एक वक्त आता है जब बच्चे माता-पिता के प्रेम की छांव से निकल कर, उस सुरक्षित दहलीज़ को त्याग कर, जीवन के सत् को समझने के लिए, नए रास्तों पर निकलते हैं।
मैं अभी तक अपनों के बीच रहती आई थी।पङोसी भी इतने अपने कि पता नहीं था कि वे पङोसी थे या रिश्तेदार।अपनों का अपनत्व ही जाना था। अजनबियों के साथ व्यवहारिकता की समझ नहीं थी। शादी के बाद ससुराल अजनबी, पति अजनबी और साथ ही आस-पड़ोस भी अजनबी था।

शादी को तीन वर्ष हो गए थे, कुछ-कुछ व्यवहारिकता की समझ बनने लगी थी।अजनबी जिन्दगी, जीवन को नई समझ देने लगी थी।यह स्वीकृति मन और दिमाग को हो गई थी कि माता-पिता की ऊंगली छूट गई है। तब स्वतः जीवन के प्रति अपनी मौलिक दृष्टि बनने लगी थी।

मैं दिल्ली से एक महीने बाद लौटी थी। घर का नक्शा बदला हुआ था। सामने दो अजनबी बुजुर्ग थे। प्रत्येक व्यक्तित्व के प्रभाव से परिवेश भी प्रभावी होता है। अतः घर में प्रवेश करते ही परिवेश में आए बदलाव को महसूस किया था। छाबड़ा परिवार की तरह चहकता हुआ परिवेश अब शांत और थका हुआ महसूस हो रहा था।

आंगन में छाबङा जी के बङे कमरे के सामने एक फोल्डिंग बैड पर एक उम्रदराज बुजुर्ग बैठे थे।और हमारी छोटी रसोई के सामने एक कमर झुकी, पतली कमजोर उम्रदराज बुजुर्ग महिला बैठी अपना काम कर रही थी। इन दोनो के बीच एक पांच वर्षीय कन्या अचंभे से मुझे और सेतु को देख रही थी।

इन अम्माजी का कद बहुत छोटा था और बाबुजी उनसे दुगने लंबे थे।
मुझ से और सेतु से मिलकर दोनों बुजुर्ग बहुत खुश हुए थे। थोङी देर में अम्माजी मेरे लिए पानी व बिस्कुट नमकीन ले आई थी,उन्हें पता था कि चाय मेरे लिए नुकसानदायक है, इसलिए ठंडा शरबत बना लाई थी। उनके इस सदव्यवहार से मैं नि:शब्द थी।

मैं अम्माजी से बहुत प्रभावित थी, कमर झुकी थी,पर धीरे-धीरे सभी काम करती थी, कपङे धोना, खाना बनाना, बर्तन व सफाई सभी काम स्वयं करती थी। वह बहुत कम पानी में साफ और झकाझक कपङे धोती थी, जैसे किसी डिटर्जेंट पाउडर का विज्ञापन होता है। सबसे बङी बात थी कि वह खुश रहती थी, दिखता था कि थक जाती हैं पर कभी उफ करते नही देखा था।

मेरे से उनकी दोस्ती हो गई थी। वह अपने मन की बात मुझसे कह देती थी। ये सिंधी पंजाबी थे, रेवाड़ी के किसी गांव से आए थे। भाषा भी वैसी बोलते थेl मुझसे हिन्दी में बात करती थी पर अधिकांश शब्द हरियाणवी सिंधी होते थे।

अम्माजी के दो बेटियाँ और एक बेटा था, बङी बेटी सोनीपत रहती थी, छोटी बेटी गुङगांव में ही रहती थी।वह ही जब समय मिलता सुबह-शाम माता-पिता से मिलने आती थी व अपनी माँ के काम में मदद भी कर जाती थी।

अम्माजी का बेटा दिल्ली में रहता था, अक्सर सपरिवार उनसे मिलने आता था। उसके एक बेटी थी, जो अम्माजी के साथ रहती थी। दो जुङवां बेटे थे जो तीन साल के थे। शायद जुङवा बच्चों को संभालने की परेशानी को देख पोती दादी-बाबा के पास रहने लगी थी।
बहु मार्डन थी, मैंने उसे कभी अम्माजी की मदद करते नहीं देखा था। अम्माजी भी उसके साथ मेहमानों की तरह व्यवहार करती थी।

