नए मकान- नए परिवेश – चतुर्थ भाग

तीसरा मकान

नया शहर- नए लोग

सेतु का हमारे जीवन में आना अथार्त गृहस्थी के एक अगले सुंदर पङाव में कदम रखना था।

हम सामान ट्रक में भर कर गुड़गांव की ओर चले और दिल्ली को अलविदा कहा, कहीं मन में उम्मीद जगाने की कोशिश तो की थी कि कभी दिल्ली वापिस लौटेंगे …… पर नहीं लौटे….
हम गुडगांव पहुँचे और हमारा ट्रक एक बङे मकान के सामने रूका, उस मकान के भारी दरवाजे को देख, मुझे अपने मायके के मकान के मुख्य द्वार की याद आई थी।
मकान का दरवाजा खुलते ही एक बङा आंगन था, आंगन के शुरू में ही बाए तरफ हमारी एक छोटी रसोई , उससे लगकर एक कमरा और उससे जुङा दूसरा कमरा था।पहले कमरे से हो कर दूसरे कमरे में जाना था। परंतु दोनो कमरे में दूसरे दरवाजे भी थे जो बाहर गली में खुलते थे।

यहाँ हमें शौचालय व स्नानघर मकान मालिक के बङे बेटे के परिवार के साथ शेयर करना था। शुरू में चिंता हुई कि बहुत कठिनाई आएगी, परंतु बङी भाभीजी यानि घर की बङी बहु के मधुर स्वभाव व समझदारी ने सब आसान कर दिया था।

यहाँ भी मकान मालिक ‘गुप्ता जी’ थे। यह गुप्ता जी एक छोटी दुकान के मालिक थे , जिसमें वह दैनिक प्रयोग की वस्तुएं रखते थे। हरियाणा के किसी सरकारी विभाग से रिटायर हुए थे। अब अपना समय इस दुकान में काटते थे । अपने समय में इनके पास पैसा था पर अब कठिनाई में थे। बहुत मन से यह बङा मकान बनाया था। इनके चार बेटे और तीन बेटियाँ थी। अभी एक बेटा- बेटी कुआंरे थे।

दो बङे बेटे इसी मकान में अपने-अपने भाग में स्वतंत्र रहते थे।तीसरा बेटा माता-पिता के साथ उनके भाग में रहता था। गुप्ताजी का अपना भाग बहुत सुंदर बना था।

मेरी सबसे पहली मुलाकात दूसरे बेटे की पत्नी प्रेमा से हुई थी। उसका कमरा हमारे कमरे के साथ ही था। अतः जब तक ट्रक से सामान उतरा मैं सेतु को लेकर उसी के कमरे में बैठी थी।

प्रेमा का मुझ से पहला सवाल था, ” क्या नाम है, तेरा?” यूं तो हम दिल्ली वासियों के लिए तु करके बोलना आम बात है, परंतु पहली मुलाकात में यह बेतकल्लुफी अजीब लगी थी। उसके हरियाणवी अंदाज़ ने बता दिया था कि मैं हरियाणा में बैठी हुँ।

मैं जानती थी कि गुडगांव एक गांव नहीं अपितु एक छोटा शहर है, जो दिल्ली के सामने तो देहात ही था।

1985 में गुडगांव के नए भाग बसने शुरू ही हुए थे। किसान अपने खेत- खलिहान सरकार को बेच रही थी और सरकार वहाँ नए सेक्टर बना रही थी।इसके साथ सरकारी मकानों के अतिरिक्त प्राइवेट कोठियां भी बननी शुरू हो गई थी।

हम पुराने गुडगांव में रह रहे थे।इधर रहने वाले लोग लोकल लोग कहलाते थे अथार्त जिनके पुर्वज सदियों से यही रहते आए थे। इनमें सभी जातियों के लोग थे। बनिया, कायस्थ , पंजाबी, सिंधी, गुर्जर और मुसलमान भी थे।

यह माना जाता है कि पांडवों ने गुरू द्रोणाचार्य को यह गांव भेंट स्वरूप दिया था। इसीलिए इस को गुरूग्राम कहते थे, बाद में धीरे-धीरे इसका नाम बिगङ कर गुड़गांव पङ गया था । अब फिर सरकारी तौर पर इसका नाम गुरूग्राम हो गया है।

आर्य , गुप्त व मौर्य साम्राज्य का शासन देखने के बाद इस शहर ने मुगलों , राजपुतों व अंग्रेजों का शासन भी भोगा है। यह 1947 में स्वतंत्रता के बाद पंजाब के प्रमुख जिलों में से एक था, 1966 में हरियाणा पंजाब से अलग हुआ और गुडगांव हरियाणा का हो गया । यह भी कहा जाता है कि यहाँ की भूमि खेती की दृष्टि से ऊपजाऊ नहीं थी। अतः धीरे-धीरे यहाँ नए- नए उद्योग खोलने के लिए लोगों को प्रोत्साहित किया गया था।

1985 के गुडगांव ने विकसित होकर गुरूग्राम की शक्ल ही बदल दी है। शहर का औद्योगिकीकरण हुआ, नए-नए-नए माॅल खुल गए हैं । बङी-बङी बिल्डिंग बन गई है। इस देहाती शहर का नाम पूरी दुनिया में प्रसिद्ध हो गया है। तब जब मैं किसी को बताती कि मैं गुडगांव में रहती हुँ, लोग सोचते, ” बेचारी दिल्ली की लङकी देहात में जा बसी है।” वहीं वे आज सोचते है कि ” मैं एक आधुनिक शहर में रहती हुँ।”

आज गुरूग्राम हरियाणा का दूसरा सर्वाधिक जनसंख्या वाला शहर है और भारत का यह चंडीगढ़ और मुंबई के बाद तीसरा पर कैपिटा इनकम वाला नगर है।

यह परिवार गुड़गांव के स्थानीय बनिया थे। इनके आस-पास भी सभी स्थानीय लोग रहते थे। अतः इनकी भाषा में स्थानीय हरियाणवी ठेठपना होते हुए भी हिन्दी अच्छी थी।
मेरी मुलाकात मकान मालकिन से उस दिन शाम को हुई थी। उन्हें देखकर तो उन्हें हरियाणवी नहीं कहा जा सकता था, पर बोली में रौब और तेजी थी। वह छोटे कद की सख्त मिजाज़ की महिला थी। उन्हें देखकर मुझे अपनी मामी नानी की याद आती थी। बिलकुल नारियल के समान, ऊपर से सख्त अंदर से कोमल थी। सेतु का बहुत ध्यान रखती थी, उसके रोने की आवाज सुन तुरंत आ जाती थी, बोलती, ” अरी, बहु, क्या हुआ छोरे को?”

हम किराया मकानमालिक को ही देते थे। फिर एक दिन अम्मा जी(मकान मालकिन) मेरे पास आई और बोली, “तुम भविष्य में किराया मुझे दिया करना, गुप्ता जी के हाथ में मत देना।”

मैंने एस. के. को बताया तो उन्हें यह सुझाव अजीब लगा और बोले, ” बाबुजी ( गुप्ताजी) बुरा मानेंगे।”

आदमियों को कहाँ औरतों की बात समझ आती है और उन्होंने किराया बाबुजी को ही दिया था तब अम्मा जी बोली तो कुछ नहीं पर उनके व्यवहार में बदलाव आ गया था।
मुझे जो बात समझ आई उसकी पुष्टि उनकी बहु ने भी की थी।बाबुजी घर का पुरा खर्च उठाते थे पर अम्मा जी को एक पैसा नहीं देते थे।अपने खर्च वह हमारे किराए से पुर्ण करती थी।

समाज में सभी जगह औरतों की तकलीफे एक जैसी होती है। पुरुष अपने को अक्लमंद समझते हैं , उन्हें लगता है कि पैसा संभालने की समझ उन्हीं के पास है। औरतों की निजी जरूरत , सुरक्षा- असुरक्षा, आत्मसम्मान की भावना को तो कोई बिरले ही समझ पाते हैं ।
ऊपर से दबंग दिखने वाली अम्माजी भी अपने पति के सामने कमजोर पङ जाती थी।
उसके बाद मैं स्वयं अम्माजी के हाथ में किराया देने लगी थी।बाबुजी ने भी बुरा नहीं माना था। यानि बाबुजी सब जानते थे, फिर एक बार किराये के पैसे उनके पास आ जाते थे तो वह स्वयं उन पैसों को अम्माजी के हाथ में क्यों नहीं देते थे?

