चलो अभिष्ट मार्ग में सहर्ष खेलते हुए,
विपत्ति विप्र जो पङे उन्हें ढकेलते हुए।
घटे न हेल मेल हाँ, बढ़े न भिन्नता कभी,
अतर्क एक पंथ के सतर्क पंथ हो सभी।
तभी समर्थ भाव है कि तारता हुआ तरे,
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।
(मैथिलीशरण गुप्त)

यह नया मकान श्री पम्बु का था। उनके दो बेटियां थी। बङी बेटी रमा का विवाह जयपुर में हुआ था। छोटी बेटी उमा एम.ए. इकनॉमिक्स पढ़ रही थी। पम्बू साहब भी आर्म्स फैक्टरी में काम करते थे। यह परिवार एक आदर्श परिवार था। परिवार के सभी सदस्य अपने फर्ज धर्म समझकर निभाते थे। हमारी परिस्थिति व समस्या को समझ कर, उन्होंने हमें अपना मकान किराए पर दिया था। अतः मेरे उस कठिन समय में उन्होंने मेरा ध्यान अपना धर्म समझ कर रखा था। आज सोचती हुँ तो लगता है कि उनका कर्ज मैं उतार ही नहीं सकती थी। ईश्वर ने ही देवस्वरूप लोगों के करीब मुझे रखा था।

श्री पम्बू बुद्धिमान व मेहनती व्यक्ति थे। जितने मेहनती पम्बू साहब थे उतनी ही मेहनती उनकी पत्नी थी । वह एक धर्मनिष्ठ कर्तव्यपरायण गृहणी थीं।

परिवार के सभी सदस्य -एक-दूसरे के सुख दुख व पसंद-नापसंद का ध्यान रखते थे। रात को घर आते ही पम्बू साहब अपनी पत्नी व पुत्री से पूछते कि आज उन दोनों के पसंदीदा
सीरियल में क्या हुआ। वह स्वयं सीरियल नही देखते थे। सिर्फ यही नहीं रात को सभी मिलकर उनकी पसंद के ज्ञानवर्धक या अन्य कार्यक्रम देखते थे।

उनका भी एक दरवाजा पीछे आंगन में खुलता था, जहाँ से वह मोटर चलाने आती थी। माँ- बेटी अक्सर मेरे पास आकर गप्प लगाती थीं ।वे दोनों उनके यहाँ जितने किराएदार रह कर गए थे, उनकी पूर्ण दास्तान सुनाती थीं । कुछ तो मुझे अब भी याद है।वे भी चाहती तो मेरी तरह एक किताब लिख सकती थी। या शायद उनकी दास्तानों ने मुझे अपनी इन यादों की पोटली खोलने को प्रेरित किया हो।

परंतु मिसेज पम्बू को संभवतः अपने से या समाज से नाराजगी थी। उनके दो बेटियाँ थी और उनकी बेटी के भी बेटी थी।अतः वह लङकों से चिढ़ रखती थी। पर साथ ही उन्हें चिन्ता थी कि उनकी बेटी रमा के दूसरी संतान बेटी न हो जाए।

वह एक बहुत ही संकीर्ण बात बार-बार कहती थी, सुनकर दुःख होता था, जवाब इसीलिए नहीं देती थी कि जानती थी, इनकी बङी बेटी रमा व उसके पति समझदार हैं ।मुझे उनकी सोच पर दया आती थी।
वह कहतीं, “जब भ्रुण जांच की वैज्ञानिक पद्धति है, तो क्यों दो बेटियों को जन्म दिया जाए। पहली बेटी तो ठीक है, परंतु दूसरी संतान के समय मैं रमा की जांच करा दूंगी।(तब भ्रुण जांच पर कानून नहीं बना था और लोग इसी तरह मनमानी कर रहे थे।) लङका होगा तो ठीक और जांच में लङकी पता लगी तो उसे दुनिया में क्यों लाया जाए।”
वह एक दयावान, नेक स्त्री थी, पर औरतों पर सामाजिक बंदिशों व तकलीफों ने उनके विचारों को कलुषित कर दिया था।

