” किस बात पर रो रही हुँ? तुम्हारे जाने का गम कर रही हुँ या इस बात का अधिक गम कर रही हुँ कि तुम मुझ से पहले चले गए, मैं पहले जाती तो तुम मुझे याद करते और याद आती वो सब तकलीफें जो तुमने मुझे दीं थी।और शायद पछताते भी, तुम मेरे दर्दों का अहसास जीते फिर रोते, चीखते, चिल्लाते और कहते मुझे माफ कर देना, मैंने तुम्हें बहुत सताया। पर उल्टा हो गया तुम चले गए अब मैं रो रही हुँ, चीख रही हुँ , पछता भी रही हुँ। उन सब बद् दुआओं के लिए जो मेरे मुहँ से अपने आप निकलती थी।जब तुम्हारी दी हुई तकलीफ के दर्द से तङपती थी, तब भी जब मेरी बाँहे पूरे बिस्तर पर तुम्हें ढूँढते हुए बिलख जाती थी और एक श्राप निकलता तुम मरते क्यों नहीं, भगवान तुम्हें उठाता क्यों नहीं। पर ऐसा नहीं हुआ तुम जीए और मैने धीरे-धीरे दर्द के साथ सब स्वीकार करते हुए जीना सीख लिया था। भगवान के आगे सिर नवा कर माफी माँगी और तुम्हारे लिए, अपने बच्चो के पिता के लिए लंबी उम्र की दुआ माँगती।लेकिन जब मैं तुम्हारे लिए दुआ माँगती रही हुँ, तुम चले गए।”

आज वंदना के पति विनय को इस दूनिया से गए 20 दिन हो गए है और वह इन दिनों पूरी हिम्मत के साथ अपने सिवा घर के हर सदस्य को संभाल रही थी। और दोनों बेटों के साथ सारे काम देख रही, क्रिया, चौथा, तेहरवीं।शोक व्यक्त करने आए लोगों के सामने सब वृतांत बार- बार बताना कैसे बुखार आया?हाॅस्पिटल, डाॅक्टर और देखते-देखते उनका चले जाना। यह सभी जिम्मेदारी उसी की तो है, ससुरजी की इतनी उमर उस पर दूसरे बेटे का गम।वह अपने दोनों बेटों को देखती, बङे हो गए, पर उनके हौसलों को दुरस्त रखना उसकी जिम्मेदारी है। अभी तो इन्हें अपने पिता की जिम्मेदारियाँ भी पूर्ण करनी है। दोनो सौतेले भाई-बहन अभी बहुत छोटे हैं, अपनी माँ के साथ, दूसरी माँ की भी जिम्मेदारी है।कितनी मुश्किलों भरी जिन्दगी मिली उसके बच्चों को….। 20 दिन बीत भी गए, आज शोक व्यक्त करने वालों का तांता कुछ कम हुआ है, बाहर से आए रिश्तेदार भी चले गए है। घर में सन्नाटा फैला है। और वह अभी अपने बिस्तर पर आँखें मीचें पङी है। दिल पर बहुत बङा बोझ, आज बहुत भारी लग रहा है, जख्मों को रिसता हुआ महसूस कर रही हैं।रो नहीं पा रही हैं, कराह भी नहीं पा रही हैं।पहले बरसों तक रोती रही, कराहती रही थी फिर आँसु सुख गए।इन्हीं सूने अहसासों को लिए, पिछले एक महीने की थकान ने उसकी आँखों में नींद भर दी।धीरे-धीरे उसकी बाँहे फैलने लगी और हाथ सिर के बाल सहलाने लगे और वह सिहर उठी, यह कैसे इतने वर्ष बाद…वह घबरा गई। तभी आवाज़ सुनाई दी, भाभी!भाभी! क्या हुआ आँख खोलो, उसने आँखें खोली सामने कमला खङी थी। कमला पानी लेकर आई वह तो स्तब्ध पङी थी, कमला ने ही सहारा दे कर पानी पिलाया तब कुछ होश संभले और उसने अपना सिर कमला के कंधों पर रख दिया, रोई तब भी नहीं। कमला बरसों से उसके पास काम कर रही है, उसका दर्द समझती है।

