कविता ( हरिवंशराय बच्चन)

” जीवन की आपाधापी में कब वक्त मिला,

कुछ देर, कहीं पर बैठ, कभी यह सोच सकूँ,

जो किया, कहा, माना, उसमें भला बुरा क्या?

मैं कितना ही भूलूँ भटकू या भरमाऊँ,

है एक कहीं मंजिल, जो मुझे बुलाती है,

कितने ही मेरे पांव पङे, ऊँचे-नीचे,

प्रतिपल वह मेरे पास चली ही आती है,

मुझ पर विधि का आभार बहुत-सी बातों का,

पर मैं कृतज्ञ उसका इस पर सबसे ज्यादा-

नभ ओले बरसाए, धरती शोले उगले,

अनवरत समय की चक्की चलती जाती है।”

मेरा काम अच्छा चल रहा था, अतः अब बङे स्थान की भी आवश्यकता थी।पार्क के ठीक सामने हमें एक बङा मकान मिल गया था।दो बङे कमरे( बैडरूम ) एक बङा हाॅल था।आगे-पीछे बङे आंगन थे।
उस हाॅल को हमने स्कूल बना दिया था।बाहर की तरफ के बैडरूम को छोटा ड्राइंग रूम या स्कूल का ऑफिस बना दिया था।
अब मैं छात्रों के माता-पिता से अलग ऑफिस में मिल सकती थी।हाॅल और ऑफिस के प्रवेश-द्वार अलग- अलग थे।

यह मकान भी सेक्टर-7 में ही था,अतः छात्रों को आने में कठिनाई नहीं थी। फिर हमने रिक्शा भी लगा दी थी। यहाँ भी छात्रों में वृद्धि हो रही थी। हम बच्चों को सामने पार्क में खिलाने ले जाते थे।यहाँ हमने फैंसी ड्रेस शो व खेल दिवस भी किया था।
हमारे मकान-मालिक श्री श्याम न्यू काॅलोनी में रहते थे, उन्हें हमारे द्वारा उस मकान में स्कूल चलाने से कोई एतराज नहीं था।

लेकिन फिर हुडा(हरियाणा ऑथॉरिटी) की ओर से यह नियम बनाया गया कि रिहायशी घरों से कोई व्यापारिक कार्य नहीं किया जा सकता है। घर के समीप ही एक अन्य प्री- नर्सरी स्कूल की संचालिका को भी हमारे स्कूल से परेशानी थी, जबकि उसका स्कूल कई सालों से अच्छा चल रहा था व हमारे स्कूल से उसके लाभ में कोई अंतर भी नहीं पङा था। पर उसके मन की शंका और भय ने उसे हमारे विरूद्ध कर दिया था। हमारे लिए भी एक सीख थी, कोई भी व्यापारिक काम करने पर प्रतिद्वंद्वी भी मिलते हैं।

उसने श्री श्याम को भङकाया व हुड्डा का नियम भी था। अतः श्री श्याम ने हमसे रातोंरात मकान खाली करा दिया था। हम लगभग 2साल उस मकान में रहे थे।

हमारे इस मकान के साथ दाएं मकान में सचदेवा परिवार रहता था और उनके साथ के मकान ( जो उस लाइन का कोने का मकान था) में वशिष्ठ परिवार रहता था। मैं वशिष्ठ परिवार की सदा आभारी हूँ ।

जब मैंने अपने प्री- स्कूल की नींव रखी थी। तब आरंभ में मकान पर, स्कूल के नाम का एक बोर्ड लगा दिया था। आस-पास सभी स्थानों में स्कूल के पर्चे बांट दिए थे। कुछ खिलौने और सामान लगा कर, बच्चों के लिए एक दरी बिछा दी थी।
अभी यह सब प्रबंध किए, 15 दिन हो गए थे, पर कोई एडमिशन तो दूर की बात, कोई पता करने भी नहीं आया था।मेरा स्कूल वीरान पङा था।

वशिष्ठ साहब की छोटी बहु घर पर ही एक प्री नर्सरी स्कूल चलाती थी।
लेकिन वह आंगनबाड़ी के प्रशासन विभाग में नौकरी भी करती थी।स्कूल के लिए उसने एक आया व एक अध्यापिका रखी थी।स्कूल ठीक चल रहा था, पर प्रबंधन में कठिनाई आ रही थी।अतः उनके मन में स्कूल बंद करने की इच्छा हो रही थी।सेशन का आरंभ था, उनके पास स्कूल में सिर्फ पांच छात्र थे।

