अधिकार (महादेवी वर्मा )

वे मुस्काते फूल, नहीं

जिनको आता है मुर्झाना,

वे तारों के दीप, नहीं

जिनको भाता है बुझ जाना,

ऐसा तेरा लोक, वेदना

नहीं, नहीं जिसमें अवसाद,

जलना जाना नहीं, नहीं

जिसने जाना मिटने का स्वाद!

क्या अमरों का लोक मिलेगा

तेरी करूणा का उपहार ?

रहने दो हे देव! अरे

यह मेरा मिटने का अधिकार।

सरकारी क्वार्टर भी बङा मकान था।दो बैडरूम, एक ड्राईंग कम डाइनिंग रूम था, किचन भी बङी थी।
यह मकान पहली मंजिल पर था, सीढ़ियों से ऊपर जाते ही दो क्वार्टर थे। बाएं तरफ का क्वार्टर हमारा था।
मुख्य दरवाजे के साथ ही लंबी बाॅलकोनी थी। बाॅलकोनी से ही पहला दरवाजा ड्राइंगरूम में खुलता था और दूसरा दरवाजा बैडरूम में खुलता था, बाॅलकोनी में ही उसके आगे एक छोटा स्टोर था।
इस लंबी बाॅलकोनी में हम धूप व शाम की छांव का सुख लेते थे।
ड्राइंगरूम से ही जुङा डाइनिंग व उससे जुङी एक बङी किचन भी थी। किचन में स्लेब इत्यादि सब अच्छे बने थे।
डाइनिंग के एक तरफ से छोटे बैडरूम में जाते हुए, स्नानाघर व शौचालय थे। छोटे बैडरूम के साथ एक छोटी बाॅलकोनी भी थी। छोटे बैडरूम के साथ एक बङा बैडरूम था। जिसका एक दरवाजा गैलरी से भी था।

यह दो मंजिला मकान ही थे, अतः हमारी पहली मंजिल से सीढ़ियाँ छत पर जाती थी। छत भी बहुत बङी थी, उस पर पानी की टंकियां रखी थीं।

मुझे शाम का समय छत पर बिताना बहुत अच्छा लगता था। अभी तक गुङगांव के जितने मकानों में रहे थे, छत का सुख मिला था।
यह एक सरकारी काॅलोनी थी, अतः यहाँ सभी सरकारी बाबू, इंजीनियर, ऑफिसर इत्यादि रहते थे।

घर के साथ के क्वार्टर में स्थायी रूप से रहने कोई नहीं आया था, पर जिस वर्ष हम उस मकान से निकले थे, उस वर्ष एक परिवार रहने आया था, उनसे थोङा मेलजोल हुआ था।
हमारे ठीक नीचे क्वार्टर में एक इंजीनियर साहब रहते थे। पति-पति-पत्नी दोनों ही भारी बदन के थे। शादी के 12-15 वर्ष बाद संतान की प्राप्ति हुई थी।अब बेटा 10 वर्ष का था।

नीचे का मकान होने के कारण, उन्हें आगे-पीछे बहुत खुले आंगन मिले थे, आगे उन्होंने अच्छे पेङ-पौधे लगा रखे थे। वह कई वर्ष से इसी मकान में रह रहे थे, अतः मकान में अपनी सुविधानुसार कुछ परिवर्तन भी किए थे।

इंजीनियर साहब का अच्छा रूतबा था। पत्नी भी आधुनिक थी।
उनके दाएं तरफ भी एक अन्य इंजीनियर साहब का परिवार था।दोनों ही परिवार ग्रामीण परिवेश से संबंधित थे, व अपने-अपने गाँवों में भी इनके परिवार अच्छे रूतबेदार थे। जमींदारी तो कब की बीत गई, पर उसका प्रभाव अभी भी उनके व्यवहार और रहन-सहन में दिखता था।

परंतु जैसा कि हम जानते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति का व्यक्तित्व व व्यवहार अलग होता है। अतः हमारे नीचे के मकान के पङोसी के व्यवहार में शालीनता व सज्जनता मिलती थी।
अन्य इंजीनियर साहब पर अभी ग्रामीण रूतबा हावी था, उनका रहन-सहन भी पूर्णतः ग्रामीण ही था।उनके दो बेटे थे, उन्होंने अपने 10 वर्षीय बेटे को बोर्डिंग स्कूल भेजा था, चूंकि दोनों बेटे बहुत शरारती थे, उन्हें अलग-अलग रखना ही उचित लगा था।

