हम एक ही वर्ष लखनऊ रहे थे। समय बहुत अच्छा बीता था। पर वहाँ एक दुखद घटना घट गई थी।

हमारे घर के ठीक सामने प्रोफेसर साहब का मकान था। वह लखनऊ विश्वविद्यालय में इंग्लिश के प्रोफेसर थे। परंतु ग्रामीण परिवेश के कारण उनकी पत्नी कम पढ़ी-लिखी थी। प्रोफेसर साहब में अपने ज्ञान का बहुत दंभ था । अपनी पत्नी को वह सम्मान की दृष्टि से नहीं देखते थे। पैसे की कोई कमी नहीं थी, फिर भी उनकी पत्नी इधर-उधर पैसे मांगती नज़र आती थी। अपने पति से क्षुब्ध होने के कारण उनका व्यवहार बहुत अजीब व अटपटा दिखता था। फिर भी वह अक्सर मेरे पास आती थी और अधिकांशतःअपने पति व बङे बेटे के विषय में बात करती थी।

उनके दो बेटे और एक बेटी थे।बङा बेटा 16 साल का था, दसवीं में पढ़ता था, बेटी 10 वर्ष की थी, छोटा बेटा सिर्फ 3वर्ष का था।
श्रीमती प्रोफेसर का कहना था कि प्रोफेसर साहब को जितना अपनी बेटी व छोटे बेटे से प्यार हैं,उनसे आधा भी वह अपने बङे बेटे से प्रेम नहीं रखते हैं ।

वहाँ सभी पङोसनों का यही विचार था कि श्रीमती प्रोफेसर के कारण उनका घर बर्बाद हो रहा था।मुझे उनसे दूर रहने की सलाह दी गई थी । अतः मैं सिर्फ उनकी श्रोता थी। प्रोफेसर ज्ञानी पुरूष थे(अथार्त दुनियावी ज्ञानी)। पूरे मोहल्ले में उनका बहुत मान था, यह जानते हुए भी कि प्रोफेसर साहब अपने बङे बेटे के साथ बहुत सख्त है, लोगों को कमी श्रीमती प्रोफेसर में ही लगती थी।

श्रीमती प्रोफेसर की कहानी तो उन्होंने स्वयं सुना ही दी थी, परंतु जो कुछ भी उन्होंने बताया था और जो कुछ भी वहाँ घटा था, उसके बाद और आज भी जब विचार करती हुँ तो ऐसा मानती हुँ कि अपने बेटे की मृत्यु के लिए अगर कोई जिम्मेदार थे तो वह प्रोफेसर ही थे।

श्रीमती प्रोफेसर तो प्रोफेसर साहब के सख्त व्यवहार व अनुशासन से विद्रोही हो गई थी, पर बङे पुत्र के साथ जो भी बीतता था, उसका विरोध करते हुए भी रोक नहीं पाती थी, प्रोफेसर साहब के लिए उनकी पत्नी अनपढ़ समान थी। बङे पुत्र को बचपन से वह स्वयं पढ़ाते थे, छोटी से छोटी गलती पर भी कङी से कङी सजा देते थे।

उन्होंने बताया था कि बेटा 9-10 वर्ष की आयु में पिता की सख्ती से घबराकर घर से भाग गया था, पर किसी प्रकार ढूँढ लाया गया था।

प्रोफेसर साहब की सख्ती में विशेष फर्क नहीं पङा था। बाद में छोटे भाई-बहन का अधिक लाड होता देख वह और भी क्षुब्ध हो गया था।पिता को अपने बङे बेटे से इतनी उम्मीदें थी कि उसके प्रति उनका प्रेम कहीं दलदल में फंस गया था और साथ ही बेटा भी उसमें धंसता जा रहा था।

पिता की सख्ती ने लङके को बहुत सहमा दिया था, ऊपर से सहमापन उसे अंदर से विद्रोही बना रहा था। पर काश यह विद्रोह सही राह पकङ पाता।

उसने माँ से कह दिया था कि पिता की सख्ती ऐसी ही रही तो वह चिन्ता न करें,वह घर से भागेगा नहीं , चूंकि वह जानता है, पिता उसे ढूंढ लाएंगे ।

माँ को बिना बताए आने वाला संकट शंकालु कर देता है।
माँ का मन आशंकित तो हुआ था । शायद इसीलिए वह सबको अपनी कहानी सुनाती थी, पर कौन समझता है? कौन किसके पचङे में पांव फंसाता है। एक औरत का यूं दर-दर पति की आलोचना करना अच्छा गुण नहीं माना जाता है।

वह पढ़ाई में मन नहीं लगा पा रहा था, प्रोफेसर साहब की जिद कि उन जैसे ज्ञानी का पुत्र पढ़ाई में पीछे कैसे रह सकता है? नतीज़न अर्धवार्षिक परीक्षा में फेल होने पर उसने अपने को घर में ही खत्म कर लिया था। माँ ही नहीं पिता भी हाथ मलते रह गए थे।

इस घटना ने सभी को हिला दिया था, पर लोग नहीं बदले थे, दो महीने बाद होली पर, श्रीमती प्रोफेसर ने बेटी को होली खेलने भेज दिया था, शाम को भी वह बच्ची जब अपने नए वस्त्र पहन, सहेलियों के साथ घूमने निकली तो आस-पङोस उस माँ पर प्रश्न उठा रहा था, कैसे वह बङे बेटे के गम को अनदेखा कर, अपने छोटे बच्चों का मन पूरा कर सकती हैं।
लोगों के उलाहने व दुनियावी परंपराएं कहाँ किसी का दर्द समझ पाते हैं ?

जो ऐसे ही चले जाते हैं

वो सब जो चले जाते हैं,
कितना दर्द छोङ जाते हैं ,
वो सब जो ऐसे ही चले जाते हैं
छटपटाती आत्माएँ , बिलखते दर्द ,
क्या वो देख पाते हैं ?
नासूर बनते हैं , जख्म उनके,
जिन्हें वो पीछे छोङ जाते हैं ।