हम अपने जीवन से हर पल कुछ सीख रहें होते हैं।समय आगे चलता जाता है, उसके साथ हमारा जीवन भी बढ़ता जाता है इसीलिए कहते है कि इस जीवन सफर में अतीत के पीछे न भाग कर आज पर ध्यान देते हुए भविष्य की ओर बढ़ते चलना चाहिए।

किन्हीं परिस्थितियों वश हमें अपना यह स्कूल बंद करना पङा था। उस समय बुरा लगा था, पर धीरे-धीरे समझ आया कि परिस्थितियाँ भी हमें आगे बढ़ने, कुछ नया सीखने की प्रेरणा देने के लिए आती हैं।

मैंने अपना ट्यूशन कार्य कभी बंद नहीं किया था, जब स्कूल चल रहा था तब भी शाम को मेरे पास बच्चे ट्यूशन पढ़ने आते थे और यह कार्य मैं निरंतर आज तक कर रही हुँ। मैं अपने ट्यूशन कार्य के विषय में अपने अगले भागों में लिखूँगी, क्योंकि ट्यूशन के बच्चे तो जैसे मेरे घर के सदस्य हैं । वे तो मेरे घर आकर मुझे नित नया पाठ सीखा जाते हैं।
मैंने उसके बाद एक प्रतिष्ठित स्कूल में काम किया था। उस विद्यालय के अपने अनुभवों के विषय में लिखने से पूर्व मैं कक्षा प्रथम के पाठ्यक्रम की विस्तार से विवेचना करने जा रही हुँ।

मैं यहाँ प्राइवेट स्कूल(अंग्रेजी माध्यम) के प्रथम कक्षा के विषयों की ही बात करूँगी। इसलिए भी कि लोगों का अमीर या गरीब सबका सरकारी विद्यालयों पर से विश्वास उठा हुआ है, उनकी भरसक कोशिश रहती है कि उनका बच्चा अंग्रेजी माध्यम के स्कूल में पढ़े।जिस कारण शहरों में अंग्रजी माध्यम के प्राइवेट स्कूल बहुत मिलेंगे और कई गाँवों में भी ऐसे प्राइवेट स्कूल मिल जाते हैं।

यहाँ प्रथम कक्षा में हिन्दी व अंग्रेजी दो भाषाएँ पढ़ाई जाती हैं, गणित के अतिरिक्त पर्यावरण संबधी(E.V.S) व सामान्य ज्ञान (G.K) भी पढ़ाए जाते है।
नर्सरी से कक्षा प्रथम तक बेसिक भाषा सीखा दी जाती है। भाषाओं का अक्षर ज्ञान व शब्द ज्ञान भली-भांति सीखने से ही आगे की कक्षाओं में लाभ होता है। चूंकि पढ़ाई का माध्यम अंग्रेजी हैं, तो यह आवश्यक है कि अंग्रेजी भाषा के शब्द निर्माण व वाक्य- विन्यास उन्हें समझ आए और वह उसमें निपुण हो जाएं। उन्हें दोनों भाषाओं के व्याकरण का बेसिक ज्ञान देना आवश्यक है।

यह खुशी की बात है कि किताबें बहुत अच्छी व ध्यान पूर्वक लिखी गई हैं, परंतु विद्यालयों में पाठ्यक्रम निबटाने की जल्दी होती हैं। यह समझे बिना कि कक्षा के प्रत्येक विद्यार्थी ने पाठ ग्रहण किया है या नहीं, अध्यापक अगला पाठ आरम्भ कर देते हैं। ऐसे लगता है कि जैसे वे किसी काॅलेज में सिर्फ लेक्चर देने जाते हों।

मेरे विचार से भाषा को मात्र एक विषय न समझ कर उसे शिक्षा के विटामिन समझा जाना आवश्यक है। जैसे अच्छे स्वास्थ्य के लिए विटामिन आवश्यक है।वैसे शिक्षा के लिए भाषा आवश्यक है। अगर कोई विद्यार्थी पढ़-लिख कर भी अपने को किसी भी भाषा में लिख कर व्यक्त नहीं कर सकता तो इससे अधिक दुःख की बात क्या हो सकती है। भाषा ही तो अभिव्यक्ति का साधन है।

अंग्रेजी तो विदेशी भाषा है जो हमारे देश के परिवारों में बोली नहीं जाती है, अतः विद्यार्थी को कठिनाई हो सकती है। परंतु ऐसा होना नहीं चाहिए क्योंकि विद्यार्थी नर्सरी कक्षा से इंगलिश पढ़ता है अर्थात 3-4 वर्ष की आयु से भाषा सीखता है, यह वह आयु होती है जब बालक आसानी से भाषाएँ सीख सकता है। परंतु अधिकांश विद्यालयों में भाषाएँ भी इतनी जल्दबाजी में पढ़ाई जाती है कि एक बच्चा छोटे वाक्य बनाना सीख नहीं पाता है और बङे वाक्य कक्षा में सिखाने शुरू कर दिए जाते हैं।

