तू, मत फिर मारा मारा(काव्य) (रविन्द्रनाथ टैगोर )

निविङ निशा के अंधकार में,

जलता है ध्रुव तारा,

अरे मूर्ख मन, दिशा भूलकर,

मत फिर मारा-मारा-

तू मत फिर मारा-मारा।

चिर आशा रख, जीवन-बल रख,

संसृति में अनुरक्ति अटल रख,

सुख हो, दुख हो, तू हँसमुख रह,

प्रभु का पकङ सहारा-

तू मत फिर मारा-मारा।

हमारे मकान के बाएं तरफ एक पङोसन से जान-पहचान हुई थी। कुछ लोग स्वयं ही पहल करके दोस्ती का हाथ बढ़ाते हैं व आपकी इच्छा को अनदेखा कर आपसे गहरी जान- पहचान बनाने की पुरज़ोर कोशिश करते हैं।

वह अपने पति की दूसरी पत्नी थी।नाम याद नहीं सुविधा के लिए सुशीला कर देती हुँ।सुशीलाजी के दो सौतेले बच्चे थे। एक बेटा व एक बेटी थे। जब वह विवाह करके इस घर आईं थी, तब वे दोनो बच्चे विवाह योग्य थे। पति चाहते तो गृहस्थी संभालने के लिए बेटे का विवाह कर सकते थे, चूंकि वह एकाकी जीवन नहीं काटना चाहते थे, अतः उन्होंने दूसरा विवाह किया था।सुशीलाजी का भी यह दूसरा विवाह था।

सौतेले बेटा व बेटी का विवाह भी शीघ्र कर दिया था। बेटा अपनी सौतेली माँ से कोई सरोकार नहीं रखता था, बहु सम्मान देती थी।

सुशीला जी अक्सर अपनी रामकहानी सुनाने मेरे पास आ जाती थी। सिर्फ इसी मकान में नही, इसके बाद के मकानों में भी खोजते हुए पहुंच जाती थीं।
सुशीलाजी की सौतेली बेटी मंद बुद्धि थी, यूं देखकर प्रतीत नहीं होता था।
कभी समझ नहीं आया कि विवाह ही हर समस्या का समाधान कैसे समझा जाता है। उनकी इस मंदबुद्धि लङकी के दो विवाह टूट गए थे।

बेटी भी अक्सर मेरे पास आती थी व अपनी ससुरालों की कहानियाँ सुनाती थी।
माँ-बेटी की बातों से यह निष्कर्ष निकला था कि मंदबुद्धि लङकी का विवाह पैसे के बल पर कर तो दिया जाता था पर वह स्थायी नहीं रह पाता था।

एक जवान लङकी की जिम्मेदारी पिता व भाई नहीं ले सकते थे। एक ही बात कही जाती है कि ऐसी लङकी का पूरा जीवन कैसे कटेगा?
अपनी जिम्मेदारी दूसरे के कंधों पर डालना ही एकमात्र उपाय समझा जाता है।पुत्री या बहन के प्रति जब इनका प्रेम इतना ही होता है, तो दूसरा गैर क्योंकर उनसे प्रेम कर सकता है।

सुशीलाजी की भी यही कहानी थी, पहले पति की मृत्यु के बाद वह मायके में भाई भाभी के लिए बोझ थी। वह निःसंतान थी, शिक्षित व तेज तर्रार थी। वह आर्थिक दृष्टि से किसी पर निर्भर नहीं थी। पर एकाकी जीवन कैसे कटेगा? अतः एक ही उपाय रहता है कि विवाह कर दिया जाए।

व्यक्ति अकेले खुश रहता है या किसी के साथ, वाकई खुश रहना भी मनःस्थिति ही है। इस दूसरे विवाह में भी सुशीलाजी खुश नहीं थी, पर जीवन कट रहा था।

भसीन साहब के मकान से निकले थे, इस सपने के साथ कि स्कूल आगे बढ़ेगा। पर श्री श्याम के इस मकान से स्कूल बंद करके निकले थे।
किस्मत और अक्ल कब धोखा दे जाए, पता नहीं लगता है।

