मैंने इस प्रतिष्ठित स्कूल में कक्षा प्रथम को पढ़ाया था। यह एक पुराना व प्रसिद्ध स्कूल था। फ़ीस भी अधिक नहीं थी। मध्यम व निम्न मध्यम वर्गीय परिवारों के बच्चे यहाँ पढ़ने आते थे। स्कूल में बच्चों की संख्या का अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि प्रत्येक कक्षा के 9 सेक्शन थे। प्रथम कक्षा के ही सेक्शन A से सेक्शन I तक थे। तब भी एक सेक्शन में 40-45 विद्यार्थी थे।

हम सभी अध्यापिकाओं को एक समान कार्य कराने की हिदायत थी। मैं और कान्ता मैडम नई अध्यापिकाएँ थी। हमें अपनी सीनियर अध्यापिकाओं के कार्यों की नकल ही अपनी कक्षा के बच्चों को करानी होती थी, कोई भी मौलिक कार्य नही करा सकते थे। सभी सेक्शनस की अध्यापिकाओं के बीच प्रतियोगिता रहती थी कि किस की कक्षा का विद्यार्थी सभी प्रथम कक्षाओं मे उच्चतम स्थान प्राप्त करेगा।

प्रथम कक्षा में सभी विषय कक्षा अध्यापिका को ही पढ़ाने थे, पर कंप्यूटर की अध्यापिका अलग थी। नैतिक शिक्षा जैसा कोई विषय नहीं था। दुख की बात थी कि कोई खेल का पीरियड नहीं दिया था। बाद में हम सभी अध्यापिकाओं के बार-बार अनुरोध करने पर प्रथम कक्षा को खेल व ड्राइंग पीरियड भी मिले व उनके लिए खेल व ड्राइंग अध्यापिकाएँ भी मिलने से हम कक्षा अध्यापिकाओं का कार्य आसान हो गया था।

मेरा पहला दिन था उस स्कूल में और मैं अपना कार्यभार संभालने से पूर्व कुछ औपचारिकताएँ पूर्ण कर रही थी। हमारी इंचार्ज ने मुझे कुछ फार्म भरने के लिए दिए व बताया कि कल से आप ‘प्रथम जी’ की कक्षाध्यापिका का पद संभालेंगी। मैं स्टाफ रूम में बैठी, वे सब फार्म भर रही थी कि वहाँ उपस्थित एक अध्यापिका ने प्रश्न किया कि “आप को कौन सा सैक्शन मिला?”
मेरे जवाब देते ही “जी” वहाँ बैठी सभी अध्यापिकाएँ एक साथ ही बोली,” अरे! अभिषेक की क्लास, फिर तो बहुत मुश्किल आने वाली है।” बाद में ऐसी प्रतिक्रिया सभी दे रहे थे, मानों वह पांच-छः साल का बालक कोई आफत का परकाला हो। जिस अध्यापिका से मैं अपने कार्य की जिम्मेदारी ले रही थी, वह बोली, ” मैंने तो अभिषेक से मुक्ति पाई, अब आप संभालें ।” फिर मुस्करा कर बोली,” वैसे बाकी क्लास तो ठीक है पर एक अभिषेक पूरी क्लास के बराबर है।”

अगले दिन मैं अभिषेक से मिलने के लिए उत्सुक लिए कक्षा प्रथम जी में पहुँची, पूरी क्लास में नज़र दौङाई कि अभिषेक कौन हो सकता है? कक्षा के आगे भाग के कोने में एक तरफ एकमात्र डेस्क था, वह खाली था। मैंने विद्यार्थियों से बात करना शुरू करी व उनसे उनका परिचय लेना आरम्भ किया तभी दरवाजे पर एक बालक आकर खङा हुआ और वह कक्षा में आने की अनुमति मांग रहा था, कक्षा में फुसफुसाहट हुई कि अभिषेक आ गया….। मैंने देखा सिर पर अच्छी तरह तेल लगाए, व बाल भी ढंग से बने थे, कपङे भी साफ, जूते भी चमकते हुए थे, कहीं कोई कमी नहीं थी। आँखों में शरारत थी व चेहरे पर उद्दंडता थी या मेरे पुर्वाग्रह के कारण मुझे उसमें शैतानियत नज़र आ रही थी।

