कुछ समय बाद मैंने एक अन्य विद्यालय में पढ़ाना शुरू किया था। इस विद्यालय में मुझे L.K.G कक्षा पढ़ाने को मिली थी। एक कक्षा में 45 विद्यार्थी थे । यहाँ भी सिलेबस का बोझ अध्यापिका और विद्यार्थियों दोनो पर था। इस कक्षा में 4वर्ष से 5वर्ष की आयु तक के बच्चे पढ़ते थे। आरम्भ में एक सप्ताह मैंने उस कक्षा की पुर्व अध्यापिका के साथ पढ़ाया था।

बच्चें अपनी अध्यापिका से बहुत गहरे जुङे होते हैं, विशेष रुप से छोटी कक्षाओं के बच्चे घर से बाहर विद्यालय के वातावरण में अपनी अध्यापिका के सानिध्य में सुरक्षित महसूस करते हैं। अपनी अध्यापिका से बिछोह उनके लिए कष्टदायी होता है। इस कक्षा की भी ज्योति मैडम विद्यालय छोङकर जा रही थीं, जिसका दुख सभी बच्चों को था और वे सभी मुझे संदिग्ध दृष्टि से देख रहे थे।

कुछ ही दिनों में कक्षा के सभी विद्यार्थी मेरे अभ्यस्त हो गए थे। लेकिन चारू मुझे स्वीकार नहीं करना चाहती थी। ज्योति मैडम के सामने ही यह महसूस हो गया था कि वह भावनात्मक रुप से उनसे बहुत जुङी हुई है। इस बात को स्वयं ज्योति मैडम ने भी स्वीकार किया था कि चारू का उनसे विशेष लगाव है।

ज्योति मैडम के जाने के बाद वह बहुत उदास व चुप रहती थी। वह मुझ पर विश्वास करना नहीं चाहती थी। वह बहुत अनमनेपन से कक्षा में होने वाले कार्यकलापों में भाग लेती थी। मैंने शुरू में उससे बिना उसकी इच्छा के बात करना उचित नहीं समझा व उसकी गलतियों को अनदेखा भी किया। मुझे खुशी हुई जब उसकी माँ मुझ से मिलने आई क्योंकि कई बार अभिभावक अपने बच्चों के मानसिक तनाव को समझ नहीं पाते हैं।

मैंने उनसे कहा,” चारु पढ़ाई तो सीख ही लेगी, परंतु अभी आवश्यक है कि उसे भावनात्मक रुप से मज़बूत किया जाए।” हमें समझना चाहिए कि बच्चों के भी अपने मानसिक कष्ट हो सकते है।
जिनसे हम अधिक जुङाव महसूस करते हैं कभी हम उनसे दूर भी होते है। ऐसी व्यवहारिक बातें भी सीखनी आवश्यक होती है। मुझे खुशी हुई कि घर व विद्यालय में अनुकुल वातावरण मिलने से वह थोङे समय पश्चात अपनी स्वाभाविक चंचलता को पा सकी थी।

इसी कक्षा में नेहा के लिए सीधी लाइनों में लिखना कठिन था। उसे अक्षरों की पहचान व बनावट का ज्ञान था पर काॅपी में लिखते समय लाइनें उसे समझ नहीं आती थी। वह प्रार्थना के समय, अपनी पंक्ति से बाहर आ जाती थी व आँखे बंद करे उल्टी घूम जाती थी, उसके कारण पंक्ति बिगङ जाती थी। वह यह शरारत में नहीं करती थी, अपितु उससे अनजाने में यह होता था, क्योंकि वह सीधी पंक्ति समझ नही पाती थी। इसकी एकमात्र वज़ह थी कि कोई बच्चा देर से बोलना सीखता है अथवा किसी बच्चे को रंगों का भेद समझने में कठिनाई होती है। इन बच्चों पर गुस्सा करना गलत है।

मैं नहीं चाहती थी कि नेहा के आत्मविश्वास में कमी आए, जबकि वह स्वयं जानती थी कि उससे गङबङी होती है । हम अक्सर यह सोचते हैं कि बच्चे अपने इस अलग गुण को समझ नहीं पा रहे हैं, पर सच है कि बच्चों को भिन्नता का अहसास होता है, हमें उनके अहसास को सकारात्मक मोङ देना होता है, हमारी थोङी नकारात्मकता उसके आत्मविश्वास को सोख सकती हैं। यहाँ भी खुशी है कि नेहा की माँ ने मेरे सुझावों को समझा व उस पर काम किया जिसके अनुकुल परिणाम प्राप्त हुए थे। मेरी सलाह पर वह उसे खेल -खेल में वस्तुएँ पंक्ति में रखना सिखाती और कक्षा में भी उसको काॅपी में लिखाते समय विशेष ध्यान कराते व ऐसे खेल खेले जाते जिससे सभी बच्चों की शारीरिक व मानसिक क्षमता का विकास हो ।

इस विद्यालय में पढ़ाते हुए, मुझ से गलती हुई, उसका जिक्र मैं अवश्य करना चाहुँगी। मैं अपनी L.K.G कक्षा के सभी बच्चों को अक्षर ज्ञान कराने में सफल हो रही थी पर एक विद्यार्थी मुकुल के सामने मै असफल थी। कारण सिर्फ मेरी लापरवाही ।

मुकुल अक्सर अनुपस्थित रहता था व बहुत शैतान था। उसके माता-पिता शिक्षित नहीं थे, वे कभी उसकी प्रगति जानने के लिए मुझ से मिलने नहीं आते थे। (यह तथ्य बहुत महत्वपूर्ण रहा होगा उसके प्रति मेरी लापरवाही के लिए) मैं उसकी प्रगति नहीं होने से क्षुब्ध तो थी, पर कोई कोशिश नहीं कर रही थी। मैंने यह धारणा बना ली थी कि उसकी कक्षा में कम उपस्थिति ही उसका कक्षा में पिछङने का कारण है। अतः उसके उपस्थित होने पर भी मैं उसकी कमियों को दूर करने का विशेष प्रयास नही करती थी। जब इसके लिए मुख्याध्यापिका ने आगाह किया तब ही मैं सचेत हुई थी।

एक अध्यापिका को लापरवाह नहीं होना चाहिए। जबकि यह ज्ञात था कि यह छोटी कक्षा बच्चों के मानसिक विकास की नींव होती है । मैंने अपनी अध्यापिका की भूमिका को निभाने की प्रक्रिया को और गहराई से समझा था।