स्वामी विवेकानंद (भाग-3)

सेवा ही पूजा है


‘स्वतंत्रता, विकास की पहली शर्त है।’ स्वामी जी कहते हैं यह बात एक बार नहीं हज़ार बार गलत है कि तुम में से कोई भी यह कहता है कि ” मैं इस औरत या इस बच्चे की मुक्ति के लिए काम करूंगा।”
छोड़ दो! वे अपनी समस्याएं स्वयं सुलझाएंगे।तुम कौन हो? यह मानने वाले कि तुम सब जानते हो?
तुम यह सोचने कि हिम्मत कैसे कर सकते हो कि तुम्हारा ईश्वर से ऊपर अधिकार है।
क्या तुम नहीं जानते कि प्रत्येक आत्मा ईश्वर की आत्मा है।’
स्वामी जी कहते हैं कि ‘प्रत्येक में ईश्वर देखो। तुम केवल सेवा कर सकते हो।
यदि तुम्हारे पास संसाधन है तो ईश्वर की संतानों की सेवा करो।
तुम भाग्यवान हो कि ईश्वर ने तुम्हें उसके किसी बच्चे की सेवा के लिए अपनी स्वीकृति दी है।
तुम भाग्यवान हो कि तुम्हें वो विशेषाधिकार मिला है जो दूसरों के पास नहीं है।
इसे केवल पूजा की तरह करो।’

मेरी समझ

हम सब ईश्वर की संतान है, हमारे सभी कर्म ईश्वर की आराधना है।हमें अपना जीवन दूसरों की सेवा में अर्पित करना चाहिए , यही ईश्वर की सच्ची पूजा है।

विचारों का समावेश

‘शिक्षा सूचनाओं का भंडार नहीं है, जिन्हें तुम्हारे दिमाग में भर दिया जाए, जहाँ वे मिलकर उपद्रव करे और तुम पूरे जीवन उसे हजम न कर सको।’
विवेकानंद जी कहते हैं, ‘हमारे पास जीवन- निर्माण, व्यक्ति- निर्माण व चरित्र – निर्माण के विचारों का सम्मिलन होना चाहिए ।


यदि तुम पांच ऐसे विचारों को ग्रहण करते हो, जिससे तुम्हारे जीवन व चरित्र का निर्माण होता हो, तब उस व्यक्ति से भी अधिक तुम्हारे पास शिक्षा है, जिसने संपूर्ण पुस्तकालय रट लिया है।’
वे कहते हैं , ‘ यदि शिक्षा का अर्थ सूचनाएं हैं , तब पुस्तकालय संसार के महान संत और विश्वकोश ऋषि हो सकते हैं ।’

मेरी समझ

शिक्षा का अर्थ सूचनाएं एकत्रित करना नहीं है, जैसा कि आज की रटन शिक्षा प्रणाली है , जहाँ बालकों को पाठों को रटना सिखाया जाता है।
हमें बच्चों को ऐसे विचारों को प्रदान करना चाहिए , जिससे उनके चरित्र का निर्माण हो सके उनकी सोचने-समझने की शक्ति का विकास हो सके व वे स्वयं के विचारों का निर्माण कर सके।

गलत शिक्षा

‘दूसरों के विचारों को विदेशी भाषा में रट लेना और उससे अपने दिमाग को भर लेना और कुछ विश्वविद्यालय की डिग्रियां प्राप्त करके, तुम सोचते हो तुम शिक्षित हो। यह शिक्षा है? इस शिक्षा का उद्देश्य क्या है ? ‘
विवेकानंद जी इस शिक्षा प्रणाली पर अपनी नाराजगी दिखाते हुए कहते हैं, ‘ क्लर्की, वकील या बहुत अधिक तो डिप्टी मैजिस्ट्रेट जो क्लर्की का ही एक दूसरा रूप है। यही सब न!
इससे तुम्हारी या देश की क्या भलाई है ?
आँखें खोलो! देखो! अन्न का भंडार भारत, भूख से बिलख रहा है।”
क्या तुम्हारी यह शिक्षा इस कमी को पूरा करेगी?
ऐसी शिक्षा जो आम जनता को जीवन संघर्ष के लिए मददगार न हो, जो चरित्र की ऊर्जा को निकाल न सके, जो एक दयालु आत्मा या शेर जैसी हिम्मत न दे सके, ऐसी शिक्षा का क्या मूल्य है।’

मेरी समझ

हमारी शिक्षा प्रणाली रटन प्रणाली है, यह व्यक्ति को विचारवान नहीं बनाती है।किताबों में लिखी सूचनाओं को रटना शिक्षित होना नहीं है।
शिक्षा का अर्थ व्यक्ति को जीवन संघर्ष के लिए तैयार करना है, उसके अंदर की छिपी प्रतिभा को बाहर निकालना है ।उसे ऐसा विचारवान और कर्मशील व चरित्रवान बनाना है, जिससे उसे स्वयं व देश समाज को लाभ हो।

शिक्षा की आवश्यकता

स्वामी जी ने कहा, ‘हमें ऐसी शिक्षा की आवश्यकता है जो व्यक्ति के चरित्र का निर्माण करे, दिमागी शक्ति को विकसित करे, बुद्धिमत्ता को पैना करे और उसे अपने पांव पर खङा कर सके।
हमें क्या पढ़ने की आवश्यकता है, विदेशी सत्ता से स्वतंत्रता, हमारे अपने विभिन्न ज्ञान उसके साथ अंग्रेजी भाषा व पाश्चात्य विज्ञान।हमें तकनीकी ज्ञान की आवश्यकता है, जिससे हम अपने उद्योगों को विकसित कर सके, जिससे व्यक्ति अपनी जरूरतों की पूर्ति के लिए तो उपार्जन कर ही सके साथ ही कठिन समय के लिए भी बचा सके।’

मेरी समझ

शिक्षा का उद्देश्य व्यक्ति के व्यक्तित्व व बुद्धि का विकास होना चाहिए। शिक्षा ऐसी हो जिससे व्यक्ति उसके जीवन संघर्ष के लिए मजबूत बन सके।

व्यक्ति निर्माण का उद्देश्य


विवेकानंद जी के अनुसार,
‘व्यक्ति का निर्माण ही समस्त शिक्षा-प्रशिक्षण का उद्देश्य होना चाहिए । प्रशिक्षण जो व्यक्ति को तत्कालीन व भविष्य की समस्त समस्याओं को सुलझाने में सहायक है ,वही शिक्षा है।


हमारे देश को चाहिए, लोहे की मांसपेशियां, स्टील की नाङियाँ और विशाल अभिलाषाएँ, इच्छाशक्तियाँ जो उन्हें कुछ भी करने से रोक न सके, जो ब्रह्मांड के समस्त रहस्यों जानने के लिए रूक न सके, अपने उद्देश्यों को पूर्ण करने के लिए वे समुद्र के तल तक जाने के लिए, मृत्यु का सामना करने के लिए तैयार हो।

यही व्यक्ति निर्माण धर्म हम चाहते है, यही व्यक्ति निर्माण सिद्धांत चाहते हैं , यही व्यक्ति निर्माण शिक्षा सबके लिए हम चाहते हैं ।’

मेरी समझ

शिक्षा का उद्देश्य व्यक्ति का संपूर्ण मानसिक, बौद्धिक व शारीरिक विकास होना चाहिए ।

क्रमशः

स्वामी विवेकानंद और शिक्षा


स्वामी विवेकानंद एक योगी व दार्शनिक थे। स्वामी  विवेकानंद आधुनिक मानव के आदर्श प्रतिनिधि हैं ।
विशेषकर भारतीय युवकों के लिए स्वामी विवेकानंद  से बढ़कर दूसरा कोई नेता नहीं हो सकता है
जवाहरलाल  नेहरू के शब्दों में,” मेरे विचार में यदि वर्तमान पीढ़ी के लोग स्वामी विवेकानंद के भाषणों और लेखों को पढ़े तो उन्हें बहुत बड़ा  लाभ होगा और बहुत कुछ सीख पाएंगे।
स्वामी जी के विचार हमें सदा प्रभावित करते रहेंगे।”