हिन्दी भाषा सीखने में भी बङी कठिनाई आती है। हिन्दी भाषायी प्रदेशों में जहाँ प्रत्येक घर की भाषा हिन्दी होती है, वहाँ भी एक शब्द के उच्चारण व लहजे में भिन्नता पाई जाती है। बच्चे घर में जो बोली बोलते हैं वह स्कूल में नहीं सिखाई जाएगी यहाँ वह भाषा सीखते हैं, अतः अध्यापक का कर्तव्य है कि वह शब्दों का सही उच्चारण व प्रत्येक शब्द का प्रयोग करना अपने विद्यार्थियों को सिखाएँ।

परंतु अध्यापक बहुत जल्दी में होते हैं। कारण पाठ्यक्रम में दो अन्य विषय भी होते है-E.V.S &G.K. इन अतिरिक्त विषयों की किताबों और दिए हुए ज्ञान में कोई परेशानी नहीं है। यह आवश्यक भी है कि विद्यार्थियों को पर्यावरण संबधी व सामान्य ज्ञान मिलना चाहिए। लेकिन क्या यह दोनो विषय एक नहीं हो सकते हैं?

परंतु इन विषयों के पाठों को न केवल पढ़ाया जाता है, अपितु उनके प्रश्न- उत्तर लिखाए जाते हैं, रटाए जाते हैं और फिर उनकी परीक्षा भी ली जाती है। परीक्षा क्यों? अभी विद्यार्थी भाषा की कक्षा में छोटे शब्दों और वाक्यों को ही बनाना लिखना सीख सका है। पर इन विषयों के बङे-बङे शब्दो का उसे न केवल उच्चारण सीखना है अपितु उसकी spelling भी समझनी हैं, रटनी है और फिर परीक्षा भी देनी है।

हम उन्हें इन विषयों का ज्ञान, चर्चा द्वारा, कहानी और चित्रों द्वारा भी दे सकते हैं ।छोटी-छोटी टेली फिल्मस के माध्यम से भी सिखाया जाता है, आजकल स्कूलों में स्मार्ट क्लास में इसी विधि से पढ़ाया जाता है।अगर संभव हो तो उन्हें व्यावहारिक ज्ञान दिया जाए जैसे पेङ- पौधों के ज्ञान के लिए उन्हें बगीचें में ले जाएं । पर मेरी समस्या यह है कि उसके बाद परीक्षा क्यों? जो देखा-समझा, वो कितना-देखा समझा का सवाल क्यों?

मेरा अनुभव है कि बच्चों से चर्चा करते हुए, उन्हें अपने से जोङते हुए, यदि पाठ समझाया जाता है तो प्रत्येक बच्चा उस पाठ को ग्रहण कर पाता है। जैसे- खरगोश और कछूए की कहानी से सभी बच्चे समझते है कि खरगोश तेज दौङता है और कछुआ धीरे। पेङों व फूलों के भागों के विषय में तथा वे अपना भोजन कैसे बनाते है उन्हें व्यावहारिक प्रयोगों के माध्यम से आसानी से सीखा सकते हैं। यह सिर्फ मेरे विचार नहीं है अपितु सभी विद्वान शिक्षाविदों के विचार हैं, मैं तो उन विचारों को पुनः स्मरण कर रही हुँ।

परीक्षा के लिए पाठ पढ़ाना और उसे रटाना यही शिक्षण विधि की अहम भूमिका बन गई है। कोई भी विषय जब परीक्षा के उद्देश्य से पढ़ाया जाता है तो उसमे से ज्ञान विलुप्त हो जाता है। परीक्षा शब्द में इतना बोझ है कि अध्यापक और अभिभावक दोनो ही भयभीत हो उस बोझ को बच्चों पर डालने लगते हैं। उनकी एक ही कोशिश होती है कि बच्चे पाठ का अभ्यास कार्य अच्छी तरह रट लें कि परीक्षा में सभी उत्तर अच्छे लिख सके व नंबर मिलने पर अध्यापक खुश कि उसने अच्छा पढ़ाया और अभिभावक भी खुश कि वे बच्चे को पाठ अच्छी तरह रटा सके थे ।

लेकिन परीक्षा में लिखने के लिए बच्चे का भाषा ज्ञान अच्छा होना आवश्यक है, पर चूंकि प्रथम कक्षा में छात्रों की भाषा में उतनी प्रवीणता नहीं होती हैं कि वह स्वयं अपने ज्ञान के अनुसार उत्तर लिख सके इसीलिए उन्हें उत्तर रटाए जाते हैं।
कई स्कूलों में परीक्षा नहीं ली जाती पर छोटे-छोटे class test लिए जाते हैं और उनके आधार पर रिपोर्ट कार्ड जरूर बनती है ताकि माता-पिता अपने बच्चे की प्रगति जान सके। रिपोर्ट कार्ड में अब छोटी कक्षाओं के लिए ग्रेड पद्धति भी है।अभिभावक की मानसिक समझ वही रहती है और वे A+ व B+ की तुलना में फंसे रहते हैं।

