एक और नया साल

फिर आया नया साल और मैं फिर पहुँची अपने अतीत में

मुझे याद नहीं कब मैनें नव वर्ष को जाना,

मेरे लिए पहले नव वर्ष क्या था?

वो दिन याद है मुझे जब अपनी नन्ही दूनिया के खेल में मग्न,

मैनें सुनी माँ की आवाज़, “आज हमारी बिटिया का जन्म दिन है,

पर अभी उसे इसका अहसास नहीं”फिर मैं जब भी पाती सिर्फ मेरा विशेष दिन-

नई पोशाक, मेरी पसंद के पकवान और हाँ विशेष रूप से सभी का प्यार व दुआएँ।

तब उसे ही मानती नया साल।

तब तारिखों, वर्षों का कहाँ तक ज्ञान।

फिर आया एक ओर विशेष दिन- मिला पहली कक्षा का परिणाम,

किसी ने बताया अब शुरू हुआ  तुम्हारा पढ़ाई का नया साल।

फिर नई किताबों-काॅपियों की खुशबू के साथ मनाते नया साल।

यूँ बङे भाई साहब खूब चिढ़ाते,”न बदला तुम्हारा कक्षा कमरा, न बदले सहपाठी(हमारी तो पहली से तीसरी तक अध्यापिका भी नहीं बदली थी)

फिर बोलो, कैसा तुम्हारा नया साल? तुम तो रही वहीं अभी भी पुराने साल।”

फिर काॅपियो में तारिखें  बदलते-बदलते जान गए नया साल।

अब इंतज़ार होता एक जनवरी का, सुबह सभी को देनी है नव वर्ष की बधाई।

और फिर जब आया टी.वी., तब से 31 दिसम्बर की रात कटती टीवी के साथ।

 लगा समझदार हो गए है, हम भी सभी की तरह करते अपने से एक नया कुछ कर गुजरने का वायदा।

फिर एक साल याद कर आती है, अपने पर हँसी,। इस मिथ को जानकर कि जिस काम को करते हुए नववर्ष की शुरुआत करोगे, वह काम पूरे वर्ष करोगे।

हमने भी उस वर्ष दी टी.वी. को तिलांजलि, ले बैठे किताबें, सारी रात पढ़ने की ठान ली। पर  टी.वी. की आवाज़ हमारे कानों तक पहुँचती थी, उससे भी अधिक सभी के ठहाकों की आवाज़े हमारे कानों को चुभती थी।(तब टी.वी. कार्यक्रम मनोरंजक होते थे)कैसे पहुँचे उस साल नववर्ष तक यह  हम जैसे सभी अंधविश्वासी समझ सकते है।

अब न रहे हम मिथो के घेरे में, किया है अपने को सभी अंधविश्वासों से आज़ाद।अपने से न कर कोई वायदा, ज़िन्दगी खुल कर जिया करते हैं।

इस इंटरनेट की दूनिया में अपना 60वाँ नववर्ष सभी जाने, पहचाने और अंजानों  के साथ मना रहे हैं।

‘आप सभी के लिए नव वर्ष मंगलमय हो।’

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सूखे विचारों की गीली खुशबू

​कुछ सूखे पत्ते और सूखी लकङियाँ

कुछ सूखी उम्मीदें और सूखी उलझने

निराशाएँ भी सूखी और मन भी सूखा

यह तो मानों अकाल हो गया।

कहाँ से मिलेगी आद्रता?

कब भीगेगा मन?

सूखी धरती हुई सख्त,

मन भी हुआ कठोर,

कहाँ मिलेगी गीली धरती?

कैसे भीगेगा मन?

आसमान भी फीका पङ गया,

तारें भी हुए बेचमक,

कहाँ होगा नीला आसमान

जिसमें हो टिम-टिम तारे, 

कहाँ मिलेंगे जलभरे बादल?

जैसे ही वे बरस जाएँगे,

वैसे ही खिल उठेंगे सूखे पत्ते और सूखी लकङियाँ,

चमक उठेंगी उम्मीदें और जागेंगी उलझने

निराशाएँ भी मारेगी हिलोरें और मन भी होगा भरा-भरा

 जैसे मानों आएगा बसंत।

पर अभी तो-

कुछ सूखे पत्ते…………मन भी सूखा।

​  एक सच्चाई-एक सोच (भाग-3)

यह दुःख की बात है कि संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार विश्व में बाल विवाह के मामले मे भारत का दूसरा स्थान है। विश्व में होने वाले बाल विवाह में 40% भारत के बाल विवाह है। उसमें भी 49% लङकियों का बाल विवाह होता है। जरूरी नही कि लङकी अभी छोटी है तो उसका वर भी छोटा होगा वह आयु में उससे दुगना या तिगुना बङा भी हो सकता है। यदि वर व वधू दोनो की आयु छोटी होती है तब तो संभव है कि वधू  की विदाई उसके बङे होने पर की जाए परंतु यदि वर वयस्क है तब वधू की आयु  कितनी भी कम क्यों न हो उसकी विदाई तभी कर दी जाती है और वह तभी शारीरिक यौन प्रताङनों से गुजरने लगती है।
लङकी बाल विवाह के आंकङे राज्यानुसार इस प्रकार है:-

             मध्य प्रदेश-75%

             राजस्थान- 68%

               उत्तर प्रदेश-64%

              आंध्र प्रदेश-64%

               बिहार-    67%

देश के लङकी बाल विवाह में 72% लङकियाँ ग्रामीण प्रदेश की होती है। हमारे देश में 1.2 करोङ बच्चों की 10वर्ष से कम आयु में शादी कर दी जाती है।78.4लाख लङकियों की शादी 10 वर्ष से कम उम्र में हो जाती है।अतः ये 12वर्ष से कम आयु मे ही गर्भ धारण कर लेती हैं। सरकारी सूचनाओं के अनुसार बाल विवाह रोकने के लिए कानून बने हैं तथा सख्ती भी बरती जाती है।परंतु ये लोग छिपते-छिपाते बालक – बालिकाओं का विवाह कर ही देते है।राजस्थान में अक्षय तृतीया तिथि को बहुत शुभ दिन माना जाता है,अतः इस दिन अधिक विवाह संपन्न किए जाते है, बहुत रोकथाम व सख्ती के बावजूद विवाह हो जाते है।

अर्थात कहने का अभिप्राय यही है कि कानून बनाने व सख्ती करने के बाद भी सफलता नही मिल रही है, क्योंकि हम ग्रामवासियों की सोच बदलने में सफल नहीं रहे हैं।माना कि सोच बदलना आसान नही है पर 70वर्ष तो बहुत होते है। हमे दुःख है कि हमारा देश सोच के आधार पर कितना पिछङा देश है। क्या देश की प्रगति बङे-बङे उद्योगों, बङे बाजारों, बङे-बङे माॅल,मेट्रो इत्यादि से दिखती है।

हमारे देश के गाँव तो आज भी अविकसित है, फिर कैसे कहा जा सकता है कि देश की प्रगति हो रही है।आज भी हमारे देश की 68.84% जनसंख्या गाँवों में बसती है। हमारे देश की आत्मा यहीं है। परंतु दुःख के साथ कहना होगा कि हमारे देश की सरकारे  देश के ग्रामीण क्षेत्र के सुधार के लिए विशेष कार्य नही कर सकीं है।हमारे देश में 6लाख 49 हजार 4सौ 81 गाँव है। सबसे अधिक उत्तर प्रदेश में व सबसे कम चंडीगढ़ में है।

कहने को कहा जाता है कि हमारे देश के गाँवों में आधुनिक सुविधाएँ पहुँच चुकी हैं, वे बीती सदियों के गाँव नही हैं, परंतु यह पूर्णतः सच नही है। राजस्थान के गाँवों की औरतों को अभी भी दूर-दूर स्थानों से पानी लेने जाना पङता है। आज भी गाँवो में आधुनिक चिकित्सा सुविधाएँ उपलब्ध नही है। अगर चिकित्सालय खोल दिए गए हैं तो चिकित्सक नही है साथ ही दवाइयों और उपकरणों का भी अभाव पाया जाता है।गंभीर मरीजों को शहर ले जाना पङता है, जिसके लिए पर्याप्त साधन नही है, अस्पतालों मे एम्बुलेंस नही है जिससे मरीजों को सुरक्षा पूर्वक शहर के किसी सरकारी अस्पताल तक पहुँचाया जा सके। सही समय पर सही चिकित्सा न मिलने के कारण मरीज की मृत्यु भी हो जाती है।  कोई भी डाॅक्टर, डाॅक्टर बनने के बाद सिर्फ पैसा कमाना चाहता है, अतः वे गाँवों में जाकर चिकित्सालयों में काम करना पसंद नही करते है।ग्रामीणों के लिए सरकार जितना कार्य कर रही है, वह पर्याप्त नही है, परंतु क्या हम उनके लिए कुछ कर सकते हैं?

खेती से पर्याप्त आय न होने के कारण कृषक परिवार शहरों की ओर आ रहे है, जहाँ उनके परिवार का पालन ठीक से हो सके, वे एक शांति पूर्ण सुखमय जीवन का  सपना  ले कर आते है। परंतु  इन परिवारों के मर्द शीघ्र ही शराबखोरी की आदत के शिकार हो जाते है। नशा उनकी बुद्धि और सपना दोनो भ्रष्ट कर देते है। तब इन परिवारों की औरतें घर से बाहर मेहनत मजदूरी करने निकलती है। दिन भर मेहनत के बाद रात को नशेबाज पतियों की मार खाती है, फिर भी उसे भरपेट भोजन कराती है, जो सपना मिलकर देखा था, उसे पूर्ण करने की जिम्मेदारी  अकेले अपने कंधों पर उठाती हैं।

अब प्रश्न यह उठता है कि यदि हमारे गाँव आधुनिक गाँव है तो क्यों परिवारों को शहर की ओर पलायन करना पङता है? अगर गाँवों में ही सुरक्षित भविष्य हो तो किसान क्यों शहर आकर मजदूरी करें और गलत आदतों के शिकार बने।कभी बाढ़, कभी सूखा,ऐसी स्थिति में ये पुरूष किसान या तो आत्महत्या करते हैं या शहर आकर बुरी आदतों के शिकार होते हैं।हर स्थिति में किसान औरत ही परिवार की जिम्मेदारी उठाती है। वह अपने बच्चों को यूँ बेसहारा या भूखा नही रख सकती है।आज इतने सहस्त्रों वर्षों से क्यों हमारी कृषि वर्षा पर निर्भर है, ऐसे उपाय क्यों नही किए गए कि यह निर्भरता कम हो पाती।

