कविता ( हरिवंशराय बच्चन)

‘पथ की पहचान’

पूर्व चलने के बटोही, बाट की पहचान कर ले,

पुस्तकों में है नहीं छापी गई इसकी कहानी,

हाल इसका ज्ञात होता है न औरों की ज़बानी,

अनगिनत राही गए इस राह से,उनका पता क्या,

पर गए कुछ लोग इस पर छोङ पैरों की निशानी,

यह निशानी मूक होकर भी बहुत कुछ बोलती है,

खोल इसका अर्थ, पंथी, पंथ का अनुमान कर ले।

पूर्व चलने के बटोही, बाट की पहचान कर ले।

हमारे मकान के सामने राखी अपनी चार वर्षीय बेटी मौली के साथ रहती थी।राखी उस गली की रौनक भी थी और शोर भी थी। सारे दिन उसकी आवाज़ गली में गूंजती थी। जितनी तेज माँ की आवाज़ थी, उतनी ही शैतान व नटखट मौली थी।राखी की आवाज़ से ही प्रतीत होता था कि उसका जीवन खुशियों से भरा है।

पर कभी-कभी उसकी आवाज़ दो- तीन दिन तक सुनाई नहीं देती थी । एक दिन मैंने स्वयं देखा कि उसका पति उसे मार रहा था, सिंह साहब के बेटे देवा ने भी देखा और उसने टोका व रोका भी था।

तब पता चला कि राखी दो- तीन दिन तक कैसे गायब हो जाती है।फिर दो तीन दिन बाद हँसती-बोलती दिखती थी। एक औरत अपने जीवन से इस तरह समझौता करती है कि उसे पता ही नहीं चलता कि सुख किसमें, दुःख किसमें ?

मैंने कई बार राखी से उसके मन के हाल जानने का प्रयास भी किया व सहायता करने का आश्वासन देने का अनुमान भी दिया था।

पर राखी ने कभी मन के हाल नहीं दिए थे।उसका मायका पंजाब में था, उसने म्यूजिक में बी.ए. किया था। मैंने उसे म्यूजिक क्लास लेने का सुझाव भी दिया था।

परंतु शायद पति को पसंद नहीं था, पर वह ट्यूशन पढ़ाने लगी थी। उसने नौकरी करने की कोशिश भी की थी, फिर वही कि पति की अनुमति के बिना वह कुछ नहीं कर सकती थी।एक औरत के लिए आर्थिक स्वावलंबन आवश्यक है, पर अपने लिए स्वतंत्र फैसले का स्वावलंबन भी आवश्यक है।

क्या आर्थिक स्वावलंबन के साथ अपने लिए आत्मविश्वास जग जाता है? नहीं, कुछ सीमा तक आत्मविश्वासी तो बनती है, पर घर की चहारदीवारी के लिए दिए गए संस्कार, एक अकेली औरत के लिए बने सामाजिक तंबू, उसे कोई भी गंभीर फैसला लेने से रोक देते है।
औरत घर के अंदर सुरक्षित या बाहर असुरक्षित ? विचार का विषय है?

हमारा समाज उस (तथाकथित अपने) घर में रहते हुए, अपनी दुष्कर स्थिति को सुधारने का सुझाव तो देता है, पर अलगाव की सहमति सहज ही नहीं मिलती है।

राखी से ही मुझे आस-पङोस की जानकारी मिलती थी, श्रीमती वाजपेयी के ससुर अपने आॅपरेशन के लिए आए हैं, उनके पङोसी के बेटे की शादी पहले गुर्जर की बेटी से हुई थी। बाद में दूसरी शादी अपनी ही जाति की लङकी से हुई है।

सबके समाचार देने वाली राखी अपनी कोई बात नहीं बताती थी।पर….

