सेतु ढाई साल का हो गया था, वह मेरी गोद से बाहर निकलने को बेकल हो रहा था। उसे दोस्त चाहिए थे, जिनके साथ वह अपने जैसे खेल खेलता, शैतानी करता, नई- नई खोज करता।
लेकिन घर के आसपास बच्चें नहीं थे । पङोस की आठ वर्षीय इंदु और उसका सात वर्षीय भाई अमित अक्सर सेतु के साथ खेलते थे। पर उनके लिए सेतु एक छोटा मनभावन खिलौना था।
मुझे लगता कि उसके हमउम्र साथी होने चाहिए।

मैं अभी उसे स्कूल के अनुशासन में बाँधना नहीं चाहती थी।स्कूल में उसे हमउम्र साथी तो मिलते पर उन्मुक्त वातावरण नहीं मिल सकता था।
और मेरी मुराद पुरी हुई, जब कपिल आया था।

उन बुजुर्ग दंपत्ति के जाने के बाद, उन कमरों में कपिल अपनी माँ उषा के साथ रहने आया था।

कपिल सेतु का हमउम्र बहुत प्यारा व शरारती बच्चा था। कपिल के पिता डॉक्टर थे और माँ हाउस वाइफ थी। यह परिवार गुड़गांव के ही पास किसी गाँव से आया था। डॉ. साहब की डाॅक्टरी गांव में अच्छी चलती थी, या यूं कहें कि उन्होंने अपना जीवन अपने गांव को समर्पित किया था। अतः वह अपने परिवार के साथ शहर में शिफ्ट नहीं हुए थे।

मैंने एक कहानी पढ़ी थी, जिसमें नायिका अपने परिवार के विरोध को अनदेखा कर, अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा देने के लिए, बच्चों को लेकर अकेली शहर आ जाती है।
इस कहानी में भी कपिल की माँ उषा, अपने बेटे के व्यक्तित्व के विकास के लिए,अकेली गुडगांव आकर रहने लगी थी।
अंतर यही था कि उसे अपने पति व परिवार का पुरा समर्थन व सहयोग प्राप्त था । डॉ. साहब सप्ताह में एक बार उनसे मिलने आ जाते थे। अक्सर रात के ग्यारह बजे आते और सुबह पांच बजे चले भी जाते थे।
डाॅ. साहब का परिवार, अपने गाँव का एक प्रतिष्ठित परिवार था, गांव में उनका बहुत मान था। डाॅ. साहब ने कभी शहर आकर प्रेक्टिस करने की नहीं सोची थी, वह बहुत मन से अपने गाँव के लोगों की सेवा कर रहे थे।
गाँव में इनका संयुक्त परिवार था। परिवार के सभी सदस्य मिलकर सभी काम संभालते थे। एक- दूसरे की योग्यता का सम्मान व आपसी अटूट विश्वास अद्वितीय था। उसके ताया ससुर -खेती-बाड़ी संभालते थे। उसके पिता ससुर हिसाब-किताब देखते थे। चाचा ससुर के जिम्मे बाहर के काम थे।
चाचा ससुर ही समय- समय पर आते और उषा और कपिल की जरूरतें संभालते थे।

एक चचेरी ननद गुङगांव में ही रहती थी, वह और उसके पति हर समय उसकी कठिनाई में उसके सहारे थे। अतः डॉ. साहब उषा और कपिल की ओर से पुर्णतः निश्चित थे।। वे इत्मीनान से अपनी डाक्टरी सेवा पर ध्यान दे पा रहे थे।

उषा कोई ग्रामीण महिला नहीं थी। वह दिल्ली शहर में पली बङी थी। उसके पिता का तबादला होता रहता था, अतः उसकी परवरिश में अनेक शहरों की संस्कृति का प्रभाव था। उसने ग्रामीण जीवन शादी के बाद ही जाना समझा था।

