स्वामी विवेकानंद एक योगी व दार्शनिक थे। स्वामी  विवेकानंद आधुनिक मानव के आदर्श प्रतिनिधि हैं ।
विशेषकर भारतीय युवकों के लिए स्वामी विवेकानंद  से बढ़कर दूसरा कोई नेता नहीं हो सकता है
जवाहरलाल  नेहरू के शब्दों में,” मेरे विचार में यदि वर्तमान पीढ़ी के लोग स्वामी विवेकानंद के भाषणों और लेखों को पढ़े तो उन्हें बहुत बड़ा  लाभ होगा और बहुत कुछ सीख पाएंगे।
स्वामी जी के विचार हमें सदा प्रभावित करते रहेंगे।”

यहां स्वामी  विवेकानंद जी के शिक्षा पर विचार प्रस्तुत है।
विवेकानंद जी के विचारों को अपने शब्दों में अपनी मेरी समझ के अनुसार  भी वर्णन करने का प्रयास किया  है  ।




Philosophy of Education 

शिक्षा का दर्शन 


शिक्षा मनुष्य में उपस्थित प्रवीणता का प्रकाशन है ।
अथार्त शिक्षा द्वारा मनुष्य अपने गुणों को प्रकट कर सकता है।

ज्ञानका प्रकाशन

विवेकानंद जी कहते हैं –

‘ज्ञान मनुष्य के अंतर में उपस्थित है।
कोई भी ज्ञान बाहर से नहीं आता, यह सब उसके अंतर में निहित है।
अथार्त मनुष्य ज्ञानवान है, उसे बाहरी संसार  से ज्ञान प्राप्त नहीं करना है, वह तो उसके अंदर स्वतः निहित है  ।’

विवेकानंद जी ने कहा कि ‘हम कहते हैं, एक व्यक्ति जानता है, मनोवैज्ञानिक नियत भाषा में कहा जाना चाहिए कि वह क्या खोजता या प्राप्त करता है।
एक व्यक्ति क्या सीखता है, वास्तव में वह अपनी आत्मा के आवरण को हटाकर क्या खोजता है, जो अपरिमित ज्ञान की खान है।’

इसे समझने के लिए विवेकानंद जी ने न्यूटन का उदाहरण दिया है।
उन्होंने कहा, ‘हम कहते हैं कि न्यूटन ने आकर्षण-शक्ति की खोज की थी। लेकिन क्या वह खोज किसी कोने में बैठी उसकी प्रतीक्षा कर रही थी?’
इस प्रश्न के जवाब में वह कहते हैं कि ‘यह खोज उसके अपने मस्तिष्क में थी, समय आया और उसने उसे प्राप्त किया।’

आगे वह इसे विस्तार से समझाते हुए कहते हैं कि ‘संसार के समस्त ज्ञान मस्तिष्क से ही प्राप्त किए गए हैं।
विश्व का अपरिमित पुस्तकालय तुम्हारे मस्तिष्क में है। 
बाह्य संसार केवल सुझाव व अवसर देता है, जिससे तुम अपने मस्तिष्क का अध्ययन करते हो ।

गिरते हुए सेब ने न्यूटन को एक सुझाव दिया था, जिससे उसने अपने मस्तिष्क का अध्ययन किया । उसने अपने मस्तिष्क में पूर्व उपस्थित समस्त विचारों की कङियो को पुनः व्यवस्थित किया और उनमें से एक नई कङी की खोज करी, जिसे हम कहते है- आकर्षण- शक्ति का नियम।
यह न तो सेब में और न ही पृथ्वी के केंद्र में  कहीं  उपस्थित था।’

मेरी समझ

अतः यह कहना होगा कि विवेकानंद  जी हमें इस बात का अहसास दिला रहे थे कि हम सभी व्यक्ति संसार में उपस्थित सभी ज्ञान से परिचित हैं, हमें  सिर्फ अपने अंर्तज्ञान पर ध्यान  देने की आवश्यकता  है, जिससे हम वे सभी ज्ञान स्वतः खोज सकते हैं,जो हमारे पास है।

