(प्रथम अध्याय – करण)

– किरकिराता सुख –

आज दुष्यंत नाराज़ हो कर गया है। अब वह मुझसे मिलने बहुत कम ही आ पाता है। जब वह छोटा था तब मैं उससे व विचित्रा से प्रत्येक शनिवार- रविवार को मिलता था। नैना से अलग होने के बाद मैं बच्चों से इसी तरह मिलता था। अब बच्चे बङे हो गए है तो अपनी सुविधानुसार वह स्वयं मुझसे मिलने आ जाते हैं। विचित्रा तो सप्ताह में एक बार आ ही जाती है। दुष्यंत मनमौजी है, और उसका काम भी ऐसा है इसीलिए कभी तो सप्ताह में दो-तीन बार आ जाता है और कभी दो-दो महीने उसकी शक्ल नही दिखती है। पर फोन पर उससे बात होती रहती हैं।

यूँ तो मैं अपने अतीत को अक्सर ही खंगाल लेता हुँ। पर इस बार दुष्यंत के शब्द मेरे कानों में बज रहे हैं और दिमाग बार-बार अतीत का विशलेषण कर रहा है।

उसका कहना था,” आप और माँ बहुत अलग हो और आप तो कुछ समझना ही नहीं चाहते हो।” सिर दर्द होने लगता है। अतीत आँखों के सामने घूम रहा है और मैं दृष्टा बना सब देखने लगा हुँ।-
हमारे बीच प्रेम नहीं हुआ, यूँ तो न तो वह प्रेम के बारे में जानती थी, न मै ही जानता था। वह मुझे अच्छी लगी थी, इसीलिए हमारा विवाह हुआ था, उसे मैं अच्छा लगा या नहीं मुझे आज तक पता नहीं, अरेंज मैरिज़ में शायद यही होता है। जो भी हो शादी के आरंभ के दिन हमने एक दूसरे के प्रति प्रेम अभिव्यक्त करने की कोशिश में बिताए। पर जल्दी ही हम सिर्फ एक-दूसरे के साथ रहने की समस्त रस्में निभा रहें थे और इस तरह सभी रस्मों को निभाते हुए हमारे बच्चें हुए, वह और मैं बच्चों की परवरिश करने में लग गए। अब मैं उसे उतना पसंद नहीं करता था, वह भी….। उसे मुझ से जो उम्मीद थी वो मैं पूरी नहीं कर रहा था, वह भी….। पर ज़िन्दगी आराम से चल रही थी। मैं ऑफिस जाता, वह घर व बच्चों की देखभाल करती। हम विवाहित जीवन के सभी धर्म निभाते। कभी हमारे घर कोई मेहमान आता तो वह हमारे तालमेल की प्रशंसा करता। हमें अच्छा लगता। मैने उसे कभी नही कहा कि अब वह मुझे अच्छी नहीं लगती, उसने भी नही कहा…। हमारा परम धर्म सिर्फ बच्चों की परवरिश था, इसीलिए एक दूसरे के लिए किसी भी भावना पर ध्यान भी नहीं था।

मैं अब उसे पसंद नहीं करता यह भी मन के किसी कोने में बंद था। उसके साज-श्रंगार पर भी मेरा ध्यान नहीं जाता था। उसके प्रति एक निर्विकार और निर्लिप्तता थी। ऐसा नहीं कि मेरे अंदर का रोमांसिज्म खत्म हो गया था। दूसरी औरतों और लङकियों के प्रति अभी भी मेरे अंदर कुआँरे व लङकपन वाले भाव उल्लसित होते थे। मैं बहुत इत्मीनान से बेख्याली की ज़िन्दगी जी रहा था। मुझे लगता था कि मैं अपने परिवार के प्रति समस्त जिम्मेदारी और कर्तव्य बखूबी पूरे कर रहा हुँ। मैं उसे पसंद नहीं करता पर मुझे उसकी आदत थी। मैं किसी ओर के हाथ का खाना क्या चाय भी पसंद नहीं करता था, वह मेरी पसंद जानती थी। वह मेरी सारी जरुरतें समझते हुए उन्हें खुशी खुशी पूरा करती थी। मुझे उससे कोई शिकायत नहीं थी। मैं ऐसा ख्याल उसके लिए भी रखता था। मुझे कोई भी वजह नही नज़र आती थी कि उसे मुझ से शिकायत है ।