उषा ने Home science में डिग्री प्राप्त की थी। उषा सुंदर व स्मार्ट थी। दिल्ली शहर की लङकी के लिए ग्रामीण ससुराल ही क्यों चुनी गई थी ? हम दुनिया है, जो सीधी बात को भी भेदना चाहते हैं ।

सोचा प्रेम में सब संभव है, अगर उषा सुंदर थी, तो डाॅ.साहब भी कम न थे, इस पर सज्जनता चेहरे पर चमकती थी। भावुक प्रेमिका अपने प्रेमी के साथ कहीं भी रहना पसंद करती हैं।

पर यह प्रेम विवाह नहीं था। अब माता-पिता ने क्यों कर अपनी बेटी के लिए ग्रामीण परिवेश व उसकी कठिनाइयों को चुना था ?

इन सवालों के उत्तर जो उषा से मिले उसके सार में समाज की परिपाटियाँ ही थी और कुछ नहीं ……।

विवाह की अनिवार्यता और वह भी सही उम्र में होना आवश्यक है । सही उम्र निकल गई तो उत्तम जीवनसाथी मिलना कठिन हो जाएगा, विशेषकर लङकियों के लिए. …… लङकियों के जन्म के साथ ही उसका विवाह …. उसके लिए उचित घर- वर की तलाश, एक बहुत बङी जिम्मेदारी, माता-पिता के लिए होती है।

हिन्दुस्तानी माता-पिता यह बहुत दृढ़ता से मानते है कि अपने बच्चों के वे ही भाग्य निर्माता हैं और फिर भी कमी हो जाए तो माना जाता है , ‘ ईश्वर की यही इच्छा होगी।’ पर बच्चों को अपने भविष्य निर्माण में भागीदार नहीं बनाते हैं।

उषा सुंदर थी, पर सुंदरता के मापदंड से ही विवाह सही उम्र में हो जाए, यह आवश्यक नही है। माता-पिता के पास धन की कमी न थी । पर उचित घर-वर नहीं मिल पा रहा था, फिर छोटी बेटी का कद भी बङा होता जा रहा था। उस पर रिश्तेदार ! उनके पास बात करने के लिए एक ही विषय या यूं कहें फिक्र… उनके अपनों के बच्चों का विवाह . ..।

डॉ. साहब व उनके परिवार की सज्जनता व शराफत प्रसिद्ध थी।
यह सोचा कि हमारी संस्कारी लङकी ग्रामीण जीवन की कठिनाइयों को पार कर लेगी। लङकी भी क्यों न करेगी? वह संस्कारी लङकी भी अपने लिए थक चुके माता-पिता को अपनी जिम्मेदारी से मुक्त करना चाहेगी।

एक सुंदर ख्याल यह भी रखा गया कि डॉ. साहब भी कब तक गाँव में ही प्रेक्टिस करेंगे, शहरी आमदनी उन्हें आकृषित करेगी ही और वह शहर आ जाएंगे।
उसने चार साल ग्रामीण जीवन को समझा व पति के मन को भी समझा और अपनी नियति को भी जाना…. फिर गुङगांव अकेले रहने का फैसला लिया।

उसे ससुराल वाकई अच्छी मिली थी। कुएँ से पानी भरना हो या मसाले पीसने हो….. घर में अन्य सदस्यों की सहायता तत्परता से मिलती थी। उसके इस फैसले पर खुशी-खुशी स्वीकृति मिलने में कठिनाई तो हुई पर अंततः सबने एकजुट हो उसको अपना सहयोग और मान दिया था ।

अपने माता-पिता व भाई-बहन सबको उसने अपने इस एकाकी घर में निमंत्रित किया था। अपनी माँ की दी हुई सुंदर कीमती क्राकरी पहली बार निकाली, “गांव के बुजुर्ग ऐसी क्राकरी में खाना नहीं खाते हैं । वे तो व्यंजन भी देसी पारंपरिक ही खाना पसंद करते हैं “।अक्सर ऐसे वाक्यांश उसके मुहँ से सुने जाते थे।

