एक ही परिवार में पले- बढ़े बच्चों के स्वभाव व प्रवृतियों में भिन्नता पाई जाती है। प्रत्येक बच्चा अपनी जन्मजात प्रवृति व स्वभाव लेकर आता है ।एक समान शिक्षा- दीक्षा को वे अपनी – अपनी प्रवृति के अनुकुल ग्रहण करते हैं और भिन्न-भिन्न व्यक्तित्व का विकास होता है।

लव,कुश और मेघा ये एक ही परिवार के तीन बच्चे हैं। तीनों ही मेरे छात्र रहे हैं परंतु कुश दूसरी कक्षा से आठवीं कक्षा तक मेरे पास पढ़ा था।लव और मेघा एक ही वर्ष पढ़े थे।

सात वर्ष का कुश आरम्भ में बहुत शर्मीला था। पर उसकी आखें उसकी चंचलता और होशियारी बयां करती थी। उसे पढ़ना अच्छा लगता था पर खेलना भी चाहता था । यह खुशी की बात थी कि वह दोनो के लिए समय का तालमेल बना लेता था। काम करने की गति तीव्र थी और चूंकि मन से पढ़ता था तो काम समझने में देर नहीं लगाता था। उसने मुझ से यह निश्चित करा लिया था कि वह काम अच्छा और जल्दी पूरा कर लेगा तो उसकी जल्दी छुट्टी कर दूँगी जिससे उसे खेलने का अधिक समय मिल सके।

कुश का बङा भाई दस वर्षीय लव भोला, मितभाषी और विनम्र था। लव को पढ़ना बिलकुल पसंद नहीं था।उसे पढ़ने का उद्देश्य समझ नहीं आता था। मेरे पास सिर्फ 2 महीने ही पढ़ा था। ऐसा लगता था कि वह पढ़ना ही नहीं चाहता था, काम बहुत धीमी गति से करता था। खेलना उसे पसंद था पर उसमें यह भावना नही थी कि उसके लिए पहले पढ़ाई अच्छी और जल्दी कर ले।

लव, कुश की बहन मेघा अपने भाईयों से बङी थी।वह आठवीं कक्षा में पढ़ती थी। जैसा कि अधिकांशतः परिवारों में होता है कि लङकी को बाहर पढ़ने तो भेजते हैं पर इस भय के साथ कि कहीं उसके साथ कुछ गलत न हो जाए या वह स्वयं न भटक जाए। मेघा के परिवार में भी ऐसा ही था। लव का ध्यान इसी में रहता कि मेघा किस से बात कर रही है और फिर पूरी खबर घर जाकर माँ को देता था । मेघा बहुत तनाव में रहती थी।

एक ही पारिवारिक, आर्थिक व सामाजिक परिस्थिति में रहते हुए भी उनके व्यक्तित्व का विकास भिन्न ही रहा था। मेघा का विवाह 19 वर्ष में कर दिया गया था, वह अपने परिवार का दायित्व पूर्ण जिम्मेदारी से अवश्य निभा रही है पर उसमें घर से बाहर कोई काम करने का आत्मविश्वास नहीं है।

लव बहुत कम पढ़ाई कर सका था, वह अपने पिता का बिजनेस संभाल रहा है।
कुश ने ही पढ़ाई करी, ग्रेजुएशन करके होटल मैनेजमैंट का कोर्स किया व नौकरी कर रहा है।
प्रसिद्ध शायर निंदा फाजली ने लिखा है-
” पंछी, मानव,फूल, जल अलग-अलग आकार
माटी का घर एक ही, सारे रिश्तेदार।

पायल, हिमांशु और मानव तीनों भाई-बहन मेरे ही पास पढ़ते रहे थे। पायल ने स्कूल की पढ़ाई मेरे पास नहीं करी थी। पर मैंने उसके बचपन से उसे देखा था। हमेशा हँसती दिखती पायल के मन में बहुत दुख था। अपनी बीमारी के कारण वह बहुत चिङचिङी और गुस्सैल हो गई थी ।घर से बाहर वह जितनी खुश दिखती थी घर में उतनी ही परेशानी का सबब थी
बीमारी ने उसे दिमागी समझ से कुछ पीछे जरूर कर दिया था, पर उसकी मेहनत और निरंतर कोशिश व लगन से उसने बारहवीं तक पढ़ाई कर, जे.बी.टी का कोर्स किया व अब ग्रेजुएशन भी कर रही है।मुझे पूरी उम्मीद है कि नौकरी की कोशिशों में भी वह सफलता अवश्य पा लेगी।बीमारी आज भी उसके साथ है, जिसे उसने स्वीकार कर लिया है और एक जिद के साथ उसकी आगे बढ़ने की कोशिश ज़ारी है।

एक लङकी को घर से बाहर भेजने का भय इस परिवार में भी दिखता है,फिर पायल की बीमारी के कारण भी अनचाही अनहोनी घटने की कल्पना से प्रभावित हो, वे उसे घर से बाहर भेजना नहीं चाहते हैं।

लेकिन पायल सब समझते हुए भी अपने पाँव पर खङे होने के इरादे को डिगने नहीं देती है।
सोहनलाल द्विवेदी ने यह कविता पायल के समान हार न मानने वालों के लिए लिखी है-
लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती,………
असफलता एक चुनौती है, स्वीकार करो………
संघर्ष का मैदान छोङ मत भागो तुम…….
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती।

पायल हमेशा अपनी पढ़ाई के लिए या अन्य समस्याओं के समाधान ढूँढने मेरे पास आती है। यह कहना कठिन है कि वह मुझ से कुछ सीखती है या मुझे सिखाती है। सच, यही है कि वह ही मेरी गुरू है।

