(द्वितीय अध्याय दुष्यंत)

-घुटते मन-

आज मैने अच्छा नहीं किया, मुझे पापा से ऐसे बात नहीं करनी चाहिए थी। पहले भी मेरी पापा से कई बार बहस हुईं है , लेकिन व्यक्तिगत स्तर पर कभी हमने एक-दूसरे को तकलीफ नहीं पहुँचाई थी। हम सामाजिक, राजनीतिक व अन्य विषयों पर चर्चा करते थे, बचपन से पापा मुझे विभिन्न विषयों पर बात करने के लिए प्रोत्साहित करते थे।

ऐसा नहीं कि उन्होंने पहले कभी मेरे द्वारा कला को ही अपना जीवन उद्देश्य चुनने के लिए आलोचना नहीं करी थी। गाहेबेगाहे, जब भी मौका मिलता तो वह अपनी अनिच्छा या कहुँ चिन्ता प्रकट करते रहे थे। पर मैंने कभी उनसे बहस नहीं की थी । बचपन से यह अहसास था कि कुछ बातों में वह परपंरवादी हैं।
लेकिन आज जब बात माँ के प्रति कङवाहट प्रकट करते हुए कही गई तो न जाने यह रोष कैसे प्रकट हो गया था। चाहे जो भी हो मुझे उनसे इस तरह और ऐसे शब्दों से बात नहीं करनी चाहिए थी।
मैं और पापा मित्र नहीं थे, पर मैं उनसे बहुत खुल कर बात कर लेता हुँ। मैं हमेशा अपनी जरूरतों के लिए उनसे पैसे मांगता रहता था, हमारी शिक्षा के लिए अपनी समस्त जिम्मेदारी उन्होंने पूर्ण की थी। बेशक उन्हें हमारे विषयों के प्रति न केवल अरुचि अपितु नाराज़गी रही हो ।

मैं तब सिर्फ आठ वर्ष का था, जब माँ मेरे और दीदी के साथ हमारे घर से अलग दूर एक मकान लेकर रहने लगी थी। माँ ने हमारा एडमिशन अपने कला विद्यालय में करा दिया था। दीदी को माँ के विद्यालय में पढ़ना अच्छा नहीं लगा था, पर मैं खुश था। एक तो माँ पास में थी, दूसरे यह कला विद्यालय होने के कारण यहाँ सभी कलाओ में प्रशिक्षण की समुचित सुविधाएँ थी। यह विद्यालय हमारे पहले विद्यालय से अलग था, क्योंकि यहाँ कलाओं के साथ विद्यार्थी को विभिन्न खेलों में विद्यार्थी की रुचि अनुसार भाग लेने के लिए प्रोत्साहित किया जाता था। यही कारण था कि बाद में दीदी को यह विद्यालय बहुत पसंद आ गया था। वह बहुत अच्छी हाॅकी खिलाङी बन कर विद्यालय टीम के साथ दूसरे शहरों में खेलने जाती थी।

मुझे पापा से दूर रहना बहुत अखरा नहीं था, पर कुछ याद है कि दीदी कुछ समय तक माँ से नाराज़ रहीं थी। बाद में जब हम दोनो इस योग्य हुए कि उन दिनों की बात आपस में कर सकते थे, तब दीदी ने स्वीकार किया कि आरम्भ में वह माँ को समझ नहीं सकी थी। हालांकि मैं हैरान था क्योंकि मैं तो माँ को हमेशा समझता था, उनकी तकलीफ पहचानता था।
हम प्रत्येक शनिवार व रविवार पापा के साथ बिताते थे। दादा-दादी, चाचा व बुआ सबसे मिलते थे। जबकि मेरा मन होता माँ भी साथ हो, पर माँ ने आरम्भ में ही पूर्ण सच्चाई के साथ समझाया था कि “तुम्हारे माँ और पापा साथ नहीं रह सकते हैं, तुम्हें मम्मी और पापा दोनों मिलेंगे व उनका प्यार भी, पर अलग-अलग । कई बार सबको हर चीज नहीं मिलती है।” कई वर्षो बाद एक बार माँ ने हँसते हुए कहा, “तुम दोनो ने मेरे लिए त्याग किया है।”

