सीखने सिखाने की कोशिश से अभिप्राय है कि जब भी आप किसी को कुछ भी सिखाते हो तो आप भी कुछ सीखते हो। यह भी अवश्य सुना होगा कि ज्ञान बाँटने से ही बढ़ता है। मैं भी शिक्षिका इसीलिए बनी कि ज्ञान बाँटने की प्रक्रिया में मैं भी अपने अधूरे ज्ञान में वृद्धि कर सकू। शायद इसी कोशिश ने मुझे अध्यापिका बना दिया था।

परंतु बचपन में हर बच्चे की तरह मैं भी प्रतिदिन अपने विचार बदलती होंगी, बिलकुल ‘तोतोचान’ की नायिका की तरह जो सब्जी बेचने वाले से प्रभावित हो कर सब्जीवाली बनना चाहती तो कभी सफाईवाली बनना चाहती थी।

कई बार माता-पिता भी बच्चे के जन्म के साथ बच्चे का भविष्य निश्चित कर देते हैं कि उनका बच्चा बङे हो कर क्या बनेगा ? एक बार एक के.जी. कक्षा के विद्यार्थी के पिता अपने बेटे की प्रगति जानने के लिए मुझ से मिलने आए। मैं उसकी अध्यापिका उस बालक की प्रगति से संतुष्ट थी परंतु उसके पिता संतुष्ट नहीं हुए और नाराज़ होकर अपने पुत्र से बोले, “तुम नहीं पढ़ोगे तो बङे होकर पत्थर ढोने या चाय बेचने का काम करना होगा।” मैं यह सोच कर मन ही मन मुस्करा रही थी कि एक चार वर्षीय बच्चे के लिए यह दोनो ही काम दिलचस्प हो सकते हैं। मुझे यह समझ नहीं आ रहा था कि यह अपने चार वर्षीय बच्चे से एक अठारह वर्षीय युवक समझकर क्यों बात कर रहे है?

मैं शायद आरंभ से ही अध्यापिका बनना चाहती थी। मेरी प्राइमरी कक्षा की अध्यापिका ने मेरे गुणों को समझ लिया था तभी जब कक्षा के कुछ विद्यार्थी कोई कार्य नहीं कर पाते थे तब उन्हें उस काम को सिखाने की जिम्मेदारी मुझे दे दी जाती थी।

सबसे अच्छी तरह जो याद है वो है डाॅक्टर बनने का सपना जो बहुत मन से देखा व जिया भी था। लेकिन जब गरीब मज़दूर बच्चों को काम करते देखती या जो नहीं करते उन्हें यूँ ही मिट्टी में डोलते देखती तो दुःख होता कि ये बच्चे क्यों पढ़ नहीं सकते हैं। पर अभी भी बहुत करुण स्थिति है कि आज भी हमें सङक पर भीख मांगते, काम करते बच्चे दिखते है जो स्कूल या पढ़ाई के विषय में कुछ नहीं जानते हैं। इन्ही बच्चों को पढ़ाने के विचार ने मेरे मन में अध्यापिका बनने के ख्याल को जन्म दिया था। पर आज मैं दुख के साथ कह सकती हुँ कि मैं इसमें कामयाब नहीं हो सकी हुँ । अलबत्ता अपने 35 वर्ष के अध्यापन कार्यकाल में कोशिश रही कि मैं गरीब बच्चों को भी शिक्षित करुँ।

आज मेरे मन में इच्छा जागी कि मैं अपनी शिक्षिका के रुप में प्राप्त अनुभवों की चर्चा करते हुए, देश की शिक्षण पद्धति और बच्चों व अभिभावकों के मनोविज्ञान को भी समझने का प्रयास करूँ।

सर्वप्रथम जो मेरा विद्यार्थी था वह मेरा पांचवी कक्षा का सहपाठी आकाश था, मेरी अध्यापिका ने पढ़ाई में व शारीरिक रूप से कमज़ोर आकाश की सहायता करने की जिम्मेदारी मुझे क्यों सौंपी, इसका मुझे ज्ञान नहीं है। आकाश को नज़र बहुत कम आता था, इसी कारण वह पढ़ाई में पिछङ गया था। वह बुद्धु बालक नहीं था, पर पढ़ाई में कमज़ोर होने के कारण उसकी सहज चंचलता कहीं दब गई थी। पढ़ाई में पिछङने में उसका कोई दोष नहीं था।

मैं जब अपनी एन.टी.टी की पढ़ाई कर रही थी, तब मैंने दो गरीब बच्चों को पढ़ाया था। मेरे पिताजी का कहना था कि विद्या दान के लिए है व जब आप किसी को पढ़ाते हो तो स्वयं भी ज्ञान पाते हो, अतः घर में ट्यूशन पढ़ाओ तो फीस मत लो।
परंतु मेरा तर्क था कि इन बच्चों व इनके अभिभावकों को शिक्षा का महत्व नहीं पता हैं, इन बालकों को नियमित बुलाने के लिए फीस लेनी आवश्यक है। मैंने उनसे बहुत कम फीस ली थी। ऐसा नहीं कि ये लोग इतनी कम फीस नहीं दे सकते हैं अपितु सही कारण यही है कि शिक्षा उनकी प्राथमिकता नहीं होती है।

सरकारी विद्यालयों में अधिकांशतः गरीब तबकों के बच्चें पढ़ने आते हैं, जिनकी पढ़ाई पर इनके घर पर ध्यान देने वाला कोई नहीं होता है। इनके माता- पिता इन्हें पढ़ने तो स्कूल भेज देते हैं, पर वे बच्चों में पढ़ाई की रुचि पैदा नहीं कर पाते है और हमारे सरकारी विद्यालयों में इन बच्चों में शिक्षा के प्रति रुचि बनी रहे ऐसी कोई शिक्षण पद्धति विकसित नहीं की गई है।