मीशु ने जब घुटने के बल चलना शुरू किया, तब मौका मिलते ही वह उनकी तरफ निकल जाता और उनके सामान से छेड़छाड़ करता था। वह मीशु को पसंद नहीं करती थी, एक तो लङका दूसरे वह उन्हें एक नंबर का शैतान व बदमाश दिखता था।
जब उनकी नातिन आती जो मीशु से कुछ महीने बड़ी थी, तब मिसेज पम्बू का व्यवहार बहुत अजीब हो जाता था।

मीशु थोड़ा बङा हुआ तो वह और उनकी नातिन साथ खेलते थे। दोनो ही अपने-अपने खिलौनों से मिलकर खेलते थे। परंतु पम्बू आंटी को चिन्ता रहती कि मीशु कहीं उसका खिलौना अपने पास न रख ले। तब मीशु सिर्फ 11/2साल का था।

एक दिन उनकी नातिन का कोई खिलौना नहीं मिल रहा था, तब पम्बू आंटी का व्यवहार बहुत भिन्न था। मैं आंटीजी की बहुत इज्जत करती थी और उनके व्यवहार का उतावलापन समझ में आ रहा था। कई बार दादी-नानी, दादा-नाना अपने पोते- नातिन के प्यार में इतना डूब जाते है कि भूल जाते हैं कि वह दूसरों का अपमान कर रहे हैं । मीशु तो छोटा था पर…..।

खिलौना तो उन्हें अपने घर मिल गया था। पर अब हमारे बीच एक कङवी दीवार बनने लगी थी। अब इस मकान को बदलने का समय आ गया था।
यह मकान मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण था, मीशु का जन्म यहाँ हुआ था और पम्बू परिवार से बहुत कुछ सीखने को मिला था। आस-पड़ोस में भी हमारा अच्छा मेलजोल हो गया था।

जब इस मकान में शिफ्ट हुए तब सेतु का आर्मी पब्लिक स्कूल में एडमिशन हो गया था। मीशु के जन्म के कुछ समय बाद मिन्टू भी पास ही एक स्कूल में जाने लगा था।
हमारे घर के ठीक सामने बत्राजी का मकान था, बत्रा जी का पोता सुमित भी आर्मी स्कूल में सेतु के साथ पढ़ता था।

मीशु के जन्म के समय कानपुर से बङी दीदी व डौली आए थे। डौली ने सब काम संभाला था। डौली की दोस्ती उमा से हुई थी। आसपास में सभी उसे जान गए थे। डौली और एस. के. के मिलनसार स्वभाव के कारण आसपास में सभी मुझे भी जान गए थे।

सुमित की मम्मी से मेरी अच्छी दोस्ती हो गई थी। सुमित और सेतु व मिंटू और उनकी बेटी सोनल साथ में खेलते थे। सोनल मिन्टू से एक साल बङी थी।
मिसेज पम्बू व अन्य मिन्टू और सोनल की दोस्ती का मज़ाक भी बनाते थे।माना कि मज़ाक ही होता था, पर यही हमारी सामाजिक सोच को दर्शाता है। एक लङका व एक लङकी की दोस्ती पर निगाह उठाना समाज का बहुत गहरा व गंभीर स्वभाव है। इस तरह हम अनजाने ही बच्चों के मन में ऐसी दोस्ती व लङके व लङकी के आपसी रिश्ते पर कई प्रश्न छोङ देते हैं।

सुमित के पापा से एस. के. की अच्छी मित्रता हो गई थी। इस तरह हम दोनों परिवार का बहुत घनिष्ठ संबंध बन गया था।