यह सच्चाई थी कि हम पापा से दूर नहीं हुए थे। उनसे बराबर मिलते व प्रतिदिन फोन पर बातें करते थे।
यह बात तो दीदी ने भी स्वीकार की थी कि जब हम साथ रहते थे, तब हम पापा के साथ इतना समय नहीं बिताते थे। शनिवार- रविवार को भी पापा को अक्सर अपने कुछ काम होते थे, बहुत कम वह हमारी बातें ध्यान से सुनते थे। लेकिन अलग रहने पर सिर्फ शनिवार- रविवार ही मिलते पर पापा पूरा समय हमें देते थे। वह अपने सभी काम पहले ही निबटा देते ताकि हमें अपना पूरा समय दे सके।वह हमारे साथ खेलते, घुमाते और हमारी पढ़ाई भी देखते थे।

पर आरम्भ में ऐसा नहीं था, वह शुरू में हमसे मिलने के लिए इतने उत्सुक नहीं होते थे और जब मिलते तो अक्सर झुँझलाए और और गुस्से में होते थे। फिर भी हम उनसे मिलना चाहते व शनिवार की प्रतीक्षा बेताबी से करते थे, मैं तो शुक्रवार से ही अपना बैग लगाने लगता था। मुझे उत्सुकता होती कि वह अकेले कैसे रहते हैं? अपना घर, कमरा सब देखने व वहाँ रहने का मन होता था। पर माँ के बिना उस घर में रहना, सोना अच्छा नहीं लगता था। जबकि इस नए मकान में पापा की कमी नहीं लगती थी। वैसे मैं कल्पना करता था कि अगर पापा भी यहाँ आए तो वह कहाँ सोएँगे? उनका सामान कहाँ रखा जाएगा। पर उनके बिना बुरा भी नहीं लगता था। क्योंकि यहाँ उनकी हमें आदत नहीं थी। मेरा मन होता माँ से कहुँ कि कभी वह भी हमारे साथ अपने घर चलें, पर नहीं कहता क्योंकि याद आ जाता उनका वह चेहरा जब उन्होंने कहा,
” कई बार सबको हर चीज़ नहीं मिलती है।” उस चेहरे में दुःख से अधिक अपराध बोध अधिक था।
मैं अक्सर सोचता था कि क्या उन्हें अपना घर याद नहीं आता होगा? फिर बहुत दिन बाद जब माँ ने अपना मकान बनाया और अपने किराए के फ्लेट से निकल कर हमने माँ के बनाए नए मकान में शिफ्ट किया था। माँ बहुत खुश थी।
पर जैसा दीदी, कहती है, ” तु बात करते हुए सही समय का ध्यान नहीं रखता है।”
मैंने माँ की बहुत बङी खुशी के समय उनसे सवाल किया, ” क्या आपको कभी अपना घर छोङने के बाद उस घर और पापा की याद नही आती थी?।”
सवाल करते ही, मैंने देखा दीदी मुझे गुस्से से देख रही थी। और मेरी माँ! हमेशा की तरह शांत जैसे वह मेरे अंदर के सभी सवालों को जानती-पहचानती थी। इसीलिए उत्तर बहुत सहजता और सरलता से दिया था अब तो चेहरे पर कोई उदासी व अपराधबोध भी नहीं था।
” हम 12 वर्ष साथ रहे थे। वह मकान तुम्हारे पापा और मैंने बहुत शौक से बनाया व सजाया था, इसीलिए घर व गृहस्थी की याद आती थी, पर उनकी याद ? मैं स्वयं हैरान रही हुँ कि कभी उनकी याद तो दूर, जीवन में उनकी कमी भी महसूस नहीं हुई। ”
फिर एक गहरी सोच के साथ बोली,” शायद यही कारण था, हमारे अलग होने का…। ”
माँ के इतना कहते ही मुझे बचपन की वह छोटी घटना याद आई, हम सो रहे थे कि मेरी आँख खुल गई थी, पापा गुस्से में चिल्ला रहे थे। मैं महसूस करने लगा था कि पापा आजकल माँ से नाराज़ रहते थे, उनसे गुस्से में ही बात करते थे। उन दिनों मुझे उनसे डर लगने लगा था।
यह डर कहीं न कहीं अभी भी मन में ज़मा है। पापा हम पर कभी गुस्सा नहीं करते थे पर क्योंकि मैं समझता था कि माँ पापा के गुस्से के कारण ही उनसे अलग हुई थी, इसीलिए यह डर दर्द के रूप में मेरे अंदर ऐसे बसा था कि उससे अलग होना असंभव था। मैं हैरान हुँ कि मैंने आज उनसे यह कैसे कह दिया था?
माँ को नहीं बताया, बताने पर नाराज़ तो नही होंगी, पर यह जरुर कहेंगी कि आजकल बच्चे अपने माता-पिता से अधिक खुले होते हैं इसीलिए आसानी से उन पर अपना आक्रोश प्रकट कर देते हैं।
माँ भी कोई बहुत उदार विचारों की नहीं हैं, आजकल के बच्चों के life style पर उनकी टिप्पणियाँ सुनने को मिलती रहती है। पिछले दो वर्षो से माँ और मेरे बीच अच्छी तरह बातचीत हो पाती है, उससे पहले तो मात्र बहस ही होती थी। यूँ तो मैं बचपन से ही माँ से ही जिद करता था और उनके न मानने पर गुस्सा करता व रूठता भी था। पर हम माँ- बेटे के बीच यह सब इतना स्वाभाविक था कि हमें कभी लगा नहीं कि मेरे व्यवहार में कोई त्रुटि है।