यहां स्वामी  विवेकानंद जी के शिक्षा पर विचार प्रस्तुत है।
विवेकानंद जी के विचारों को अपने शब्दों में अपनी मेरी समझ के अनुसार  भी वर्णन करने का प्रयास किया  है  ।




Philosophy of Education 

शिक्षा का दर्शन 


शिक्षा मनुष्य में उपस्थित प्रवीणता का प्रकाशन है ।
अथार्त शिक्षा द्वारा मनुष्य अपने गुणों को प्रकट कर सकता है।

ज्ञानका प्रकाशन

विवेकानंद जी कहते हैं –

‘ज्ञान मनुष्य के अंतर में उपस्थित है।
कोई भी ज्ञान बाहर से नहीं आता, यह सब उसके अंतर में निहित है।
अथार्त मनुष्य ज्ञानवान है, उसे बाहरी संसार  से ज्ञान प्राप्त नहीं करना है, वह तो उसके अंदर स्वतः निहित है  ।’

विवेकानंद जी ने कहा कि ‘हम कहते हैं, एक व्यक्ति जानता है, मनोवैज्ञानिक नियत भाषा में कहा जाना चाहिए कि वह क्या खोजता या प्राप्त करता है।
एक व्यक्ति क्या सीखता है, वास्तव में वह अपनी आत्मा के आवरण को हटाकर क्या खोजता है, जो अपरिमित ज्ञान की खान है।’

इसे समझने के लिए विवेकानंद जी ने न्यूटन का उदाहरण दिया है।
उन्होंने कहा, ‘हम कहते हैं कि न्यूटन ने आकर्षण-शक्ति की खोज की थी। लेकिन क्या वह खोज किसी कोने में बैठी उसकी प्रतीक्षा कर रही थी?’
इस प्रश्न के जवाब में वह कहते हैं कि ‘यह खोज उसके अपने मस्तिष्क में थी, समय आया और उसने उसे प्राप्त किया।’

आगे वह इसे विस्तार से समझाते हुए कहते हैं कि ‘संसार के समस्त ज्ञान मस्तिष्क से ही प्राप्त किए गए हैं।
विश्व का अपरिमित पुस्तकालय तुम्हारे मस्तिष्क में है। 
बाह्य संसार केवल सुझाव व अवसर देता है, जिससे तुम अपने मस्तिष्क का अध्ययन करते हो ।

गिरते हुए सेब ने न्यूटन को एक सुझाव दिया था, जिससे उसने अपने मस्तिष्क का अध्ययन किया । उसने अपने मस्तिष्क में पूर्व उपस्थित समस्त विचारों की कङियो को पुनः व्यवस्थित किया और उनमें से एक नई कङी की खोज करी, जिसे हम कहते है- आकर्षण- शक्ति का नियम।
यह न तो सेब में और न ही पृथ्वी के केंद्र में  कहीं  उपस्थित था।’

मेरी समझ

अतः यह कहना होगा कि विवेकानंद  जी हमें इस बात का अहसास दिला रहे थे कि हम सभी व्यक्ति संसार में उपस्थित सभी ज्ञान से परिचित हैं, हमें  सिर्फ अपने अंर्तज्ञान पर ध्यान  देने की आवश्यकता  है, जिससे हम वे सभी ज्ञान स्वतः खोज सकते हैं,जो हमारे पास है।

समस्त ज्ञान अंतर में है


‘ समस्त ज्ञान धार्मिक या लौकिक भी मनुष्य के मस्तिष्क में है। बहुत सी स्थितियों में ज्ञान छिपा हुआ नहीं था, लेकिन अधिकांशतः ज्ञान लुप्त होता है और ज्ञान पर पङे पर्दे को जब धीरे-धीरे हटाया जाता है, तब हम कहते है, ‘ हम सीख रहे है’।
और इस पर्दे को हटाने  की क्रिया से आगे का ज्ञान निर्मित होता है ।’

‘वह व्यक्ति  जिसके ऊपर से पर्दा हटाया जा रहा है, वह उस व्यक्ति से अधिक  ज्ञानी है जो निरंतर अज्ञानता के गढ्ढे  में   पङा हुआ है । वह व्यक्ति जो समस्त ज्ञान प्राप्त  कर लेता है, सर्वज्ञाता त्रिकालदर्शी है।
जिस प्रकार एक चकमक पत्थर के टूकङे में आग होती है, उसी प्रकार मनुष्य के मस्तिष्क में ज्ञान का स्थायित्व होता है और सुझाव वो रगड़ है जो इसे मस्तिष्क से बाहर  निकालती है ।
समस्त ज्ञान और समस्त शक्ति अंतर में  है ।
हम कहते हैं ,शक्तियाँ, प्रकृति के रहस्य, और बल अंतर में है।
समस्त ज्ञान मनुष्य की आत्मा से निकलता है। मनुष्य  ज्ञान  का प्रकाशन करता है और इसे अपने अंतर में  खोजता है, जो अंतर में अंनतकाल से पूर्व  स्थित  है।’

मेरी समझ

विवेकानंद जी के इस विचार को इस तरह समझा जा सकता  है कि मनुष्य जब इस धरती में  जन्म लेता है, तब उसकी आत्मा   समस्त लौकिक व धार्मिक ज्ञान अपने साथ ले कर आती है।
ये ज्ञान  उसकी बुद्धि में उपस्थित होता है। परंतु  मनुष्य अनभिज्ञ होता है कि  ज्ञान का प्रचुर भंडार उसमें निहित   है।
यदि मनुष्य  अपने अंतर में खोजे और एकाग्रता से उसे व्यवस्थित करे तो उसका अपने अंतर में उपस्थित ज्ञान से परिचय होगा।
पर इसके लिए आवश्यक है कि मनुष्य अपने जीवन में सीखने और समझने की प्रक्रिया पर अपना ध्यान केंद्रित करे,  इससे न केवल वह स्वयं इस ज्ञान के दर्शन कर ज्ञानी बनता है अपितु  वह संसार में अपने ज्ञान से दूसरों  को भी लाभ पहुंचाता है । 


अपरिमित शक्ति हमारी आत्मा में है 

विवेकानंद जी हमें समझाते हैं कि 
‘कोई भी व्यक्ति दूसरे व्यक्ति से नहीं सीखता है। बाह्य अध्यापक केवल सुझाव देता है जो वस्तुओं के समझने के लिए, अंतर के अध्यापक को जागृत करता है। तब वस्तुएं हमारे अपने विचारों और ज्ञान के द्वारा स्पष्ट होती है और अपनी आत्मा में हम इन्हें महसूस करते हैं।’

विवेकानंद जी इसे उदाहरण से समझाते हुए कहते है कि-
एक संपूर्ण बरगद का बङा पेङ जो डेढ़ बीघा जमीन घेरता  है, वह एक छोटे से बीज में था, जो शायद सरसों के बीज का 1/8 हिस्से से बङा नहीं था।
हम जानते है कि एक विशाल ज्ञान, पुरस संबधी कोशिका में चक्कर काटता था।
यह असत्य सा लगता है, परंतु यह सच है।
हममें से प्रत्येक एक पुरस संबंधी कोशिका से बाहर आया है।और वहां  चक्कर  काटती समस्त शक्तियों को हम प्राप्त करते थे। 
तुम यह नहीं कह सकते कि वे अन्न से आए हैं इससे क्या शक्ति बाहर आती  है।
इसमें कोई संदेह नहीं कि वहाँ शक्ति थी लेकिन वह वहां निश्चल है।
इसीलिए  मनुष्य की आत्मा में अपरिमित शक्ति है, चाहे  वह जानता है या नहीं।
इसका प्रकाशन ही केवल एक प्रश्न है जिसकी चेतना उत्पन्न  की जाए।’

मेरी  समझ

विवेकानंद जी की इस बात को फिर हम इस तरह समझ सकते है कि एक बच्चा जब इस धरती पर  जन्म लेता है तब वह समस्त ज्ञान अपने साथ लेकर आता है।
जिस प्रकार एक नन्हे बीज में पूरा बरगद पेङ समाया होता है, सही पानी, हवा इत्यादि मिलने से उस बीज से हमें   एक विशाल वृक्ष मिलता है।