समस्त ज्ञान अंतर में है


‘ समस्त ज्ञान धार्मिक या लौकिक भी मनुष्य के मस्तिष्क में है। बहुत सी स्थितियों में ज्ञान छिपा हुआ नहीं था, लेकिन अधिकांशतः ज्ञान लुप्त होता है और ज्ञान पर पङे पर्दे को जब धीरे-धीरे हटाया जाता है, तब हम कहते है, ‘ हम सीख रहे है’।
और इस पर्दे को हटाने  की क्रिया से आगे का ज्ञान निर्मित होता है ।’

‘वह व्यक्ति  जिसके ऊपर से पर्दा हटाया जा रहा है, वह उस व्यक्ति से अधिक  ज्ञानी है जो निरंतर अज्ञानता के गढ्ढे  में   पङा हुआ है । वह व्यक्ति जो समस्त ज्ञान प्राप्त  कर लेता है, सर्वज्ञाता त्रिकालदर्शी है।
जिस प्रकार एक चकमक पत्थर के टूकङे में आग होती है, उसी प्रकार मनुष्य के मस्तिष्क में ज्ञान का स्थायित्व होता है और सुझाव वो रगड़ है जो इसे मस्तिष्क से बाहर  निकालती है ।
समस्त ज्ञान और समस्त शक्ति अंतर में  है ।
हम कहते हैं ,शक्तियाँ, प्रकृति के रहस्य, और बल अंतर में है।
समस्त ज्ञान मनुष्य की आत्मा से निकलता है। मनुष्य  ज्ञान  का प्रकाशन करता है और इसे अपने अंतर में  खोजता है, जो अंतर में अंनतकाल से पूर्व  स्थित  है।’

मेरी समझ

विवेकानंद जी के इस विचार को इस तरह समझा जा सकता  है कि मनुष्य जब इस धरती में  जन्म लेता है, तब उसकी आत्मा   समस्त लौकिक व धार्मिक ज्ञान अपने साथ ले कर आती है।
ये ज्ञान  उसकी बुद्धि में उपस्थित होता है। परंतु  मनुष्य अनभिज्ञ होता है कि  ज्ञान का प्रचुर भंडार उसमें निहित   है।
यदि मनुष्य  अपने अंतर में खोजे और एकाग्रता से उसे व्यवस्थित करे तो उसका अपने अंतर में उपस्थित ज्ञान से परिचय होगा।
पर इसके लिए आवश्यक है कि मनुष्य अपने जीवन में सीखने और समझने की प्रक्रिया पर अपना ध्यान केंद्रित करे,  इससे न केवल वह स्वयं इस ज्ञान के दर्शन कर ज्ञानी बनता है अपितु  वह संसार में अपने ज्ञान से दूसरों  को भी लाभ पहुंचाता है । 


अपरिमित शक्ति हमारी आत्मा में है 

विवेकानंद जी हमें समझाते हैं कि 
‘कोई भी व्यक्ति दूसरे व्यक्ति से नहीं सीखता है। बाह्य अध्यापक केवल सुझाव देता है जो वस्तुओं के समझने के लिए, अंतर के अध्यापक को जागृत करता है। तब वस्तुएं हमारे अपने विचारों और ज्ञान के द्वारा स्पष्ट होती है और अपनी आत्मा में हम इन्हें महसूस करते हैं।’

विवेकानंद जी इसे उदाहरण से समझाते हुए कहते है कि-
एक संपूर्ण बरगद का बङा पेङ जो डेढ़ बीघा जमीन घेरता  है, वह एक छोटे से बीज में था, जो शायद सरसों के बीज का 1/8 हिस्से से बङा नहीं था।
हम जानते है कि एक विशाल ज्ञान, पुरस संबधी कोशिका में चक्कर काटता था।
यह असत्य सा लगता है, परंतु यह सच है।
हममें से प्रत्येक एक पुरस संबंधी कोशिका से बाहर आया है।और वहां  चक्कर  काटती समस्त शक्तियों को हम प्राप्त करते थे। 
तुम यह नहीं कह सकते कि वे अन्न से आए हैं इससे क्या शक्ति बाहर आती  है।
इसमें कोई संदेह नहीं कि वहाँ शक्ति थी लेकिन वह वहां निश्चल है।
इसीलिए  मनुष्य की आत्मा में अपरिमित शक्ति है, चाहे  वह जानता है या नहीं।
इसका प्रकाशन ही केवल एक प्रश्न है जिसकी चेतना उत्पन्न  की जाए।’

