(Book Review)

यह उपन्यास इंगलिश में लिखा गया है। इस उपन्यास को पढ़ते हुए मुझे महसूस हुआ कि मैं जीवन के विभिन्न गलियारों मे से गुजर रही हुँ। इस उपन्यास ने जो अनुभूति मुझे दी है, उसकी अभिव्यक्ति मैं इन पंक्तियों मे करना चाहती हुँ।
            जीवन के अलग-अलग गलियारों से गुजरते हुए-

जिन्दगी बिताते है हम।

जीवन के विभिन्न पङावों के हर रंग भोगते है हम।

कुछ सुख के क्षण यूँ ही बिताते हैं हम,

पर दर्द के क्षण न भूला पाते है हम।

जीवन तो सबके साथ है,

पर ज़िन्दगी है सबकी अलग-अलग।

सुख-दुख भी सबके एक हो सकते हैं,

पर उसे जीते हैं सब अलग-अलग

जीवन के अलग-अलग गलियारों से………….

एक कहानी ‘दर्द की कहानी’ कैसे जीवन पूरे दर्द में बीता जाता था, एक का नहीं, सबका, सब उनका जो उसके अपने थे। उसके यानि नायक उद्यान के अपने थे। इस कहानी का नायक उद्यान ही है क्योंकि बाकी पात्रों की कहानी उसके कारण ही बनती या घूमती है। यह कहानी  उद्यान के अपनो की कहानी है। इतने अपने कि जान ही न सके उसके धोखे को, जो उसकी गलती थी, एक उन्मादपूर्ण गलती। जिसे वह तब जान सका, जब उसका उन्माद ठंडा हुआ था या तब जब वह धूंधले होते हुए अपनों के चेहरों को फिर से देख सका था। तब उसके पास उनसे क्षमा मांगने का समय भी नहीं था।

पर शायद नहीं जानता था, नहीं समझ सकता था,उन दर्दो को जो इन सबने जीने थे, अपने-अपने हिस्से के दर्द, जो उसके कारण थे, वो चला गया, शायद मुक्त हुआ, शायद नहीं। वो टूट गया, वो आपसी रिश्ते टूटते गए। अपने पराए होते गए, अपने – अपने दर्दो में घिरे, दूसरों के दर्द को न तो ठीक से समझ पाते थे, न उन पर मरहम लगा सकते थे। मरहम लगाने का प्रयास भी दर्द भरा था।

         उद्यान के पिता के दर्द की दास्तान कुछ ही शब्दों में बहुत कुछ कहती है और माँ के दर्द की कहानी आपके अपने जख्मों को भी उकेर देती है। अपने-अपने दर्दो में घिरे ये माता पिता एक दूसरे के लिए अजनबी बनते जाते है, यह दुख भरा अहसास है पर सच्चा अहसास, जीवन की गहरी वास्तविकता, दर्द की वास्तविकता, दर्द का प्रभाव इतना पैंठा कि दोनो टूटते और टूटते गए और फिर दोनों अलग-अलग किनारों तक पहुँच गए थे।

