जिन विद्यार्थियों को मैं लिखना पढ़ना नहीं सिखा सकी, उनके लिए मैं उतनी ही गुनहगार हुँ, जितनी सरकार की नीतियाँ व स्कूल प्रबंधक इत्यादि। कोई भी स्पष्टीकरण मेरी कमी को भर नहीं सकता है। हम सभी अध्यापिकाओं या अध्यापकों ने चाहे कितना भी अच्छा काम किया हो, यदि हम से पढ़े बच्चों में से कोई एक भी ठीक से पढ़- लिख न सके तो हमें अपनी कमी स्वीकार करनी चाहिए।

मैंने इस कमी को दूर करने के लिए ट्यूशन में बच्चों पर विशेष ध्यान देने की कोशिश की थी। मेरा ट्यूशन का सफर भी लंबा रहा है और निरंतर चल रहा है। ट्यूशन में पढ़ने आए विद्यार्थी तो मेरे अपने बच्चे होते हैं, मेरी कोशिश होती है कि मेरे पास वे किसी दबाव का अनुभव न करें, वे मेरे विद्यार्थी न हो कर मेरे सहयोगी होते है हम मिलकर सीखने-सिखाने की कोशिश करते हैं। ये मेरे नन्हें- किशोर सहयोगी मुझ से खुलकर अपने मन का हाल कहते है।
प्रत्येक बच्चे के विषय में लिखना तो कठिन होगा पर जिन बच्चों से विशेष सीखने को मिला उनकी चर्चा अवश्य करूँगी।
कुछ लङकियाँ बचपन से ही बहुत कोमल व नाजुक होती हैं, पांच साल की नैन्सी भी ऐसी ही थी, बहुत कम बोलती थी, जितना पूछो उतना जवाब मिलता था। आवाज भी बहुत शांत धीमी निकलती थी। अपना काम बहुत तन्मयता से व सुंदर करती थी।

उसकी दादी ने बताया कि वह घर में भी चुप रहती है, सिर्फ मतलब की बात करती है। अपनी तकलीफ व परेशानी भी नहीं बताती है। उसकी दादी ने कहा,” हम इसे आपके पास इसीलिए लाए हैं कि यह बोलना सीखे, बातें करना सीखें।”

मैं उसे कहानियाँ सुनाती, उसके साथ खेलती थी, पर वह उतना ही बोलती थी, जितना जरूरी होता था। कहानी ध्यान से सुनती, उस पर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर भी ठीक देती थी।अपने मन से कोई बात नहीं करती थी। कक्षा-प्रतियोगिता के लिए कहानी व कविता याद करती व सुनाती भी थी, पर आवाज बहुत धीमी थी वैसे स्पष्ट थी । बहुत समझाने से थोङा ऊँचा तो बोलने लगी थी, पर बातें करना पसंद नहीं था।

दो दिन के लिए उसका चार साल का छोटा भाई कपिल मेरे पास पढ़ने आया था। कपिल बहुत शरारती था, वह नैन्सी की हर वस्तु लेता पर नैन्सी उससे भी नहीं लङती थी।पता चला कि घर पर भी जब बहुत परेशान हो जाती है तब बोलती है उसे लङना पसंद नहीं था।इसी बात से घर वाले उसके लिए चिंतित थे।

यह चिंता की बात भी थी इतना शांत रहना, अपने अधिकार के लिए भी नहीं बोलना! घर का माहौल भी अच्छा था, परिवार में सभी उसे बहुत प्यार करते थे।यह उसका जन्मजात स्वभाव था उसे बदलना कठिन था,समय के साथ स्वभाव में परिवर्तन आएगा।पर यह चिंता की बात भी है क्योंकि यदि उसके साथ कुछ भी गलत होगा तब भी वह अपनी तकलीफ अपने पास रखेगी। परिवार उसके प्रति बहुत सचेत था,लेकिन बहुत ध्यान रखने पर भी चूक हो सकती है।

हम उस पर इस छोटी आयु में स्वभाव बदलने के लिए दबाव नहीं डाल सकते हैं। हम धीरे- धीरे उसे बिना डराए समाज की बुराईयों से परिचित करा सकते हैं । कहानियों द्वारा अपने अधिकार के लिए लङना व विद्रोह करना सिखाया जा सकता है।

नैन्सी को एक अच्छा शिक्षित परिवार मिला था जो उसके व्यक्त्तित्व के विकास के प्रति सजग था। अधिकांशतः ऐसे बच्चों को बहुत कठिनाई का सामना करना पङता है। असामाजिक तत्व ऐसे बच्चों को आसानी से अपना शिकार बना लेते हैं।

