नाटक -‘मुगल- ए- आज़म

निर्देशक – फिरोज़ अब्बास

1960 में प्रदर्शित फिल्म ‘मुगल-ए – आज़म मेरी पसंदीदा फिल्मों में से एक है।यह भव्य फिल्म अपने समय की ही नहीं आज भी कलात्मकता की अनूठी मिसाल है।

इस फिल्म का नाट्य मंचन हुआ है, ऐसा जानने पर यही प्रश्न मन में आया कि क्या फिरोज़ अब्बास खान ने इस अनमोल कला को एक नया आयाम दिया होगा?

नाटक देखने से पूर्व फिल्म के संवाद, संगीत व गाने न केवल कानों में गूँज रहे थे अपितु पूरी फिल्म ही आँखों के सामने चल रही थी।

मंच पर नाटक आरम्भ हुआ और शीघ्र ही हम नाटक में खो चूके थे । संवाद तो वही थे जो कुछ देर पहले कानों में गूँज रहे थे।गीत भी वही जो दिल में बसे थे। परंतु यह फिल्म नहीं थी, नाट्य मंचन था।

यह नाटक कला की सच्चाई का प्रतिरूप बन कर उभरा है। नाट्य मंचन की दूनिया में एक सफल अनोखा अनूठा प्रयास है। हम एक देखी- सुनी कहानी के प्रस्तुतिकरण से हतप्रभ थे। अभिनेताओं द्वारा संवादों को बोलने की शैली उस कहानी को नए रूप में हम तक पहुँचा रही थी।

प्रत्येक गीत व नृत्य का मंचन ह्र्दय को गदगद कर रहा था। शकील बदायुनी लिखित गीत ‘ प्यार किया तो डरना क्या’ मंच पर देख हम अभिभूत थे। अगर के. आसिफ साहब ने इस नृत्य को फिल्माने के लिए कोई भी त्रृटि नहीं छोङी थी, तो निर्देशक फिरोज़ अब्बास साहब ने इस गीत- नृत्य के मंचन में कला को एक नई ऊँचाई में पहुँचा दिया है।

के. आसिफ साहब ने इस गाने के लिए शीशमहल का विशेष सेट तैयार कराया था और फिर गीत के बोलो की गुंज व मधुबाला के नृत्य ने उस शीशमहल में उस दृश्य को जीवंत किया था।

उसी खूबसूरती को फिरोज साहब को इस मंच में बिखेरनी थी, हमारी आँखें भी इस गीत व नृत्य का नाट्यमंचन देखने के लिए बैचेन थी।

दृश्य आरम्भ हुआ, अनारकली के रूप में प्रियंका बर्वे की मधुर आवाज व नृत्य तथा अन्य नृत्यांगनाओं के नृत्य मंच पर अद्भूत छटा बिखेर रहे थे। मंच सज्जा, लाइटों के प्रयोग ने उस दृश्य को इस तरह जीवंत बनाया कि हम फिल्म के फिल्मांकन को भूल गए थे। दृश्य के अंत में सलीम के चारों ओर गुजंता गीत,’ प्यार किया तो डरना क्या’ व नृत्यांगनाओं का अद्भूत नृत्य तथा मंच का सुदंर प्रयोग, रोशनी का सटीक संयोजन सबने मिलकर जैसे के. आसिफ के शीशमहल को मंच पर उतार दिया था। और मुहँ से निकला, ‘वाह!’

नाटक के प्रत्येक दृश्य को स्वाभाविक बनाने के लिए मंच सज्जा पर बहुत बारिकी से काम किया गया था। दरबार का दृश्य, बाग का दृश्य हो अथवा महल का दृश्य देखते हुए मंच आपको निराश नहीं करता है, अपितु उत्साहित करता है।

युद्ध के दृश्य की प्रस्तुति आपको युद्ध में पहुँचा देती है दृश्य को सफल बनाने के लिए रोशनी के प्रयोग के साथ कुछ प्रतीकों का भी सफल प्रयोग किया गया है , फिर अकबर और सलीम के बीच के युद्ध का दृश्यांकन मन द्रवित कर देता है, यह सिर्फ मंच पर दृश्य के प्रस्तुतिकरण का प्रभाव था।

नाट्य मंचन में मंच का सफल उपयोग आवश्यक है और यह तो फिल्म मुगल – ऐ – आज़म का नाट्य मंचन था, यह खुशी की बात है कि फिरोज साहब ने इसमे कोई कमी नहीं छोङी है, तभी यह नाटक भी बना है कला की अनोखी मिसाल।

कलाकारों का अभिनय व संवाद शैली इस नाटक को एक नए अंदाज़ में प्रस्तुत करता है।सभी मुख्य व सहकलाकारों के अभिनय की प्रशंसा के साथ नृत्यांगनाओं के नृत्य की सराहना बहुत आवश्यक है , जिनसे दृश्य सुंदर और प्रभावशाली बने थे।

महारानी जोधा के आदेश पर बहती तानसेन की रागनियाँ व कत्थक नृत्यांगनाओं के घूघँरूओं की झंकार हमारे हृदय को भी संगीत मय कर देती है। और अंत में वह गीत व नृत्य ‘खुदा निगहबान हो तुम्हारा।’ दृश्य को इस खूब सूरती से प्रस्तुत किया गया है कि ‘ उठे जनाज़ा….’ पर आह निकलती है।

अभिनेताओं और अभिनेत्रियों की प्रशंसा मात्र उनके अभिनय के लिए नहीं की जा सकती है उनके गाए गीत उसी प्रकार दिल में प्रभाव छोङते गए जैसे फिल्म के गीत । कलाकारों द्वारा स्वयं मंच पर ही अभिनय और नृत्य के साथ गीत गाए गए हैं। मंच के पीछे से कोई रिकाॅर्ड नहीं बजता हैं। हम प्रत्यक्ष रूप से कलाकारों को गाते हुए देखते व सुनते हैं।कलाकारों का प्रत्यक्ष गायन दृश्यों को देखने का आनंद बढ़ा देता है।

‘ तेरी महफिल में किस्मत आज़माकर हम भी देंखेगे।’ इस कव्वाली की प्रस्तुति कलाकारों के गान व कत्थक नृत्यांगनाओं के नृत्य से बहुत रोचक बन गई थी।

अंत में यही कहना होगा कि सच्चे कलाकार जो अपनी कला के साथ समझौता नहीं करते है, उनकी कला इतिहास रचती है। फिरोज अब्बास खान ने भी इस नाट्य मंचन से नाटक के इतिहास को नया आयाम दिया है।