उसी तरह उस बालक की छोटी-सी बुद्धि में समस्त ज्ञान उपस्थित होते है।बालक नहीं  जानता कि वह ज्ञानी है।
उचित मार्गदर्शन व वातावरण से उसे पूर्वतः उपस्थित ज्ञान की प्राप्ति   होती है।और वह तब सर्वज्ञाता  सिद्ध होता है, जब वह उस ज्ञान की रोशनी को संसार में फैलाते हुए, अन्य मनुष्यों  की अज्ञानता को दूर  करने में सहायक बनता है।
अज्ञानता अथार्त यह अनभिज्ञता कि वे सब भी ज्ञानी हैं ।
वे यह भी समझा रहे हैं कि अन्य जीवों व परजीवों में भी शक्ति  है, परंतु  वह एक  निश्चित  दायरे तक सीमित है।
परंतु मनुष्य  की आत्मा ज्ञानी है, अतः सर्वशक्तिमान है। कठिनाई यह है कि इसका उसे ज्ञान ही नहीं है। मनुष्य   का उसकी   शक्ति  से परिचय कराना होगा ।कहते है न! अपने ज्ञान के चक्षु खोल!  अपने अंदर उपस्थित ज्ञान   को खोज!

शीशे का पीपा

     विवेकानंद जी कहते हैं कि 
‘अधिकांशतः व्यक्तियों में पवित्र सुंदर आत्मा अंधकारपूर्ण होती है । यह लोहे के पीपे पर लैम्प के समान होता है, कोई भी रोशनी की मंद प्रभा इससे नहीं चमक सकती है।
इसका विकास पवित्रता और स्वार्थहीनता से होता है , हम अस्पष्ट माध्यम को हल्के-हल्के   गहन बना सकते हैं, अंत में  यह पारदर्शी  शीशे के समान हो जाता है।
    श्री रामकृष्ण लोहे के पीपे के समान थे, जिनका शीशे के पीपे में हस्तांतरण  हुआ था, जिससे अन्तस्थ रोशनी जैसे इसे देख सकते हैं ।


मेरी समझ

स्वामी विवेकानंद जी की उपरोक्त बात का यह अर्थ समझा जा सकता 
है कि प्रत्येक मनुष्य को  ज्ञानी तो है, परंतु अपने ज्ञान को समझने की दृष्टि सबके पास स्पष्ट नहीं होती है।
अतः उनके ज्ञान का प्रकाशन होने में  कठिनाई होती है ।
अगर व्यक्ति अपने मन या दिमाग को पवित्र और स्वार्थहीन रखे और वैसे कर्म भी करे तो उसको ज्ञान को प्राप्त करने की दृष्टि भी मिलगी व वह ज्ञान  का प्रकाशन भी कर सकेगा।
उन्होंने अपने गुरु श्री रामकृष्ण  परमहंस जी का उदाहरण दिया  है।
स्वामी रामकृष्ण परमहंस एक महान संत, विचारक और समाज सुधारक थे। विवेकानंद जी उनके प्रमुख शिष्य थे।
स्वामी जी ने मानवता को सबसे बङा धर्म  माना था।वे सभी धर्मों का सम्मान करते हुए , सभी मनुष्यों को एक साथ रहने की प्रार्थना करते थे।
विवेकानंद जी कहते हैं कि श्री   रामकृष्ण का ज्ञान भी अंधेरे में था जिसे उन्होंने तप व मानवता की निःस्वार्थ सेवा से अपने ज्ञान का प्रकाशन किया   था।
स्वामी विवेकानंद ने अपने गुरू के विचारों और शिक्षा को रामकृष्ण मिशन की स्थापना करके विश्व भर में प्रसारित किया था।


स्वामी विवेकानंद   (भाग-2)


स्वयं  शिक्षा


स्वामीजी   कहते हैं  कि ‘ आप एक बच्चे का विकास उस तरह नहीं कर सकते हैं जैसे आप एक पौधे को विकसित करते हो।
एक पौधा अपनी प्रकृति के अनुसार विकसित होता है। एक बच्चा भी अपनी स्वभावगत प्रकृति के अनुकूल विकसित होता है।
पर तुम उसके विकास में उसकी सहायता कर सकते हो।
तुम जो कर सकते हो सकारात्मक से अधिक नकारात्मक होता है।
तुम बाधाओं को  हटा सकते हो और ज्ञान स्वयं  अपनी प्रकृति के अनुसार बाहर आएगा।

इसे और स्पष्ट करते हुए स्वामी जी कहते हैं कि मिट्टी को थोड़ा ढीला करो, जिससे वह स्वयं सरलता से बाहर आ सकेगा। तुम उसके चारों ओर झाङ लगा दो पर इससे वह नष्ट नहीं होगा, तुम उस मिट्टी में बीज डाल सकते हो, उसको उसका आकार उस मिट्टी में   देने के लिए उसको उपयुक्त हवा पानी इत्यादि  दे सकते हो। यहां तुम्हारा कार्य समाप्त होता है। अब वह स्वयं अपनी स्वभावगत प्रगति करेगा।
इसी तरह एक बच्चा स्वतः शिक्षित होता है।
एक गुरु इस सोच से सब नष्ट कर देता है कि वह सब सीखा रहा है।’
एक बार फिर विवेकानंद जी याद दिलाते हैं  कि ‘ मनुष्य के अंतर में समस्त ज्ञान निहित है, जिसे सिर्फ जागृत करने की आवश्यकता है। एक गुरु का यही कार्य होता है।
हम मात्र इतना कर सकते हैं कि जिससे बच्चे अपने हाथ, पैरों, कान व आँखों की सहायता से अपने ज्ञान  का सही उपयोग  कर सकें ।

मेरी समझ

  जैसा हम समझ चूके है कि एक बच्चे की बुद्धि में समस्त ज्ञान है, उसे सिर्फ जागृत करना है अथार्त उसकी बुद्धि का विकास इस तरह करना है कि वह अपने अंदर समाए समस्त ज्ञान को समझ सके। इसके लिए उसे उचित वातावरण व सही मार्गदर्शक मिलना आवश्यक है।


स्वतंत्र  विकास


विवेकानंद जी कहते हैं कि ‘ऐसी शिक्षण व्यवस्था जिसका उद्देश्य   हमारे बच्चों को ऐसे  शिक्षित  करना है कि जैसे गधे के मालिक को सलाह दी जाए कि गधे को नष्ट करके उसे घोङा बनाया जा  सकता है।ऐसी व्यवस्था को खत्म कर देना  चाहिए  ।
यह परंपरागत अभ्यास है कि माता-पिता अपने बच्चों पर इस तरह कठोर शासन करते है कि इन बच्चों को स्वतंत्र विकास के अवसर मिल नहीं पाते हैं।’
विवेकानंद जी कहते हैं कि ‘प्रत्येक बच्चे में अपरिमित प्रवृत्तियाँ होती है, जिनकी संतुष्टि के लिए उपयुक्त अवसरों की आवश्यकता होती है।
तीव्रता से सुधार की कोशिश  का अंत, धीमा सुधार होता है।
अगर आप उसे शेर बनने की अनुमति नहीं देते हो, तो वह लोमड़ी बन जाएगा।


मेरी समझ



विवेकानंद जी ने वर्तमान शिक्षा प्रणाली व माता-पिता के कठोर अनुशासन की आलोचना करी है।
उनके अनुसार शिक्षा प्रणाली ऐसी होनी चाहिए जिसमें बालक अपनी प्रवृत्ति के अनुसार स्वतः शिक्षा प्राप्त कर सके।
माता-पिता में अपने बच्चों को एक तथाकथित अच्छा  बच्चा बनाने की बहुत जल्दबाजी होती है। जिस कारण वह उनसे कठोर व्यवहार करते हुए उनकी संभावित  प्रवृत्तियों के विकास में बाधाएं खङी कर देते हैं  ।
हमें अपने बच्चों की परवरिश सहजता और इत्मीनान के साथ करनी चाहिए । उन्हें उनकी प्रवृत्ति के अनुसार विकसित होने के लिए समय और मौके मिलने चाहिए  ।