कमला उसके सिर पर तेल लगाने लगी और उसकी आँखे पता नहीं कौन-कौन से, कितने पुराने मंज़र दिखा रहीं थी। दो चोटी करे, हाथ में किताबें लिए घर पहुँची, अरे, वीनु तेरी माँ नहीं रही। माँ….और माँ का मुस्कराता, ममतामयी चेहरा आँखों के सामने..चौंक जाती है।”बुखार बहुत तेज़ है” “अरे! बाबुजी मेरे कमरे में! कमला मेरे सिर पर पल्ला…।” “बेटा, लेटी रहो। बुखार तेज है, कुछ खाकर दवाई ले लो।” बाबुजी कहकर चले गए। निम्मी उसे सूप पिलाने लगी। आज पता नहीं क्यों उसका मन नहीं हुआ, निम्मी के हाथ से उसने कटोरा ले लिया जबकि उसके हाथों में कंपन था पर उसने उन्हें संभाला बरसों के अभ्यास ने उसके भावों को संयमित और दृढ़ता दी है। पर निम्मी भी समझ गई, उसने उसको देखा, निम्मी की करुण नम आँखों का जवाब उसने अपनी स्निग्ध मुस्कान से दिया। नहीं, वह कभी निम्मी से नाराज़ नहीं हुई थी। उसने उसे छोटी बहन जैसा मान दिया है। निम्मी का सच, निम्मी के लिए उचित रहा, अपने को चरित्रवान प्रमाणित करते हुए उसका यही तर्क था कि जिसे एक बार उसने अपना तन मन सौंपा वही उसका पति हुआ।

दवाई से बुखार कुछ कम हुआ, पसीने से बैचेनी हो रही है धीरे से उसने आँखें खोली बगल में, पलंग के दूसरी ओर वह बैठा धीरे-धीरे मुस्करा रहा था, बिलकुल वैसा ही जैसा उससे पहली बार मिलने आया था।हङबङा कर पूरी आँखें खोली, पलंग का उसका भाग वैसा ही रिक्त था। क्या बुखार के कारण?, नहीं तो वर्षों से उसने उसे ठीक से नही देखा था।

उसकी आँखें फिर मुँदने लगी। “हमें डाॅक्टर को बुलाना चाहिए, प्रलभ! डाॅक्टर को फोन कर,और फिर तु खुद जाकर उन्हे ले आना, गाङी ले जाना।” वंदना धीरे से बुदबदायी, “विनय की आवाज़? वह मेरी चिन्ता कर रहे हैं।” पर दूसरे ही क्षण… सांस जैसे गले में अटक गई हो। “माँ! क्या हुआ?”शलभ?” शलभ की आवाज़ अपने पापा जैसी है, उसे पहले कभी महसूस क्यों नहीं हुआ?” फिर उसे याद आया, एक ही घर, एक ही आंगन कैसे उस निर्मोही से दूर रहना असहनीय हो रहा था। उसकी एक झलक देख बेताब हो जाती आँखें, आसपास से उसके गुजर जाने भर से मन में न जाने कितने अहसास जग जाते थे, उसकी आवाज़ कानों पर पङते ही दिल तङप उठता था। कितनी बार उसने उस बेदर्द के सामने अपने प्रेम की दुहाई दी पर उस बेरहम ने….। फिर वंदना ने जगाया था अपना स्वाभिमान और अपनी सभी इंद्रियों को सुप्त कर दिया था। अब न उसे विनय दिखता, न उसकी आवाज़ ही सुनाई देती, जैसे वह उसके लिए था ही नहीं। पर अब वह हमेशा के लिए चला गया तो… उसकी इंद्रियाँ क्यों जागकर उन अहसासों में उसे ले जाकर तङपा रही हैं।