वह अंदर आया और मुझे गुडमाॅर्निग भी कहा व उसी कोने के एकमात्र डेस्क पर जाकर बैठ गया था, बिलकुल अकेला। मैंने देखा और कहा,” सबसे अलग क्यों बैठे हो? कक्षा में किसी दूसरे विद्यार्थी के साथ क्यों नहीं बैठते हो?” कहते हुए मैंने कक्षा में नज़र दौङाई कि उसे कहाँ किसके साथ बैठा सकती हुँ कि उससे पहले ही सभी बच्चे बोल उठे कि ” नहीं! हम इसे अपने पास नहीं बैठा सकते हैं।”

कक्षा माॅनिटर रूबी बोली,” मैडम यह बहुत गंदा बच्चा है, सभी मैडम इसे यहाँ अलग बिठाती हैं।” अभिषेक भी शैतानियत भरी हँसी लिए मुस्करा रहा था।

मुझे यह प्रबंध पसंद तो नहीं आया था पर जिस तरह सभी बच्चों की प्रतिक्रिया थी, उसे देखते हुए मैंने उस समय चुप रहना ही ठीक समझा था। काम कराते समय मैंने पाया कि उसकी काॅपियाँ फटी हुई थी। कोने में बैठा होने के कारण उसको ब्लैक बोर्ड से काम उतारने में भी कठिनाई थी। अवसर मिलते ही उसने कक्षा के एक लङके को जाकर एक घूँसा मारा अर्थात अलग बैठने के बाद भी वह अन्य बच्चों को परेशान कर रहा था।
लंच के बाद मैंने उसे रूबी के पास बैठा दिया, रूबी को अच्छा नहीं लगा, पर मैंने कहा, ” अभिषेक सबसे अलग नहीं बैठेगा, सबके साथ बैठेगा।”
अभिषेक से भी कहा कि वह रूबी को तंग नहीं करेगा। उस समय तो वह भी खुश था और शांत बैठा रहा था।

छुट्टी के समय मुझे उसकी माँ मिली तब मैंने उनसे अभिषेक की सभी काॅपियाँ फटी होने के विषय में बताया व नई काॅपियाँ कवर लगा कर भेजने को कहा। लेकिन उनकी प्रतिक्रिया व जवाब से बहुत दुःख हुआ।

वह हँसते हुए बोली,” अरे, फिर फाङ दी काॅपियाँ, कोई बात नहीं मैडम कोई दिक्कत नहीं हैं, नई खरीद देंगे। क्या करे बहुत शैतान है? हमने पहले वाली मैडम को भी बोला था कि काॅपियाँ फट जाए तो बता दिया करे, पैसे की कोई समस्या नही है।”

उनके इस गैरजिम्मेदारना जवाब से हैरान हो कर मैंने उन पर ठीक से निगाह डाली, देहाती परिवेश, शायद बहुत कम शिक्षित, लेकिन इससे क्या फर्क पङता है क्योंकि शिक्षा का जिम्मेदारी से कोई संबध नहीं होता है। उस समय मेरे पास उन्हें समझाने का समय नहीं था, पर मैंने उन्हें अगले दिन मिलने के लिए बुलाया था।

उनके बारे में पता लगा कि कई वर्षों की प्रतीक्षा के बाद उन्हेँ संतान प्राप्ति हुई है, संतान वह भी पुत्र, अतः अभिषेक के लिए सब कुछ न्योछावर कि उसका भला बुरा भी नहीं सोचना है। पिता कोई कारोबार करते थे, पैसे की कोई कमी नहीं थी। यह भी सुना कि वह एक बदलिहाज व्यक्ति है कि कोई अध्यापिका उनसे बात करना पसंद नहीं करती है ,बच्चे की शिकायत पर वह उल्टा अध्यापिकाओं को कङे ज़वाब देते है।यह भी कि फिर उन्हें इतना गुस्सा आता है कि वह अपने लाडले की जूते-चप्पलों से पिटाई लगा देते है।पर आँख के तारे की सभी जिदे व मांगें भी पूरी करते है।
मुझे बिलकुल समझ नहीं आते ये माता-पिता, बच्चों के लाड-प्यार में भी आगे और मारने में भी पीछे नहीं है।

माँ से मिलने पर उन्हें काॅपी, कागज और उस पर किए गए काम का महत्व समझाया यह भी कि बच्चे को मार कर नहीं संभालते व दृढ़ता पूर्वक कहा कि कक्षा में हम ध्यान रखेंगे और घर पर आप ध्यान रखें कि काॅपी- किताबें न फटे।