लेकिन जब मैं 15-16 वर्ष का हुआ तो मेरी माँ एक जासूस माँ बन गई थी। ऊपर से उदार दिखती ,पर चोरी- छिपे मेरी पूरी खोज-बीन रखती थी, इसी कारण मेरी उनसे झिकझिक हो जाती थी। अब तो हँसी भी आती है, यह माता-पिता भी कितने डरे रहते हैं!

माँ को भी हर समय डर रहता कि मैं किसी गलत रास्ते में न पङ जाऊँ। टी. वी. सीरियल व अन्य कार्यक्रमों में वह जो भी देखती उसका प्रभाव मेरे प्रति उनके व्यवहार में प्रकट होने लगता था। मेरी अनुपस्थिति में वह मेरे सामान की तलाशी लेती थी। मेरे दोस्तों पर कङी निगरानी रखती थी ।जब मैं काॅलेज जाने लगा तब मेरी माँ मेरे नए मित्रों से इतने प्रश्न करती कि वे मेरे घर आने से कतराते थे। विशेष तौर पर लङकियों से मेरी दोस्ती उनके लिए सबसे बङी परेशानी का सबब होता था। बचपन से हम लङकियों के साथ पढ़ रहें थे , वे भी हमारी मित्र होती थी, सब कुछ माँ जानती थी, फिर भी उन्हें घबराहट रहती थी। मेरी हर नई लङकी से दोस्ती पर वह अपनी पैनी नज़र रखने लगी थी । वह हर लङकी को मेरी गर्लफ्रेंड बना देती थी और उन्हें लगता कि मेरा उससे सभी तरह का रिश्ता बन गया है। एक दिन मुझे बहुत गुस्सा आया जब मैं अपने मित्र निलेश की बहन रिया से बात कर रहा था और माँ ने देखा तो मुझ से उनका सवाल था, ” क्या रिया भी तेरी गर्लफ्रेंड है?” मुझे बहुत गुस्सा आया था।
और मैंने बहुत दुःख से कहा था कि ” आप मेरे चरित्र को गिरा हुआ समझती हो कि मैं हर लङकी को अपनी गर्लफ्रेंड बना लेता हुँ।”
फिर दीदी ने मुझे समझाया था कि” माँ को फ्रेंड और गर्लफ्रेंड में अंतर नहीं पता है।”
मैं आश्चर्यमिश्रित निगाहों से दीदी को देख रहा था।
” माँ युनिवर्सिटी में पढ़ी हैं।लङके-लङकियाँ साथ पढ़ते थे। ऐसा कैसे हो सकता है कि वह लङके और लङकी की मित्रता नहीं समझती हो।”

