जीवन में पङोस और पङोसियों के महत्व पर एक बङा लेख लिखा जा सकता है। भारतीय संस्कृति में यह माना जाता है कि अगर पङोस अच्छा है तो कोई चिन्ता की बात नही है क्योंकि आपके सुख-दःख में रिश्तेदार बाद में आते हैं, पहले पङोसी ही खङे होते हैं ।

आज के दौर में भी जब लोग मिलनसार नही रहे हैं, अपनी प्राईवेसी पर अधिक जोर रहता है, तब भी बुरे वक्त पर पङोसी याद आते हैं व पङोसी भी अपना धर्म निभाते हैं ।
यह मेरी खुशकिस्मती रही कि हमें हमेशा पङोस अच्छा मिला है।
अतः गुङगांव से लखनऊ निकलने से पहले उस गली के सभी पङोसियों पर एक नजर तो डालनी ही होगी।

‘ करोगे याद तो हर बात याद आएगी,
गुजरते वक्त की हरमौज ठहर जा आएगी’

हम इस मकान में चार वर्ष रहे थे, आस-पड़ोस में सभी से हमारे संबध अच्छे बन गए थे। पङोसियों से अच्छे सबंध बनाने का श्रेय मैं हमेशा एस.के को
देती हुँ। उनका मिलनसार स्वभाव शीघ्र ही सबको प्रभावित करता था

हमारे दाएं तरफ का मकान एक सरदार परिवार का था, 1984 के दंगों ने उन्हें गुङगांव से निकलने को विवश कर दिया था।
उन्होंने अपना मकान एक अग्रवाल परिवार को किराए पर दिया था।
अग्रवाल परिवार संयुक्त परिवार था, सास, तीन बेटे, दो बहुए, एक छोटी कुआंरी ननद थी।
ससुर नहीं थे तो घर की सारी जिम्मेदारी बङे बेटे ने संभाल रखी थी। अपने पति की इस जिम्मेदारी को गरूर सहित निभाते हुए, परिवार पर अपना दबदबा बङी बहु ने अपने सहज अधिकार के तौर पर लिया था।
घर का सभी काम दोनों बहुएं मिलकर करती थी,पर छोटी बहु अधिक दबी नजर आती थी, उसी के दो बच्चे थे। बङी बहु नि:संतान थी।
सास और छोटी ननद से मेरी दोस्ती हुई थी। सास समझदार थी, उन्होंने फैसला ले रखा था कि बेटी की शादी के बाद बेटों को अलग कर देगी और स्वयं छोटे बेटे के साथ रहेगी।

अग्रवाल परिवार के जाने के बाद यह मकान मिस्टर तनेजा ने खरीद लिया था। मिस्टर तनेजा का परिवार मैनपुरी से शिफ्ट हो कर आया था। मिस्टर तनेजा मुलतः गुङगांववासी थे। बच्चों की उच्च शिक्षा के लिए, उन्हें एक जगह स्थापित करने के उद्देश्य से यह मकान खरीदा गया था। परिवार यहाँ शिफ्ट हो गया था पर उनकी नौकरी मैनपुरी में थी, वह स्वयं महीने में एक बार परिवार से मिलने आते थे।

मिसेज तनेजा के लिए पति के बिना परिवार की देखभाल करना एक चुनौती थी, अतः वह हमेशा तनाव में रहती थी। उनके दो बेटी व एक बेटा था। बङी बेटी बारहवीं कक्षा में पढ़ रही थी, बेटा आठवीं कक्षा और छोटी बेटी दूसरी कक्षा में पढ़ रही थी।

मिसेज तनेजा के हमेशा तनाव में रहने के कारण, उनके घर में अशांति बनी रहती थी ।गली में कोई उन्हें पसंद नहीं करता था। मेरे पास वह बेझिझक आती थी ,हम अपना सुख-दुख बांटते थे। पर फिर याद नहीं किस कारण हमारे बीच बात-चीत बंद हो गई थी। शायद मेरी रिश्ते बढ़ाने की अपनी सीमा रेखा थी, जिसे मैं किसी को लांघने नहीं देती थी।

