माता-पिता को हम याद नहीं करते हैं , अपितु वे हर पल हमारे साथ होते हैं ।अपने जीवन के हर क्षण हम उनके साथ जीते हैं ।

पापा के जाने के लगभग 21वर्ष बाद माँ हमें छोङ कर गई थीं , अथार्त वह पापा की तुलना में अधिक समय तक हमारे साथ रहीं थी। पर सच तो यह था कि वह थीं तो जैसे पापा भी साथ थे।

अब तो माँ के स्वर्ग वास को भी 7 वर्ष हो गए हैं ।
आज अपनी डायरी के पन्नें पलटते हुए, उन कुछ पन्नों में फिर माँ जैसे अपने अहसासों के साथ मेरे सामने थीं।

सात वर्ष पूर्व, जब डॉक्टर ने घोषित किया कि माँ का अब अंत समय आ गया है। हम सब उनकी संतानें(पुत्र-पुत्री, पोते-पोती), उनकी देखभाल के बहाने उनके साथ अधिक से अधिक समय व्यतीत करने का प्रयास कर रहे थे।
वह भी अपनी इस स्वर्गिक यात्रा की तैयारी के अहसासों को जीने लगी थी।

मैं मुर्ख उनके इन अहसासों को समझने का प्रयास करने लगी, भला मैं कैसे उनके अहसासों को जी सकती थी? फिर भी मैं यह दुःसाहस कर रही थी। और अपने इस प्रयास को डायरी में उतार रही थी।
आज फिर जब डायरी के वे पन्ने खुले तो मन हुआ, माँ की याद को सबके साथ बांटू।

माँ ! मुझे माफ करना, आपके अहसासों और भावनाओं को समझने के अपने अनगढ़ प्रयास पर मैं शर्मिंदा हुँ।
क्योंकि कोई भी किसी के अहसासों को जी नहीं सकता है।
अपने सभी प्रियजनों से भी मैं अपने इस दुःसाहस के लिए माफी चाहती हूं।

ये शब्द मेरे हैं, मैं कह रही हुं , इस तरह जैसे वह अपने अंतिम क्षणों में हमें अपने अहसासों का भागी दार बना रहीं हो।
मैं एक बार फिर स्पष्ट कर रही हुं कि यह मेरी उनके अहसासों की मात्र कल्पना है।

‘स्वर्गिक यात्रा’

मैंने महसूस किया कि माँ अपनी इस स्वर्गिक यात्रा की तैयारी में पापा को अवश्य याद करती होंगी । उस समय बहुत छोटी आयु में एक लङकी का विवाह कर दिया जाता था, इस तरह लङकी ,अपना बचपन , जवानी… तमाम उम्र पति के साथ, अपनी ससुराल, अपनी गृहस्थी में ही गुजारती थी।मायका तो एक हल्की मीठी याद बन कर रह जाता था।

जब शायद माँ ने पापा (अपने पति) को याद किया होगा।-

प्रथम अहसास ‘

(‘अंतिम घड़ी’)

ज़िंदगी तुम से ही है,

यह समझाया तो गया ही था- पर यह भी तो कि जब ठीक से खुली आँख,
तुम ही थे सामने,

तुम से है ज़िन्दगी , याद था पाठ मुझे-

अब तुम ही जीवन धूरी,

तुम ही सुन्दर स्वप्न ,

तुम से ही बुझता कलुषित मन।

तुम और तुम्हारी निशानियाँ,

यही जीवन अर्थ ,

हमारा संघर्ष, हमारी जीत (‘मैं’ तो पता नहीं क्या है?)

और

फिर तुम चले गए – – – – –

एक लंबा सफर- – – – –

पर मैं कहां थी, तुम्हारे बिना? बीता जीवन था-
जो तुम संग और तुम्हारे कारण था।

कुछ दर्द टीसे मारते,

कहते हैं कि तुमसे मिले हैं ,

पर तुम तो याद आते हो,

अक्सर मरहम लगाते-

जो भी हो, अब नए सफ़र की तैयारी है-

क्यों लगता है?

खङे हो उस पार, बढ़ाए हाथ,

आखिर होता तो है,

जन्म-जन्म का साथ।

क्रमशः