कक्षा में मैंनें अभिषेक को बारी-बारी से हर बच्चे के साथ बिठाना शुरू किया था, अभिषेक को समझाया कि सबके साथ बैठना है तो किसी को तंग नहीं करना है। पर एक दिन में ऐसे उद्दंडी बच्चे को बदला नहीं जा सकता था। उसके कारण मुझे भी सचेत रहना पङता था कि वह कक्षा में परेशानी न खङी कर दे।गालियाँ तो ऐसी देता था, वो उसके परिवेश का ही परिणाम था। कहा जाता है कि बच्चे की प्रथम पाठशाला उसका परिवार होता है। अतः उसके माता-पिता से मिलना जरूरी था।

उसके पिता से भी P.T.M(parent-Teacher meeting) में बात हुई थी। देखने में ही वह उज्जड और अक्खङ दिखते थे, पर उन्होंने मेरी बातों को ध्यान से सुना था और व्यवहार में भी लिहाज था। शायद इसीलिए कि मैं अभिषेक की शिकायत नहीं कर रही थी, सिर्फ समस्या बता रही थी। वह गाली दे रहा है नहीं ‘वह सीख रहा है।’ सीख रहा है इस पर मैंने ज़ोर दिया था। और यह भी कि समस्या घर से आ रही है, इस सच्चाई को उन्होंने समझा था।

कक्षा में मैंने ध्यान किया कि वह सीधे बच्चों को कम परेशान करता है। उसकी परेशानी दूसरे शरारती बच्चों के साथ अधिक थी, अतः उसकी शिकायतों पर भी ध्यान दिया था।
काफी कोशिशों के बाद मुझे यह समझ आया कि जो पढ़ाया जाता है, उसे समझ आता है व अब प्रश्न करने पर वह उत्तर भी उत्साह पूर्वक देता था। अब काॅपियाँ नहीं फटती थी, इसीलिए उसकी ट्यूशन टीचर उसे पढ़ा पाती थी, जिससे परीक्षा में सही नंबर प्राप्त करता था। कक्षा में सभी बच्चों के बीच बैठकर वह खुश था।

जैसा मैंने पहले भी बताया था कि शैतान बच्चे दुःसाहसी होते हैं, अभिषेक इसका सबसे अच्छा उदाहरण था। हमारी कक्षा ऊपरी मंजिल में थी। एक दिन नीचे मैंदान में कोई खेल खेला जा रहा था, अभिषेक पानी पीने कक्षा के बाहर गया था। तभी वह खेल देखने के लिए सीधे रेलिंग से ही कूदना चाहता था, यदि किसी बङी कक्षा के विद्यार्थी ने उसे न देख लिया होता तो मैं उसके माता-पिता को अपना मुँह नहीं दिखा सकती थी। अब मैं उसे कक्षा से बाहर कभी अकेले नहीं भेजती थी।

सत्र के अंत तक वह बहुत संभल चूका था। वह दूसरी कक्षा में पहुँचा । उसकी दूसरी कक्षा की अध्यापिका मुझे मिली और एक प्रकार से मेरे काम में कमी निकालते हुए बोली कि “आपने अभिषेक की लिखाई पर ध्यान नहीं दिया था, अब मैं सिखा रही हुँ तो बहुत अच्छा लिख रहा है।
मैंने उन्हें जवाब नहीं दिया क्योंकि मेरे लिए यही कामयाबी थी कि वह काम कर रहा है और अब कोई अभिषेक से परेशान नहीं है। मुझे अभिषेक के लिए खुशी हो रही थी कि उसे एक अच्छी अध्यापिका मिली है जो उसके साथ मेहनत कर रही हैं।