महान साहित्यकार अज्ञेय ने अपनी पुस्तक ‘ शेखर एक जीवनी’ में लिखा है कि किसी में भी विद्रोह के गुण जन्म से होते हैं और वे प्रत्येक में नहीं होते है। अतः क्रांतिकारी बनाए नहीं जाते हैं, वे जन्मजात होते हैं। जिस कारण कुछ व्यक्ति यह समझते हुए भी कि गलत हो रहा है, पर उसका विरोध नहीं करते हैं, बेशक जो भी हो रहा हो वह उनके लिए भी हानिकारक हो, तब भी वह चुप रहने और सहने में विश्वास करते है। जबकि विद्रोही कुछ भी गलत हो, चाहे वह उनके लिए हानिकारक न हो, पर दूसरे के लिए हो तब भी आवाज़ उठाते हैं, विद्रोह करते हैं।

नैन्सी का शांत स्वभाव उसका जन्मजात गुण था तो अनन्या का स्वभाव विद्रोही था। चार साल की अनन्या को जब बङे बच्चे तंग करते तो वह तुरंत उनका जवाब देती थी। मैं यह देखकर खुश थी कि उसे किसी के साथ भी गलत होना सहन नहीं था।और जब किसी को आवश्यकता होती तो सबसे पहले वह सहायता के लिए आगे बढ़ती थी।

वह जब मेरे पास आती तो बहुत शांत दिखती थी, लेकिन उसकी शरारती आँखे बताती थी कि वह किसी से कम नहीं थी, वह अपने आस-पास के वातावरण के प्रति बहुत सजग थी। जबकि उसका ‘आई क्यू’ अपनी आयू के बच्चों से कुछ कम था पर सिर्फ पढ़ाते समय ही प्रतीत होता था कि उसे देर से समझ आता है परंतु व्यवहारिक ज्ञान में उसे किसी भी रूप में पीछे नहीं कहा जा सकता था।

वह उस छोटी आयु में भी सबकी मित्र बनना चाहती थी और मित्रता निभाना भी जानती थी, इसीलिए सबके कष्ट समझती थी। विद्रोही स्वभाव के बच्चे अधिक भावुक और संवेदनशील होते है।

मंथन दूसरी कक्षा में पढ़ता था, उसे अपने पर पूर्ण विश्वास था और अपनी बूद्धि व समझ से दूसरों को परख कर वह व्यवहार करता था।आरम्भ में वह कुछ नहीं बोलता था पर उसके व्यवहार से उसकी सजगता प्रकट हो रही थी। जैसे वह बता रहा था कि उसे अभी हम पर विश्वास नहीं है । मेरी बातों को सुनते हुए वह भाव शुन्य रहता था ।पहले दिन उसकी किताबों को जैसे ही मैंने हाथ में लिया वैसे ही तपाक से उसने अपनी किताबें मुझ से ले ली और बोला,” आपको नहीं पता मुझे क्या और कैसे पढ़ना है?” उसने स्वयं एक किताब निकाल कर पढ़ना शुरू किया था।

मैं समझ गई थी कि उसे कुछ समय देना होगा और उसका विश्वास जीतना होगा वह न केवल शक्की अपितु स्वाभिमानी बच्चा भी था। अपने सम्मान के प्रति बहुत सतर्क था। कठिनाई यह थी कि कुछ अभिभावक ट्यूशन में बच्चे को भेजकर समझते हैं कि तुरंत बच्चे के रिजल्ट में सुधार हो जाएगा। पर मंथन तो अभी बात भी नहीं करना चाहता था।

दूसरों को परखना या जल्दी विश्वास न करना, क्या उसका जन्मजात स्वभाव था ? अथवा सामाजिक परिस्थतियों व बङों ने यह सिखाया था। वैसे थोङे शक्की सभी बच्चे होते हैं और यह होना भी चाहिए।

जैसे हमारे व्यक्तित्व के दो रूप होते हैं, हम घर के अंदर जो होते हैं वह घर के बाहर नहीं होते है। उसी प्रकार एक बच्चा जैसे घर पर व्यवहार करता है वैसे बाहर नहीं करता है। माता-पिता को उसके बाहरी स्वरूप का ज्ञान भी नहीं होता है।

मंथन की माँ को भी जल्दी थी पर दादी को समझ थी, उन्होंने बताया कि मंथन बहुत जिद्दी है व घर पर तो बहुत शोर मचाता है व जिद न मानने पर चिल्लाता भी है। यहाँ भी वह जिद् तो दिखा रहा था पर अपना गुस्सा दृढ़ता से चुप रहकर व रूखाई से दिखा रहा था।

