चाँद और कवि (रामधारी सिंह दिनकर)

‘रात यों कहने लगा मुझसे गगन का चाँद,
आदमी भी क्या अनोखा जीव होता है ,
उलझनें अपनी बनाकर आप ही फँसता,
और फिर बैचेन हो जगता, न सोता है।’

एस. के. का स्थानांतरण दिल्ली हो गया था, अतः हम आगरा से निकले। एस. के. को दिल्ली का वायुदूषित वातावरण व कोलाहल पसंद नहीं था। अतः हमने गुड़गांव को ही अपना रिहायशी स्थल चुना था। आज भी हम गुड़गांव में ही रह रहे हैं।

इन सात सालों में गुड़गांव और भी विकसित हो गया था। सेक्टर-7 के 250गज की एक कोठी में हमें दो कमरे किराए पर मिले थे। अब मैं मकान मालिक के साथ नहीं रहना चाहती थी। चूंकि मकान मालकिन श्रीमति बाली को परिवार सहित अमेरिका जाना था, अतः हमें तसल्ली थी कि कुछ दिन में हम इस मकान में अकेले रहेंगे।

श्रीमती बाली के चार बेटियाँ थी, सबसे बङी बेटी फिजियोथेरेपिस्ट थी, अब अमेरिका में ही काम कर रही थी।उसी ने सबको अपने पास बुलाया था।पहले श्री बाली वहाँ गए थे। वे सब टूरिस्ट वीज़ा पर वहाँ गए, फिर धीरे-धीरे सब वहीं बस गए थे। यहाँ भी माँ अपनी बेटियों के भविष्य के लिए अधिक चिंतित थी और बेटियाँ विदेशी जीवन के सपने देख रहीं थी।
इस मकान का महत्व मेरे लिए इसलिए आवश्यक है कि मैं अब दृढ़निश्चयी थी कि अब अपने जीवन को एक नया अर्थ व मोङ दूंगी।

गुड़गांव आने के कुछ समय बाद मैंने पहले एक प्री-नर्सरी स्कूल में काम किया, फिर एक मिडिल स्कूल में पढ़ाया था उसके बाद अपना एक प्री नर्सरी स्कूल खोलने का साहस किया था।

मैथिलीशरण गुप्त की कविता मन में घूमा करती थी।-

‘नर हो, न निराश करो मन को,

संभलो कि सुयोग न जाए चला,

कब व्यर्थ हुआ सदुपाय भला,

समझो जग को न निरा सपना,

पथ आप प्रशस्त करो अपना,

अखिलेश्वर है अवलम्बन को।’

नर हो, न निराश करो मन को।

मैंने देखा, इन महिलाओं द्वारा इन पंक्तियों को सार्थक करते हुए, जिन्होंने अपने परिश्रम से अपने काम को एक ऊँचाई तक पहुँचाया था। ये सब मेरी प्रेरणा स्रोत बनी थी।

मैंने जिस प्री-नर्सरी स्कूल में काम किया था, उसे दो क्रिश्चियन बहनें चला रही थी। छोटी बहन के मकान के एक कमरे में स्कूल चल रहा था। छोटी बहन किसी सरकारी स्कूल में अध्यापिका थी, अतः पढ़ाने का कार्य बङी बहन ही देखती थी।स्कूल शुरू किए अभी दो वर्ष ही हुए थे, दोनों बहनें बहुत मेहनत कर रहीं थीं । मैंने उन दोनों से शिक्षण पद्धति व स्कूल प्रशासन संबधी तथ्यों को बहुत गहराई से समझा था।

बाद में मैंने उस स्कल मेें अध्यापन कार्य किया, जिसमें मीशु पढ़ रहा था । यह स्कूल आठवीं कक्षा तक था । मिसेज कटारिया ही स्कूल की प्रधानाध्यापिका व प्रशासिका थीं ।
वह गुड़गांव गांव की रहने वाली थीं और गांव में उनका परिवार एक सम्मानित परिवार था। अतः स्कूल में बच्चे उसी गाँव से आते थे। मिसेज कटारिया बहुत मेहनत व लगन से काम कर रही थीं । उनकी कार्य पद्धति भी मेरे लिए प्रेरणादायी बनी थी।

