रहिमन मनहि लगाईं कै, देखि लेहू किन कोय।
नर को बस करिबो कहा, नारायन बस होय।

सामान्यतः हम उन बच्चों को प्रतिभाशाली कहते हैं, जो किसी भी विशेष क्षेत्र में सर्वोतत्म कार्य कर दिखाते हैं, हम उनके लिए तालियाँ बजाते हैं, उनके नाम अखबार और मीडिया में प्रसिद्ध होते हैं।
मेरे विचार से तो सभी बच्चे प्रतिभाशाली हैं। पिछले दिनों एक माँ ने मीडिया में एक पोस्ट डाली थी। उसके बेटे ने बारहवीं कक्षा में 60% अंक प्राप्त किए थे, वह अपने बेटे पर गर्व महसूस कर रही थी। एक माँ से अधिक कौन अपने बच्चे की प्रतिभा को पहचान सकता है? उस माँ ने यह कहने का प्रयास किया है कि सिर्फ 90%-100% अंक प्राप्त करने वाले विद्यार्थी ही प्रतिभाशाली नही होते है। यह सिर्फ आपके दिमाग में उपस्थित नंबरों का खेल है।

प्रत्येक विद्यार्थी जो मेहनत करता है, पुरज़ोर कोशिश करता है, वह प्रतिभाशाली है, सफलता असफलता के साथ प्रतिभा को नही जोङा जा सकता है। सीखने की इच्छा और आगे बढ़ने की निरंतर कोशिश प्रतिभा परखने के मापदंड हो सकते हैं।

चींटी कितनी बार चढ़ी और कितनी बार गिरी यह महत्वपूर्ण नहीं है, महत्वपूर्ण यह है कि उसने हार नहीं मानी और कोशिश बकरार रखी।

वे बच्चे जिनकी परिस्थितियाँ विकट होती हैं, साधन व सुविधाएँ मामूली व न के बराबर होती है, वे भी सपने देखते हैं व कोशिश करते हैं और मेहनत करते हैं। महत्वपूर्ण यह नहीं कि वे कितने सफल होते हैं? सफलता के आंकङे से उनकी प्रतिभा को आंका नहीं जा सकता है। वे सपने देखते हैं, फिर उनकी मेहनत ही उनको प्रतिभाशाली बना देती हैं। वे अपनी परिस्थितियों व संघर्ष के लिए शिकायत नहीं करते हैं पर बदलाव के लिए निरंतर प्रयास करते हैं। इनकी यही प्रतिभा इन्हें भीङ से अलग खङा कर देती है।

नितिन, सीलु, महीप, प्रेमा और उसकी बहनें आदि, ऐसे कितने बच्चे हैं, जिनमें सीखने की इच्छा और जीवन में आगे बढ़ने का जज्बा कूट-कूट कर भरा होता है। ये वे बच्चे होते हैं, जो दूसरे के जीवन से अपने जीवन की तुलना नहीं करते हैं। अपने जीवन की सच्चाई को स्वीकार करते हुए उससे पूर्णतः संतुष्ट रहते हुए, अपने कठिन पथ पर आगे बढ़ते हैं।

प्रेमा के पिता मज़दूर है और माँ घर- घर जाकर लोगों के घर का काम करती हैं। इस वर्ग के पिता, समाज के सबसे नकारा व्यक्ति होते हैं। दिन- भर मज़दूरी करते हैं, फिर दिन भर की कमाई से शराब पीते हैं। इन्हें अपने परिवार की जिम्मेदारी का अहसास नहीं होता है।

इस वर्ग में माँ मेहनती और हिम्मतवाली होती है, और अपने बच्चों का जीवन सुंदर बनाने का सपना देखती हैं। प्रेमा की माँ ने भी अपनी चार बेटियों का जीवन उज्जवल करने का सपना देखा और बेटियों ने उसका साथ देते हुए उस सपने को पूर्ण किया था।

