हम यह जानते हैं कि देश में भ्रष्टाचार की बीमारी व्यापक रुप से फैली हुई है। हम सब के खून में भ्रष्टाचार बसा हुआ है। हम इच्छा से या अनिच्छा से भ्रष्टाचार के शिकार होते भी हैं और दूसरों को इसका शिकार बनाते भी है। कोई कितना भी सदाचारी हो वह भी मुसीबत पङने पर कमजोर पङ ही जाते हैं।
परंतु दुख तब होता है जब लोग समाजसेवा के नाम पर गरीबों को ठगते है, मुर्ख बनाते हैं।मुझे इनकी कङवी सच्चाई से रूबरू होने का भी अवसर प्राप्त हुआ था।

अक्सर अध्यापकों और गायकों को अधिक बोलने या गले में आवाज़ की नली पर अधिक जोर देने के कारण, आवाज नली में उपस्थित गाठें उभर आती है, जिससे उनकी आवाज़ तो ख़राब होती ही है साथ ही दर्द भी होता है। मैं इस तकलीफ की शिकार हो गई थी अतः डाक्टर की सलाह से स्कूल में पढ़ाना छोङ दिया था।स्वस्थ होने के बाद दो सामाजिक संस्थाओं में काम किया था।

इन सामाजिक संस्थाओं में वे बच्चें पढ़ने आते जो सरकारी स्कूलों में पढ़ते थे, शाम को डेढ़ दो घंटे के लिए यहाँ ट्यूशन पढ़ते थे। इन संस्थाओं का उद्देश्य था कि चूंकि सरकारी विद्यालयों में ठीक से पढ़ाया नहीं जाता है अतः उन कमियों को यहाँ दूर किया जाए।
जिसके लिए उनके पास कार्यकर्ता थे, जो इन बच्चों को पढ़ाते थे। पर दुख हुआ यह देखकर कि इस उद्देश्य की मात्र खानापूर्ति हो रही थी। एक कार्यकर्ता के पास 30-40 अलग-अलग आयू वर्ग व अलग-अलग कक्षाओं के विद्यार्थी थे। यह कार्यकर्ता इन बच्चों की पढ़ाई में आने वाली कठिनाईयाँ को दूर करना तो दूर वह तो उनकी कठिनाईयाँ समझ भी नहीं पाते थे।

इनमें से एक संस्था ने बच्चों की नियमित उपस्थिति के लिए, प्रत्येक बच्चे को मासिक 100रूपये देने का प्रावधान किया था, अतः बच्चें लालच में नियमित आते लेकिन उन्हें पढ़ाने के लिए न तो उनके पास अच्छे व पर्याप्त शिक्षक थे न अच्छी शिक्षण सुविधाएँ थीं। यहाँ भी एक कार्यकर्ता के पास 40 से अधिक बच्चे थे।जिनमें से किसी के पास फटी काॅपी थी तो किसी के पास वह भी नहीं थी । कार्यकर्ता व बच्चे समय बिताकर चले जाते थे ।
बच्चों के लिए यहाँ आना खेल था और अभिभावकों के लिए भी कुछ आर्थिक सहायता चूंकि एक परिवार में अगर 5-6बच्चे हैं तो थोङी आय ही सही पर उनके लिए यह भी सहारा था।

मैंने एक दिन देखा कि सभी बच्चों को अच्छे कपङे पहन कर आने के लिए कहा गया था। शायद वह 14 नवंबर का दिन था बालदिवस, फिर दीवाली का त्योहार भी आने वाला था। अतः उस दिन संस्था में कई प्रतियोगिताएँ आयोजित की गई थी। मुझे रंगोली प्रतियोगिता का निरीक्षण करना था। लङकियों की रंगोलियों से प्रांगण जगमगा उठा था।उन छात्राओं ने बताया कि उन्होंने रंगोली बनाना अपने-अपने विद्यालयों में सीखा है। इस संस्था में कला या संगीत शिक्षा की कोई व्यवस्था नहीं है ।