लेकिन एक दिन मेरी बेख्याली ज़िन्दगी में उसने खलल डाल दिया, उसने बताया कि उसने शहर के एक प्रतिष्ठित कला विद्यालय में नौकरी ले ली हैं और अगले दिन से उसे जाना है। पहले तो मैं भौचक्का रह गया फिर गुस्सा आया कि वह नौकरी करना चाहती है। और अब नौकरी शुरू भी करने जा रही है।
उसने कहा, ” आप, मेरी बात पर ध्यान ही कहाँ देते हो? मैंने आप को इस विद्यालय का अखबार में आए विज्ञापन के बारे में बताया था।”
आगे बोली,” मैंने शादी से पहले भी कहा था कि मैं काम करना चाहुँगी, अभी तक बच्चे बहुत छोटे थे और उन्हें संभालने वाला कोई नहीं है। पर अब मैं काम कर सकती हुँ।”
मैं अभी अपने पति होने के दंभ से भरा था। पर जानता था, वह सही कह रही है। और लगा कि अभी तक गृहस्थी की जो व्यवस्था चल रही है वो गङमङा जाएगी।

अभी तक मैं घर से बाहर काम पर जाता था तो निश्चित होता था कि घर व बच्चों को संभालने के लिए वो है। ऑफिस जाने से पहले इत्मीनान से तैयार होता, नाशता इत्यादि सब तैयार मिलता था, ऑफिस से लौट कर भी आराम था, मैं तो एक गिलास पानी भी भरकर नहीं पीता था।
और जैसा मैं जानता हुँ कि ये औरतें घर से बाहर अपनी स्वतंत्रता ढूँढती है, यह भी जब दूसरी आत्म निर्भर स्त्रियों से मिलेगी तो इसके व्यवहार में भी बदलाव आएगा। मुझे लग रहा था कि घर की शांति खत्म हो सकती है।
मैंने सोचा कि उसे समझाऊँ, परंतु उसके चेहरे पर दृढ़ता और आत्मविश्वास झलक रहा था। मेरे प्रति भी उसमें गहरा विश्वास नज़र आ रहा था उसे दूर-दूर तक अंदेशा नहीं था कि मैं विरोध कर सकता हुँ। पर अपना पतित्व निभाते हुए मैंने इतना तो आदेशात्मक स्वर में कह ही दिया कि-
” घर की व्यवस्था में कोई फर्क नहीं पङना चाहिए।मुझ से किसी सहयोग की अपेक्षा मत रखना।”
उसने कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की, सिर्फ मुस्करा दी शायद मेरे से उसे यह भी उम्मीद थी। अगले दिन मैने देखा उसने अपने सहयोग के लिए एक कामवाली बाई रख ली है।
धीरे-धीरे उसने घर व नौकरी सुचारू रुप से संभाल ली थी। वह प्रसन्न रहती थी, मै हैरान था कि बच्चे भी प्रसन्न थे। सिर्फ मैं ही परेशान व चिङचिङा रहता था। उसका यह स्वंतत्र व स्वावलंबी स्वरुप मेरे दिल पर बरछियाँ चलाता था। जहाँ वह मेरे ध्यान में कभी नहीं होती थी, अब मैं हर समय उसी के विषय में सोचता था।
वह सुबह तैयार होती तो मैं ध्यान देता कि उसने क्या पहना और कैसा मेकअप किया है। उसका स्मार्ट और सुंदर दिखना मुझे परेशान करता जबकि स्वभावतः वह सिम्पल रहना पसंद करती थी तो उसका मेकअप और पहनावा बहुत सामान्य व स्वाभाविक होता था, फिर भी मैं उसे टोक देता और अपनी खीझ प्रकट करने में बिलकुल नहीं हिचकिचाता था।
मुझे स्वयं समझ नहीं आ रहा था कि मुझे क्या हो रहा है?

