कुछ समय बाद मैंने अपना एक छोटा विद्यालय खोलने का फैसला लिया । ‘Rose Garden Pre Nursery School’ का बोर्ड बन गया और मेरा विद्यालय शुरू हुआ, पर बिना विद्यार्थियों के कैसा विद्यालय?

हमने यथासंभव प्रचार किया था और मैं नित विद्यार्थियों की प्रतीक्षा करती, पुछताछ करने तो लोग आते पर अभी दाखिले नहीं हो रहे थे। ईश्वरीय कृपा से यह इंतज़ार खत्म हुआ, जब समीप के एक छोटे विद्यालय की प्रबंधक मुझे मिलने आई और कहा कि किन्हीं कारणवश उन्हें अपना विद्यालय बंद करना पङेगा । उन्होने अपने विद्यालय का फर्नीचर हमे बेच दिया । सत्र का आरम्भ ही था अतः उनके पास सिर्फ पाँच विद्यार्थी थे, वे सब मेरे पास आ गए थे। अब मैंने पाँच विद्यार्थी और एक आया ऊषा के साथ अपना प्री-नर्सरी विद्यालय शुरू किया था ।

मेरा पहला स्वतंत्र कार्य और अपनी रचनात्मकता व कार्यक्षमता को परखने व निखारने का यह मेरा प्रथम स्वावलंबी कदम था। अभी तक दूसरे के आधीन व निर्देशानुसार कार्य किया था । इन मासूमों के कोमल मन को समझते हुए, इन्हें दूनियावी नियमों के अनुकुल ढलना सिखाना था । लेकिन वास्तविकता में इन बच्चों ने मुझ से मेरा परिचय कराया था। यह पाँच बच्चे मेरे अन्वेषण के आधारस्तंभ थे।

सोमी, चंचल, अभिषेक, पीयूष और गीतांजलि के साथ मेरी नित सीखने-सिखाने की प्रक्रिया मुझे एक नया पाठ पढ़ा जाती थी।
पीयूष बहुत ही होशियार और आत्मविश्वासी बच्चा था। प्रत्येक नया पाठ अथवा खेल उसकी जिज्ञासु बुद्धि को तुरंत जागृत करता था।ऐसे बच्चे कम होते हैं जो हर कार्य पूर्ण मनोयोग से करते हो और शीघ्रता से सीखते हो ।

चंचल गोलु-सी प्यारी बच्ची थी।रंगों की पहचान उसने इतनी बारिकी से समझी थी कि तीन वर्ष की उस आयु में भी चित्र में रंग भरते समय उसके रंगों का चुनाव देखते बनता था। इस आयु में आकृतियाँ बनाना आसान नहीं होता पर चंचल बहुत आसानी से सीख जाती और फिर बहुत तन्मयता से उसमें रंग भरती थी। कुछ साल बाद उसके पिताजी मिले थे, बहुत खुशी के साथ उन्होने जानकारी दी थी कि चंचल चित्रकारी में इनाम जीतती रहती है।

सोमी एक सरदार परिवार की बेटी थी, आरंभ में सिर्फ पंजाबी बोलती थी, उसकी पंजाबी मेरी समझ के बाहर थी। ऊषा ही बताती कि वह क्या बोल रही है? सोमी जब कक्षा में प्रवेश करती तब ही लगता जैसे वह नृत्य करती हुई चल रही हो। उसे नृत्य करना, कविता व poem बोलना बहुत पसंद था।धीरे-धीरे वह इंगलिश और हिन्दी बोलने व समझने लगी थी।

गीतांजलि बहुत चुप रहती थी। वह स्वयं अभी साढ़े तीन वर्ष की थी और उससे छोटे एक बहन और भाई भी थे। वह घर की बङी बेटी बनने से बङप्पन के दबाव में थी। सोमी और चंचल कक्षा में आते ही मुझ से बोलना शुरू कर देते थे। कई बार तो वे अपनी बातें बताने के लिए बहुत ही बेताब होती थीं। इसके विपरीत गीतांजलि से बात करने के लिए मुझे कोशिश करनी होती थी, कोई भी कहानी व कविता सुनाते समय उस पर विशेष ध्यान देना होता था। वैसे गीतांजलि सब बहुत शीघ्रता से सीख लेती थी। उसे कक्षा में आनंद आने लगा था पर वह पहल कम करती थी । बाद में धीरे से वह अपनी बात मुझ से कहने लगी थी।