कुछ समय मिलने पर मैं उस स्थान पर गई जहाँ संगीत व नृत्य प्रतियोगिता हो रही थी। बच्चे अपनी पसंद के फिल्मी गीत गा रहे थे व नृत्य कर रहे थे। एक कमरे में चित्रकला प्रतियोगिता हो रही थी और नन्हें कलाकार अपना कला कौशल अपने चित्रों में बिखेर रहे थे। इसके अतिरिक्त एकल नाट्य प्रतियोगिता को देखते हुए मैं सोच रही थी, ये कलाकार स्वयं पारंगत हैं, यदि इन्हें प्रशिक्षण दिया जाए तो इनकी कला सोने की तरह चमक सकती है।
पर इस संस्था में यह सब एक दिन का तमाशा था, यहाँ इनके इन गुणों को विकसित या निखारने की सोच भी नज़र नहीं आ रही थी।

हम कार्यकर्ताओं ने ही मिलकर प्रतियोगिताओं का परिणाम तैयार किया, फिर संस्था के संचालकों और अधिकारियों ने विजेताओं के नामों की घोषणा करते हुए उन्हें पुरस्कार भी दिए। कई फोटो लिए गए।
यह समझा जा सकता था कि ये सब किसलिए किया जा रहा है।इन सभी फोटो को दिखाकर व रजिस्टर में सभी छात्रों की नियमित उपस्थिति गिनाकर, संस्था सरकार से अनुदान प्राप्त करेगी। विदेशी दानकर्ता भी इनकी इन झूठी तस्वीरों की सच्चाई जाने बिना इन संस्थाओं को प्रसन्नता से दान करेंगे। इस तरह संचालक अपने खातों को तो भर लेंगे, पर इन गरीब बालकों के लिए वे कुछ सार्थक कार्य करेंगे ऐसी दृष्टि नहीं नज़र आई थी।

ये सामाजिक संस्थाएँ किसी राजनीतिक दल या मंत्री के सरंक्षक में फल-फूल रही थी।
दुख इस बात का है कि ये लोग गरीबो को झूठी दिलासाएँ देकर इन्हें मूर्ख बनाते हैं और बच्चों का भविष्य निखारने के स्थान पर उनका मजाक बनाते हैं।

परंतु ऐसा नहीं कि सभी सामाजिक संस्थाएँ धोखा हैं, कुछ लोग बहुत मन से काम कर रहें है। बाद में मैंने जिस संस्था में कार्य किया था, वह संस्था विकलांग व मानसिक दृष्टि से पिछङे विशेष बच्चों के लिए कार्य कर रही है। यहाँ काम करके खुशी मिल रही थी।
अपना विद्यालय खोलने के शुरूआत के दिनों में मेरे पास ऐसे विशेष एक- दो बच्चे पढ़ने आए थे पर कई कठिनाईयों के कारण मैंने उन्हें अपने विद्यालय में प्रवेश के लिए मना कर दिया था। अब मुझे इन बच्चों को जानने का अवसर मिला था।

इस संस्था ने इन विशेष बच्चों के लिए सभी सुविधाओं का प्रबंध किया था। समस्त चिकित्सा सुविधाओं के अतिरिक्त, इनकी शिक्षा के लिए प्रशिक्षित अध्यापिका व तकनीकि शिक्षा का भी प्रबंध था।
चूंकि इन बच्चों को पढ़ाने के लिए मैं प्रशिक्षित नही थी इसलिए मैं इस संस्था में ऑफिस का काम देख रही थी। पर जब समय मिलता मैं बच्चों के साथ समय व्यतीत करती थी। इन बच्चों से मिला इनका निश्छल प्रेम आज भी मन को खुशी देता है।