मेरी  समझ

विवेकानंद जी की इस बात को फिर हम इस तरह समझ सकते है कि एक बच्चा जब इस धरती पर  जन्म लेता है तब वह समस्त ज्ञान अपने साथ लेकर आता है।
जिस प्रकार एक नन्हे बीज में पूरा बरगद पेङ समाया होता है, सही पानी, हवा इत्यादि मिलने से उस बीज से हमें   एक विशाल वृक्ष मिलता है।

उसी तरह उस बालक की छोटी-सी बुद्धि में समस्त ज्ञान उपस्थित होते है।बालक नहीं  जानता कि वह ज्ञानी है।
उचित मार्गदर्शन व वातावरण से उसे पूर्वतः उपस्थित ज्ञान की प्राप्ति   होती है।और वह तब सर्वज्ञाता  सिद्ध होता है, जब वह उस ज्ञान की रोशनी को संसार में फैलाते हुए, अन्य मनुष्यों  की अज्ञानता को दूर  करने में सहायक बनता है।
अज्ञानता अथार्त यह अनभिज्ञता कि वे सब भी ज्ञानी हैं ।
वे यह भी समझा रहे हैं कि अन्य जीवों व परजीवों में भी शक्ति  है, परंतु  वह एक  निश्चित  दायरे तक सीमित है।
परंतु मनुष्य  की आत्मा ज्ञानी है, अतः सर्वशक्तिमान है। कठिनाई यह है कि इसका उसे ज्ञान ही नहीं है। मनुष्य   का उसकी   शक्ति  से परिचय कराना होगा ।कहते है न! अपने ज्ञान के चक्षु खोल!  अपने अंदर उपस्थित ज्ञान   को खोज!

शीशे का पीपा

     विवेकानंद जी कहते हैं कि 
‘अधिकांशतः व्यक्तियों में पवित्र सुंदर आत्मा अंधकारपूर्ण होती है । यह लोहे के पीपे पर लैम्प के समान होता है, कोई भी रोशनी की मंद प्रभा इससे नहीं चमक सकती है।
इसका विकास पवित्रता और स्वार्थहीनता से होता है , हम अस्पष्ट माध्यम को हल्के-हल्के   गहन बना सकते हैं, अंत में  यह पारदर्शी  शीशे के समान हो जाता है।
    श्री रामकृष्ण लोहे के पीपे के समान थे, जिनका शीशे के पीपे में हस्तांतरण  हुआ था, जिससे अन्तस्थ रोशनी जैसे इसे देख सकते हैं ।


मेरी समझ

स्वामी विवेकानंद जी की उपरोक्त बात का यह अर्थ समझा जा सकता 
है कि प्रत्येक मनुष्य को  ज्ञानी तो है, परंतु अपने ज्ञान को समझने की दृष्टि सबके पास स्पष्ट नहीं होती है।
अतः उनके ज्ञान का प्रकाशन होने में  कठिनाई होती है ।
अगर व्यक्ति अपने मन या दिमाग को पवित्र और स्वार्थहीन रखे और वैसे कर्म भी करे तो उसको ज्ञान को प्राप्त करने की दृष्टि भी मिलगी व वह ज्ञान  का प्रकाशन भी कर सकेगा।
उन्होंने अपने गुरु श्री रामकृष्ण  परमहंस जी का उदाहरण दिया  है।
स्वामी रामकृष्ण परमहंस एक महान संत, विचारक और समाज सुधारक थे। विवेकानंद जी उनके प्रमुख शिष्य थे।
स्वामी जी ने मानवता को सबसे बङा धर्म  माना था।वे सभी धर्मों का सम्मान करते हुए , सभी मनुष्यों को एक साथ रहने की प्रार्थना करते थे।
विवेकानंद जी कहते हैं कि श्री   रामकृष्ण का ज्ञान भी अंधेरे में था जिसे उन्होंने तप व मानवता की निःस्वार्थ सेवा से अपने ज्ञान का प्रकाशन किया   था।
स्वामी विवेकानंद ने अपने गुरू के विचारों और शिक्षा को रामकृष्ण मिशन की स्थापना करके विश्व भर में प्रसारित किया था।