पायल का छोटा भाई हिमांशु प्रथम कक्षा से आठवी कक्षा तक मेरे पास पढ़ा था। हिमांशु बहुत ही मनोयोग से पढ़ाई करता था ।उसके लिए अध्यापक के शब्द ही पत्थर की लकीर थे। समस्या यही थी कि उसकी माँ कभी उसके नंबरों से संतुष्ट नहीं होती थी। हिमांशु को बिलकुल पसंद नहीं था कि उसकी माँ मुझ से आकर मिले। कारण था कि हिमांशु जितना शरीफ बन कर मेरे पास पढ़ता था, उतना ही वह घर पर शैतानी करता व माँ को परेशान करता था।

हिमांशु नहीं चाहता था कि उसकी माँ मुझ से उसकी शिकायत करे,यह बात तो कोई पसंद नहीं कर सकता है। मेरे बहुत समझाने पर भी उसकी माँ ने अपना स्वभाव नहीं बदला था। मानव के साथ भी वह यही करती थी, मानव हिमांशु का आठ साल छोटा भाई था, वह के. जी. कक्षा से मेरे पास पढता रहा था ।

हिमांशु मेरे पास सीधा बच्चा था पर घर में शरारती था, उसके घर व बाहर दो व्यक्त्तित्व दिखते थे, पर मानव जैसा घर में था वैसा ही बाहर था थोङा जिद्दी व गुस्सैल भी था। मानव मुझ पर अपना बहुत अधिकार समझता था। किसी अन्य बच्चे के सामने मैं उसे कुछ नहीं कह सकती थी।

हिमांशु और मानव दोनो बच्चे दिमाग के तेज थे। नए-नए काम करने में, प्रश्नों को भिन्न-भिन्न तरीके से हल करने में, ये आनंद लेते थे। हिमांशु पढ़ाई के प्रति हमेशा गंभीर रहा था, अपना काम हमेशा पूरा रखता था। उसका ध्यान कभी भटकता था पर फिर पढ़ते समय पूरा ध्यान देता था। इस समय उसने इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूर्ण कर ली है।

मानव को पढ़ाने में बहुत आनंद आता था क्योंकि वह प्रश्न बहुत करता था और बहुत जल्दी सब समझता था।घर में सबसे छोटा होने के कारण उसकी परवरिश बहुत लाड में हो रही थी जिसका वह पूरा लाभ उठा रहा था।जब वह सातवी कक्षा में आया तो मैंने महसूस किया कि वह अधिक खिलाङी हो रहा है अतः पढ़ाई को कम महत्व दे रहा है। पर मैं समझ सकती थी यह दौर कुछ ही समय का है। मानव अब दसवीं कक्षा की पढ़ाई कर रहा है।
पायल , हिमांशु और मानव तीनों ही बच्चे तीव्र दिमाग के होशियार बच्चे हैं। ये तीनों जन्मजात लगन के पक्के हैं।

दोनों परिवार लङकियों को पढ़ाने के लिए विशेष उत्साही नहीं थे। मेघा की शादी छोटी आयु में ही कर दी गई थी। लङकियों को पढ़ाई कोई नौकरी या व्यवसाय कराने के उद्देश्य से नहीं कराई जाती है।उन्हें आत्मनिर्भर बनाने का विचार भी उनके मन में नहीं होता है।

जिन घरों में व्यापार या व्यवसाय करने की परंपरा चल रही हो, वहाँ लङकों को भी पढ़ने के लिए विशेष उत्साहित नहीं किया जाता है।इसीलिए लव के मन में आरम्भ से ही पढ़ाई के प्रति जिम्मेदारी का अहसास नहीं था।फिर भी कुश ने अपनी रूचि से पढ़ाई करी थी। प्रत्येक बच्चा अपनी रूचि से अपने जीवन पथ का चुनाव करता है।

पायल को पढ़ने के लिए बहुत संघर्ष करना पङ रहा है। वह भी अपने भाईयों की भांति आत्म निर्भर होना चाहती है। वह हमेशा से नौकरी करने का सपना देखती रही है जिससे वह अपने माता-पिता पर निर्भर न रहे।
परंतु माता-पिता व भाई भी उसे एक आराम का जीवन देना चाहते हैं,वे नहीं समझ पा रहे हैं कि वह घर का आराम छोङ कर बाहरी दूनिया के धक्के खाना क्यों चाहती है।यदि यह सच है कि वे पायल की बीमारी के कारण भी उसे घर से बाहर नहीं भेजना चाहते है पर यह भी कङवा सच है कि वह स्वस्थ होती तो उसका विवाह कर दिया जाता ।

समझना कठिन है कि इन्हें अपनी बेटियों और बहनों के लिए सुख घर की चहार दीवारी में ही क्यों नज़र आता है? क्या वाकई घर में रह कर ही सुख है? नौकरी को संघर्ष का पर्याय क्यों माना जाता है ? इसीलिए पुरूष यह कहते दिखते हैं कि हम संघर्ष कर रहे है तो तुम लङकियों को क्यों परेशान होना है, तुम आराम से घर देखो।
आत्मनिर्भर होने में स्वाभिमान तो हो सकता है पर संघर्ष कैसे? समाज बदल रहा है, आज लङकियों की शिक्षा के लिए हर वर्ग जागरूक हो रहा है। लङकियाँ आत्म निर्भर भी हो रहीहै, पर कठिनाई के साथ…..। परिवर्तन हो रहा है और समाज विकास की ओर बढ़ रहा है।
हिमांशु और मानव के पिता भी व्यवसायी है, पर दोनों बच्चों की पढ़ाई को भी महत्व दिया गया है, जिससे उनकी सूझ-बूझ बढ़े और अपनी पसंद का व्यवसाय या नौकरी का चुनाव करने के लिए वे सक्षम हो।