लखनऊ को नवाबों का शहर कहा जाता है। प्राचीन काल में इसे लक्षमणपुर कहा जाता था। माना जाता है कि अयोध्या के श्रीराम ने अपने छोटे भाई लक्ष्मण को लखनऊ भेंट किया था।
लखनऊ के वर्तमान स्वरूप की स्थापना नवाब आसफद्दौला ने 1775 में की थी।1850 में अवध के अंतिम नवाब वाजिदअली शाह को ब्रिटिश की अधीनता स्वीकार करनी पङी थी।
यह भारत के सर्वश्रेष्ठ आबादी वाले राज्य उत्तर प्रदेश की राजधानी है। इस शहर के बीच गोमती नदी बहती है।
लखनऊ शहर अपनी खास नज़ाकत और तहज़ीब वाली बहु सांस्कृतिक खूबी के लिए जाना जाता है।यहां संगीत और साहित्य को हमेशा संरक्षण दिया गया है।कत्थक नृत्य का यही केंद्र है। हिंदी कवि गोष्ठियाँ और उर्दू के मुशायरे दोनों ही इस शहर की पहचान है।
मोतीमहल, बङा इमामबाङा, हजरतगंज मार्केट यात्रियों के आकर्षण बिंदु है। इसे पूर्व का स्वर्ण नगर और शिराज़-ए-हिंद भी कहा जाता है । टूंडे कबाब और मक्खन मलाई मिष्ठान विशेष लजीज है
यह दशहरी आम के बागों तथा चिकन की कढ़ाई के काम के लिए भी जाना जाता है।
यहां की हिंदी का लखनवी अंदाज़ विश्व प्रसिद्ध है। मेरी ताई लखनऊ में जन्मी थी। पर बरसों दिल्ली
में रहने के पश्चात भी उन्होंने अपनी लखनवी बोली को अपनी ज़ुबान से मिटने नहीं दिया था। मैं हमेशा उनकी भाषा से प्रभावित रहती थी।

लखनऊ एच. ए. एल काॅलोनी में श्री श्रीवास्तवा के मकान को हमने किराए पर लिया था। वह अपनी पत्नी सहित हमसे मिलने आए थे। हम भी एक बार उनके घर गए थे। उनके चार बेटियाँ थी, उनकी पत्नी बहुत चुप और तनाव में रहती थीं ।
अधिकांशतः देखा गया है कि औरतें ही पुत्र न होने का दुख पालती हैं। इसके विपरीत श्रीवास्तवजी खुश रहते थे। अपनी बेटियों को उच्च शिक्षा दिला रहे थे।
सिर्फ एक माँ को नहीं सुनना पङता पिता को भी समाज पुत्र न होने के ताने देता है। मुझे एक परिचिता ने बताया था कि उसे पुत्र का दबाव न पति की ओर से था, न सास-ससुर की ओर से था। पर पति के दोस्त उनका मज़ाक बनाते कि वह एक भी पुत्र पैदा नहीं कर सका है। एक सामाजिक मिथ है कि पुत्र जन्म भी पुरूषत्व की पहचान है। पति परवाह नहीं करते थे व ऑपरेशन करने की सलाह देते थे । परंतु अब वह अपनी जिद और पुत्र की आशा में पांच बेटियों की माँ थी।
पति का नाम पुत्र से ही चलेगा, ऐसी उसकी तमन्ना थी। अपने नाम की चिन्ता नही , पर पति का नाम पीढ़ियों तक चले वाह री, परंपरा !

लखनऊ के मकान में मैं बहुत खुश थी। स्वतंत्र मकान ( कोई अन्य परिवार साथ नहीं )। दो कमरे, साथ में किचन, बाथरुम ,बीच का स्थान डाइनिंग के लिए प्रयोग में आता था। चारों तरफ लाॅन, पीछे की ओर हमने कुछ सब्जियां उगाई थी।आगे टमाटर, गुलाब, गेंदे के पौधे, पपीते का पेङ भी था। हरी-हरी घास पर बैठना अच्छा लगता था। शाम को सेतु बाहर खेलता, मैं वहीं बगीचे में मिंटू के साथ बैठती थी। मिंटू घूटनों चलता और लाॅन में बहुत खुश रहता था, टमाटर तोङ कर खाता था। सर्दियों में भी धूप में बहुत आनंद आता था। सुबह-शाम पेङ पौधों में पानी डालना बहुत अच्छा लगता था।