फिर उसने सुना माँ! ठीक हो जाओ, तुम्हारे बिना कैसे?आँखें खोली, शलभ, प्रलभ दोनो थे।धीरे धीरे आराम आने लगा पर कमजोरी बहुत थी, उस पर यादों का तांता लगा था।वंदना के लिए बहुत अच्छा रिश्ता आया है। पर अभी बहुत छोटी है। बिन माँ की बेटी को कैसे संभालोगे। लङके और उसकी माँ ने हमारे रजत की शादी में वंदना को देखा था। तब से उनके कितनी बार फोन आ चूके है। अच्छे संपन्न लोग है।माँ तो इतनी अच्छी कि वंदना अपनी माँ का गम भूल जाएगी। वंदना को भगवान ने जैसे फुर्सत से बनाया था। नयन नक्श ऐसे कि देखते रह जाओ छवि भी इतनी प्यारी कि मन मुग्ध हो जाए।विनय तो उसका दीवाना था। ससुराल में सास-ससुर लाड करते तो वंदना भी उनके सम्मान में कोई कमी न रखती थी।उसकी खूबसूरती और स्वभाव प्रसिद्धि पा रहे थे कि ननद मंजु की शादी में सारे रिश्तेदार वंदना को परखने ही आए थे। शलभ अभी दो महीने का ही था पर वंदना ने किसी की आवभगत में कोई कसर नहीं छोङी थी। उसकी खुशमिजाजी ने सबका दिल जीत लिया था। विनय भी उस पर निहाल हुआ जाता था। विनय रिश्ते की भाभियों से चुहल करता तब वंदना मायुस हो जाती पर अपने पर और विनय पर पूरा विश्वास था।फिर वह जानबुझकर रुठती ताकि वह उसे मनाए। शलभ के दो साल बाद प्रलभ हुआ था, वंदना अपने विवाहित जीवन मे पूरी तरह डूबी थी। पर न जाने किस दुख ने देवर विपिन को आत्मघात करने को मजबूर कर दिया था।विपिन की आकस्मिक मृत्यु ने सारे परिवार पर दुख का वज्रपात कर दिया था।वंदना सास ससूर के दुःख का सहारा बन रही थी, विनय भी विपिन के जाने से टूट गया था, अपने को बहुत अकेला महसूस करता था। वंदना उसे संभालती। वही थी जो सबकी हिम्मत बन रही थी। समय पंख लगाकर उङ रहा था, वंदना कुशलता से सब संभाल रही थी, उसे महसूस होता उसके और विनय का रिश्ता, प्रेम और गहरा होता जा रहा है कि तभी एक दिन जैसे उसे पहाङ से नीचे गिरा दिया हो उसके विश्वास का ऐसा हश्र! विनय उसे निम्मी के विषय मे बता रहा था और वह अचंभित सुन्न बैठी रह गई थी।वह चला गया ।तब बाबुजी और माँ ने उसे अपना भरोसा दिया था। पर बेटा ऐसे घर छोङ जाए असहनीय था।

माँ-बाबूजी अपने नालायक बेटे पर बहुत नाराज़ हुए, समझाया भी कि अपनी गृहस्थी मत खराब कर। ननद मंजु और ननदोई राजेश ने भी कोशिश करी पर वह टस से मस नहीं हुआ।और एक दिन मंजु आई बताया उसने शादी कर ली है, मंजु बोली,” वह तो आपके पैर की धूल भी नहीं है।” वह बोली, “बता मंजु क्या मैं पहले जैसी सुंदर नहीं रही? दोनो बच्चों के बाद मोटी हो गई हुँ, बोल क्या प्रेम सिर्फ शारीरिक सौंदर्य तक सीमित रहता है? फिर अपने आप बोली, पर सुना है वह सुंदर नही है, तो क्या कमी आई मुझ में?” वह तो पगला ही गई थी।मंजु बोली,”भाभी, आप में कोई कमी नहीं है, हमारा भाई ही नालायक निकला। उस लङकी ने ही कोई जादू किया है।”

वह तो टूटती जा रही थी कि एक दिन माँ आई और बोली,”बेटा, तेरा दुःख समझती हुँ, फिर झोली फैलाकर बैठ गई, बोली, मुझे मेरा बेटा ला दे, एक तो पहले ही असमय चला गया, अब इसे भी देखे बिना कैसे जीऊँ?” वह हतप्रभ-सी बोली, “मैं कैसे? मेरे पास क्यों वापिस आएँगे?” माँ ने कुछ झिझकते हुए कहा,”अगर विनय के साथ निम्मी भी आ जाए…” “क्या कहती हो माँ? और मैं कहाँ जाऊँगी? मेरे बच्चे?” तब बाबूजी की आवाज़ आई,” बेटा, आज से तु हमारी बहु नहीं, बेटी है, तेरी और पोतो की जिम्मेदारी हमारी है, तेरा कोई हक मारा नहीं जाएगा।” उसने मन में कहा हक?वह तो मारा जा चूका है।’