अब अम्माजी हम से खुश रहने लगी थी, गुङगांव में पानी की समस्या थी पर उनकी कोशिश रहती थी कि हमें परेशानी न हो।

हमारे कमरे के सामने थोङा आंगन पार कर दो स्नानघर थे, उनमें से एक स्नानघर हमें उनके बङे बेटे के पांच सदस्यों के परिवार के साथ शेयर करना था। हमें स्नान के लिए अपनी रसोई के नल से पानी भर कर ले जाना होता था। पानी की दिक्कत थी पर यह भी सच है कि कई बार पानी सिर्फ हमारी रसोई में ही आता था और उन सबको हमारी रसोई से पानी लेना पङता था।

समस्याएं थी, जब गुङगांव रहने का फैसला करा था तो इन समस्याओं को कबूल भी करना था। फिर दिमाग में था कि यह जिला गांव जैसा होगा , पर खुशी थी कि यह छोटा सही शहर तो है।

अम्माजी का बङा बेटा दिल्ली के किसी सरकारी विभाग में काम करता था, नौकरी अच्छी थी पर उसकी शराब पीने की आदत से बङी भाभी बहुत तनाव में रहती थी। इसी कारण उन्होंने अपने 18 वर्षीय बेटे को अपने मायके छोङा हुआ था।उनका मायका रेवाङी में धनी व्यापारी का था। दिल्ली के गुप्ताईन व इंदू भाभी (बङी भाभी) में इसी बात में समानता थी। दोनों का अपने बेटों को अपने मायके (यानि उनके नाना-नानी की देख-रेख ) में छोङना अजीब था। जहाँ तक मुझे याद है दोनो लङके पढ़ाई में पिछङे हुए थे।

इंदू भाभी के 15 व 12 वर्ष की दो बेटियाँ भी थी। दोनों पढ़ाई में होशियार थी। जबकि दोनों माता – पिता के साथ रहती थी।

अम्माजी इंदू भाभी को पसंद नहीं करती थी।कई बार माता-पिता अपने लङके की गलत आदतों के लिए अपने बेटे को दोष न दे कर अपनी बहु को ही दोष देते हैं कि उनकी बहु उनके बेटे(अपने पति) को संभाल नहीं सकी है।

मेरा मन इंदू भाभी के साथ ही लगता था। गुङगांव शिफ्ट होने के डेढ़ महीने बाद मेरा छोटा भाई आशु चला गया और उसके एक महीने बाद मम्मीजी का स्वर्गवास हो गया था। तब उस संताप में मुझे बाहर की रोशनी और लोगों से बात करना अच्छा नही लगता था।मैं अपने सब काम जल्दी खत्म कर, सेतु को लेकर कमरा बंद कर रहती थी।तब इंदू भाभी ने मेरा दुख समझा था।

यहाँ मकान में कई लोग रहते थे, पर दिल्ली के पहले मकान की तरह नियम -कानून नहीं थे। सिर्फ सप्ताह के दो दिन शौचालय की टंकी में पानी भरना होता था।पानी का दबाव कम आता था, अतः ऊपर टंकी तक पानी स्वयं नहीं पहुँचता था व किसी पाइप से भी नहीं भर सकते थे। तो बाल्टी भर कर ही टंकी में पानी डालते थे।

लेकिन मैंने एक दिन भी यह काम नहीं किया था, चूंकि अम्माजी की बहुएँ मेरा साथ देती थी।वे मुझ पर हँसती और कहती,” आपको तो देखने से ही लगता है कि आपने ऐसे भारी काम कभी नहीं किए हैं ।”

अम्मा जी की बङी बहु इंदू अमीर घर की थी, जिससे अम्माजी की निभती नहीं थी। दूसरी बहु प्रेमा गरीब घर की थी, वह ही सास की प्यारी थी। तीसरी बहु मीना दूर कानपुर की थी।

प्रेमा थोङे भारी बदन की थी, पर सुंदर थी। शायद दो बच्चों के होने के बाद मोटी हो गई थी, चूंकि उसकी शादी की फोटो में वह पतली दिख रही थी।

प्रेमा अपने पति के साथ बाइडिंग का काम करती थी। उसके 8 व 7 वर्ष के दो बेटे थे। पति के काम में सहयोग करते हुए , गृहस्थी के सब काम, बच्चों की देखभाल व समय मिलते ही या सास की जरूरत के समय सास-ससुर का काम भी करती थी।

औरतें एक साथ कई कार्य करने की क्षमता रखती हैं ।यह सिर्फ मैं नहीं कह रही, गांधीजी ने भी कहा था।

समय पर सही काम अन्यथा उलाहने मिलने में देर नहीं लगती थी। वह अपनी सास की सबसे पसंदीदा बहु थी क्योंकि उलाहने सुन कर भी हँसती रहती थी व सभी काम कुशलता से करती थी।

अम्माजी की तीसरी बहु मीना की बुरी गत थी। शादी के दो साल के भीतर उसके दो बेटियाँ हो गई थी। अतः शारीरिक रूप से भी वह कमजोर हो गई थी, फिर गोदी में दो बच्चे, वह घर के काम उतनी चुस्ती -फुर्ती से नहीं कर पाती थी।

उसके प्रत्येक कार्य में नुक्स निकाला जाता था, उसका आत्मविश्वास कमजोर कर दिया गया था। फिर भी प्रेमा भाभी उसका साथ देती थी। मीना M.A. पास थी ।उसकी शिक्षा का प्रभाव उसकी बातचीत व लहजे में झलकता था। वह कम पढ़े-लिखे परिवार में आई थी पर अपनी शिक्षा का प्रदर्शन नहीं कर रही थी।

मैंने देखा वह जब भी कहीं बाहर जाती, बहुत सलीके से तैयार होती थी, सांवली थी पर उसे बहुत अधिक मेकअप की आवश्यकता नहीं थी।मीना के पति का काम हमारे स्थानीय निवास से बहुत दूर था। उसे आने – जाने में परेशानी थी अतः वह अपने परिवार के साथ अपने कार्यालय के पास ही शिफ्ट हो गया था।

एक दिन अम्मा जी व परिवार के सदस्य मीना से मिलने उसके घर गए थे। जब अम्माजी उस से मिलकर वापिस आई तो बहुत खुश थी, मीना ने उनकी अच्छी खातिरदारी की थी। उसके बनाए पकवानों के साथ, जिस प्रकार उसने अपनी गृहस्थी सजाई थी, उसका वर्णन किए बिना भी वह नहीं रह पा रही थी।

बाद में पता चला था कि अंत समय तक अम्मा- बाबुजी उसी के पास रहे थे।
अक्सर बहुओं को अपनी ससुराल में सम्मान नहीं मिलता है, उन्हें अपनी ससुराल में अपनी जगह बनाने के लिए बहुत हील – हुज्जत करनी पङती है।

यादें बेशकीमती होती हैं ,

जिनके रंग अपने-अपने होते हैं ,

याद आते हैं वे अजनबी,

जो थे कभी, मेरे हमदर्द।

( ऐसे अन्य हमदर्दो के निजी दर्दों की दास्तान अगले भाग में)

क्रमशः

नए मकान- नए परिवेश

दास्ताने मकान व मकान मालिकों की

(भाग-3)
(दूसरा मकान)
(छलकती – खिलती खुशियाँ )

हमने उसी सरकारी काॅलोनी में बने चार मंजिली क्वाटरों में चौथी मंजिल पर एक क्वाटर किराए पर लिया और अपने घर को एक नया खूबसूरत आयाम दिया था।
यह दो बैडरूम का मकान था, हम चाहते थे मम्मीजी साथ रहे। इस बङे स्वतंत्र मकान को अपना रिहायशी बनाने का एक उद्देश्य मकान मालिक की चिक चिक से दूर रहना भी था। मेरे लिए इस अवस्था में शांति से खुश रहना आवश्यक था।

इस स्वतंत्र मकान में जैसे मैं शादी के बाद पहली बार आजादी से जी रही थी। मकान में प्रवेश के साथ ही ड्राइंगरूम था, जिसके एक ओर रसोई और दूसरी ओर बाॅलकनी थी। प्रवेशद्वार से सीधे जाते ही दो बैडरूम थे। फिर शौचालय और स्नानघर थे। दोनों बैडरूम में एक बङी खिङकी थी। कमरों में हवा और धूप आने का बहुत सुख था।
मैं सुबह-शाम बाॅलकोनी में बैठ कर काॅलोनी की रौनक का
आनन्द लेती थी। सर्दियों में छत पर चली जाती थी। हमने इस मकान को बहुत दिलचस्पी से सजाया था। शादी के बाद के सभी पहले त्योहार इसी मकान में मनाए थे। मम्मी जी साथ थी और भाई साहब भी पास ही रहते थे। पहले त्योहारों की अपनी खास यादे होती हैं ।

यूँ तो इस मकान में शिफ्ट होने पर हमें अपने बङों से डाँट भी पङी थी, चौथी मंजिल पर यह मकान और मेरी ऐसी अवस्था के कारण मम्मी जी तो बहुत नाराज थी। पर हम नव युवा दंपत्ति को कहाँ कुछ समझना था,उस पर मेरा बचपना ऐसा कि जैसे पैरों में पंख लगे थे।सीढियों पर तेजी से चढ़ना उतरना, तब थम कर काम करना कहाँ आता था।

ऐसे में तबियत भी बिगङी, और भूल भी समझ आई। सामने के मकान में रहने वाली खन्ना आंटी भी तब बोली, ” मुझे नहीं पता था तुम इस अवस्था में हो, मैं तो तुम्हारे बचपने में अपने बचपने को देख खुश होती थी। पता होता तो तभी रोकती तुम्हें । फिर बहुत प्यार से बोली,” अब तुम लङकी नहीं रही हो अपितु माँ बन रही हो, धैर्य के साथ उसे दुनिया में लाओ, तब तुम उसे दिखाना, अपनी चुस्ती-फुर्ती। और धीरे से पंजाबी में बोली, ” तुझे मेरी नज़र लग गई ।”