मैने बाद में नौकरी छोङ अपना प्री- नर्सरी स्कूल खोला था। स्कूल मिसेज बाली के मकान में ही खोला था । अपने दो कमरों में से एक कमरा, मैंने अपने शिक्षण कार्य के लिए व्यवस्थित किया था।

स्कूल खोलने के लगभग एक वर्ष बाद मिसेज बाली आईं थी। उन्हें बहम हुआ था कि हम उनके मकान में स्कूल खोल कर उनके मकान में कब्जा करना चाहते हैं। अतः हमें वह मकान छोङने का नोटिस मिल गया था।

मिसेज बाली के मकान के साथ वाले मकान में डब्बू रहती थी।उसका वास्तविक नाम क्या था? किसी को पता नहीं था। चूंकि सब आसपास उसे डब्बू कहते थे। बच्चों की वह डब्बू दीदी थी । आयु में लगभग मेरे ही बराबर थी। वह अविवाहित थी। सरकारी स्कूल में नवीं-दसवीं कक्षा की साइंस व गणित की अध्यापिका थी। बाद में वह प्रिंसिपल बन गई थी। अब तो सुना है कि शिक्षा विभाग में डाइरेक्टर के पद पर आसीन है।

घर में भी बच्चो को कोचिंग देती थी।सुबह पाँच बजे से उसकी कोचिंग शुरू हो जाती थी और रात ग्यारह बजे तक चलती थी । बीच में स्कूल जाती थी, अपने शिक्षण कार्य को बहुत मेहनत व रूचि से अंजाम देती थी।

रहन-सहन, बोल-चाल सब में क्रेनबेदी अथार्त किरण बेदी (आई. पी. एस. आॅफिसर) लगती थी। एक आँख मेें मामूली सी कमी थी, जिसका बाद मेें ऑपरेशन करा लिया था।

पिता की मृत्यु के बाद डब्बु ने ही घर संभाला था।अपनी बङी बहन व छोटी बहन की शादी उसी ने करा दी थी। एक छोटा भाई था जिसका भविष्य डब्बू ने ही संवारा था। वह विवाह के बाद अलग हो गया था।कभी-कभी मिलने आता था।

एक बूढ़ी माँ और डब्बू ही इस मकान में रहते थे। मकान का पीछे का भाग किराए पर उठाया था। ऊपर छत पर कोचिंग के लिए कमरे बने थे।
माँ की इच्छा थी कि किसी प्रकार डब्बू का घर भी बस जाए। पर माँ की इच्छा पूर्ण नहीं हुई थी।

डब्बू का जीवन अध्यापन कार्य के लिए समर्पित था। वह किसी भी काम के लिए दूसरों पर निर्भर नहीं थी।कोचिंग में बहुत कम फीस लेती थी, सबके मन में उसके लिए बहुत आदर था।सेतु मिंटू भी उससे पढ़े थे।

जब तक हम उस मकान में रहे थे, मेरी उसकी माँ से बहुत बातें होती थी। डब्बू से बात करने के अवसर कम ही मिलते थे, पर उसके मन में घरेलु महिलाओं के लिए कोई सम्मान नहीं था।

एक बार जब मैंने डब्बू से कहा, “आप तो बहुत व्यस्त रहती हो।” तो उसने मेरी प्रशंसा को सही अर्थों में न लेकर, तपाक से जवाब दिया था, “तो क्या करूं ? आप लोगों की तरह इधर उधर की बुराईयाँ करूँ।” ( तब मैं घर पर ही रहती थी, अपना शिक्षण कार्य शुरू नहीं किया था।)

इस तरह के व्यक्तित्व की महिला से इससे अच्छे जवाब की उम्मीद करना बेवकूफी थी। ऐसी आचार- विचार की महिलाओं को समाज से इतनी टीका-टिप्पणी मिलती है कि वह सामान्य टिप्पणी से भी उद्धेलित हो जाती हैं।

मैं तो उससे प्रभावित ही थी कि किस प्रकार अकेले ही वह इस समाज का सामना करती है। अपने अध्यापन कार्य के लिए उसकी प्रतिबद्धता प्रशंसनीय है। बाद में बच्चों की पढ़ाई के लिए मैं उसके पास जाती थी, तब वह बहुत प्यार व इज्जत से बात करती थी।

राह में सहयात्री बहुत मिले,

उनसे मिली अब सीखों को,

एक नई दिशा हमने देनी है,

यहीं से तो आरंभ होनी है,

सीखने सिखाने की कोशिश।