एक अन्य विषय बच्चों पर लादा जाने लगा है । कंप्यूटर आज के युग की प्राथमिक आवश्यकता है तो बच्चों को उसका ज्ञान होना चाहिए।कक्षा प्रथम से एक कंप्यूटर की किताब लग जाती है और फिर कंप्यूटर लैब में तो बच्चे कम जाते हैं पर उन्हें किताब के पाठ रटाए जाते हैं, फिर उसकी भी परीक्षा ली जाती है।

एक विद्यालय के प्रथम कक्षा के छात्र को पढ़ाते हुए मैं परेशान थी कि मुझे उसे सात विषय पढ़ाने थे और इन सभी विषयों की परीक्षा भी होनी थी।
विषय थे-1: गणित
2: हिन्दी
3: इंगलिश
4: ई.वी.एस
5: जी.के.
6: नैतिक शिक्षा
7: कंप्यूटर
ड्राइंग भी आठवाँ विषय था, जिसमें उसकी बहुत रूचि थी।
अब फिर यह प्रश्न कि नैतिक शिक्षा की परीक्षा क्यों ? इस विषय की किताब में रोचक कहानियाँ थी, जिन्हें वह खुशी से सुनता था। अभी उसकी इंगलिश इतनी अच्छी नहीं थी कि वह स्वयं पढ़ सके व समझ भी सके। पर कठिनाई यह थी कि इसकी भी परीक्षा होनी थी।

विद्यार्थी जिसे सब ज्ञान है,पर वह परीक्षा में प्रश्न समझ नहीं सका, या पढ़ नहीं सका है क्योंकि वह सभी अक्षरों व शब्दों को पढ़ नहीं पाता या समझ नहीं पाता है( बात कक्षा प्रथम की ही हो रही है)।अतः उत्तर नहीं लिख सकता है।
एक विद्यार्थी जिसे सब ज्ञान है व पढ़ व समझ भी सकता है परंतु लिखने में कठिनाई है या लिख पाता है परंतु spelling mistake करता है अथवा speed कम है, दी गई निश्चित अवधि तक वह पेपर पूरा नहीं कर पाता है, तब नंबर तो कम ही आएँगे।
इन बच्चों पर लिखने का इतना बोझ डाला जाता है कि वे सपने में भी अपने को शब्दों में घिरा महसूस करते होंगे।

मेरी एक मित्र ने अपने स्कूल में जहाँ वह एक काउंसिलर के पद पर कार्यरत थी, ऐसे बच्चों के लिए उस स्कूल के मुख्याध्यापिका व अध्यापिकाओं से विवाद किया और उन्हें सहमत किया कि जिन बच्चों को सब ज्ञान है व वे परीक्षा में पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दे सकते हैं, पर लिखने में कमज़ोर है उन्हें भी उनके ज्ञान के आधार पर नंबर दिए जाएं।

नंबर न मिलने पर व उस पर भर्त्सना झेलने के कारण उनका पढ़ाई से, व नित कुछ नया सीखने से रूचि खत्म हो जाती है।
मेरे विचारों का आधार बङे प्रतिष्ठित प्राइवेट विद्यालयों और छोटे प्राईवेट विद्यालयों में सामान्यतः अपनाई गई शिक्षण विधियाँ है।

निष्कर्ष में कह सकते है कि कक्षा तीन तक बच्चों की भाषाओं पर विशेष ध्यान दिया जाए । उनके शब्दों के उच्चारण व लिखने में उनके वाक्य विन्यास को मज़बूत किया जाए।प्रत्येक अध्यापिका का कर्तव्य है कि भाषा सीखने में प्रत्येक बच्चे को जो कठिनाई आ रही हैं उसे समझे व दूर करें। यदि अध्यापकों पर भी कार्य बोझ कम हो, पाठ्यक्रम पूरा करने का दबाव न हो तो वह स्वतंत्र रूप से अपने कार्य को पूर्ण निष्ठा से निभा सकते हैं।
गणित को भी खेल-खेल में सिखाने का अधिक प्रयत्न किया जाए, अन्य विषयों को भी रूचिकर विधियों से पढ़ाया जाए। बच्चे ज्ञान स्वयं सहजता से प्राप्त करें। सभी बच्चें ज्ञान प्राप्त करें यह आवश्यक है पर वह ज्ञान कितनी मात्रा तक ग्रहण करें इसका दबाव नहीं डाला जाना चाहिए। तथ्य उन्हें समझाएँ जाए व रटाए न जाए उन्हें स्वतः रूचि अनुसार समझने की स्वतंत्रता भी देनी आवश्यक है।