डॉक्टरी सलाह से अब अधिक समय बिस्तर पर बिताना था व घर से बाहर निकलना, सीढ़ियों पर उतरना- चढ़ना तो नामुमकिन था। अब खुशमिजाज खन्ना आंटी ही मददगार थी। आंटी जी के दो बेटे थे। बङा बेटा विवाहित था, बहु भी नौकरी करती थी, अतः उससे मिलना कम होता था। किसी पंजाबी परिवार के इतने करीब रहने का मेरा पहला मौका था।
सरसों का साग वो भी पंजाबी तङके में बनाना मेरे लिए कठिन अवश्य था , पर खन्ना आंटी ने सब आसान कर दिया था। आज भी सरसों का साग बनाती हुँ तो उनकी याद अवश्य आती है।
कई बार रात में उनके घर से आने वाली आवाज ने यह बता दिया था कि खुशमिजाज आंटी जी के दिल में भी दर्द है।
मैं अपना अकेलापन दूर करने के लिए उनसे पत्रिकाएं ले कर पढ़ती थी।

एक दिन जब मेरी तबियत में तो सुधार था पर डिलिवरी का समय करीब था। मैं अपने मायके गई थी। मम्मी जी को गैस के चुल्हे पर काम करने की आदत नहीं थी। उस दिन दोपहर में मम्मी जी गैस की नाॅब बंद करना भूल गई थी और सो गई थी। गैस की बदबू घर के बाहर तक पहुँची ही थी, खन्ना आंटी तुरंत हमारे घर पहुंची, घर की काॅलबेल बजाई, दरवाजा खुलते ही गैस की नाॅब बंद करी, खिङकी, दरवाजे खोले, मम्मी जी को संभाला था। हम हमेशा उनके आभारी रहे हैं ।

हमारी बिल्डिंग की तीसरी मंजिल में एक बिहारी परिवार रहता था।वे दंपत्ति भी बहुत मिलनसार थे, अक्सर मिलने आते थे। बिहारी आंटी बहुत सुन्दर कढ़ाई का काम करती थी।
इस सरकारी काॅलोनी की विशेषता यह थी कि यहाँ औरतें खाली नहीं बैठती थी। अथार्त ऐसा कोई भी काम करना जिससे कुछ अतिरिक्त आय अर्जित कर सके। जो महिला जिस कार्य को कुशलता पूर्वक कर सकती थी, उसे ही अपना अर्थोपार्जन का माध्यम बना लेती थी। इस तरह वह घर से ही इस अतिरिक्त आय से अपने पति के कंधा से कंधा मिलाकर गृहस्थी को सही पटरी पर रख पाती थी।

ये वो स्त्रियाँ हैं , जो career नहीं जानती है, इनके सपने अपने परिवार से शुरू होते हैं और वही समाप्त होते हैं फिर भी इनकी मेहनत को कोई पहचान नही मिल पाती हैं , इन्हें भी अपने अस्तित्व की पहचान से कोई सरोकार नही होता है। इनका सिर्फ एक मकसद होता है कि इनकी गृहस्थी की इमारत मजबूत बने।
मैं एक पुरानी प्राइवेट काॅलोनी से इस सरकारी काॅलोनी में आई थी। मैंने शादी से पहले किसी औरत को इस प्रकार निःसंकोच व निशंक होकर ऐसे काम करते नहीं देखा था। यह दुनिया मेरे लिए अलग व प्रेरणादायी थी।
और फिर वह दिन आया जब जाना कि कैसे एक माँ अपनी संतान को पहली बार गोद में लेते ही अपने सब दुःख, दर्द भूल जाती है और एक असीम सुख में खो जाती है। सेतु ने मेरा जीवन एक नए उल्लास से भर दिया था।

पर अस्पताल से घर आने पर पता चला कि हमें अपना यह घर उर्फ मकान अपने मकान मालिक से शेयर करना होगा।
यह हिंदूस्तान है जहाँ भ्रष्टाचार का बोलबाला है। सरकारी मकान उन सरकारी कर्मचारियों को दिए जाते है जिनके पास अपने मकान नहीं होते हैं । यह नियम है कि अगर आपके पास अपना मकान है तो आप सरकारी मकान के अधिकारी नहीं हो सकते हैं। ।अपने नाम पर मिले सरकारी मकान को किराए पर नहीं उठा सकते हैं । फिर भी लोग बेझिझक इस नियम को तोङते रहते हैं । जबकि उन्हें सरकार को भी किराया देना होता है पर वे किराएदार से डबल किराया लेकर लाभ में ही रहते थे।

सरकारी मकान कम और कर्मचारी अधिक होते हैं तब ऐसी भ्रष्टता के कारण जरूरतमंदों को किराए के मकान में ही रहना पङता है, जैसे हमारे पहले मकान के अवास्तविक मकान मालिक गुप्ता जी जिन्हें 20 वर्षों की नौकरी में सरकारी मकान अलाॅट नहीं हुआ था।

हमारे इस मकान के मकान मालिक श्री यादव हरियाणवी थे और शाहदरा में उनका अपना मकान था। फिर भी उन्होंने यह सरकारी मकान अपने नाम अलाॅट कराया था और उसमें स्वयं न रहकर उसे किराए पर देते थे।
लेकिन इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद सरकार की ओर से नियमों के पालन में सख्ती बरती जाने लगी थी।अतः जांच-पड़ताल जोर-शोर से होने लगी थी।
इसी जांच -पङताल के भय से वह हमसे मकान खाली कराना चाहते थे, पर मेरी अवस्था को देख चुप थे। लेकिन उनकी पत्नी श्रीमती यादव सुबह से शाम तक हमारे घर पर बैठती थी कि यदि कोई जांच के लिए आए तो वह प्रमाणित कर सके कि वे इसी मकान में रहते हैं।
श्रीमति यादव पतली व लंबी महिला थी।उनकी भाषा व बातचीत का लहजा पूर्णतः हरियाणवी था। वह बहुत उलझी व अपनी परिस्थितियों से परेशान दिखती थी। उनकी बातों से पता चला कि शाहदरे का मकान बङा था व उनके ससुर के नाम था। अतः श्री यादव के अन्य भाई भी उसी मकान मे अपने – अपने भाग में रहते थे। वहाँ वह स्वतंत्र रूप से रहते हुए भी स्वतंत्र नहीं थी। शायद अधिकांशतः महिलाओं की ख्वाहिश होती है कि कब ससुरालवालों से अलग रहने का अवसर मिलेगा। ( माफी चाहती हुँ, उन महिलाओं से, जो ऐसी सोच नहीं रखती हैं )

अब जब यह मौका मिला था, तो वह इसे छोङना नहीं चाहती थी। अतः उनकी जिद थी कि इस मकान में वे शिफ्ट हो जाएं। पता नहीं कैसे उनकी बुद्धि को यह समझ नहीं आ रहा था कि उनके पति को यह सरकारी मकान अलाॅट हुआ है , यह मकान उनकी निजी संपत्ति नहीं है। हम से वह ऐसे व्यवहार करने लगी थी कि जैसे हमने उनकी संपत्ति पर कब्जा कर लिया हो। मुझे उन पर गुस्सा नहीं आता था अपितु कभी हँसी, कभी दया आती थी। औरते भी किस दायरे में फँसी होती है कि वह सिर्फ अपनी निजता की तलाश ताउम्र करती रह जाती हैं ।

श्री यादव इस मकान में शिफ्ट होना नही चाहते थे शायद वह इसे छोङना चाहते थे परंतु अपनी पत्नी की जिद के आगे मजबूर थे।

अंततः हमें सेतु के एक महीना के होने से पूर्व वह मकान भी छोङना पङा था। एक महीना हम भाईसाहब के साथ रहे थे। उस सरकारी कालोनी में किराए पर मकान मिलना अब कठिन था। चुंकि एस.के. (पतिदेव ) की नौकरी गुडगांव में थी और प्रतिदिन वहाँ की आवाजाही से भागा दौङी भी थी । अतः हमने गुड़गांव शिफ्ट होने का फैसला लिया था। सासु माँ के करीब रहने की इच्छा से ही हम उस काॅलोनी में रह रहे थे। पर अब मजबूर हो कर निकले थे।
एक माँ के लिए अपने बेटे को दूर जा कर गृहस्थी बसाते देखना कष्टकारी होता है। मम्मी जी के लिए भी यह असहनीय दुःख था।

हम भी दिल्ली छोङना नहीं चाहते थे पर तब यह फैसला लेना ही ठीक लगा था। लेकिन यह मालूम नहीं था कि गुरूग्राम हमारे जीवन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण शहर बनेगा।

‘ किस्मत तेरे रंग अनेक, कुछ जाने- पहचाने, कुछ अनजाने-बेगाने।’
‘कारंवा लेकर निकल पङे हम एक नई मंजिल की तलाश में ।’

