दास्ताने मकान व मकान मालिकों की –

प्रथम मकान- कुछ कङवे अनुभव व मीठे अहसास-

मेरी गृहस्थी का प्रारंभ इसी मकान से हुआ था, अतः यही गृहस्थ जीवन की नींव का पहला पत्थर था। मिस्टर गुप्ता किसी सरकारी विभाग में काम करते थे, लेकिन उन्हें कोई सरकारी क्वाटर नहीं मिला था परंतु उनके किसी मित्र ने अपने नाम का क्वाटर उन्हें किराए पर दिया था।
दो कमरे का क्वाटर था, जिसमें से एक कमरा हमें किराए पर दिया गया था, शायद उनकी कोई आर्थिक मजबूरी रही होगी। पता नहीं वास्तविक मकान मालिक को पता था या नहीं ।
खैर हमारे लिए तो वही मकान मालिक थे। श्रीमती गुप्ता यानि गुप्ताईन मोटी और लंबी थी, पैर में लचक थी। उन्होनें हमें पहले ही दिन अपने पैर के फ्रेक्चर की दास्तान सुनाई थी। उन्होंने बताया था वह अपने कमरे में पैर मोङ कर पलंग पर बैठी थी, तभी ध्यान आया कि गैस पर दूध उबलने रखा था, यह सोच कि दूध उबल न गया हो वह रसोई की ओर भागी पर भाग न सकी चूँकि मोङे हुए पैरों को खोलना भूल गई और गिर गई थी।(मैं यह सुन अचंभित थी) उस समय वह गर्भवती भी थी।
गुप्ता जी अपनी पत्नी के सामने पतले, ठिगने व दब्बू भी लगते थे। उनके तीन बच्चे थे, दो बेटे व एक बेटी।बङा बेटा 16 वर्ष का व बेटी 15 वर्ष की थी। छोटा बेटा तीन वर्ष का ही था।
मोटी गुप्ताईन को सुबह उठने में परेशानी थी, इसीलिए बेटी स्कूल जाने से पहले सुबह उठ कर घर की सफाई करती व पिता के साथ रसोई में उनकी सहायता भी करती थी। जब सब्जी बन जाती, आटा तैयार हो जाता तब गुप्ताईन आकर रोटी बना देती थी। दोपहर में स्कूल से आने के बाद व रात के खाना बनाने में बेटी को मदद करनी होती थी। छुट्टी के दिन भी पिता- पुत्री घर का सभी काम संभालते थे।( किसने कहा कि पति घर के काम में सहयोग नही करते हैं )
मैं पहले कभी किराए के मकान में नहीं रही थी।अतः ज्ञान नहीं था कि किसी के साथ मकान शेयर करने पर कुछ नियमों का पालन करना होगा।
मोटी गुप्ताईन के नियमों से मेरे से ज्यादा सासू माँ परेशान थी। सासू माँ हमारे साथ नहीं रहती थी, वह थोङी दूरी पर जेठजी के साथ उनके क्वाटर में रहती थी। पर हम से मिलने दिन में कम से कम दो बार आती थी।
सबसे अधिक हमें जिस नियम से परेशानी थी, वह सुनने में अजीब लगा था । उन्होंने बाथरूम के बाहर जो चप्पल रखी थी, उसी चप्पल को पहनकर उनका परिवार बाथरूम जाता था उन्ही चप्पलों का प्रयोग हमें करना था, हम अपनी चप्पलों का प्रयोग नहीं कर सकते थे। सुन कर घिन भी आई थी। हमारे परिवार में सभी सदस्यों की बाथरूम चप्पल अपनी अलग थी। और बाथरुम से आकर पैर भी धोए जाते थे, कोशिश रहती चप्पल भी धोई जाए।

मकान में प्रवेश करते ही दालान था, दालान की दाई ओर रसोई थी और रसोई के लगभग साथ ही एक कमरा था, जो हमारा कमरा था, इस कमरे के साथ एक बङा कमरा था वह मकान मालिक का था। दालान के दूसरी तरफ स्नानघर व शौचालय था।

उसी कमरे में जगह बनाकर, एक मेज लगाकर हमने अपने दो चुल्हों वाले स्टोव पर खाना बनाना शुरू किया था। मकान मालकिन आई और बहुत प्रेम से आदेश दिया कि बर्तन घर के बाहर लगे नल पर धोएं जाए।उनके आदेशानुसार सारे झूठे बर्तन उठा मैं घर के बाहर लाॅन एरिया में लगे नल पर पहुँच गई थी। तभी सासु माँ का पदार्पण हुआ और अपनी नई -नवेली बहु को इस प्रकार घर के बाहर बर्तन साफ करते देख उनका गुस्सा आपे बाहर था, एक तो अपनी छोटी बहु को साथ न रख सकने का अफसोस पहले ही गहरा था। खैर किसी प्रकार मम्मी जी को समझाया गया था।

लेकिन धीरे-धीरे गुप्ताईन की छोटी-छोटी बातों की टोका-टाकी ने हमारी सहन शक्ति को समाप्त कर दिया था। सच तो यही था कि उनका तीन बच्चों के साथ, (उसमें दो किशोर बच्चे) एक ही कमरे में गुजारा करना मुश्किल था। इसी कारण अपने बङे बेटे को उन्होंने उसके नाना के घर छोङा हुआ था। गुप्ताईन का मायका अमीर था और अपने पति के वेतन से वह असंतुष्ट थी।

उनका मानसिक कष्ट गहन था, उन्होंने अतिरिक्त आय के उद्देश्य से यह कमरा हमें किराए पर उठाया था। अब वह कठिनाई में थी। परिणामतः अब वह बात-बात पर हम से लङती थी। मैं तो मोटी गुप्ताईन की तेज आवाज़ से दुबक कर कमरे में बैठ जाती थी। मम्मीजी को भी चुप कराकर पति देव ही मोर्चा संभालते थे। उधर दब्बू गुप्ताजी कुछ न बोलते थे।

अंततः हमने उस कमरे से निकलने का फैसला लिया और इस बार एक बङा स्वतंत्र क्वाटर लिया। मम्मीजी भी हमारे साथ रह सकती थी।
पर इस कमरे से ही मैं नन्हीं -मीठी खुशबू अपने में बसाए निकली थी, एक नन्हा सपना जो साकार होना चाहता था। मैं गर्भवती हो गई थी, मन में उल्लास था, मीठे सपने थे।इस पहले मकान ने मुझे एक बङी खुशी दी थी।

कुछ गुपचुप-गुपचुप नन्हें ख्याल थे मेरे,
कुछ मीठे-मीठे अनोखे अहसास थे मेरे।
कभी आनंदित, कभी अचंभित हो जाती मैं ,
वह मेरे अंदर जैसे गुंज रहा था,
हमारा मीठा सपना साकार हो रहा था।

क्रमशः