          पर मेरा यही विषय है कि ये सब इन कमज़ोर औरतो को सहना पङता है।छोटी आयु में विवाह फिर हर वर्ष एक बच्चा या गर्भपात, उस पर भूख, कमजोर शरीर तो आत्महत्या नहीं पर इनकी हत्या तो हो ही जाती है।जिसके लिए सिर्फ सरकार नहीं, समाज भी जिम्मेदार है। समाज में सदियों से चली आ रही परंपराएँ ही इन्हें घूटती जिन्दगी देती है।

इन औरतों को मै दलित नहीं कहुँगी न कमज़ोर कहुँगी। बंगाल की रेवा व अंजलि के अपने गाँवों मे इनके परिवारों के अपने खेत है, चावल, धान की खेती होती है। अपने मकान भी है, परंतु इनके बच्चों का भविष्य वहाँ नहीं है, अच्छे विद्यालय, चिकित्सा सुविधाएँ कुछ भी उपलब्ध नही है।

मध्यप्रदेश की राजकुमारी, कमला, मीना इन सबके गाँवों में अपने खेत है, अपने मकान भी है, किसी के कच्चे, किसी के पक्के मकान है, पर रहने के लिए अपने स्थान है।जब गाँवों में काम नहीं होता, ये शहर आते है, कुछ धन कमाकर फिर कुछ समय के लिए गाँव जाते है, वहाँ अपनी खेती संभालते हैं। जिनके गाँवों मे विद्यालय हैं, उनके बच्चे वहीं पढ़ते हैं, पर उच्च शिक्षा के लिए शहर जाना पङता है। चिकित्सा सुविधा नाममात्र की है, अतः बच्चों की बीमारी की सूचना मिलने पर राजकुमारी गाँव को भागती है।गाँव में बङे बुज़ुर्ग है जो बच्चों को संभालते हैं। इन्हें शहर काम करने आना ही पङता है सिर्फ खेती से गुज़ारा नहीं हो सकता है।अगर पति भी मेहनतकश है, नशे से दूर रहता है, समझदार है तब तो पति-पत्नी मिलकर परिवार को संभाल पाते है।पर यदि नहीं तो………

बिहार की अनीता के गाँव में अपने खेत व पक्का मकान है, परंतु बच्चों का भविष्य नहीं है।कई वर्षों से शहर में रह रही है तो उसका राशन कार्ड व आधार कार्ड है, इसलिए बच्चों को सरकारी विद्यालयों में दाखिला मिल गया है। तीन बच्चों के बाद और बच्चे नहीं! वह अपने फैसले पर मजबूती और हिम्मत से दृढ़ रही। पति भी मेहनती है, अतः जीवन सही चल रहा है।

अब एक प्रश्न फिर कर रही हुँ जो न केवल आप सबसे अपितु अपने से भी कर रही हुँ। जब सरकारी तंत्र इन कमज़ोर असहाय स्त्रियों की एक सशक्त तरीके से सहायता नहीं कर पा रहा है, सामाजिक संस्थाओं के कार्य भी अच्छे परिणाम नहीं दे रहे हैं, तब हम क्या करें?   हम हमारे पास आने वाली इन कमज़ोर स्त्रियों की सहायता कर सकते हैं। हमें इनकी सहायता पैसे से नही करनी है क्योंकि ये आत्मनिर्भर व स्वाभिमानी औरतें हैं।हमें उनके जीवन में उन्हें नैतिक रूप से सहयोग देना है, उन्हें शिक्षित और जागरूक बनाना है।हमें इनकी सोच बदलने का प्रयास करने चाहिए। चूंकि यह समस्या गरीबी से अधिक अशिक्षा की है।अतः सर्वप्रथम इन लोगों को शिक्षित और जागरुक बनाना है। हमें अपने व्यस्त समय से अपने इन देशवासियों के लिए थोङा समय निकालना है।

​ किसकी चोट

किसका दर्द गहरा? तुम्हारा या मेरा?
किसकी तकलीफ अधिक गहन?

तुम्हारी या मेरी?

किसने किसको अधिक चोट पहुँचाई?

तुमने या मैंने?

जो भी कहो- 

दर्द में तो हम दोनो ही है।

लेकिन तुम तो सांमतवादी रहे,

चोट पहुँचाना तो सिर्फ तुम्हारा अधिकार रहा ।

मैंने तो बस अपना बचाव किया, और!

तुम इसी में चोटिल हो गए,

 ऐसे क्या देखते हो?

ओह! तुम तो अपने को प्रगतिवादी कहते रहे।

पर मेरे सामने तो तुम सामंतवादी ही रहे न!

जब भी जिस रूप में आए-

पिता, बङा भाई, छोटा भाई, पति और पुत्र भी।

तुम्हारे अधिकार,सिर्फ अधिकार

मेरे अधिकार भी मेरे कर्तव्य,

तुम्हारे प्रति मेरे कर्तव्य,

चाहे जिस रुप में तुम मिलो।

कर्तव्य में हो जाए कमी तो?

तो तुम मुझे प्रताङित करते रहे-

(सामाजिक, आधिकारिक व वैयक्तिक प्रताङना भी।)

चाहे जिस रुप में मैं तुम्हें मिली-

पुत्री, बङी बहन, छोटी बहन, पत्नी और माँ भी।

तो फिर किसका दर्द गहरा?

मैं? जो सदियों से प्रताङित होती रही।

या तुम?

मैंने तो सिर्फ अपना बचाव ही किया था।

और तुम चोटिल हो गए।

​           यादें

आज फिर यादों ने जगाया मुझे,
मुझ से मेरे बचे बकायों का हिसाब मांगा,

कैसे दूँ हिसाब? अभी तो चुकाने का सोचा भी नहीं,

कहाँ से करूँ हिसाब? बकायों की लिस्ट लंबी जो रही।

समय गुजरता जाता है, मैं डर से आँखें मीचे पङी हुँ,

ये यादें भी ना जाने कौन-कौन से बकायें ढूंढ  के सामने ला रही है,

वो जिन्हें मैंने अपना बचपना समझा था,

वो जो लगा था, यह तो अधिकार था मेरा

पता नहीं किस-किस से रुठी मैं,

पता नही कब-कब, किस- किस को नाराज़ किया मैने,

मैने सवाल किया, वो बचपना था मेरा, बकाया कैसे बन गया?

यादें हँस कर बोली, भूल गई? तब भी तो दिल दूखा था किसी का।

जब भी तुम से किसी दिल को चोट पहुँची, वो चोट तुम्हारी बकाया बन गई।

मैं सिर पकङे बैठी थी, फिर पूछा, और मेरा दिल? वो भी तो टूटा कई बार,

 ये तो सब करते न! फिर मेरे बकाए इतने क्यों?

यादें फिर जोर से हँसी, बोली, यादें हम तुम्हारी है किसी और की नही।

तुमने ही हमें अपने दिल में बसाया 

आज फिर यादों ने जगाया मुझे।

एक सच्चाई- एक सोच (भाग-2)

कुछ दिन पहले खबर आई कि सुमन अब इस दूनिया में नहीं रही है। सुमन? वही सुमन जिसकी 12 वर्ष की आयु में शादी हो गई थी और उसने 14 वर्ष की आयु में पहली संतान को जन्म दिया था। अब उसकी आयु 34 वर्ष की थी, पांच बच्चे है, बङी दो लङकियों का विवाह उनकी 16-17वर्ष की आयु में कर दिया था, उसके बाद वह दो बेटे और एक बेटी को बेसहारा छोङ गई है। 

मृत्यु का कारण? वह गर्भवती थी, तीन महीने के गर्भ को गिराना चाहती थी, अतः बिना डाक्टर की सलाह के उसने कोई भी दवाई खाली, बच्चा तो पेट में ही मर गया जिसके ज़हर से सुमन भी नहीं बच सकी थी। पिछले 20 वर्ष से वह यही कर रही थी या तो बच्चों को जन्म देती या गर्भपात कराती थी। पता नही सुमन किसी डाक्टर के पास क्यों नही गई, कोई गर्भनिरोधक उपाय क्यों नही करें? आजकल तो मुफ्त ही सरकारी चिकित्सा व्यवस्था मिलती है। सुमन गाँव की लङकी थी, पर शहर में रहती थी, अच्छे पढ़े-लिखे लोगों के घर काम करती थी। ऐसा तो हो नहीं सकता कि उसे गर्भ निरोधक उपायों के विषय में पता नहीं हो,अवश्य पता होगा, लेकिन फिर भी ऐसा क्यों हुआ होगा? इस मृत्यु को क्या कहें? दूर्घटनावश मृत्यु, मुर्खतापूर्ण कदम, आत्महत्या या हत्या।

इन सब का फैसला करने से पहले हम सरकारी आंकङों पर एक नज़र डालते है? मातृ मृत्यु दर व शिशु मृत्यु दर कितनी है और बाल विवाह के आंकङो को भी समझ लेते है।

WHO की रिपोर्ट के अनुसार हमारे देश मे प्रतिवर्ष 1.36 लाख महिलाओं की मृत्यु होती है। हर साल 4लाख शिशुओं की मृत्यू 24 घंटे के अंदर हो जाती है। शिशु मृत्यु दर में भारत का विश्व में स्थान पांचवाँ है भारत इस स्तर में अफ्रीकी देशों से भी पीछे है।भारत में सबसे ज्यादा मातृ मृत्यु दर वाले प्रदेशों में सबसे अग्रणी असम, उत्तरप्रदेश व उत्तराखंड है। भारत विश्व के उन 10देशों मेः आता है जहाँ मातृ मृत्यु दर बहुत अधिक है।

मातृ मृत्यु दर और शिशु मृत्यु का मुख्य कारण है कि लङकी का छोटी आयु में विवाह व छोटी ही आयु में गर्भधारण करना। उसके पश्चात जल्दी-जल्दी गर्भवती होना, जिससे लङकी का कच्चा शरीर और कमज़ोर होता जाता है। इसके कारण गर्भपात भी होते हैं। अधिकांशतः ग्रामीण व आदिवासी क्षेत्रों में पूर्णतः व सुचारू रूप में चिकित्सा सुविधा न होना भी माँ व शिशु की मृत्यु के कारण होते है। माना यह जाता है कि देश में पहले से मातृ मृत्यु दर और शिशु मृत्यु दर में कमी आई है। परंतु हम जानते हैं  कि अभी भी स्थिति बहुत दयनीय ही है। हम अभी भी अपने ग्रामीण वासियों और आदिवासियों की सोंच में बदलाव लाने में असफल रहे हैं। अभी भी वहाँ घर पर दाई द्वारा प्रसव कराने को महत्व दिया जाता है तथा वे सरकारी सुविधाओं का भी लाभ नहीं उठाते हैं। हमारे प्रचार तंत्र में अभी बहुत कमी है, लोगों को जागरूक करने में हम असफल रहे हैं, लोग अपनी परिपाटियों की सोच को बहुत गहरे पकङे है।सिर्फ कानून और योजनाएँ बनाने से फर्क नहीं पङ सकता है। सरकार व सामाजिक संस्थाओं को अपने प्रचार व जागरूकता अभियान में तेजी लाने की आवश्यकता  है।