नए मकान- नए परिवेश- भाग-2

दास्ताने मकान व मकान मालिकों की –

प्रथम मकान- कुछ कङवे अनुभव व मीठे अहसास-

मेरी गृहस्थी का प्रारंभ इसी मकान से हुआ था, अतः यही गृहस्थ जीवन की नींव का पहला पत्थर था। मिस्टर गुप्ता किसी सरकारी विभाग में काम करते थे, लेकिन उन्हें कोई सरकारी क्वाटर नहीं मिला था परंतु उनके किसी मित्र ने अपने नाम का क्वाटर उन्हें किराए पर दिया था।
दो कमरे का क्वाटर था, जिसमें से एक कमरा हमें किराए पर दिया गया था, शायद उनकी कोई आर्थिक मजबूरी रही होगी। पता नहीं वास्तविक मकान मालिक को पता था या नहीं ।
खैर हमारे लिए तो वही मकान मालिक थे। श्रीमती गुप्ता यानि गुप्ताईन मोटी और लंबी थी, पैर में लचक थी। उन्होनें हमें पहले ही दिन अपने पैर के फ्रेक्चर की दास्तान सुनाई थी। उन्होंने बताया था वह अपने कमरे में पैर मोङ कर पलंग पर बैठी थी, तभी ध्यान आया कि गैस पर दूध उबलने रखा था, यह सोच कि दूध उबल न गया हो वह रसोई की ओर भागी पर भाग न सकी चूँकि मोङे हुए पैरों को खोलना भूल गई और गिर गई थी।(मैं यह सुन अचंभित थी) उस समय वह गर्भवती भी थी।
गुप्ता जी अपनी पत्नी के सामने पतले, ठिगने व दब्बू भी लगते थे। उनके तीन बच्चे थे, दो बेटे व एक बेटी।बङा बेटा 16 वर्ष का व बेटी 15 वर्ष की थी। छोटा बेटा तीन वर्ष का ही था।
मोटी गुप्ताईन को सुबह उठने में परेशानी थी, इसीलिए बेटी स्कूल जाने से पहले सुबह उठ कर घर की सफाई करती व पिता के साथ रसोई में उनकी सहायता भी करती थी। जब सब्जी बन जाती, आटा तैयार हो जाता तब गुप्ताईन आकर रोटी बना देती थी। दोपहर में स्कूल से आने के बाद व रात के खाना बनाने में बेटी को मदद करनी होती थी। छुट्टी के दिन भी पिता- पुत्री घर का सभी काम संभालते थे।( किसने कहा कि पति घर के काम में सहयोग नही करते हैं )
मैं पहले कभी किराए के मकान में नहीं रही थी।अतः ज्ञान नहीं था कि किसी के साथ मकान शेयर करने पर कुछ नियमों का पालन करना होगा।
मोटी गुप्ताईन के नियमों से मेरे से ज्यादा सासू माँ परेशान थी। सासू माँ हमारे साथ नहीं रहती थी, वह थोङी दूरी पर जेठजी के साथ उनके क्वाटर में रहती थी। पर हम से मिलने दिन में कम से कम दो बार आती थी।
सबसे अधिक हमें जिस नियम से परेशानी थी, वह सुनने में अजीब लगा था । उन्होंने बाथरूम के बाहर जो चप्पल रखी थी, उसी चप्पल को पहनकर उनका परिवार बाथरूम जाता था उन्ही चप्पलों का प्रयोग हमें करना था, हम अपनी चप्पलों का प्रयोग नहीं कर सकते थे। सुन कर घिन भी आई थी। हमारे परिवार में सभी सदस्यों की बाथरूम चप्पल अपनी अलग थी। और बाथरुम से आकर पैर भी धोए जाते थे, कोशिश रहती चप्पल भी धोई जाए।

मकान में प्रवेश करते ही दालान था, दालान की दाई ओर रसोई थी और रसोई के लगभग साथ ही एक कमरा था, जो हमारा कमरा था, इस कमरे के साथ एक बङा कमरा था वह मकान मालिक का था। दालान के दूसरी तरफ स्नानघर व शौचालय था।

उसी कमरे में जगह बनाकर, एक मेज लगाकर हमने अपने दो चुल्हों वाले स्टोव पर खाना बनाना शुरू किया था। मकान मालकिन आई और बहुत प्रेम से आदेश दिया कि बर्तन घर के बाहर लगे नल पर धोएं जाए।उनके आदेशानुसार सारे झूठे बर्तन उठा मैं घर के बाहर लाॅन एरिया में लगे नल पर पहुँच गई थी। तभी सासु माँ का पदार्पण हुआ और अपनी नई -नवेली बहु को इस प्रकार घर के बाहर बर्तन साफ करते देख उनका गुस्सा आपे बाहर था, एक तो अपनी छोटी बहु को साथ न रख सकने का अफसोस पहले ही गहरा था। खैर किसी प्रकार मम्मी जी को समझाया गया था।

लेकिन धीरे-धीरे गुप्ताईन की छोटी-छोटी बातों की टोका-टाकी ने हमारी सहन शक्ति को समाप्त कर दिया था। सच तो यही था कि उनका तीन बच्चों के साथ, (उसमें दो किशोर बच्चे) एक ही कमरे में गुजारा करना मुश्किल था। इसी कारण अपने बङे बेटे को उन्होंने उसके नाना के घर छोङा हुआ था। गुप्ताईन का मायका अमीर था और अपने पति के वेतन से वह असंतुष्ट थी।

उनका मानसिक कष्ट गहन था, उन्होंने अतिरिक्त आय के उद्देश्य से यह कमरा हमें किराए पर उठाया था। अब वह कठिनाई में थी। परिणामतः अब वह बात-बात पर हम से लङती थी। मैं तो मोटी गुप्ताईन की तेज आवाज़ से दुबक कर कमरे में बैठ जाती थी। मम्मीजी को भी चुप कराकर पति देव ही मोर्चा संभालते थे। उधर दब्बू गुप्ताजी कुछ न बोलते थे।

अंततः हमने उस कमरे से निकलने का फैसला लिया और इस बार एक बङा स्वतंत्र क्वाटर लिया। मम्मीजी भी हमारे साथ रह सकती थी।
पर इस कमरे से ही मैं नन्हीं -मीठी खुशबू अपने में बसाए निकली थी, एक नन्हा सपना जो साकार होना चाहता था। मैं गर्भवती हो गई थी, मन में उल्लास था, मीठे सपने थे।इस पहले मकान ने मुझे एक बङी खुशी दी थी।

कुछ गुपचुप-गुपचुप नन्हें ख्याल थे मेरे,
कुछ मीठे-मीठे अनोखे अहसास थे मेरे।
कभी आनंदित, कभी अचंभित हो जाती मैं ,
वह मेरे अंदर जैसे गुंज रहा था,
हमारा मीठा सपना साकार हो रहा था।

क्रमशः

नए मकान- नए परिवेश

जीवन सफर में हमें भिन्न-भिन्न राहगीर मिलते हैं जो जीवन को विभिन्न प्रेरणाओं से भर देते हैं ।

विवाहित जीवन के 36वर्षो की यादों की गांठे जब – तब खुलने लगती हैं , तो आँखों के सामने आते हैं, वे लोग जो गाहे-बगाहे जीवन यात्रा को सुगम बनाने में पथ-प्रदर्शक बनें थे।
36 वर्ष में हमने 17 मकान बदले हैं । दिल्ली , गुरूग्राम, लखनऊ व आगरा में हम रहे अब इस समय हम फिर गुरूग्राम में किरायेदार के रूप में रह रहे हैं ।
आज फिर मेरी यादों की पोटली कुलबुलाने लगी है, और फिर वे सब सोए हुए किरदार जागने लगे हैं और मुझे भी जगाकर , मेरा हाथ पकङ अतीत की चौखट तक ले जा रहे हैं।
उनका मन मैं समझ रही हुँ, वे सब फिर मुझ से मेरा परिचय कराना चाहते हैं । लेकिन ये अतीत की गलियाँ आगे-पीछे हो रही हैं , इन्हें क्रमवार ठीक से सजाना होगा, अपने को भटकने से बचाना होगा तभी मैं अपने इन अतीत के कुछ करीबी और कुछ अजनबी सहयात्रियों से फिर एक बार परिचित होते हुए अपने को भी पहचान दे पाऊँगी।

नए मकान

प्रत्येक मकान की पहली सुबह, उसकी खुशबू, उसका रंग पूर्णतः नया और भिन्न होता है।
शादी के बाद का पहला एक कमरे का मकान याद आ रहा है। नए जीवन की पहली शुरुआत की पहली सुबह, नई महक सब बहुत मिठास भरा था।
जब याद कर रही हुँ अपनी गृहस्थी की पहली सुबह की तो एक अन्य खुबसूरत शहर, उसकी सुबह, हमारा हनीमुन याद आ रहा है, तब पहली बार महसूस किया था पर ठीक से जाना न था कि हर स्थान की पहली सुबह की खुशबू, रंगत बिलकुल अलग व नए रूप में होती है।
शिमला की वह सुबह ताजगी भरी थी, मैं हाथ में चाय का कप लिए, होटल के कमरे की बाॅलकोनी में खङी थी। हल्की – हल्की बारिश की महक, लंबे-लंबे पेङो से टपकती, छोटी -छोटी बुंदों को देखते हुए मेरा मन अदभूत हो रहा था।
फिर उसी मौसम में हम थोङा नीचे उतरे थे, एक दिन पहले शाम को हमको यह टूरिस्टों का शहर नज़र आया था, वही शहर सुबह शिमलावासियों का शहर था। छोटे- नन्हें बच्चे अपने माता या पिता का हाथ थामें, हम सबसे बेखबर अपने विद्यालय जाते हुए, उसी शहर में रचे-बसे नज़र आए थे।
यह मेरे लिए नई सुबह के साथ नई खुशहाली की ओर बढ़ने का संकेत था।
फिर गृहस्थी की पहली शुरुआत के पहले मकान की नई सुबह और उसके बाद कई मकान भिन्न-भिन्न शहरों में बदले और हर मकान की पहली सुबह ने हमेशा एक नई अनुभूति दी है।
प्रत्येक मकान की पहली सुबह मैं हमेशा बहुत प्रसन्न होती थी। मैं तनावरहित हो, उस सुबह की हर सकारात्मकता को अपनी झोली में लेने के लिए मंत्रमुग्ध बैठी रहती थी।
आरंभ में नवीनपन की खुशी का अहसास भर हुआ, फिर जब जान लिया कि यह खुशी तो मिलनी ही है, तब मकान चाहे इच्छा से या अनिच्छा से क्यों न बदला हो, पिछले मकान से बेशक बहुत लगाव हो गया हो। उस मकान की बहुत गहरी यादें ही क्यों न छूट रही हो, पर नए मकान की नई सुबह की खुशबू महसूस करने के लिए, उस नई सुबह बेताबी से उठती थी, घर के खिङकी, दरवाजे खोल नई खुशबू का अपने घर में स्वागत करती थी। घर तो वही रहता था न! चाहे मकान कितने भी बदले हो।
तो आज अभी लिखते हुए जाना कि मेरा घर कितनी नई-नई सुबह की सकारात्मक खुशबुओं के रंग में रंगा है।

