प्रशिक्षित अध्यापक बनने के लिए एन.टी .टी, जे.बी.टी और बी.एड. जैसे कोर्स करने होते हैं। सभी अध्यापकों को बाल- मनोविज्ञान की पूर्ण जानकारी दी जाती है। अध्यापकों के साथ बच्चे जीवन का कुछ समय बिताते हैं, परंतु माता-पिता का साथ तो पूरा जीवन होता है।
प्रश्न यह है कि क्या अपने बच्चों की परवरिश के लिए माता-पिता को प्रशिक्षण की आवश्यक्ता नहीं है?

हमारे देश में आज भी कई पिछङे स्थानों में बाल- विवाह हो रहे हैं, छोटी आयु में ही वे माता-पिता बन जाते हैं । इन अभिभावकों को उनके बच्चों के लालन- पालन के लिए शिक्षित करने के लिए कई सामाजिक संस्थाएँ काम करती हैं, जिसमें बच्चों के स्वास्थ्य व शिक्षा संबधी ज्ञान दिया जाता है।

छोटे शहरों व बङे शहरों के शिक्षित माता-पिता को भी बच्चों के परवरिश के लिए प्रशिक्षित करना आवश्यक है। ये वे माता-पिता होते हैं जो अपने बच्चों को दुनिया की दौङ में शामिल करने के लिए बेताब व बैचैन होते है, साथ ही इस घबराहट के साथ कि क्या हमारा बच्चा दुनिया की दौङ में सफल हो पाएगा?

मेरी मनोवैज्ञानिक मित्र प्राची का कहना है कि ” कई बार जब माता- पिता मेरे पास अपने बच्चे को एक समस्या बच्चे के रूप में लाते हैं तो मैं हैरान होती हुँ कि बच्चे का व्यवहार स्वाभाविक है। समस्या तो माता-पिता के अपने व्यवहार और समझ में होती है। बच्चे का जिद करना व गुस्सा करना एक स्वाभाविक व्यवहार है पर अधिकांशतः माता-पिता बच्चे के गुस्से व जिद को गलत मानते हैं।वे उसे एक आदर्श बच्चा बनाना चाहते हैं। वे स्वयं अपने व्यवहार और स्वभाव को भूल जाते हैं।”
बाल- मनोवैज्ञानिक प्राची का मानना है कि, “प्रत्येक दंपति को माता-पिता बनने से पहले प्रशिक्षित होना आवश्यक है, उन्हें बाल-मनोविज्ञान की गहरी समझ होनी चाहिए। चूंकि बच्चे की परवरिश एक बहुत बङी जिम्मेदारी है।”

प्रत्येक बच्चा एक स्वतंत्र व्यक्त्तित्व लेकर इस दूनिया में आता है ।दूनिया में उसके आस-पास का वातावरण, परिवेश, परिस्थितियाँ व उसके साथ रहने वाले लोगों का स्वभाव और बच्चे के प्रति उनका व्यवहार उसके व्यक्तित्व के नव निर्माण के लिए उसे एक सांचा देते है।
सबसे महत्वपूर्ण बच्चे के प्रति उसके अभिभावक का व्यवहार, उनका अपना सामाजिक व्यवहार और स्वभाव, एक बच्चे के व्यक्तित्व पर प्रभाव डालता है। अभिप्राय यही है कि बच्चे सबसे अधिक अपने अभिभावकों का अनुसरण करते हैं।

लेखक मायाराम पतंग ने अपनी पुस्तक ‘अभिभावक कैसे हो’ में इस तथ्य को विशेष महत्व दिया है कि अभिभावकों का भी प्रशिक्षण आवश्यक है। यह हिन्दी साहित्य में पहली अनूठी पुस्तक लिखी गई है जो अभिभावकों को सिखाती है । इस पुस्तक में लिखा है कि “माता – पिता बच्चों के प्रथम गुरू होते हैं। माता-पिता तो बन ही जाते हैं, पर अच्छे माता- पिता बनना कठिन कार्य है। अच्छे अभिभावक बनने के लिए भी मेहनत करनी होती है। अच्छे अभिभावक वे ही हो सकते हैं जो अपने बच्चे के सर्वागीण विकास पर ध्यान देते हैं।”

प्यार तो सभी अपने बच्चों से करते हैं पर उनके प्रति आप की संवेदनशीलता और उन्हें समझने की कोशिश आपको अच्छा अभिभावक बना सकती है।
लक्ष्य की माँ बहुत महत्वाकांक्षी थी, वह चाहती थी कि उनका बेटा प्रत्येक क्षेत्र में अव्वल आए, जिसके लिए वह बहुत मेहनत करती थी। चूंकि वह एक महत्वाकांक्षी महिला थी अतः उनकी अपने प्रति भी कुछ अभिलाषाएँ थी। इसके लिए उन्होंने स्वयं भी एक छोटा व्यापार करना आरंभ किया था।महत्वाकांक्षी और मेहनती ये दोनो ही गुण सफलता के लिए आवश्यक होते हैं जो उनमें मौज़ूद थे।