वे ग्राणीण दलित स्त्रियाँ जो जीवनयापन के लिए शहरों में आती हैं, उन्हें तो समस्त चिकित्सा सुविधा सरकारी अस्पतालों में प्राप्त हो सकती है। फिर भी वह प्राप्त नहीं करती हैं, जैसे सुमन। सच्चाई यह है कि सरकारी तंत्र व सामाजिक संस्थाएँ इन स्त्रियों की मानसिकता को बदलने में असफल रहे हैं। ये स्त्रियाँ घर से बाहर आकर काम भी करती है अर्थात ये औरते आत्मनिर्भर होती हैं, पर इनके पति शराबी व कामचोर होते हैं। पूरे परिवार का पालन पोषण इन स्त्रियों पर ही निर्भर होता है।इस सबके पश्चात भी स्त्री पुरूष की मानसिकता का सामना नहीं कर पाती है। यह जानते हुए भी कि बार-बार गर्भ धारण करना उनके स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है अतः उसके लिए उपाय किए जा सकते है, वे ऐसा नहीं कर पाती हैं क्योंकि उनके पति व परिवार के अन्य सदस्य(सास-ससुर) उन्हें ऐसा नहीं करने देते हैं, ये औरते अपने लिए लङते-लङते मर जाती हैं। अतः इन स्त्रियों के साथ इनके पति व परिवार के अन्य सदस्यों को जागरूक करना बहुत जरूरी है।इन औरतों में इतनी हिम्मत नहीं होती कि पति की अनुमति के बिना गर्भनिरोधक उपाय अपना सकें। इनके परिवारों भें घरेलू हिंसा साधारण बात है,पर यह बात इतनी भी साधारण नहीं है, ये कभज़ोर औरतें स्वास्थ्य से कमज़ोर होने के साथ-साथ पतियों से मार खाते हुए, शारीरिक चोटें खाती हुई और कमज़ोर होती जाती है साथ ही अपना मनोबल भी खोती जाती हैं, अतः पति का विरोध नहीं कर पाती व गर्भनिरोधक उपाय नहीं अपना पाती हैं।पतियों को फर्क नहीं पङता उनके कितने भी बच्चे पैदा हो जाए क्योंकि उनकी परवरिश की जिम्मेदारी से उन्हें सरोकार नहीं होता है।

गुलज़ार के बहाने

गुलज़ार साहब को कौन नही जानता है,उनके गीत, शायरी और उनकी कहानियों का हर कोई मुरीद है। 

आजकल तो यह भी हो रहा है कि लोग उनके अंदाज पर अपना कुछ भी लिखते है,शर्मवश या वाह-वाह पाने के लिए लेखक मे अपना नाम डालने के स्थान पर गुलजार या किसी भी बङे कवि का नाम डालते है।यह बात मुझे तो पसंद नही है, आपको भी नही होगी,इस तरह तो आगे की पीढ़ी मौलिक रचनाओं को कैसे समझ पाएगी या पढ पाएगी।लिखने का शौक है, तो अवश्य लिखे,अपने विचारों और भावों को अवश्य प्रकट करना चाहिए परंतु यूँ साहित्य से खिलवाङ न करें। यह मुझ जैसे समस्त साहित्यिक प्रेमियों की ओर से एक महत्वपूर्ण गुजारिश है।

गुलज़ार की कुछ कहानियों को पढ़ने का अवसर मिला है। उनकी कहानियाँ और उनके किरदार बहुत सच्चे होते है। मुझे तो मौका चाहिए अपने मन को खोलने का तो सोचा क्यों न उनकी कहानियों के बहाने कुछ अपने मन का भी कहा जाए।

मैने उनकी जिन कहानियों का चुनाव किया है,उनमें से सर्वप्रथम जिसके बहाने मै कुछ कहना चाहुँगी वह कहानी है ‘खौफ’।

                                                                     खौफ

खौफ’  कहानी में यासीन इतना खौफज़दा है कि एक अन्य व्यक्ति को जान से मारने की हिम्मत कर बैठता है। यह कहानी यूँ तो हिन्दू- मुसलमानों के दंगों पर आधारित है। पर यह भी बताती है कि कैसे एक इंसान का दूसरे इंसान पर विश्वास नहीं रहा है, जबकि एक हिन्दू ने यासीन की मदद भी की थी। तब भी वह इतना डरा था कि उसके सोचनें की शक्ति खत्म हो गई थी,और उस अंजान व्यक्ति से भयभीत हो, यह डर कि कोई भी हिन्दू उसकी जान ले सकता है,उसने उस अंजान व्यक्ति की हत्या कर दी और बाद में पता चला कि जिसे मारा था वह उसका जाति भाई मुसलमान ही था।

               पहले अंग्रेजों ने अपने लाभ के लिए हिन्दू-मुसलमान में फूट डालों नीति अपनाकर एक पाकिस्तान की नींव डाली थी। अपने ही देश के नागरिक, सभी भारतीय, पर उन्होंने ऐसा खेल खेला कि व्यक्ति का दूसरे व्यक्ति से, भाई का भाई पर से विश्वास उठ गया था।नतीजन उस बंटवारे में हुए खुन-खराबे ने उस अविश्वास की नींव को मजबूत कर दिया था।

स्वतंत्रता के बाद अपने ही राजनीतिज्ञों ने इसी नीति को अपनाते हुए अपनी राजनीति की रोटी सेंकी है।आज 70 साल बाद इस नीति ने विकराल रूप ले लिया है।क्योंकि अब बात सिर्फ हिन्दू-मुसलमान की नहीं रह गई है अपितु यह खेल हर जाति-उपजाति के बीच खेला जा रहा है। जिसने एक साधारण ईमानदार व्यक्ति को इतना खौफज़दा कर दिया है कि वह अपने पङोसी, अपने सहयात्री को शक की निगाह से देखता है। जब दंगे होते है तो यह डरे और सहमे, दहशत से भरे लोग अपनों की ही जान लेने लगते है।एक आम आदमी की पवित्र आत्मा को कलुषित कर दिया  गया है।

हम क्या कर रहे है? एक दूसरे की जाति धर्म पर कीचङ उछालते रहते है और अपने डर व दहशत को निकालते हुए और सहमते जाते है। गुजारिश है कि डरना बंद कीजिए, हिम्मत और हौसला रखिए अपने-अपने ईश्वर और खुदा पर विश्वास रखते हुए अपने जीवन के सहयात्रियों, मित्रों और पङोसियों पर विश्वास करना शुरू कीजिए।विश्वास करेंगे तो सदियों से बसे खौफ से मुक्ति पा सकेंगे।क्यों जीए हम यह दहशत भरी जिन्दगी?

200वर्ष अंग्रजों की फूट डालो नीति को विफल नहीं कर सकें और 70वर्ष से अपने ही देश के राजनेताओं  की इस हर जाति, हर भाषा व हर प्रांत में मतभेद पैदा करने और उसे ज़हर की तरह हमारे दिमाग में फैलाने की नीति को हम न समझ रहे हैं या समझ कर भी मूर्ख बन रहें है।यह सब बंद करना होगा, डर और दहशत से बाहर निकल कर विश्वास के पथ पर चलते हुए इन राजनीतिज्ञों की नीति को विफल करना होगा।

              

                                                 किसकी कहानी

‘किसकी कहानी’ एक व्यंगात्मक कहानी है, इसमे व्यंग है लेखकों पर जो सोचते है कि उनकी लेखनी से बदलाव आएगा, साहित्यकारों से जानना है कि जिस सच को लिखकर उन्होंने साहित्य का विकास किया है  उससे क्या समाज का विकास हुआ है?

किसकी कहानी लिखी जाती है एक कहानी में?वह एक किरदार या अधिक किरदारों की कहानी हो सकती है। हम जब कहानियाँ पढ़ते हैं तब कई बार कोई कहानी बिलकुल अपनी लगती है, जैसे लेखक ने हमारा जीवन ही अक्षरक्षः कागज पर उतार दिया हो।कभी किसी कहानी का किरदार अपने जैसा नही पर कहीं बहुत करीब से देखा हुआ लगता है। लेखक सच लिखते हैं, समाज का सच्चा आईना सामने रखते हैं। कहानी किसी भी भाषा, देश या प्रांत की हो सकती है पर वह सच बताती है तभी तो पाठक उससे जुङाव महसूस करते हैं। एक देश या प्रांत की जीवन शैली व जीवन के विभिन्न रंगों से हमारा परिचय होता है।

लेखक अपने शब्दों के खूबसूरत जालों में पाठकों को बहा ले जाता है। पाठक पढ़ते हुए कभी हँसते है,कभी मुस्कराते हैं और कभी उनका मन द्रवित हो जाता है। हर लेखक अपने लेखन की अपनी निजी शैली अपनाते हुए पाठकों को आकृषित करता है।

‘किसकी कहानी’ के अंत में वह मोची कहता है कि कहीं कुछ नही बदला है। समाज के जीवंत किरदारों को अपनी कहानी का किरदार बनाने से कहानी का विकास हो सकता है,पर समाज नहीं बदलता है।

कई बार हमने दंगों पर कहानियाँ पढ़ी है, उनसे प्रभावित लोगों पर कहानियाँ पढ़ी है व उन पर आधारित बनी फिल्मों या नाटकों में उन किरदारों के कष्टों और दुःखों को महसूस किया है। हमारा जीवन द॔गों से प्रभावित है 1984 के हिन्दू-सिक्खों के दंगे,गुजरात के दंगे, मुम्बई के दंगे इत्यादि छोटे-बङे दंगे।ऐसा एक दंगा हुआ 25अगस्त2017 को ‘राम रहिम’ के नाम पर, एक अपराधी के नाम पर, उन्मादी भीङ ने गाङियाँ जला दी,कितने मासूम निर्दोष मारे गए है(‘कितनों’ का प्रयोग इसलिए किया गया है कि सरकारी आंकङों पर विश्वास नहीं किया जा सकता है)

अब लेखकों का मन द्रवित होगा और वे कहानी,कविता और लेख लिखेंगे, फिल्मकार फिल्में बनाएंगे पर फिर भी समाज ऐसे ही चलता रहेगा, दंगे होते रहेंगे, किरदार तो बदलेंगे पर उनका जीवन नहीं बदलेगा।

‘किसकी कहानी’ में एक लेखक, एक पाठक और एक किरदार भी है। यह किरदार का सवाल  लेखक से है कि कहाँ तरक्की हुई है? जब किरदारों का जीवन आज भी वही है जो उसकी कहानी लिखने से पहले था, यहाँ तक कि लेखक के जीवन में भी क्या बदलाव आया है?