लेकिन तभी एक घटना ने मेरे दिल मेें उनके लिए सम्मान बढा दिया था। यह मेरे दूसरे बेटे मिंटू के जन्म के बाद की बात है। सेतु को बुखार आ रहा था।तेज बुखार उसके दिमाग में चढ़ गया और वह बेहोश हो गया था।हम तुरंत उसे लेकर डाक्टर के पास भागे थे। हमें परेशान जाता देख मिसेज तनेजा ने मिस्टर तनेजा (उस समय गुङगांव में थे) को हास्पिटल भेजा था, मिस्टर तनेजा ने एस. के. को कुछ रूपये पकङाते हुए कहा,” हमने सोचा आप घबराकर भागे हैं , पता नहीं अचानक इस समय पैसे है कि नहीं । संकोच न करें और अन्यथा न लें ।”
मैंने हमेशा मिसेज तनेजा का आभार माना है, हम फिर मित्र बन गए थे।
बुरे वक्त पर जो काम आए वह ही सच्चे मित्र होते हैं।

मिसेज तनेजा ने अपने मकान में आगे के भाग में एक कमरा किराए पर दिया था। उस कमरे में वंदना व राकेश रहने आए थे। उनका बेटा मनु सेतु से छोटा था। कपिल, सेतु और मनु एक साथ खेलते थे। यह महज इत्तफाक था या इसके पीछे कोई मनोवैज्ञानिक कारण भी हो सकता है। हमारे बाएं तरफ के मकान में वधवा भाभी ( इंदू की मम्मी) ने बेटे को जन्म दिया था और उसके लगभग एक साल बाद उषा ने बेटी को और तीन महीने बाद वंदना ने बेटे को जन्म दिया था। फिर हमारे घर मिंटू आया था।

कहा जाता है कि छोटे भाई-बहन के माँ की गोद में आने से बङे बच्चों पर मनोवैज्ञानिक प्रभाव पङता है, पर कपिल, मनु और सेतु पर बहुत ही सकारात्मक असर हुआ था। वे अब अपने को अधिक आजाद महसूस कर रहे थे। जब हम माएँ अपने नवजात शिशुओं के साथ व्यस्त रहते तब ये बच्चे अपना मनमाना जीवन जीते थे। उसी आजादी ने कपिल को एक चोट दी थी। गेट पर खेलते हुए कपिल गिर गया था और सिर फट गया था, कपिल को लेकर एस. के. डाक्टर के पास भागे थे, साथ बदहवास उषा गई थी। कपिल के सिर पर टांके आए थे। दो दिन बाद फिर कपिल खेलने के लिए मैदान में था। बच्चे जल्दी ही तकलीफ भूल जाते है।

हमारे मकान के बाएँ तरफ सेठी साहब का मकान था । मिसेज सेठी एक सरकारी विद्यालय में अध्यापिका थी। बहुत हल्के- हल्के चलती थी, पैरों में तकलीफ थी। प्रतिदिन रिक्शे से स्कूल जाती थी। मुझे वह बहुत अच्छी लगती थी, जब भी मिलती बहुत प्यार से मिलती थी। उनके दो बेटी और एक बेटा था।

गुड़गांव के इन मकानों की विशेषता थी कि यहाँ आंगन बङे होते थे। फ्लेटवासी, आजकल की पीढ़ी तो आंगन शब्द से परिचित भी नहीं हो सकती है।

मुझे अपनी दादी का पुरानी दिल्ली का मकान याद आ जाता है।घर का दरवाजा खुलते ही आंगन होता था। उसी आंगन में बङे-बङे कार्यक्रम होते थे। मेरे और छोटी बहन के फेरे उसी आंगन में हुए थे।
गुड़गांव के बङे खुले आंगन देख, दिल खुश हो जाता था। हमने भी इसी मकान के बङे आंगन में देवीजागरण किया था।

सेठी साहब के मकान के आंगन के बाएं तरफ एक कमरा और किचेन था। जिसे वह किराए पर उठाते थे। आंगन के दूसरी तरफ उनके कमरे थे।कमरों के आगे दालान भी था पहले ऐसे ही मकान बनते थे, आंगन उसके बाद दालान फिर कमरे होते थे। आजकल तो कहा जाएगा कि खाली जगह छोङ कर, जगह बेकार कर दी है।
अभी भी HUDA के नियम अनुसार आगे- पीछे बेङे (आंगन) बनाना अनिवार्य है।

यह महज इत्तफाक ही था कि चार साल में सेठी साहब के दो किराएदार आए और उनकी पत्नियों से मेरे गहरे सबंध बने थे।

कुछ भूली- बिसरी यादें,
जब मन को छूकर जाती है,
मन भीग जाता है,
कितने अनाम रिश्ते,
तब जग जाते हैं,
यादें गिली हो, मुस्काती है।

क्रमशः