पहले शायद ही मैंने उसके कार्य में रूचि दिखाई थी। वह अपनी कलात्मक रुचि और शिक्षा का अनुसरण करते हुए घर की साज-सज्जा करती थी, जिसकी प्रशंसा मन में करते हुए भी मैं यही मानता कि यह उसका कर्तव्य है, साथ ही कलात्मक वस्तुओं के निर्माण में उसकी फिजुलखर्ची पर चेतावनी भी देता था। पहले मैं ऑफिस से आकर, टी.वी. देखता उससे औपचारिक बातें करता और रात के खाने के बाद सैर करने जाता वह कभी मेरे साथ नही होती थी, बाहर पङोसी मित्रों से मिलता उनसे दुनियावी बातें करता और घर आकर सो जाता था।
पर अब मैं उससे बात करना चाहता था, इसलिए नहीं कि मैं उसमें और उसके कार्य मैं रुचि लेने लगा था। नहीं, मेरी दिलचस्पी सिर्फ इतनी थी कि वह अपने कार्य स्थल में किससे मिलती है और पुरुष सहकर्मियों के साथ कैसा व्यवहार है? वह भी बिना संकोच और खुल कर सहजता से बताती व मेरे से सलाह भी लेती । मैं यह जताता कि वह पहली बार घर से बाहर निकली है अतः नही जानती कि दुनिया कितनी खराब है? सिर्फ पुरुष ही नहीं अपितु महिलाएँ भी कितनी चालाक होती है।वह पूर्णतः मुझ से सहमत न होते हुए भी मेरे अनुभव का सम्मान करती, मैं भी अपने अनुभवों की कहानियों में सच्चाई कम व मिर्च-मसाले ज्यादा लगाता था। कभी ऐसा लगता कि वह किसी विशेष स्त्री या पुरुष के साथ अधिक जुङ रही है तो मैं यह प्रमाणित करने की कोशिश करता कि वह विशेष एक ध्रुत प्राणी है जो उसके भोलेपन का लाभ उठाना चाहता है।
लेकिन कुछ समय बाद मैने उसमें बदलाव महसूस किया, अब वह मुझ से अपने सहकर्मियों और कार्य के बारे में कम बात करती थी। मेरे कुछ पूछने पर वह संक्षिप्त जवाब देती थी ।उसे काम करते हुए एक वर्ष से ऊपर हो गया था और मेरी चिङचिङाहट और दोगलेपन को भी….।

जी हाँ, दोगलापन…. मैं जो अपने को उच्च शिक्षित और आधुनिक मानता था, आज अपनी पत्नी के नौकरी करने पर बौखलाया हुआ था। उसे सहयोग व प्रोत्साहित करने के स्थान पर, उसके काम में बाधा उत्पन्न करने व निरुत्साहित करने से नहीं चूकता था।

