कविता (बंधन-मैथिलीशरण गुप्त)

सखे,मेरे बंधन मत खोल,

आप बंधा हुँ, आप खुलूँ मैं,

तू न बीच में बोल।

जूझूंगा जीवन अनंत है,

साक्षी बन कर देख,

और खींचता जा तु मेरे,

जन्म- कर्म की रेख।

सिद्धि का है साधन ही मोल,

सखे मेरे बंधन मत खोल।

मिसेज बाली के मकान के सामने मीनु रहती थी। मीनु हंसमुख, खुशदिल लड़की थी। आठवीं कक्षा में पढ़ती थी।उसकी माँ ने कहा कि मैं उसे गणित पढ़ा दूं।मुझे ट्यूशन का कार्य आरंभ करना था, पर आठवीं कक्षा का गणित, हरियाणा बोर्ड की पढ़ाई, कुछ संकोच था, फिर सोचा पढ़ाने से पहले, स्वयं भी पढ़ लूंगी। उन्हें भी अपनी द्वविधा स्पष्ट कर दी थी।पर उन्होंने मुझ पर विश्वास प्रकट किया, कैसे? पता नहीं।

मीनु पढ़ाई में होशियार थी, अपना कक्षा कार्य पूर्ण करती थी। उसकी अध्यापिका कक्षा में पाठ जल्दी- जल्दी खत्म कर देती थी, जिस कारण छात्राओं को गणित के पाठ समझने में कठिनाई होती थी। उसने मेरे पास पढ़ने आना शुरू किया और मेरा ट्यूशन कार्य आरंभ हुआ था। हमने मिलकर गणित की समस्याओं को सुलझाना शुरू किया था।

मीनु की दो बङी बहनें व एक बङा भाई था। उसका बङा भाई उससे एक वर्ष बङा था । वह हमेशा अपने भाई की प्रशंसा करती थी। स्वभावतः लङकियाँ बातुनी होती हैं, मेरी छात्राएँ अपने मन का हाल मुझे नि:संकोच कह देती थीं । मीनु भी बहुत उत्साही लङकी थी, अपनी हर बात व महत्वकांक्षा व्यक्त करती थी।

उसकी माँ व बहनों का बहुत अच्छा स्वभाव था। पिता किसी सरकारी विभाग में कार्य करते थे। वेतन परिवार के खर्चों के अनुसार कम था और मीनु अपनी पारिवारिक आर्थिक स्थिति के प्रति संवेदनशील थी। फिर भी परिवार में खुशनुमा रौनक थी।

इस नई जगह में इस परिवार का मुझे बहुत सहारा था।जब हमने यह मकान छोङा था,तब भी अक्सर मीनु मेरे पास आती थी। कुछ वर्षों बाद मुझे पता चला कि मीनु के भाई की एक सङक दुर्घटना में मृत्यु हो गई थी। कुछ समय से मीनु से भी मुलाकात नहीं हुई थी। पर वह मुझे सपने में दिख रही थी, मुझे उसकी याद आ रही थी, सोचा वह इस समय बहुत दुखी है। मैं शोक प्रकट करने उनके घर गई थी।

घर पर नीरव सन्नाटा था, जबकि माता-पिता व दोनों बङी बहने थी, मुझ से बात भी कर रहे थे।उनका दु:ख गहन था। मैंने मीनु के लिए पुछा,” वह मुझ से मिलने क्यों नहीं आई?” वे हैरानी से बोले,” आपको कैसे नहीं पता, एक वर्ष पुर्व उसकी भी असामयिक मृत्यु हो चुकी है व उसके पंद्रह दिन बाद उसकी दादी का भी स्वर्गवास हो गया था।”
वह नीरव सन्नाटा दो जवान व एक उम्र दराज मौतों का था। दुःख गहन ही नहीं था उसमें जीवन के प्रति स्तब्धता भी थी।

उसके बाद मीनु सपने में नज़र नहीं आई। मैं समझ नहीं पाई कि मैं कहाँ व्यस्त थी कि उसका जाना जान नहीं पाई थी। मीनु आज भी मुझे बहुत याद आती है।

हमें श्री भसीन का दो कमरों का 100 गज में बना मकान मिल गया था।स्वतंत्र मकान था व भसीन साहब को उनके मकान में मेरा अपना काम करने से कोई परेशानी नहीं थी।

