तीसरा मकान

नया शहर- नए लोग

सेतु का हमारे जीवन में आना अथार्त गृहस्थी के एक अगले सुंदर पङाव में कदम रखना था।

हम सामान ट्रक में भर कर गुड़गांव की ओर चले और दिल्ली को अलविदा कहा, कहीं मन में उम्मीद जगाने की कोशिश तो की थी कि कभी दिल्ली वापिस लौटेंगे …… पर नहीं लौटे….
हम गुडगांव पहुँचे और हमारा ट्रक एक बङे मकान के सामने रूका, उस मकान के भारी दरवाजे को देख, मुझे अपने मायके के मकान के मुख्य द्वार की याद आई थी।
मकान का दरवाजा खुलते ही एक बङा आंगन था, आंगन के शुरू में ही बाए तरफ हमारी एक छोटी रसोई , उससे लगकर एक कमरा और उससे जुङा दूसरा कमरा था।पहले कमरे से हो कर दूसरे कमरे में जाना था। परंतु दोनो कमरे में दूसरे दरवाजे भी थे जो बाहर गली में खुलते थे।

यहाँ हमें शौचालय व स्नानघर मकान मालिक के बङे बेटे के परिवार के साथ शेयर करना था। शुरू में चिंता हुई कि बहुत कठिनाई आएगी, परंतु बङी भाभीजी यानि घर की बङी बहु के मधुर स्वभाव व समझदारी ने सब आसान कर दिया था।

यहाँ भी मकान मालिक ‘गुप्ता जी’ थे। यह गुप्ता जी एक छोटी दुकान के मालिक थे , जिसमें वह दैनिक प्रयोग की वस्तुएं रखते थे। हरियाणा के किसी सरकारी विभाग से रिटायर हुए थे। अब अपना समय इस दुकान में काटते थे । अपने समय में इनके पास पैसा था पर अब कठिनाई में थे। बहुत मन से यह बङा मकान बनाया था। इनके चार बेटे और तीन बेटियाँ थी। अभी एक बेटा- बेटी कुआंरे थे।

दो बङे बेटे इसी मकान में अपने-अपने भाग में स्वतंत्र रहते थे।तीसरा बेटा माता-पिता के साथ उनके भाग में रहता था। गुप्ताजी का अपना भाग बहुत सुंदर बना था।

मेरी सबसे पहली मुलाकात दूसरे बेटे की पत्नी प्रेमा से हुई थी। उसका कमरा हमारे कमरे के साथ ही था। अतः जब तक ट्रक से सामान उतरा मैं सेतु को लेकर उसी के कमरे में बैठी थी।

प्रेमा का मुझ से पहला सवाल था, ” क्या नाम है, तेरा?” यूं तो हम दिल्ली वासियों के लिए तु करके बोलना आम बात है, परंतु पहली मुलाकात में यह बेतकल्लुफी अजीब लगी थी। उसके हरियाणवी अंदाज़ ने बता दिया था कि मैं हरियाणा में बैठी हुँ।

मैं जानती थी कि गुडगांव एक गांव नहीं अपितु एक छोटा शहर है, जो दिल्ली के सामने तो देहात ही था।

1985 में गुडगांव के नए भाग बसने शुरू ही हुए थे। किसान अपने खेत- खलिहान सरकार को बेच रही थी और सरकार वहाँ नए सेक्टर बना रही थी।इसके साथ सरकारी मकानों के अतिरिक्त प्राइवेट कोठियां भी बननी शुरू हो गई थी।

हम पुराने गुडगांव में रह रहे थे।इधर रहने वाले लोग लोकल लोग कहलाते थे अथार्त जिनके पुर्वज सदियों से यही रहते आए थे। इनमें सभी जातियों के लोग थे। बनिया, कायस्थ , पंजाबी, सिंधी, गुर्जर और मुसलमान भी थे।