प्रेमा और उसकी बहनें सरकारी विद्यालय में पढ़ती थी, कई बार शाम को माँ की सहायता करने आती थी, ट्युशन पढ़ती और अपने घर का काम भी करती थी।
प्रेमा की बहन को स्कूल की हाॅकी टीम में चुना गया और पिता के विरोध के बाद भी माँ ने अपनी बेटी का दृढ़ता से साथ दिया था। अपने समाज के विरोध की चिन्ता न करते हुए अपनी बेटियों की शिक्षा पूर्ण करने के साथ, उनके अपने पाँव पर खङे होने के बाद ही उनका विवाह किया था।

ममता अपनी बेटी सीलु को स्कूल पढ़ने नहीं भेज सकी थी। सीलु का पिता शराबी नहीं था, घर की जिम्मेदारियों के प्रति सजग होते हुए भी, वह परंपरावादी था। वह अपनी बेटियों को स्कूल भेजना नहीं चाहता था। पर ममता ने अपनी बेटियों को शिक्षित करने की ठान रखी थी।

सीलु एक समाजसेवी संस्था के विद्यालय में पढ़ने जाती थी। पिता के विरोध के बावजूद ममता उसे स्वयं उस विद्यालय तक छोङने जाती थी।

सीलु भी जब समय होता अपनी माँ के साथ दूसरे घरों में काम करने आती थी। एक दिन ममता ने मुझ से कहा,” आप सीलु की पढ़ाई देखिएगा, इसके पापा कहते है,” तु इसे पढ़ने तो भेजती है, पर इसे कुछ आता नहीं है।” “पर सीलु परीक्षा में तो नंबर लाती है, इसकी अध्यापिका भी इसकी प्रशंसा करती है। यह तो घर पर भी बहुत पढ़ती है।”

एक दिन सीलु अपनी किताबें लेकर मेरे पास आई। मैंने उसे उसकी हिन्दी के पाठ पढ़ने को कहा, उसने पाठ बहुत अच्छी तरह पढ़ा था। उस पाठ के प्रश्नों के उत्तर भी रटे हुए तोते की तरह सुना दिए, फिर बिना देखे, लिख कर भी दिखा दिए। दीपावली का प्रस्ताव जैसा अध्यापिका ने लिखाया बिलकुल वैसा सुनाया भी और लिखकर भी दिखा दिया था, लिखाई बहुत साफ और एक भी शब्द गलत नहीं लिखा था।
इंगलिश में भी ‘My teacher’ पर दस लाइनें सही लिख कर दिखाई, पर पाठ नहीं पढ़ सकी थी। छोटे- छोटे शब्द पढ़ लेती थी।
सवाल भी सब आते थे, वह जमा, घटा गुणा और भाग भी बिना कठिनाई के करती थी।

फिर भी मेरे मन में कुछ शंका थी। मैंनै उसे हिन्दी के अखबार से कुछ पढ़ने को कहा, वह पढ़ नहीं सकी थी। अलग काॅपी में कुछ आसान शब्द लिखकर दिए, वह उन्हें भी नहीं पढ़ सकी थी। जिन पाठों को रटे हुए तोते की तरह पढ़ व लिख भी रही थी, उन्हीं पाठों के शब्दों को बीच- बीच में से पढ़ाने पर वह कठिनाई से कुछ शब्द ही पढ़ सकी थी। उसके अक्षर ज्ञान व मात्राओं की परीक्षा लेने पर उसने शतप्रतिशत सही उत्तर दिए थे। अब समझ नहीं आया कि फिर वह पढ़ क्यों नहीं सकती थी?