माँ बाबूजी के दुख के सामने उसने अपना मान नीचा कर, चल दी अपने पति और उसकी पत्नी को लेने, मंजु और राजेश ने बहुत मना किया, कहा, “आप अपने साथ अन्याय कर रही हो।” पर वंदना को सिर्फ माँ-बाबुजी का ध्यान था। फिर माँ ने कहा,” वह तुझी से सच्चा प्यार करता है, अभी भटक गया है। तु सामने होगी, तो फिर तेरे पास होगा और मर्द तो दो-दो पत्नियाँ रखते है। तुझे भी हम तेरा हक दिलाएँगे। वह उन दोनो को अपने साथ ले कर आई, मन रो रहा था पर चेहरे पर मुस्कान थी।”

समय बीतता गया पर विनय उसके पास नहीं आया, कभी वह सामने से पूछती कि उसका क्या होगा? “मेरे साथ भी बिताओ कुछ समय।” पर उस निर्मोही ने उससे जो मुहँ मोङा तो फिर उसकी ओर नहीं आया। उसे लगता क्यों बेशरम सी पङी हुँ यहाँ? कई बार अपनी जान लेने का मन हुआ पर बेटों का मुहँ देखकर सोचती इन्हें कैसे सौतेली माँ के पास छोङ जाऊँ। यूँ भी इन मासूमों को भी तो घर से बाहर निकलते ही दूनिया के सवालों का जवाब देना पङता है। घर से पिताजी का फोन आया था बोले,”तु यहाँ आ सकती है, पर तुझे और बच्चों को अपना हक लेने में कठिनाई आएगी।” वह थक गई थी, इस ‘हक’ शब्द को सुन सुनकर।कैसा हक? जमीन जायदाद? अपने बच्चों को मेहनत मजदूरी कर पाल लेगी, पर इस तरह अपमनित होकर जीना..। उन दोनों के हँसी ठठ्ठे की आवाज़े, उसके दिल में हथौङे बजते थे।

माँ-बाबुजी को तो दो बहुओं की सेवा-टहल मिल रही थी, जब माँ निम्मी का भी वैसा लाड करती तो उसका दिल और टूट जाता था।सोचती,” इन्होंने अपना सुख देखा, मेरी तङप नही समझी।” पर अंतिम समय में माँ उसका हाथ पकङ कर बोली,” मुझे माफ करना बेटा, अपने स्वार्थ के सामने, मैने तेरी तङप और मान को अनदेखा किया। एक औरत होकर भी, तेरी माँ बनकर भी….। मुझे उसे लाने को तुझे नहीं कहना था।मैं जानती थी, एक पुरुष की प्रवृति… फिर भी मेरे अंदर की औरत एक माँ की ममता के आगे हार गई। वह अनाचारी पुरुष, माँ के कंधों का सहारा पा कर जीत गया।आदिकाल से चली आ रही पुरुष की ऐसी भूमिका को बढ़ावा दिया। कोई नया इतिहास नहीं बनाया, अगर तेरे मान के साथ अपना भी मान जोङ देती, उसने एक माँ के दिए संस्कारों का अपमान किया था।उसे घर से बेदखल रखती,और तुझमें व पोतों में अपना सुख देखती। पर तु ही इस घर का मान है, मैने तेरे बाबुजी से कहा है कि वंदना की इच्छा बिना इस घर का पत्ता भी नहीं हिलेगा” माँ के जाने के बाद बाबुजी उसकी ही सलाह लेते है, वह भी घर की बङी बहु की समस्त जिम्मेदारी निभा रही है।

तबियत में अब बहुत सुधार था, इसलिए शाम को छत पर टहलने लगी, टहलते-टहलते उसकी निगाह दरवाज़े पर पङी, “कौन है?” धीरे-धीरे गरिमा बाहर आई, “अरे,वहाँ क्यों खङी है? मेरे पास आ और गरिमा दौङ कर आकर उससे लिपट कर रोने लगी,” नहीं, रोते बेटा, मै अब ठीक हुँ।” “बङी मम्मी मुझे लगा आप भी मर जाओगी।” नमन की आवाज़ सुनकर, मुङ कर देखा, वह भी बहुत उदास व मायुस था। दोनो बच्चों को गले लगा कर बोली, नहीं मेरे बच्चों मैं तुम्हें छोङ कर कहीं नहीं जाऊँगी। कमला से बोली, “चाय यहीं छत पर ले आ, निम्मी को भी बुला लेना साथ ही चाय पी लेंगे। निम्मी ने चाय पकङाते हुए , झिझकते हुए उसे देखा चेहरे पर वही तेज और निश्चछलता, आँखों में बच्चों के लिए माधुर्यपूर्ण झलकता वात्सल्य। निम्मी ने निश्चितता और सुरक्षा का उसांस भरा, नही तो, विनय के जाने बाद कैसी असुरक्षा की भावना मन को घेर रही थी।