ऐसे विद्यालय भी होते हैं जो गरीब और निम्न तबके के बच्चों के लिए खोले जाते हैं।फीस बहुत कम होती है। ऐसे भी एक विद्यालय में पढ़ाने का अवसर मिला था। मैंनें देखा कि कुछ परिवारों के लिए कम फीस देना भी कठिन था। इसका मुख्य कारण था कि पिता के पास काम नहीं होना या काम करने की इच्छा भी नहीं होना अथवा उनका शराबी होना । कारण जो भी हो पर फीस न देने के कारण कुछ बच्चों को स्कूल में अपमानित होना पङता था। इन परिवारों में बच्चों की परवरिश के लिए कोई गंभीर सोच नहीं होती है।

जो अपने बच्चों के लिए सपने देखते हैं, वे मेहनत मी करते हैं। इन बच्चों के अच्छे भविष्य के लिए वे उन्हें इन स्कूलों में भेजते है। इस स्कूल में अध्यापिकाएँ बहुत मन से पढ़ाती थी। पर पढ़ाई में कमज़ोर बच्चों के लिए कोई विशेष कार्यक्रम नहीं बनाया गया था।

मैं यहाँ 6th से 8th कक्षाओं को इंगलिश पढ़ा रही थी । यहाँ कक्षाओं में 20-25 बच्चे ही थे, इसीलिए हम सभी विद्यार्थियों पर ध्यान दे सकते थे। मैं छठी कक्षा की कक्षा अध्यापिका थी, यह मेरी ख़ास कक्षा भी थी क्योंकि यह विद्यालय की सबसे अनुशासित कक्षा थी। मै इन्हें इंगलिश पढ़ा रही थी, वे सब बहुत रुचि व शौक से इंगलिश पढ़ रहे थे, जो समझ नहीं आता तो प्रश्न भी करते थे, तब पढ़ाने में आनंद भी आता था।

मुझे संतुष्टि थी कि यहाँ विद्यार्थियों की नींव अच्छी थी, पर सिर्फ उन्हीं विद्यार्थियों की नींव मज़बूत थी जो यहाँ आरंभ से पढ़ रहे थे। पर जो विद्यार्थी दूसरे स्कूलों से या सरकारी स्कूलों से आए थे, उनकी स्थिति बहुत ख़राब थी। उनके अभिभावकों ने पिछले स्कूलों से निकाल कर उन्हें इस स्कूल में प्रवेश इसीलिए कराया होगा कि इन विद्यार्थियों की पढ़ाई में सुधार आएगा । मुख्याध्यापिका ने उन बच्चों को पैसे के लिए प्रवेश दे तो दिया पर उनकी कमियाँ दूर करने के लिए विशेष प्रयास नहीं करे ।

ये छठी से दसवी कक्षा के विद्यार्थी थे, जो मात्र इसीलिए पास होते आए थे कि सरकारी नीतियों के अनुसार आठवीं कक्षा तक सभी विद्यार्थियों को पास किया जाए।
आरंभ में मैं बहुत हैरान रह गई थी, पहले सत्र की परीक्षा ली गई थी और सातवीं से दसवीं तक सभी कक्षाओं के एक- दो विद्यार्थी ऐसे थे जिन्होंने पेपर में कुछ नहीं लिखा था या लिखा भी था तो वो जिस भाषा में लिख रहे थे वह किसी की भी समझ के बाहर था । मैंने मुख्याध्यापिका को वे पेपर दिखाए, उन्होंने कहा, ” आप इन्हें नंबर मत दीजिए व इनके पेपर अभिभावकों को दिखाएँगे।”

मेरे लिए यह अत्यंत हताशा का दिन था, जब रिजल्ट में मुख्याध्यापिका ने ज़ीरो से पहले चार लिखकर उसे चालीस बना दिया और विद्यार्थी को पास कर दिया था। उनका तर्क था, ” क्या करें सरकारी नीति के अनुसार इन्हें फेल नहीं कर सकते और इनके अभिभावक इस नीति के आधार पर हम से लङाई करेंगे कि उनके बच्चे को फेल क्यों किया?”

