(चतुर्थ अध्याय – दुष्यन्त )

जवाबों के पुल

दीदी ने बताया कि पापा ने बुलाया है । दो दिन बाद मुझे मुम्बई के लिए निकलना है। इतने दिन पापा के पास नहीं जा पाया और फोन भी नहीं किया। मुझे उनसे मिल कर जाना हैं। उस दिन दीदी को बताया था कि, “कैसे पापा को जवाब दे कर आया हुँ।”

मैंने सोचा था कि दीदी नाराज़ होगी और कहेगी, ” हमेशा बिना सोचे बोलता है।” पर नहीं, इस बार ऐसा नहीं हुआ था । उसने कहा, ” कोई बात नहीं, एक बार तो दबा हुआ आक्रोश निकलना था।”

मैंने दीदी की ओर देखा…. हम दोनो ने एक समान दर्द भोगा है, शायद दीदी ने अधिक भोगा है । शुरू में वह माँ से नाराज रही और पापा से भी दूरी बनी रही थी ।पापा का प्यार तो था पर उसके लिए वो अपनापन नहीं था।

थोङी देर में दीदी बोली, ” देखा जाए तो हमें मम्मी-पापा को दोष नहीं देना चाहिए, यह उनका जीवन था, उनको अधिकार था अपने जीवन का फैसला लेने का, अधिक तकलीफ़ों के साथ रहने से अच्छा था कि कम तकलीफ़ों के साथ रहना, आसान तो नहीं रहा होगा ऐसा फैसला लेना। अगर हम दुख में थे तो वे भी कम दुखी नहीं थे। फिर ठीक ही तो किया, अगर हमारे कारण इस बेमानी रिश्ते में रहते तो और भी बुरा लगता।”

” अब अपने दो ब्रेक-अप के बाद सोचती हुँ कि यह रिलेशनशिप खून के रिश्तों से अलग होता है ।शादी के बाद तो पूरा जीवन साथ रहना है। फिर अगर इतनी असमानताएँ हों, कष्ट हो और अपमान भी हो तो कैसे कटता होगा इतना लंबा सफर!”

” हमारी माँ यह फैसला ले पाई, बहुत तो ले ही नहीं पाते है। अधिकांश औरतें इससे भी अधिक अपमानित स्थिति में ताउम्र रहती हैं। हाँ, मैं स्वीकार करती हुँ कि जबरदस्ती की शादी पुरुष भी निभाते है, पर कष्ट और अपमान ज्यादा औरत के साथ ही जुङे हैं।”

” माँ से पहले के समय में तो यह सोचना भी पाप था। तब यह धर्म माना जाता था, ‘ जिस आंगन में डोली गई उसी आंगन से अर्थी निकलेगी।’ और पुरूष भी अगर अपनी पत्नी को छोङ देते थे तो समाज में उनकी अवमानना होती थी, फिर भी औरत को दोष मिलता था कि उसने पति सेवा में कमी रखी होगी।सहना तो औरत का धर्म है।”

“पर दीदी, प्रेम तब भी होते थे और उसकी नियति शादी ही हो यह जरूरी नहीं था, फिर प्रेम असफल, मतलब ब्रेक अप। अब इसे इस तरह लिया जाता है कि शादी से पहले प्रेम मतलब relationship और न निभ सके तो ब्रेक अप। शादी के बाद न निभे तो तलाक जो एक खासा मसला बन जाता है। जबकि शादी से पहले कितने भी ब्रेक-अप हो सकते हैं।” मैंने अपनी बात स्पष्ट करते हुए आगे तर्क रखा, ” तलाक हो या ब्रेक-अप तकलीफ तो होती ही है पर तलाक से बच्चे भी प्रभावित होते हैl”

दीदी ने सोचते हुए जवाब दिया,” जीवन का सफर अज़ीब होता है, सब सोच विचार के बाद भी विवाह हो, तब भी कुछ बदल सकता है, मुझे लगता है महत्वपूर्ण है कि आपस में प्रेम बना रहे और एक-दूसरे के प्रेम के प्रति विश्वास और सम्मान होना जरुरी है।”

मैं विचार करने लगा कि बात सही है, महत्वपूर्ण बात यह नहीं थी कि माँ और पापा बहुत अलग थे, बात आपसी समझ और सम्मान की ही थी।

