जीवन सफर में हमें भिन्न-भिन्न राहगीर मिलते हैं जो जीवन को विभिन्न प्रेरणाओं से भर देते हैं ।

विवाहित जीवन के 36वर्षो की यादों की गांठे जब – तब खुलने लगती हैं , तो आँखों के सामने आते हैं, वे लोग जो गाहे-बगाहे जीवन यात्रा को सुगम बनाने में पथ-प्रदर्शक बनें थे।
36 वर्ष में हमने 17 मकान बदले हैं । दिल्ली , गुरूग्राम, लखनऊ व आगरा में हम रहे अब इस समय हम फिर गुरूग्राम में किरायेदार के रूप में रह रहे हैं ।
आज फिर मेरी यादों की पोटली कुलबुलाने लगी है, और फिर वे सब सोए हुए किरदार जागने लगे हैं और मुझे भी जगाकर , मेरा हाथ पकङ अतीत की चौखट तक ले जा रहे हैं।
उनका मन मैं समझ रही हुँ, वे सब फिर मुझ से मेरा परिचय कराना चाहते हैं । लेकिन ये अतीत की गलियाँ आगे-पीछे हो रही हैं , इन्हें क्रमवार ठीक से सजाना होगा, अपने को भटकने से बचाना होगा तभी मैं अपने इन अतीत के कुछ करीबी और कुछ अजनबी सहयात्रियों से फिर एक बार परिचित होते हुए अपने को भी पहचान दे पाऊँगी।

नए मकान

प्रत्येक मकान की पहली सुबह, उसकी खुशबू, उसका रंग पूर्णतः नया और भिन्न होता है।
शादी के बाद का पहला एक कमरे का मकान याद आ रहा है। नए जीवन की पहली शुरुआत की पहली सुबह, नई महक सब बहुत मिठास भरा था।
जब याद कर रही हुँ अपनी गृहस्थी की पहली सुबह की तो एक अन्य खुबसूरत शहर, उसकी सुबह, हमारा हनीमुन याद आ रहा है, तब पहली बार महसूस किया था पर ठीक से जाना न था कि हर स्थान की पहली सुबह की खुशबू, रंगत बिलकुल अलग व नए रूप में होती है।
शिमला की वह सुबह ताजगी भरी थी, मैं हाथ में चाय का कप लिए, होटल के कमरे की बाॅलकोनी में खङी थी। हल्की – हल्की बारिश की महक, लंबे-लंबे पेङो से टपकती, छोटी -छोटी बुंदों को देखते हुए मेरा मन अदभूत हो रहा था।
फिर उसी मौसम में हम थोङा नीचे उतरे थे, एक दिन पहले शाम को हमको यह टूरिस्टों का शहर नज़र आया था, वही शहर सुबह शिमलावासियों का शहर था। छोटे- नन्हें बच्चे अपने माता या पिता का हाथ थामें, हम सबसे बेखबर अपने विद्यालय जाते हुए, उसी शहर में रचे-बसे नज़र आए थे।
यह मेरे लिए नई सुबह के साथ नई खुशहाली की ओर बढ़ने का संकेत था।
फिर गृहस्थी की पहली शुरुआत के पहले मकान की नई सुबह और उसके बाद कई मकान भिन्न-भिन्न शहरों में बदले और हर मकान की पहली सुबह ने हमेशा एक नई अनुभूति दी है।
प्रत्येक मकान की पहली सुबह मैं हमेशा बहुत प्रसन्न होती थी। मैं तनावरहित हो, उस सुबह की हर सकारात्मकता को अपनी झोली में लेने के लिए मंत्रमुग्ध बैठी रहती थी।
आरंभ में नवीनपन की खुशी का अहसास भर हुआ, फिर जब जान लिया कि यह खुशी तो मिलनी ही है, तब मकान चाहे इच्छा से या अनिच्छा से क्यों न बदला हो, पिछले मकान से बेशक बहुत लगाव हो गया हो। उस मकान की बहुत गहरी यादें ही क्यों न छूट रही हो, पर नए मकान की नई सुबह की खुशबू महसूस करने के लिए, उस नई सुबह बेताबी से उठती थी, घर के खिङकी, दरवाजे खोल नई खुशबू का अपने घर में स्वागत करती थी। घर तो वही रहता था न! चाहे मकान कितने भी बदले हो।
तो आज अभी लिखते हुए जाना कि मेरा घर कितनी नई-नई सुबह की सकारात्मक खुशबुओं के रंग में रंगा है।

यह तेरा घर यह मेरा घर,
किसी को देखना हो गर,
तो पहले आकर मांग ले,
मेरी नज़र , तेरी नज़र ,

यह घर बहुत हसीन है।

क्रमशः