सकारात्मक  विचार


विवेकानंद जी कहते हैं कि ‘हमें हमेशा सकारात्मक विचार ही प्रकट करने चाहिए, नकारात्मक विचार केवल व्यक्ति को कमजोर बनाते हैं ।
अक्सर हम देखते हैं  कि माता-पिता अपने बच्चों पर पढ़ने लिखने का निरंतर दबाव डालते हुए,  उन्हें कहते है कि वे कभी कुछ नही सीख सकेंगे, वे उन्हें मूर्ख कहते हैं व कई बार इससे भी अधिक बोल जाते है।’
विवेकानंद जी कहते हैं , ‘ तुम उनसे कोमल शब्दों में बात करते हुए उन्हे प्रोत्साहित करोगे तो उनमें शीघ्र   सुधार पाओगे।
यदि तुम उन्हें सकारात्मक विचार देते हो,तो उनका एक ऐसे व्यक्ति के रूप में विकास होगा जो अपने पैरों पर खड़ा होना सीख सकेगा ।
भाषा, साहित्य या कला में, प्रत्येक क्षेत्र  में, व्यक्ति जैसे विचारों का निर्माण करता है या क्रिया करता है, हमें उनमें उनकी गलतियों पर उंगली नहीं उठानी है, अपितु ऐसे विचार देने चाहिए कि वे अपने कार्य को बेहतर  बना सके।’
स्वामी  जी ने कहा,”अपनी शिक्षण पद्धति को शिक्षण की आवश्यकतानुसार परिवर्तित कर देना चाहिए।” 
अतीत में हमारी प्रवृत्तियों को परिवर्तित किया जाता रहा है, आज हमें  बालक की प्रवृत्ति के अनुरूप उसे शिक्षा देनी है।
प्रत्येक को, जो जहाँ खड़ा है, वहीं से आगे बढ़ने  दिया जाना चाहिए।’
स्वामी जी ने अपने गुरु रामकृष्ण जी का उदाहरण देते हुए कहा ,’ हम देखते हैं  कि कैसे श्री रामकृष्ण जी, जिन्हें हम निकृष्ट मानते हैं, उन्हें भी प्रोत्साहित करते हुए,उनके जीवन में भी बदलाव ले आए थे।
वह किसी भी व्यक्ति की विशेष प्रवृत्ति की अवेहलना नहीं करते थे। वे सबसे आशावादी व प्रोत्साहन  करने वाली बाते करते थे, वह निम्न से निम्न   व्यक्ति को प्रोत्साहित करते और उनके शब्द उसके   जीवन को आगे बढ़ाने में  सहायक   बनते है।’



मेरी समझ




‘हमारी प्रवृत्ति है कि हम अपने बच्चों को सख्ती से, कठोर अनुशासन में रखते हैं।परंतु ऐसा करने से बच्चों का स्वाभाविक विकास नहीं हो सकता है।कठोर शब्द व कठोर व्यवहार बच्चों की बुद्धि को कमजोर बनाता है।कमजोर को और कमजोर करता है।
हमें अपनी इस प्रवृत्ति में बदलाव लाने की आवश्यकता है।
समाज के सुधार के लिए आगे की पीढ़ी को सकारात्मक, ऊर्जावान व आशावान बनाना आवश्यक है।

‌‌ क्रमशः

















  





















 















माँ की याद में -(अंतिम भाग )

स्वर्गिक यात्रा

माँ की स्वर्गिक यात्रा पापा के बिना पूर्ण नहीं हो सकती है। माँ की अंतिम विदाई हुई और पापा याद आए।
पापा की बातें, जो वह माँ के लिए करते थे, वह भी अपने लिए किसी सुख की बात नहीं करते थे, चूंकि माँ के सुख में ही उनका सुख था।
माँ का सुख, माँ की चिन्ता और माँ के लिए उनके ह्रदय में सिर्फ प्रेम को ही नहीं , माँ के लिए सच्चे सम्मान को भी महसूस किया जा सकता था।

वह नास्तिक नहीं थे, पर पूजा- पाठ के पाबंद न होते हुए भी माँ की पूजा-अर्चना के प्रति पूर्ण श्रद्धा रखते थे।
एक सामान्य गृहस्थ व्यक्ति के मन में यह साध रह जाती है कि वह अपनी सहधर्मिणी को जीवन के समस्त सुख दे पाता। वह अपनी जीवनसंगिनी के त्याग और तपस्या के सामने नतमस्तक होता है।

पापा, माँ की झोली समस्त सुखों से भरना चाहते थे। उन्होंने कहा,” देखें , तुम्हारी माँ की झोली कब उनकी पूजा के फलों से भर पाती है।”
तब पूजा के फल अथार्त सांसारिक सुख ही समझा गया था। हम तार्किक लोग कैसे समझ सकते थे! यह तो अब जाना माँ को सांसारिक सुख की नहीं आत्मिक और अलौकिक सुख की चाह थी।

माँ की भक्ति अतार्किक थी, तभी तो वह सच्ची भक्तिन बनी और ईश्वर को पा सकी हैं ।

पापा का आशीर्वाद माँ के लिए-

‘आशीर्वाद ‘

आज मैं निश्चित हुआ,

प्रसन्न हुआ, आत्मविभोर हुआ,

जो तुमने आज अपनी पूजा का फल पाया है।

तुम्हारी झोली पूजा के फूलों

और प्रसाद से भरी है-

मन बाग-बाग हुआ जाता है-

तुम्हारे उल्लसित, आनंदित , प्रकाशमान चेहरे को देख,

वाह। ! क्या! तुमने अपनी-

त्याग और तपस्या का फल पाया है,

यूँ तो मेरा आशीर्वाद था तुम्हें –

जीवन के समस्त सुखों से,

झोली भरे रहे तुम्हारी-

हाँ, आशीर्वाद तो रहा-

पर आत्मविभोर हुआ जाता हूँ

कि

तुमने आज अपनी पूजा का फल पाया है।

यही तो थी तुम्हारी तपस्या-

तब न समझ पाया,

पर आज आत्मविभोर हो तुम्हें ,

निहारा करता हूँ ,

तुमने अपनी भक्ति का फल पाया है।

आज मैं निश्चित हुआ।

माँ की याद में -(भाग-5)

स्वर्गिक यात्रा

एक खूबसूरत अनोखे , अनमोल, अवर्णनीय दृश्य के हम साक्षी बने, यह हमारा सौभाग्य था।
वह जा रहीं थी और हम भजन गा रहे थे, हमें किसी ने नहीं कहा था, हमने एक-दूसरे से भी भजन गाने के लिए , नहीं कहा था, पर हम उस दृश्य में डूब गए थे। जैसे कि हम अनुभव कर सकते थे कि माँ को लेने स्वयं प्रभु आए हैं ।

माँ का उज्जवल , शांत चेहरा हमें अभिभूत कर गया था। मुझ अज्ञानी के पास शब्द नहीं कि उस दृश्य को शब्दों में बाँध संकू।


‘स्वर्गिक आनंदित पल ‘

आज मैं आनंदित , उल्लसित,

तुम मुझे लिवाने आए हो,

मेरे प्रभु! तुम मेरे द्वारे आए हो,

आनंदित, उल्लसित दीवानी हुई जाती मैं,

आरती गाऊँ ,भजन गाऊँ?

धूप जलाऊँ, दीप जलाऊँ ?

मैं दीवानी, कुछ समझ न पाती हुँ,

तुम मुझे लिवाने आए हो,

द्वार पर फूल बिछाऊँ,

दीपों की माला सजाऊँ,

या

स्वयं दीप बन जाऊँ ,

आनंदित -उल्लसित दीवानी हुई जाती मैं ,

तुमने थाम मुझे रथ पर बिठाया है,

वाह! यह स्वर्गिक आनंदित पल,

मैं तुम में लीन हुई जाती हुँ,

यह सुंदर भजन स्वर!