अभिषेक इन सभी बच्चों में सबसे बङा था उसकी आयु 5 वर्ष थी। उसे बोलने में परेशानी थी, उसकी स्पीच थैरेपी चल रही थी। इसी कारण अभी वह किसी विद्यालय में पढ्ने नहीं जाता था। पर उसे शब्द ज्ञान था। वह कोशिश करता और किताबों में से कहानी कविता पढ़ कर सुनाता था। सभी बच्चे उसकी बात (जो कठिनाई से समझ आती थी) बहुत ध्यान और धीरज से सुनते थे।सभी बच्चे अभिषेक को प्यार करते थे।

धीरे-धीरे नए विद्यार्थियों का आना शुरू हुआ, मेरी कक्षा भरने लगी थी। बाद में मैंने अपनी सहायता के लिए दो अन्य अध्यापिकाएँ रखी थी। प्री नर्सरी स्कूल में विद्यार्थी सिर्फ एक वर्ष के लिए प्रवेश लेते हैं, एक वर्ष बाद उनका एडमिशन बङे विद्यालयों में हो जाता है। हमारे पास नए विद्यार्थी आते उन्हें दूनियावी वातावरण के अनुकुल अभ्यस्त करते हुए हम भी कुछ नया सीखते जाते थे।

मुझे अपने इस छोटे विद्यालय में बहुत आनंद आता था। बच्चों के साथ नई-नई गतिविधियाँ करते, उन्हें तरह-तरह के खेल खिलाते थे । मैंने प्रत्येक शनिवार खेल का दिन रखा था, उस दिन हम मैंदान में खेलने वाले खेल ही खेलते थे।उन्हें दौङ प्रतियोगिता में आनंद आता था। गेंद से भी कई खेल खेलते थे। म्यूजिकल चेयर खेलने में सभी बच्चे आनंद लेते थे।

इसके अतिरिक्त उनकी कविताओं और कहानियों पर हम उनसे अभिनय कराते थे। सभी बच्चें उसमे भाग लेते थे, समूह में भी भागीदारी होती व व्यक्तिगत तौर पर भी प्रत्येक बच्चा कुछ न कुछ अभिनय अवश्य करता था। हमारा उद्देश्य उनके संकोच को दूर करना होता था व उनकी वाकशक्ति को स्पष्ट करना व बढ़ावा देना होता था।

कहानी, कविता के अतिरिक्त हम उन्हें उनके आसपास के लोगो का अभिनय करने के लिए प्रेरित करते थे। उनकी कल्पना शक्ति लाजवाब होती थी। उन्हें हम संवाद नहीं देते थे वे स्वयं अपने सीमित शब्द भंडार से चुन कर संवादों की गढ़ना करते थे। अपने आसपास के परिवेश से जो भी सीखा व समझा था, वे खुल कर सामने आता था। कुछ बच्चे संकोची होते है उन्हें खुलने में समय लगता था पर कुछ का अभिनय देखकर व संवाद सुनकर हम दाँतों तले ऊँगली दबा लेते थे।

कुछ बच्चें स्वाभाविक ही वाचाल और खुले होते है, पर ऐसे बच्चें भी होतें जिनका स्वभाव शर्मीला और संकोची होते है। उन्हें अगर शुरु से प्रोत्साहन मिले तो वे भी खुल सकेंगे और अपने को अभिव्यक्त करने में झिझकेंगे नहीं, कम बोलना किसी का चुनाव हो सकता है, पर सबको आत्मविश्वासी होना आवश्यक है।

यह सच है कि पुत के पाँव पालने में नज़र आते हैं, हम चाहे तो उनकी प्रतिभा को परख कर उन्हें निखारने का प्रयास कर सकते हैं।पारस, संदीप, कनिका व वंशिका का अभिनय के प्रति रूझान स्पष्ट नज़र आता था। चंचल, पीयूष, कुणिका व देवेन्द्र के चित्र प्रभावशाली होते थे तो वीणा, महक, सोमी की नृत्य के साथ भावभंगिमा बहुत दिल मोहने वाली थी।

यूँ तो सभी बच्चे खेलों में रुचि रखते हैं, पर कई आरम्भ से ही सराहनीय प्रदर्शन कर हमारा ध्यान आकृषित कर लेते हैं।

खेलों के प्रति रूझान के विषय में यह ध्यान देने योग्य बात है कि प्रत्येक बच्चा न केवल खेलना पसंद करता है बल्कि वह किसी न किसी खेल में विशेष रूझान रखता है अतः प्रत्येक बच्चे को न केवल खेलने दिया जाए अपितु उसे उसकी पसंद व प्रतिभा के अनुकुल खेल में प्रशिक्षित भी किया जाना चाहिए।