सब कुछ स्पष्ट था कि ये विद्यार्थी बिलकुल निश्चित है कि वे कभी फेल नहीं हो सकते, अतः पढ़ना समय की बरबादी है,वे स्कूल सिर्फ इसीलिए आते कि उनके अभिभावक जबरदस्ती भेजते थे, यहाँ वे समय बिताने और अध्यापिकाओं की डाँट या मार बेशरमी से सहते पर मन में किसी के लिए सम्मान भी नहीं रखते थे। और क्यों रखते क्या हम उनके भविष्य के लिए कुछ कर रहे थे?

पहली बार जब उन्होंने शायद किसी बहुत छोटी कक्षा में पेपर में कुछ नहीं लिखा होगा और रिजल्ट पास का आया होगा, उसी दिन उन्हें यह खेल मज़ेदार लगा होगा। बङे होने तक यह खेल खेलने की आदत बन चूकी थी।

हम किसे बेवकूफ बना रहे थे, इन बच्चों को, इनके अभिभावकों को या स्वयं अपने को….। हम क्या स्वयं शिक्षा का अर्थ जान सके हैं? हमने शिक्षा को पास-फेल का खेल बना दिया है।

नीति निर्धारकों ने ऐसी नीति बनाते समय, किस सोच को आधार बनाया था? क्या यह ख्याल बनाया कि हमारे देश के प्रत्येक नागरिक के पास आठवी कक्षा का सार्टिफिकेट होगा? अगर यही सोच थी तो जिसने भी आठवी कक्षा तक पढ़ाई की उसको आठवीं का सार्टिफिकेट तो मिल ही गया है, पर ज्ञान? क्या उन्हें जो कक्षा में पढ़ाया गया उसका ज्ञान है, जो किताबें उन्हें दी गई वे उन्हें पढ़ सके उसमें दिए गए ज्ञान को ग्रहण कर सके?

ऐसे विद्यार्थी क्या आठवी के बाद आगे की कक्षाओं को पढ़ सके? नहीं, आगे की कक्षाओं को पास करने के लिए पढ़ना जरूरी था और पढ़ना उन्हें आता नहीं था। बेसिक शिक्षा का ज्ञान भी उन्हें नहीं था।

अब नीति में परिवर्तन आया है कि पांचवी कक्षा तक किसी विद्यार्थी को फेल नहीं किया जा सकता है ।आठवीं से नीचे पांचवी तक पास होने की छूट दी गई है पर उसका लाभ?
क्या बदलेगा? एक पांच साल का विद्यार्थी परीक्षा में कुछ लिख कर नहीं आता हैं, वह जानता है उसने कुछ नहीं किया पर वह अगले साल दूसरी कक्षा में पढ़ाई करेगा, फिर तीसरी….। उसे पहली कक्षा की भी पढ़ाई नहीं आएगी और वह पांचवी कक्षा में होगा। उसके लिए स्कूल क्या होगा?
क्या यह मासूमों की ज़िन्दगी से खिलवाङ नहीं है?

पास- फेल का ज्ञान से मतलब नहीं हैं, पर शिक्षा का तो ज्ञान से मतलब है । क्या नीति- निर्धारकों को सभी शिक्षकों और विद्यालयों के संस्थापकों को इस नीति का स्पष्ट उद्देश्य नहीं समझाना चाहिए। प्रत्येक विद्यार्थी पर पास- फेल का बोझ नहीं डालना है, पर उसे शिक्षा तो देनी है, यदि किन्ही कारणों से वह अपनी कक्षा की पढ़ाई नहीं सीख सका है तो इसका अभिप्राय यह नहीं है कि उसे अगली कक्षा की किताबें पकङा दी जाए।

ऐसे विद्यार्थियों के लिए कोई विशेष व्यवस्था की जाए, कारणों पर ध्यान दिया जाए और उनकी मदद की जाए। शिक्षा का अर्थ ज्ञान है जो बोझिल नहीं हो सकता है। हमारा कर्तव्य है कि किसी के लिए भी ज्ञान को बोझिल न बनने दें।