हाँ ……….मेरे उत्तराधिकारी……….

तुम्हारे स्वागत में, मेरी अंतिम विदा पर,

भजन गाते हैं ।

तुम्हारी कृपा से इन्होंने मेरा-

यह अंतिम मार्ग सुलभ कराया है।

मैं आनंदित , उल्लसित बाल- सुलभ, किलकारी करती,

तुम संग इन पर शुभाशीषों की वर्षा करती हूं। :

जानती हुँ, विश्वास है मुझे-

तुम संभालोगे इन्हें ।

मैं तो आनंदित, उल्लसित, बस

दीवानी हुई जाती हूँ,

तुम मुझे लिवाने आए हो।

क्रमशः

माँ की याद में -(भाग-4)

स्वर्गिक यात्रा

जीवन में उल्लास व आशा दिखती है तो मृत्यु में रहस्यमय भय व निराशा है। यह सच है कि जीवन है तो मृत्यु भी अवश्यंभावी है।

मृत्यु क्या है? कैसी है? उसके बाद क्या? ऐसे अनेक प्रश्न मृत्यु से जुड़े है।
मृत्यु की रहस्यमयी प्रवृति मन में भय पैदा करती है।

जीवन के अंतिम पङाव में मृत्यु का ख्याल एक अनिश्चितता पैदा करता है।
माँ की बिमारी ने जहाँ हम उनके अपनों को चेताया था, वहाँ माँ भी निश्चित हो गई थी कि यह जीवन पूर्ण हुआ जाता है।

‘अनजाना भयभीत मन’

क्या मैं प्रसन्न हूँ ?
कि
जिस वक्त का था इंतजार ,
आखिर वो आ गया।
अगर हां , तो फिर यह डर कैसा?

यूं तो प्रभु! होती तो हूँ, मैं तुम्हारे ध्यान में ,

पर हर स्वर पर चौंक जाती हूँ ,

क्यों ?

पूर्णतः शांति, बेआवाज़ डराती है मुझे ,

क्यों ?

अकेला होना भयभीत करता है,

क्यों ?

लेटना चाहती हूँ , पर-

लेट कर सोने का ख्याल सहमा देता है,

क्यों ?

क्या यह मृत्यु का भय है?

गर जानती हूँ कि उस पार भी खुशी है,

तो यह भय क्यों ?

गीता के तुम्हारे प्रत्येक अक्षर पर,

विश्वास है मुझे,

पूर्णतः तुम पर विश्वास है मुझे ,

तो यह भय!

क्यों ?

इस शरीर से भी मोह नहीं मुझे,

पर प्राणों के निकलने का भय!

क्या यही है वो डर!

ओह! यह बैचेनी !

ईश्वर ! मेरी हर सांस तेरा नाम लेती!

लेकिन

जब यह सांस निकलेगी इस शरीर से-

तब क्या ले पाऊँगी नाम तेरा?

क्या यही है वो डर?

पर

मै शांत भी हूँ ,

तुम हो साथ मेरे,

यह है विश्वास है साथ मेरे,

पर हूँ तो साधारण मानस,

तब न हो दर्द –

यह भय है क्या?

अब तो तुम्हीं पार लगाओगे!

हाथ तुम्हारा थाम,

भवसागर पार जाऊँगी ।

क्रमशः

माँ की याद में -(भाग-3)

स्वर्गिक यात्रा

व्यक्ति सांसारिक मोह-माया में पूर्णतः जकङा होता है, वह उससे मुक्त होना चाह कर भी, नहीं हो पाता है।
एक सच्चा साधू-संत भी इस मोह-माया में कहीं न कहीं फंसा रह जाता है।
संत कबीर ने भी कहा है,
“जहाँ लगि सब संसार है, मिरग सबन की मोह
सुर, नर, नाग, पताल अरु, ऋषि मुनिवर सब जोह।”

माँ तो एक सामान्य गृहणी थी, जिनका जीवन सांसारिक धर्म सच्चे मन से निभाने में बीता था।
‘कर्म ही भगवान् की पूजा है’ यह उनकी ईश्वरीय साध थी पर साथ ही पूजा-अर्चना को अपना पूरा समय देना भी उनका अपना व्यक्तिगत संकल्प था।जिसमें उन्होंने कभी चूक नहीं होने दी थी।

और अब अंत समय सामने था, वह ईश्वर में लीन होना चाहती थीं, अपने प्रभु की ऊंगली पकङ वह उस पार जाना चाहती थी। लेकिन वह जानती थी कि जब तक सांसारिक मोह-माया से बंधी हूँ, प्रभु उंगली नहीं थामेंगे।
यह आसान नहीं था, पर वह जानती थी नामुमकिन भी नहीं है।

कबीर कहते हैं –
” मोह नदी बिकराल हे, कोई न उतरे पार
सतगुरु केबट साथ लेई, हंस होय जम न्यार।”

‘मोह और ईश्वर ‘

छोङना होगा, अब सब कुछ,
हर मोह, माया और सारी चिन्ताएँ।
जाने का समय आएगा………….
आया है……. आ रहा है………..।

मुक्त होना होगा सब बंधनों से,

अब नहीं देखना किसी ओर-

ईश्वर ! सिर्फ तुम्हें देखूँ-

तुम्हें देखते-देखते मुक्त हो जाऊँ,

प्रार्थना है मेरी-

अब कोई पूजा नहीं, पाठ नहीं,

प्रार्थना ही है सब,

तुम बैठे हो मेरे मन में ,

तुम बैठे, मेरे सामने-

अब कोई कांड नहीं ,

सिर्फ तुममें लीन होना है,

तुममें ही समाना है।

छोङना होगा सब कुछ-

बिना किसी कष्ट के-

तभी तो दोगे तुम मुक्ति

यह कैसा कोलाहल?

हर तरफ शोर…….,

मुझे नहीं देना ध्यान कहीं ओर-

सिर्फ और सिर्फ तुममें ध्यान लगाना है-

क्योंकि, अब मुझे तुम्हें पाना है!

आया है वक्त, आ गया है वक्त,

तुममें ही समाना है-

क्यों कभी-कभी मन भटकता है?

क्यों कोई मोह सिर उठाता है,

नहीं ! नहीं ! मुझे सब छोङना होगा,

किसी भी बाधाओं पर ध्यान नहीं देना होगा-

अब तो नाव आई है किनारे-

मुझे साथ लिवाने, उस पार जाने को,

बस कुछ समय और-

मोह रूपी रस्सी के खुलते ही-

नाव चल पङेगी उस पार।

मुझे नहीं देखना, पलट कर उन मोह बंधनों को,

जिनमें बंधी थी मैं,

अब तो आया है, समय-

ईश्वर को पाने का,

उसमें चूक नहीं होने देनी है-

अब छोङना ही होगा सब कुछ।

मुझे प्रभु में लीन होना है।

क्रमशः

माँ की याद में – (भाग-2)

स्वर्गिक यात्रा

ऐसा माना जाता है कि एक माँ अपनी सबसे छोटी संतान के साथ अधिक जुङाव रखती है।
हालांकि मैं इस तथ्य से सहमत नहीं हुं, चूंकि हमारी माँ का अपनी सभी संतानों से एक समान जुङाव व विश्वास था।
पर जब कोई उस जुङाव व विश्वास को अनदेखा कर गया हो, तब एक माँ का ह्रदय यह समझ सकने में असहाय था कि यह कैसे हो सकता है ?