राखी के सास ससुर कई वर्ष पहले विदेश चले गए थे।राखी के पति उस समय बहुत छोटे थे।दादा-दादी के लाडले थे, अतः वह भारत में ही रह गए थे। दो बङी बहनों के साथ माता- पिता चले गए थे, कभी-कभी मिलने आते थे। दादा-दादी ने ही उसकी परवरिश की थी, वह लाड में बहुत जिद्दी व बिगङैल बने थे।राखी की एक ननद विवाह के बाद भारत में पंजाब में रहती थी।

जहाँ राखी को अपने विदेशी सास-ससुर पर गर्व था, वहीं वह कभी उनके साथ रहना नहीं चाहती थी, उसका पति भी भारत छोङना नहीं चाहता था।

पर इस बार सास-ससुर भारत आए तो वह राखी के साथ ही रहे थे। राखी की सास को केंसर था, स्थिति खराब थी, वह अपना अंत समय, भारत में ही बिताना चाहती थीं ।
राखी और उसके पति ने उनके रहने के प्रबंध किए थे। मुझे लगा था कि राखी और उसके पति उनकी सेवा कर रहे होंगे, विशेषकर राखी अवश्य मन से सेवा सत्कार करती होगी। लेकिन एक सप्ताह बाद वह अपनी बेटी के पास चले गए थे।

फिर बात समझ की ही होती है न! सही, गलत को समझना कठिन होता है। एक स्त्री अपने घर के पुरूषों को ही सही मानती रही है, और उसे यही ठीक लगता है। या अपनी सुविधा में उसे यह आसान लगता है। घर के पुरूषों को गलत कहना, मतलब विद्रोह करना और जितना सहन कर रहे हैं , उससे कहीं अधिक झेलना। इसलिए यही सही कि स्वयं सहन करों, दूसरों को भी यही सिखाओ, क्योंकि यही सबसे सरल है, अपने हालातों को अनदेखा करना ही सीखा है, परिवर्तन से डर लगता है ।और बहाना यह कि जो इनके जैसा जीवन नहीं जीते, वे इनके हालात नहीं समझ सकते हैं ।

ऐसा भी है कि न वह अपने प्रति संवेदनशील रहती है न दूसरों के प्रति संवेदनशील होती है।वह अपने जीवन के सुख दुख सिर्फ पति और अपने बच्चों के सुख-दुख में ही पाती है, उस दायरे में रहते हुए कोई रूकावट नहीं चाहती है, इतनी स्वार्थी हो जाती है कि उसे न अपने पर होते अन्याय महसूस होते है न दूसरों पर हो रहे अन्याय ।अपितु वह असंवेदनशील हो कर आततायी का सहयोग भी करती है।

इन स्त्रियों के लिए वे औरतें अजीब होती हैं जो अपने अधिकारों की लङाई लङती हैं।
राखी जिसने कभी अपनी तकलीफ़ को जग जाहिर नहीं किया था, उसने अपनी सास की बात बताई, राखी के शब्दों में,”मम्मी (सास) बहुत जिद्दी हो गई हैं, बहुत चिल्लाती है।कल तो पापाजी(ससुर) को बहुत गुस्सा आया और उन्होंने एक झापङ लगा दिया, मेरे पति ने भी पापा से कहा, एक ओर लगाओ पापा!, बहुत तंग करती है । तब वह चुप हुई।”
मेरे मुँह से तत्काल निकला,” क्या एक बिमार औरत को मारा? तुम्हें लगता है, मारना ठीक था?

