THE ​LOW LAND by Jhumpa Lahiri 

(Book Review)

यह उपन्यास इंगलिश में लिखा गया है। इस उपन्यास को पढ़ते हुए मुझे महसूस हुआ कि मैं जीवन के विभिन्न गलियारों मे से गुजर रही हुँ। इस उपन्यास ने जो अनुभूति मुझे दी है, उसकी अभिव्यक्ति मैं इन पंक्तियों मे करना चाहती हुँ।
            जीवन के अलग-अलग गलियारों से गुजरते हुए-

जिन्दगी बिताते है हम।

जीवन के विभिन्न पङावों के हर रंग भोगते है हम।

कुछ सुख के क्षण यूँ ही बिताते हैं हम,

पर दर्द के क्षण न भूला पाते है हम।

जीवन तो सबके साथ है,

पर ज़िन्दगी है सबकी अलग-अलग।

सुख-दुख भी सबके एक हो सकते हैं,

पर उसे जीते हैं सब अलग-अलग

जीवन के अलग-अलग गलियारों से………….

एक कहानी ‘दर्द की कहानी’ कैसे जीवन पूरे दर्द में बीता जाता था, एक का नहीं, सबका, सब उनका जो उसके अपने थे। उसके यानि नायक उद्यान के अपने थे। इस कहानी का नायक उद्यान ही है क्योंकि बाकी पात्रों की कहानी उसके कारण ही बनती या घूमती है। यह कहानी  उद्यान के अपनो की कहानी है। इतने अपने कि जान ही न सके उसके धोखे को, जो उसकी गलती थी, एक उन्मादपूर्ण गलती। जिसे वह तब जान सका, जब उसका उन्माद ठंडा हुआ था या तब जब वह धूंधले होते हुए अपनों के चेहरों को फिर से देख सका था। तब उसके पास उनसे क्षमा मांगने का समय भी नहीं था।

पर शायद नहीं जानता था, नहीं समझ सकता था,उन दर्दो को जो इन सबने जीने थे, अपने-अपने हिस्से के दर्द, जो उसके कारण थे, वो चला गया, शायद मुक्त हुआ, शायद नहीं। वो टूट गया, वो आपसी रिश्ते टूटते गए। अपने पराए होते गए, अपने – अपने दर्दो में घिरे, दूसरों के दर्द को न तो ठीक से समझ पाते थे, न उन पर मरहम लगा सकते थे। मरहम लगाने का प्रयास भी दर्द भरा था।

         उद्यान के पिता के दर्द की दास्तान कुछ ही शब्दों में बहुत कुछ कहती है और माँ के दर्द की कहानी आपके अपने जख्मों को भी उकेर देती है। अपने-अपने दर्दो में घिरे ये माता पिता एक दूसरे के लिए अजनबी बनते जाते है, यह दुख भरा अहसास है पर सच्चा अहसास, जीवन की गहरी वास्तविकता, दर्द की वास्तविकता, दर्द का प्रभाव इतना पैंठा कि दोनो टूटते और टूटते गए और फिर दोनों अलग-अलग किनारों तक पहुँच गए थे।

उनके दो बेटे सुभाष और उद्यान थे, पिता रेलवे में क्लर्क थे, स्वयं उच्च शिक्षा नहीं प्राप्त कर सके थे, पर बच्चों को उच्च शिक्षा देने के लिए बहुत मेहनत करते, माँ भी सिलाई कढ़ाई का काम करके अपना योगदान देती थी। बच्चे भी कुशाग्र बुद्धि के स्वामी थे, मन लगा कर पढ़ते और अच्छे नंबर लाते थे। सुभाष बचपन से ही सीधा और माता पिता का आज्ञाकारी, उद्यान शरारती, उसकी शरारतें माँ का मन मोह लेती थी, इसी कारण वह उसी की चिन्ता अधिक करती थी। काॅलेज में ही उद्यान माओवाद से प्रभावित हो रहा था, वह ऐसी किताबें पढ़ता, उन पर चर्चा करता, उसकी जोश भरी बाते सुन, पिता यही सोचते इस आयु के लङके इस तरह की बाते करते ही है। पोस्ट ग्रेजुएशन, अच्छे नंबरों के बाद भी देश में नौकरी नहीं है, सुभाष आगे की पढ़ाई के लिए विदेश चला जाता है। एक दिन उद्यान उन्हें सुचना देता है कि उसने विवाह कर लिया है, दुख तो होता है पर वे दोनों गौरी को अपनी बहु के रूप में स्वीकार करते है। सुभाष को लिखते है जो उद्यान ने किया वो तुम मत करना तुम्हारे लिए पत्नी का चुनाव करना हमारा हक है। सुभाष भी उन्हें आश्वासन देता है। नक्सलवादियो का आंदोलन जोर पकङता जा रहा था, प्रदेश के नवयुवक उसके प्रभाव में आ रहे थे।। उन दोनों का मन उद्यान के लिए शंकित होता है, पर यह सोच कि हमारा बेटा विवाहित है, अपना शिक्षण कार्य लगन से कर रहा है,निश्चित हो जाते थे। पुलिस ने लङको को मात्र संदेह के आधार पर पकङना शुरू कर दिया, तब भी दोनो का मन डरा रहता है, एक ही संकल्प कि उद्यान को इन सबसे बचा कर रखना है। पर वो दिन आता है जब पुलिस आती है, घर की तलाशी में सबूत पाती है, उद्यान पकङा जाता है, उनके सामने ही उसे  ले जाते है, पर थोड़ी दूर जाकर सूनी जगह पर, पुलिस के विचार से उन्हें कोई नहीं देख रहा है, उद्यान को गोली मार दी जाती है। छत पर खङे उद्यान के माता- पिता,पत्नी ने सब देखा, उद्यान का गोली खा कर गिरना,फिर उसे उठा कर ले जाना, सभी कुछ दिखाई दिया, उस नई ऊँची बनी छत से, गौरी विधवा हो गई। माता पिता के पास कुछ कहने के लिए नहीं रहा है। दोनो अपने – अपने गम में गुम हो गए है। सुभाष के आने पर भी उनके पास कुछ कहने  या बताने के लिए नहीं है। सुभाष पर तो जैसे ध्यान ही नही है, इस आघात से मिली चोट अंदर गहराई तक पहुँची है। गौरी को उद्यान के लिए स्वीकारा था, पर अब वह आँख का काँटा है, यह पक्का विश्वास है कि उसी ने उद्यान को इस मार्ग में डाला है। जब पता लगा कि गौरी गर्भवती है, उनका टूटा मन उद्यान के नन्हे स्वरूप के लिए जी गया है। पर गौरी? एक बार उद्यान की निशानी पा जाएँ तो गौरी को घर से बाहर करें। पर सुभाष विरोध करता है। माँ नही समझ पाती क्यों सुभाष गौरी के लिए सोच रहा है? अपने माता पिता के लिए नही? वह सुभाष को गौरी से दूर रखना चाहती है। पर दूसरा आघात  लगता है, सुभाष गौरी से शादी कर लेता है। वे दोनो उससे बेहद नाराज है। सुभाष गौरी को लेकर विदेश चला जाता है। अब दोनो बेटे पास नही है। माता पिता अकेले, अपने- अपने गम से लङते हुए।

पिता जानते और मानते है सच्चाई, बिलकुल अकेले और चुप रहना ही उनका जीवन है। माँ के दिल में तो बस उद्यान ही बसा है, उन्हें उसका इंतजार है। पार्टी ने उद्यान के नाम का चबूतरा बना दिया है, माँ की दिन चर्या का यह महत्व पूर्ण काम है कि प्रतिदिन उस चबूतरे को साफ करना और उस पर फूल चढ़ाना।

कई बार दोनो को महसूस होता है कि सुभाष से नाराज हो कर ठीक नही किया वह भी दूर हो गया है।

अपने – अपने दुख के साथ, हर खुशी के अहसास से परे पहले पिता और बाद में माँ इस दुनिया से चले जाते है।
भाई सुभाष का दर्द, जिम्मेदारी भरा था। छोटे भाई की जिम्मेदारियों को कंधा देकर उसने अपने दर्द को कम करने का प्रयास किया, पर यह दर्द तो और गहराता गया और इतना गहराया कि इस प्रयास में प्रश्नचिन्ह लगता गया। कोई शिकायत नहीं, कोई नाराजगी नहीं, सिर्फ सहमाता गया। केवल कर्त्तव्य, खुशी नहीं।खुश होने का ख्याल भी नहीं क्योंकि दर्द इतना भरा था कि किसी ओर भाव की जानकारी भी नहीं रही थी।