सबसे छोटी संतान (छोटे पुत्र) को लापता हुए, 29 वर्ष हो गए थे, उसके जाने को सबने स्वीकार किया था, यह ही मान लिया था कि वह अब इस दुनिया में नहीं है।(उसके न होने के प्रमाण भी थे)।

पर एक माँ प्रमाण नहीं मानती, वह सिर्फ अपने विश्वास को समझती है।
वह तो अंत तक उसकी राह देखती रहीं थी।

वह यह मानती थीं कि वह उनके साथ लुकाछिपी का खेल खेल रहा है ।जैसे कृष्ण अपनी माता के साथ खेलते थे।

‘यह कदंब का पेङ अगर माँ होता यमुना तीरे,
मैं भी उस पर बैठ कन्हैया बनता धीरे-धीरे ।’

उन्होंने इस लुकाछिपी के खेल को ही सच माना था।
जब यह जान लिया कि अंतिम समय सामने हैं , तब एक बार फिर ह्रदय विकल हुआ, ‘ उससे मिलने के लिये , कितने सवाल……एक बार आँख भर देखने के लिए।’

फिर अपनी इस विह्वलता को शांत कर, इस लुकाछिपी में ही अपनी संतान का सुख स्वीकार कर, अपने को समझा लिया कि’ मैं न सही, पर वह मुझे देख रहा है और वह मेरे अंत समय को जान जाएगा।’

‘ज़ख्म जो कभी नहीं भरा’

तुम हो आस-पास मेरे,

यह विश्वास ही नहीं ,जानती हूँ ,

कि देखा है,पहचाना है,

क्या?

गर लगा कि तुम ही हो तो!

सोचा-‘जरूर पुकारोगे,’

और, क्यों न चाहूँ?

तुम पुकारो मुझे-

तुम ही ने तो किया था भ्रमित!

क्या नहीं जानते थे तुम?

कुछ अलग जुङाव,

कुछ अलग अनुभूति ,

बहुत -सा अपनापन-

सबसे समभाव रहते हुए भी,

तुम कुछ अलग, निजी,

फिर भी चले गए न!

चलो……………..

अब तो बीता लंबा समय…….

थक गई………………… !

पुकारो न! मम्मी !

तृप्त आत्मा दें तुम्हें भी

‘आशीष’

क्रमश:

माँ की याद में –

माता-पिता को हम याद नहीं करते हैं , अपितु वे हर पल हमारे साथ होते हैं ।अपने जीवन के हर क्षण हम उनके साथ जीते हैं ।

पापा के जाने के लगभग 21वर्ष बाद माँ हमें छोङ कर गई थीं , अथार्त वह पापा की तुलना में अधिक समय तक हमारे साथ रहीं थी। पर सच तो यह था कि वह थीं तो जैसे पापा भी साथ थे।

अब तो माँ के स्वर्ग वास को भी 7 वर्ष हो गए हैं ।
आज अपनी डायरी के पन्नें पलटते हुए, उन कुछ पन्नों में फिर माँ जैसे अपने अहसासों के साथ मेरे सामने थीं।

सात वर्ष पूर्व, जब डॉक्टर ने घोषित किया कि माँ का अब अंत समय आ गया है। हम सब उनकी संतानें(पुत्र-पुत्री, पोते-पोती), उनकी देखभाल के बहाने उनके साथ अधिक से अधिक समय व्यतीत करने का प्रयास कर रहे थे।
वह भी अपनी इस स्वर्गिक यात्रा की तैयारी के अहसासों को जीने लगी थी।

मैं मुर्ख उनके इन अहसासों को समझने का प्रयास करने लगी, भला मैं कैसे उनके अहसासों को जी सकती थी? फिर भी मैं यह दुःसाहस कर रही थी। और अपने इस प्रयास को डायरी में उतार रही थी।
आज फिर जब डायरी के वे पन्ने खुले तो मन हुआ, माँ की याद को सबके साथ बांटू।

माँ ! मुझे माफ करना, आपके अहसासों और भावनाओं को समझने के अपने अनगढ़ प्रयास पर मैं शर्मिंदा हुँ।
क्योंकि कोई भी किसी के अहसासों को जी नहीं सकता है।
अपने सभी प्रियजनों से भी मैं अपने इस दुःसाहस के लिए माफी चाहती हूं।

ये शब्द मेरे हैं, मैं कह रही हुं , इस तरह जैसे वह अपने अंतिम क्षणों में हमें अपने अहसासों का भागी दार बना रहीं हो।
मैं एक बार फिर स्पष्ट कर रही हुं कि यह मेरी उनके अहसासों की मात्र कल्पना है।

‘स्वर्गिक यात्रा’

मैंने महसूस किया कि माँ अपनी इस स्वर्गिक यात्रा की तैयारी में पापा को अवश्य याद करती होंगी । उस समय बहुत छोटी आयु में एक लङकी का विवाह कर दिया जाता था, इस तरह लङकी ,अपना बचपन , जवानी… तमाम उम्र पति के साथ, अपनी ससुराल, अपनी गृहस्थी में ही गुजारती थी।मायका तो एक हल्की मीठी याद बन कर रह जाता था।

जब शायद माँ ने पापा (अपने पति) को याद किया होगा।-

प्रथम अहसास ‘

(‘अंतिम घड़ी’)

ज़िंदगी तुम से ही है,

यह समझाया तो गया ही था- पर यह भी तो कि जब ठीक से खुली आँख,
तुम ही थे सामने,

तुम से है ज़िन्दगी , याद था पाठ मुझे-

अब तुम ही जीवन धूरी,

तुम ही सुन्दर स्वप्न ,

तुम से ही बुझता कलुषित मन।

तुम और तुम्हारी निशानियाँ,

यही जीवन अर्थ ,

हमारा संघर्ष, हमारी जीत (‘मैं’ तो पता नहीं क्या है?)

और

फिर तुम चले गए – – – – –

एक लंबा सफर- – – – –

पर मैं कहां थी, तुम्हारे बिना? बीता जीवन था-
जो तुम संग और तुम्हारे कारण था।

कुछ दर्द टीसे मारते,

कहते हैं कि तुमसे मिले हैं ,

पर तुम तो याद आते हो,

अक्सर मरहम लगाते-

जो भी हो, अब नए सफ़र की तैयारी है-

क्यों लगता है?

खङे हो उस पार, बढ़ाए हाथ,

आखिर होता तो है,

जन्म-जन्म का साथ।

क्रमशः

नए -मकान – नए परिवेश (भाग-अष्टविशंति) ( हाऊसिंग सोसाइटी के अनुभव

कविता- अंतिम ऊँचाई (कुँवर नारायण)

दुर्गम वनों और ऊँचे पर्वतों को जीतते हुए

जब तुम अंतिम ऊँचाई को भी जीत लोगे-

जब तुम्हें लगेगा कि कोई अंतर नहीं बचा अब

तुममें और उन पत्थरों की कठोरता में

जिन्हें तुमने जीता है-

जब तुम अपने मस्तक पर बर्फ का पहला तूफ़ान झेलोगे

और काँपोगे नहीं –

तब तुम पाओगे कि कोई फ़र्क नहीं

सब कुछ जीत लेने में

और अंत तक हिम्मत न हारने में ।

मीशु की सगाई से दो दिन पहले, एक छोटी-सी दुर्घटना में मेरा दायां कंधा चोटिल हो गया था।
दर्द डाक्टरी इलाज़ से भी ठीक नहीं हो रहा था। मुझे चिन्ता थी कि इतनी तकलीफ़ में मैं मीशु की शादी का काम कैसे संभालुंगी।जया भी गर्भवती थी, फिर भी वह मेरा बहुत बङा सहारा बनी रही थी।हमने मिलकर बहुत आराम से सब संभाल लिया था।

फिर मीशु की शादी के तीन महिने बचे थे। और मुझे एक नोटिस मिला कि सोसाइटी के कम्यूनिटी हाॅल में योगा क्लास शुरू हो रही है। मैंने भी योगा कक्षा में जाने का फैसला लिया था।

तब मेरी पहली मुलाकात अपनी योगा गुरू स्मिता से हुई।आयु +35 की होगी। इस बंगाली कन्या में मुझे एक गुरू के साथ, एक मित्र भी मिल गई थी। जब दिल- दिमाग मिल जाएं, तो आयु- भेद कोई अर्थ नहीं रखता है।

स्मिता से मैंने योगा सीखना शुरू किया था,उसने मेरी आयु व शारीरिक कष्टों को समझते हुए, योगासन कराए। मेरी मांमांसपेशियों में बहुत तनाव था, मुझे बहुत कठिनाई आ रही थी।