अम्माजी- बाबुजी बच्चों के आने से बहुत खुश हो जाते थे।बेटा बहु पोती दीक्षा को अब अपने पास रखना चाहते थे।इस बात पर बाबुजी बहुत दुखी व नाराज़ थे। पांच वर्षीय दीक्षा हमेशा दादा-दादी के साथ ही रही थी, अतः वह भी जाना नहीं चाहती थी। जब भी बेटा आता तब वह बाबुजी को समझाता कि “दीक्षा का अब हमारे साथ रहना जरूरी है।”

बाबुजी को लगता कि ” बेटा स्वार्थी है जब उसे जरूरत थी उसने दीक्षा को उनके पास छोङ रखा था, अब जब वे दीक्षा के मोह में बंध चुके हैं, तब वह उसे हमारे पास से ले जा रहा है। उन दोनों के अकेलेपन का दीक्षा ही सहारा थी।”

कई बार औरतें जो बात व्यावहारिक रूप से समझ पाती है, उसे मर्द समझना नहीं चाहते हैं या समझ नहीं पाते हैं।शायद मैं गलत भी हो सकती हुँ, यह औरत- मर्द की बात नहीं है, अपितु प्रत्येक के व्यक्तिगत व्यक्तित्व की बात हो सकती है।

अम्माजी ने मुझे कहा था,” मुझे भी दीक्षा से उतना ही मोह व प्रेम है, जितना तुम्हारे बाबुजी को है, मैंने ही उसे गोद में रखा संभाला है।
पर एक दिन तो उसे अपने माता-पिता के पास जाना ही है, हम कब तक रहने वाले हैं, अभी उसे बुरा लगेगा पर और बङा होने पर अधिक बुरा लगेगा। हमारी पोती अवश्य है पर अमानत तो बेटे-बहु की ही है न! फिर अब मुझ से भी कहां इतना काम संभलता है। इसके माता-पिता इसकी अच्छी परवरिश कर सकते हैं ।”

हमारे सामने उनकी बङी बेटी व बच्चे उनके पास छुट्टियां बिताने आए थे। उसकी विदाई के समय, उन्होंने रिवाज़ के अनुसार उसे कुछ उपहार दिए थे।उसके उपहार देख, उनकी छोटी बेटी उनसे नाराज हो गई थी।

अम्माजी ने दुःखी हो मुझे बताया था,” बहुत मुश्किल है, बङी बेटी सोचती है कि छोटी बेटी हमारे करीब रहती है तो उसे हम अक्सर कुछ न कुछ देते रहते होंगे, जिससे वह वंचित रह जाती है।
छोटी बेटी इसलिए नाराज़ है कि इतने गिफ़्ट एक साथ हम कभी उसे नहीं देते हैं।”

अम्माजी अपने आर्थिक सामर्थ्य के कारण दुःखी नहीं थी ।उनके मन के संताप का कारण, उनकी बेटियों की नासमझी थी। जिन्हें अपने माता-पिता का प्रेम आज भी धन व उपहार में दिखता था।

इन बेटियों के व्यवहार से जो अशांति मिलती थी, उसने उनकी अपनी बेटियों से मिलने की इच्छा को मंद कर दिया था।

इस बुजुर्ग दंपत्ति को अब किसी से कुछ नहीं चाहिए था। अब अपने बच्चों के लिए एक ही आशीर्वाद था, ‘ अपने-अपने परिवार के साथ सुखी रहें।’
वे अपने जीवन के अंतिम पड़ाव में सिर्फ शांति चाहते थे।

समझ नहीं आता कि हिंदूस्तानी संतानें हमेशा अपने माता-पिता से लेना ही क्यों चाहती हैं। तभी तो कई-कई बीघा जमीनें छोटे-छोटे टूकङों में बंट जाती है।

अम्माजी व बाबुजी सिर्फ छः महीने हमारे साथ रहे थे, दीक्षा अपने माता-पिता के पास चली गई थी तो वे लोग अपने गाँव वापिस चले गए थे । रविन्द्र भी दिल्ली चला गया था।

बीता वक्त गुजर गया,
जो करना था वो कर दिया,
जो होना था वो हो गया,
न कोई उथल-पुथल, न कोई उलझन है,
न कोई नाराजगी, न कोई शिकायत है,
अब तो शांति पथ पर बढ़ना है,
समय है अब थोङा,
तो अब अपने लिए भी है जीना।