उस समय(1985) वही विद्यार्थी टयूशन पढ़ते थे, जो पढ़ाई में कमज़ोर होते थे , पर आज होशियार विद्यार्थी भी ट्यूशन पढ़ता है , अधिक से अधिक नंबर प्राप्त करने के लिए, वह अपनी पढ़ाई में कोई कमी नहीं छोङना चाहता है।

रजनी हमारे पङोस में रहती थी, जब मेरे पास पढ़ने आई तब वह दूसरी कक्षा में पढ़ती थी।रजनी से बङी एक बहन और एक बङा भाई था। दोनो भाई- बहन से रजनी बहुत छोटी थी। घर की सबसे छोटी सदस्या होने के कारण उसे अपने सभी बङों का कोप भाजन बनना पङता था। इसका अभिप्राय यह नहीं है कि उसे उसका परिवार प्रेम नहीं करता था। प्यार का सबंध, व्यक्ति के व्यवहार के साथ नहीं होता है। रजनी की माँ किन्हीं परिस्थितिवश बहुत चिङचिङी हो गई थी। परंतु अपने जीवन के कष्टों की झल्लाहट वह अपनी बङी पुत्री अथवा पुत्र पर नहीं निकालती थी। कारण यही रहा होगा कि 18 वर्षीय पुत्री पहली संतान थी, इसीलिए इस पुत्री पर प्रेम अधिक था।और आमतौर पर पुत्र पर माताओं का प्रेम विशेष छलकता है। फिर ये दोनो संतानें उस आयु तक पहुँच गई थी कि वे अब उसकी मददगार बन गई थी, अतः उन पर खिझाहट निकालने का प्रश्न ही नहीं था।

रजनी मात्र आठ वर्ष की थी । और माँ की सबसे छोटी संतान होने के बावजूद, वह अप्रत्यक्ष रूप से माँ के दुःखों का कारण बन गई थी। माँ स्वयं रजनी पर अपना गुस्सा निकालती तो ठीक होता पर माँ रजनी की हर छोटी गलती पर उसे उसके भाई के सामने कर देती थी । 15 वर्षीय बङा भाई रजनी से बङा था पर इतना समझदार नहीं हो सकता था कि उसे एक आठ वर्षीय बच्ची से व्यवहार करने का ज्ञान हो, वह सिर्फ अपनी ताकत का ही प्रयोग कर सकता था। (घर के लङकों को परिवार की समस्त छोटी-बङी बहनों का अभिभावक बनाने की परंपरा पाई जाती है।)। इसक अभिप्राय यह नहीं कि वह चुपचाप सहती थी। भाई से मार खाने पर वह पूरी ताकत से विद्रोह करती तथा शोर मचाती थी।

रजनी के पिता शहर से बाहर नौकरी करते थे, जब कभी वह आते वे रजनी के सुखद दिन होते थे। अन्यथा प्रतिदिन ही उसके रोने की आवाज़े सुनाई देती थी, उसकी माँ ने कहा था, कि रजनी बहुत जिद्दी है, पर अपने पिता से डरती है। मुझे लगा कि घर के स्वामी के आने से परिवार में सभी खुश रहते होंगे, उन दिनों माँ अपने दुःख भूल जाती होगी व बङे भाई-बहन कुछ दिन के लिए उस पर रौब गाँठने के अपने अधिकार को एक तरफ रख देते होंगे और इस खुशनुमा माहौल में रजनी भी प्रसन्न ही रहेगी। वैसे भी वह खुशदिल बच्ची थी।
जब तक मै उनके पङोस में रही, तब तक वह मुझ से पढ़ी थी । रजनी हमेशा हँसती रहती थी, बातुनी रजनी मुझे अपनी सहेलियों और स्कूल के बारे में बताती थी। पढ़ना उसे मुसीबत लगता था , परिवार के सदस्यों के व्यवहार का प्रभाव उसके मस्तिष्क पर पङ रहा था। पढ़ाई में वह कम दिमाग लगाती थी, उसे सवाल समझाने के लिए मैं उसे दैनिक जीवन के उदाहरण देती थी। पाठ याद करना उसे पसंद नहीं था । हमारे देश की शिक्षा की रटन पद्धति उसके अनुकुल नहीं थी। मैं उसे पाठ कहानी की तरह समझाती थी व स्वयं उत्तर खोजने और लिखने के लिए प्रोत्साहित करती। थी।