किरदार एक मौची है, मौची जिसे आप और हम सालों-साल से एक पेङ के नीचे जूता पेटी लिए हुए बैठा देख रहे हैं। जब हम छोटे थे, तब भी मोची था, बङे हुए और बूढ़े भी हुए पर मौची उसी तरह पेङ के नीचे बैठा आपके जीवन में अहम् भूमिका निभाता रहा है, मौची की शक्ल बदल गई होगी पर ‘मौची’ तो वही रहेगा। यह तो मात्र एक उदाहरण है, आप अपने अंदर झांकिए, आसपास को ध्यान से देंखे और समझे, क्या कुछ बदला है? क्या वाकई बदलाव आया है?

                                         

                                                   मर्द

‘मर्द’ कौन होता है? एक मर्द तब मर्द होता है, जब उसका किसी औरत से रिश्ता होता है, वह औरत उसकी बेटी,बहन, पत्नी या प्रेमिका हो सकती है और कभी माँ भी हो सकती है। मर्द तब मर्द होता है जब वह अपनी इन रिश्तों से बँधी स्त्रियों पर अपना मालिकाना हक समझता है।वह समझता है कि इन स्त्रियों के जीवन की डोर,उनके आत्मसम्मान की डोर उसके हाथ में है, वह अपनी इच्छा से उस डोर को ढीला या कस सकता है, यह उसका अधिकार ही नहीं उसकी जिम्मेदारी भी है।ज्यादा स्पष्ट करने की आवश्यकता नहीं है, आप जानते है कि पिता के सवाल, उसकी बंदिशे फिर भी एक पुत्री मान-मर्यादा के लिए स्वीकार करती है।बङा भाई है, तो खीझ कर ही सही, परिवार के दायरे को समझ कर उसकी बेमतलब की रोक टोक सह जाती है। पर अगर वह छोटा भाई है तो वह अपमानित होती है लेकिन दूनिया द्वारा समाज की व्यभिचारिता, कलुषता का भय दिखाने पर सब झेल जाती है।शादी के बाद पति, वह तो स्वामी ही माना जाता है, उसे अधिकार है अपनी पत्नी से उसकी स्वतंत्रता छीनने का, पति की आज्ञा के बिना कोई कार्य नहीं कर सकती है। पति कुछ भी जायज या नाजायज करें उस पर उंगली नहीं उठा सकती है और पत्नी का जायज भी पति को जवाबदेही होता है।

फिर आता है पुत्र-दुःख होता है जब वह अपनी इच्छा व खुशी के लिए भी अपने पुत्र का मुँह देखती है।

         इस कहानी की नायिका रमा अपने पति बख्शी के दूसरी स्त्री के साथ संबधों से बेजार हो जाती है,नतीज़ा तलाक तक पहुँचता है, उनका पुत्र कपिल है, रमा को कपिल की चिन्ता है, वह सोचती है कि वह कपिल को दिलासा देगी कि वह उसकी माँ उसके पास है। पर होता विपरीत है बेटा माँ को दिलासा देता है कि वह उसका बेटा है उसके पास।कपिल अपने बचपन में ही मर्द बन जाता है, इसलिए जब रमा का एक अन्य पुरूष के साथ सबंध बनते है तब कपिल अपनी माँ से एक मर्द की तरह व्यवहार करता है।

कहानी यही कहना चाहती है कि स्त्री को अपने अस्तित्व के लिए, स्वतंत्रता के लिए हमेशा किसी न किसी मर्द के प्रति जवाबदेही होना पङता है।
                                                               धुआँ

धुआँ गुलज़ार की वह कहानी है जिसने मुझे फिर मुझे जाति व धर्म के प्रश्न पर उलझा दिया है।

यह कहानी भी यही सवाल उठाती है कि व्यक्ति बङा या धर्म। धर्म भी क्या है? मेरे विचार से धर्म वही है जो हमें प्रेमपूर्ण मानवता का व्यवहार करना सिखाता है। वह ही व्यक्ति धार्मिक व्यक्ति हो सकता है जो सबसे प्रेमपूर्ण व्यवहार करता है, नफरत नहीं फैलाता है, हर प्राणी को समान समझता है।

इसलिए सवाल यह नही है कि व्यक्ति बङा या धर्म? सवाल यह है कि व्यक्ति बङा या जाति। जाति के नाम पर हम अपने ही लोगों को मारते हैं।

कहानी में चौधरी मुसलमान थे, उन्होने अपने धर्म को पूरे दिल से निभाया था। दीन दुखियों की सेवा करना ही उनका धर्म था। जिसकी सहायता करते थे उसकी जाति नही दखते थे। दुःखी, निर्धन व्यक्ति हिन्दू , मुसलमान किसी भी जाति का हो सकता था।

उन्ही चौधरी ने ख्वाहिश कर दी कि उन्हें मरने के बाद कोई नाम नहीं चाहिए इसलिए मरने के बाद वह अपने मुर्दा शरीर को दफनाना नही चाहते बल्कि जलाना चाहते थे और उसकी राख गाँव की नदी में बहाना चाहते थे।चौधरी जैसे सीधे सच्चे इंसान थे वैसी उनकी सीधी सच्ची इच्छा थी। उनकी सोच जातिवाद से ऊपर थी।

चौधरी तो अपनी इच्छा वसीयत में लिख गए और उनकी पत्नी चौधराइन ने उनकी इच्छा पुरी करने की ठान ली थी, जिसका पुरजोर विरोध जाति के ठेकेदारो ने किया, यही नही इस भय से कि चौधराइन उनकी जाति के नियमों और परंपराओं के विरूद्ध न चली जाए, उन्होने चौधराइन को उसकी हवेली में आग लगाकर जिन्दा जला दिया व चौधरी की लाश को कब्र मे ही दफना दिया था।

जातिवादी धर्म को निभाने के लिए मानवतावादी धर्म की बलि चढ़ा दी गई और हमेशा चढ़ाई जाती रहेगी जब तक हम धर्म को सही अर्थों में नहीं समझेंगे।

बच्चे व संवेदनशीलता

मै ‘तेत्सुको कुरोयानागी’ की किताब ‘तोत्तो-चान’ पढ़ रही थी। इस किताब मे तेत्सुको ने अपने विद्यालय ‘तोमोए’ और उसके संस्थापक व संचालक सोसाकु कोबायशी के विषय मे बहुत ही रोचक रूप भे लिखा है। 

इस किताब को पढ़ने के साथ मुझे याद आ रही थी, विभिन्न शिक्षण पद्धतियाँ व विभिन्न विद्वानो के शिक्षा पर उनके विचार, उनका दर्शन । उनकी व्यावाहारिक पाठशालाएँ या आश्रम जो उनके अपने विचारों और दर्शन पर आधारित थे।
तोत्तो-चान को अनुभवी, समझदार वास्तव में बच्चो को प्यार करने वाला अध्यापक सोसाकु कोबायशी मिले थे व उसे मिली वह माँ जिसने अपनी पुत्री को दूनिया की निगाह से नहीं देखा था,अपितु अपनी निगाह से देखा और समझा कि उसकी पुत्री एक सहज, स्वाभाविक बच्ची है। बहुत कम बच्चों की ऐसी किस्मत होती है, जिन्हें ऐसे अध्यापक व माँ मिलती है।

अध्यापक सिर्फ अपने छात्रों को परंपरागत तरीके से पढ़ाकर अपना काम पूरा करते है और माता-पिता अपने बच्चों की दूसरे बच्चों से तुलना करके उनके विकास मे बाधा पहुँचाते है।

हर बच्चा अपनी बात कहना चाहता है, हमें धीरज के साथ उनकी बात सुननी व समझनी चाहिए। कई बार दादी-नानी बच्चों के अधिक करीब होती है क्योंकि वे धीरज के साथ बच्चो को सुनती है।परंतु माता-पिता के पास समय नहीं होता है, न वे उन्हे सुनते है न देख समझ पाते हैं।हमें अपने बच्चो को पूरा समय देना चाहिए ताकि वे अपने मन को हमारे सामने खोल सके। बच्चे बहुत संवेदनशील होते है, उनकी समझ व परखने की शक्ति बहुत गहरी होती है।जैसे-जैसे हम बङे होते जाते है, तब इतने स्वार्थी हो जाते है कि अपनी इस शक्ति को खो देते है।

अध्यापकों व माता-पिता को बच्चों के मनोविज्ञान का ज्ञान होना चाहिए।इन्हे इससे संबधित किताबें पढ़नी चाहिए और समय-समय पर प्रशिक्षित लोगो से ज्ञान भी लेना चाहिए। अध्यापकों को उनके प्रशिक्षण के समय बच्चों के मनोविज्ञान से सबंधित विषय पढ़ाया जाता है।परंतु व्यवहार मे वह उसका कम ही ध्यान रख पाते है।अध्यापकों को बच्चों के प्रति संवेदनशील होना बहुत आवश्यक है।उसी प्रकार माता-पिता भी बच्चो के प्रति भावुक होते है,उनसे अगाध प्रेम भी करते है, परंतु उनमे भी संवेदनशीलता की कमी पाई जाती है।
संवेदनशीलता से अभिप्राय है कि आप की दूसरे की भावनाओं के प्रति क्या और कितनी समझ है। यह भावना बच्चों के संबध मे अधिक होनी चाहिए। बङो की अपेक्षा बच्चें अधिक संवेदनशील होते है। जैसे बच्चा अपनी माँ की डाँट खाकर फिर माँ से लिपटता है। वह माँ के मन को अधिक समझता है।
इस विचार में कोई संदेह नहीं कि हर प्राणी अपनी विशेष योग्यताओं के साथ इस दूनिया में आता है। हर व्यक्ति हर दूसरे व्यक्ति से भिन्न होता है।वयस्क व्यक्ति का दिमाग व व्यक्तित्व विकसित हो चुका होता है। वह अपनी प्राकृतिक प्रवृतियों व स्वभाव में अपने परिवेश व परिस्थितियों से ग्रहण समस्त अनुभूतियों का उसमें मिश्रण कर चुका होता है। अतः यह आवश्यक है कि एक बच्चा अपने परिवेश व परिस्थितियों से जो अनुभूतियों ग्रहण करे वह उसके व्यक्तित्व को संपूर्ण रूप से निखार सकें।
एक बच्चे की परवरिश स्वस्थ वातावरण में स्वस्थ हाथों मे होनी चाहिए, जिससे उसका चंहुमुखी विकास हो सके। स्वस्थ वातावरण से अभिप्राय है कि जहाँ जातिगत भेदभाव, छलकपट इत्यादि विषैलो तत्वों की उपस्थिति न हो।
स्वस्थ हाथो से अभिप्राय है कि माता-पिता व गुरू का मन साफ व पवित्र हो उनमे किसी के प्रति दुर्भावना न हो। उनका हृदय जातिगत भेदभाव, साम्प्रदायिकता व उच्च नीच के भाव से ऊपर हो।

