कुछ दिन पहले खबर आई कि सुमन अब इस दूनिया में नहीं रही है। सुमन? वही सुमन जिसकी 12 वर्ष की आयु में शादी हो गई थी और उसने 14 वर्ष की आयु में पहली संतान को जन्म दिया था। अब उसकी आयु 34 वर्ष की थी, पांच बच्चे है, बङी दो लङकियों का विवाह उनकी 16-17वर्ष की आयु में कर दिया था, उसके बाद वह दो बेटे और एक बेटी को बेसहारा छोङ गई है। 

मृत्यु का कारण? वह गर्भवती थी, तीन महीने के गर्भ को गिराना चाहती थी, अतः बिना डाक्टर की सलाह के उसने कोई भी दवाई खाली, बच्चा तो पेट में ही मर गया जिसके ज़हर से सुमन भी नहीं बच सकी थी। पिछले 20 वर्ष से वह यही कर रही थी या तो बच्चों को जन्म देती या गर्भपात कराती थी। पता नही सुमन किसी डाक्टर के पास क्यों नही गई, कोई गर्भनिरोधक उपाय क्यों नही करें? आजकल तो मुफ्त ही सरकारी चिकित्सा व्यवस्था मिलती है। सुमन गाँव की लङकी थी, पर शहर में रहती थी, अच्छे पढ़े-लिखे लोगों के घर काम करती थी। ऐसा तो हो नहीं सकता कि उसे गर्भ निरोधक उपायों के विषय में पता नहीं हो,अवश्य पता होगा, लेकिन फिर भी ऐसा क्यों हुआ होगा? इस मृत्यु को क्या कहें? दूर्घटनावश मृत्यु, मुर्खतापूर्ण कदम, आत्महत्या या हत्या।

इन सब का फैसला करने से पहले हम सरकारी आंकङों पर एक नज़र डालते है? मातृ मृत्यु दर व शिशु मृत्यु दर कितनी है और बाल विवाह के आंकङो को भी समझ लेते है।

WHO की रिपोर्ट के अनुसार हमारे देश मे प्रतिवर्ष 1.36 लाख महिलाओं की मृत्यु होती है। हर साल 4लाख शिशुओं की मृत्यू 24 घंटे के अंदर हो जाती है। शिशु मृत्यु दर में भारत का विश्व में स्थान पांचवाँ है भारत इस स्तर में अफ्रीकी देशों से भी पीछे है।भारत में सबसे ज्यादा मातृ मृत्यु दर वाले प्रदेशों में सबसे अग्रणी असम, उत्तरप्रदेश व उत्तराखंड है। भारत विश्व के उन 10देशों मेः आता है जहाँ मातृ मृत्यु दर बहुत अधिक है।

मातृ मृत्यु दर और शिशु मृत्यु का मुख्य कारण है कि लङकी का छोटी आयु में विवाह व छोटी ही आयु में गर्भधारण करना। उसके पश्चात जल्दी-जल्दी गर्भवती होना, जिससे लङकी का कच्चा शरीर और कमज़ोर होता जाता है। इसके कारण गर्भपात भी होते हैं। अधिकांशतः ग्रामीण व आदिवासी क्षेत्रों में पूर्णतः व सुचारू रूप में चिकित्सा सुविधा न होना भी माँ व शिशु की मृत्यु के कारण होते है। माना यह जाता है कि देश में पहले से मातृ मृत्यु दर और शिशु मृत्यु दर में कमी आई है। परंतु हम जानते हैं  कि अभी भी स्थिति बहुत दयनीय ही है। हम अभी भी अपने ग्रामीण वासियों और आदिवासियों की सोंच में बदलाव लाने में असफल रहे हैं। अभी भी वहाँ घर पर दाई द्वारा प्रसव कराने को महत्व दिया जाता है तथा वे सरकारी सुविधाओं का भी लाभ नहीं उठाते हैं। हमारे प्रचार तंत्र में अभी बहुत कमी है, लोगों को जागरूक करने में हम असफल रहे हैं, लोग अपनी परिपाटियों की सोच को बहुत गहरे पकङे है।सिर्फ कानून और योजनाएँ बनाने से फर्क नहीं पङ सकता है। सरकार व सामाजिक संस्थाओं को अपने प्रचार व जागरूकता अभियान में तेजी लाने की आवश्यकता  है।

वे ग्राणीण दलित स्त्रियाँ जो जीवनयापन के लिए शहरों में आती हैं, उन्हें तो समस्त चिकित्सा सुविधा सरकारी अस्पतालों में प्राप्त हो सकती है। फिर भी वह प्राप्त नहीं करती हैं, जैसे सुमन। सच्चाई यह है कि सरकारी तंत्र व सामाजिक संस्थाएँ इन स्त्रियों की मानसिकता को बदलने में असफल रहे हैं। ये स्त्रियाँ घर से बाहर आकर काम भी करती है अर्थात ये औरते आत्मनिर्भर होती हैं, पर इनके पति शराबी व कामचोर होते हैं। पूरे परिवार का पालन पोषण इन स्त्रियों पर ही निर्भर होता है।इस सबके पश्चात भी स्त्री पुरूष की मानसिकता का सामना नहीं कर पाती है। यह जानते हुए भी कि बार-बार गर्भ धारण करना उनके स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है अतः उसके लिए उपाय किए जा सकते है, वे ऐसा नहीं कर पाती हैं क्योंकि उनके पति व परिवार के अन्य सदस्य(सास-ससुर) उन्हें ऐसा नहीं करने देते हैं, ये औरते अपने लिए लङते-लङते मर जाती हैं। अतः इन स्त्रियों के साथ इनके पति व परिवार के अन्य सदस्यों को जागरूक करना बहुत जरूरी है।इन औरतों में इतनी हिम्मत नहीं होती कि पति की अनुमति के बिना गर्भनिरोधक उपाय अपना सकें। इनके परिवारों भें घरेलू हिंसा साधारण बात है,पर यह बात इतनी भी साधारण नहीं है, ये कभज़ोर औरतें स्वास्थ्य से कमज़ोर होने के साथ-साथ पतियों से मार खाते हुए, शारीरिक चोटें खाती हुई और कमज़ोर होती जाती है साथ ही अपना मनोबल भी खोती जाती हैं, अतः पति का विरोध नहीं कर पाती व गर्भनिरोधक उपाय नहीं अपना पाती हैं।पतियों को फर्क नहीं पङता उनके कितने भी बच्चे पैदा हो जाए क्योंकि उनकी परवरिश की जिम्मेदारी से उन्हें सरोकार नहीं होता है।