सुभाष बङा, उद्यान 14महीने छोटा । दोनों का हर पल का साथ, जब सुभाष ने स्कूल जाना शुरू किया तब उद्यान की जिद पर उसे भी सुभाष की कक्षा में दाखिला दिला दिया था। अब पढ़ना, खाना, खेलना और शरारतें सब साथ में ही करते थे। उद्यान ही शरारतें सोचता और सुभाष उसका साथ देता था। विज्ञान के नए-नए प्रयोग दोनो मिलकर करते थे। सुभाष का मन उद्यान के बिना नही लगता था। पर कालेज दोनो के अलग – अलग थे। उद्यान के नए दोस्त बन गए, वह समय से घर नहीं आता और सुभाष उसकी प्रतीक्षा करता रहता था। उद्यान माओवाद, नक्सलवाद के प्रभाव में आ रहा था। वह भावुक हो कर किसानों की स्थिति से विचलित हो रहा था। उसने कोशिश करी कि सुभाष भी माओ और नक्सल विचारधारा को समझे। वह सुभाष को सभाओं में लेकर भी गया। परंतु अब सुभाष की अपनी सोच है,उसे नही लगता कि ऐसी क्रांति से स्थिति में बदलाव आ सकता है। वह पढ़ लिख कर एक अच्छी नौकरी करना चाहता है, देश में नौकरी नही है, वह विदेश पढने जाता है, वह चाहता है कि उद्यान भी इन सब चक्करों को छोङ कर, विदेश जाकर पढ़ाई करे। उद्यान सुभाष को स्वार्थी कहता है। सुभाष विदेश में, इधर उद्यान की शादी,फिर उसका चला जाना। अब कभी सुभाष उद्यान को देख सुन नहीं पाएगा। उसी के लिए व गौरी को हर परेशानी से बचाने के लिए वह गौरी से शादी का प्रस्ताव रखता है। गौरी के साथ अमेरिका में उसका नया जीवन शुरु होता है। कुछ दिन में बेला का जन्म होता है, उद्यान की बेटी ही उसकी खुशी  है। वह जानता है कि गौरी के लिए कठिन है उसके साथ रहना, वह उसे समय देना चाहता है। पर देखता है गौरी मन से कोशिश नही कर रही है। बेला के लिए भी उसका व्यवहार स्वाभाविक नही है। और एक दिन गौरी चली जाती है, वह बेला और सुभाष को छोड़कर अपना जीवन अपनी तरह जीने के लिए चली जाती है। गौरी के जाने से बेला बहुत उदास व गुमसुम रहने लगती है। सुभाष जानता है कि गौरी ने बुझे मन से उसके साथ 12वर्ष बिताएँ है, पर बेला के साथ वह यह अनाचार कैसे कर सकती है? इस आयु में बेटी को माँ की अधिक आवश्यकता होती है। अब बेला ने सुभाष से दूरी बनाकर रखी है, पिता से केवल काम का रिश्ता है,वह महसूस करता है कि अब पिता और बेटी के बीच का अपनत्व ठंडा पङ गया है। धीरे – धीरे बङे होते ही वह स्वतंत्र होती जाती है। उस घर से, शहर से बाहर रहकर काम करती है।सुभाष बहुत अकेला हो गया है, उद्यान के साथ का समय याद करता है, माता पिता की नाराजगी के बाद भी वह अपने कर्तव्य पूरे करता रहा था। पिता के जाने के बाद माँ तो सिर्फ उद्यान की यादों में डूब गई थी, सुभाष दूर से जो कर पाता, करता था। कभी- कभी माँ के पास जाता भी था। माँ के भी गुजर जाने के बाद अब एकमात्र वह रह गया था और उद्यान की निशानी बेला थी। अभी तक उसने बेला को उद्यान के विषय में नही बताया था। पर जब बेला लौटी है और अब बेला माँ भी बनने वाली है तब वह उसे अपनी सच्चाई बताता है। सुभाष नही, उद्यान बेला का पिता है। सुभाष को लगता है अब बेला उससे और दूर हो जाएगी, पर नही, ऐसा नही होता है, वह कहती है, वह उद्यान को नही जानती है उसके पिता सुभाष ही है। सुभाष को अपनी पुत्री वापिस मिलती है। अब उसकी नातिन मेघना भी है। एक परिवार- जो वह गौरी के साथ चाहता था। उसके जीवन की खुशियाँ लौट रही है । एलिस के रूप में एक अच्छी मित्र मिलती है, जिससे गौरी को तलाक देकर वह विवाह कर लेता है। जीवन का अंतिम पड़ाव वह एलिस के साथ बिताएगा। उद्यान की यादें हमेशा साथ रहेगी।
पत्नी गौरी का दर्द, प्रेयसी का दर्द, वो तो सिर्फ प्रेयसी ही रही थी। पत्नी बनने के बाद भी तो वह सिर्फ दीवानी थी, जिस दीवानगी में उसने उद्यान से विवाह किया था और उसी दीवानगी में उसके सही गलत की साथिन बनती गई थी परंतु जब जान पाई उसके धोखे को, उसके उन्माद को, वो टूटने लगी थी। उसके जाने के बाद एक सन्नाटा था। कैसे समझ पाती अपने इस दर्द को, जो दर्द तो था पर कैसा? धोखे का? उसकी मृत्यु का? या अपनी आँखों के सामने उसे इस तरह प्रताड़ित होते हुए मृत्यु के मुँह में जाने का दर्द था। यह सन्नाटा था, यह न समझने की स्थिति का  कि वह दुःखी है पर किसलिए? अपने दीवानगी भरे प्रेम पर या अपनी नासमझी के लिए दुःखी है। या वह उस प्रेम के लिए दुःखी है, जो अभी भी उसके दिल में उसके लिए मौजूद था। वो दगाबाज उसके दिल में, ख्यालों में बसा रहता था, वह जाता ही नही था। यह सन्नाटे भरा दर्द इसलिए था कि इसमें भय भी मिल गया था। इस दीवानी ने उसके हर गलत को सही मान उसका साथ दिया था। वो दहशत भरा दर्द इतना गहरा था कि कुछ भी स्वीकारने का मतलब ही न था। न किसी का साथ, न किसी का अपनापन। अपने खुन को-अपनी पुत्री को, उन दोनो की पुत्री को भी कैसे स्वीकार करे? क्यों नही आता उसके मन में कि यह दोनो के प्रेम की निशानी है। क्यों केवल धोखा लगता है? अपनी कोख से जन्मी पर प्यार क्यों नहीं आता? यह हर वक्त, हर पल कण- कण में टूटते बिखरते दिल का दर्द है। इस दर्द में स्वाभिमान भी है, प्रेम भी है और प्रताड़ित होने का अहसास भी है जो जीवन में सिर्फ खालीपन देता है। ‘खुशी’ या इसका अर्थ  दोनो अब याद ही नही है।

             उद्यान गौरी के भाई मानस का दोस्त था। घर पर ही उसने उद्यान को देखा और उसकी ओर आकृषित हुई थी। गौरी एक चुप, गंभीर लङकी,किताबों मे ही डूबी रहती थी, उसके जीवन मे उद्यान आता है, वह उसका परिचय मार्क्स से कराता है। वह उससे प्रेम करती है, वह जो कहता है, सोचता है, करता है, सब उसके लिए सच है। वह उससे शादी करना चाहता है वह उससे शादी करती है, उसके माता पिता के साथ रहती है, यह समझते हुए कि उन्होने उसे दिल से स्वीकार नहीं किया है, समस्त परंपराओं को निभाते हुए रहती है। उद्यान उससे अपने संदेश भिजवाता है, वह नही जानती उनमे क्या लिखा है, वह सिर्फ इतना समझती है कि उद्यान की नक्सल पार्टी एक अर्थ पूर्ण कार्य कर रही है,उसे नही पता इसमे कोई विध्वंसकारी मंशा हो सकती है। उद्यान उससे एक पुलिसवाले पर निगाह रखने को कहता है, वह उसके लिए यह काम करती है, पुलिस वाले की समस्त सुचनाएँ उसे देती है। उसे उद्यान पर गहरा विश्वास है, उसके हर शब्द पर विश्वास करती है। पर विश्वास टूटता है, उद्यान उस निर्दोष पुलिस वाले की हत्या कर देता है। उद्यान पकङा जाता है और मारा जाता है। सच जानकर, गौरी टूट जाती है। इस हत्या मे उसे बिना बताए  उद्यान ने उसे बराबरी का भागीदार बना दिया है। पुलिस आती है, उससे पुछताछ करती है।वह डर जाती है, दहशत से भर जाती है। एक अपराधबोध कि किसी औरत को विधवा बनाने, किसी बच्चे को पितृहीन करने मे उसका भी हाथ है। हर समय डर की तलवार सिर पर लटकी है। वह किसी को कुछ नही बताती, न मानस को, न ही सुभाष को बताती है।

      सुभाष उसके आगे शादी का प्रस्ताव रखता है, इस डर से भागने का यह सही रास्ता मिलता है, अभी तक पुलिस को उस पर कोई संदेह नही हुआ है, पर भविष्य का क्या पता? सुभाष से शादी  करके वह अमेरिका चली जाती है। सही समय पर बेला का जन्म होता है। उसे भी लगता है अब सुभाष के साथ ही उसका जीवन है। इस जीवन को अपनाने की कोशिश भी करती है। सुभाष उद्यान जैसा होते हुए भी उससे अलग है, फिर भी वह उसे उद्यान की याद दिलाता है। वह उस धोखे को भूल नही पाती है, इसीलिए वह बेला को अपना नही पाती है। वह उस डर व दहशत और अपराघबोध से मुक्त नही हो पाती है और 12वर्ष बाद बेला को सुभाष के पास छोङकर चली जाती है।  अपना जीवन अपनी तरह जीती है पर उद्यान की यादें, उससे मिला धोखा, वो दहशत, अपराधबोध उससे चिपके ही रहते है। कई वर्ष बाद सुभाष उससे तलाक मांगता है, वह आती है, बेला से मिलती है,  अपने लिए उसके गुस्से को जानती है  और फिर अपना एकाकी जीवन जिसे उसने स्वयं चुना था,जीने वापिस चली जाती है।

अब पुत्री बेला का दर्द, जो जानती नही कि उद्यान उसका पिता है। सुभाष ने यह जानने के बाद कि गौरी  गर्भवती है, अपने भाई की जिम्मेदारियो को लेते हूए गौरी से शादी कर ली थी। बेला को माँ के प्रेम मे भी मातृत्व का भाव कम और कुछ ऐसा भाव मिलता था जो उसे अजनबी बनाता था। लेकिन उसने सब स्वीकार किया था क्योंकि उसने माँ को ऐसे ही जाना था। वह जिसे पिता के  रूप मे जानती थी, उसके लिए भी माता के उसे छोङ जाने के बाद सिर्फ मन मे विद्रोह था। पर जो भी अपनापन, प्यार दुलार मिला वो इसी पिता से मिला था, अतः मान-सम्मान भी इसी के प्रति था। पिता के रूप मे छवि इसी की थी। परन्तु यह जानने के पश्चात कि यह उसका बायोलिजिकल पिता नही है तो विद्रोह मिट गया और अब तो उसके प्रति अधिक प्रेम व सम्मान जागा था।।

यह बेला ही थी जो खुशियों की तरफ बढ़ी और अपनी पुत्री के साथ इस उपन्यास के अंत मे, इस कहानी मे खुशियाँ लाई। दर्द अभी भी था,पर खुशी भी थी, इस पिता पुत्री की खुशी।

अंत मे उद्यान की तकलीफ भी है।जो वह तब नही जान पाया था, उसे अपने अंत समय मे स्पष्ट समझ पाया था कि बदलाव और सुधार का यह रास्ता नहीं है। वह या उसके हमउम्र साथी किसानों की तकलीफ से विचलित हुए थे, वे किसानों के लिए कुछ करना  चाहते थे। वह गाँव-गाँव किसानों की हालत जानने लिए भटका था, मन हुआ तुरंत कुछ किया जाए और लोगो की सलाह से वह नक्सलवादियों से मिल गया था। वहाँ बताई हुई हर बात सच लगती थी। जोश इतना था कि अपने दिमाग से सोचना बंद कर दिया था। पर अब जान पाया कि निर्दोषों की जान लेकर कुछ नहीं बदला जा सकता है। अब वह सिर्फ अपराधी है, माता-पिता के लिए शर्मसार, गौरी के लिए धोखेबाज। काश! किसानो की भलाई के लिए कोई ओर रास्ता चुना होता!