उन्हें पता लगा कि हमने स्कूल खोला है, तब उनकी बहु ( नाम याद नहीं, शायद किरण) मुझसे मिलने आई थी। उसने अपने स्कूल का सब सामान व वे पाँच छात्र मुझे देने की पेशकश की थी।

स्कूल खोलने के विचार के साथ, मैंने स्कूल प्रशासन, प्रबंधन व शिक्षण शैली पर विचार किया था, उसकी ट्रेनिंग भी ली थी। परंतु व्यापारिक गुणों को अभी सीखना था।

किरण का आत्मविश्वासी व प्रभावशाली व्यक्तित्व देख, एक बार मैं असमंजस में थी, अपने आत्मविश्वास पर भी एक बार दृष्टिपात किया था।

यह व्यापारिक लेन- देन था, पर साथ ही यह भी तुरंत अहसास हुआ कि यह ईश्वरीय कृपा बरसी है।अतः मन में यह विचार बना लिया था कि यह मौका हाथ से नहीं जाने दूंगी।

अपने आत्मविश्वास पर विश्वास नहीं, अपने मन की सच्चाई पर विश्वास था।कहा जाता है कि ‘ईश्वर भी उनकी मदद अवश्य करता है, जो अपनी मदद स्वयं करते हैं ।’
सभी लेन- देन शांतिपूर्वक हुआ था और मेरे स्कूल में उन ईश्वरीय प्रदत पांच बच्चों ने अपने पवित्र कदम रख कर मेरे स्कूल को रौनक किया था।

अब छात्रों के लिए दरी के स्थान पर कुर्सियाँ थीं । खेलने के लिए झूले थे। उनके स्कूल की आया उषा ने मेरे साथ काम करना स्वीकार किया था ।आज हम उनके पङोसी थे, वे हमारे स्कूल की प्रगति देख बहुत खुश थे।

किरण की जिठानी दुबई में नौकरी करती थी, पर जेठजी की नौकरी यहीं किसी सरकारी विभाग में थी, वे यहीं रहते थे।पत्नी का तबादला जब दुबई हुआ तो उसकी उन्नति में बाधा नहीं बने थे।जेठजी साल में एक बार दुबई जाते थे व एक बार पत्नी आ जाती थी, उनके दो बेटियाँ थी, जो माँ के साथ रहती थी।बाद में पत्नी का स्थानांतरण भारत हो गया था।
किरण के दो बेटे थे, उस समय वे दोनो 7-8 वर्ष के थे। किरण अपने सास-ससुर के साथ बहुत खुश थी।

सचदेवा परिवार के मकान की दीवार और हमारी दीवार एक थी।वहीं खङे हो कर हम दोनों पङोसनें बातें करते थे।
इस मकान में दो भाईयों के परिवार रहते थे। बङे भाई के तीन बेटियाँ थी, वह नीचे के भाग में रहते थे।छोटा भाई मकान के ऊपरी भाग में रहता था। उसके एक बेटा, एक बेटी थे।
बहुत पहले मेरी जान-पहचान देवरानी रेखा सचदेवा से हुई थी, जब हम एक ही स्कूल में पढ़ाते थे। इस समय भी वह किसी स्कूल मेें संस्कृत की अध्यापिका थी।

रेखा के पति किसी हरियाणवी सरकारी विभाग मेें काम करते थे।रेखा शाम को ट्यूशन भी पढ़ाती थी। उसका ट्यूशन का काम भी अच्छा चलता था।ईश्वरीय कृपा से उसके जीवन में मेहनत थी तो उसका फल भी अच्छा था।

परंतु उनकी जिठानी की कहानी उसके विपरीत थी। इस मकान में रहते हुए, मेरी जिठानी श्रीमती सचदेवा से अच्छी घनिष्ठता हो गई थी।मैं अक्सर उनसे उनकी संघर्ष की कहानी सुनती थी।

पति-पत्नी मेहनती थे, पर कभी-कभी किस्मत देर से फल देती है। उनके पति ने कई काम किए थे, पर कभी सफल रहे, पर अधिकांशतः असफलता देखनी पङी थी। किसी न किसी कारण काम ठप्प हो जाते थे। कभी किसी से धोखा मिला या कभी बाजार में मंदी आ गई थी।

दोनों भाइयों में छोटा भाई पढ़ाई में होशियार था, अतः सरकारी नौकरी प्राप्त कर ली थी। बङा भाई इस श्रेत्र में भी सफल नहीं हुए थे।अतः परिवार को अक्सर तंगी के दिन देखने पङे थे।