उसे अक्षरों व मात्राओं को स्वयं मिलाकर पढ़ना नहीं आ रहा था। यह उसकी विलक्षण प्रतिभा ही थी कि जब कक्षा में पाठ पढ़ कर सुनाया जाता था, तभी उसे पाठ कठंस्थ हो जाता था। उसके दिमाग में शब्दों के चित्र तो बनते थे, तभी वह लिख भी सकती थी, पर उन शब्दों का निर्माण कैसे हुआ, उसको जानने की कोशिश व इच्छा उसमें नहीं थी। वह मेहनत रटने में कर रही थी।

परंतु सीलु जैसे मेहनती बच्चे जब अपनी गलती समझ जाते हैं, तब वह सुधारने में भी पूर्ण लगन से कोशिश करते हैं। एक कठिनाई थी कि सीलु की भाषा साफ नहीं थी, ग्रामीण उच्चारण उसे नए शब्द सीखने में बाधा उत्पन्न कर रहा था ।अतः अंग्रेजी के शब्द सीखने में उसे अधिक कठिनाई आ रही थी। पर निरंतर अभ्यास व मेहनत से सीलु ने अपनी सभी कमियों में सफलता प्राप्त करी थी। मुझे किन्ही कारणों से उस मकान से शिफट होना पङा था। सीलु को छोङने का मुझे बहुत दुख था, वह भी परेशान थी कि उसकी पढ़ाई कैसे होगी?
पर मुझे विश्वास है कि वह हार मानने वालों में से नहीं है। अवश्य ही वह अपने सपने पूरे करेगी।

नितिन अपने माता-पिता व छोटे भाई नितिश के साथ गाँव से शहर आया था। नितिन के पिता ने शहर में माली का काम करना शुरू किया व माँ ने किसी के घर आया का काम ले लिया था। नितिन व नितिश दोनों का प्रवेश एक छोटे प्राइवेट स्कूल में करा दिया गया था। माता-पिता दोनो अल्प शिक्षित थे। नितिन के दूसरी कक्षा में प्रवेश करने पर उन्होंने उसे मेरे पास भेजना शुरू किया था।

प्रथम दिन नितिन आया और फर्श पर बैठ गया जबकि अन्य बच्चे कुर्सी पर बैठे थे। सब बच्चे हैरान- परेशान उसे नीचे बैठा देख रहे थे, वे सब समझ रहे थे कि वह अपने शौक से नीचे नहीं बैठा है, अपितु अपने को निम्न दर्जे का समझ कर उसने नीचे फर्श पर बैठना उचित समझा है।

मैंने उसे बुलाया और अपने पास कुर्सी पर बिठाया तो सभी बच्चो के चेहरे खिल गए और नितिन के चेहरे पर शर्मीली मुस्कान खिल गई थी।
इस बच्चे को उसकी परिस्थिति का इतनी अच्छी तरह ज्ञान कराया गया था कि वह कभी दूसरे बच्चों की कीमती रंगबिरंगी पेंसिल-रबङ इत्यादि वस्तुओं पर निगाह उठा कर भी नहीं देखता था। हमेशा अपनी वस्तुएँ ही प्रयोग में लाना पसंद करता था।

एक अन्य गुण उसमें था कि वह सिर्फ अपनी पढ़ाई पर ध्यान देता था। अन्य बातुनी बच्चे बातें करते, शैतान बच्चे एक-दूसरे को परेशान करते या आपस में लङते भी थे। पर वह किसी पर ध्यान नहीं देता था, न दूसरे ही उसे परेशान करते थे। पर सभी बच्चे उसे पसंद भी करते थे, चूंकि वह तटस्थ रहता और समय पर दूसरों की सहायता भी करता था। जब वह जरूरी समझता तब बातचीत में भाग भी लेता था विशेष रूप से जब मै कोई विषय समझा रही होती थी, वह अपनी शंकाएँ मेरे सामने निःसंकोच रखता था।