अधिकांशतः अभिभावक अपने कष्टों और परिस्थितियों का बोझ अंजाने ही अपने बच्चों पर डाल रहे होते हैं। जिसका प्रभाव बच्चे के संपूर्ण विकास पर पङता है।

1997 में मैंने एक प्री नर्सरी विद्यालय में अध्यापन कार्य किया था। प्री नर्सरी का उद्देश्य 2+ आयु के बच्चों को घर से बाहर रहने व स्कूली माहौल के लिए अभ्यस्त करना होता है। उस समय प्रतिष्ठित विद्यालयों में प्रवेश के लिए विद्यार्थी का साक्षात्कार होता था, उस साक्षात्कार के आधार पर मैरिट लिस्ट बनती थी, उसमें विद्यार्थी का नाम होने पर ही प्रवेश मिलता था। प्री-नर्सरी में इन छोटे बच्चों को साक्षात्कार के लिए निपुण बनाने का प्रयास किया जाता था। मैंने इस विद्यालय में छोटे बच्चों को पढ़ाने की नई तकनीके सीखी थीं।
सभी अभिभावक अपने बच्चों को अपनी पसंद के विद्यालय में प्रवेश कराने के लिए बहुत चिन्तिंत होते थे और उसका दबाव वे इन नन्हें मासूमों पर डालते थे । अगर बच्चा उस प्रवेश प्रक्रिया में असफल रहता तो उसके अभिभावक निराश हो जाते कि उनका बच्चा प्रतिभाशाली नहीं है। दुःख इस बात का था कि अभिभावक अपनी प्रतिभा पर दृष्टि भी नहीं डालते और अपनी असफलताओं के लिए अपनी परिस्थितियों को दोष देते हैं। इन सबसे उत्पन्न कुंठाए अपने बच्चों पर बरसाते है। परंतु अगर माता-पिता प्रतिभाशाली रहे हो और इनके बच्चे असफल हो जाए तो मानो इन पर दुःखों का पहाङ ही टूट जाता है।

जब बच्चों का किसी प्रतिष्ठित विद्यालय में प्रवेश नहीं हो पाता था तो अभिभावक दान रूपी रिश्वत देने को तैयार रहते थे। एक बात और अज़ीब सामने आई थी। एक बच्चे की माँ ने बताया कि अपने बच्चे के विद्यालय की प्रवेश प्रक्रिया में अभिभावकों के साक्षात्कार के दौरान बच्चे की माँ जो एक नौकरी पेशा महिला थी से प्रश्न किया गया था कि ” आप चूंकि नौकरी करती हैं तो बच्चे की पढ़ाई पर कैसे ध्यान दे सकेंगी?” यह प्रश्न बच्चे के पिता से क्यों नहीं किया गया था? प्रश्नकर्ता विद्यालय की प्रधानाचार्या और अध्यापिका थीं।( वे भी नौकरीपेशा महिलाएँ थीं)।

एक अन्य प्रश्न अभिभावकों से किया जाता था, यदि वे अंग्रेजी बोलने में कमज़ोर होते थे, कि “आप अपने बच्चे को घर में अंग्रेजी बोलने का माहौल कैसे दे पाएँगे?” जबकि अभिभावक शिक्षित थे।

आज प्रवेश प्रक्रिया के दौरान बच्चों का साक्षात्कार बंद हो गया है। यह अच्छी बात है कि अब शिक्षण पद्धति में बदलाव लाने के प्रयास हो रहे हैं।