मैंने अब एक प्रतिष्ठित स्कूल में नौकरी शुरू कर दी थी।

बारहवां मकान

स्कूल बंद हो गया था, पर मेरा अध्यापन कार्य चल रहा था, समय की गति के साथ हम चल रहे थे, मैं स्कूल जाती थी व ट्यूशन भी चल रहा था। अतः व्यस्तता में अंतर नहीं था, वस्तुतः कार्यप्रणाली में भिन्नता थी। अपनी इस स्कूल की नौकरी में बहुत कुछ नया सीखने को मिल रहा था। प्रतिभावान अध्यापिकाओं के साथ काम करते हुए बारीकी से उनके गुणों को आत्मसात करने का प्रयास भी हो रहा था। किसी के लिए काम करते हुए, अपना काम करने का सुख व स्वतंत्रता के अभाव को महसूस कर रही थी।

अब हम जिस मकान में आए थे, यह भी एक 100गज का मकान था। पर पिछला मकान चूँकि बङा था, दुबारा से छोटे मकान में थे तो यह मकान अधिक छोटा लग रहा था।
इस मकान का नक्शा भी भिन्न था। आगे आंगन फिर एक दरवाजे से किचन खुलती थी और दुसरा दरवाजा ड्राईंगरूम में खुलता था। ड्राइंगरूम से एक छोटी गैलरी अंदर जाती थी, जिसके एक तरफ बैडरूम था व दूसरी तरफ शौचालय व स्नानाघर थे। गैलरी से पीछे का दरवाजा पीछे आंगन में खुलता था।

इस मकान में कोई अलमारी नहीं थी, भसीन साहब के मकान में हमें एक स्टोर मिला था और पिछले श्याम जी के मकान में अलमारियाँ बहुत अच्छी बनी थी व एक छोटा स्टोर भी था। इस मकान में सामान रखने की समस्या थी।

यह मकान एक गली में, गली के अंत में था।गली के दूसरे छोर पर गुर्जरों का मैदान था।गली बंद नहीं थी, दोनों छोर से लोगों की आवाजाही थी।
इस गली में 10-12 मकान थे, सभी पङोसी बहुत अच्छे थे व आपसी मेल-जोल भी अच्छा था।
हमारे मकान के ठीक सामने श्रीमती मेहरा का मकान था। श्रीमती मेहरा अपने दो विवाहित बेटों के साथ रहती थीं । दोनों बहुएँ कामकाजी महिलाएँ थी। बङा बेटा परिवार सहित मकान के ऊपरी भाग में रहता था। उसके एक दस वर्षीय बेटी व एक आठ वर्षीय बेटा था।बच्चे स्कूल के बाद किसी क्रेच में चले जाते थे।शाम को आते थे, फिर ट्यूशन चले जाते थे। बङे बेटा-बहु रात को ही घर आते थे।
छोटे बेटा का विवाह को अभी एक वर्ष भी नहीं हुआ था, वह माँ के साथ नीचे के भाग में रहता था।
श्रीमती मेहरा के पति का देहांत कई वर्ष पहले हुआ था, उन्होंने बहुत मेहनत से अपने बच्चों को योग्य बनाया था।

उन्होंने जीवन में खाली बैठना नहीं सीखा था, अतः बेटों के मना करने पर भी घर से कोई न कोई काम करती थीं ।पङोस के मकान में कुछ लङके किराए पर रहते थे, उन लङकों के लिए वह टिफिन बनाती थीं, अक्सर अचार-पापङ भी बना कर पङोस में सबको देती थीं । स्वभाव बहुत अच्छा था। बहुत सुंदर, सौम्य चेहरा व मुख पर बहुत शांति थी। प्रतिवर्ष पति की पुण्यतिथि पर गरीबों के लिए लंगर करती थीं ।