यह तेरा घर यह मेरा घर,
किसी को देखना हो गर,
तो पहले आकर मांग ले,
मेरी नज़र , तेरी नज़र ,

यह घर बहुत हसीन है।

क्रमशः

दायरे सोच के

अंतिम अध्याय – करण

बसंत की नई धूप –

विचित्रा से बात हुई, “उसने बताया कि दुष्यंत भी आएगा, फिर उसे मुम्बई जाना है, वहीं के काॅलेज में एडमिशन लिया है, अभी फ्रांस नहीं जा रहा है।”
शायद पैसे का इंतजाम नहीं हुआ होगा तभी फ्रांस का विचार बदल दिया होगा
, मुझे उससे पूछना चाहिए था । मैं अपने बच्चों के काम नहीं आऊँगा तो कौन आएगा?

यह सब सोच ही रहा था कि वे दोनो आ पहुँचे। उनके आते ही मेरा घर जी उठा है। किसी तरह नहीं लग रहा कि उन्हें मेरे से कुछ नाराज़गी व शिकायत हो ।विचित्रा आते ही रसोई में घुस गई है, आज उसके हाथ का स्वादिष्ट खाना मिलेगा। और दुष्यंत की बातें चल रही हैं। उसे पता है कि मुझे क्रिकेट की बातें पसंद है, इसीलिए वही बातें छेङ रखी हैं, शायद नहीं चाहता कि मैं उससे उसकी पढ़ाई की बात करूँ। पर नहीं….। यह तो अचानक अपने कोर्स के बारे में बात करने लगा है।

दुष्यंत कह रहा है, ” पापा, मैं आपको अपने मुम्बई काॅलेज में एडमिशन लेने के विषय में बताना चाहता था, पर माँ के एक्सीडेंट के कारण हम बहुत व्यस्त हो गए थे। फिर सोचा कि आप को मिलकर विस्तार से बताऊँगा।”
“हाँ, विचित्रा ने बताया था,पर तुम लोगों को तो मुझे खबर करनी चाहिए थी। मुझे अच्छा नहीं लगा कि तुम परेशानी में थे और मुझे बताना उचित भी नहीं समझा था, अपने पापा को भी गैर मान लिया।” मैंने थोङी नाराज़गी दिखाई तो दुष्यंत की जगह विचित्रा बोली, ” हाँ, पापा यह हमारी गलती थी।”

शायद विचित्रा नहीं चाहती थी कि दुष्यंत के मुँह से कोई टेढ़ा जवाब निकले इसीलिए उसने ज़वाब दिया है। मतलब विचित्रा को पिछली बार मेरे और दुष्यंत के बीच के विवाद के विषय में पता है।
दुष्यंत फिर बताने लगा,” मैं हमेशा मुर्तिकला में विशेषज्ञता प्राप्त करना चाहता था, पर माँ को लगता था कि इसमें अपना स्थान बनाने के लिए बहुत संघर्ष करना होगा। मैं भी द्वविधा में था तो सोचा कि पैंटिग यानि चित्रकला में आगे की पढ़ाई करूँ इसीलिए फ्रांस के विषय में विचार बनाने लगा था ।”
“मैं तो बेटा, पैसा देने को तैयार था, तुमने मुझे बताया नहीं।” मैं बीच में ही बोलने लगा।

पर मेरी बात काट कर वह बोला,” अरे नहीं पापा, पैसे की बात नहीं है, आप को बताता हुँ कि कैसे मेरे अंदर की उलझन समाप्त हुई और मैं सही फैसला ले पाया हुँ।”
“आपको पता है कि ललित कला एकेडमी में हम छात्रों को प्रदर्शनी की सुविधा मिलती है। इसी संदर्भ में मेरे प्रोफेसर साहब का फोन आया कि “दुष्यंत, हम तुम छात्रों के लिए एक प्रदर्शनी लगा रहें हैं, तो तुम भी अपनी दो-तीन मुर्तियाँ प्रदर्शनी के लिए दे दो।”
“मैं हैरान कि उन्होंने मेरे चित्र नहीं मांगे!” दुष्यंत हैरानी के साथ बता रहा था कि वह बोले ,” हमें तुम्हारी बनाई मुर्तियाँ बहुत पसंद आती हैं। इस प्रदर्शनी में सभी कलाओ के नमूने रखे जाएंगे, सभी छात्रों के उत्कृष्ट कलाकारी के नमूने रखने है, जिसके लिए मैं तुम्हारी मुर्तियों को ही चुन रहा हुँ।”
मैं भी यही जानता था कि दुष्यंत चित्र बहुत सुंदर बनाता है, पर वह मुर्तिकार भी है यह तो अभी पता चला है। सच तो यह है कि मैंने कभी जानना ही नहीं चाहा था।

दुष्यंत अपनी धुन में बोले जा रहा था, ” पापा, इन्ही प्रोफेसर साहब ने मुझे इस मुम्बई काॅलेज के फार्म भरने की सलाह दी थी।”
मैंने जल्दी से उसे फिर बीच में रोकते हुए कहा ,” बेटे, एडमिशन में तो फिर भी पैसा लगा होगा न!। मुझ से क्यों नहीं मांगे? पहले भी तो….”

इस बार फिर विचित्रा बोली,” आपसे ही लेते रहेंगे, अभी तो कोर्स शुरू भी नहीं हुआ है।”
और दुष्यंत बोला,” पहले आप मुझ से सुनो कि जब से यह फैसला लिया, मैं बहुत खुश हुँ, अपने मन का काम करने में ही सबसे बङा सुख है।”
“और तुम्हारी माँ क्या कहती हैं? वह तो मुर्ति कला के कोर्स के लिए मना कर रही थी न!” मैंने जिज्ञासा से पूछा क्योंकि मैं जानना चाहता था कि माँ ने पुत्र को कितना समझा!
जवाब विचित्रा ने दिया, ” माँ से अधिक कौन समझ सकता है कि अपने मन का काम करने में कितनी खुशी मिलती है । हमें बचपन से उन्होंने हमेशा अपने मन और दिमाग से फैसले लेने की सलाह दी है।”
” उन्होंने मुझे मुर्तिकला चुनने के लिए मना किया था क्योंकि इसमें बहुत संघर्ष है। पर उन्हें पता है कि अपने जुनून के काम में सिर्फ सुख होता है, संघर्ष नहीं होता है।” दुष्यंत बोला।
” आपको पता है कि चंडीगढ़ के राॅकगार्डन के निर्माता नेकचंद सैनी और फिनलैड के स्कल्पचर पार्क के निर्माता वैयियो रोक्कोनैन ने अगर सफलता , संघर्ष या पहचान जैसे भावों से काम किया होता तो क्या वे इतना सुंदर काम कर पाते? उन्होंने अपना समय अपनी उर्जा उस कार्य में लगाई जिसमें उन्हें खुशी मिलती थी और आज उनका निर्माण सबको खुशी दे रहा है।”
” अभी मुझे बहुत कुछ सीखना है, जानना है, अभी तो मेरे ज्ञान का सफर आरम्भ हुआ है।” दुष्यंत को सुनते हुए मैं सोच रहा था कि मेरा बेटा कितना समझदार है।

फिर मैंने विचित्रा की ओर देखा और उससे सवाल किया,”तुम्हारी क्या प्लानिंग है?”
” तुम कौनसा अपने मन का काम कर रही हो?”
मैंने देखा कि वह मेरे सवाल करने से खुश हुई है। उसने भी बताना शुरू किया,” पापा, आपको पता है कि मैं समाजशास्त्र में रिसर्च कर रही हुँ। मैंने M Phil के समय ही ग्रामीण परिवेश को अपना मुख्य विषय चुना था। इसी विषय को गहराई से जानने के लिए मैं इसमें रिसर्च कर रही हुँ और इसके लिए सिर्फ किताबें ही नहीं पढ़नी हैं अपितु गाँव-गाँव जाकर उस परिवेश का गहराई से अध्ययन करना है।”

मैं सोच रहा था कि आज की पीढ़ी के सोचने का ढंग कितना आधुनिक है, हम भी जब युवक थे तो हम भी बङी-बङी बातें करते थे। समाज को बदलने की बातें करना, पूरी दुनिया पर अपना आक्रोश प्रकट करना हमारे तब आधुनिक विचार थे। लेकिन व्यवहार में हम अपने बङों की इच्छानुसार पहले सरकारी नौकरी में लगे फिर उनकी इच्छानुसार शादी भी कर ली थी। अपने मन का काम, जुनून, खुशी ….. यह सब कभी नहीं सोचा । या फिर सोचा भी तो उस दृढ़ता और विश्वास के साथ नहीं निभाया था, तो अंततः एक सही अच्छे वेतन की नौकरी अच्छे जीवनयापन के लिए जरूरी है, यही समझा और यही निभाया। यह तो तलाक पता नहीं कैसे बीच में आ गया था।शायद समझा नहीं कि बाते करने से नहीं अपितु अपने विचारों और व्यवहार में बदलाव लाने से समाज बदलता है। समाज व्यक्ति से ही बना है, अतः प्रत्येक व्यक्ति अपनी सोच, विचार और व्यवहार में बदलाव लाएगा तब समाज सुधरेगा । जिसने थोङा भी इस बदलाव को समझा उसका जीवन सफल रहा। आज की पीढ़ी तो तलाक का भी समर्थन करती है।