इसीलिए उसमें यह बदलाव था, मैं सब जानता समझता था पर अपने अहंकार को कम नहीं कर सकता था। ऐसा नहीं कि उससे मेरा व्यवहार अनदेखा व अनसमझा हो। उसने शांति से बात करने की कोशिश की, कई बार अपना विरोध प्रकट भी किया, मुझे आगाह किया कि मेरा व्यवहार बच्चों पर गलत प्रभाव डाल रहा है। पर मैं उसे ही दोषी ठहराता व समझाता कि वह नौकरी छोङ दे तो फिर सब पहले जैसा होगा। पर उसने स्पष्ट कहा कि यह असंभव है
अभी तक हम शांति से साथ रह रहे थे, मैं विश्वास के साथ कह सकता हुँ कि हम साथ सिर्फ निभाने के लिए नहीं रह रहे थे अपितु खुशी-खुशी और अपने सभी दायित्वों को सहजता से पूर्ण करते हुए रह रहे थे। हमारे ह्रदय में एक -दूसरे के लिए प्रेम था या नहीं कुछ कहा नहीं जा सकता पर हमारे दिल में अपने रिश्तें का सम्मान था, इस विवाहित जीवन पर पूर्ण निष्ठा थी।
लेकिन अब मैं महसूस कर रहा था कि रिश्ते के जिस सम्मान के धागे ने हमें जोङा हुआ था,उसके कसाव में ढील आ रही है। मैं यह भी देख रहा था कि विवाहित जीवन पर हमारी निष्ठा भी बिखरी जा रही है।
और मेरी अशिष्टता बढ़ती ही जा रही थी, मैं भूल रहा था कि मेरा अंहकार मेरी सभी मर्यादित सीमाएँ तोङ रहा है। और उस रात की अगली सुबह….। मैं जानता था कि मुझे शर्मिंदा होना चाहिए पर मैंने बेशरमी की चादर ओढ़ी हुई थी। सोचता हुँ कि क्यों नहीं जान पा रहा था? मेरे अपने हाथों मेरी बगिया उजङ रही थी ।

कुछ समझता कि वह मेरे सामने थी। बिलकुल शांत, निश्चल, दृढ़ और शक्तिवान। उसने कहा कि वह कुछ बताना चाहती है। मैंने सोचा अब इसका सच सामने आएगा। यह भी कि इसे अपनी गलती समझ आ गई है और अब यह नौकरी भी छोङ देगी, फिर घर पहले जैसा हो जाएगा। मन में जो थोङा बहुत अपराधबोध था वह भी खत्म हो गया, अपना किया सब जायज नजर आने लगा था। लेकिन मैं कितना बङा मुर्ख! जान ही नहीं पाया कि ……। अब बाँध टूट चूका है। मेरा घर, मेरा सुख दरिया में बहने जा रहा है। मैंने स्वयं बाँध में सुराख किए थे।

वह बोल रही थी और मेरी समझ में कोई बात नहीं आ रही थी, सब कुछ सिर पर से निकल रहा था। वह अपने सम्मान की बात कर रही थी जो उसे मुझ से नहीं मिला था। वह मेरे द्वारा दिए उन अपमान के घुँटों की बात कर रही थी जो उसने घर की खुशी के लिए पिए थे।

मैं बेशक उच्च शिक्षित था, आधुनिक था पर मेरी सोच पर समाज के पारंपरिक संस्कार हावी थे इसीलिए मैं यही जानता था कि मेरा उसके प्रति जो भी व्यवहार रहा है जिसे वह अपने मान- अपमान के साथ जोङ रही थी वह एक पति का अधिकार था। फिर मैंने कभी हिंसा की सोची भी नही है,दुनिया के पति तो क्या नहीं करते…।

अंत में उसने बहुत सहजता से कहा वह दोनो बच्चों के साथ जा रही है। बच्चों को वह दूसरों का सम्मान करना सिखाना चाहती है।सिर्फ बच्चों को उच्च शिक्षा नहीं देनी हैं, उच्च संस्कार भी देने है। आधुनिक वस्त्रों और आधुनिक तकनीकि की जानकारी मात्र से कोई आधुनिक नही हो जाता है, सोच भी व्यावहारिक रुप में बदलनी होती है। हाँ, व्यवहारिक रुप से क्योंकि आपकी सोच आपके व्यवहार के धरातल पर सटीक उतरनी चाहिए।