पर लक्ष्य अभी मात्र छः वर्ष का था, जब मेरे पास आया था, वह महत्वाकांक्षा और मेहनत दोनो से अंजान था । वह सिर्फ खुश रहना जानता था, और अपनी माँ को खुश देखना चाहता था। अतः माँ की अपेक्षाओं में खरा उतरने के लिए पूरी कोशिश करता व कामयाब भी हो रहा था।

उसकी माँ को अपनी व्यस्तता की मजबूरी में लक्ष्य को मेरे पास पढ़ने भेजना पङा था, लेकिन उन्हें सिर्फ अपने पर विश्वास था। जिस कारण वह लक्ष्य को क्या पढ़ाई करानी है, उसकी एक लिस्ट मेरे पास भेजती थी। यह मेरे काम करने का तरीका नहीं था। लक्ष्य अभी दूसरी कक्षा में आया था, लंबे-लंबे वाक्य लिखना अभी सीख रहा था, अतः लिखने की गति अभी धीमी थी।
आरंभ में लक्ष्य मेरे पास चहकता हुआ आता था, उसे मुझे बहुत कुछ बताना होता था। पर धीरे-धीरे उसका उत्साह कम होता दिखने लगा था।अब लक्ष्य बहुत सहमा होता था और सिर्फ पढ़ाई पर ध्यान देने लगा था । किसी दिन ऐसा लगता कि घर पर शायद उसकी पिटाई लगी हो। लक्ष्य मानव के ही पङोस में रहता था अतः दोनो साथ आते थे। एक दिन मानव अकेला आया और बोला,” आज लक्ष्य देर से आएगा क्योंकि उसकी पिटाई लग रही है।”

मानव ने बताया कि लक्ष्य जब स्कूल से घर पहुँचता है तो उसकी माँ सर्वप्रथम उसकी काॅपियाँ देखती हैं और कक्षा कार्य में हुई गलतियों के कारण उसकी पिटाई होती है। ट्यूशन से जाकर भी वह हम बच्चों के साथ खेलने नहीं आता हैं, पढ़ाई करता है?
लक्ष्य स्कूल की सभी प्रतियोगिताओं में भाग लेता था, प्रतियोगिता की तैयारी में भी पूरी मेहनत की जाती थी, यह प्रसन्नता की बात है कि लक्ष्य सभी प्रतियोगिताओं में अव्वल आता था । परंतु इन प्रतियोगिताओं में खेल प्रतियोगिता नहीं थी।

एक दिन लक्ष्य आया तो उसका मुहँ लाल था, उसका बदन गरम था ।मुझे लगा उसे बुखार है, मानव बोला,” आज भी पिटाई हुई है।”
इस स्थिति में वह पढ़ने में मन लगाएगा, यह सोचना भी व्यर्थ था। मैंने उसकी माँ से बात की, समझाने की कोशिश भी की, ” अभी लक्ष्य बहुत छोटा है, पढ़ाई के लिए इतना दबाव डालना ठीक नहीं है।”
पर उन्हें मेरा सुझाव पसंद नहीं आया था, अपितु यह उनको मेरी दखलअंदाजी लगी थी। अगले दिन से उसने मेरे पास पढ़ना छोङ दिया था।

रिचा की माँ स्वयं बहुत अच्छी अध्यापिका थी। वह पहले अध्यापन कार्य भी करती थी, पर अपने बच्चों के कारण छोङ दिया था। वह रिचा को प्रत्येक पाठ बहुत अच्छी तरह समझाती थी । पेङ-पौधों के विषय में बताने के लिए उसे बगीचे में ले जाती थी। अक्सर पाठों को समझाने के लिए वह उसके साथ प्रेक्टीकल करती थी। रिचा भी होशियार थी, बहुत जल्दी सब समझती थी।

जब मेरे पास आई तब उसकी तीसरी कक्षा का आरंभ था । लिखने की गति धीमी थी और लिखाई भी अच्छी नहीं थी। लेकिन जल्दी ही इसमें सुधार आया था। उसकी छोटी बहन बहुत छोटी थी, अतः माँ उसे कम समय दे पाती थी। तीसरी कक्षा की पढ़ाई उसने बहुत मन से की थी, वह हमेशा खुश रहती थी। रिजल्ट भी अच्छा आया था।