बत्राजी के पङोस में सरदारजी रहते थे, उनके चार बेटियाँ थी, सुना था कि बेटियों की शादी की चिन्ता में सरदारनी बिमार रहती थी। हमारे समाज में विवाह ही जीवन का उद्देश्य मान लिया गया है।वाहे गुरु की कृपा से हमारे सामने ही तीनों बङी बेटियों का विवाह हो गया था। सबसे छोटी सेतू से बङी थी व आस-पड़ोस के सभी बच्चों की नेता थी, सेतु को यहाँ भी बहुत अच्छा लगता था।

सरदारजी के किराएदार श्रीवास्तवजी थे। उनके बेटे का नाम ‘बाघा’ था। मैंने मिसेज श्रीवास्तवा से पूछा था कि उन्होंने अपने बेटे का नाम ‘बाघा’ क्यों रखा? उन्होंने बताया ” मैं उसे प्यार से बाघा पुकारती हुँ, पर उसका नाम आकाश है। बंगाल के क्रांतिकारी जतिन्द्रनाथ मुखर्जी को लोग ‘बाघा जतिन’ कहते थे। बिहार में भी ‘बाघ बहादुर’ की एक सच्ची कहानी प्रसिद्ध है।”
बाद में मैंने ‘बाघ बहादुर’ नाम की एक पिक्चर देखी थी।

बत्रा जी के चार बेटे थे, सुमित की माँ दूसरे नंबर की बहु थी। बङे दो बेटे यहाँ रहते थे, दोनों छोटे आगरा से बाहर थे। बाद में सबसे छोटा बेटा भी आ गया था।सुमित की मम्मी की किचन अलग थी। बङी बहु व छोटी बहु सास के साथ ही थी।ससुर की मृत्यु के बाद छोटी बहु की भी किचन अलग कर दी थी।

घर की सबसे बङी बहु टीचर थी। सुंदर व समझदार थी, ऐसा सब वहाँ कहते थे। परंतु मुझे सुमित की मम्मी ही अधिक समझदार दिखती थी, जो यह देखते, समझते हुए कि सास बहुओं में भेदभाव करती हैं, यहाँ तक कि बच्चों में भेदभाव करती है, चुप रहती थी।
सास के कोई बेटी नहीं थी, इसलिए बङी बहु को तो बेटी ही माना व वैसे ही लाड किया था।बङी बहु को तो पानी का गिलास भी भरकर देती थी।

पर दूसरी बहु को बहु ही माना था और बहु पर पूर्ण सख्ती की थी।यह बहु नौकरी नहीं करती थी तो घर का सारा काम भी बहु से कराया जाता था।
फिर ससुरजी ने समझदारी से दूसरे बेटे को उसी घर में अलग कर दिया था। अब दूसरी बहु सास की सभी सहेलियों के लिए एक तेज बहु थी। मिसेज पम्बू को मेरी व सुमित की मम्मी की दोस्ती पसंद नहीं थी। हमारे बीच मनमुटाव का यह भी एक कारण था।

मकान मालिक का यह भी एक रवैया होता है। वह नहीं चाहते कि उनके किराएदार आस-पड़ोस में अधिक व्यवहार करें। या फिर उतना या उनसे व्यवहार करें जिन्हें वे पसंद करते हैं ।
मेरा स्वभाव तो अभी भी रिजर्व था, फिर तीन बच्चें, इतना काम…. बाहर निकलने का समय नही था, पर सुमित की मम्मी को मैं पसंद आ गई थी। वह सभी कार्यों में बहुत चुस्त थी। अतः सभी काम शीघ्र निबटा कर मेरे पास आ जाती थीं ।मैं काम करती रहती थीं और वह अपनी बातों से मेरा मन बहलाती थी। जब मिंटू और बुलबुल के स्कूल से आने का समय होता तब वह घर जाती थी, बच्चों की पढ़ाई वह स्वयं देखती थी।

