​  ज़िन्दगी से इतने भी सवाल मत करो, कि वो तुम पर उंगली उठाने लगे।

  इस वक्त को जियो और बेकार इसे दोष न दिया करो,

 कि एक दिन यह तुमसे सवाल करने लगे।

ड्राईंग रूम मे बैठकर आप सब डिसकस किया करते हो,

सोचते हो गंभीर मुद्दो पर चर्चा कर विद्वान बन गए हो ।

इतनी भी चर्चा न करो कि मुद्दे अपनी गंभीरता पर प्रश्न करने लगे ।

तो फिर सवाल यह उठा कि क्या करे? 

कि ये ज़िन्दगी,वक्त और मुद्दे निराश न हो, 

ऐसा करे कि बिना डर के जिया करे। जो गलत हो उस पर ड्राईंग रूम मे चर्चा न कर,

बाहर निकल कर बोला करें,नेता बनने के लिए नही, नागरिक होने के लिए बोला करें।

कुछ अपने पर भी विचार करे, जिन पुरानी परिपाटियों और परंपराओं की दलदल मे फंसे हो, उससे बाहर निकल आओ।

अब न तुम ज़िन्दगी से सवाल करोगे, न वह तुम पर उंगली उठाएगी ।

न तुम वक्त को दोष दोगे, न वह सवाल करेगा। 

 मुद्दे भी उत्सुक हो, अपने हल स्वयं लिए प्रस्तुत होंगे।

जीना तो अब भी अपने लिए ही है, सिर्फ दिशा बदल दें।

सोचना तो अपने लिए ही है, बस सोच बदल दें।