यूं भी ग्रामीण लोग अपने बच्चों को हाॅस्टल या बोर्डिंग स्कूल में ही पढ़ाते हैं। चूंकि गांव में अच्छे स्कूल व काॅलेज का अभाव होता है।
परंतु वह बालक सिर्फ एक वर्ष ही बोर्डिंग में रहा था।दोनों भाई घर में आपस में बहुत लङते थे, पर आपसी प्रेम भी बहुत था। बङे भाई का मन हाॅस्टल में नहीं लगा था व छोटा भाई बङे भाई के बिना बैचेन था। माँ के लिए आठ वर्षीय छोटे बेटे को संभालना अब अधिक कठिन था, वह बङे बेटे के बिछोह में भी बहुत दुखी थी।अतः एक वर्ष बाद बेटे को वापिस बुला लिया था।

हमारे सामने के मकानों या क्वार्टरों का डिजाइन अलग था। उन्हीं में सामने का मकान श्री रस्तोगी का था। श्री रस्तोगी एस.के. के ऑफिस में ही काम करते थे। उनके परिवार से हमारा अच्छा मेल-जोल हुआ था।

कभी-कभी पति-पत्नी मानों एक ही स्वभाव के होते है अथवा दोनों एक-दूसरे के अनुसार ऐसे ढल जाते हैं कि भिन्नता दिखती नहीं है।
यह रस्तोगी दंपत्ति भी इसी श्रेणी में आते थे।दोनों खुशमिजाज व व्यवहारिक थे।उनके एक बेटा व एक विवाहित बेटी थी, उसके एक दो वर्षीय बेटा था।
श्री रस्तोगी का बेटा कम्प्यूटर ठीक करने का काम करता था।श्रीमती रस्तोगी सिलाई का काम करती थीं ।
श्री रस्तोगी, एस.के. से एक साल पहले रिटायर हो गए थे। उन्होंने गुङगांव में ही एक काॅलोनी में अपना मकान बना लिया था, रिटायरमेंट के बाद वे उसी मकान में शिफ्ट हुए थे।
श्री रस्तोगी खाली बैठना नहीं चाहते थे, अतः अपने सरकारी ऑफिस में ही पार्ट टाइम काम करना शुरू किया था।
पर दुःख हुआ था, उन्हें कैंसर हुआ था, दो-तीन वर्ष पहले उनका स्वर्गवास हो गया था।

यही एक आम आदमी का आम जीवन होता है।एक सामान्य पर महत्वपूर्ण जीवन संघर्ष, और जब संघर्ष पूर्ण हो ,तब जीवन लीला ईश्वर को समर्पित हो जाती है।

कई बार कुछ लोग ऐसे मिलते हैं, जैसे आपको वर्षों से जानते हो,श्रीमती रावत एक गढ़वाली महिला थी।
हमें इस क्वार्टर में शिफ्ट हुए दो दिन ही हुए थे, मैं दोपहर के समय अपनी बाॅलकोनी में खङी थी। किसी ने मुझे जोर से नमस्ते करी, मैंने देखा, एक लंबी-पतली महिला हाथ हिलाती हुई चली गई थी ।मैं उन्हें नहीं जानती थी, सोचा, उन्होंने किसी अन्य को अभिवादन किया होगा।

परंतु एक दिन वह श्रीमती रस्तोगी के साथ मुझसे मिलने घर पर आ गईं थी।वह मुझ से संबध बनाने की इच्छुक थी।
उन्होंने तुरंत मेरी कामवाली के काम करने के तरीके पर आलोचनात्मक टीका- टिप्पणी का अधिकार तो लिया ही था, पर साथ ही मेरी दिनचर्या पर भी तीखी हैरानी दर्शाती रही थी।

ये ग्रामीण परिवेश से संबंधित महिलाओं के लिए, कामवाली बाई रखना ऐयाशी का सूचक होता है तथा उन्हें यह समझना कठिन होता है कि कैसे कोई कामवाली का काम पसंद कर सकता है?