परंतु हम जानते हैं कि यह सभव नही है, आज समाज दिनप्रतिदिन कलुषित होता जा रहा है। अनेक कोशिशों के बाद भी मनुष्य का हृदय साफ नही हो रहा है। जातिगत भेद भाव इत्यादि कलुषित विचार मनुष्य के मन से जा नही रहे है।ऐसे वातावरण मे एक बच्चे की स्वस्थ परवरिश करना अत्यंत कठिन कार्य है।

लेकिन बच्चे के व्यक्तित्व विकास के बीज उनके बचपन के आरंभ मे ही पङ जाते है, अतः यदि माता-पिता व अध्यापक बच्चों को समानता व प्रेम की शिक्षा दें तो बच्चे का मन साफ व पवित्र रह सकता है।परंतु यह गुण किताबों मे पढ़ाने से या रटाने से नही आते हैं, इसको व्यवहार मे लाना आवश्यक है। यदि माता-पिता या अध्यापक बच्चे को किताबों से गाँधी जी का पाठ पढ़ाते हैं कि छुआ-छूत नहीं करनी चाहिए,सभी मनुष्यों को समान समझना चाहिए। लेकिन स्वयं इसका व्यवहार में पालन नहीं करते हैं, तब बच्चा उस पाठ को कैसे ग्रहण कर पाएगा, वह भी परीक्षा के लिए उस पाठ को रट लेगा। माता-पिता व अध्यापकों को अपने बच्चों को एक अच्छा व्यक्ति बनाने के लिए अपनी सोच पर कार्य करना चाहिए।
ऐसा लगता है कि जिन्हें हम महान विचारक या दार्शनिक मानते है, उनके विचारों को सिर्फ पढ़ कर या सुनकर छोङ देते है, उन पर न तो मनन करते है,न अपने व्यवहार में बदलाव लाते हैं। अतः यही परंपरा आगे की पीढ़ियाँ निभाती जाती है।

रही-सही कसर हमारे देश के नेता, देश में साम्प्रदायिकता की जङों को पूरी ताकत से धरातल में ज़मा कर पूरा कर रहें है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि ये नेता हमारे बीच से ही आते हैं, उन्हें नेता भी हम बनाते हैं। ‘आज के बच्चे कल के नेता है’। उन्हें अच्छे नेता या नागरिक बनाने के लिए पहले हम बङो को अपनी सोच में सुधार लाना होगा।

हमारे देश में शिक्षा एक मखौल बन कर रह गई है। न केवल सरकारी विद्यालयों में अपितु निम्न स्तर प्राईवेट विद्यालयों से लेकर उच्चतम स्तर प्राईवेट विद्यालयों में शिक्षा सिर्फ एक मजाक है। सरकारी विद्यालयों में अध्यापक प्रशिक्षित होते हुए भी बच्चों पर पूर्ण ध्यान नहीं देते हैं, उसके लिए उनके अपने कारण है। एक-एक कक्षा में 50-50 विदूयार्थी होते हैं। इसलिए प्रत्येक बच्चे पर ध्यान देना असंभव होता है।यूँ भी उन्हें सिर्फ किताबी शिक्षा कैसे दी जाए इसी का प्रशिक्षण दिया जाता है। बच्चों के मानसिक विकास को समझने में वह अपर्याप्त कुशल होते हैं। इनका बच्चो की संवेदनाओं से जुङने का तो प्रश्न ही नही उठता है। इन विद्यालयों में बच्चे बेसिक शिक्षा भी ठीक से ग्रहण नही कर पाते है। इस ओर न तो विद्यालय प्रबंधन का, न अध्यापकों का ध्यान होता है। तब यह कैसे समझा जा सकता है कि किसी बच्चे की ग्रहण शक्ति कितनी तीव्र या धीमी है अथवा उसका क्या कारण हो सकता है।
निम्न स्तर के प्राइवेट विद्यालयों की कक्षाओं में विद्यार्थी कम होते है, परंतु शिक्षक प्रशिक्षित नही होते है। प्रबंधकों का उद्देश्य मात्र धन कमाना होता है। अतः बच्चों के मानसिक विकास का अर्थ सिर्फ बच्चों के नंबरों से होता है। कोई बच्चा सीख पाता है या नही व उसका रूझान किस ओर है इस पर ध्यान नहीं दिया जाता है। ऐसे विद्यालयों की संख्या बहुत अधिक है। गाँवों मे भी ऐसे विद्यालय मिल जाते है जो बच्चों को शिक्षा देने के नाम पर केवल पैसा कमाते है। इन विद्यालयों के शिक्षकों और प्रबंधकों का तो संवेदना शब्द से परिचय भी नहीं होता है। सबसे अधिक परेशानी की बात यह है कि ये सभी विद्यालय अंग्रेजी माध्यम के होते हैं। गरीब व अनपढ़ भी अपने बच्चों को अंग्रेजी मे पारंगत करने के उद्देश्य से बच्चों का इन विद्यालयों मे दाखिला कराते हैं।
उच्च स्तर के प्राइवेट विद्यालयों मे सबसे अधिक ध्यान विद्यालयों की आलीशान इमारतों के बनाने पर  होता है। इन विद्यालयों को किसी फाइव स्टार होटल से कम न समझा जाए। यहाँ हर कक्षा में एयरकंडीशन लगे होते है, सीटें आरामदायक होती है। माता-पिता के जीवन का उद्देश्य मात्र है कि अपने बच्चों को इन विद्यालयों में पढ़ाना है।उनके अनुसार बच्चों की परवरिश का यह उत्तम तरीका है। इसके लिए वे जी तोङ मेहनत करते हैं।बच्चों की संवेदनाओं और मनोविज्ञान को समझने के लिए उनके पास समय नहीं है। यूँ भी इन विद्यालयों मे एक बङी फीस अदा करने के बाद वे पूर्ण दायित्व इन विद्यालयों पर डाल देते हैं।
इन विद्यालयों में भी प्रत्येक कक्षा में 40-50 विद्यार्थी होते हैं। प्रबधकों का उद्देश्य सिर्फ अच्छा व्यापार करना होता है।इन विद्यालयों में एक मनोवैज्ञानिक भी होता है जो बच्चों की उलझनों का समाधान करता है। यह एक अच्छी बात है, पर इससे माता-पिता और अध्यापकों को बच्चों की संवेदनाओं और मानसिक समस्याओं से मुक्ति मिल जाती है। इन विद्यालयों में पढ़ने वाले छात्रों के माता-पिता को अपने बच्चों का पढ़ाई में पिछङने का बहुत भय होता है। वे सोचते है कि इन विद्यालयों में पढ़कर उनके बच्चे अवश्य कोई महान वैज्ञानिक, डाॅक्टर या इंजीनियर इत्यादि तो बन ही जाएँगे। इस तरह वे अपने बच्चों को सभी आरामदायक सुविधाएँ देने के साथ असफलता का भय भी देते हैं। उनको बच्चों के वर्तमान से अधिक उनके भविष्य की चिन्ता होती है कि उनका बच्चा उनकी सोसाइटी में क्या बन कर दिखाएगा।

ये बच्चे आरामदायक सुविधाएँ पाकर बहुत ही नाजुक बनते हैं। वे दूनिया की कठोरताओं से परिचित नही हो पाते है। ऐसा माना जाता है कि हमारे देश में विद्यालयों की कमी है। पर ऐसा नही है अगर आप किसी शहर में रहते है,चाहे वह छोटा हो या बङा, आपको अपने शहर में स्कूलों की कमी नहीं मिलेगी। सरकारी विद्यालयों के साथ कई छोटे, बङे व आलीशान प्राइवेट स्कूल मिल जाएँगे। यदि गाँव में रहते हैं, तब भी गाँव आधुनिक है, अधिक पिछङा नहीं है तो सरकारी विद्यालयों के साथ प्राइवेट विद्यालय भी मिल सकते है। परंतु पिछङे व दूर-दराज़ के गाँवों की स्थिति बङी दयनीय मिल सकती हैं क्योंकि न तो यहाँ सरकारी विद्यालय मिलेंगे, यदि मिले भी तो उनकी स्थिति शोचनीय होगी और न ही प्राईवेट विद्यालय मिलेंगे चूंकि इन पिछङे गाँवों मे पैसा नही है अतः यहाँ कोई व्यापार के लिए अपना निजी स्कूल भी खोलना पसंद नही करते है।

मेरा अनुभव-  प्रत्येक बच्चा इस दूनिया में अपना व्यक्तिगत व्यक्तित्व लेकर आया है।उसकी रूचि, उसका दिमाग अपने आप में अलग होता है।अतः एक बच्चे की दूसरे बच्चे से तुलना करना उचित नही होता है। 
हमें आरम्भ से ही अपने बच्चे को समझना होगा, उसके दिमाग को, उसकी रूचि को परखना होगा। उसे दूनिया की प्रतियोगिता के वातावरण से दूर रखना होगा तभी हम उसका पूर्ण विकास कर सकेंगे।

मैं जब प्री-नर्सरी के बच्चों के लिए काम कर रही थी, तब मेरा यही अनुभव रहा कि हर बच्चे की अपनी रूचि है व समझने की शक्ति एक समान होते हुए भी उसके क्षेत्र अलग-अलग होते हैं।अथार्त यदि एक बच्चा चित्र में रंग भरना जल्दी समझ पाता है तो वही बच्चा अक्षरों को पहचानने में देर लगाता है।दूसरा बच्चा जिसको अक्षरों को पहचानने में देर नहीं लगती वह रंगों को जल्दी समझ नहीं पाता है।जो रगों की अच्छी समझ रखता है,वह चित्रों में रंग अच्छी तरह भरना नहीं सीख पाता है। कुछ बच्चे रंग अच्छा भर पाते हैं, पर उनको चित्रांकन करने में कठिनाई होती है,वहीं दूसरा बच्चा जो रंग नहीं भर पाता, वह चित्र अच्छे बना पाता है।

कुछ बच्चे कक्षा में गाई हुई कविताओं को तुरंत कंठस्थ कर लेते है और कुछ को बार-बार सिखाने पर भी कविता याद करना कठिन होता है। पर खिलौनों के प्रति उनकी समझ गहरी होती है, ब्लाॅकस को हटाने व वैसा ही लगाने में वह निपुण होते है। कक्षा में छोटी-छोटी नाटिकाएँ खेलने में सभी बच्चे रूचि लेते है परंतु किसी-किसी का प्रस्तुतीकरण देखकर दंग रह जाना पङता है। ऐसे बच्चे जरूरी नहीं किताबों में रूचि रखते हो।