हमने कई वर्षों की परतंत्रता से कङे संघर्ष के बाद मुक्ति पाई है। उस गुलामी ने हमें कई तरह से अपमानित और प्रताङित किया था। लेकिन इसके बाद भी हम आज भी अपनी सोच और संस्कारों के इतने गुलाम है कि हम बिना विचारे गर्व के साथ दूसरे का जातिगत, छुआ-छुत के आधार पर अपमान करते हैं। दुःख तब बहुत होता है जब यह भेद रंग के आधार पर किया जाता है। हम हिन्दूस्तानी गोरे कब हुए? सिर्फ थोङा- बहुत रंग के शेड में अंतर मिल सकता है। अगर हम इस थोङे अंतर पर आपस में एक दूसरे का अपमान कर सकते हैं तब अंग्रेजों को बुरा क्यों कहा जाता है? वे तो विदेशी थे, हम पर राज करने आए थे। ऐसी सच्ची घटनाएँ व कहानियाँ पढ़ने व सुनने को मिलती है जिनमें गोरों द्वारा रंग के कारण हमारे लोगों को प्रताङित किया गया था और अंग्रेज़ों के विरूद्ध हमारा खून खौल उठता है । पर हम स्वयं अपने ही लोगों के साथ भेद-भाव का कैसा व्यवहार कर जाते हैं? यह सोचा है?

कबीर जी ने कहा है,” दोस पराए देखि करि, चला हसन्त हसन्त,
अपने याद न आवई, जिनका आदि न अंत।”

मैं अपनी प्रथम कक्षा ले रही थी तभी मेरे पास एक नोटिस आया कि हमें एक कार्यक्रम के आयोजन के लिए अपनी प्रथम कक्षा में से एक छात्रा का चुनाव करना है। छात्रा का उच्चारण शुद्ध व स्पष्ट हो, उसमें आत्म विश्वास हो, स्मरण शक्ति अच्छी हो व आवाज भी अच्छी होनी चाहिए। छात्रा को तितली या परी की भूमिका मिलेगी।

मेरी कक्षा में 40-42 बच्चों में से छात्राएँ सिर्फ 10 ही थी। यह हमारा दुर्भाग्य है कि इतनी जनसंख्या के बाद भी लङकियों की संख्या बहुत कम है, उस पर उन्हें शिक्षित करने की दिशा में सोच निराशाजनक है।

मैंने सभी छात्राओं पर निगाह डाली, सभी परी व तितली दिख रही थी। मुझे ऐसी छात्रा का चुनाव करना था जो इन सब योग्यताओं में खरी उतरे। और मैंने संध्या को देखा, सांवली सलोनी संध्या जब अपनी मधुर आवाज़ में कविता पाठ करती थी, तो उच्चारण में एक-एक नुक्ता और बिंदू भी पता लगते थे और पूरी कक्षा आनंद लेती थी। मुझे उससे योग्य कोई न दिखी और मैंने उसका नाम भेज दिया।

रिहर्सल का पहला दिन था संध्या भी संगीत अध्यापिका के पास रिहर्सल के लिए गई थी। अन्य बच्चे मेरे द्वारा दिया कक्षा-कार्य कर रहे थे। तभी प्रथम कक्षा इंचार्ज संध्या के साथ आईं और मुझ से हैरानी से सवाल किया ,” आपने इसे अपनी कक्षा से चुना है? कोई और योग्य छात्रा नहीं मिली?”
मैंने प्रत्युत्तर में पूछा, ” क्यों क्या हुआ, संध्या ने क्या किया? ” उन्होंने मुझ से इस तरह से देखा जैसे मैं नासमझ हुँ और धीरे से बोली,” शक्ल तो देख ली होती?”
मैंने संध्या को उसकी सीट पर भेजा और उनसे पुछा, ” क्या संध्या के उच्चारण, आवाज़ या आत्मविश्वास में कमी है?”
उनका जवाब था,” नहीं, पर हम इन्हें परी या तितली बनाना चाहते है और यह सांवली है, आपकी कक्षा में अन्य कोई गोरी सुंदर छात्रा होगी?”
उनसे बिना बहस किए मैंने कहा कि “मेरी कक्षा में से तो संध्या को ही लिया जाएगा अन्यथा किसी को भी नहीं लिया जाए।”
कार्यक्रम में संध्या ने भाग लिया और अच्छी प्रस्तुति दी थी। और मैं आज तक सोचती हुँ कि क्या तितली या परी सांवली नहीं होती क्या ?