मेरे मन में आए सवाल का जवाब दीदी ने तुरंत दिया,” हमारे माता-पिता के समय में यह कहा जाता था और जिसे वह आज भी सच समझते हैं, कि ‘लङका- लङकी कभी दोस्त नहीं हो सकते हैं।’
“उनके विचार से उनका आपसी रिश्ता सिर्फ आकर्षण का होता है, इसीलिए अगर उनमें गहरी दोस्ती है तो वह प्रेमी-प्रेमिका ही होते है।”
दीदी की बात सुनते ही मेरे मुहँ से निकला, ” क्या बकवास है? पर अब जब ये बङे लोग अनुभवी हो चुके है, तब भी इसी धारणा को सच मानते हैं? माँ से तो मैं यह उम्मीद नहीं कर सकता था ।”

दीदी बोली,”माँ के समय भी अधिकांश लङकियाँ लङकों से कम बात करती थी, ग्रुप में लङके- लङकी होते पर गहरी दोस्ती उसी से होती जिसके साथ वाकई प्रेम होता या यूँ कहुँ कि गहरी दोस्ती का अर्थ- अंत में उनका विवाह होना ही चाहिए।” दीदी सोशयोलोजी में तब एम.ए कर रही थी, इसीलिए वह अपने समाजशास्त्र के ज्ञान को अच्छी तरह परखती रहती थी।
अपनी बात आगे बढ़ाते हुए और थोङा हँसते हुए बोली, ” यह जो आजकल फिल्मों में दिखाते है कि गर्ल फ्रेंड और बाॅय फ्रेंड मिले और उनके बीच रिश्ता हर सीमा पार कर गया है। उसे ही लेकर ये लोग अपने बच्चों के लिए भयभीत होते हैं।”
मैं सुनते ही पहले तो हँसते-हँसते लोट-पोट हो गया, फिर गुस्सा आया कि,” माँ क्या सोचती है? मेरे बारे में उन्हें यह डर सताता है ? फिर यह तो हम लङके- लङकियों पर अत्याचार है। मैं अभी सिर्फ बी.ए. द्वितीय वर्ष में ही हुँ।”
फिर दीदी से पुछा,” क्या तुम्हारे लिए भी ऐसा सोचती हैं? या अपनी लङकी शरीफ और दूसरी के चरित्र को कुछ भी कह दो, मेरी माँ का यह नारीवाद है?, इतना थोथा! जो डर मेरे लिए लगा वह तुम्हारे लिए नहीं लगा?”
दीदी ने जो जवाब दिया उस पर मैं हैरान था और वाकई तब नहीं समझा था पर धीरे-धीरे अब समझ चूका हुँ।

दीदी ने कहा,” मै जैसे-जैसे बङी होती गई वह मेरी दोस्त बनती गई और खुलकर हर बात समझाती थी, दुनिया का सच्चा और कङवा स्वरूप भी और साथ ही उसका विश्वसनीय रुप भी बताती थी। मैं उनसे अपनी सब बातें करती हुँ, अपने दोस्तों( लङका व लङकी ) के बारे में बताती हुँ, हम चर्चा करते हैं, हमारे विचार कई बार मेल नहीं खाते….। पर बात करने के कारण हमारे बीच कोई गलतफहमी नहीं होती है।”
” इन माता-पिता को अपने बेटो के लिए एक अन्य चिन्ता यह भी होती है कि उनका बेटा किसी नशे की आदत का शिकार न हो जाए जैसे ड्रग्स, सिगरेट, शराब आदि। लङकों की संगत पर अधिक निगरानी रखी जाती हैं, लङकियों के लिए ऐसी चिन्ताएँ कम होती हैं ।”