लेखिका ने बहुत ही सशक्त और मार्मिक शब्दों में एक कहानी कही है, बहुत ही बारिकियों से चरित्रों का निर्माण किया है। साथ ही नक्सलवाद और आतंकवाद की आलोचना भी है। ये नवयुवकों की भावुकता और जोश का लाभ उठाकर, उन्हें दिशाहीन करते हैं।

परिवार के किसी सदस्य का ऐसे जीवन से चले जाना, अन्य सदस्यो को कैसे दुख से तोङता है, इसका बहुत ही स्वाभाविक चित्रण किया गया है, पढ़ते हुए ऐसे लगता है, जैसे हम स्वयं उनके दुख से गुजर रहे हो।

​यह कैसा प्रेम? क्या प्रेम ऐसा होता है।

यह प्रेम व प्यार मेरी समझ से बाहर है। पिक्चरे देख लो, कहानियाँ पढ लो, यह आनंद यही तक तो ठीक है। कभी-कभी दूसरो के प्रेम के किस्से रस भरे लगते है।पर मै जो बात करने जा रही हूँ वो इस प्रेम से उत्पन्न परेशानियो से संबधित है।
उस दिन शाम को जब कुश नही आया, तो मुस्कान ने बताया कि आज बाजार मे गोलियाँ चली है, कुश वही रहता है इसलिए नही आ पाएगा।अगले दिन विद्यालय पहुँची तो वहाँ भी यही चर्चा चल रही थी। मेरे पहुँचते ही सब मुझसे पुछने लगी, आप ही की तरफ हुआ न! मैडम,बताइए कौन थे लङका लङकी? लङका लङकी ? इस विषय मे मुझे कोई जानकारी नही थी। तभी कमलेश मैडम अंदर आते हुए बोली, अरे लङकी तो भली थी, पर लङका ही बदमाश था। लङकी तो हमारे ही पङोस की थी। सभी कमलेश मैडम की तरफ खिसक गए। कमलेश मैडम फिर मुझसे बोली, मैडम आप तो जानती हो उस लङकी को वही किरण बुटीक वाली लङकी, नलिनी ही मारी गई है। उनके कहते ही मेरी निगाह अपनी साङी पर ठहरी, यही साङी व ब्लाउज मैने तैयार कराए थे किरण बुटीक मे, नलिनी का काम व स्वभाव मुझे इतने पसंद आए थे कि मैने सोचा था, अब सब काम इसी बुटीक पर कराऊँगी।

मै अभी तक इस घटना को विशेष महत्व नही दे रही थी, सिवाए इसके कि हमारे सेक्टर मे और उसकी छोटी सी मार्केट मे ही यह घटना क्यो घटी?पतिदेव अब मुझे व बच्चो को उस ओर जाने न देंगे। लेकिन किरण बुटीक का नाम लेते ही यह घटना जैसे मेरे निजी दुख मे बदल गई थी।नलिनी को मार दिया? हाँ, दस दिन बाद उसकी बङी बहन दीक्षा की शादी थी। वह अपनी बहन के साथ रिक्शा मे थी तभी वह लङका पवन आ गया और दीक्षा को तो धक्का देकर नीचे उतार दिया व नलिनी से एक बार पुछा, चलेगी मेरे साथ, नलिनी के नही कहते ही उसने उस पर गोलियाँ दाग दी थी। यानि प्रेम चक्कर? नही, लङकी को तो उसमे कोई दिलचस्पी नही थी, कभी स्कूल मे दोस्ती थी, पर उसके स्वभाव व आदत के कारण नलिनी ने उससे कोई नाता नही रखा था।पर दो वर्ष पहले नलिनी के पिता की मृत्यु के बाद वह उसके पीछे लगा था।

 यह कैसा प्रेम? क्या लङकी को नही कहने का अधिकार नही? कभी सुनते है कि लङकी के नही कहने पर उसके चेहरे पर तेजाब डाल दिया। क्या इसी को प्रेम कहते है? जिसे प्रेम करते है उसे कष्ट पहुँचाएँ या मार दे।

यह प्रेम तो नही पर सामंतवाद का परिचायक तो हुआ।राजा महाराजाओ,जमींदारो और सामंतो के युग मे ऐसा होता था कि इन शासक वर्ग के पुरूषो को आम जनता मे से कोई लङकी या औरत पसंद आ जाती थी तो उसे उठा लेते या जबरन उससे विवाह कर लेते थे। इन्हे एक से अधिक विवाह करने का अधिकार प्राप्त था पर आज वह युग समाप्त हो गया है। देश मे प्रजातंत्र है। यह नीच हरकत करने वाले किसी सांमत या राजा के वंशज  भी नही है।यह वे लोग है जो प्रेम को बिना समझे अपने प्रेम को मजनू या देवदास की श्रेणी का मानते है। पर इन मजनूओ को लैला नही मिलती अथवा जिसे वह अपनी लैला मानते है वह इनसे प्रेम नही करती है अब जब लैला ही नही है तो ये मजनू कैसे? यह तो किसी हिन्दी फिल्म के खलनायक की भूमिका हो सकती है। अरे, हमारे समय मे तो लङके अपनी जान दे देते थे पर लङकी को कोई तकलीफ नही पहुँचाते थे। किसी ने कहा।

 मै सोच रही थी कि इन लङको को मरने या मारने के अतिरिक्त कोई और बात सुझती क्यो नही? लैला मजनू, सोनी महिवाल ये तो एक दूसरे से प्रेम करते थे। इनके प्रेम का समाज विरोधी होता था।जैसे ऑनर किलिंग मे होता है, लङका लङकी एक दूसरे से प्रेम करते है उनके परिवारो को आपत्ति होती है, विशेष रूप से लङकी के परिवार को, अतः वे दो मारे जाते है या भागे फिरते है।

मुझे याद आ रहा है, मेरे साथ मास्टरस कर रही वनिता मुझे बता रही थी कि एक लङके ने उसके कारण आत्महत्या कर ली थी। वनिता ने उसे पसंद नही किया था इसलिए उस लङके ने वो कदम उठाया था। वनिता को बहुत अपराधबोध था।हाँ, किसी की मृत्यु पर दुख होना स्वाभाविक है। लेकिन मैने उसे समझाया कि ऐसे लङके दिमागी रोगी होते है, जिनके लिए एक लङकी(जो उन्हे पसंद नही करती) ही जीवन का एक मात्र ध्येय रह जाता है। वह अपने माता पिता के प्रेम को भी अनदेखा कर देते है।

वनिता के साथ-साथ मुझे अंजु का भी ध्यान आ रहा था। यह प्रेम की बात आज भी मेरे सिर पर से निकल जाती है तब तो मै बहुत छोटी थी।हमारा सरकारी प्राइमरी विद्यालय, लङके व लङकियाँ साथ पढ़ते थे।पांचवी कक्षा का आरंभ था,अभी कक्षाओं मे पढ़ाई शुरू नही हुई थी। नए प्रवेशो के कारण अध्यापिकाएँ व्यस्त थी।हम कक्षाओं मे बैठे कोई खेल खेला करते थे।उस दिन भी कुछ ऐसा ही था जब अचानक कुछ भगदङ सी मच गई थी, पता चला एक बहुत सुंदर लङकी ने हमारी कक्षा मे प्रवेश लिया है। कक्षा के लङके उसे ही देखने कक्षा से बाहर जा रहे थे। वह सुंदर लङकी अंजु थी। मेरी कक्षा के अनिल और कमल गहरे दोस्त थे, अगले दिन अंजु कक्षा मे आई और आते ही उसकी अनिल से लङाई हो गई थी, अनिल शरारती लङका था। पर कुछ दिन बाद कमल और अंजु मे भी दोस्ती हो गई जिस कारण कमल और अनिल की पक्की दोस्ती टूट गई।सभी को यह अच्छा नही लगा था। अंजु से मेरी दोस्ती हो गई थी, पर उसके लिए मै सविता व कविता छोटी लङकियाँ थी, यूँ वह भी हमारे बराबर ही थी, पर उसने गहरी दोस्ती कक्षा की सबसे निखद लङकी फ्लोरा से की थी, अंजु पढाई मे होशियार थी इसलिए फ्लोरा से उसकी दोस्ती मेरे समझ मे नही आई थी। सरिता ने बताया कि फ्लोरा कमल के घर के पास रहती है, मुझे तब भी कुछ समझ नही आया था। अब अंजु और कमल एक साथ नजर आते थे।