यह माना जाता है कि पांडवों ने गुरू द्रोणाचार्य को यह गांव भेंट स्वरूप दिया था। इसीलिए इस को गुरूग्राम कहते थे, बाद में धीरे-धीरे इसका नाम बिगङ कर गुड़गांव पङ गया था । अब फिर सरकारी तौर पर इसका नाम गुरूग्राम हो गया है।

आर्य , गुप्त व मौर्य साम्राज्य का शासन देखने के बाद इस शहर ने मुगलों , राजपुतों व अंग्रेजों का शासन भी भोगा है। यह 1947 में स्वतंत्रता के बाद पंजाब के प्रमुख जिलों में से एक था, 1966 में हरियाणा पंजाब से अलग हुआ और गुडगांव हरियाणा का हो गया । यह भी कहा जाता है कि यहाँ की भूमि खेती की दृष्टि से ऊपजाऊ नहीं थी। अतः धीरे-धीरे यहाँ नए- नए उद्योग खोलने के लिए लोगों को प्रोत्साहित किया गया था।

1985 के गुडगांव ने विकसित होकर गुरूग्राम की शक्ल ही बदल दी है। शहर का औद्योगिकीकरण हुआ, नए-नए-नए माॅल खुल गए हैं । बङी-बङी बिल्डिंग बन गई है। इस देहाती शहर का नाम पूरी दुनिया में प्रसिद्ध हो गया है। तब जब मैं किसी को बताती कि मैं गुडगांव में रहती हुँ, लोग सोचते, ” बेचारी दिल्ली की लङकी देहात में जा बसी है।” वहीं वे आज सोचते है कि ” मैं एक आधुनिक शहर में रहती हुँ।”

आज गुरूग्राम हरियाणा का दूसरा सर्वाधिक जनसंख्या वाला शहर है और भारत का यह चंडीगढ़ और मुंबई के बाद तीसरा पर कैपिटा इनकम वाला नगर है।

यह परिवार गुड़गांव के स्थानीय बनिया थे। इनके आस-पास भी सभी स्थानीय लोग रहते थे। अतः इनकी भाषा में स्थानीय हरियाणवी ठेठपना होते हुए भी हिन्दी अच्छी थी।
मेरी मुलाकात मकान मालकिन से उस दिन शाम को हुई थी। उन्हें देखकर तो उन्हें हरियाणवी नहीं कहा जा सकता था, पर बोली में रौब और तेजी थी। वह छोटे कद की सख्त मिजाज़ की महिला थी। उन्हें देखकर मुझे अपनी मामी नानी की याद आती थी। बिलकुल नारियल के समान, ऊपर से सख्त अंदर से कोमल थी। सेतु का बहुत ध्यान रखती थी, उसके रोने की आवाज सुन तुरंत आ जाती थी, बोलती, ” अरी, बहु, क्या हुआ छोरे को?”

हम किराया मकानमालिक को ही देते थे। फिर एक दिन अम्मा जी(मकान मालकिन) मेरे पास आई और बोली, “तुम भविष्य में किराया मुझे दिया करना, गुप्ता जी के हाथ में मत देना।”

मैंने एस. के. को बताया तो उन्हें यह सुझाव अजीब लगा और बोले, ” बाबुजी ( गुप्ताजी) बुरा मानेंगे।”

आदमियों को कहाँ औरतों की बात समझ आती है और उन्होंने किराया बाबुजी को ही दिया था तब अम्मा जी बोली तो कुछ नहीं पर उनके व्यवहार में बदलाव आ गया था।
मुझे जो बात समझ आई उसकी पुष्टि उनकी बहु ने भी की थी।बाबुजी घर का पुरा खर्च उठाते थे पर अम्मा जी को एक पैसा नहीं देते थे।अपने खर्च वह हमारे किराए से पुर्ण करती थी।