मेरी बात सुन राखी घबरा गई थी, उसे यह तो समझ आया कि उसे घर की इतनी बङी बात मुझसे नहीं कहनी चाहिए थी, पर यह समझ नहीं आया कि यह दुर्व्यवहार गलत है। उसे अपनी सास का पक्षधर होना चाहिए था, पर वह तो आततायियों की पक्षधर बनी थी।
ऐसा क्यों ? एक औरत का सम्मान दूसरी औरत का सम्मान क्यों नहीं है? राखी उसी घर में रहेगी, उसकी बेटी बङी होगी, शायद उसके अनुभव कुछ बदलाव लाएं ।

इस गली में मेरी ट्यूशन के कारण, अधिक जान-पहचान हो गई थी। हमेशा की तरह,इस बार भी, मैं अपना काम छोड़, जीवनपथ पर आगे बढ़ गई, यह विश्वास अटूट है कि सीखना- सिखाना ही तो जीवन उद्देश्य है और यह निरंतर चलता रहेगा।

नए नन्हें मेहमान (सदस्य) का स्वागत सत्कार हम सब मिलकर करना चाहते थे।हमने सेक्टर 23 में एक तीन बैडरूम का तीन मंजील मकान किराए पर लिया था।सेतु द्वारका से और हम सब सेक्टर 7 हाऊसिंगबोर्ड से उस मकान में पहुंचे थे, हम सब फिर एक साथ रह रहे थे। एक साथ रहने की खुशी दूगनी हो गई थी, जब बनी का जन्म हुआ था। इस मकान में भी मैंने ट्यूशन करना ज़ारी रखा था और बनी का साथ भी था, उसकी नित नई गतिविधियां हमारे उल्लास को नया रंग देती थी।

सेक्टर 23 के मकान के बङे गेट से घूसते ही एक छोटा आंगन था।आंगन के एक तरफ मोटर लगी थी, व पानी का टेंक था।घर के दरवाजे में प्रवेश करते ही ड्राइंग रूम था और सीधे जाते ही डाइनिंग स्पेस था।ड्राइंग रूम के साथ ही सीढ़ियाँ ऊपर जाती थीं ।सीढ़ियों के नीचे का भाग स्टोर का काम देता था। एस. के. ने उसे ही पूजा स्थल बनाया था।

डाईनिंग के सामने एक लंबी रसोई थी। रसोई में सामान रखने के लिए, शेल्फ इत्यादि अच्छे बने थे। एक तरह से यह एक आधुनिक किचन था। डाइनिंग में एक खिङकी थी, एक खिङकी किचन में थी, जो पीछे आंगन में खुलती थीं ।पीछे आंगन में हमने वाशिंग मशीन रखी थी एक तरफ बाथरूम भी बना था, वह अधिकांशतः हमारे लिए स्टोर का काम करता था।

ऊपरी पहली मंजिल में पहुंचते ही एक खुली चौङी गैलरी थी, जिसमें अलमारियाँ बनी थी। गैलरी के दोनों तरफ एक-एक बैडरूम थे।दोनों बैडरूम में बाॅलकोनी भी थीं। कमरों में ही बाथरूम थे।दूसरी मंजिल में भी एक तरफ बङा बैडरूम था, चौङी गैलरी में सामने अलमारियाँ थी, साथ में एक तरफ बाथरूम था,फिर खुली चौङी छत थी।

यह मकान खुला बना था, सबको इस मकान का नक्शा बहुत पसंद आया था। बनी के जन्म के बाद सेक्टर 7 एक्सटेंशन में सेतु ने एक प्लॉट खरीद लिया था और उसका नक्शा इस मकान से मिलता-जुलता ही बनाया था।

ऐ मेरे बेकल मन! तु कुछ तो समझ,

जीवन के है इंद्रधनुषी रंग, उन्हें तु समझ,

मिलेंगे तुझे सब रंग, तु धीरज धर।

ऐ मेरे बेकल मन! तु कुछ तो समझ,

जीवन बहता, समय की धारा में, उसे तु समझ,

उस बहाव में बहता बहुत कुछ, तु अधीर न बन,

कभी तिनके, तो कभी मोती भी मिलेंगे, तु सब्र कर।

सभी रंगों, मोतियों और तिनको को भी,

तु झोली में भर, कोई न बेअसर।

ऐ मेरे बेकल मन! तु कुछ तो समझ।