यह सही भी है, साथ में घुट- घुट कर जीने से अच्छा है कि अलग रहे। पर हमारे समाज में विवाह संस्था पर बहुत विश्वास रखा जाता है। विवाह, जिससे एक परिवार की नींव बनती है। यह मीठा सच है कि परिवार से जीवन का सच्चा सुख मिलता है। इस सुख के आधार स्तंभ पति-पत्नी ही होते है। अतः इन दो व्यक्तियों में आपसी विश्वास व सामंजस्य होना आवश्यक है ।एक दूसरे के लिए ह्रदय में सम्मान होना आवश्यक है। परिवार के प्रत्येक व्यक्ति के व्यक्तित्व के विकास में उसे सहयोग देना महत्वपूर्ण है। व्यक्ति के विकास से, परिवार का विकास है और फिर समाज का विकास है।

हम सदियों से परिवार में तो रहते आ रहे है, पर वह अंदर ही अंदर टूटते- बिखरते परिवार होते हैं । अगर परिवार के किसी भी सदस्य को परिवार में सम्मान प्राप्त नहीं है व सदस्य के व्यक्तित्व का विकास नहीं हो रहा है तो वह एक स्वस्थ परिवार नहीं हो सकता है। कहा जाता है कि पेङ की एक डाली भी सूख जाती है तो धीरे-धीरे पूरा पेङ ही सूख जाता है।और तलाक इन्हीं टूटते- बिखरते परिवारों की परिणति है।
मैं देख रहा हूँ कि यह पीढ़ी तलाक का समर्थन करती है पर एक- दूसरे के आत्मसम्मान को भी महत्व देती है।
आज अपने बच्चों को खुश देख, मैं आत्मग्लानि से मुक्त हो गया था।

समाप्त

दायरे सोच के

(चतुर्थ अध्याय – दुष्यन्त )

जवाबों के पुल

दीदी ने बताया कि पापा ने बुलाया है । दो दिन बाद मुझे मुम्बई के लिए निकलना है। इतने दिन पापा के पास नहीं जा पाया और फोन भी नहीं किया। मुझे उनसे मिल कर जाना हैं। उस दिन दीदी को बताया था कि, “कैसे पापा को जवाब दे कर आया हुँ।”

मैंने सोचा था कि दीदी नाराज़ होगी और कहेगी, ” हमेशा बिना सोचे बोलता है।” पर नहीं, इस बार ऐसा नहीं हुआ था । उसने कहा, ” कोई बात नहीं, एक बार तो दबा हुआ आक्रोश निकलना था।”

मैंने दीदी की ओर देखा…. हम दोनो ने एक समान दर्द भोगा है, शायद दीदी ने अधिक भोगा है । शुरू में वह माँ से नाराज रही और पापा से भी दूरी बनी रही थी ।पापा का प्यार तो था पर उसके लिए वो अपनापन नहीं था।

थोङी देर में दीदी बोली, ” देखा जाए तो हमें मम्मी-पापा को दोष नहीं देना चाहिए, यह उनका जीवन था, उनको अधिकार था अपने जीवन का फैसला लेने का, अधिक तकलीफ़ों के साथ रहने से अच्छा था कि कम तकलीफ़ों के साथ रहना, आसान तो नहीं रहा होगा ऐसा फैसला लेना। अगर हम दुख में थे तो वे भी कम दुखी नहीं थे। फिर ठीक ही तो किया, अगर हमारे कारण इस बेमानी रिश्ते में रहते तो और भी बुरा लगता।”

” अब अपने दो ब्रेक-अप के बाद सोचती हुँ कि यह रिलेशनशिप खून के रिश्तों से अलग होता है ।शादी के बाद तो पूरा जीवन साथ रहना है। फिर अगर इतनी असमानताएँ हों, कष्ट हो और अपमान भी हो तो कैसे कटता होगा इतना लंबा सफर!”

” हमारी माँ यह फैसला ले पाई, बहुत तो ले ही नहीं पाते है। अधिकांश औरतें इससे भी अधिक अपमानित स्थिति में ताउम्र रहती हैं। हाँ, मैं स्वीकार करती हुँ कि जबरदस्ती की शादी पुरुष भी निभाते है, पर कष्ट और अपमान ज्यादा औरत के साथ ही जुङे हैं।”

” माँ से पहले के समय में तो यह सोचना भी पाप था। तब यह धर्म माना जाता था, ‘ जिस आंगन में डोली गई उसी आंगन से अर्थी निकलेगी।’ और पुरूष भी अगर अपनी पत्नी को छोङ देते थे तो समाज में उनकी अवमानना होती थी, फिर भी औरत को दोष मिलता था कि उसने पति सेवा में कमी रखी होगी।सहना तो औरत का धर्म है।”

“पर दीदी, प्रेम तब भी होते थे और उसकी नियति शादी ही हो यह जरूरी नहीं था, फिर प्रेम असफल, मतलब ब्रेक अप। अब इसे इस तरह लिया जाता है कि शादी से पहले प्रेम मतलब relationship और न निभ सके तो ब्रेक अप। शादी के बाद न निभे तो तलाक जो एक खासा मसला बन जाता है। जबकि शादी से पहले कितने भी ब्रेक-अप हो सकते हैं।” मैंने अपनी बात स्पष्ट करते हुए आगे तर्क रखा, ” तलाक हो या ब्रेक-अप तकलीफ तो होती ही है पर तलाक से बच्चे भी प्रभावित होते हैl”

दीदी ने सोचते हुए जवाब दिया,” जीवन का सफर अज़ीब होता है, सब सोच विचार के बाद भी विवाह हो, तब भी कुछ बदल सकता है, मुझे लगता है महत्वपूर्ण है कि आपस में प्रेम बना रहे और एक-दूसरे के प्रेम के प्रति विश्वास और सम्मान होना जरुरी है।”

मैं विचार करने लगा कि बात सही है, महत्वपूर्ण बात यह नहीं थी कि माँ और पापा बहुत अलग थे, बात आपसी समझ और सम्मान की ही थी।

मुझे याद आया मैंने एक बार माँ से पूछा था कि यह क्यों हुआ? तब मैं छोटा ही था और माँ से यूँ ही कुछ भी पूछ लेता था।

माँ का जवाब था, ” सब मेरे कारण।”

मैं असमंजस में था और वह बोली,” ज्यादा नहीं सोचते, तुम्हारे पापा और माँ तुम दोनो को बहुत प्यार करते हैं, साथ नहीं रहेंगे पर तुम्हारे लिए हमेशा साथ है। हमेशा यही याद रखो, अपने माँ और पापा के आपसी रिश्ते के बारे में तुम्हें नहीं सोचना है।”

उसके बाद मैंने कभी माँ से कुछ नहीं पुछा है । पर क्या यही बात थी कि माँ ने समझ नहीं रखी? या फिर….।
मैं सोच में था कि दीदी बोली, ” माँ कहती थी कि अहं और आत्मसम्मान में एक पतले धागे के समान भेद होता है, पर गहरा होता है। सबको अपने आत्मसम्मान के लिए संघर्ष करना चाहिए।”
” क्या तुमसे माँ ने पापा के साथ अपने रिश्ते के टूटने के विषय पर बात की ?” मैं ने उत्सुकता से पुछा
” माँ कभी अपने अतीत पर बात करना पसंद नहीं करती है, उन्हें अपने फैसले पर पूर्ण विश्वास रहा है, उनका आज हम ही रहे हैं ।” दीदी बता रही थी और मैं माँ को और जानना चाहता था।
माँ हमेशा कहती हैं कि अपमानित और प्रताड़ित करने की आदत पङना बहुत भयंकर होता है, तब आप अपने प्रियजनों को ही सबसे अधिक तकलीफ़ देते हैं। इसमें अपने को भी गिराते जाते हैं व आप दूसरे का नहीं अपना आत्मसम्मान कुचलते जाते हैं ।

पर इससे भी अधिक खतरनाक बात होती है जब आपको अपमानित व प्रताड़ित होने की आदत पङ जाती है। तब आप स्वयं अपने को मारते हैं , ऐसी स्थिति में आप अपने प्रियजनों के लिए भी कुछ नहीं कर सकते हैं । ऐसा व्यक्ति मृतप्राय होता है।

दीदी ने बताया, ” माँ ने उन्हें कहा कि वह अपने आत्मसम्मान के लिए वह घर छोङ आई थी, वह अच्छी तरह जानती थी कि अपने ‘मैं’ के लिए नहीं , अपनी आत्मा को बचाने के लिए यह कदम उठाना आवश्यक था।”

” पर उन्होंने हमारे लिए….?” यह प्रश्न करते- करते अटक गया था।
दीदी बोली,” माँ जानती थी कि वह तो तकलीफ़ से निकल आई हैं , पर उनके नासमझ बच्चें तकलीफ़ में है, हमारे दर्द के समय वह हमारे साथ रहना चाहती थी, इससे अधिक वह कुछ कर नहीं सकती थीं । ”