वहाँ सभी मकान एक – समान बने थे, सभी ने बहुत सुंदर लाॅन बनाए थे । हमारे मकान में किराएदार ही रहते रहे थे, इसीलिए लाॅन एरिया का फर्श अच्छा नहीं बना था। हमारा मकान जैसा अलाॅट किया गया था, वैसा ही था, उसमें कुछ सुधार नहीं किया गया था। बाकी सभी मकानों में सुधार हुआ था। किसी-किसी का लाॅन तो बहुत सुंदर था, कुछ ने माली रखा था और कुछ महिलाएं स्वयं संभालती थी। हमारे सामने श्रीमती सिंह ग्रामीण परिवेश से संबंध रखती थी, बागबानी की अच्छी जानकारी रखती थी। वह प्रतिदिन अपना कुछ समय बागबानी में लगाती थी। एच. ए. एल के सभी कर्मचारी सुबह 7 बजे ऑफिस चले जाते थे। उसके बाद महिलाएं अपना घर व बगीचा संभालती थी।

सिंह भाभी के दो लङके व एक लङकी थी। लङकी का नाम डौली था, सबसे पहले वह ही हमसे मिलने आई थी।सेतु मिंटू को उसका साथ अच्छा लगता था। वहाँ आसपास अधिकांशतः लङकियाँ थी, आरंभ में सेतु को उनके साथ खेलना अच्छा नहीं लगता था। बाद में वे सब लङकियाँ उसे अपने साथ ले जाती थी। सेतु का बातचीत का लहजा भी लखनवी हो गया था। कुछ समय बाद सेतु को एक हमउम्र दोस्त मिला था ‘करण’।

इस काॅलोनी में सभी लोग बहुत मिलनसार थे। कई लोग हमसे मिलने स्वयं आए थे। त्योहारों का आनंद तो हमने लखनऊ में ही जाना था। दीपावली की शाम को सभी लोग समय से तैयार हो कर अपने घरों से बाहर निकल आए थे। हम नए थे, तो सभी हमें विशेष रूप से मिलने आए थे, बाहर बुला कर ले गए थे।सबके साथ दीवाली मनाने में बहुत आनंद आया था। कोई औपचारिकता नहीं थी, न ही दिखावटी आवभगत और चमकदमक थी, सिर्फ अपनापन था।
होली पर भी सभी महिलाएं मुझे बुलाकर ले गई थी। मैं पहली बार महिला टोली के साथ घर-घर होली मनाने गई थी। सेतु बच्चों की टोली में था और एस. के. पुरूषों की टोली में गए थे। मुझे बहुत आनंद आया था।ऐसी होली मैंने कहीं नहीं खेली थी। कोई व्यर्थ का छिछलापन नहीं था, एक अत्यंत सुरक्षित व स्वस्थ वातावरण में सिर्फ गुलाल से खेली थी होली।
शाम को भी सेतु को सब बच्चे अपने साथ ले गए थे। हर घर में बच्चे जाते खाते- पीते मस्ती कर रहे थे। सेतु भी बहुत खुश था। मम्मी-पापा के बिना मित्र टोली में घूमने का उसका अनुभव बहुत आनंददायक था।

थोङे समय में ही कुछ परिवारों के साथ मेरा अच्छा मेलजोल हो गया था। सामने श्रीमती सिंह, उनके पङोस में एक हिमाचली परिवार था, नाम याद नहीं, पर उनसे बहुत ही स्नेहिल संबध बने थे।

हमारे साथ श्रीमती कानपाल रहती थी। अध्यापिका थी, उनके व्यक्तित्व से मैं बहुत प्रभावित थी। उनके बच्चे भी छोटे थे। उनका संयुक्त परिवार था। वह बच्चों के बालपन से ही उनके स्वतंत्र व्यक्तित्व विकास को महत्व देती थीं बच्चों को स्वयं पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करती थी। बच्चे अपने होमवर्क स्वयं करें, अपने काम स्वयं करें।मुझे भी सही लगा था कि बच्चों को आरंभ से जिम्मेदार बनाना आवश्यक है। सेतु और उनके बच्चे शाम को बाहर साथ खेलते थे। मैं तब भी उन पर ध्यान देती थीं। वह कहती थी मै आपके कारण निश्चित रहती हुँ।

यह शहर अलग था,
इसकी नज़ाकत, नफासत अनोखी थी।
इसकी संस्कृति अपनत्व से भरी थी।
एक नई तहज़ीब भरी जीवन सीख थी।

क्रमशः