उनके दो बेटे सुभाष और उद्यान थे, पिता रेलवे में क्लर्क थे, स्वयं उच्च शिक्षा नहीं प्राप्त कर सके थे, पर बच्चों को उच्च शिक्षा देने के लिए बहुत मेहनत करते, माँ भी सिलाई कढ़ाई का काम करके अपना योगदान देती थी। बच्चे भी कुशाग्र बुद्धि के स्वामी थे, मन लगा कर पढ़ते और अच्छे नंबर लाते थे। सुभाष बचपन से ही सीधा और माता पिता का आज्ञाकारी, उद्यान शरारती, उसकी शरारतें माँ का मन मोह लेती थी, इसी कारण वह उसी की चिन्ता अधिक करती थी। काॅलेज में ही उद्यान माओवाद से प्रभावित हो रहा था, वह ऐसी किताबें पढ़ता, उन पर चर्चा करता, उसकी जोश भरी बाते सुन, पिता यही सोचते इस आयु के लङके इस तरह की बाते करते ही है। पोस्ट ग्रेजुएशन, अच्छे नंबरों के बाद भी देश में नौकरी नहीं है, सुभाष आगे की पढ़ाई के लिए विदेश चला जाता है। एक दिन उद्यान उन्हें सुचना देता है कि उसने विवाह कर लिया है, दुख तो होता है पर वे दोनों गौरी को अपनी बहु के रूप में स्वीकार करते है। सुभाष को लिखते है जो उद्यान ने किया वो तुम मत करना तुम्हारे लिए पत्नी का चुनाव करना हमारा हक है। सुभाष भी उन्हें आश्वासन देता है। नक्सलवादियो का आंदोलन जोर पकङता जा रहा था, प्रदेश के नवयुवक उसके प्रभाव में आ रहे थे।। उन दोनों का मन उद्यान के लिए शंकित होता है, पर यह सोच कि हमारा बेटा विवाहित है, अपना शिक्षण कार्य लगन से कर रहा है,निश्चित हो जाते थे। पुलिस ने लङको को मात्र संदेह के आधार पर पकङना शुरू कर दिया, तब भी दोनो का मन डरा रहता है, एक ही संकल्प कि उद्यान को इन सबसे बचा कर रखना है। पर वो दिन आता है जब पुलिस आती है, घर की तलाशी में सबूत पाती है, उद्यान पकङा जाता है, उनके सामने ही उसे  ले जाते है, पर थोड़ी दूर जाकर सूनी जगह पर, पुलिस के विचार से उन्हें कोई नहीं देख रहा है, उद्यान को गोली मार दी जाती है। छत पर खङे उद्यान के माता- पिता,पत्नी ने सब देखा, उद्यान का गोली खा कर गिरना,फिर उसे उठा कर ले जाना, सभी कुछ दिखाई दिया, उस नई ऊँची बनी छत से, गौरी विधवा हो गई। माता पिता के पास कुछ कहने के लिए नहीं रहा है। दोनो अपने – अपने गम में गुम हो गए है। सुभाष के आने पर भी उनके पास कुछ कहने  या बताने के लिए नहीं है। सुभाष पर तो जैसे ध्यान ही नही है, इस आघात से मिली चोट अंदर गहराई तक पहुँची है। गौरी को उद्यान के लिए स्वीकारा था, पर अब वह आँख का काँटा है, यह पक्का विश्वास है कि उसी ने उद्यान को इस मार्ग में डाला है। जब पता लगा कि गौरी गर्भवती है, उनका टूटा मन उद्यान के नन्हे स्वरूप के लिए जी गया है। पर गौरी? एक बार उद्यान की निशानी पा जाएँ तो गौरी को घर से बाहर करें। पर सुभाष विरोध करता है। माँ नही समझ पाती क्यों सुभाष गौरी के लिए सोच रहा है? अपने माता पिता के लिए नही? वह सुभाष को गौरी से दूर रखना चाहती है। पर दूसरा आघात  लगता है, सुभाष गौरी से शादी कर लेता है। वे दोनो उससे बेहद नाराज है। सुभाष गौरी को लेकर विदेश चला जाता है। अब दोनो बेटे पास नही है। माता पिता अकेले, अपने- अपने गम से लङते हुए।

पिता जानते और मानते है सच्चाई, बिलकुल अकेले और चुप रहना ही उनका जीवन है। माँ के दिल में तो बस उद्यान ही बसा है, उन्हें उसका इंतजार है। पार्टी ने उद्यान के नाम का चबूतरा बना दिया है, माँ की दिन चर्या का यह महत्व पूर्ण काम है कि प्रतिदिन उस चबूतरे को साफ करना और उस पर फूल चढ़ाना।

कई बार दोनो को महसूस होता है कि सुभाष से नाराज हो कर ठीक नही किया वह भी दूर हो गया है।

अपने – अपने दुख के साथ, हर खुशी के अहसास से परे पहले पिता और बाद में माँ इस दुनिया से चले जाते है।
भाई सुभाष का दर्द, जिम्मेदारी भरा था। छोटे भाई की जिम्मेदारियों को कंधा देकर उसने अपने दर्द को कम करने का प्रयास किया, पर यह दर्द तो और गहराता गया और इतना गहराया कि इस प्रयास में प्रश्नचिन्ह लगता गया। कोई शिकायत नहीं, कोई नाराजगी नहीं, सिर्फ सहमाता गया। केवल कर्त्तव्य, खुशी नहीं।खुश होने का ख्याल भी नहीं क्योंकि दर्द इतना भरा था कि किसी ओर भाव की जानकारी भी नहीं रही थी।