एक दिन कमल और अंजु के माता पिता को स्कूल बुलाया गया था,मै उस दिन विद्यालय नही गई थी मुझे सब सविता ने बताया था।पर क्यो बुलाया? सविता ने कहा उनकी आपसी दोस्ती के कारण बुलाया था। यह बात भी मेरी समझ के बाहर थी। कक्षा मे लङके पढ़ते है तो बातचीत, दोस्ती तो हमारी भी है। रौनी, फिलिप्स, डेविड और टोनी इन सबके साथ हम भी तो खेलते है व लङते भी है।अंजु और कमल तो लङते भी नही थे। कमल को तो मै कक्षा का सबसे भोंदू लङका मानती थी। मैने हेरानी  के साथ सविता से कहा तो वह बोली बुद्धु, उनकी दोस्ती फिल्मी दोस्ती है न! इसलिए। जैसै फिल्म मे हीरो हीरोइन मे होती है। यह बात वाकई मजेदार थी। उस दिन घर पहुँचते ही देखा भाभी आई हुई है, भाभी से जाकर तुरंत बोली, अरे भाभी मेरी कक्षा मे एक लङका व एक लङकी मे फिल्मी दोस्ती हो गई है। मेरी बात सुनकर सब हँसने लगे देखकर बुरा लगा पर भाभी ने प्यार से पुछा तो सब बता दिया, यह भी कि उनके माता पिता कह गए है कि हमारे बच्चे अभी छोटे है, उनकी दोस्ती को तुल न दिया जाए। भाभी बोली ठीक ही कहा उन्होने ये तो अभी बहुत छोटे बच्चे है।पर पता नही क्यों मै तब भी द्विधा मे थी। पांचवी के बाद सभी अलग-अलग विद्यालयो मे चले गए। मै और टोनी की बहन मंजु एक ही विद्यालय मे थे। कमल और टोनी का विद्यालय एक था।मंजु ने बताया कमल अपनी काॅपी मे अंजु अंजु लिखता रहता है। मुझे विश्वास हो गया कि कमल निरा भौंदू ही नही अपितु पागल भी है। पर अब मै सोचती हुँ कि क्या वह प्रेम था? या दो मासुम बच्चो की दोस्ती। दोनो पांचवी कक्षा के बाद मिले भी नही होगे।

कुछ साल बाद एक दिन अंजु बाजार मे मिल गई थी,उसी ने मुझे पहचाना था वह मेरी सहेली तनुजा के घर के पास रहती थी। तनुजा ने बताया अंजु के साथ बहुत बुरा हुआ, उसके पङोस के एक लङके ने उसके कारण आत्महत्या कर ली थी व सुसाइड नोट मे उसका नाम भी लिख गया था। अंजु ने तो घर से बाहर निकलना ही बंद कर दिया था।बाद मे अंजु ने तनुजा को बताया था कि घर से उसे पूरी आजादी थी,वह लङको से निःसंकोच बात करती थी, जिसका अर्थ लङके गलत लगाते थे। पहले दादी नानी कहा करती थी न! लङकियो का इतना हँसना बोलना ठीक नही है। यह भी सुना होगा लङकी हँसी तो फंसी। कहने का अभिप्राय यही है कि अगर लङकियो को हँसने बोलने की आजादी होती तो सभी लङकियाँ हँसती बोलती अब सिर्फ एक ही लङकी बिंदास बोलेगी तो लङको को गलतफहमी होगी ही। यह सब सदियो से लङके व लङकी की परवरिश की भिन्नता के कारण है। लङको को पूर्ण आजादी व लङकियो को सात पर्दो मे रखना। बेचारे लङके द्विधा मे पङ जाते है।

लङको की परवरिश बचपन से ही ऐसे की जाती है, घर मे उनको उनकी  बहनो से उच्च स्थान मिलता है। (मै उन घरों की बात कर रही हुँ, जहाँ लङकियों और लङकों मे आज भी भेद किया जाता है। जिनकी संख्या बहुत अधिक है) घर मे वह एक गिलास पानी भी उठाकर नही पीते है। वह यदि रसोई तक जाए भी तो उनकी माँ उन्हे रोक देगी कि लङको का क्या काम रसोई मे, तुम तो पढ़ाई करो,कमाई करो, इसलिए उन्हे अपनी माँ से भी पानी माँगने मे संकोच नही होता है। बेटियो को कहा जाता है कि कितनी भी पढ़ाई या नौकरी कर लो खाना बनाना, घर संभालने का काम तो औरत का ही है इसलिए ये सब भी सीखो।भाई बहन की नोक झोक मे माता पिता लङकी को ही दबाते है यह नोक झोक कई बार हाथा पाई पर भी आजाती है, बहन को सिखाया जाता है कि भाई की बराबरी न करे। ऐसी सोच के साथ बङे हुऐ लङको मे लङकियो को अपने से कमतर मानने की भावना विकसित होती है।

उनके मन मे लङकियो के प्रति कोई सम्मान की भावना नही होती है। किसी लङकी के लिए अपने आकर्षण को वह प्रेम का नाम देते है, फिर एक ही कामना होती है कि किसी तरह उस लङकी को प्राप्त करना है। इसे प्रेम नही कहते है। जब वह लङकी उन से बात भी करना पसद नही करती है तो उनके अहं को चोट पहुँचती है।एक लङकी से हार मानना उन्हे स्वीकार्य नही होता है तब या तो यह मरते है या मारते है। ऐसा नही कि यह एक तरफा आकर्षण लङकियो मे नही होता है मैनै कई लङकियो को देखा है किसी एक लङके के पीछे भागते हुऐ या उसी के ख्यालो मे खोए हुए। कई बार यह लङकी उस लङके को जानती भी नही है,बस देखा और दूनिया भूल गए। क्या यह एक तरफ का आकर्षण ही प्रेम है? मुझे तो यह प्रेम समझ आता नही है।

एक घटना मेरे साथ भी हुई थी, तब मै दिल्ली युनिवर्सिटी मे पढ़ती थी। वह लङका कई दिनो से मुझ से बात करने की, दोस्ती करने की कोशिश कर रहा था।बार बार मना करने पर भी उसकी कोशिश बकरार थी।एक दिन मै और मेरी सहेली लाइब्रेरी के बाहर लाॅन मे बैठे चाय पी रहे थे,वह लङका अपने दोस्त के साथ वहाँ आया, उसके हाथ मे भी चाय का गिलास था,उसने मुझसे बात करनी चाही, जवाब न मिलने पर उसने अपना गिलास गुस्से मे वही लाॅन मे पटक दिया था। अंदर ही अंदर हम दोनो बहुत डर गई थी, लेकिन हमने अपना डर दिखाया नही था। दृढता से वही बैठे रहे थे, मुझे पूरा विश्वास था कि जहाँ मै बैठी हूँ, वहाँ उसी की भर्त्सना होगी। शुक्र है कि उस समय लोगो के पास इतनी आसानी से बंदूक व तेजाब नही होते थे। यह 38 वर्ष पुरानी बात हुई थी। उस घटना के बाद मैने उसके दोस्तो से बात करी थी, एक दिन लाइब्रेरी मे सबके सामने फटकारा था। उसके बाद फर्क पङा था, उसके दोस्तो के बीच उसका मान घटा था। बोलना पङता है, आवाज उठानी पङती है। यह कोशिश लङकियो को ही करनी पङती है। लङको के मानसिक स्तर को बदलने के प्रयास उनकी परवरिश मे ही करने होंगे। हम किसी से भी जबरदस्ती दोस्ती नही कर सकते है। चाहे वह लङकी हो या लङका। यहाँ यह उदाहण देने का अभिप्राय मात्र इतना ही है कि हमे दूसरे की अस्वीकृति का सम्मान करना चाहिए।

अब मै गूङगांव मे रहती हूँ,, यहाँ जाट और गुर्जर बहुत रहते है। गुङगांव के स्थानीय लोग भी रहते है।यूँ तो अब गुङगांव मे भिन्न भिन्न प्रदेशो के लोग बस गए है। पर मुलतः यह एक हरियाणवी शहर है।हरियाणा एक ऐसा प्रदेश है जहाँ कन्या भ्रुण हत्या आम बात है जिससे यहाँ लङकियो की संख्या कम है। मै जिस विद्यालत मे पढ़ाती थी,वहाँ अधिकांशतः हरियाणा के गाँवो से आए हुए बच्चे पढते थे। एक कक्षा मे 25बच्चो मे सिर्फ 5 लङकियाँ थी। ऐसा नही कि ये लङकियो को पढाना नही चाहते पर घरो मे बेटियाँ होगी तभी तो पढेगी न! 