सभी बच्चों को बाहर मैदान में खेलना पसंद होता है। बाहर का प्राकृतिक वातावरण सभी के मन को भाता है और प्रकृति से जुङ कर वे जल्दी सीख पाते हैं।पर उसमें भी कुछ बच्चे उस वातावरण में दौङना-भागना व खेलना पसंद करते हैं। पर कुछ बच्चे चुपचाप उस वातावरण को महसूस करते हैं, उन्हें दौङना-भागना व खेलना पसंद नही है।फिर भी हम उन्हें शारीरिक क्षमताओं के खेल खिलाते जिससे उनकी शारीरिक क्षमताओं का विकास हो। कुछ दौङकर गेंद पकङना जल्दी समझ पाते व पकङ पाते और किसी-किसी के लिए यह कठिन होता है पर जिनके लिए यह कठिन होता वह दौङने में बहुत आगे भी होते है। 

 लेकिन हमें ऐसे बच्चे भी मिलते, जिनके लिए लगता कि वह किसी क्षेत्र में रूचि नहीं ले रहे हैं। पर वे बच्चे भौंदू नहीं होते हैं, उनके साथ अतिरिक्त कोशिश करनी होती है, शायद वे जिस वातावरण से आते हैं या जिनके पास से आते है या तो उनसे बहुत जुङे होते है अथवा क्षुब्ध होते हैं। हमें अपने प्रेम और अपनत्व से उन्हें विश्वास देना होता है,उनके माता-पिता से बात करनी होती है। माता-पिता भी पारिवारिक वातावरण के विषय में खुल कर बात नहीं करेंगे अतः कोशिश अध्यापिका को करनी होती है और निरंतर प्रयास करने होते हैं।उन बच्चों की आलोचना अपने मन में भी नहीं लानी होती है। आपके मन की बात ये संवेदनशील बच्चे तुरंत समझ जाते है,वे जान जाते है कि आप उन्हें पसंद नहीं कर रहे हैं या उनके लिए अधिक परेशान व चिंतित हैं। आपकी कोशिश ऐसी होनी चाहिए कि उन्हें न लगे कि आप कोशिश कर रहें है या उन्हें सामान्य नहीं मान रहे है।

हमें हमेशा याद रखना चाहिए कि हर बच्चा सामान्य है, वह अपनी स्वाभाविक प्रवृत्तियों का स्वामी है, अतः वह एक स्वाभाविक बच्चा है।जब तक हम अपने मन व दिमाग मे यह नहीं समझेंगे व इसे स्वीकार नहीं करेंगे तब तक हमारे व्यवहार में स्वाभाविकता नहीं आ सकती है और संवेदनशील बच्चे तुरंत आपके व्यवहार को समझ जाते हैं।
  प्रत्येक बच्चा अव्वल नहीं आ सकता है, हर बच्चा हर क्षेत्र में अवव्ल नहीं आ सकता है, यह भी समझना होगा कि अधिकांश बच्चे अव्वल नहीं आते हैं, अव्वल आने वाले एक दो बच्चे ही होते है। जो बच्चे अव्वल नहीं आते हैं, वे सामान्य बच्चे है और जो अव्वल आते हैं, वे भी सामान्य बच्चे हैं। अतः सबके साथ एक समान व्यवहार करना और सीखना हम बङों का दायित्व है।

विद्यालय के वातावरण मे बच्चे फिर भी सहज होते हैं, क्योकि वहाँ उन्हें अपने समान दूसरे बच्चे मिलते हैं जो अध्यापकों की भेद-भाव पूर्ण प्रवृति के शिकार होते हैं।परंतु कठिनाई घर में होती है, माता-पिता की अपने बच्चों के प्रति अपेक्षाएँ इस हद तक होती है कि वे अपने बच्चों की ही आपस में तुलना करते हैं, वे उनकी बौद्धिक व शारीरिक क्षमताओं की तुलना करने में नहीं चूकते हैं।जिस कारण अपने भाई-बहनों में ही बच्चों को प्रतियोगिता का वातावरण मिलता है और उनका सहज जीवन असहज बन जाता है।
तब अधिक कठिनाई होती है जब एक बच्चा बर्हिमुखी और दूसरा अंतर्मुखी होता है। कभी अंतर्मुखी को बर्हिमुखी के कारण आलोचना का शिकार होना पङता है और कभी बर्हिमुखी की प्रतिभा गलत दिशा में मुङ जाती है। इस कारण बच्चों का आपसी रिश्ता भी स्वाभाविक नहीं रह पाता है।

 इसके बाद माता-पिता अपने बच्चों की तुलना पङोसियों या दोस्तो अथवा रिश्तेदारों के बच्चो से करते हैं। जैसे यदि अगर किसी दूसरे का बच्चा किसी भी क्षेत्र में इनाम पाता है अथवा माता-पिता को लगता है कि यह अन्य बच्चा उनके बच्चे से अधिक प्रतिभाशाली है, तो वह अपने बच्चे की कम प्रतिभा से अत्यंत दुःखी होते हैं व अपने बच्चे पर बिना कारण का दबाव डालते है।

दूसरे वे माता-पिता होते हैं जिन्हें अपने बच्चों के विषय में चर्चा करना बहुत पसंद होता है या तो वे अपने बच्चों की प्रतिभा की झूठी डींगे मारते हैं और अपने अहं को संतुष्ट करते है कि हमारा बच्चा किसी से कम नही है। अथवा ऐसे माता-पिता भी होते है जो अपने बच्चों की दूसरे के सामने प्रशंसा करने के स्थान पर उसकी आलोचना ही करते हैं, साथ ही यह भावना कि काश हमारे बच्चों मे ये कमियाँ न होती तो अच्छा होता।

हर स्थिति में हम अपने बच्चो को हानि पहुँचाते है।जब बच्चों को महसूस होता हैं कि हमारे बङे सिर्फ हमारी ही बात करते हैं वो भी हमारी आलोचना अथवा प्रशंसा, तब हम बच्चों के मन मस्तिष्क पर दबाव डालते हैं, उनकी सहजता व स्वाभाविकता को हम रौंद देते हैं।

   जब बच्चे इस दूनिया में आते हैं, तब उन्हें नहीं पता होता कि माता-पिता या उनके बङे अथवा यह समाज कैसा है?  उन्हें जैसे भी माता-पिता मिलते हैं, उन्हें वे स्वीकार करते हैं,उनसे प्रेम करते हैं। अपने माता-पिता के मन के भावों को, उनकी इच्छाओं को समझते है तथा उनके लिए अपने माता-पिता की संवेदनाओं का बहुत महत्व है।अपने माता-पिता की अभिलाषाओं को पूरा करना ही उनका एक मात्र लक्ष्थ होता है।अतः बच्चों पर थोपी गई माता पिता की अभिलाषाएँ उनके विकास को अवरूद्ध कर देती है।

इसका अर्थ यह नही है कि हम अपने बच्चों को इस समाज के लिए तैयार नहीं करें, उस समाज के लिए जहाँ उसे पग-पग पर प्रतियोगिता का सामना करना होगा। नौकरी, व्यापार अथवा अन्य कोई भी क्षेत्र जिसमें वह आगे बढ़ना चाहता है, उसे प्रतियोगिता मिलेगी। खेल के मैदान मे भी अच्छा खेलना होगा व हार-जीत का सामना करना होगा।हमें अपने बच्चों को आगे बढ़ना सिखाना है।पर आगे बढ़ने की गति उन्हें अपनी क्षमतानुसार चुनने दीजिए।बच्चों को रास्ते के पत्थरों और कंटीले रास्तों से परिचित कराना चाहिए पर डरा कर नही, अपितु इस स्वाभाविकता के साथ कि ये पत्थर भी आवश्यक है। A.C. कमरों में शिक्षा दिलाकर, उन्हें जीवन की हर सुविधा देकर, उनके मन व शरीर को कोमल व नाजुक बनाकर उन्हें जीवन की सच्चाई नहीं समझाई जा सकती है।
उन्हें जो भी वातावरण मिला है,उसमें उन्हें जीना सिखाना होगा, गर्मी, सरदी, बरसात, बसंत हर मौसम को जानने के लिए उन्हें इन मौसमों को महसूस करना होगा।तभी वे इस प्रकृति की इस वातावरण की उपयोगिता को समझेंगे।

हमें अपने बच्चों को आत्मविश्वासी और निर्भीक बनाना चाहिए, इसके लिए हमें उनके मन को समझना होगा, उन्हें कभी भी अपने मन व कर्म से हीन नहीं समझना होगा। तभी ये बच्चे वास्तविक रूप से आत्मनिर्भर बनेंगे।

सवाल !

​  ज़िन्दगी से इतने भी सवाल मत करो, कि वो तुम पर उंगली उठाने लगे।

  इस वक्त को जियो और बेकार इसे दोष न दिया करो,

 कि एक दिन यह तुमसे सवाल करने लगे।

ड्राईंग रूम मे बैठकर आप सब डिसकस किया करते हो,

सोचते हो गंभीर मुद्दो पर चर्चा कर विद्वान बन गए हो ।

इतनी भी चर्चा न करो कि मुद्दे अपनी गंभीरता पर प्रश्न करने लगे ।

तो फिर सवाल यह उठा कि क्या करे? 

कि ये ज़िन्दगी,वक्त और मुद्दे निराश न हो, 

ऐसा करे कि बिना डर के जिया करे। जो गलत हो उस पर ड्राईंग रूम मे चर्चा न कर,

बाहर निकल कर बोला करें,नेता बनने के लिए नही, नागरिक होने के लिए बोला करें।

कुछ अपने पर भी विचार करे, जिन पुरानी परिपाटियों और परंपराओं की दलदल मे फंसे हो, उससे बाहर निकल आओ।

अब न तुम ज़िन्दगी से सवाल करोगे, न वह तुम पर उंगली उठाएगी ।

न तुम वक्त को दोष दोगे, न वह सवाल करेगा। 

 मुद्दे भी उत्सुक हो, अपने हल स्वयं लिए प्रस्तुत होंगे।

जीना तो अब भी अपने लिए ही है, सिर्फ दिशा बदल दें।

सोचना तो अपने लिए ही है, बस सोच बदल दें।

THE ​LOW LAND by Jhumpa Lahiri 

(Book Review)

यह उपन्यास इंगलिश में लिखा गया है। इस उपन्यास को पढ़ते हुए मुझे महसूस हुआ कि मैं जीवन के विभिन्न गलियारों मे से गुजर रही हुँ। इस उपन्यास ने जो अनुभूति मुझे दी है, उसकी अभिव्यक्ति मैं इन पंक्तियों मे करना चाहती हुँ।
            जीवन के अलग-अलग गलियारों से गुजरते हुए-

जिन्दगी बिताते है हम।

जीवन के विभिन्न पङावों के हर रंग भोगते है हम।

कुछ सुख के क्षण यूँ ही बिताते हैं हम,

पर दर्द के क्षण न भूला पाते है हम।

जीवन तो सबके साथ है,

पर ज़िन्दगी है सबकी अलग-अलग।

सुख-दुख भी सबके एक हो सकते हैं,

पर उसे जीते हैं सब अलग-अलग

जीवन के अलग-अलग गलियारों से………….