सुभाष बङा, उद्यान 14महीने छोटा । दोनों का हर पल का साथ, जब सुभाष ने स्कूल जाना शुरू किया तब उद्यान की जिद पर उसे भी सुभाष की कक्षा में दाखिला दिला दिया था। अब पढ़ना, खाना, खेलना और शरारतें सब साथ में ही करते थे। उद्यान ही शरारतें सोचता और सुभाष उसका साथ देता था। विज्ञान के नए-नए प्रयोग दोनो मिलकर करते थे। सुभाष का मन उद्यान के बिना नही लगता था। पर कालेज दोनो के अलग – अलग थे। उद्यान के नए दोस्त बन गए, वह समय से घर नहीं आता और सुभाष उसकी प्रतीक्षा करता रहता था। उद्यान माओवाद, नक्सलवाद के प्रभाव में आ रहा था। वह भावुक हो कर किसानों की स्थिति से विचलित हो रहा था। उसने कोशिश करी कि सुभाष भी माओ और नक्सल विचारधारा को समझे। वह सुभाष को सभाओं में लेकर भी गया। परंतु अब सुभाष की अपनी सोच है,उसे नही लगता कि ऐसी क्रांति से स्थिति में बदलाव आ सकता है। वह पढ़ लिख कर एक अच्छी नौकरी करना चाहता है, देश में नौकरी नही है, वह विदेश पढने जाता है, वह चाहता है कि उद्यान भी इन सब चक्करों को छोङ कर, विदेश जाकर पढ़ाई करे। उद्यान सुभाष को स्वार्थी कहता है। सुभाष विदेश में, इधर उद्यान की शादी,फिर उसका चला जाना। अब कभी सुभाष उद्यान को देख सुन नहीं पाएगा। उसी के लिए व गौरी को हर परेशानी से बचाने के लिए वह गौरी से शादी का प्रस्ताव रखता है। गौरी के साथ अमेरिका में उसका नया जीवन शुरु होता है। कुछ दिन में बेला का जन्म होता है, उद्यान की बेटी ही उसकी खुशी  है। वह जानता है कि गौरी के लिए कठिन है उसके साथ रहना, वह उसे समय देना चाहता है। पर देखता है गौरी मन से कोशिश नही कर रही है। बेला के लिए भी उसका व्यवहार स्वाभाविक नही है। और एक दिन गौरी चली जाती है, वह बेला और सुभाष को छोड़कर अपना जीवन अपनी तरह जीने के लिए चली जाती है। गौरी के जाने से बेला बहुत उदास व गुमसुम रहने लगती है। सुभाष जानता है कि गौरी ने बुझे मन से उसके साथ 12वर्ष बिताएँ है, पर बेला के साथ वह यह अनाचार कैसे कर सकती है? इस आयु में बेटी को माँ की अधिक आवश्यकता होती है। अब बेला ने सुभाष से दूरी बनाकर रखी है, पिता से केवल काम का रिश्ता है,वह महसूस करता है कि अब पिता और बेटी के बीच का अपनत्व ठंडा पङ गया है। धीरे – धीरे बङे होते ही वह स्वतंत्र होती जाती है। उस घर से, शहर से बाहर रहकर काम करती है।सुभाष बहुत अकेला हो गया है, उद्यान के साथ का समय याद करता है, माता पिता की नाराजगी के बाद भी वह अपने कर्तव्य पूरे करता रहा था। पिता के जाने के बाद माँ तो सिर्फ उद्यान की यादों में डूब गई थी, सुभाष दूर से जो कर पाता, करता था। कभी- कभी माँ के पास जाता भी था। माँ के भी गुजर जाने के बाद अब एकमात्र वह रह गया था और उद्यान की निशानी बेला थी। अभी तक उसने बेला को उद्यान के विषय में नही बताया था। पर जब बेला लौटी है और अब बेला माँ भी बनने वाली है तब वह उसे अपनी सच्चाई बताता है। सुभाष नही, उद्यान बेला का पिता है। सुभाष को लगता है अब बेला उससे और दूर हो जाएगी, पर नही, ऐसा नही होता है, वह कहती है, वह उद्यान को नही जानती है उसके पिता सुभाष ही है। सुभाष को अपनी पुत्री वापिस मिलती है। अब उसकी नातिन मेघना भी है। एक परिवार- जो वह गौरी के साथ चाहता था। उसके जीवन की खुशियाँ लौट रही है । एलिस के रूप में एक अच्छी मित्र मिलती है, जिससे गौरी को तलाक देकर वह विवाह कर लेता है। जीवन का अंतिम पड़ाव वह एलिस के साथ बिताएगा। उद्यान की यादें हमेशा साथ रहेगी।
पत्नी गौरी का दर्द, प्रेयसी का दर्द, वो तो सिर्फ प्रेयसी ही रही थी। पत्नी बनने के बाद भी तो वह सिर्फ दीवानी थी, जिस दीवानगी में उसने उद्यान से विवाह किया था और उसी दीवानगी में उसके सही गलत की साथिन बनती गई थी परंतु जब जान पाई उसके धोखे को, उसके उन्माद को, वो टूटने लगी थी। उसके जाने के बाद एक सन्नाटा था। कैसे समझ पाती अपने इस दर्द को, जो दर्द तो था पर कैसा? धोखे का? उसकी मृत्यु का? या अपनी आँखों के सामने उसे इस तरह प्रताड़ित होते हुए मृत्यु के मुँह में जाने का दर्द था। यह सन्नाटा था, यह न समझने की स्थिति का  कि वह दुःखी है पर किसलिए? अपने दीवानगी भरे प्रेम पर या अपनी नासमझी के लिए दुःखी है। या वह उस प्रेम के लिए दुःखी है, जो अभी भी उसके दिल में उसके लिए मौजूद था। वो दगाबाज उसके दिल में, ख्यालों में बसा रहता था, वह जाता ही नही था। यह सन्नाटे भरा दर्द इसलिए था कि इसमें भय भी मिल गया था। इस दीवानी ने उसके हर गलत को सही मान उसका साथ दिया था। वो दहशत भरा दर्द इतना गहरा था कि कुछ भी स्वीकारने का मतलब ही न था। न किसी का साथ, न किसी का अपनापन। अपने खुन को-अपनी पुत्री को, उन दोनो की पुत्री को भी कैसे स्वीकार करे? क्यों नही आता उसके मन में कि यह दोनो के प्रेम की निशानी है। क्यों केवल धोखा लगता है? अपनी कोख से जन्मी पर प्यार क्यों नहीं आता? यह हर वक्त, हर पल कण- कण में टूटते बिखरते दिल का दर्द है। इस दर्द में स्वाभिमान भी है, प्रेम भी है और प्रताड़ित होने का अहसास भी है जो जीवन में सिर्फ खालीपन देता है। ‘खुशी’ या इसका अर्थ  दोनो अब याद ही नही है।