यह बात समझ नहीं आती कि सरकार का डंडा है कि सभी बच्चों को पास करना है और इसी कारण सभी को पास कर दिया जाता है, यह जानते हुए भी कि उस विद्यार्थी को अभी इस कक्षा की पढ़ाई नहीं आई है, उसे अगली कक्षा में भेज कर अपना कर्तव्य पूर्ण कर दिया जाना कैसे ठीक है?
यह गरीब व अनपढ़ माता- पिता कैसे समझे कि इनके बच्चे सिर्फ कागजों में पास होते हैं ?।

मुख्याध्यापिका जो स्कूल प्रबंधक की ही बेटी थी, अपनी शादी की तैयारी में व्यस्त रहीं, फिर नई ससुराल की समस्याओं से घिरी थी।
फिर भी इन कम आयु की मुख्याध्यापिका से इस विषय पर चर्चा करने की कोशिश की पर उन्होंने मुझे डंडा पकङा दिया और कहा, ” यहाँ जो विद्यार्थी आते हैं वह डंडे की भाषा समझते हैं।”

यह पहला स्कूल देखा जहाँ अध्यापिकाएँ स्कूल में डंडा लिए घूमती थी। पर मैं ऐसा नहीं कर सकती थी। अन्य अध्यापिकाओं से बात करने पर पता चला कि इन एक-दो विद्यार्थियों का सभी विषयों में ऐसा ही हाल था।

मैंने ही इन छात्रों से बात करने का प्रयास किया और कहा पेपर खाली दिया तो दूबारा पेपर कराऊँगी। उन्हें समझाया कि सभी प्रश्न का उत्तर दें, रटा हुआ नही है तो भी प्रश्न समझ कर स्वयं उत्तर बना कर लिखने का प्रयास करें।
इंगलिश में उत्तर देना कठिन था पर मेरे विचार से रट कर लिखना अधिक कठिन था। उन्हें कहा कोशिश करने पर नंबर दिए जाएंगे। अब जो कोशिश कर सकते थे उन्होंने कोशिश शुरू कर दी, कम से कम परीक्षाओं को खेल समझना बंद किया। यूँ ये विद्यार्थी विशेष रूप से लङके बेहद लापरवाह हो गए थे और पढ़ाई में बहुत पिछङ चुके थे, पर मेरी कोशिश ज़ारी थी।

आठवी कक्षा का सामाजिक ज्ञान हिन्दी में था, यह भी मैं पढ़ा रही थी, अतः सभी विद्यार्थियों को मैंने प्रोत्साहित किया कि वे रट कर न लिखे, अपनी भाषा में उत्तर दें। स्वयं उत्तर तलाशे, अन्यथा उन्हें तो गाइडे पकङा दी गई थी। मैंने गाइडे हटा दी और कहा कठिनाई हो तो मेरी सहायता लें।
जो बच्चे रट नहीं सकते थे वह खुश हुए, मुझे खुशी थी कि आठवी कक्षा के सभी विद्यार्थी सामाजिक ज्ञान में रूचि ले रहे थे। अपने शब्दों में उत्तर न केवल लिख रहे थे अपितु स्वयं विचार कर भी अपना तर्क या तथ्य जोङने लगे थे।

मैं चाहती थी कि उनका दिमागी व्यायाम हो,और यह धीरे- धीरे शुरू हो गया था। कठिन था, चूंकि बच्चों को स्वयं विचार कर अपने शब्दों में लिखने की आदत नहीं थी, पर उन्हें कोशिश करना अच्छा लग रहा था।
मैं खुश थी कि कुछ विद्यार्थी अपनी स्वयं लिखी कहानी, कविताएँ मुझे पढ़ाते और मेरा प्रोत्साहन उन्हें खुशी दे रहा था।