वह चली गई, मैं कई दिन अपमान और गुस्से की आग में झुलसता रहा था। सभी मेरे को तिरस्कार की दृष्टि से देख रहे थे, मेरे दोस्त ही नहीं मेरी माँ और मेरी बहन भी …. अपितु नाराज़ भी थे। पर मेरे पिता ! जिनके संस्कार मुझे विरासत में मिले थे, जबकि मैं तो यह मानता था कि मैं उनसे अच्छा पति हुँ, उन्होनें भी अपनी बहु का पक्ष लेते हुए स्त्री सम्मान पर मुझे भाषण दिया ।
बच्चों को एक घर देने का अहसास करते हुए मैं उससे समझौता करने और एक पति की जिम्मेदारी की तहत उसे वापिस लाने पहुँचा था। पर मैं समाज के इस बदलते हुए स्वरुप को और स्त्री में आई प्रगति को कहाँ समझ पा रहा था।

कई वर्ष बीत गए अकेले रहते हुए, बच्चों से मिलता हुँ वे मेरा आदर करते हुए मेरा मान बनाए रखते हैं क्योंकि उन्होंने दूसरों का सम्मान करना सीखा है। मैं ही उनके आगे अपने को बौना महसूस करता हुँ।
बच्चे बङे हो गए है, दोनों ने अपनी पसंद का कार्य चुना है। विचित्रा काॅलेज में लेक्चरार है। अपनी माँ की तरह स्पष्ट सोच की स्वामिनी है। मुझ से कुछ दूरी बनाए रखते हुए भी, मेरी चिन्ता व देखभाल के प्रति कर्तव्यनिष्ठ है।
दुष्यन्त बचपन से ही शरारती व बातुनी है। वह अपनी माँ की तरह कला प्रेमी है। मेरी सोच आज भी यही है कि यह सब कला इत्यादि शौक के लिए तो ठीक है पर आजीविका….।लङकियाँ इसे आजीविका बना सकती है, पर लङकों के लिए, यह सब अज़ीब है, मैंने उसे कहा था कि डाक्टर, इंजीनियर न सही, पर वकील, आई.ए.एस अधिकारी अथवा किसी बैंक का उच्चाधिकारी तो बन ही सकता था। वह अपना समय चित्रकारी, फोटोग्राफी करने व उनकी प्रदर्शनी करने में बिताता है।

कितनी बहस की थी उसने उससे जब वह उसे कोई अच्छी नौकरी करने की सलाह दे रहा था।23 वर्ष का हो रहा है,मैंने उसे एम.बी.ए करने के लिए जोर दिया था। तब बोला,” पापा, आप कैसी बात कर रहें है, आप जानते हैं कि मैंने ललित कला से स्नातक की डिग्री ली है।”
” फ्रांस की एक युनिवर्सिटी से कला क्षेत्र में ही आगे पढ़ाई करना चाहता हुँ। बैंक से शिक्षा के लिए कर्ज़ मिल जाता है पर कुछ अपने पास से भी देना होता है। मैं इसीलिए आपके पास आया था, पर आप तो….।”
मैं कभी उस पर गुस्सा नहीं करता पर उस समय न जाने क्या हुआ? “बेटा भी नैना के पदचिन्हों पर ही चलेगा।”
यह ख्याल मन में आते ही मैं उबल पङा और बोला,” यह सब तुम्हारी माँ के कारण है, वह तुम्हें मनमानी करने से रोकती नहीं, स्वयं उसने पूरा जीवन मनमानी की है और तुम दोनो को भी यही सिखाया है। मेरे पास रहते तो कभी मैं तुम्हें इस दिशा में जाने नहीं देता।”

मेरी बात से दुखी हो दुष्यन्त बोला,” पापा, आज तक नहीं समझा था कि हम साथ क्यों नहीं रहते, कभी आपसे और माँ से जानने की कोशिश भी नही की थी। यही सोचा यह आप दोनो का मामला है। आप दोनो से भरपूर प्यार मिल रहा था। पर आज सब समझ आ रहा है। आप दोनो बहुत अलग हो। आप तो कुछ समझना ही नहीं चाहते हो।।”

दुष्यन्त नाराज़ हो कर चला गया।और मैं यही सोचता रहा कि क्या वाकई मै गलत हुँ।

क्रमशः