एक दिन हम तैराकी पर बात कर रहे थे। गर्मी की छुट्टियाँ शुरू हो गई थी और कुछ बच्चे तैराकी सीखना चाहते थे। इस बात पर चर्चा हो रही थी कि स्वीमिंग पुल का पानी साफ होना चाहिए व तैराकी एक व्यायाम भी है।
तभी मैंने नितिन को देखा, वह अपने काम में व्यस्त होते हुए भी, सबकी बातें ध्यान से सुनते हुए धीमे-धीमे मुस्करा रहा था।
मैंने उससे पूछा, ” तुम छुट्टियों में अपने गाँव जाओगे?”
वह बोला,” हाँ, इसीलिए छुट्टियों का काम जल्दी- जल्दी पूरा कर रहा हुँ।”
मैंने पुछा,” तुम्हें तैरना आता है?
मेरा जवाब उसने शर्माते हुए दिया, ” हाँ, मेरी नानी के गाँव के साथ ही नदी बहती है।”
उसकी बात सुनकर सभी बच्चे दंग थे। मैंने नितिन से कहा कि तुम सबको अपने तैराकी के अनुभव बताओ।

नितिन ने बताया,” मैं बहुत छोटा था जब मेरे मामा मुझे नदी पर ले जाते थे, उनके साथ ही हाथ- पैर चलाते हुए मै तैरना सीख गया था, उसके बाद जब भी मौका मिलता, मैं अपने मित्रों के साथ जरूर तैरने जाता हुँ।छुट्टियों में मुझे गाँव जाना अच्छा लगता है, हम सुबह जल्दी उठते हैं, खेतों में घूमने जाते हैं, नदी में तैरने जाते हैं।”
मानव ने पूछा, ” नदी का पानी साफ होता है?, गंदे पानी में बीमार पङ सकते हैं।”
नितिन ने कहा,” न मैं और न ही मेरे दोस्त कभी बीमार पङे हैं, मेरे दोस्त गाँव में ही रहते हैं, रोज ही तैरते हैं।”
खुशबु ने पुछा,” तुम तैरते हो तो क्या खाते हो? मैं जहाँ तैरने जाती हुँ, वहाँ डाइटिशियन ने मेरी मम्मी को बताया कि तैरना सीखने के लिए विशेष क्या- क्या खाना चाहिए।”
नीतिन बोला,” मैं तो कुछ विशेष नहीं खाता जो नानी और मम्मी खाना बनाती है, वही खाता हुँ। मम्मी और नानी को पता भी नहीं चला था कि मैं और मेरा छोटा भाई कब तैरना सीख गए।”
” इस मौसम में जो भी फल गाँव में लगते हैं, हम वही खाते हैं। गाँव में तो बहुत मजा आता है, हम पेङो पर भी चढ़ते है और दूर- दूर तक दौङ लगाते हैं।”
पहली बार नितिन इतना बोल रहा था और शहरी बच्चें बहुत ध्यान से उसकी बात सुन रहे थे।

नितिन को हर नया काम सीखने में रूचि थी । जब मैंने उससे कहा, ” तुम्हें कुछ समझ न आए तो बार- बार मुझ से पूछ सकते हो, और देर तक यहाँ मेरे पास बैठ कर पढ़ सकते हो।”
तब यह सुन कर वह बहुत खुश हुआ । वह तीन साल मेरे पास पढ़ा था । दूसरे बच्चे उससे अच्छे स्कूल में पढ़ रहे थे परंतु नितिन उन सब बच्चों से होशियार था, वह रटता नहीं था, समझता था ।

मुझे मकान बदलना था, मैंने नितिन से पूछा कि, “अब कहाँ पढ़ोगे?”
उसने पूर्ण आत्मविश्वास से जवाब दिया,” अब तो मुझे पढ़ने का तरीका समझ आ गया है, अपने आप पढ़ लूँगा और छोटे भाई को भी पढ़ा लूँगा।”

कबीर कहते हैं- ” जिन खोजा तिन पाइया, गहरे पानी पैठ,
मैं बपुरा बूडन डरा,रहा किनारे बैठ।