             उद्यान गौरी के भाई मानस का दोस्त था। घर पर ही उसने उद्यान को देखा और उसकी ओर आकृषित हुई थी। गौरी एक चुप, गंभीर लङकी,किताबों मे ही डूबी रहती थी, उसके जीवन मे उद्यान आता है, वह उसका परिचय मार्क्स से कराता है। वह उससे प्रेम करती है, वह जो कहता है, सोचता है, करता है, सब उसके लिए सच है। वह उससे शादी करना चाहता है वह उससे शादी करती है, उसके माता पिता के साथ रहती है, यह समझते हुए कि उन्होने उसे दिल से स्वीकार नहीं किया है, समस्त परंपराओं को निभाते हुए रहती है। उद्यान उससे अपने संदेश भिजवाता है, वह नही जानती उनमे क्या लिखा है, वह सिर्फ इतना समझती है कि उद्यान की नक्सल पार्टी एक अर्थ पूर्ण कार्य कर रही है,उसे नही पता इसमे कोई विध्वंसकारी मंशा हो सकती है। उद्यान उससे एक पुलिसवाले पर निगाह रखने को कहता है, वह उसके लिए यह काम करती है, पुलिस वाले की समस्त सुचनाएँ उसे देती है। उसे उद्यान पर गहरा विश्वास है, उसके हर शब्द पर विश्वास करती है। पर विश्वास टूटता है, उद्यान उस निर्दोष पुलिस वाले की हत्या कर देता है। उद्यान पकङा जाता है और मारा जाता है। सच जानकर, गौरी टूट जाती है। इस हत्या मे उसे बिना बताए  उद्यान ने उसे बराबरी का भागीदार बना दिया है। पुलिस आती है, उससे पुछताछ करती है।वह डर जाती है, दहशत से भर जाती है। एक अपराधबोध कि किसी औरत को विधवा बनाने, किसी बच्चे को पितृहीन करने मे उसका भी हाथ है। हर समय डर की तलवार सिर पर लटकी है। वह किसी को कुछ नही बताती, न मानस को, न ही सुभाष को बताती है।

