसके 8 व 7 वर्ष के दो बेटे थे। पति के काम में सहयोग करते हुए , गृहस्थी के सब काम, बच्चों की देखभाल व समय मिलते ही या सास की जरूरत के समय सास-ससुर का काम भी करती थी।

औरतें एक साथ कई कार्य करने की क्षमता रखती हैं ।यह सिर्फ मैं नहीं कह रही, गांधीजी ने भी कहा था।

समय पर सही काम अन्यथा उलाहने मिलने में देर नहीं लगती थी। वह अपनी सास की सबसे पसंदीदा बहु थी क्योंकि उलाहने सुन कर भी हँसती रहती थी व सभी काम कुशलता से करती थी।

अम्माजी की तीसरी बहु मीना की बुरी गत थी। शादी के दो साल के भीतर उसके दो बेटियाँ हो गई थी। अतः शारीरिक रूप से भी वह कमजोर हो गई थी, फिर गोदी में दो बच्चे, वह घर के काम उतनी चुस्ती -फुर्ती से नहीं कर पाती थी।

उसके प्रत्येक कार्य में नुक्स निकाला जाता था, उसका आत्मविश्वास कमजोर कर दिया गया था। फिर भी प्रेमा भाभी उसका साथ देती थी। मीना M.A. पास थी ।उसकी शिक्षा का प्रभाव उसकी बातचीत व लहजे में झलकता था। वह कम पढ़े-लिखे परिवार में आई थी पर अपनी शिक्षा का प्रदर्शन नहीं कर रही थी।

मैंने देखा वह जब भी कहीं बाहर जाती, बहुत सलीके से तैयार होती थी, सांवली थी पर उसे बहुत अधिक मेकअप की आवश्यकता नहीं थी।मीना के पति का काम हमारे स्थानीय निवास से बहुत दूर था। उसे आने – जाने में परेशानी थी अतः वह अपने परिवार के साथ अपने कार्यालय के पास ही शिफ्ट हो गया था।

एक दिन अम्मा जी व परिवार के सदस्य मीना से मिलने उसके घर गए थे। जब अम्माजी उस से मिलकर वापिस आई तो बहुत खुश थी, मीना ने उनकी अच्छी खातिरदारी की थी। उसके बनाए पकवानों के साथ, जिस प्रकार उसने अपनी गृहस्थी सजाई थी, उसका वर्णन किए बिना भी वह नहीं रह पा रही थी।

बाद में पता चला था कि अंत समय तक अम्मा- बाबुजी उसी के पास रहे थे।
अक्सर बहुओं को अपनी ससुराल में सम्मान नहीं मिलता है, उन्हें अपनी ससुराल में अपनी जगह बनाने के लिए बहुत हील – हुज्जत करनी पङती है।

यादें बेशकीमती होती हैं ,

जिनके रंग अपने-अपने होते हैं ,

याद आते हैं वे अजनबी,

जो थे कभी, मेरे हमदर्द।

( ऐसे अन्य हमदर्दो के निजी दर्दों की दास्तान अगले भाग में)

क्रमशः