स्मिता मेरी कठिनाई देख, मेरे लिए आसान रास्ते निकालती, जिससे मैं आराम से आसन कर सकती थी। उद्देश्य एक ही था कि मेरी मांसपेशियों का तनाव कम हो ।
धीरे-धीरे कामयाबी मिलने लगी थी, मुझे लगने लगा, मेरा शरीर हल्का हो रहा है।अब मैं सब काम आसानी से कर रही थी, मेरा दायां कंधा बहुत काम कर सकता था।

जैसा मैंने पहले भी बताया है कि सोसाइटी का माहौल बहुत शांत था, सभी परिवारों का आपसी संबध मित्रतापूर्ण सहयोगी था।
मीशु की शादी में हमने मेहमानों के लिए दो-तीन फ्लैट सोसाइटी में ही लिए थे। मेहमानों के रहने का प्रबंध उनमें अच्छा हो गया था।
खाने-पीने, हलवाई , मेहंदी व लगन कार्यक्रम का आयोजन भी हमने सोसाइटी के प्रांगण में किया था। सभी कार्य बहुत शांति से पूर्ण हुए थे।

मीशु की शादी हुई और श्रीष्टी अपने शुभ कदमों से हमारे घर में प्रविष्ट हुई।
कुछ लोगों से हमारे पिछले जीवन का संबध होता है और वे इस जन्म में भी मिलते हैं।ऐसा मेरा निजी अहसास है।
श्रीष्टी की मम्मी परिमला जी को मैं जानती थी, पर पहचानती नहीं थी। वह सेक्टर-7 में ही रहती थी, पर मेलजोल नहीं हुआ था।वह मीशु के स्कूल के प्रशासनिक विभाग में काम करती थीं, मैं उनके व्यक्तित्व से प्रभावित थी।

यह कुदरती करिश्मा है कि जिन्हें हम बरसों से जानते हैं, उनसे एक दिन करीबी रिश्ता जुङता है।
यह रिश्ता अथार्त उत्तर और दक्षिण का मिलन है। एक-दूसरे की संस्कृति को सम्मान देने में ही रिश्तों की सार्थकता है।

परिमला जी के कारण, शादी में, मीशु के स्कूल के प्रबंधक, प्रिंसिपल के साथ पूरा स्कूल आया था और मीशु व श्रीष्टी को अपने गुरूओं का आशीर्वाद प्राप्त हुआ था।
क्योंकि हम दोनों ही परिवार कई वर्षों से सेक्टर -7 में रह रहे थे, अतः मैं देख रही थी कि, हमारे जीवन सफर के सहभागी हमारे बच्चों को अपनी शुभकामनाएं दे रहे थे।

स्मिता ने योगा क्लास, विशेष रूप से घरेलू महिलाओं के लिए ही शुरू की थी। पर अफसोस की बात है कि भारतीय महिलाएं अपने स्वास्थ्य के लिए जागरूक नहीं है।
योगा में मेरे अतिरिक्त किसी महिला ने रूचि नहीं ली थी।
शनिवार- रविवार की कक्षाओं में भी सिर्फ तीन-चार महिलाएं ही आती थीं। उसमें जया भी जाती थी।

महिलाएं अपने घर के कार्यों व जिम्मेदारियों से फुर्सत नहीं पाती हैं। ऐसा नहीं कि महिलाओं ने रूचि नहीं ली थी, महिलाओं ने मुझ से योगा व स्मिता की जानकारी प्राप्त की थी।वे स्मिता से मिलने भी आईं थी, योगा भी करना चाहती थीं, पर नहीं कर सकी थीं ।
इसका एक मुख्य कारण फीस भी थी, घरेलू महिलाएं अपने लिए कब पैसे खर्च करना चाहती हैं ?

वे घर खर्च से बचत करके, किट्टी पार्टी तो करती हैं, पर अपने स्वास्थ्य पर खर्च करना, उन्हें अपव्यय लगता है।
हमारी सोसाइटी में शिक्षित व संपन्न परिवार रहते थे, पर न तो महिलाओं को स्वयं, न उनके परिवार को उनके स्वास्थ्य के प्रति चेतना थी।

स्मिता ने मेरा बौद्ध धर्म से भी परिचय कराया था।मैं उसके साथ ग्रुप की मीटिंग में भी दो बार गई थी। मुझे बहुत अच्छा लगा था। वे सब सिर्फ अपने दुःखों व कष्टों के लिए ही नहीं , दूसरों के लिए, समाज में नित नई आपदाओं से मुक्ति के लिए भी प्रार्थना करते हैं। मैंने समझा कि प्रार्थना में बहुत शक्ति है और उसे मैंने व्यक्तिगत रूप से भी अनुभव किया है।
कोरोना के कारण, अब स्मिता ऑनलाइन योगा क्लास लेती है, इस तरह योगा और स्मिता से मेरा अटूट संबध बन गया है।

मीशु की शादी के दो महीने बाद ज़विका का जन्म हुआ था। हम सब खुश थे, हमारे सभी परिचित, हमें विशेष बधाई दे रहे थे चूंकि एक लंबे समय बाद हमारे खानदान में कन्या का जन्म हुआ था।

हमारा सेक्टर-7 का फ्लैट भी लगभग तैयार था। परंतु कोरोना नामक गंभीर बीमारी ने सारे देश- विदेश के वातावरण में एक नए संकट का प्रादुर्भाव कर दिया था।
ज़विका अभी एक महीने की ही थी और लाॅकडाउन ने, घर के सभी सदस्यों को, घर के अंदर कैद कर दिया था।

अब सब ऑफिस घर से कर रहे थे। कोई कामगार नहीं आ सकता था।हम सब मिलकर घर के काम कर रहे थे।

हमारे मकान का निर्माण कार्य भी रूक गया था। ये दिन बहुत बैचेनी और दर्द भरे हैं ।
धीरे-धीरे स्थिति में कुछ समय के लिए सुधार हुआ, लाॅकडाउन खुला, परंतु बंदिशें थी। कोरोना से बचाव रखना था।
अभी भी मींटू के अतिरिक्त सभी घर से ऑफिस कर रहे थे।

परंतु यह अच्छा हुआ कि मकान का निर्माण कार्य फिर शुरू हुआ व दीपावली से पहले, हमने अपने नए मकान का गृहप्रवेश किया था।

एक सपना साकार हुआ था और हम अपने मकान में शिफ्ट हुए थे।

जीवन क्या है ?

जीवन एक दर्शन है,

अनगिनत सवालों का जवाब है,

उमङते उफानों का सैलाब है।

मुठ्ठी में बंद लम्हों का हिसाब है।

दुखों में भीगे सुखों का ख्याल है।

न पूछें, यह क्या है?

यह तो महज एक उलझी किताब है

नए मकान-नए परिवेश (भाग-सप्तविशंति) ( हाऊसिंग सोसाइटी के अनुभव)

(इशारे जिंदगी के) अज्ञेय

जिंदगी हर मोङ पर करती रही हमको इशारे,

जिन्हें हमने नहीं देखा।

क्योंकि हम बाँधे हुए थे पट्टियाँ संस्कार की

और, हमने बाँधने से पूर्व देखा था-

हमारी पट्टियाँ रंगीन थीं ।

एक नीरव नदी बहती जा रही थी,

बुलबुले उसमें उमङते थे,

रहः संकेत के: हर उमङने पर हमें रोमांच होता था,

फूटना हर बुलबुले का, हमें तीखा दर्द होता है।

हम कभी फ्लैट में नहीं रहे थे, हमेशा छत अपनी मिली थी।हाउसिंग सोसाइटी में भी रहने का पहला अनुभव था। फ्लैट जहाँ आगे-पीछे कोई आंगन या बेङा नहीं होता है।

यह सोसाइटी साफ व शांत थी। पानी व बिजली की भी समस्या नहीं थी। मुझे सोसाइटी में रहना अच्छा लगने लगा था।पीछे रेलवे लाइन थी, दिन भर उसमें रेले गुजरती थी और बनी के लिए यह एक अचंभा था, वह किसी ट्रेन की आवाज सुन उत्साहित हो जाता और उसे देखने के लिए दौङ पङता था।अपने पोते के बचपन में अपना बचपन भी मुस्काता था, कितनी मीठी यादें गुनगुनाती थी।