      सुभाष उसके आगे शादी का प्रस्ताव रखता है, इस डर से भागने का यह सही रास्ता मिलता है, अभी तक पुलिस को उस पर कोई संदेह नही हुआ है, पर भविष्य का क्या पता? सुभाष से शादी  करके वह अमेरिका चली जाती है। सही समय पर बेला का जन्म होता है। उसे भी लगता है अब सुभाष के साथ ही उसका जीवन है। इस जीवन को अपनाने की कोशिश भी करती है। सुभाष उद्यान जैसा होते हुए भी उससे अलग है, फिर भी वह उसे उद्यान की याद दिलाता है। वह उस धोखे को भूल नही पाती है, इसीलिए वह बेला को अपना नही पाती है। वह उस डर व दहशत और अपराघबोध से मुक्त नही हो पाती है और 12वर्ष बाद बेला को सुभाष के पास छोङकर चली जाती है।  अपना जीवन अपनी तरह जीती है पर उद्यान की यादें, उससे मिला धोखा, वो दहशत, अपराधबोध उससे चिपके ही रहते है। कई वर्ष बाद सुभाष उससे तलाक मांगता है, वह आती है, बेला से मिलती है,  अपने लिए उसके गुस्से को जानती है  और फिर अपना एकाकी जीवन जिसे उसने स्वयं चुना था,जीने वापिस चली जाती है।

अब पुत्री बेला का दर्द, जो जानती नही कि उद्यान उसका पिता है। सुभाष ने यह जानने के बाद कि गौरी  गर्भवती है, अपने भाई की जिम्मेदारियो को लेते हूए गौरी से शादी कर ली थी। बेला को माँ के प्रेम मे भी मातृत्व का भाव कम और कुछ ऐसा भाव मिलता था जो उसे अजनबी बनाता था। लेकिन उसने सब स्वीकार किया था क्योंकि उसने माँ को ऐसे ही जाना था। वह जिसे पिता के  रूप मे जानती थी, उसके लिए भी माता के उसे छोङ जाने के बाद सिर्फ मन मे विद्रोह था। पर जो भी अपनापन, प्यार दुलार मिला वो इसी पिता से मिला था, अतः मान-सम्मान भी इसी के प्रति था। पिता के रूप मे छवि इसी की थी। परन्तु यह जानने के पश्चात कि यह उसका बायोलिजिकल पिता नही है तो विद्रोह मिट गया और अब तो उसके प्रति अधिक प्रेम व सम्मान जागा था।।

यह बेला ही थी जो खुशियों की तरफ बढ़ी और अपनी पुत्री के साथ इस उपन्यास के अंत मे, इस कहानी मे खुशियाँ लाई। दर्द अभी भी था,पर खुशी भी थी, इस पिता पुत्री की खुशी।

अंत मे उद्यान की तकलीफ भी है।जो वह तब नही जान पाया था, उसे अपने अंत समय मे स्पष्ट समझ पाया था कि बदलाव और सुधार का यह रास्ता नहीं है। वह या उसके हमउम्र साथी किसानों की तकलीफ से विचलित हुए थे, वे किसानों के लिए कुछ करना  चाहते थे। वह गाँव-गाँव किसानों की हालत जानने लिए भटका था, मन हुआ तुरंत कुछ किया जाए और लोगो की सलाह से वह नक्सलवादियों से मिल गया था। वहाँ बताई हुई हर बात सच लगती थी। जोश इतना था कि अपने दिमाग से सोचना बंद कर दिया था। पर अब जान पाया कि निर्दोषों की जान लेकर कुछ नहीं बदला जा सकता है। अब वह सिर्फ अपराधी है, माता-पिता के लिए शर्मसार, गौरी के लिए धोखेबाज। काश! किसानो की भलाई के लिए कोई ओर रास्ता चुना होता!

लेखिका ने बहुत ही सशक्त और मार्मिक शब्दों में एक कहानी कही है, बहुत ही बारिकियों से चरित्रों का निर्माण किया है। साथ ही नक्सलवाद और आतंकवाद की आलोचना भी है। ये नवयुवकों की भावुकता और जोश का लाभ उठाकर, उन्हें दिशाहीन करते हैं।

परिवार के किसी सदस्य का ऐसे जीवन से चले जाना, अन्य सदस्यो को कैसे दुख से तोङता है, इसका बहुत ही स्वाभाविक चित्रण किया गया है, पढ़ते हुए ऐसे लगता है, जैसे हम स्वयं उनके दुख से गुजर रहे हो।