अब मेरा अगला प्रश्न या बैचेनी भरी उलझन,” पर जब मैं बङा होता गया माँ मेरी दोस्त क्यों नहीं बनी, क्यों हर बात खुल कर नहीं समझाई, दुनिया तो जैसी लङकियों के लिए बुरी वैसे लङकों के लिए भी, वह तो जैसे मुझ पर सिर्फ शक करती है और यह तकलीफदायक है।”
दीदी ने कहा,” कारण सिर्फ इतना कि कभी लङकों से दोस्तों की तरह बात नहीं करी तो बात करनी आती नहीं है। बेशक उनके पुत्र हो पर हो तो पुरूष ही न! झिझक की दीवार बीच में बनी रहती है। वह तुमसे बात करना चाहती हैं पर कर नहीं पाती है और यही उलझन तुम दोनों के बीच उलझाव पैदा करती है।”
मैंने फिर कुछ खीझते हुए कहा,” अब इस दीवार और उलझाव का क्या करें?”
दीदी बोली, ” मैं बनती हुँ तुम दोनो के बीच एक कङी और तुम भी कोशिश करना, उनसे लङना बंद करो और बात करो अगर तुम्हें लगता है कि तुम बङे हो गए हो। वैसे भी तुम तो दावा करते हो कि तुम माँ को समझते हो।”
“मैं तुम दोनो को एक कहानी पढ़ने के लिए दूँगी, किसी ने अपने ब्लाॅग में भेजी है। कहानी का नाम है ‘किशोर माँ’। ऐसा लगता है कि जैसे तुम दोनो माँ- बेटे की कहानी हो। किशोर वय का बेटा जो अपने अंदर के बदलाव से परेशान, कुछ उलझा हुआ और अपने को बहुत समझदार मानता है। माँ उसे बच्चा माने यह बात उसे नापसंद है।और उसकी माँ उससे भी अधिक परेशान, दुनिया भर के मिथ उसे सच लगते हैं, अपने किशोर बेटे के हाथ से निकल जाने का डर….। माँ- बेटे के बीच की टकराहट घर की शांति भग करने लगती है।
यह कहानी जरूर इस स्थिति में तुम दोनो की भूमिका स्पष्ट करेगी।”

इन सब कोशिशों के बाद भी थोङा समय लगा पर धीरे-धीरे मेरे बङे होने के साथ माँ से मैं खुल कर बात कर लेता हुँ। उनके मन के भय भी दूर हो गए हैं । यूँ मैं दीदी को छेङता रहता हुँ ,” तुम सब कुछ तो माँ को नहीं बताती हो।”

माँ ने आज की पीढ़ी को समझना चाहा है, ऐसा नहीं कि वह हमारी पीढ़ी के प्रत्येक बदलाव से सहमत हो, पर वह हमें समझना चाहती हैं और जब हम चर्चा करते हैं तो हम भी उनकी पीढ़ी को समझने का प्रयास करते हैं।
पर पापा में जिद है, वह नए विचारों का स्वागत भी नहीं करते है। वह अपने समय के परिवर्तित विचारों को समझ नहीं पाए थे तो हमारी पीढ़ी को कैसे समझ पाएँगे। हमें ही उन्हें समझना होगा। ( यह भी दीदी ने समझाया है)

यूँ भी पापा ने मुझ पर अविश्वास नहीं दिखाया था, जब मैंने काॅलेज जाना शुरू किया तब भी उनका व्यवहार सामान्य रहा था। शायद इसलिए कि हम कम मिलते थे। मेरे कुछ मित्रों के तो पिता ही बहुत सख्त और शक्की थे और कुछ मित्रों के माता- पिता दोनो ने ही जीना मुश्किल कर दिया था। जैसे हम बङे ही बिगङने के लिए हुए हैं।

पापा को तो नाराज़गी थी कि मैं बी. एफ.ए. कर रहा हुँ। मैं जब भी उनसे मिलता वह मुझे यही समझाने की कोशिश करते कि कला में अपना जीवन समर्पित करना मेरी सबसे बङी भूल है। मेरे मित्रों पर या मेरी जीवन शैली पर वह कभी बात नहीं करते थे।
मैंने कभी उन्हें अपने मित्रों से नहीं मिलाया हैं ।अंदर यह भय है कि वह मेरे मित्रों को पसंद नहीं करेंगे। मुझे याद है कि दीदी पर कितनी बुरी बीती थी जब दीदी अपने मित्रों के साथ पापा के पास गई थी।
दीदी के बारहवीं के रिजल्ट की खुशी में पापा ने घर पर एक छोटी-सी पार्टी रखी थी व दीदी को अपने सभी मित्रों को निमंत्रित करने को कहा था। पापा ने तो सहेलियों शब्द का प्रयोग किया था पर दीदी ने अपने सभी मित्रों(लङके व लङकियों) को निमंत्रित कर लिया था।