स्वामी विवेकानंद   (भाग-2)


स्वयं  शिक्षा


स्वामीजी   कहते हैं  कि ‘ आप एक बच्चे का विकास उस तरह नहीं कर सकते हैं जैसे आप एक पौधे को विकसित करते हो।
एक पौधा अपनी प्रकृति के अनुसार विकसित होता है। एक बच्चा भी अपनी स्वभावगत प्रकृति के अनुकूल विकसित होता है।
पर तुम उसके विकास में उसकी सहायता कर सकते हो।
तुम जो कर सकते हो सकारात्मक से अधिक नकारात्मक होता है।
तुम बाधाओं को  हटा सकते हो और ज्ञान स्वयं  अपनी प्रकृति के अनुसार बाहर आएगा।

इसे और स्पष्ट करते हुए स्वामी जी कहते हैं कि मिट्टी को थोड़ा ढीला करो, जिससे वह स्वयं सरलता से बाहर आ सकेगा। तुम उसके चारों ओर झाङ लगा दो पर इससे वह नष्ट नहीं होगा, तुम उस मिट्टी में बीज डाल सकते हो, उसको उसका आकार उस मिट्टी में   देने के लिए उसको उपयुक्त हवा पानी इत्यादि  दे सकते हो। यहां तुम्हारा कार्य समाप्त होता है। अब वह स्वयं अपनी स्वभावगत प्रगति करेगा।
इसी तरह एक बच्चा स्वतः शिक्षित होता है।
एक गुरु इस सोच से सब नष्ट कर देता है कि वह सब सीखा रहा है।’
एक बार फिर विवेकानंद जी याद दिलाते हैं  कि ‘ मनुष्य के अंतर में समस्त ज्ञान निहित है, जिसे सिर्फ जागृत करने की आवश्यकता है। एक गुरु का यही कार्य होता है।
हम मात्र इतना कर सकते हैं कि जिससे बच्चे अपने हाथ, पैरों, कान व आँखों की सहायता से अपने ज्ञान  का सही उपयोग  कर सकें ।

मेरी समझ

  जैसा हम समझ चूके है कि एक बच्चे की बुद्धि में समस्त ज्ञान है, उसे सिर्फ जागृत करना है अथार्त उसकी बुद्धि का विकास इस तरह करना है कि वह अपने अंदर समाए समस्त ज्ञान को समझ सके। इसके लिए उसे उचित वातावरण व सही मार्गदर्शक मिलना आवश्यक है।


स्वतंत्र  विकास


विवेकानंद जी कहते हैं कि ‘ऐसी शिक्षण व्यवस्था जिसका उद्देश्य   हमारे बच्चों को ऐसे  शिक्षित  करना है कि जैसे गधे के मालिक को सलाह दी जाए कि गधे को नष्ट करके उसे घोङा बनाया जा  सकता है।ऐसी व्यवस्था को खत्म कर देना  चाहिए  ।
यह परंपरागत अभ्यास है कि माता-पिता अपने बच्चों पर इस तरह कठोर शासन करते है कि इन बच्चों को स्वतंत्र विकास के अवसर मिल नहीं पाते हैं।’
विवेकानंद जी कहते हैं कि ‘प्रत्येक बच्चे में अपरिमित प्रवृत्तियाँ होती है, जिनकी संतुष्टि के लिए उपयुक्त अवसरों की आवश्यकता होती है।
तीव्रता से सुधार की कोशिश  का अंत, धीमा सुधार होता है।
अगर आप उसे शेर बनने की अनुमति नहीं देते हो, तो वह लोमड़ी बन जाएगा।