पर चौथी कक्षा में धीरे-धीरे वह क्षुब्ध रहने लगी, पढ़ाई से ध्यान उचटने लगा था। मुझे लगा कि इस आयु में बच्चे खिलाङी होने लगते हैं। कुछ दिन बाद तो जैसे वह मेरे पास पढ़ने नहीं खेलने आती थी। उसका कहना होता, ” आंटी, आप मुझे ज्यादा नहीं पढ़ाओ, घर जाकर फिर पढ़ना तो पङेगा ही, मम्मी स्कूल से आकर पढ़ाती है, फिर आपके पास पढ़ो और घर जाकर दूबारा पढ़ो”

मैंने कहा,” यहाँ सब काम अच्छा करोगी तो घर पर मम्मी को नहीं पढ़ाना पङेगा”
वह बोली,” नहीं, आंटी, मम्मी सिर्फ पढ़ाई की बात करती हैं।”
यहाँ भी समस्या नंबरों की थी । प्रत्येक सप्ताह होने वाली कक्षा परीक्षा का बोझ उसकी माँ ने अपने ऊपर ले रखा था। रिचा में प्रश्न समझ कर उत्तर देने की क्षमता बहुत अच्छी थी। पाठ पर आधारित प्रत्येक प्रश्न के उत्तर बहुत अच्छे देती थी। माँ चाहती थी कि रिचा परीक्षा में प्रत्येक प्रश्न का उत्तर सही लिखकर दें।इस कारण वह उसे पाठ बार-बार समझाती थी। यह समझाना वास्तव में रटाना बनता जा रहा था, यह उन्हें समझ नहीं आ रहा था।

एक दिन रिचा की माँ ने कहा, ” मैंने यह पाठ इतनी बार इसे समझाया था फिर भी रिचा कक्षा परीक्षा में एक प्रश्न का उत्तर नहीं लिख कर आई है।”
मैने उनसे कहा,” यह पाठ रिचा की अध्यापिका ने भी समझाया होगा, आपने भी कई बार समझाया। तो एक बात पर ध्यान दें जब आप पाठ समझा रहीं थी क्या उसका ध्यान आपकी बात पर था? ”
“बच्चें जब बङे हो रहे होते हैं, वह खिलाङी भी हो रहें होते हैं। ऐसा नहीं कि उसे पाठ समझ नहीं आया था, सिर्फ उसका ध्यान बँट रहा है।”
मैंने उनसे उसकी सारे दिन पढ़ने की शिकायत के विषय में बताया था। उन्होंने इसे स्वीकार नहीं किया था।अभिभावकों को बुरा लगता है जब बच्चे उनकी शिकायत किसी अन्य से करते हैं।

मैंने उन्हें कहा कि “शायद वह अपनी छोटी बहन को खेलता देख भी परेशान होती है”
वह बोली, ” हाँ, मुझ से कहती है कि आप छोटी को नहीं पढ़ाती हो।”
मैंने उनसे कहा,” आप उसके अंदर अहसास जगाए कि वह बङी है और अधिक समझदार है। छोटी बहन की कुछ देखभाल उससे कराएँ।अपने को बङा समझेगी तो अपनी पढ़ाई को भी उससे बङा समझेगी।”

छोटी बेटी अब कुछ समय के लिए स्कूल जाने लगी थी और माँ के पास बङी बेटी की चिन्ता करने का अधिक समय हो गया था।
मैंने उन्हें इसका अहसास भी कराना चाहा कि वह स्वयं रिचा को पढ़ाने में समर्थ है। उस पर ट्यूशन का बोझ न डाला जाए।

मुझे अफसोस होता है कि अभिभावक बच्चे के बालपन पर ही पढ़ाई का इतना बोझ डाल देते हैं कि किशोरावस्था तक उनकी पढ़ाई से रूचि समाप्त हो जाती है। फिर भी अभिभावक नहीं समझते और बच्चों को ही दोष देते हैं।

आज का अभिभावक अपने बच्चों को हर गतिविधि में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित तो करता है पर बहुत कुछ सिखाने की चाह में बच्चों से उनका बचपन छीन लेता है।

एक बार प्रसिद्ध भरतनाट्यम नृत्यांगना हेमामालिनी ने कहा कि मैं अच्छी नृत्यांगना अपनी माँ के कारण बनी हुँ। उनके अनुशासन और मेहनत ने मुझे इस मंजिल तक पहुँचाया है। पर आज मैं अपना बचपन याद करती हुँ, जो मुझे कभी मिला ही नहीं था, गुङियों का खेल नही खेला, बाहर मैदान में दौङ नहीं लगाई, दोस्तों के साथ मस्ती नहीं करी, मुझ से मेरा बचपन छीन गया था।