माँ ने थोङा आगाह भी किया था कि लङको को पापा के पास न लेकर जाए। पर दीदी ने कहा, ” हमारा पूरा ग्रुप है, ऐसा मैं नहीं कर सकती हुँ। फिर पापा जानते हैं कि लङके भी हमारे साथ पढ़ते हैं, तो वे भी हमारे दोस्त हुए ।”

दीदी के मन में माँ के लिए तब भी घर छोङने की नाराज़गी शेष थी। बिना कहे वह अपनी मुखमुद्रा से अपना यह दर्द ज़ाहिर कर देती थी।पता नहीं क्यों दीदी को वे सब बातें याद नहीं है जो मैने महसूस की थी, जबकि दीदी मुझ से बङी थी। दीदी को यही लगता था कि माँ ने घर छोङने में जल्दी की थी, उन्होंने हमारे बारे मे नहीं सोचा, सिर्फ अपने लिए सोचा और हमसे हमारा घर छूट गया था।

अतः माँ ने दीदी को तो फिर कुछ नहीं समझाया पर बुआ को इस स्थिति से अवगत करा दिया था। माँ ने अपने ससुराल के रिश्तों से नाता पूर्णतः तोङा नहीं था , बुआ से तो उनका विशेष स्नेह था।
पार्टी के दिन पापा बहुत खुश थे और चूंकि बुआ ने पहले ही उनसे सब स्थिति स्पष्ट कर दी थी अतः उन्होने दीदी के सभी दोस्तों का खुशी-खुशी स्वागत किया था। लेकिन दीदी को अपने मित्रों के साथ हँसते-बोलते देख उनका गुस्सा बढ़ने लगा था। फिर जिस तरह उन्होंने दीदी को घूर कर देखा तो दीदी पूर्णतः काँप गई थी। कुछ ही देर में सभी को पापा के बदलते व्यवहार को समझने में देर नहीं लगी थी।

पार्टी के खुशनुमा वातावरण में बदली छा गई थी। हम पार्टी से उस दिन वापिस आ गए थे जबकि हम वहाँ रुकने के इरादे से गए थे। दीदी तो बहुत दुखी थी और मुझे बहुत डर लग रहा था, बहुत दिनों बाद लगा, माँ को भी हमारे साथ होना चाहिए था।

जब शुरू में हम पापा से मिलने आते थे और रात उनके साथ बिताते थे तब…… पापा बहुत खुश हो कर हमसे नहीं मिलते थे और रात को तो गुस्से में चीखते- चिल्लाते, माँ के लिए अनाप-शनाप बकते, हम दोनों डरकर एक-दूसरे का हाथ पकङकर सोने का नाटक करते थे।

मैंने ही शायद एक दिन माँ को सब बताया था, नहीं, मुझे याद है, दीदी ने मुझे माँ को कुछ भी बताने से मना किया था।( दीदी के विचार से ये सब माँ के कारण हो रहा है।) पर एक दिन जब पापा के पास से हम लौटे तो मैं बहुत डरा हुआ था और मुझे बुखार आ रहा था। माँ ने बहुत प्यार से कुछ पुछा और मेरे मुँह से थोङा सा वह भेद निकल गया था।माँ ने मेरे दो शब्दों से पूरी कहानी समझ ली थी। फिर मुझे याद है कि पापा मुझ से मिलने आए थे और वायदा किया था, अब वह हमें कभी नहीं डराँएगे। बाद में पता चला था कि दादी ने भी उनसे कहा, ” बीबी तो छोङ कर चली गई है,अब बच्चे भी खोना चाहता है?”

उसके बाद पार्टी के दिन फिर वही डर जागा था। बुआ ने समझ कर चाचा के साथ हमें घर भेज दिया था। घर आने पर हमेशा की तरह हमने माँ को कुछ नहीं बताया था पर माँ के चेहरे पर बहुत उदासी थी। उन्होंने बहुत बाद में बताया था कि फिर उस दिन पापा का फोन उनके पास आया था कि “माँ ने दीदी को बिगाङ दिया है।”

इस घटना के बाद दीदी ने माँ को समझना शुरू किया था। मेरे साथ पापा की कोई ऐसी बात नहीं हुई है, फिर भी मैंने उन्हे नाराज़ कर दिया था।