समय के पाँव नहीं होते है, अब यादें तो ताज़ा हैं, पर मान-अभिमान, अपमान सब धूँधले पङ गए हैं।शलभ की 10वर्षीय बेटी निकिता एकाएक पूछने लगी, “दादी माँ, सुनाओ न अपनी शादी की कहानी, कैसे बङी दादी माँ ने आपका घुघंट खोला?और चाचू बाबा और बुआ दादी ने आपको खीर में डालने के लिए चीनी की जगह नमक पकङा दिया था” “अरे, कितनी बार सुनेगी लङकी!” हँसते हुए वंदना ने फिर पुराने किस्से सुनाने शुरू किए। तभी गरिमा आई, बोली, आपके यह किस्से सुनने में तो हमें भी बङा मज़ा आता है।”उसकी गोद में नमन का एक वर्षीय बेटा था, उसके जन्मदिन के उपलक्ष्य में ही आज वंदना का पूरा कुनबा इकठ्ठा हुआ था।गरिमा से पोते को उसने अपनी गोद में लिया और प्यार से उसे निहारने लगी। तभी निम्मी आई ,उसकी खुशी छलकी जा रही थी, उत्साहित होकर बोली,”देखो, बिलकुल नमन से मिलती है इसकी शक्ल।” वंदना धीरे से बोली,” पर आँखे और यह लुभावनी मुस्कान बिलकुल अपने दादा पर हैं।” निम्मी भी धीरे से बोली,”आप उनसे कितना प्रेम करती हो! मेरा प्रेम तो आपके आगे….”बीच में ही उसे रोक बोली वंदना,”पगली! प्रेम की क्या तुलना?” वंदना अब जल्दी थक जाती है, इसलिए गरिमा ने सहारा दे कर उसे लिटा दिया । फिर अपनी बङी माँ से बोली, ” माँ एक सवाल उठता है मन में पुछुँ?” वंदना धीरे से मुस्कराई। गरिमा की बोलने और सवाल करने की आदत से वह परिचित है।उसके सवाल शुरू हुए, “आप कैसे रुक पाई यहाँ? मेरी माँ और पापा को कैसे माफ किया? आप चली क्यों नहीं गई? यूँ ये सवाल अनुचित हैं, आप चली जाती तो आपका प्यार हमें कैसे मिलता? पर फिर सोचती हुँ,मेरे साथ ऐसा हो तो मैं कभी न रुकु अपनी ससुराल में।” “बस कर लङकी!कुछ भी बोलती है। भगवान न करें, तेरी किस्मत मेरे जैसी हो, पर हाँ यह प्रश्न कई बार अपने से करती हुँ, क्या मुझे चले जाना चाहिए था? फिर तुम सबका प्यार पाती हुँ, अपनी हरी-भरी फुलवारी देखती हुँ तो सभी दर्द भूल जाती हुँ और यह प्रश्न बेमानी लगता है।”

फिर आगे बोली, ” मैंने तो अपने जीवन के सुख दुख भोग लिए, पर अन्य किसी लङकी को ऐसा अपमान और दर्द सहने की सलाह नहीं दूँगी।” एकाएक उठी और गरिमा का हाथ पकङ पूछा,”कोई तकलीफ तो नहीं न बेटा? अपनी बङी माँ से कभी कुछ न छिपाना। मैं हमेशा तेरे साथ हुँ और हल्के से बोली, सिर्फ बेटी ही नहीं बहुओं के साथ भी हुँ, अब इस घर में किसी बहु-बेटी के साथ अनाचार न हो पाएगा।” आँखों से आँसु छलक आए, गरिमा ने उनके आँसु पोंछे और बोली, ” मै सुखी हुँ माँ, आप जैसी माँ पाकर कौन सुखी न होगा। वंदना ने सुख शांति की अनुभूति लेते हुए जीवन का सत् पा लिया था।