मैं आज अपने प्रश्नो के उत्तर पा सका हुँ।

अपने जीवन के अतीत की बखिया उधेङने से कोई लाभ नहीं है। प्रत्येक व्यक्ति को अपने लिए फैसले लेने का अधिकार है। महत्वपूर्ण यह है कि हमें जीवन में आगे बढ़ना चाहिए , हम बढ़ेगे तो समाज भी बढ़ेगा। नए विचारों का स्वागत करना चाहिए और प्रयोग में लाना चाहिए , इसी में मानव का विकास है।

मुझे जीवन के प्रति एक नई दृष्टि मिली है।

कल पापा से मिलने जाना है। उनके प्रति मेरी समझ बदली है। अब मैं अधिक तटस्थ हो कर,सब देख सकता हूँ । उनसे अब अधिक खुलकर बात कर सकता हूँ । माता-पिता के आपसी रिश्ते का प्रभाव अब हमारे पिता- पुत्र के रिश्ते पर नहीं पङेगा।

और मुझे तो आगे बढ़ना है, अपनी कला को निखारना है।

क्रमशः

दायरे सोच के

(तृतीय अध्याय – करण)

-उलझते-सुलझते धागे –

हमारे अलग होने के दर्द को बच्चों ने बहुत झेला है। अक्सर लोग अपनी तकलीफ़ों को स्वयं निमंत्रित करते हैं।अगर हम अपने रिश्तों को महत्व नहीं देते तो अंज़ाम कष्टदायी होता है। यही हमारे साथ हुआ था।

अगर नैना नहीं जाती तो भी क्या होता? उन दिनों मैं सिर्फ गुस्से में था… शायद थोङे दिनों में मेरा गुस्सा शांत हो जाता और मैं सब स्वीकार कर लेता, पर अगर शांत नहीं होता तब ?

नैना ने कोशिश की बात करने की पर मैं सुनना नहीं चाहता था । फिर भी अगर वह रहती तो उसके सब्र का बाँध तो तब भी टूटता, अगर घर नहीं छोङती तो झगङे तो होते ही….।रात-दिन के कलह से बच्चों की परवरिश कैसी होती? तब भी उन्हें बहुत सहना होता। अभी बच्चों को हमारा अलग-अलग ही पर प्यार तो मिला और क्लेश के बीच रहते हुए, हम साथ तो होते पर हमारा प्यार व देखभाल नहीं मिल पाती।
एक अन्य महत्वपूर्ण बात है कि हमने दूसरी शादी नहीं की ।नैना ने तो शायद सोचा भी नहीं होगा पर मेरे पास तो प्रस्ताव आए थे, घर मे सबने ज़ोर भी डाला था, मन में भी आया कि कर लूँ दूसरी शादी, अपने को एक चांस देने का मन भी हुआ पर बच्चों को न खो दूँ! इस भय ने मुझे शादी करने से रोक दिया था।
दुष्यंत को बुरा लगा कि मैंने उसकी माँ को दोष दिया या यह भी सही है मैं भी उसे कहाँ समझ रहा हुँ, वह जो करना और सीखना चाहता है उसमें कमियाँ ही निकालता रहता हुँ।

दुष्यंत बातुनी है,जो उसके मन में होता है कह देता है, वह आता है तो उसकी बातों से घर में रौनक आ जाती है। पर वह भावुक भी है, प्रत्येक बात को गहराई से लेता है। जब छोटा था, तब मेरे गुस्से से डर जाता था। नैना के जाने से मेरे अंहकार को बहुत चोट पहुँची थी और मैं चाहता था कि वह ज़माने की ठोकरे खा कर फिर मेरे दरवाजे आए, जबकि जानता था ऐसा नहीं होगा । इसीलिए मैं बच्चों की जिम्मेदारी लेना नहीं चाहता था, सोचा जब बच्चों को अकेले संभालेगी, उनके सारे खर्चे उठाएगी तब थक हारेगी, तो मैं तमाशा देखूँगा। भूल गया बच्चों को तो वही संभालती थी, बात सिर्फ खर्चे की ही तो थी।
यही होता है हम अपने-अपने अहं को जिताने के लिए बच्चों को मोहरा बनाते हैं। हमने भी यही तो किया था। जब बच्चे मुझ से मिलने आते तब भी मैं गुस्से में ही होता, यह डर मज़बूत हो जाता कि वह नहीं आएगी । समाज के सामने जिस अपमान और जिल्लत का सामना करना पङ रहा था उससे मैं तिलमिला रहा था यह भूल गया था कि बच्चों को भी समाज का सामना करना पङ रहा होगा और उनके मासूम मन पर कैसी गुज़र रही होगी।
मुझे तो सिर्फ अपना अपमान याद था, मुझे छोङ कर नैना ने मेरा अपमान किया था।

सबके कहने से मैं उसके पास गया था, उसे वापिस लाने के लिए, एक नई शुरूआत की बात भी की थी, पर वह नहीं मानी …. और मैं अपमानित हो कर वापिस आ गया था।
मेरी तकलीफ बच्चों के सामने ही उबल पङती थी, उनके सामने भी मैं एक पिता की तरह नहीं, अपितु एक चोट- खाए पुरूष की तरह ही होता था। बच्चे सहम रहे हैं, यह देख कर भी मैं अनदेखा करता रहता , अगर दुष्यंत बिमार नहीं पङता, उसकी बिमारी ने मुझे सचेत किया कि अगर बच्चे भी मेरे जीवन से चले गए तो मेरे जीवन में खुशी कहाँ बचेगी!

आज फिर दुष्यंत नाराज़ हो कर गया है, यह घर उनका वो घर नहीं है, जहाँ शाम को लौट कर आना ही है, यहाँ इनका कोई कोना नहीं है, वैसा सामान नहीं है, जिसके बिना….,इस घर को भी उनके प्रतिदिन आने की आदत नहीं हैं। पर कभी-कभी यह भी उनके न आने के अहसास से गमगीन हो जाता है। यूँ इस घर में भी उनके अपने कोने है, उनके सामान की अलमारियाँ, उनका कमरा, पलंग, सब वैसा ही उनका अपना है जैसे पहले था, जब भी दोनों आते हैं उनके कोने खिल उठते है, वैसे तो पूरा घर खिल उठता है।
दुष्यंत के बनाए चित्र, रंग ब्रश फोटो….। उसके जाने के बाद भी, उसकी रौनक का अहसास दे जाते हैं। पर ये सब उसकी वो जरूरतें नहीं जिसके लिए उसका आना अनिवार्य हो…

विचित्रा अब रहने नहीं आती है, पर यह घर उसका 8-10 दिन में प्रतीक्षा करने लगता है। जब से उसकी माँ इस घर को छोङ गई है, विचित्रा ने ही इस घर को संभाला है। 10 वर्ष की विचित्रा सप्ताह में एक बार आती थी पर आते ही अपने नन्हें हाथों से घर को संवारना शुरू कर देती थी। मैं जानता था कि उसे इस घर व मुझे छोङ जाने का दुःख था साथ ही इसीलिए अपनी माँ से नाराज़ भी थी ।मैं खुश था कि वह अपनी माँ के इस फैसले से बहुत नाखुश है। विचित्रा बहुत कम बोलती है, लेकिन उसका चुप गुस्सा पता लगता है। मैं भी कभी उससे बात करने का अधिक प्रयास नहीं करता हुँ। वह शुरू से चुपचाप मेरा ध्यान रखती थी, उसकी निगाहें मेरी हर छोटी व बङी जरूरत समझ लेती व मुझे पता भी नहीं लगता था और वे पूरी भी हो जाती थी, जब छोटी थी तब वह अपने चाचा व बुआ की सहायता ले लेती थी। पर अब तो वह सिर्फ बङी नहीं समझदार भी हो गई है।

मैं जानता हुँ कि वह धीरे-धीरे अपनी माँ के बहुत करीब हो गई है। पर मेरे और उसके बीच दूरी नहीं होते भी एक दीवार है।यूँ वह मुझे बहुत अच्छी तरह समझती व पहचानती है।
मैंने कभी उस दीवार को हटाने की कोशिश नहीं की है, क्योंकि मैंने उसे अपनी पुत्री से अधिक दुनियावी दृष्टि रखते हुए उसे एक सामान्य लङकी के रूप में ही देखा । इसीलिए जब वह घर संभालती तो उसकी प्रशंसा करता उस पर दुलार भी आता पर साथ ही अंदर से यह स्वीकार करता कि एक लङकी को यह सब आना चाहिए।

मेरे मन में कहीं यह रहता कि यह लङकी है तो अवश्य अपनी माँ पर ही गई है, जबकि जानता था कि उसके मन में अपनी माँ के लिए नाराज़गी भरी हुई है।
दुष्यंत तो अब कई बार हँसते हुए कहता है, “पापा, मैं नहीं, दीदी आप पर गई है।”
वह बहुत अच्छी हाॅकी खिलाङी थी, मैं भी अपने समय में काॅलेज टीम में था। फिर भी मैंने विचित्रा के खेल को प्रोत्साहित नहीं किया अपितु मैं अफसोस करता कि दुष्यंत किसी ऐसे खेल में भाग नहीं लेता है।