हम उन्हीं दो कमरों में से एक कमरे को स्कूल व ड्राइंगरूम की तरह उपयोग में लाते थे।आगे-पीछे खुले आंगन व बेङे थे। इस मकान के पीछे आंगन में भी गेट था, यह उस गली का कोने का मकान था।दो तरफ गेट से लाभ था, तो नुक्सान भी था। लाभ था कि स्कूल के बच्चे व मेहमान आगे के गेट से आते थे और हमारे बच्चे पीछे के गेट से आते थे।
पर मेरे बच्चे अक्सर स्कूल से आते हुए या वहाँ खेलते हुए पीछे का गेट बंद करना भूल जाते थे, जिस कारण बेटे की नई साईकिल चोरी हो गई थी।

पीछे के बेङे से ही सीढ़ियाँ छत पर जाती थी। छत पर सर्दियों में धूप का व गर्मियों में सांझ की ठंडक का आनंद मिलता था। बिजली न होने पर छत पर ही सो जाते थे।

इस मकान में लगभग 4 साल रहे थे और इन चार सालों में मेरा नन्हा विद्यालय बढ़ने लगा था। मैं बहुत व्यस्त रहती थी।यह हमारा यादगार मकान बना था।

भसीन साहब के इस मकान के साथ का मकान श्रीमती गांधी का था। श्रीमती गांधी गुजराती नहीं थी, महात्मा गांधी को ही हम जानते हैं तो सभी गांधी को हम गुजराती समझ लेते हैं । श्रीमती गांधी हरियाणवी सिंधी ही थी, चूंकि दिल्ली में ही पली बढ़ी थी तो भाषा हरियाणवी कम थी। यह बात इंगित करने की है कि हिंदूस्तान में अलग -अलग प्रांतों में व जातियों में कुछ उपनाम या कुलनाम एक समान पाए जाते हैं।

श्री मति गांधी जितनी खुशमिजाज थी उनके पति उतने ही खुश्क स्वभाव के व्यक्ति थे।कभी उनके चेहरे पर मुस्कान नहीं देखी थी।

पति-पत्नी दोनों सरकारी नौकरी करते थे। श्रीमती गांधी दिल्ली यूनिवर्सिटी की पढ़ी हुई थी और दिल्ली के ही किसी सरकारी विभाग में काम करती थी। उनके पति गुड़गांव में ही किसी सरकारी विभाग में थे।

मिसेज गांधी का यह नया मकान था, दो वर्ष पहले ही इस मकान में आए थे। इस मकान में आते ही उनके बचपन की पैर की चोट उभर आई थी। तकलीफ इतनी बढ़ी थी कि उनके दो ऑपरेशन भी हो गए थे। फिर भी नौकरी नहीं छोड़ी थी। कष्ट तो आते-जाते हैं, हिम्मत और हौसले छोङे नहीं जाते हैं ।

मैंने एक बार कहा,”आपके अपने मकान में आते ही तकलीफें शुरू हुई हैं।”
उन्होंने तुरंत मुझे रोक दिया और बोली, ” मेरी तकलीफों के लिए मेरे मकान को दोष न दें । अपने मकान में आना तो लाभप्रद रहा था, पहले किराए के मकान में रहते थे तो हज़ार दिक्कतें थीं ।यह कष्ट तो आना ही था, पर अपने मकान में आया तो सुविधाजनक रूप से इस कष्ट को संभाल पा रही हुँ।”

यह सकारात्मक सोच बहुत कम लोगो की होती है। वह हमेशा खुश रहती थी।
वह निःसंतान थीं । एक मकान छोङकर उनके देवर रहते थे। उनके बच्चों के साथ ही वह अपना मन लगाती थीं ।

अपने मकान को बच्चे की तरह संभालती थीं। ऑफिस से लौटते ही सबसे पहले झाङू उठाकर बाहर बेङे को साफ करती थीं । शनिवार को मशीन लगती, सुबह-सुबह उनके कपङे धुलने शुरू हो जाते थे। कामकाजी स्त्रियाँ कामवाली बाई नहीं लगाती हैं कि इन बाईयों के चक्कर में काम नहीं होते हैं ।

कुछ भुला हुआ जब आया याद, मन हुआ कितना उदास,
कुछ क्षण खुशी के थे,
संजो के रखे थे, मन में,
गुज़रे ज़माने की खुशी,
क्यों करती मन उदास,
यह जीवन एक नदी है,
यह तो बहती जाएगी,
अपने साथ सुख- दुख बहाती जाएगी,
तु भी निर्बाध गति से तैर,
मंजिल को है अभी देर।