आज फिर यादों ने जगाया मुझे,
मुझ से मेरे बचे बकायों का हिसाब मांगा,

कैसे दूँ हिसाब? अभी तो चुकाने का सोचा भी नहीं,

कहाँ से करूँ हिसाब? बकायों की लिस्ट लंबी जो रही।

समय गुजरता जाता है, मैं डर से आँखें मीचे पङी हुँ,

ये यादें भी ना जाने कौन-कौन से बकायें ढूंढ  के सामने ला रही है,

वो जिन्हें मैंने अपना बचपना समझा था,

वो जो लगा था, यह तो अधिकार था मेरा

पता नहीं किस-किस से रुठी मैं,

पता नही कब-कब, किस- किस को नाराज़ किया मैने,

मैने सवाल किया, वो बचपना था मेरा, बकाया कैसे बन गया?

यादें हँस कर बोली, भूल गई? तब भी तो दिल दूखा था किसी का।

जब भी तुम से किसी दिल को चोट पहुँची, वो चोट तुम्हारी बकाया बन गई।

मैं सिर पकङे बैठी थी, फिर पूछा, और मेरा दिल? वो भी तो टूटा कई बार,

 ये तो सब करते न! फिर मेरे बकाए इतने क्यों?

यादें फिर जोर से हँसी, बोली, यादें हम तुम्हारी है किसी और की नही।

तुमने ही हमें अपने दिल में बसाया 

आज फिर यादों ने जगाया मुझे।