हमारे घर की दाएं दीवार के साथ एक बनिया परिवार का मकान था, सभी बेटे बहु साथ रहते थे।बिजनेस भी साझे में था। बनिया परिवार में एक विशेषता होती है, पूरे परिवार का या कहीं एक खानदान का बिजनेस साझे में होता है, तथा यह संयुक्त परिवार में ही रहना पसंद करते हैं ।इन्हें न एकल व्यापार पसंद होता है, न ही एकल रहना अच्छा
लगता है।

घर के मर्दो को घर की किचन राजनीति से कोई मतलब नहीं होता है। यह स्पष्ट होता है कि लङकर रहो या शांति से, पर रहना सबको संयुक्त ही है। यह घर भी ऐसा ही था, घर की सर्वेसर्वा सास ही थी। सास या माँ को घर के फैसले लेने का अधिकार होता है उसमें पुरूषों का कोई दखल नहीं होता है।

घर के दूसरी तरफ झांई जी का मकान था। झांईजी का स्वभाव बहुत अच्छा था, उन्होंने अपने सनकी पति के सख्त व्यवहार को बहुत बर्दाश्त किया था।
उनके तीन बेटे थे, बङा बेटा चंडीगढ़ में व दूसरा बेटा धनबाद रहता था। सबसे छोटे बेटे की शादी नहीं हुई थी, पिता की मृत्यु के बाद घर के एक भाग में उसने दैनिक जरूरतों की एक दुकान खोल ली थी।

झांईजी के पति का स्वर्गवास हमारे उस मकान में शिफ्ट होने के बाद हुआ था। पति की मृत्यु के कुछ समय बाद उन्होंने आस- पङोस में जाना शुरू किया था। काका(छोटा बेटा) की दुकान खुलने के बाद वह दुकान पर भी बैठती थी।

मिंटू को बहुत प्यार करती थी। अक्सर मेरे पास आती थी, उन्हें मेरे हाथ की चाय बहुत पसंद थी। मुझे अपने पति की बातें बहुत गर्व से सुनाती थी, कभी उनकी बुराई नहीं करती थी।
मिसेज पम्बू से मुझे उनके जीवन का दुख पता चला था।
पति के जीवित रहते वह अपने मायके से संबध नहीं रख सकी थी।पति के स्वर्गवासी होने पर ही भाईयों ने आना शुरू किया था व वह भी कई वर्षों के बाद अपने मायके गई थी।अब मायके में माता-पिता नहीं रहे थे।

मुझे लगा कि पति की मृत्यु ने उनकी अनकही इच्छाओं को पुरा कर दिया था। काका का विवाह हुआ और तीसरी बहु का सुख पाया था। चंडीगढ़ गई , फिर धनबाद भी गई, अपने दोनों बेटों के सुख को देख आत्मा संतुष्ट हुई। पर धनबाद से लौटी तो बिमार थी, लीवर के केंसर ने उनकी जीवन लीला को समाप्त किया था। ऐसा लगा मानों ईश्वर ने उन्हें दो वर्ष खुली हवा में सांस लेने व आज़ादी को महसूस करने के लिए दी थी।

आर्मी पब्लिक स्कूल का अनुभव अच्छा नहीं रहा था। मिन्टू और सेतु का विभवनगर के एक स्कूल में दाखिला करा दिया था। और हम विभव नगर शिफ्ट हो गए थे।

नारी तु तो शक्ति है,
क्यों तु अपना अस्तित्व मिटाने चली है?
नारी तु तो दुर्गा है, नारी तु तो योद्धा है,
क्यों पङी कमज़ोर तु अपने लिए?
चल अब अस्त्र उठा अपने लिए।
यह तेरा मान नहीं, यह तेरा स्वाभिमान नहीं ।
यह निरकुंशता खोखली है।
अपनी शक्ति को पहचान।
क्यों तु अपने अस्तित्व पर संदेह करती है।
नारी तु तो शक्ति है।