जब से यह शिक्षा नीति बनी है कि आठवीं कक्षा तक किसी विद्यार्थी को फेल नहीं किया जा सकता है, तब से पढ़ाई में कमज़ोर से कमज़ोर विद्यार्थी आठवीं पास का सार्टिफिकेट प्राप्त कर लेता है। दुःख की बात है कि उन्हें पहली कक्षा की पढ़ाई भी नहीं आती है। ये विद्यार्थी अपनी भाषा में भी लिखकर अपने भाव प्रकट नहीं कर पाते हैं। यह खुशी की बात है कि सरकारी नीति में परिवर्तन आ रहा है।

परिस्थितिवश मैंने विद्यालयों में शिक्षण कम किया था, परंतु ट्युशन के माध्यम से मैं शिक्षण से जूङी रही थी और बच्चों के गुणों और मन को समझने में कुछ सफल रही हुँ।

शादी के बाद जब ट्युशन कार्य करना आरंभ किया था, तब मेरे सर्वप्रथम विद्यार्थी थे, दो भाई परेश व उमेश । ट्युशन में विद्यार्थी का सीधा संपर्क अपने अध्यापक/ अध्यापिका से होता है। कई बार उनका सबंध इतना गहरा बन जाता हैं कि विद्यार्थी अपना मन पूर्णतः अध्यापक के सामने खोल देता है। अध्यापक के लिए उसके मन और दिमाग को समझने में सहायता मिलती है।

परेश तीसरी कक्षा का विद्यार्थी था, वह बहुत शैतान था, पर दिमाग का तेज था ।पढ़ने में उसका मन नहीं लगता था। उमेश शरारती था पर उसे पढ़ना पसंद था अतः कुदरती वह पढ़ने में मन लगाता था।

आप सोच सकते हैं कि दोनो बालकों के लिए शैतान व शरारती दो अलग-अलग शब्दों का प्रयोग क्यों किया गया है? मेरे विचार से शैतान बच्चा एक उद्दंडी बच्चा होता है जिसे संभालना बङों के लिए कठिन कार्य होता है। इनका दिमाग बहुत तेज़ी से न केवल चलता है अपितु खुरापाती कार्यों पर अधिक चलता है, क्योंकि ये अतिरिक्त बहादुर होते हैं, इसीलिए दूसरों के अनुभवों से अधिक अपने अनुभवों पर भरोसा करते हुए नए-नए प्रयोग करने में झिझकते नहीं है। तभी इनकी एकाग्रता पढ़ाई में नहीं लगकर अपितु ऐसे कार्यों में अधिक लगती है जिसमें उनकी शारीरिक व बौद्धिक क्षमता का एकसाथ उपयोग हो। इन बच्चों की विशेष योग्यता को अगर सही समझ कर प्रशिक्षित किया जाए तो यह सही मंजिल पा जाते हैं।

इन बालकों की देखभाल करते हुए, इनके अभिभावकों को अतिरिक्त सावधानी बरतनी पङती है। परेश एक शैतान बच्चा था, इसीलिए उसकी माँ से अधिक उसके पिता का उस पर नियंत्रण था, परंतु पिता के पास सिर्फ एक ही उपाय था, उस पर बेहद गुस्सा करना या उसकी पिटाई कर देना। पिता के ऐसे नियंत्रण से वह अधिक जिद्दी ही बन सका था। यह भी पाया गया है कि ये बच्चे भावुक भी होते है। अपने से अधिक उमेश को प्रशंसा मिलने से उसमें गुस्सा भी बढ़ रहा था। फिर भी वह अपने छोटे भाई और माता-पिता के प्रति बेहद संवेदनशील भी था। उसे उसकी चुस्ती-फुर्ती और तकनीकी कार्यों में अतिरिक्त कौशलता दिखाने के लिए प्रशंसा भी मिलती थी, इसीलिए परेश अपनी इस योग्यता को प्रदर्शित करने का कोई अवसर नहीं छोङता था, विशेषतः जब उसके पिता कोई तकनीकी काम करते थे।

सभी बच्चें शरारती होते ही है, खेलने, कूदने और मस्ती करने में, सभी बच्चों को मज़ा आता है। अपितु यदि बच्चा शरारती नहीं है, तब यह एक समस्या है। शैतान या शरारती होना समस्या नहीं है।

उमेश चूंकि शरारती था और उसको एकाग्रता बनाने में कोई प्रयास नहीं करने पङते थे। अतः अपनी पढ़ाई ध्यानपूर्वक कर लेता था। वह पढ़ाई में रूचि भी लेता था व उसे समझ थी कि पढ़ाई पूरी किए बिना उसे खेलने को नहीं मिलेगा। उसे खेल का मैंदान और खेल स्पष्ट नज़र आते थे। वह बिना जल्दबाज़ी करें, पढ़ाई ठीक से पूरी कर खेल के लिए दौङ पङता था।

ऐसे बच्चे थोङे डरपोक भी होते है, इन्हें थोङा डर दिखाकर शांत बिठाया जा सकता है । ये बच्चे अपने बङो को नाराज़ नहीं करना चाहते हैं। इनकी एकाग्रता अच्छी होती है अतः इनकी पसंद के विषय में इन्हें प्रशिक्षित करना आसान होता है।

इन दोनों भाईयों की विशेषताओं के अंतर को दर्शाने के लिए मैंने शैतान व शरारती बच्चों का वर्गीकरण किया है। यूँ मेरे विचार में प्रत्येक बच्चा अनोखा है उसमें अपनी अलग खूबियाँ होती है।