एक कहानी ‘दर्द की कहानी’ कैसे जीवन पूरे दर्द में बीता जाता था, एक का नहीं, सबका, सब उनका जो उसके अपने थे। उसके यानि नायक उद्यान के अपने थे। इस कहानी का नायक उद्यान ही है क्योंकि बाकी पात्रों की कहानी उसके कारण ही बनती या घूमती है। यह कहानी  उद्यान के अपनो की कहानी है। इतने अपने कि जान ही न सके उसके धोखे को, जो उसकी गलती थी, एक उन्मादपूर्ण गलती। जिसे वह तब जान सका, जब उसका उन्माद ठंडा हुआ था या तब जब वह धूंधले होते हुए अपनों के चेहरों को फिर से देख सका था। तब उसके पास उनसे क्षमा मांगने का समय भी नहीं था।

पर शायद नहीं जानता था, नहीं समझ सकता था,उन दर्दो को जो इन सबने जीने थे, अपने-अपने हिस्से के दर्द, जो उसके कारण थे, वो चला गया, शायद मुक्त हुआ, शायद नहीं। वो टूट गया, वो आपसी रिश्ते टूटते गए। अपने पराए होते गए, अपने – अपने दर्दो में घिरे, दूसरों के दर्द को न तो ठीक से समझ पाते थे, न उन पर मरहम लगा सकते थे। मरहम लगाने का प्रयास भी दर्द भरा था।

         उद्यान के पिता के दर्द की दास्तान कुछ ही शब्दों में बहुत कुछ कहती है और माँ के दर्द की कहानी आपके अपने जख्मों को भी उकेर देती है। अपने-अपने दर्दो में घिरे ये माता पिता एक दूसरे के लिए अजनबी बनते जाते है, यह दुख भरा अहसास है पर सच्चा अहसास, जीवन की गहरी वास्तविकता, दर्द की वास्तविकता, दर्द का प्रभाव इतना पैंठा कि दोनो टूटते और टूटते गए और फिर दोनों अलग-अलग किनारों तक पहुँच गए थे।

उनके दो बेटे सुभाष और उद्यान थे, पिता रेलवे में क्लर्क थे, स्वयं उच्च शिक्षा नहीं प्राप्त कर सके थे, पर बच्चों को उच्च शिक्षा देने के लिए बहुत मेहनत करते, माँ भी सिलाई कढ़ाई का काम करके अपना योगदान देती थी। बच्चे भी कुशाग्र बुद्धि के स्वामी थे, मन लगा कर पढ़ते और अच्छे नंबर लाते थे। सुभाष बचपन से ही सीधा और माता पिता का आज्ञाकारी, उद्यान शरारती, उसकी शरारतें माँ का मन मोह लेती थी, इसी कारण वह उसी की चिन्ता अधिक करती थी। काॅलेज में ही उद्यान माओवाद से प्रभावित हो रहा था, वह ऐसी किताबें पढ़ता, उन पर चर्चा करता, उसकी जोश भरी बाते सुन, पिता यही सोचते इस आयु के लङके इस तरह की बाते करते ही है। पोस्ट ग्रेजुएशन, अच्छे नंबरों के बाद भी देश में नौकरी नहीं है, सुभाष आगे की पढ़ाई के लिए विदेश चला जाता है। एक दिन उद्यान उन्हें सुचना देता है कि उसने विवाह कर लिया है, दुख तो होता है पर वे दोनों गौरी को अपनी बहु के रूप में स्वीकार करते है। सुभाष को लिखते है जो उद्यान ने किया वो तुम मत करना तुम्हारे लिए पत्नी का चुनाव करना हमारा हक है। सुभाष भी उन्हें आश्वासन देता है। नक्सलवादियो का आंदोलन जोर पकङता जा रहा था, प्रदेश के नवयुवक उसके प्रभाव में आ रहे थे।। उन दोनों का मन उद्यान के लिए शंकित होता है, पर यह सोच कि हमारा बेटा विवाहित है, अपना शिक्षण कार्य लगन से कर रहा है,निश्चित हो जाते थे। पुलिस ने लङको को मात्र संदेह के आधार पर पकङना शुरू कर दिया, तब भी दोनो का मन डरा रहता है, एक ही संकल्प कि उद्यान को इन सबसे बचा कर रखना है। पर वो दिन आता है जब पुलिस आती है, घर की तलाशी में सबूत पाती है, उद्यान पकङा जाता है, उनके सामने ही उसे  ले जाते है, पर थोड़ी दूर जाकर सूनी जगह पर, पुलिस के विचार से उन्हें कोई नहीं देख रहा है, उद्यान को गोली मार दी जाती है। छत पर खङे उद्यान के माता- पिता,पत्नी ने सब देखा, उद्यान का गोली खा कर गिरना,फिर उसे उठा कर ले जाना, सभी कुछ दिखाई दिया, उस नई ऊँची बनी छत से, गौरी विधवा हो गई। माता पिता के पास कुछ कहने के लिए नहीं रहा है। दोनो अपने – अपने गम में गुम हो गए है। सुभाष के आने पर भी उनके पास कुछ कहने  या बताने के लिए नहीं है। सुभाष पर तो जैसे ध्यान ही नही है, इस आघात से मिली चोट अंदर गहराई तक पहुँची है। गौरी को उद्यान के लिए स्वीकारा था, पर अब वह आँख का काँटा है, यह पक्का विश्वास है कि उसी ने उद्यान को इस मार्ग में डाला है। जब पता लगा कि गौरी गर्भवती है, उनका टूटा मन उद्यान के नन्हे स्वरूप के लिए जी गया है। पर गौरी? एक बार उद्यान की निशानी पा जाएँ तो गौरी को घर से बाहर करें। पर सुभाष विरोध करता है। माँ नही समझ पाती क्यों सुभाष गौरी के लिए सोच रहा है? अपने माता पिता के लिए नही? वह सुभाष को गौरी से दूर रखना चाहती है। पर दूसरा आघात  लगता है, सुभाष गौरी से शादी कर लेता है। वे दोनो उससे बेहद नाराज है। सुभाष गौरी को लेकर विदेश चला जाता है। अब दोनो बेटे पास नही है। माता पिता अकेले, अपने- अपने गम से लङते हुए।

पिता जानते और मानते है सच्चाई, बिलकुल अकेले और चुप रहना ही उनका जीवन है। माँ के दिल में तो बस उद्यान ही बसा है, उन्हें उसका इंतजार है। पार्टी ने उद्यान के नाम का चबूतरा बना दिया है, माँ की दिन चर्या का यह महत्व पूर्ण काम है कि प्रतिदिन उस चबूतरे को साफ करना और उस पर फूल चढ़ाना।

कई बार दोनो को महसूस होता है कि सुभाष से नाराज हो कर ठीक नही किया वह भी दूर हो गया है।

अपने – अपने दुख के साथ, हर खुशी के अहसास से परे पहले पिता और बाद में माँ इस दुनिया से चले जाते है।
भाई सुभाष का दर्द, जिम्मेदारी भरा था। छोटे भाई की जिम्मेदारियों को कंधा देकर उसने अपने दर्द को कम करने का प्रयास किया, पर यह दर्द तो और गहराता गया और इतना गहराया कि इस प्रयास में प्रश्नचिन्ह लगता गया। कोई शिकायत नहीं, कोई नाराजगी नहीं, सिर्फ सहमाता गया। केवल कर्त्तव्य, खुशी नहीं।खुश होने का ख्याल भी नहीं क्योंकि दर्द इतना भरा था कि किसी ओर भाव की जानकारी भी नहीं रही थी।