समाज में सभी जगह औरतों की तकलीफे एक जैसी होती है। पुरुष अपने को अक्लमंद समझते हैं , उन्हें लगता है कि पैसा संभालने की समझ उन्हीं के पास है। औरतों की निजी जरूरत , सुरक्षा- असुरक्षा, आत्मसम्मान की भावना को तो कोई बिरले ही समझ पाते हैं ।
ऊपर से दबंग दिखने वाली अम्माजी भी अपने पति के सामने कमजोर पङ जाती थी।
उसके बाद मैं स्वयं अम्माजी के हाथ में किराया देने लगी थी।बाबुजी ने भी बुरा नहीं माना था। यानि बाबुजी सब जानते थे, फिर एक बार किराये के पैसे उनके पास आ जाते थे तो वह स्वयं उन पैसों को अम्माजी के हाथ में क्यों नहीं देते थे?

अब अम्माजी हम से खुश रहने लगी थी, गुङगांव में पानी की समस्या थी पर उनकी कोशिश रहती थी कि हमें परेशानी न हो।

हमारे कमरे के सामने थोङा आंगन पार कर दो स्नानघर थे, उनमें से एक स्नानघर हमें उनके बङे बेटे के पांच सदस्यों के परिवार के साथ शेयर करना था। हमें स्नान के लिए अपनी रसोई के नल से पानी भर कर ले जाना होता था। पानी की दिक्कत थी पर यह भी सच है कि कई बार पानी सिर्फ हमारी रसोई में ही आता था और उन सबको हमारी रसोई से पानी लेना पङता था।

समस्याएं थी, जब गुङगांव रहने का फैसला करा था तो इन समस्याओं को कबूल भी करना था। फिर दिमाग में था कि यह जिला गांव जैसा होगा , पर खुशी थी कि यह छोटा सही शहर तो है।

अम्माजी का बङा बेटा दिल्ली के किसी सरकारी विभाग में काम करता था, नौकरी अच्छी थी पर उसकी शराब पीने की आदत से बङी भाभी बहुत तनाव में रहती थी। इसी कारण उन्होंने अपने 18 वर्षीय बेटे को अपने मायके छोङा हुआ था।उनका मायका रेवाङी में धनी व्यापारी का था। दिल्ली के गुप्ताईन व इंदू भाभी (बङी भाभी) में इसी बात में समानता थी। दोनों का अपने बेटों को अपने मायके (यानि उनके नाना-नानी की देख-रेख ) में छोङना अजीब था। जहाँ तक मुझे याद है दोनो लङके पढ़ाई में पिछङे हुए थे।

इंदू भाभी के 15 व 12 वर्ष की दो बेटियाँ भी थी। दोनों पढ़ाई में होशियार थी। जबकि दोनों माता – पिता के साथ रहती थी।

अम्माजी इंदू भाभी को पसंद नहीं करती थी।कई बार माता-पिता अपने लङके की गलत आदतों के लिए अपने बेटे को दोष न दे कर अपनी बहु को ही दोष देते हैं कि उनकी बहु उनके बेटे(अपने पति) को संभाल नहीं सकी है।

मेरा मन इंदू भाभी के साथ ही लगता था। गुङगांव शिफ्ट होने के डेढ़ महीने बाद मेरा छोटा भाई आशु चला गया और उसके एक महीने बाद मम्मीजी का स्वर्गवास हो गया था। तब उस संताप में मुझे बाहर की रोशनी और लोगों से बात करना अच्छा नही लगता था।मैं अपने सब काम जल्दी खत्म कर, सेतु को लेकर कमरा बंद कर रहती थी।तब इंदू भाभी ने मेरा दुख समझा था।

यहाँ मकान में कई लोग रहते थे, पर दिल्ली के पहले मकान की तरह नियम -कानून नहीं थे। सिर्फ सप्ताह के दो दिन शौचालय की टंकी में पानी भरना होता था।पानी का दबाव कम आता था, अतः ऊपर टंकी तक पानी स्वयं नहीं पहुँचता था व किसी पाइप से भी नहीं भर सकते थे। तो बाल्टी भर कर ही टंकी में पानी डालते थे।