श्रीमती सचदेवा पूर्णतः घरेलू महिला थी। शिक्षा भी सामान्य ली थी। ससुराल दिल्ली की थी,ससुर तो अभी भी दिल्ली के अपने मकान में रहते थे और गुड़गांव का यह मकान भी ससुर का था।

लेकिन जब हम उनके पङोसी बने थे, उनकी स्थिति बेहतर थी। श्री सचदेवा कोई प्राइवेट नौकरी कर रहे थे, श्रीमती सचदेव क्रेच चलाती थी, और क्रेच अच्छा चल रहा था। वह हिन्दी माध्यम के छोटी कक्षा के बच्चों को ट्यूशन पढ़ाती थीं।बङी बेटी ने नर्सिंग का कोर्स किया था, अब वह एक अस्पताल में नर्स का काम करती थी।

पर वह उन दिनों की बात बताती थी जब उनके बच्चे छोटे थे। वह इतनी घरेलू थी कि स्वयं कोई काम करने का विचार भी मन में नहीं आया था।फिर मध्यम वर्ग की महिला कोई भी काम करने से पहले दुनिया की सोचती है। ससुराल व मायके के रिश्तेदार संपन्न थे।

पर संसार में सबका जीवन भिन्न होता है, दूसरों की परवाह करके अपने जीवन का उद्धार नहीं कर सकते हैं।

इस बात की शिक्षा उन्हें अपनी एक पङोसन से मिली थी। जब तंगी के एक दिन, वह बहुत परेशान थी, अपनी छोटी बेटी के लिए घर में दूध भी नहीं था।उस समय उस पङोसन ने उनकी आर्थिक मदद तो करी ही थी, पर साथ ही स्वयं अपना कोई काम करने का सुझाव भी दिया था।
उसने उनके स्वाभिमान व आत्मविश्वास को जगाया था व हौसला दिया कि वह स्वयं भी कोई काम कर सकती हैं ।

उन्होंने मुझे बताया,” सबसे पहले मैंने अपने अंदर की झिझक को दूर किया था, व क्रेच खोला तथा सिलाई का काम भी शुरू किया। उसके बाद पति का काम चला या नहीं, मेरे बच्चों को खाने की कमी नहीं हुई है।”

यह उनकी मेहनत का फल था कि तीनों बेटियाँ पढ़ाई में होशियार थी। मंझली बेटी इंजीनियर बनी व एक अच्छी कंपनी मेें काम करती थी। सबसे छोटी बेटी सेतु के बराबर थी, उसने एम. सी. ए. किया था व साफ्टवेयर इंजीनियर बनी थी।

तीनों बेटियों के विवाह भी बिना दहेज़ व सादगी से हुए थे।तीनों बेटियों को अच्छे जीवन साथी मिले है।
अब बहुत समय से मुलाकात नहीं हुई है,पर कुछ वर्ष पहले अपनी नातिन के साथ मिलने आई थीं ।

ईश्वर ने सबकी किस्मत में अच्छा लिखा होता है, उसे पहचानना ही हमारी सिद्धि है।
श्रीमती सचदेवा ने बहुत कठिनाइयों के साथ अपनी बेटियों को उच्च शिक्षित किया था, कठिनाइयों के बावजूद उनकी शिक्षा में रूकावटें नहीं आने दी थी। जब आप लगन से कर्म करते हैं तो सहायता भी आती है।

भविष्य के गर्त में क्या छिपा होता है? हमें पता नहीं होता है। हम भविष्य के काल्पनिक भय को सच मानकर अपने वर्तमान कर्म को प्रभावहीन बना देते हैं ।

घरेलू महिलाएँ जो घरेलू आर्थिक कार्य करके, अपने परिवार को आर्थिक मजबूती देती हैं , उनका कोई सरकारी रिकॉर्ड नही मिलता है। दुख की बात यह है कि उनके आत्मसम्मान को भी सम्मान नहीं मिलता है, दया अवश्य मिल जाती है ।

दोनों भाईयों ने मिलकर उस मकान को बेच दिया था।श्री व श्रीमती सचदेवा ने उस पैसे से एक छोटा मकान खरीद लिया था, व कुछ पैसा बैंक में डिपोजिट करके अपना भविष्य सुनिश्चित कर लिया था।

जो बीत गया वो याद नहीं,

पर मीठा सुख वो देता है,

वो रंगबिरंगा अतीत था,

जो आज भी मन को,

रंगीन कर देता है।