मंथन ने शीघ्र ही समझ लिया था कि मेरे पास पढ़ने आए अन्य बच्चों में से पांचवीं कक्षा के मानव से उसकी नहीं पटेगी। मानव नर्सरी कक्षा से मेरे पास पढ़ रहा था अतः मेरे पर अपना अधिक अधिकार समझता था। मंथन जब मेरी बात नहीं सुनता तो मानव को अच्छा नहीं लगता था। इस पर मानव भी मंथन से रूखा व्यवहार करता था। मैंने मानव को समझाया कि उसे मंथन के व्यवहार को अनदेखा करना होगा, थोङे दिन में ठीक हो जाएगा। दस वर्षीय मानव के लिए यह समझना व करना कठिन था। क्योंकि उसने सामान्यतः बच्चों को ऐसा व्यवहार करते नहीं देखा था।

मंथन की स्कूल डायरी से पता लगा कि उसने कक्षा के किसी विद्यार्थी की किताब फाङ दी थी । मैंने प्यार से पूछा कि कक्षा में क्या हुआ तब वह गुस्से में बोला,” उसने मुझे मारा था।”
मेरे पुछने पर कि टीचर ने क्या कहा?, उसने बताया,” मैडम ने मुझे मारा था। मैं सबके साथ नहीं बैठता ज़मीन पर सबसे अलग बैठता हुँ।” मुझे अभिषेक की याद आई थी।

मंथन का कक्षा कार्य बहुत खराब और गंदा था। शायद इसीलिए वह अपनी काॅपियाँ नहीं दिखाता था। मैंने देखा कि उसने काॅपी में गलतियाँ रबङ से मिटाने के स्थान पर ऊँगली व थूक से मिटाई थी।

उससे पूछने पर बहुत रूखाई व नाराज़गी से उसने उत्तर दिया, “मम्मी रबङ नहीं देती व पैंसिल भी आधी देती है जो खो जाती है।”
मंथन का कष्ट समझ आ गया था। उसकी माँ का उत्तर था, ” मै क्या करूँ? यह प्रतिदिन पैंसिल रबङ खो देता है।मैं चाहती हुँ यह जिम्मेदार बने।”
मन में आया कहुँ कि ‘पहले आप स्वयं तो जिम्मेदार बने।’ पर नहीं कहा क्योंकि यह सीखने सिखाने में नहीं आता है।
मैंने उन्हें मंथन की स्कूल की काॅपियाँ दिखाई, जिसे उन्होंने शायद ही पहले देखा था। (माँ नौकरी करती थी)
उन्हें दिखाया कि रबङ के बिना वह कैसे मिटाता है और पैंसिल जो पहले ही आधी थी घिस कर छोटी होने पर वह कैसे लिख पाता होगा? खो जाने पर बिलकुल नही लिख पाता होगा और कक्षा में सबके सामने जिल्लत भी सहनी पङती होगी।
मुझे समझ नहीं आया कि अध्यापिका ने मंथन की शरारत की शिकायत तो डायरी में लिख भेजी थी परंतु उसकी पैंसिल- रबङ की समस्या को महत्व क्यों नहीं दिया गया था।
उन्हें कहा कि ‘ कक्षा में मंथन को अलग बिठाया जा रहा है, इस विषय में उसकी अध्यापिका से चर्चा करें कि ऐसे तो वह तनाव में होकर और विद्रोही हो रहा है।

मंथन उस दिन बहुत खुश था क्योंकि अब वह जमीन पर नहीं डेस्क पर बैठने लगा है।
हमारा बच्चा ही शरारती है, यह सोच कर, अनदेखा नहीं करना चाहिए, उसकी बात सुननी चाहिए व अध्यापिका के संपर्क में रहना चाहिए।

मंथन की समस्याएँ सुलझी, साथ ही मैंने उसका विश्वास भी जीत लिया था।
अब प्रश्न यह है कि क्या बच्चे को जिम्मेदारी का पाठ पढ़ाना चाहिए?

जिम्मेदारी का अहसास बच्चे में अवश्य जगाना चाहिए। लेकिन सजा के माध्यम से हम कोई पाठ नहीं सिखा सकते हैं।सजा से बच्चे के मन में आक्रोश ही पैदा होता है।बच्चे को कुछ सिखाने से पहले हमें उस माध्यम व मार्ग को अच्छी तरह परख लेना चाहिए, जिससे बच्चे को सिखाने जा रहे हैं। साथ ही यह नहीं भूलना चाहिए कि हम सिर्फ सिखा नहीं रहे हैं अपितु सीख भी रहे हैं। अतः अपनी सिखाने की प्रक्रिया को जाँचते रहना जरुरी है।