एक घरेलू महिला, जो नौकरी पर नहीं जाती है, वह अगर कामवाली रखती है(जिसको इसका अधिकार नहीं है ), तो अपना पूरा दिन खाली कैसे बिताती हैं? और जैसा कई बार यह भी देखा है कि कामकाजी महिलाएं भी कामवाली के नखरे उठाना पसंद नहीं करती है।

ये ग्रामीण महिलाएं सुबह-सवेरे अपने घर के काम करके, सिलाई-कढ़ाई अथवा बाहर के अन्य कार्य (बिल जमा करना, राशन इत्यादि काम) भी करती हैं ।और मैं तो यह सब भी नहीं करती हुँ।आस-पङोस में भी गपशप करने नहीं निकलती हुँ।

मुझे लगा कि वाकई जब दूसरे की निगाह से देखो तो पता लगता है कि ईश्वर हम पर कितना मेहरबान है। मैं उनकी बातें सुनकर मुस्करा रही थी।सोच रही थी कि ये दुनिया को सिर्फ अपनी परिपाटियों के दायरे में देखती रही हैं, यही देखना भी चाहती है।और हमें (उनके दायरे से जो बाहर है) एक कटघरे में खङा करने की साधिकार चेष्टा भी करना जानती है।

वह अक्सर मिलने आती थी, धीरे-धीरे मैं जान गई थी कि वह किसी गुरू के पास जाती थी और मुझे भी वहाँ ले जाना चाहती थी। परंतु मैं गुरु पर विश्वास नहीं करती हुँ। एक बार मेरे बाल झङने की समस्या के समाधान के लिए, लाल-हरी बोतले देकर गई थीं कि उसमें पानी भर कर पिया करूं। वे बोतले बियर या शराब की खाली बोतले थी । जिन्हें देखकर ही उबकाई आ रही थी। घर पर सब मुझे उनसे दूर रहने की सलाह दे रहे थे।

तीन वर्ष का समय हमने इस सरकारी मकान में बहुत अच्छा बिताया था।यह मकान मुझे बहुत अपना लगता था, जबकि जानती थी यह भी छूट जाएगा।

इन तीन वर्षों में मैंने अपनी शिक्षण यात्रा का भी एक अन्य पङाव बिताया था। ट्यूशन का काम तो यहाँ भी अच्छा चल रहा था। मैंने यहाँ पास ही एक मानसिक व शारीरिक अपंग बच्चों की सामाजिक संस्था में काम किया था। प्रशासनिक कार्य था, इन बच्चों के साथ बहुत समय नहीं बिताती थी पर एक संबध बन गया था।

मेरे लिए प्रशासनिक कार्य का नया अनुभव था, मैं कुछ नया सीख रही थी।मुझे खुशी हुई कि इस सामाजिक संस्था में अर्थपूर्ण काम हो रहा था। बच्चों की शारीरिक व मानसिक अवस्था को नज़र में रखते हुए ही कार्यप्रणाली का संचालन किया जा रहा था।

एक वर्ष इस संस्था में काम करने के बाद, मैने एक प्राइवेट स्कूल में पढ़ाना शुरू किया था।इस स्कूल में गरीब तबके या ग्रामीण मजदूरों के बच्चे पढ़ने आते थे। ऐसे किसान जिनके पास वर्ष के किसी-किसी मौसम में काम नहीं होता था, उस समय ये किसान शहर आकर मजदूरी करते हैं ।

शहर में रहते हूए बच्चों को अंग्रेजी शिक्षा में शिक्षित करने की प्रबल अभिलाषा मन में रखते हुए, इन छोटे स्कूलों में, जिसमें फीस कम होती थी, अपने बच्चों को पढ़ाते हैं ।

इन किसान मजदूरों का शहर आने का कारण भूख ही नहीं होता है।वे कहते हैं कि गाँवों में खाने को अनाज तो मिल जाता है, पर अन्य जरूरतों के लिए, जैसे-कपङा, दवाई, शिक्षा आदि के लिए नकद पैसा जमा करना जरूरी होता है, इनके पास गाँवों में अपने कच्चे-पक्के मकान भी होते हैं।

कुछ अपने मन की राह भी पकङ राहगीर,

ईश्वर ने जो दी डगर, उसे तुने अपनाया है।

उसे देख और मुस्करा, कुछ लाड दिखा!

अब मनचाही राह पर चलने का वक्त आया है।

रास्ते तो वे भी कठिन थे,

थामी उसने उंगली , तो बने सुगम थे।

डगर तो यह भी पथरीली होगी,

अभी तो खुलकर जीने का दिन आया है।

देख वह भी मुस्करा रहा है,

रास्ता तु चुन अपना, मंजिल वह बना रहा है।