मुझे याद आया मैंने एक बार माँ से पूछा था कि यह क्यों हुआ? तब मैं छोटा ही था और माँ से यूँ ही कुछ भी पूछ लेता था।

माँ का जवाब था, ” सब मेरे कारण।”

मैं असमंजस में था और वह बोली,” ज्यादा नहीं सोचते, तुम्हारे पापा और माँ तुम दोनो को बहुत प्यार करते हैं, साथ नहीं रहेंगे पर तुम्हारे लिए हमेशा साथ है। हमेशा यही याद रखो, अपने माँ और पापा के आपसी रिश्ते के बारे में तुम्हें नहीं सोचना है।”

उसके बाद मैंने कभी माँ से कुछ नहीं पुछा है । पर क्या यही बात थी कि माँ ने समझ नहीं रखी? या फिर….।
मैं सोच में था कि दीदी बोली, ” माँ कहती थी कि अहं और आत्मसम्मान में एक पतले धागे के समान भेद होता है, पर गहरा होता है। सबको अपने आत्मसम्मान के लिए संघर्ष करना चाहिए।”
” क्या तुमसे माँ ने पापा के साथ अपने रिश्ते के टूटने के विषय पर बात की ?” मैं ने उत्सुकता से पुछा
” माँ कभी अपने अतीत पर बात करना पसंद नहीं करती है, उन्हें अपने फैसले पर पूर्ण विश्वास रहा है, उनका आज हम ही रहे हैं ।” दीदी बता रही थी और मैं माँ को और जानना चाहता था।
माँ हमेशा कहती हैं कि अपमानित और प्रताड़ित करने की आदत पङना बहुत भयंकर होता है, तब आप अपने प्रियजनों को ही सबसे अधिक तकलीफ़ देते हैं। इसमें अपने को भी गिराते जाते हैं व आप दूसरे का नहीं अपना आत्मसम्मान कुचलते जाते हैं ।

पर इससे भी अधिक खतरनाक बात होती है जब आपको अपमानित व प्रताड़ित होने की आदत पङ जाती है। तब आप स्वयं अपने को मारते हैं , ऐसी स्थिति में आप अपने प्रियजनों के लिए भी कुछ नहीं कर सकते हैं । ऐसा व्यक्ति मृतप्राय होता है।

दीदी ने बताया, ” माँ ने उन्हें कहा कि वह अपने आत्मसम्मान के लिए वह घर छोङ आई थी, वह अच्छी तरह जानती थी कि अपने ‘मैं’ के लिए नहीं , अपनी आत्मा को बचाने के लिए यह कदम उठाना आवश्यक था।”

” पर उन्होंने हमारे लिए….?” यह प्रश्न करते- करते अटक गया था।
दीदी बोली,” माँ जानती थी कि वह तो तकलीफ़ से निकल आई हैं , पर उनके नासमझ बच्चें तकलीफ़ में है, हमारे दर्द के समय वह हमारे साथ रहना चाहती थी, इससे अधिक वह कुछ कर नहीं सकती थीं । ”

मैं आज अपने प्रश्नो के उत्तर पा सका हुँ।

अपने जीवन के अतीत की बखिया उधेङने से कोई लाभ नहीं है। प्रत्येक व्यक्ति को अपने लिए फैसले लेने का अधिकार है। महत्वपूर्ण यह है कि हमें जीवन में आगे बढ़ना चाहिए , हम बढ़ेगे तो समाज भी बढ़ेगा। नए विचारों का स्वागत करना चाहिए और प्रयोग में लाना चाहिए , इसी में मानव का विकास है।

मुझे जीवन के प्रति एक नई दृष्टि मिली है।

कल पापा से मिलने जाना है। उनके प्रति मेरी समझ बदली है। अब मैं अधिक तटस्थ हो कर,सब देख सकता हूँ । उनसे अब अधिक खुलकर बात कर सकता हूँ । माता-पिता के आपसी रिश्ते का प्रभाव अब हमारे पिता- पुत्र के रिश्ते पर नहीं पङेगा।

और मुझे तो आगे बढ़ना है, अपनी कला को निखारना है।

क्रमशः