जैसे हम होते है वैसे ही हमारी कल्पनाएँ होती है तो परी भी हमारी जैसी होगी और तितली? उसके रंग तो किसी विशेष रंग से बंधे नहीं होते है।

कारण जो भी हो यह एक बच्चे के मन में हीन भावना का अहसास भरना था। हम इस तरह जाने-अनजाने बच्चों के अंर्तमन को कलुषित करके उनके विकास को बाधित करते हैं।

कबीर जी यह भी कहते है,” कबीर गर्व न किजीये, देहि देखि सुरंग,
बिछुरै पर मेला नहीं, ज्यों केंचुली भुजंग।”

हमें चूंकि अपनी सीनियर अध्यापिका के कार्यों का ही अनुसरण करना था तो मैं वैसा ही कार्य करा रही थी। लेकिन एक दिन कक्षा में तोते के विषय में पाठ पढ़ा कर उसका अभ्यास कार्य करा रही थी। प्रश्न था कि तोता किस रंग का होता है? पाठ के अनुसार सीनियर अध्यापिका ने उत्तर में सिर्फ हरा रंग ही लिखाया था। परंतु मेरी कक्षा के सचिन ने मुझ से कहा कि उसने तो चिङियाघर में लाल और नीले रंग के भी तोते देखे हैं। उसकी बात में सच्चाई थी, पाठ लिखने वाले को इस बात का ध्यान रखना चाहिए था। कक्षा के अन्य विद्यार्थी भी अब सचिन की बात का समर्थन कर रहे थे। अतः यहाँ मैंने उत्तर थोङा बदल कर लिखा दिया था।

अन्य घटना इससे मिलती-जुलती घटी कि पाठ था परिवार के सदस्य क्या-क्या काम करते है। पाठ के अनुसार माता खाना बनाती है व घर के अन्य काम करती हैं। पिता नौकरी या पैसा कमाने के लिए अन्य कोई कार्य करते है और बाजार से फल, सब्जी इत्यादि लाते हैं।
अब उसी के अनुसार अभ्यास प्रश्न था कि” आप के घर में बाजार का सामान कौन लाता है?
उत्तर लिखाया गया था,”पिता”
नवीन लिखते हुए रुक गया , क्योंकि उसने उत्तर दिया,” मेरे पापा कुछ नहीं करते, सब काम माँ करती है।”
साथ ही अङ भी गया” मैं उत्तर में पिता नहीं लिखूँगा।”

उसके साथ कुछ दूसरे विद्यार्थियों की भी यही प्रतिक्रिया थी।
यही नही फिर उनसे पाठ पर चर्चा करी तो जो उत्तर मिले उसने मुझे सोचने के लिए मजबूर किया।
कुछ विद्यार्थी मुझे बता रहे थे कि उनकी माँ भी नौकरी करती है या अन्य कार्य करती है और पैसा घर लाती हैं। यह 5-6 वर्ष के बच्चे मुझे याद दिला रहे थे कि समाज बदल रहा है और वह इसी बदले समाज को जानते है।

जो तथ्य बच्चे देख रहे थे उसे किताब लिखने वाले ने क्यों नहीं देखा?
मैंने उन्हें उत्तर लिखने के लिए चुनाव करने दिया कि वे जैसा अपने परिवार में देख रहे है उसके अनुकुल उत्तर दे सकते हैं।

परीक्षा में विद्यार्थियों के पेपर जाँचने का नियम था कि कक्षा अध्यापिका अपने विद्यार्थियों के पेपर नहीं जाँचती थी अन्य सैक्शन की कक्षा अध्यापिका जाँचती थी। अतः मैंनें अन्य अध्यापिकाओं को बताया कि” मैने उत्तरों में क्या बदलाव किए है?” वे सब मुझ से सहमत होते हुए भी हैरान थी कि “आपकी कक्षा के विद्यार्थी इतने सवाल क्यों करते है?” शायद मै उन्हें अपनी बात कहने की स्वतंत्रता दे रही थी।

मेरे विचारों से हमें बच्चों से अवश्य सभी विषयों पर चर्चा करनी चाहिए, जिससे उनमें सोचने- विचारनें के प्रति रुझान विकसित हो सके, साथ ही अपने विचार प्रकट करने की झिझक दूर हो। हमें उन्हें सुनना चाहिए और यह विश्वास देना चाहिए कि आप उन्हें समझ रहे हैं।
लेकिन इसके लिए आवश्यक है कि कक्षा में छात्रों की संख्या कम हो, जिससे अध्यापक आसानी से चर्चा के लिए समय दे सके व प्रत्येक बच्चे को सुन सके। अन्यथा जैसा होता है कि रटे रटाए तरीके से पाठ पढ़ाया गया और काम करा दिया गया। न अध्यापक कुछ विचारे न बच्चे अपने मन के सवालों को सुलझा सकें।