मेरी समझ



विवेकानंद जी ने वर्तमान शिक्षा प्रणाली व माता-पिता के कठोर अनुशासन की आलोचना करी है।
उनके अनुसार शिक्षा प्रणाली ऐसी होनी चाहिए जिसमें बालक अपनी प्रवृत्ति के अनुसार स्वतः शिक्षा प्राप्त कर सके।
माता-पिता में अपने बच्चों को एक तथाकथित अच्छा  बच्चा बनाने की बहुत जल्दबाजी होती है। जिस कारण वह उनसे कठोर व्यवहार करते हुए उनकी संभावित  प्रवृत्तियों के विकास में बाधाएं खङी कर देते हैं  ।
हमें अपने बच्चों की परवरिश सहजता और इत्मीनान के साथ करनी चाहिए । उन्हें उनकी प्रवृत्ति के अनुसार विकसित होने के लिए समय और मौके मिलने चाहिए  ।



सकारात्मक  विचार


विवेकानंद जी कहते हैं कि ‘हमें हमेशा सकारात्मक विचार ही प्रकट करने चाहिए, नकारात्मक विचार केवल व्यक्ति को कमजोर बनाते हैं ।
अक्सर हम देखते हैं  कि माता-पिता अपने बच्चों पर पढ़ने लिखने का निरंतर दबाव डालते हुए,  उन्हें कहते है कि वे कभी कुछ नही सीख सकेंगे, वे उन्हें मूर्ख कहते हैं व कई बार इससे भी अधिक बोल जाते है।’
विवेकानंद जी कहते हैं , ‘ तुम उनसे कोमल शब्दों में बात करते हुए उन्हे प्रोत्साहित करोगे तो उनमें शीघ्र   सुधार पाओगे।
यदि तुम उन्हें सकारात्मक विचार देते हो,तो उनका एक ऐसे व्यक्ति के रूप में विकास होगा जो अपने पैरों पर खड़ा होना सीख सकेगा ।
भाषा, साहित्य या कला में, प्रत्येक क्षेत्र  में, व्यक्ति जैसे विचारों का निर्माण करता है या क्रिया करता है, हमें उनमें उनकी गलतियों पर उंगली नहीं उठानी है, अपितु ऐसे विचार देने चाहिए कि वे अपने कार्य को बेहतर  बना सके।’
स्वामी  जी ने कहा,”अपनी शिक्षण पद्धति को शिक्षण की आवश्यकतानुसार परिवर्तित कर देना चाहिए।” 
अतीत में हमारी प्रवृत्तियों को परिवर्तित किया जाता रहा है, आज हमें  बालक की प्रवृत्ति के अनुरूप उसे शिक्षा देनी है।
प्रत्येक को, जो जहाँ खड़ा है, वहीं से आगे बढ़ने  दिया जाना चाहिए।’
स्वामी जी ने अपने गुरु रामकृष्ण जी का उदाहरण देते हुए कहा ,’ हम देखते हैं  कि कैसे श्री रामकृष्ण जी, जिन्हें हम निकृष्ट मानते हैं, उन्हें भी प्रोत्साहित करते हुए,उनके जीवन में भी बदलाव ले आए थे।
वह किसी भी व्यक्ति की विशेष प्रवृत्ति की अवेहलना नहीं करते थे। वे सबसे आशावादी व प्रोत्साहन  करने वाली बाते करते थे, वह निम्न से निम्न   व्यक्ति को प्रोत्साहित करते और उनके शब्द उसके   जीवन को आगे बढ़ाने में  सहायक   बनते है।’



मेरी समझ




‘हमारी प्रवृत्ति है कि हम अपने बच्चों को सख्ती से, कठोर अनुशासन में रखते हैं।परंतु ऐसा करने से बच्चों का स्वाभाविक विकास नहीं हो सकता है।कठोर शब्द व कठोर व्यवहार बच्चों की बुद्धि को कमजोर बनाता है।कमजोर को और कमजोर करता है।
हमें अपनी इस प्रवृत्ति में बदलाव लाने की आवश्यकता है।
समाज के सुधार के लिए आगे की पीढ़ी को सकारात्मक, ऊर्जावान व आशावान बनाना आवश्यक है।

‌‌ क्रमशः