यह शहर अब एक आधुनिक शहरो मे गिना जाता है। यहाँ बङे-बङे नामचर विद्यालय है । यहाँ लोगो ने अपनी बङी बङी कोठियाँ बना ली है। इनके घरो की लङकियाँ अंग्रेजी माध्यम के विद्यालयो मे पढ़ती है। आधुनिक वस्त्र पहनती है, साइकिल, स्कुटर या कार चलाती है। अथार्त लाड प्यार मे कोई कमी नही है पर इन लङकियो को अपना जीवन साथी चुनने का अधिकार नही है। बहु और बेटी मे फर्क किया जाता है। लङके सर्वेसर्वा होते है, छोटा भाई भी बङी बहन का बाप बना होता है।यहाँ अधिकांशतः घरो की यही स्थिति है।पर अब यहाँ बङी बङी मल्टीनेशनल कंपनियाँ आगई है, जिससे आधुनिक होते इस छोटे शहर के स्थानीय लोगो की सोच मे बदलाव आना शुरू हुआ है। यूँ भी कहा जाता है कि प्रेम तो हो ही जाता है । प्रेम  की दास्ताने सदियो पुरानी है, यह प्रेम के किस्से आदिवासी गांवो से लेकर महानगरो मे सभी जगह सुनने को मिलते है जो मेरी समझ मे तो नही आते है।

फिर भी मै यह अवश्य कहना चाहुँगी कि बात प्रेम की तभी हो सकती है, जहाँ मान भी हो,अपमान मे प्रेम कैसे उत्पन्न हो सकता है। हमे अपने बच्चो को सिखाना होगा और उनसे बात करनी होगी जो हम नही करते है। उनकी परवरिश मे बदलाव लाना आवश्यक है। लङकियो और लङको को बराबरी की शिक्षा के साथ, एक समान स्वतंत्रता व विश्वास देना भी आवश्यक है।जिन्दगी मे आगे बढने के समान अवसर भी मिलने जरूरी है।

इस सोच मे बदलाव की कोशिश महिलाओ ने ही करनी होगी  वैसे भी बच्चे की परवरिश माँ ही करती है। माँ जो पहले एक बहु, एक पत्नी है उसे अपनी ससुराल व पति से बराबरी का हक लेना होंगा जब वह माँ है तो अपने बेटे और बेटी मे फर्क न करे, न सोचे कि जैसा उसकी माँ ने उसके साथ किया, वैसा उसे अपनी बेटी के साथ करना है।फिर सास बने तो बेटी और बहु मे फर्क न करे। तभी एक बच्चा बराबरी की समझ के माहौल मे बङा होगा।

पर जैसा मैने कहा कि प्रेम की बात मेरे गले नही उतरती है। कितने भावुक प्रेमी प्रेमिकाओ को देखा है कि जिन्दगी अच्छी तरह चल रही होती है,प्रेम के चक्कर मे पङे और जिन्दगी पटरी से उतर गई। वो लङके लङकियाँ जिनकी पढाई अच्छी तरह चल रही है,अभी जिन्दगी मे बहुत कुछ करना है पता भी नही कितना कछ समझना है, पर प्रेम मे पङ जाते है।और इतनी छोटी उम्र में? 

मेरे स्कूल मे, नेहा सातवी कक्षा मे पढ़ती थी,जब उसको दसवी कक्षा के सुरेश से प्रेम हो गया था। नेहा पढ़ाई मे होशियार थी और सुरेश बस काम चला रहा था। नेहा जानती थी कि उसके माता पिता को पता चला तो पढ़ाई बंद हो जाएगी। घर मे लङकियों की पढ़ाई का माहौल नही था और इन गाँवो मे आज भी बालविवाह हो रहे है।नेहा जिन्दगी मे कुछ बङा बनने का सपना देखती थी, पर इस प्रेम ने उसके सपने को विभाजित कर दिया था या यूँ कहुँ कि वो नादान जानती नही थी कि उसका कौन-सा सपना उसकी मंजिल है।अच्छा हो कि उसके बचपन का प्रेम बचपन मे ही रह गया हो और उसने अपने सपनो को पूरा करने मे ध्यान लगाया हो, नही तो……..माला की तरह अगर उसने भी शादी कर ली तब?

उस दिन काम करने सुमन के साथ माला आई थी।माला 22-23 वर्ष की युवती है, उसी ने बताया कि वह 12वी पास है। 18वर्ष की आयु मे बारहवी पास करते ही उसने अपनी कक्षा के एक लङके के साथ भाग कर शादी कर ली थी। ससुराल वालो ने अपने बेटे की खातिर उसे स्वीकार कर लिया था। पर उसका अपने मायके से नाता बिलकुल टूट गया था।  लङका तो अपना खुन होता है उससे कुछ भी गलत हो जाए तो भी उससे नाराजगी तो होगी पर उसे छोङा नही जाएगा। बेटी भी अपना खुन है पर वह पिता का मान व परिवार की आन भी होती है। अतः उसे प्रेम करने का हक नही है। अगर किसी से कर लिया यह तो अनुचित हुआ ही और वह भी परिवार के अनकुल जाति का या प्रतिष्ठा का नही है तब तो उससे घोर पाप हो गया है, और पूरा कुनबा उसके और उसके प्रेमी के जान के प्यासे हो जाते है। समझ नही आता कि प्रेम हो गया तो हो गया पर शादी किस लिए? नही, यह न समझिए कि मै शादी के विरूद्ध हूँ, पर 18वर्ष की आयु मे शादी? कानूनन विवाह की आयु 18वर्ष है नही तो यह पहले ही कर लेते। हमारे समाज सुधारक बाल विवाह के विरूद्ध आंदोलन करते रहे, इन बच्चो के हित मे नियम कानुन बने। पर जब यह बच्चे ही…….

18वर्ष की आयु मे शादी,19वर्ष मे एक बच्चा भी गोदी मे आजाता है। पढने मे आया हे कि पाश्चात्य देशो मे छोटी आयु की कुआंरी माँओ की संख्या बढती जा रही है।

अब माला की कहानी का अगला मोङ यह था कि उसके पागल प्रेमी (पति)को अब एक अन्य लङकी से प्रेम हो गया और उसने उससे दूसरी शादी कर ली थी व उसे एक तरह से छोङ ही दिया था। बीच -बीच मे वह अपना पति हक जताने व रौब मारने आता था। अब माला के दो बच्चे है।उसकी ससुराल को भी उसमे कोई रूचि नही रही थी।उन्होने पोते को तो अपने पास रख लिया था और माला व पोती को बाहर का दरवाजा दिखा दिया था।माला ने प्रेम के चक्कर मे अपने को जिन्दगी की ऐसी मझधार मे डाल दिया था कि बाहर निकलने के लिए उसे बहुत हिम्मत और मेहनत की आवश्यकता है। ऐसी न जाने कितनी माला होती है और वह किसी भी वर्ग व जाति की हो सकती है।

ऐसा लग रहा है कि इस प्रेम के चक्कर मे हर तरह से एक लङकी ही सहती है।लङके भी सहते है पर लङकियो की सामाजिक व शारिरिक स्थिति लङको से भिन्न है। अगर लङकी किसी से हँस कर बात कर ले तो लङके को गलतफहमी हो जाती है, प्रेम करे तो परिवार नही मानेगा, अतः शादी परिवार की मर्जी से करती है तो प्रेमी की निगाह मे बेवफा बनती है। परिवार के खिलाफ होकर प्रेमी के साथ भागती है,तब भागी हुई कहलाती है, पूरे जीवन भागकर आई का तमगा लगा रहता है। यही नही प्रेमी के प्रेम का बुखार जब उतरेगा तब कहाँ जाए?
                 भाग गई

यह कल ही की तो बात है जब हाथ मे हाथ डाले बैठे थे साथ

वचन वायदे करते थे साथ,सारी दूनिया भूल कर रहेंगे साथ।

मर्यादा की झोली फैलाए माता -पिता बैठे थे पास,

पर मुझे तो देना था तेरा साथ।

दूनिया ने कहा भाग गई- किसी ने कहा भाग कर आई।

जो किया मैने किया। लङकी को डोली मे विदा होना होता है, मै बिन डोली आई तेरे द्वार।

तुझे नही कहा भाग गया, किसी ने नही कहा भाग कर आया। 

तु तो बैठा था अपने द्वार।

जो लांछना थी वो मेरी थी, जो सहना था वो मैने था।

समझौते भी तो मेरे थे, तेरे साथ, तेरे परिवार के साथ।

चूंकि मै भाग आई थी।

माता पिता बैठे थे फैलाए झोली, लांघ मै आई मर्यादा उनकी।

अब तु कहता चली जा, निकल जा, अब न संभलता हमारा साथ,

सच, अब न निभता साथ।

पर तु तो बैठा अपने द्वार, मै जाऊ किस द्वार?

जाती फिर कोई कहता भाग गई।

जो भी था तुझे समर्पित था, जो त्यागा तुझ पर त्यागा था।

कुछ न अब अपना मेरे पास।

क्या जाऊँ उस पार? क्या वही ठौर अब मेरे पास?

नही! मुझे रहना होगा इसी पार।

अब जो मर्यादा होगी वो मेरी अपनी होगी। 

जो वायदे होगे वो मुझसे मेरे अपने होंगे।
हम लङके व लङकी की परवरिश के माहौल को व सोच को बदलकर उन्हे शायद बराबरी का स्थान दे पाएंगे। लङकियों को बता पाएं कि उनकी स्वीकृति अस्वीकृति का महत्व है। उन्हे भी प्रेम करने की आजादी है और सीखा पाए कि प्रेम मे त्याग तो संभव है पर अपमान संभव नही हो सकता है। अपना मान और दूसरे का मान उनकी पहली महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है।और यही  सीख लङको को भी भली भांति सिखानी होगी। 
परंतु यह लैला मजनू की प्रेम कहानियाँ जो पता नही कितनी छोटी-सी उम्र मे शुरू हो जाती है? इस समस्या का समाधान कैसे करे?आप ही विचार करें? यह प्रेम की बात मेरे तो सिर पर से निकल जाती है।

​पांच बरस लंबी सङक- अमृता प्रीतम

इस किताब मे पांच कहानियाँ है, प्रत्येक कहानी अपना अलग अस्तित्व रखते हुए भी अपने को अगली कहानी से जोङती है और इस तरह एक दूसरे से जुङते हुए, वह एक लंबी कहानी बन जाती है। पहली कहानी शुरूआत है तो पांचवी कहानी अंत है।
लेखिका के अनुसार यह उसका एक चौराहे पर खङे होकर, अलग-अलग राहो को देखने का,और उन पर चलते अलग-अलग राहियों को देखने का एक तजुर्बा है।