हमारे मकान के बाएं तरफ के मकान में एक अन्य सचदेवा परिवार रहता था। उनके दो बेटे व एक बेटी थे। बेटी विवाहित थी, पास ही रहती थी। बङे बेटे का विवाह हमारे सामने हुआ था। बङा बेटा योग्य था, उसकी नौकरी अच्छी थी, बहु भी नौकरीपेशा थी। पर छोटा बेटा न कोई स्थायी नौकरी करता था, न किसी व्यापार में मन लगाता था।हर दिन व्यापार बदलता था।

बच्चों के सपने जो भी हो,पर वे यदि दुनियावी तरीके से अपने जीवन को नहीं ढालते हैं , तो माता-पिता परेशान होते हैं ।श्रीमती सचदेवा स्वयं किसी सरकारी स्कूल में पढ़ाती थी। श्री सचदेवा सरकारी विभाग में काम करते थे।

उन्होने अपने बेटे के विवाह से पूर्व अपने मकान का ऊपरी भाग किराए पर दिया था। उनकी किराएदार श्रीमती शर्मा थी, उनके दो छोटे -छोटे बच्चे थे।एक तीन वर्षीय बेटा व एक वर्षीय बेटी ।श्रीमती शर्मा सुंदर, सुशील व सर्वगुणसंपन्न थी।वह उत्तर प्रदेश के एक छोटे शहर से संबंधित थीं।

गुङगांव शहर छोटा होने पर भी आधुनिक है। कई विदेशी कंपनियों के यहाँ होने से लोगों के रहन-सहन व पहनावे में आधुनिकता झलकती है।यहाँ अधिकांशतः लङकियाँ नौकरीपेशा, आत्मनिर्भर हैं ।

श्रीमती शर्मा को आरंभ में इस शहर में तालमेल करने में कठिनाई का अनुभव होता था। वह उस मकान से जाने के बाद भी अक्सर मेरे पास आती थीं, वह नौकरी करना चाहती थीं, मै उन्हें प्रोत्साहित करती थी। तब उन्होंने एन.टी. टी का कोर्स किया था व एक अच्छे स्कूल में नौकरी करने लगी थीं । उनके आत्मविश्वास व पहनावे में अंतर दिखने लगा था।

हमारे मकान के सामने गली का दूसरा या तीसरा मकान श्री गांधी का था, वह गणित के अध्यापक थे, स्कूल में तो अध्यापिकी करते ही थे, घर पर भी सारे दिन कोचिंग करते थे।उनके दो छोटे बच्चे थे।

उनकी पत्नी मधुर स्वभाव की थी। अक्सर मुझसे बहुत बातें करती थीं, कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं कि आप उनसे बेझिझक मिल सकते हैं व सिर्फ़ उनसे मिलकर ही, उनके प्रसन्नचित चेहरे को देखकर , आपके मन की समस्त चिन्ताएं दूर हो जाती हैं।
ऐसी थी श्रीमती गांधी, हमेशा खुश रहती थीं, अपने पति पर गर्व व अपने बच्चों की शरारतें सबसे अनमोल थी।एक ऐसी औरत जिसका जीवन व दुनिया यहीं तक सिमटी थी।

क्यों मन करता है कि इन औरतों को जोर से हिला दूं, जगा दूं, उन्हें ले जाकर शीशे के सामने खड़ी कर दूँ और उनसे उनकी पहचान करा दूँ।

अन्य जितने भी परिवार वहाँ रहते थे,सब एक कुटुंब की तरह रहते थे। यहाँ पङोसियों से अच्छा मेल-जोल हो गया था।

हमने उस मकान को छोङा था चूँकि हमें मकान घुटा-घुटा लगता था। इस स्कूल की नौकरी में पहले मेरे सीधे हाथ का, फिर दोनों पैरों का फ्रेक्चर हुआ व फिर गले की तकलीफ के कारण उस स्कूल की नौकरी छोङ दी थी। अब सिर्फ ट्यूशन ही करती थी।

क्या हारा, क्या जीता,

उसका क्या हिसाब करूँ,

परिपाटियों को तोङने में,

ज़ोर तो लगाना होगा,

फिर कुछ अनचाहा टूटेगा भी,

चाहा कुछ छुटेगा भी।

हार-जीत के फेर में, न पङू,

यही अच्छा होगा।