ऐसा नहीं कि रेल की आवाज़ हमें परेशान नहीं करती थी, मगर बनी के उत्साह को देख, यह परेशानी उल्लास में बदल जाती थी।कुछ महिनों में हमें इसकी आदत हो गई थी, बनी को भी नए उत्साही खेल मिल गए थे।

मैं सर्दियों में दोपहर में व गर्मी में शाम को बनी के साथ, नीचे पार्क में चली जाती थी, वहाँ कई महिलाओं से कुछ जान-पहचान हो गई थी।

सोसायटी में बहुत सुरक्षा थी, मैं रात को अकेले ही सैर करने के लिए नीचे कम्पाउंड में सैर कर सकती थी। कोरोना और लाॅक डाउन के दिनों में भी, जब रात को नीचे कोई नहीं होता, हम सैर के लिए नीचे जाते थे, कभी- कभी छत पर भी जाते थे। उन दिनों आकाश बहुत साफ और नीला ही दिखता था।

यहाँ मैंने टयूशन के काम के लिए कोशिश नहीं की थी, संपूर्ण समय बनी के साथ खेलने व पढ़ने-लिखने में बिताने लगी थी।

पढ़ने-लिखने का शौक तो बचपन से था, पर लेखन को कभी गंभीरता से नहीं लिया था। लेकिन 2016 में जब सेतु ने मुझे टैब दिया, और मिंटू ने मुझे वर्ड प्रेस से परिचित कराया, मेरी जिंदगी ही बदल गई थी, अपने विचारों और मन के भावों को दूसरों तक पहुँचाने का एक अच्छा और सरल माध्यम मिल गया था, मेरी लिखने में रूचि बढ़ने लगी, मैं सरलता से नए और प्रतिष्ठित लेखकों को न केवल पढ़ रही थी अपितु उनसे लिखना सीख भी रही थी

सेक्टर-23 से ही मैने अपनी रचनाएँ ब्लॉग में लिखनी शुरू कर दी थी।सेक्टर -9 में भी मैं अपने आस-पास के परिवेश से, अपनी कल्पनाओं को मूर्त्त रूप दे, उसे अपनी लेखनी में उतारने का प्रयास करने लगी थी। लेखनी की प्रक्रिया में नित नए सुधार करने की कोशिश बरकरार थी । सीखना-सिखाना ज़ारी था।

हमारे घर के ठीक नीचे फ्लैट में एक कश्मीरी परिवार रहता था, उनके दो बेटे थे, बङा बेटा विवाहित था, उसके दो बेटे थे। बहु भी नौकरी करती थीं । वह भी मेरी तरह व्यस्त रहती थीं। कुछ दिनों में छोटे बेटे का भी विवाह हो गया था। उनके इस सोसाइटी में दो फ्लैट थे। उन्होंने दोनों बेटों को एक-एक फ्लैट दे दिया था।

अक्सर उनसे मुलाकात होती थी।, जब भी मिलती मुस्कराकर मिलती थीं ।हम अपने-अपने परिवारों को संभालने में व्यस्त थे, तो मिलना और बैठकर बात करने का समय कम होता था।

सिर्फ हम दो ही नहीं, हम जैसी और भी नानी- दादी थीं जो मुस्कराती हुई, गर्व के साथ, समाज में आए इन परिवर्तनों को स्वीकार करते हुए, अपने कर्तव्यों को जी रहीं थी।ऐसा नहीं कि किसी को भी अपनी बहु या बेटी के नौकरीपेशा या महत्वाकांक्षी होने से उज्र था, अपितु वे सब प्रसन्न थी। कुछ ये दादी- नानी अपने समय में स्वयं नौकरीपेशा रहीं थीं ,कुछ वे भी, जिन्होंने परिवार के हित को सर्वोपरि मान, अपनी महत्वाकांक्षाओं को अनदेखा किया था, इन सबका, निरंतर हो रहे इस सामाजिक विकास में पूर्ण सहयोग व सहर्ष सहमति थी।

फिर भी कुछ द्वविधा थी, अपनी भूमिका, अपना जीवन, अपना भविष्य और उससे भी अधिक वे तमन्नाएँ, जो आज भी उनका मुँह ताक रहीं है। अभी भी अपने लिए जीने की इच्छा दबी हुई ही है और यह भी कि पौरूख भी अब थक गए हैं ।

मुझे ऐसी भी युवतियां मिली, जिन्होंने इस भागदौड़ के जीवन को न चुनकर, घर-परिवार का सुरक्षित जीवन चुना है।
और मैंने सोचा कि बेशक भाग दौङ न चुने पर सपने तो चुने।मुझे एक ऐसी युवती भी मिली, जिसने बताया उसे कला में , पेंटिंग, संगीत में रूचि है।वह शादी से पूर्व इसी में अपना समय सार्थक करती थी। संगीत की भी शिक्षा ली थी।यह सब बतातें हुए, उसकी आँखें उल्लास से चमक रहीं थी।
पर अब क्यों नहीं ?
मेरे इस सवाल के जवाब पर वह नैराश्य मुख से बोली,” अब कहाँ समय मिलता है!”
मैं हैरान थी, जो मुझे दिखता था…परिवार में, वह, उसका पति व एक चार साल का बेटा— घर के काम की मदद के लिए, एक कामवाली भी थी।

शायद ऐसा भी हो जो मुझे न दिखता हो, जिसने प्रयास में भी नाउम्मीदी का पर्दा डाला हुआ था।
बाद में मुझे वह सोसाइटी की भजन मंडली में अपने संगीत का शौक पूरा करते दिखती थी।

सोसाइटी की महिलाओं ने मिलकर एक ग्रुप बनाया था, वे सब मिलकर प्रत्येक बृहस्पतिवार को भजन-पाठ करती थीं । सावन के महीने में व नवरात्रि के दिनों में भी उनके विशेष कार्यक्रम होते थे।

हमारा मकान बनना शुरू हो गया था, एस. के. और सेतु प्लॉट पर जाते थे, भजन-पाठ के लिए मैं बनी को लेकर नहीं जा सकती थी। आरंभ में एक दिन गई भी थी, भजन-पाठ अच्छा भी लगा था, अन्य महिलाओं से मिलना भी खुशनुमा था। परंतु मैं धार्मिक मिज़ाज भी नहीं हुँ। अतः उसके बाद कभी समय भी हुआ, तब भी मैं भजन-पाठ के लिए नहीं गई थी। इस कारण भी हम दो वर्ष उस मकान में रहे थे, पर मेरी किसी महिला से गहरी जान- पहचान नहीं हो सकी थी, यूं अभिवादन योग्य जान-पहचान सबसे थी। हमारे फ्लोर पर भी दो फ्लेट के परिवारों से परिचय स्नेहपूर्ण नमस्कार तक ही सीमित था।

पर फिर भी मेरी दोस्ती स्मिता से हो गई थी। वहाँ रहते हुए, हमें नौ महीने हो गए थे, और हमारे घर दो खुशियों का आगमन हो रहा था, लक्ष्मी दो स्वरूपों में हमारे घर प्रवेश कर रही थी। मीशु ने विवाह का फैसला किया था और उसका विवाह श्रृष्टि से निश्चित कर दिया गया था।बनी भी बङा भाई बनने जा रहा था, और हमारा विश्वास लक्ष्मी स्वरूपा के लिए अभिनंदित था ।

कल एक परिंदा बैठा था खिङकी पर,

मैंने उसे देखा, उसने भी मुझे,

वह कुछ बोला नहीं,

पर मानों कहता था-

आवाज तो सुनते हो मेरी, क्या पुकार भी सुनते हो?

बात दाना- पानी की ही क्यों सदा?

कभी मेरी पुकार भी सुनो!

उसमें मेरा हाले-दिल छिपा है,

कभी ध्यान तो लगाओ उसमें ।

वह उङ गया,

मैंने सोचा, क्या वह कुछ कहने आया था?

पर मैंने नहीं सुनी उसकी आवाज़ ।