यह कहानियाँ जीवन की सच्चाईयाँ है, इसमे कल्पना नही है, सपने नही है, सिर्फ है सच।

   कच्चे रेशम सी लङकी

‘कच्चे रेशम सी लङकी’ कहानी वास्तविकता से पूर्ण एक प्रेम कहानी है। या इसे एक विद्रोह की कहानी भी कह सकते है। माता पिता अपनी इच्छाओं को अपने बच्चो पर कैसे लादते है? फिर बच्चे उनके विद्रोही हो जाते है, इसका अच्छा विश्लेषण है। इस कहानी की नायिका जिसकी उम्र अभी कच्ची है, अपने हिटलर पिता द्वारा प्रताङित, पिता की आकांक्षा (दामाद आई सी एस चाहिए) के विरूध्द कुछ भी करने को तैयार है।नायक से उसे प्रेम तो नही है,पर उसे अच्छा लगता है फिर पिता द्वारा चुने भावी वर के विरोध मे उसे वह सही लगता है। नायक को भी उससे प्रेम नही है पर उसकी चिन्ता है।नायिका जो अभी कच्ची उम्र की है, नायक के साथ भाग जाना चाहती है पर नायक समझदार है, उसे जीवन मे बहुत कुछ करना है। वह नायिका को पांच वर्ष प्रतीक्षा करने को कहता है, उसे भी जीवन मे कुछ करने को प्रेरित करता है। इस कहानी का अंत यही है। आगे की कहानियाँ इस शुरूआत के अंत की संभावनाओ से भरी है कि अगर ऐसा होता तो….और ऐसा हुआ तो….।

दीवारो की ठंडी गंध

इस कहानी का नायक पांच वर्ष बाद अपने देश लौटा है। जानी पहचानी चीजो को महसूस करता है(कोई भावुक नायक नही है) परंतु अपनी सी चीजो को एक लंबे अर्से के बाद देखो तो कुछ भावनाएँ तो जगती ही है।

विदेश जाने से पहले एक लङकी को जिसे वह उसे एक लंबे समय से जानता है उससे प्रेम हो जाता है।ठीक से वह भी नही जानती कि यह भावनाएँ उसके सच्चे प्रेम की है या नही, पर अभी वह उसके जाने के कारण भावुक है और एक प्रकार से वह प्रतीक्षा करने का वायदा कर लेती है। ऐसा नही कि नायक को उससे प्रेम था या उम्मीद थी कि वह प्रतीक्षा करती होगी, फिर भी लङकी के हाथ का बना स्वेटर गले मे डाल कर आता है।माँ झिझकते हुए उसे बताती है कि उसके छोटे भाई  ने उसी लङकी से शादी कर ली है, यह पहली संभावना है।

इसमे माँ की भावनाएँ भी है, बेटे के कमरे को उसने वैसा ही रखा है जैसे पांच वर्ष पहले था। चीजे अंदर से बदल जाती है पर बाहर से वही रहती है।माँ बेटे के आने से खुश है, बेटा भी माँ के साथ सुखी है। पिता की मृत्यु से माँ का व्यक्तित्व प्रभावित हुआ है। लेखिका शायद यह बताना चाहती है कि समाज मे स्त्री का अस्तित्व उसके पति पर निर्भर है उसके बिना वह कमजोर व असहाय है। माँ बुढ़ापे मे अकेली रह गई है, उसे भय है कि बेटा फिर चला न जाए।

समाज राग

समाज राग इस किताब की तीसरी कहानी है, अथार्त चौराहे की तीसरी सङक व लेखिका की एक अन्य अनुमानित संभावना है।

इस कहानी को एक व्यंग कहा जाए तो अधिक ठीक होगा,क्योकि यह व्यंग है समाज पर उसकी उपस्थिति पर कि वो क्यो बना, कैसे बना?  कहानी का अभिप्राय यही है कि एक इंसान अकेला नही रह सकता, चुप नही रह सकता। अकेला इंसान विवाह करता है बच्चे पैदा करता है, अपना समाज बनाता है, जहाँ सिर्फ शोर होता है, हर कोई अपनी बोलता है, दूसरे की नही सुनता, न समझता, केवल शोर करता है।

और इस तीसरी कहानी मे जिन्दगी का सच नजर आता है, पहली दो कहानियों मे कुछ रूमानियत और भावनाएँ थी, पर इसमे तो इंसान के अंदर का सच उभरता है।

खामोशी

यह चौथी कहानी खामोशी एक तरह से समाज राग का विस्तार ही है।इंसान अपने लिए समाज बनाता है, परंतु उसकी इच्छाओ का  अंत नही है, वह समाज को अपने अनुसार ढालता है और अधिक सुविधाओं को पाने के चक्कर मे नीचे गिरता जाता है।

इस कहानी मे नायक व नायिका विवाहित है, उनमे प्रेम भी है पर वह किसी भी कीमत पर आधुनिक समाज मे बसना चाहते है(जैसा समाज इंसान ने बना दिया है।) उसके लिए वह नीचे गिरने को तैयार है,क्योकि यह समाज मे होने लगा है, इससे क्या फर्क पङता है।

लेकिन एक बात महत्वपूर्ण है कि यहाँ इंसान को अहसास है कि उससे क्या हो गया है और यह दर्द उसे टीस रहा है कि वह समाज को क्या रंग दे रहा है। यह अहसास एक  सर्द खामोशी पैदा करता है। जो इस बात का संकेत है कि समाज मर रहा है, वह प्रेम जिसके कारण इंसान ने समाज की रचना की थी, वह रुमानी कल्पनाएँ जो उसके हृदय मे पैदा हुई थी,जिनके कारण वह समाज को लाया था, नष्ट हो गई है। वह गुम हो गया है, उसका रोमांस खत्म हो गया है। जिस चुप को तोङने के लिए (या चुप के कब्र जैसे रंग को तोङने के लिए) उसने शोर पैदा किया था, उसे तोङ न सका है और उसने अपने को ह्रदयहीन, प्रेमहीन बना दिया है।

पर वह फिर लौट रहा हो, उसी रोमांस की ओर ‘आग की लपट’ लेखिका की पांचवी कहानी है। उसने जीवन की समस्त कङवाईयों को चखा है। वक्त की लंबी सङक पर बहुत धूप, ठंड और बहुत बारिश और अंधेरे से गुजरते हुए सङक के अंत मे पहुँचा है।जहाँ उसे सङक का आरम्भ मिला।या एक-एक करके रोज रात की बिजली बुझाकर एक-एक दिन को अंधेरे मे फेंक कर पहुँचता है उसी सुख तक जिसकी तलाश मे उसने न जाने कितनी सङके नापी थी, वह सुख उसी सङक के आरम्भ व अंतिम सङक के मिलन मे छिपा था।

आग की लपट

इस कहानी के साथ इस किताब की पांचो कहानियों का अंत होता है। कहानी वही है, पांच वर्ष पूर्व एक लङका व एक लङकी मिलते है।उनमे शायद प्रेम उपजता है। लङकी बहुत शिद्धत के साथ उस प्रेम को महसूस करती है और सोचती है कि वह अपने प्रेमी की प्रतीक्षा करेगी। लङका गंभीर नही है पर उलझा हुआ है।पांच वर्ष का समय बीतता है।इस बीच लङकी के जीवन मै कोई ओर आ जाता है।वह यह बात उस लङके को बताती है। लेकिन फिर भी दोनो मिलते है।

“और उन दोनो ने देखा, उनके पैरो के आगे जो सङक टूट गई थी, अब वह टूटी हूई नही थी।“

और इस प्रकार पांचो कहानियों का अंत होता है। चौराहा मे चार राहे होती है, पर एक सङक टूटने से वह पांच राहे दिखती है, अब सङक जुङने से फिर चारो राहे एक जगह मिलती है।कहानियाँ बहुत खूबसरती से हमे इंसान की फितरत और उसकी भटकन से परिचय कराती है।
 

आधे अधूरे-मेरा विचार

कल आधे अधूरे नाटक (मोहन राकेश)फिर पढ़ा। सावित्री के चरित्र के ईर्द गिर्द नाटक आधारित है, सावित्री एक कामकाजी महिला है, जिसका घर उसी की कमाई से चलता है।पति की स्थिति  एक नाकामयाब व्यक्ति की है, वैवाहिक जीवन के कई सालो मे उसने पत्नि पर अत्याचार किए है, अब भी पत्नि पर ताने व कटाक्ष कसने से नही चूकता है। सावित्री अब चिङचिङी हो चुकी है। बेटी ने घर से भाग कर शादी कर ली है, बेटा भी बीच मे ही पढ़ाई छोङ चुका है। सावित्री घर की परिस्थितियाँ संभालते-संभालते अब हार चूकी है, थक चूकी है। अपनी हताशा अपने पति महेन्द्र पर निकालती है। पति के अत्याचार की पुष्टि बच्चो के संवादो से होती है। महेन्द्र के मित्र जुनेजा के संवादो व महेन्द्र के कटाक्षो से प्रतीत होता है कि सावित्री ने अपनी समस्याओ के समाधान के लिए अन्य पुरूषो का सहारा लिया है। जगन्नाथ से उसकी विशेष मित्रता है,, ऐसा दिखाया गया है। 
पर जिस तरह से जुनेजा सावित्री के चरित्र पर उंगली उठाता है या उसकी भटकन को उजागर करता है, उससे सावित्री का चरित्र कमजोर नही हो जाता है न ही उसकी दृढ़ता मे कमी आती है। वह एक मजबूत स्त्री है, उसने हर परिस्थति का, समाज का, अपने निर्बल पर अहंकारी, अत्याचारी पति का सामना दिलेरी से किया है, जब लङका भी उसे नाउम्मीद करता है, तब वह अधिक निराश होती है, ऐसा लगता है वह सब कुछ छोङना चाहती है, पर इससे ऐसा नही कि वह हार गई है।

सावित्री के चरित्र से यह इंगित होता है कि स्त्री को पुरूष की स्वामी की भूमिका स्वीकार नही है, वह पुरूष के अहंकार से टक्कर लेने को तैयार है। पुरूष तो पुरूष ही है, चाहे वह पति हो या प्रेमी अथवा मित्र, किसी भी रूप मे हो। वह अब अपना स्वतंत्र अस्तित्व चाहती है, उसके लिए वह अपनी पूर्ण ताकत के साथ जुझने को तैयार है। यह स्थिति तब भी थी, जब यह नाटक लिखा गया, उससे पहले भी थी, अब भी है। हर  युग मे, हर देश, प्रदेश मे ऐसी महिलाएँ रही है, जिन्होने अपने अधिकारो, अपनी पहचान के लिए संघर्ष किया। आज महिलाएँ शिक्षा पा रही है, नौकरी कर रही है, हर तबके, हर जिले, शहर, गाँव मे लङकियाँ जागरूक हो रही है।

परंतु पुरूषो को यह स्वीकार करने मे समय लग रहा है। पुरूष का अहंकार स्त्री के स्वतंत्र अस्तित्व को स्वीकार नही करना चाहता, इस नाटक मे भी जुनेजा के संवाद मे पुरूष की तिलमिलाहट झलकती है, उसका अहं हार रहा है, क्योकि स्त्री अब स्वतंत्र हो रही है। अंत मे महेन्द्र की वापसी घर-परिवार के महत्व को दर्शाती है।

एक सच्चाई.. एक सोच !