इसका अर्थ यह भी नहीं कि वह खुश नहीं थी, उसने अपने वैवाहिक जीवन को सच्चे दिल से स्वीकार किया था।
वह तो कभी ऐसे ही कोई क्रीच जाग जाती थी। अपने शहरी आधुनिक शहरी रिश्तेदारों के सामने जब अपने ग्रामीण ससुरालवालों की तुलना भी अनजाने ही कर जाती थी।इन ग्रामीणों की सज्जनता व मानवता पर उसे गर्व भी कम नहीं था।

अब उसके मायके से कोई न कोई उसके एकाकी जीवन के संघर्ष को समझने आ ही जाता था। यह तसल्ली भी करता कि डॉ. साहब भी जल्दी ही शहर शिफ्ट हो जाएंगे। पर ऐसा नहीं हुआ, वह अपने गाँव को छोङ नही सके थे।
उषा ने भी अपने इस संघर्ष को स्वीकार कर लिया था।यह कहना अधिक उचित होगा कि उसने अपने पति के जीवन उद्देश्य को गहराई से समझा था।

गुङगांव शिफ्ट होते ही उसने कपिल को पास ही एक play school में प्रवेश करा दिया था। कपिल जब रोता हुआ स्कूल जाता तब मैं सेतु को देख खुश होती कि वह अभी आजाद है।

कपिल संयुक्त परिवार से आया था। अतः वह बहुत जिद्दी था । वह अपने परिवार की कमी महसूस करता था।
उषा कपिल के सभी खिलौने ताले में बंद रखती थी और कपिल को उन खिलौनों से कमरे के अंदर ही खेलने देती थी। क्यों ?
मैं सेतु को बाँधकर रखना नही चाहती थी, फिर वह इसी मकान में ही बङा हो रहा था। सिर्फ कमरे में ही खेलना उसका स्वभाव नहीं था ।
सेतु कपिल के साथ अपने खिलौनों से खेलना चाहता था, पर कपिल ने छीनना और शेयर न करना सीखा था। मैं सेतु को दबाना नहीं चाहती थी और न बच्चों की बात पर झगङा करना पसंद था।
कुछ दिनों बाद सेतु और कपिल का गुङगांव के एक प्रतिष्ठित स्कूल में प्रवेश हो गया था।दोनों एक साथ स्कूल जाते थे। आरंभ में घर से जाते हुए कपिल बहुत रोता था और सेतु खुश- खुश जाता था। हम बहुत खुश थे कि हमारा बेटा बिलकुल नहीं रोता है। परंतु जब P.T.M में गए तो पता चला कि स्कूल में कपिल तो खुश रहता था पर सेतु रोने लगता था और बार- बार कपिल के पास बैठने की जिद करता था।
धीरे-धीरे सेतु और कपिल अच्छे दोस्त बन गए थे। दो साल बाद अगस्त 1989 में कपिल को एक छोटी बहन मिली और दिसंबर में सेतु को एक छोटा भाई मिला । सेतु और कपिल अब और शरारती हो रहे थे।
उषा अपनी इस नई जिम्मेदारी को खुशी-खुशी निभा रही थी। आस-पङोस और चचेरी ननद का परिवार उसकी कठिनाइयों में सहायक थे।डाक्टर साहब का वह ही रूटीन था। उषा और बच्चों को भी अब उसकी आदत हो गई थी।
1990 में हमारा स्थानांतरण लखनऊ हो गया था । हमने सोचा था कि हमारा गुङगांव वापिस लौटना नहीं होगा। पर नियति सात साल बाद फिर गुङगांव ले आई थी तब पता चला उषा ने वहीं पास ही एक मकान खरीद लिया था।

जब समझ लिए हो मन,
तब क्या चिंता करना,
तुम जियो अपना जीवन सार,
मैं हुँ तुम्हारे साथ,
पर मुझे भी पूरा करना है,
अपना जीवन साध।
जो तेरा सार वो मेरा सार,
जो मेरा साध वो तेरा साध।

हम भिन्न नहीं अभिन्न है,
यही जाना जीवन थार।