लेकिन मैंने एक दिन भी यह काम नहीं किया था, चूंकि अम्माजी की बहुएँ मेरा साथ देती थी।वे मुझ पर हँसती और कहती,” आपको तो देखने से ही लगता है कि आपने ऐसे भारी काम कभी नहीं किए हैं ।”

अम्मा जी की बङी बहु इंदू अमीर घर की थी, जिससे अम्माजी की निभती नहीं थी। दूसरी बहु प्रेमा गरीब घर की थी, वह ही सास की प्यारी थी। तीसरी बहु मीना दूर कानपुर की थी।

प्रेमा थोङे भारी बदन की थी, पर सुंदर थी। शायद दो बच्चों के होने के बाद मोटी हो गई थी, चूंकि उसकी शादी की फोटो में वह पतली दिख रही थी।

प्रेमा अपने पति के साथ बाइडिंग का काम करती थी। उसके 8 व 7 वर्ष के दो बेटे थे। पति के काम में सहयोग करते हुए , गृहस्थी के सब काम, बच्चों की देखभाल व समय मिलते ही या सास की जरूरत के समय सास-ससुर का काम भी करती थी।

औरतें एक साथ कई कार्य करने की क्षमता रखती हैं ।यह सिर्फ मैं नहीं कह रही, गांधीजी ने भी कहा था।

समय पर सही काम अन्यथा उलाहने मिलने में देर नहीं लगती थी। वह अपनी सास की सबसे पसंदीदा बहु थी क्योंकि उलाहने सुन कर भी हँसती रहती थी व सभी काम कुशलता से करती थी।

अम्माजी की तीसरी बहु मीना की बुरी गत थी। शादी के दो साल के भीतर उसके दो बेटियाँ हो गई थी। अतः शारीरिक रूप से भी वह कमजोर हो गई थी, फिर गोदी में दो बच्चे, वह घर के काम उतनी चुस्ती -फुर्ती से नहीं कर पाती थी।

उसके प्रत्येक कार्य में नुक्स निकाला जाता था, उसका आत्मविश्वास कमजोर कर दिया गया था। फिर भी प्रेमा भाभी उसका साथ देती थी। मीना M.A. पास थी ।उसकी शिक्षा का प्रभाव उसकी बातचीत व लहजे में झलकता था। वह कम पढ़े-लिखे परिवार में आई थी पर अपनी शिक्षा का प्रदर्शन नहीं कर रही थी।

मैंने देखा वह जब भी कहीं बाहर जाती, बहुत सलीके से तैयार होती थी, सांवली थी पर उसे बहुत अधिक मेकअप की आवश्यकता नहीं थी।मीना के पति का काम हमारे स्थानीय निवास से बहुत दूर था। उसे आने – जाने में परेशानी थी अतः वह अपने परिवार के साथ अपने कार्यालय के पास ही शिफ्ट हो गया था।

एक दिन अम्मा जी व परिवार के सदस्य मीना से मिलने उसके घर गए थे। जब अम्माजी उस से मिलकर वापिस आई तो बहुत खुश थी, मीना ने उनकी अच्छी खातिरदारी की थी। उसके बनाए पकवानों के साथ, जिस प्रकार उसने अपनी गृहस्थी सजाई थी, उसका वर्णन किए बिना भी वह नहीं रह पा रही थी।

बाद में पता चला था कि अंत समय तक अम्मा- बाबुजी उसी के पास रहे थे।
अक्सर बहुओं को अपनी ससुराल में सम्मान नहीं मिलता है, उन्हें अपनी ससुराल में अपनी जगह बनाने के लिए बहुत हील – हुज्जत करनी पङती है।

यादें बेशकीमती होती हैं ,

जिनके रंग अपने-अपने होते हैं ,

याद आते हैं वे अजनबी,

जो थे कभी, मेरे हमदर्द।

( ऐसे अन्य हमदर्दो के निजी दर्दों की दास्तान अगले भाग में)

क्रमशः