​मै जो लिखने जा रही हुँ, वो एक कहानी नही है, वो एक सच्चाई है,  जिसे हम सभी जानते है।  जिन के बारे मे लिख रही हूँ, वे सच्चे पात्र है, उन्हे मैने गढ़ा नही है। ये वो है जिनसे मै किसी न किसी रूप से रूबरू हुई हूँ।

सुमन मेरे घर काम करती है। सुमन के माता पिता नही थे इसलिए मामा मौसी ने अपनी तरफ से अच्छा घर देखकर ग्यारह वर्ष मे ही उसकी शादी कर दी थी। 14 वर्ष मे वह एक बेटी की माँ बन गई थी। अब उसके पांच बच्चे है। उसकी कहानी सिर्फ उसकी कहानी नही है उस जैसी  न जाने कितनो की कहानी है ।  सुमन की बात सुनते  हुए मुझे मैडम गर्ग याद आ रही थीं। वह मेरे साथ स्कूल मे पढ़ाती थी। संस्कृत की  अध्यापिका, बहुत मन से, मेहनत से पढ़ाती थी। उनके विद्यार्थी उन्हे पसंद करते थे। जब मैने उस विद्यालय मे पढ़ाना शुरू किया तब वह एक लंबी छुट्टी के बाद लौटी थी। पुरानी अध्यापिका होने के कारण उनका बहुत मान था, अपनी शर्तो पर ही उन्होने आना शुरू किया था। क्या अपनी व्यक्तिगत जिन्दगी वह अपनी शर्तो पर जी रही थी? जब हमारी कुछ दोस्ती हुई, तब एक दिन स्टाफ रूम मे, जब सिर्फ हम दो थे, उन्होने अपनी कहानी सुनाई। मुझे पता चला था कि अपनी बङी विवाहित बेटी की मृत्यु के शोक मे ही वह लंबी छुट्टी पर थी। बेटी की मृत्यु का कारण उनकी अपनी ही कहानी थी।

कहानी-  ग्यारह वर्षीय मीना अपने माता पिता के साथ एक विवाह समारोह मे सम्मलित होने के लिए गई थी,, वहाँ उपस्थित गर्ग दपत्ति को वह भा गई और तुरंत अपने 22वर्षीय पुत्र के लिए उन्होने मीना का हाथ उसके माता पिता से मांग लिया। पहले तो उसके माता पिता झिझके, माँ ने तो भरसक विरोध भी किया परंतु गर्ग परिवार की अपने गाँव, तहसील मे पद, प्रतिष्ठा, धन-संपत्ति व साथ ही लङका इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहा था इन सब मे बच्ची मीना की आयु नगण्थ थी। माँ ने सोचा कि गौना इसके वयस्क होने पर ही करेगे लेकिन मीना के सास ससुर को यह बालिका वधू इतनी भाई कि वे उसे इस आश्वासन के साथ कि उसका पूरा ध्यान रखा जाएगा तभी विदा कराकर ले गए। मीना 12-13वर्ष की आयु मे पहली बार गर्भवती हो गई, अर्थात वह 11वर्ष की आयु से ऐसी यातना सह रही थी जिसकी कल्पना भी शायद हर व्यक्ति नही कर सकता है। मीना के माता पिता तब चेते और समझ पाए अपनी कोमल बालिका पुत्री के नारकीय यातनापूर्ण जीवन को और उसकी ससुराल जाकर, यह कह कर कि लङकी का पहला प्रसव मायके मे ही होना चाहिए, मीना को अपने साथ ले आए। मीना ने बेटी को जन्म दिया परंतु जिन हालातो मे उसको जीवन मिला उसके परिणामस्वरूप बेटी का दिमाग अविकसित रह गया। इस बार मीना की माँ दृढ़ता से अङ गई और उसके सास ससुर को कह दिया चूंकि मीना का ध्यान नही रखा गया अतः उसके वयस्क होने तक मीना को उसके पति घर नही भेज सकेगे। मीना के बङे भाई अब तक समझदार हो गए थे। मीना की शिक्षा फिर से आरंभ की गई और  उसने उच्च शिक्षा प्राप्त कर ली व बङे भाई के जोर देने पर उसने बी एड भी कर लिया। उसके सास ससुर को अपनी गलती का अहसास हो चूका था। इस बार शिक्षित मीना ससुराल पहुँची थी। मीना का अपना जीवन तो संवर गया लेकिन वह अपनी बेटी जो बङी तो हुई पर मानसिक रूप से  बच्ची  ही रही थी, के साथ न्याय नही कर सकी थी। जब मीना दुबारा ससुराल गई तब उसकी माँ ने  नवासी रजनी को अपने पास ही रखा था। नानी की मृत्यु के बाद रजनी मीना के पास आ गई। इस बीच मीना के दो बच्चे और हुए, एक बेटा, एक बेटी। न जाने दूनिया की कौन सी बातो  मे आकर शिक्षित मीना ने रजनी की शादी कर दी, ऐसी लङकी के लिए वर व ससुराल कैसे मिले होगे समझा जा सकता है। रजनी के दो बच्चे हुए फिर वह बिमार रहने लगी। रजनी की मृत्यु से मीना को आघात तो पहुँचा पर उससे अधिक पछतावा था।

जिस तरह मीना के लिए उसकी माँ ने दूनिया का सामना किया, उस तरह मीना अपनी बेटी के लिए कोई साहसिक कदम क्यो नही उठा सकी?

रजनी का दिमाग विकसित नही हुआ था यानि दिमाग से वह बच्ची थी, मीना के वयस्क होने पर ही उसे दुबारा ससुराल भेजा गया, पर मीना ने अपनी अवयस्क बेटी का विवाह कर दिया क्यो?

मीना शिक्षित थी, कङवे अनुभवो से मिले जख्म कभी सूखे नही थे, फिर भी ऐसी क्या लाचारी थी?

हमेशा हर समस्या का समाधान शादी क्यो?

लङकी बहुत सुंदर है दूनिया की नजर मे आ रही है, शादी कर दो, लङका जिम्मेदार नही है, शादी कर दो । अब पढ़ाई पूरी कर ली शादी कर दो। अरे इतनी उमर हो गई शादी नही हुई।

शायद मीना अपनी गृहस्थी की जिम्मेदारी मे फंसी थी,  रजनी की जिम्मेदारी उसके लिए अतिरिक्त जिम्मेदारी थी। रजनी शारारिक रूप से पूर्ण वयस्क थी,ऐसी अवस्था मे उसे अतिरिक्त ध्यान की आवश्यक्ता थी। और जैसा कि दूनिया मे रिवाज है , व्यक्ति से ज्यादा परंपरा चलन अधिक महत्वपूर्ण है दूनिया ने कहा इसकी शादी कर दो, और रजनी की शादी कर दी गई।

मैने गर्ग मैडम से कुछ नही कहा, उनके आँसु, उनका पछतावा बता रहा था कि उन्होने अपनी सामाजिक दुनियावी बेबसी के सामने घूटने टेक दिए थे।

बंगाल की राससुंदरी देवी बंगला मे पहली वह महिला थी जिसने अपनी आत्मकथा लिखी थी उनकी आत्मकथा के अनुसार उनका जन्म सन्1809 मे हुआ था। उनकी आत्मकथा सन् 1868 मे लिखी गई थी उनका विवाह सिर्फ 12 वर्ष की आयु मे हुआ था। उन्होने14बच्चो को जन्म दिया था। उन्होने अपनी 25 वर्ष की आयु तक 12 बच्चो को जन्म दिया था।

उन्होने चोरी चोरी पढ़ना लिखना सीखा था, चूंकि तब औरतो के पढ़ने मे पाब॔दी थी। उन्होने लिखा संयुक्त परिवार व्यवस्था मे स्त्री गृहिणी देवी है या दासी, नही है तो केवल मनुष्य। उनके अनुसार स्त्री परिवार के लिए एक देह है, मर्यादा है, वंशबेल बढाने का साधन, वह माँ जिसका अपना कुछ भी नही है।

राससुंदरी देवी का विवाह 1821 मे हुआ था, मीना गर्ग का विवाह 1961 मे हुआ और सुमन का विवाह1994 मे हुआ था।

राससुंदरी बंगाल की थी और मीना व सुमन उत्तर प्रदेश की है।राससुंदरी देवी ने छिप छिप कर लिखना पढना सीखा था। मीना ने अपनी माँ की हिम्मत से उच्च शिक्षा प्राप्त करी थी। सुमन ने स्कूली शिक्षा प्राप्त नही करी थी पर बचपन मे लिखना पढना अपनी आवश्यकतानुसार सीख लिया था।

अपनी बेटियो को भी वह स्कूल नही भेज सकी थी पर जितना उसे आता था उतना उन्हे भी सीखा दिया था। अपनी बेटियो का विवाह भी उसने 18वर्ष और16 वर्ष की आयु मे कर दिया था।

रासदेवी और मीना सभ्रांत व कुलीन वर्ग से थी जबकि सुमन दलित वर्ग से थी।

हमे शहरो मे शिक्षित, नौकरी  करती लङकियाँ नजर आती है, पर गाँवो, छोटे शहरो मे स्त्री की स्थिति अभी भी दयनीय है। बाल विवाह संबधित कानून बनने पर भी बाल विवाह हो रहे है।

मै यह नही कहना चाहती कि स्त्रियों की स्थिति मे सुधार नही हुआ है या वह जागरूक नही हुई है। 

प्रगति हुई है,पर अभी ओर आगे जाना है, सोच और संस्कारो को बदलना आसान नही है। मै विवाह जैसी संस्था पर  पूर्ण विश्वास रखती हुँ।पर यदि विवाह एक ऐसा बंधन है जो किसी एक की प्रगति व विकास मे रूकावट बनता है या वह किसी भी एक के लिए किसी जेल से कम नही है तो?