सुभाष बङा, उद्यान 14महीने छोटा । दोनों का हर पल का साथ, जब सुभाष ने स्कूल जाना शुरू किया तब उद्यान की जिद पर उसे भी सुभाष की कक्षा में दाखिला दिला दिया था। अब पढ़ना, खाना, खेलना और शरारतें सब साथ में ही करते थे। उद्यान ही शरारतें सोचता और सुभाष उसका साथ देता था। विज्ञान के नए-नए प्रयोग दोनो मिलकर करते थे। सुभाष का मन उद्यान के बिना नही लगता था। पर कालेज दोनो के अलग – अलग थे। उद्यान के नए दोस्त बन गए, वह समय से घर नहीं आता और सुभाष उसकी प्रतीक्षा करता रहता था। उद्यान माओवाद, नक्सलवाद के प्रभाव में आ रहा था। वह भावुक हो कर किसानों की स्थिति से विचलित हो रहा था। उसने कोशिश करी कि सुभाष भी माओ और नक्सल विचारधारा को समझे। वह सुभाष को सभाओं में लेकर भी गया। परंतु अब सुभाष की अपनी सोच है,उसे नही लगता कि ऐसी क्रांति से स्थिति में बदलाव आ सकता है। वह पढ़ लिख कर एक अच्छी नौकरी करना चाहता है, देश में नौकरी नही है, वह विदेश पढने जाता है, वह चाहता है कि उद्यान भी इन सब चक्करों को छोङ कर, विदेश जाकर पढ़ाई करे। उद्यान सुभाष को स्वार्थी कहता है। सुभाष विदेश में, इधर उद्यान की शादी,फिर उसका चला जाना। अब कभी सुभाष उद्यान को देख सुन नहीं पाएगा। उसी के लिए व गौरी को हर परेशानी से बचाने के लिए वह गौरी से शादी का प्रस्ताव रखता है। गौरी के साथ अमेरिका में उसका नया जीवन शुरु होता है। कुछ दिन में बेला का जन्म होता है, उद्यान की बेटी ही उसकी खुशी  है। वह जानता है कि गौरी के लिए कठिन है उसके साथ रहना, वह उसे समय देना चाहता है। पर देखता है गौरी मन से कोशिश नही कर रही है। बेला के लिए भी उसका व्यवहार स्वाभाविक नही है। और एक दिन गौरी चली जाती है, वह बेला और सुभाष को छोड़कर अपना जीवन अपनी तरह जीने के लिए चली जाती है। गौरी के जाने से बेला बहुत उदास व गुमसुम रहने लगती है। सुभाष जानता है कि गौरी ने बुझे मन से उसके साथ 12वर्ष बिताएँ है, पर बेला के साथ वह यह अनाचार कैसे कर सकती है? इस आयु में बेटी को माँ की अधिक आवश्यकता होती है। अब बेला ने सुभाष से दूरी बनाकर रखी है, पिता से केवल काम का रिश्ता है,वह महसूस करता है कि अब पिता और बेटी के बीच का अपनत्व ठंडा पङ गया है। धीरे – धीरे बङे होते ही वह स्वतंत्र होती जाती है। उस घर से, शहर से बाहर रहकर काम करती है।सुभाष बहुत अकेला हो गया है, उद्यान के साथ का समय याद करता है, माता पिता की नाराजगी के बाद भी वह अपने कर्तव्य पूरे करता रहा था। पिता के जाने के बाद माँ तो सिर्फ उद्यान की यादों में डूब गई थी, सुभाष दूर से जो कर पाता, करता था। कभी- कभी माँ के पास जाता भी था। माँ के भी गुजर जाने के बाद अब एकमात्र वह रह गया था और उद्यान की निशानी बेला थी। अभी तक उसने बेला को उद्यान के विषय में नही बताया था। पर जब बेला लौटी है और अब बेला माँ भी बनने वाली है तब वह उसे अपनी सच्चाई बताता है। सुभाष नही, उद्यान बेला का पिता है। सुभाष को लगता है अब बेला उससे और दूर हो जाएगी, पर नही, ऐसा नही होता है, वह कहती है, वह उद्यान को नही जानती है उसके पिता सुभाष ही है। सुभाष को अपनी पुत्री वापिस मिलती है। अब उसकी नातिन मेघना भी है। एक परिवार- जो वह गौरी के साथ चाहता था। उसके जीवन की खुशियाँ लौट रही है । एलिस के रूप में एक अच्छी मित्र मिलती है, जिससे गौरी को तलाक देकर वह विवाह कर लेता है। जीवन का अंतिम पड़ाव वह एलिस के साथ बिताएगा। उद्यान की यादें हमेशा साथ रहेगी।
पत्नी गौरी का दर्द, प्रेयसी का दर्द, वो तो सिर्फ प्रेयसी ही रही थी। पत्नी बनने के बाद भी तो वह सिर्फ दीवानी थी, जिस दीवानगी में उसने उद्यान से विवाह किया था और उसी दीवानगी में उसके सही गलत की साथिन बनती गई थी परंतु जब जान पाई उसके धोखे को, उसके उन्माद को, वो टूटने लगी थी। उसके जाने के बाद एक सन्नाटा था। कैसे समझ पाती अपने इस दर्द को, जो दर्द तो था पर कैसा? धोखे का? उसकी मृत्यु का? या अपनी आँखों के सामने उसे इस तरह प्रताड़ित होते हुए मृत्यु के मुँह में जाने का दर्द था। यह सन्नाटा था, यह न समझने की स्थिति का  कि वह दुःखी है पर किसलिए? अपने दीवानगी भरे प्रेम पर या अपनी नासमझी के लिए दुःखी है। या वह उस प्रेम के लिए दुःखी है, जो अभी भी उसके दिल में उसके लिए मौजूद था। वो दगाबाज उसके दिल में, ख्यालों में बसा रहता था, वह जाता ही नही था। यह सन्नाटे भरा दर्द इसलिए था कि इसमें भय भी मिल गया था। इस दीवानी ने उसके हर गलत को सही मान उसका साथ दिया था। वो दहशत भरा दर्द इतना गहरा था कि कुछ भी स्वीकारने का मतलब ही न था। न किसी का साथ, न किसी का अपनापन। अपने खुन को-अपनी पुत्री को, उन दोनो की पुत्री को भी कैसे स्वीकार करे? क्यों नही आता उसके मन में कि यह दोनो के प्रेम की निशानी है। क्यों केवल धोखा लगता है? अपनी कोख से जन्मी पर प्यार क्यों नहीं आता? यह हर वक्त, हर पल कण- कण में टूटते बिखरते दिल का दर्द है। इस दर्द में स्वाभिमान भी है, प्रेम भी है और प्रताड़ित होने का अहसास भी है जो जीवन में सिर्फ खालीपन देता है। ‘खुशी’ या इसका अर्थ  दोनो अब याद ही नही है।

             उद्यान गौरी के भाई मानस का दोस्त था। घर पर ही उसने उद्यान को देखा और उसकी ओर आकृषित हुई थी। गौरी एक चुप, गंभीर लङकी,किताबों मे ही डूबी रहती थी, उसके जीवन मे उद्यान आता है, वह उसका परिचय मार्क्स से कराता है। वह उससे प्रेम करती है, वह जो कहता है, सोचता है, करता है, सब उसके लिए सच है। वह उससे शादी करना चाहता है वह उससे शादी करती है, उसके माता पिता के साथ रहती है, यह समझते हुए कि उन्होने उसे दिल से स्वीकार नहीं किया है, समस्त परंपराओं को निभाते हुए रहती है। उद्यान उससे अपने संदेश भिजवाता है, वह नही जानती उनमे क्या लिखा है, वह सिर्फ इतना समझती है कि उद्यान की नक्सल पार्टी एक अर्थ पूर्ण कार्य कर रही है,उसे नही पता इसमे कोई विध्वंसकारी मंशा हो सकती है। उद्यान उससे एक पुलिसवाले पर निगाह रखने को कहता है, वह उसके लिए यह काम करती है, पुलिस वाले की समस्त सुचनाएँ उसे देती है। उसे उद्यान पर गहरा विश्वास है, उसके हर शब्द पर विश्वास करती है। पर विश्वास टूटता है, उद्यान उस निर्दोष पुलिस वाले की हत्या कर देता है। उद्यान पकङा जाता है और मारा जाता है। सच जानकर, गौरी टूट जाती है। इस हत्या मे उसे बिना बताए  उद्यान ने उसे बराबरी का भागीदार बना दिया है। पुलिस आती है, उससे पुछताछ करती है।वह डर जाती है, दहशत से भर जाती है। एक अपराधबोध कि किसी औरत को विधवा बनाने, किसी बच्चे को पितृहीन करने मे उसका भी हाथ है। हर समय डर की तलवार सिर पर लटकी है। वह किसी को कुछ नही बताती, न मानस को, न ही सुभाष को बताती है।

      सुभाष उसके आगे शादी का प्रस्ताव रखता है, इस डर से भागने का यह सही रास्ता मिलता है, अभी तक पुलिस को उस पर कोई संदेह नही हुआ है, पर भविष्य का क्या पता? सुभाष से शादी  करके वह अमेरिका चली जाती है। सही समय पर बेला का जन्म होता है। उसे भी लगता है अब सुभाष के साथ ही उसका जीवन है। इस जीवन को अपनाने की कोशिश भी करती है। सुभाष उद्यान जैसा होते हुए भी उससे अलग है, फिर भी वह उसे उद्यान की याद दिलाता है। वह उस धोखे को भूल नही पाती है, इसीलिए वह बेला को अपना नही पाती है। वह उस डर व दहशत और अपराघबोध से मुक्त नही हो पाती है और 12वर्ष बाद बेला को सुभाष के पास छोङकर चली जाती है।  अपना जीवन अपनी तरह जीती है पर उद्यान की यादें, उससे मिला धोखा, वो दहशत, अपराधबोध उससे चिपके ही रहते है। कई वर्ष बाद सुभाष उससे तलाक मांगता है, वह आती है, बेला से मिलती है,  अपने लिए उसके गुस्से को जानती है  और फिर अपना एकाकी जीवन जिसे उसने स्वयं चुना था,जीने वापिस चली जाती है।

अब पुत्री बेला का दर्द, जो जानती नही कि उद्यान उसका पिता है। सुभाष ने यह जानने के बाद कि गौरी  गर्भवती है, अपने भाई की जिम्मेदारियो को लेते हूए गौरी से शादी कर ली थी। बेला को माँ के प्रेम मे भी मातृत्व का भाव कम और कुछ ऐसा भाव मिलता था जो उसे अजनबी बनाता था। लेकिन उसने सब स्वीकार किया था क्योंकि उसने माँ को ऐसे ही जाना था। वह जिसे पिता के  रूप मे जानती थी, उसके लिए भी माता के उसे छोङ जाने के बाद सिर्फ मन मे विद्रोह था। पर जो भी अपनापन, प्यार दुलार मिला वो इसी पिता से मिला था, अतः मान-सम्मान भी इसी के प्रति था। पिता के रूप मे छवि इसी की थी। परन्तु यह जानने के पश्चात कि यह उसका बायोलिजिकल पिता नही है तो विद्रोह मिट गया और अब तो उसके प्रति अधिक प्रेम व सम्मान जागा था।।

यह बेला ही थी जो खुशियों की तरफ बढ़ी और अपनी पुत्री के साथ इस उपन्यास के अंत मे, इस कहानी मे खुशियाँ लाई। दर्द अभी भी था,पर खुशी भी थी, इस पिता पुत्री की खुशी।

अंत मे उद्यान की तकलीफ भी है।जो वह तब नही जान पाया था, उसे अपने अंत समय मे स्पष्ट समझ पाया था कि बदलाव और सुधार का यह रास्ता नहीं है। वह या उसके हमउम्र साथी किसानों की तकलीफ से विचलित हुए थे, वे किसानों के लिए कुछ करना  चाहते थे। वह गाँव-गाँव किसानों की हालत जानने लिए भटका था, मन हुआ तुरंत कुछ किया जाए और लोगो की सलाह से वह नक्सलवादियों से मिल गया था। वहाँ बताई हुई हर बात सच लगती थी। जोश इतना था कि अपने दिमाग से सोचना बंद कर दिया था। पर अब जान पाया कि निर्दोषों की जान लेकर कुछ नहीं बदला जा सकता है। अब वह सिर्फ अपराधी है, माता-पिता के लिए शर्मसार, गौरी के लिए धोखेबाज। काश! किसानो की भलाई के लिए कोई ओर रास्ता चुना होता!

लेखिका ने बहुत ही सशक्त और मार्मिक शब्दों में एक कहानी कही है, बहुत ही बारिकियों से चरित्रों का निर्माण किया है। साथ ही नक्सलवाद और आतंकवाद की आलोचना भी है। ये नवयुवकों की भावुकता और जोश का लाभ उठाकर, उन्हें दिशाहीन करते हैं।

परिवार के किसी सदस्य का ऐसे जीवन से चले जाना, अन्य सदस्यो को कैसे दुख से तोङता है, इसका बहुत ही स्वाभाविक चित्रण किया गया है, पढ़ते हुए ऐसे लगता है, जैसे हम स्वयं उनके दुख से गुजर रहे हो।