इस पवित्र बंधन की पवित्रता पर स्थिरता बनाने के लिए अपनी

सोच पर कार्य करना होगा।

​मैने नही वोट देना ।

मैने नही वोट देना, यह भी कोई बात हुई, श्रीमति वाजपेयी गुस्से मे थी, मै हेरान उन्हे सुनने लगी, मुझे कुछ बोलने या पूछने की आवश्यकता नही थी, मै जानती थी, वह स्वं अपना मन का गुब्बार निकाल देगी। 

और मै उनके लिए चाय बनाने लगी, वह कुछ तैश मे और कुछ दुख मे बोल रही थी। यह भी कोई बात हुई सरकार ने यूँ अचानक यह नोटबंदी कर दी है। इतनी कठिनाई से हम औरते पैसा जोङती है, आप समझ सकती हैं। और हमारे गूड्डू और उसके पिताजी, सरकार के इस बेतुके काम पर तालियाँ बजाते नही थक रहे है, जैसे भ्रष्टाचार अभी और वाकई खत्म हुआ जाता है। मुझे तो बहुत गुस्सा आ रहा है, मैने नही वोट देना इस बार। 

अब पति देव को तो नही बता सकती थी, पर गुड्डू को बताया अपने 500और1000 के नोटो के बारे मे, पता नही उसे क्या हुआ एकदम बोला, आपके पास काला धन है। आप ही बताओ ऐसे कैसे कह दिया उसने अपनी माँ को, मैने कह दिया उससे बेटा यह तेरे बाप के मेहनत की कमाई के रूपये है, सच भाभी जी मेरे ये कुछ भी कर ले, पर इतने गऊ है एक पैसा रिश्वत लेने की हिम्मत नही कर सकते, आप तो जानती है, पार्ट टाइम काम करते है, और मै क्या बाहर………? आँखो मे आँसू लिए बोली, मैने नही वोट देना।

गुड्डू कहता है- नही, यह बात नही है, पर जिस पैसे का कोई हिसाब नही है, वो काला धन होता है। मैने कहा तुम्हारे पापा जो पैसा लाकर मुझे देते है, उसकी सैलरी इत्यादि का रिकार्ड होता है, वो कहता है बात पापा की नही आपकी है, आपके पास जो पैसा है,  वो आपने छिपा कर रखा है और आपके पास कोई हिसाब नही है, बताइए कैसे हिसाब नही है, कैसे एक एक पैसा जोङा है? आप तो समझ सकती है। मैने नही वोट देना यह क्या बात हुई, हमारा पैसा कैसे काला धन हो गया? कोई भी सामान खरीदते हुए कितना मोल भाव करती हूँ, ऐसे ही गृहस्थी नही चलती, इस महंगाई मे, सरकार का क्या, कब किस चीज के दाम बढ़ा दे? सरकार तो पागल बना देती है। एक एक पैसा कहाँ कहाँ किस तरह बचाए पूरा हिसाब लेले सरकार मुझसे, क्यों ठीक कह रही हूँ न! 

आप तो समझ सकती है। गुड्डू से तो मैने कहा, बेटा, मेरे पैसे को तुम काला धन कहते हो, जब सैर सपाटे को तुम्हे जाना होता है तो, पैसे हमारे से ही मांगते हो अगर हम एक-एक पैसा जमा न करते, तब अपनी गर्ल फ्रेडस को तुम यूँ ही गिफ्टस नही दे पाते, अरे ऐसे क्या देखते हो हम कुछ कहते नही पर सब पता है। आप ही बताए, इस तरह हमारे मेहनत से जूङे धन को कैसे काला धन कहा जा सकता है। मैने तो अब वोट नही देना है। आखिर झक मार कर सब रूपए मैने वाजपेयी साहब को दे दिए, और क्या इनकी मेहनत की कमाई जला देती या नाले मे बहा देती। इनके पैसे इन्हे ही वापिस कर दिए। 

कहते-कहते वो बूरी तरह रोने लगी थी, मैने उन्हे पानी दिया, पानी पीते-पीते और हिचकियो के बीच वह बोली, वाजपेयी साहब ने आजकल मुझसे बातचीत बंद कर दी है, ऐसे मुझे देखते है जैसे मैने कोई डाका डाला हो, मैने नही देना वोट इस बार। आप ही बताए, यह ऐसा व्यवहार कैसे कर सकते है, अरे जितने पैसे हाथ मे रखते है, उतने मे अपनी अकलमंदी से घर चलाती हूँ,  यह तो पैसे पकङा कर कह देते है इसी मे सब चलाना होगा,  फिर निश्चित हो जाते है और फिर इनकी और इनके बच्चो की फरमाइशे कौन पूरी करता है,इस महंगाई से जूझने के लिए मै अकेली रह जाती हूँ, आप तो समझ  सकती है। पिछली बार जब प्याज मंहगी हुई, तब भी मै इनके खाने मे कच्ची प्याज रखती थी,, कम प्याज मे भी अच्छी सब्जी बनाने के लिए यू ट्यूब का सहारा लेती थी, तब कभी नही पूछा कैसे कर पाती हो?, और तब जब इनकी बरेली वाली बहन की बेटी की शादी थी, वह तो भात न्योतने आई और बोल गई, भाई मेरी ससुराल मे इज्जत रख लेना, वह तो कह गई, पर बाद मे सब खर्चो का हिसाब लगाया तब इनका तो  ब्लड प्रेशर ही शुट अप कर गया था। फिर मैने कहा इनसे, आप तो बस शादी मे जाने के लिए पूरे परिवार की रिजर्वेशन करा लो, बाकी सब लेना देना मै देख लूगी। तब यह स्वस्थ हुए। लेकिन यह नही पूछा कैसे करोगी? सब किया, लङकी के पायल, बिछूए, नथ, साङी, इसके अलावा ननद के सभी रिश्तेदारो के कपङे नेग। हाँ, भाभी जी, यही परंपरा चली आ रही है बेटी के बच्चे के होने से लेकर उसके विवाह तक, कितने रीति रिवाजो को लङकी के मायके के सामान से निभाना जरूरी माना जाता है।क्या करे सदियों से चली आ रही इन परंपराओ को निभाना पङता है। पर इनकी बात तो ठीक नही न! अरे पैसा बचाती हूँ, तभी तो इनकी नाक नीची नही होने देती। और ये ऐसे रूठे जैसे मैने कितना बङा धोखा दिया है। मैने नही वोट देना, आ रहे है इलेक्शन, मै वोट नही दूँगी। 

इतना कह कर वह कुछ शांत हूई, शायद मन की भङास निकाल दी थी, तभी मंद- मंद मुस्कराने लगी, फिर धीरे से बोली वो कोने वाले फ्लेट मे जो मिस्टर चावला  रहते है, उनका हाल भी बिलकुल हम गृहणियो के  जैसा ही है। मैने हेरानी से देखा, उनकी इस हताशा के समय इस मुस्कान का राज? और मिस्टर चावला? पर मुझे प्रतीक्षा नही करनी पङी, उन्होने मिस्टर चावला के बारे मे बहुत प्रफुल्लित मन से बताना शुरू किया, बोली, मिस्टर चावला नोट बंदी के बाद एक दिन मेरे पास आए और पूछने लगे कि आप अपने जमा पैसो का क्या कर रही है? मै  बङी परेशान हुई, इन्हे कैसे खबर? तब तक तो मैने गुड्डू को भी नही बताया था पर वह बोले उन्हे भी अपने जमा रूपयो को कही ठिकाने लगाना है, मैने कहा, भाई साहब आपका तो अपना बैंक खाता होगा, आप क्यो परेशान? और मन मे सोचा काली कमाई? पर वो बोले, हमारी मिसेज बहुत समझदार है, हमे अपनी अक्ल से ज्यादा उनकी बुद्धि पर विश्वास है, सो हमारी सभी चेक बुक, पास बुक ए टी  एम कार्ड  मिसेज  के पास रहते है, आखिर सब उन्होने ही तो करना होता है। पर  हमारे भी तो अपने पर्सनल खर्चे होते है, तो हम कुछ  रूपया सौदा- सुलफ से बचा लेते है, उन्ही रूपयो की समस्या है, अब वो अगर हम एकाउंट मे जमा कराएँगे तो उन्हे दुख होगा। मिस्टर चावला की बात सुनकर मैने तो कह दिया कि हमारे पति और हमारे बीच कोई पर्दा नही है।

मिसेज वाजपयी ने आगे कुछ  रूखे स्वर मे कहा, हाँ, हमसे अच्छी तो मिसेज चावला, आप तो समझ ही रही है, मैने  नही वोट देना। अब तो नोटबंदी भी खत्म हो गई, पर वाजपेयी साहब का व्यवहार न बदला। आप तो समझ सकती है, इस अंधेर नगरी चौपट राजा मे मै वोट दूँगी, नही! 

मैने नही देना वोट।