मैं हमेशा यह चाहता था कि दुष्यंत की विचार शैली बहुत पैनी हो, हर विषय में उसकी गहरी पकङ हो, इसके लिए मैं हमेशा दुष्यंत के साथ किसी न किसी विषय पर चर्चा करता था। चर्चा के समय अगर विचित्रा अपने कोई विचार प्रकट करती तो उसे प्रोत्साहित करने के स्थान पर अनसुना कर देता।जबकि जानता था कि वह वाद-विवाद प्रतियोगिता में पुरस्कार जीतती है, परिणामतः उसने मुझ से दूरी बना कर रखी थी।

दुष्यंत कहता है,”आपने कभी दीदी को सुना नहीं, वह तो स्वयं ही हर विषय में अच्छी पकङ रखती थी, और उसकी विचार शैली बहुत स्पष्ट होती है। आपको दीदी से भी बातें करनी चाहिए थी।”

पर इन सबके बाद भी वह कभी मेरी लापरवाहियों के लिए मुझ पर गुस्सा भी करती, तब कम बोलने वाली विचित्रा न जाने कैसे मुखर हो जाती और मैं चुपचाप उसकी फटकार सुनकर मुस्कराता रहता था । शायद हर पुरूष को हर समय एक माँ चाहिए होती है।

दुष्यंत सही कहता है, विचित्रा में मैं अपने गुण देख पाता हुँ। जब उसने समाजशास्त्र विषय चुना था तो मैंने यही सोचा था कि इतना कठिन विषय कैसे कर पाएगी? आज वह लेक्चरार है । मुझे अपनी बेटी पर गर्व है।

मैं जानता हुँ कि मैंने उसके साथ अन्याय किया है, जो कम बोलता है, उससे भी हमें बात करनी चाहिए, आखिर मैं तो उसका पिता हुँ। उसने कभी मुझ से कुछ नहीं मांगा था । दुष्यंत की ही फरमाइशे चलती थी, मैं दुष्यंत के लिए कुछ लेता तो विचित्रा के लिए भी लेता और विचित्रा बिना किसी नखरे के खुशी-खुशी ले लेती थी। एक-दो बार ऐसा हुआ कि दुष्यंत ने मुझे बताया कि विचित्रा को ड्रेस पसंद नहीं आई है। मैने उससे कहा ,” बेटा, इस बार इसे रख लो, अगली बार तुम्हारी पसंद की लाऊँगा।” पर उसने विश्वास दिलाते हुए कहा, ” दुष्यंत झूठ बोलता है, मुझे बहुत पसंद है।”

कुछ समय पहले ही दुष्यंत ने मुझे बताया था,” पापा, दीदी के मेरे से भी ज्यादा नखरे हैं। माँ तो हमेशा उसके साथ बाजार जा कर परेशान हो जाती है, उसे आसानी से वस्तुएँ पसंद नहीं आती हैं। वह आपकी पसंद पहनती है या अपनी…….।”
” उसने आपके दिए सारे गिफ्ट आज तक संभाल कर रखे हैं, मेरे तो पता नहीं कहाँ गए?”

मेरी बेटी बहुत समझदार है, उसके मन में मेरे लिए कितना प्यार व सम्मान है। शायद खुन के रिश्ते ही हमें समझ पाते हैं।
अपने और दुष्यंत के बीच आए इस दुराव के लिए मुझे विचित्रा से ही बात करनी चाहिए। पर वह भी बहुत दिनों से नहीं आई है।8-10 दिन में उसका चक्कर लग जाता है पर इस बार तो 15 दिन हो गए है। 2-3 दिन में फोन करके मेरी दवाई व खाने के लिए पुछताछ करती रहती है, इस बार फोन भी नहीं आया….। शायद दुष्यंत ने सब बताया होगा तो वह भी नाराज़ हैं। तभी नहीं आई,उसके स्पर्श के बिना घर कैसा विरान लग रहा है। देख रहा हुँ, चादरें इत्यादि गंदे है,जगह-जगह जाले हो रहे हैं। यह कामवाली अम्मा भी कोई भी काम अपनी अक्ल से नहीं करती है। पर विचित्रा के लिए भी यह सिर्फ उसके पापा का घर है। यहाँ तो सिर्फ इन दोनो की बचपन की यादें हैं, वे यादें जिनमें हम सब साथ रहते थे।

मैं जानता हुँ कि वह नाराज़ है इसीलिए नहीं आई है। तब भी उसने आना बंद कर दिया था, उसका दिल टूटा था।मैं उसकी बारहवीं कक्षा के परिणाम से बहुत गर्व महसूस कर रहा था और इस उपलक्ष्य में घर पर एक छोटी पार्टी रखी थी। उसके सभी मित्र आए थे, लङके भी थे।मुझे लङकों से कोई परेशानी नहीं थी। पर विचित्रा सबसे जिस तरह बात कर रही थी, वे सब कुछ मेरे लिए आश्चर्य की बात थी। मैंने कभी विचित्रा को इतना खुश और उछल- कूद व शोर मचाते नहीं देखा था और वो भी सब लङकों के साथ….। मुझे अचानक अहसास हुआ कि मेरी बेटी बङी हो गई है। यह भी कि अब हमें उसकी विशेष सुरक्षा का ध्यान रखना चाहिए।
” क्या कर रही है, उसकी माँ?”
उसी समय मेरे व्यवहार में आए बदलाव को सबने महसूस किया था, पार्टी बेरौनक हो गई थी।उस दिन विचित्रा दुखी हो कर गई थी ।मैंने उसकी माँ को फोन पर बहुत सुनाया था ।
और उसका जवाब था, ” तुम कभी अपनों पर विश्वास करना नहीं सीख सके। तुमने अच्छा नहीं किया, आज तुमने अपनी बेटी को भी अपने से दूर कर दिया है।।”
कुछ दिन वह नहीं आई थी फिर उसकी बुआ मीरा ने उसे समझाया और शायद उसकी माँ ने भी समझाया था।
उसके बाद उसने मेरे से एक विशेष दूरी बना ली थी और थोङी अधिक गंभीर हो गई थी।

पर 15दिन हो गए है, दोनों की कोई खबर नहीं है, मैंने भी दोनो को फोन नहीं किया कई बार सोचा करूँ, पर नहीं किया…..।
इसी सोच-विचार में बैठा था कि देखा अम्मा ने अपनी बेटी के साथ घर की सफाई जोर-शोर से शुरू कर दी है।
मैंने पुछा,” आज कैसे इतनी सफाई?”

“दीदी का फोन आया था, कल आ रही हैं, साथ ही कह रही थी कि घर साफ मिलना चाहिए। आप तो जानते हैं कि हम कितना भी कर लें, दीदी को कमी नज़र आ ही जाएगी। अब की बार तो बहुत दिन बाद आ रही हैं।”

विचित्रा आ रही है, यह सुनकर खुशी हुई पर बुरा लगा कि उसने मुझे फोन क्यों नहीं किया?
उसका जवाब भी अम्मा ने ही दिया “आपका स्वीच ऑफ था तो मुझको ही बोली कि आपको बता दूँ ।” और जो सामान खत्म हो रहा है, उसकी लिस्ट भेज दें तो वह मंगवा लेगी।
मैंने धीरे से कहा कि “कहीं बाहर गई हुई थी क्या? इतने दिन से कोई ख़बर नहीं?”
अम्मा एकदम हैरत से बोली,” अरे ! क्या आपको नहीं मालुम?”
फिर धीरे से बोली,” बहनजी का एक्सीडेंट हो गया था तो 2-3 दिन हाॅस्पिटल में रहीं थी। अब ठीक हैं, चिन्ता की बात नही है।”
मैं एकदम बोला,”मुझे खबर तो करनी थी।

“सोचने लगा, बच्चों को पैसे की जरूरत न हो, अकेले दोनो संभाल रहे हैं, इन बच्चों का भी मेरे सिवाय कौन है?
अपने पर गुस्सा आ रहा था कि” मैंने ही बच्चों को फोन क्यों नहीं किया? न जाने किस संकोच में रहता हुँ। अपने आप सोच लिया कि बच्चे नाराज़ हैं।”
फिर सोचा विचित्रा को कहुँ कि कल दुष्यंत को भी साथ लाए।

क्रमशः

दायरे सोच के

(द्वितीय अध्याय दुष्यंत)

-घुटते मन-

आज मैने अच्छा नहीं किया, मुझे पापा से ऐसे बात नहीं करनी चाहिए थी। पहले भी मेरी पापा से कई बार बहस हुईं है , लेकिन व्यक्तिगत स्तर पर कभी हमने एक-दूसरे को तकलीफ नहीं पहुँचाई थी। हम सामाजिक, राजनीतिक व अन्य विषयों पर चर्चा करते थे, बचपन से पापा मुझे विभिन्न विषयों पर बात करने के लिए प्रोत्साहित करते थे।

ऐसा नहीं कि उन्होंने पहले कभी मेरे द्वारा कला को ही अपना जीवन उद्देश्य चुनने के लिए आलोचना नहीं करी थी। गाहेबेगाहे, जब भी मौका मिलता तो वह अपनी अनिच्छा या कहुँ चिन्ता प्रकट करते रहे थे। पर मैंने कभी उनसे बहस नहीं की थी । बचपन से यह अहसास था कि कुछ बातों में वह परपंरवादी हैं।
लेकिन आज जब बात माँ के प्रति कङवाहट प्रकट करते हुए कही गई तो न जाने यह रोष कैसे प्रकट हो गया था। चाहे जो भी हो मुझे उनसे इस तरह और ऐसे शब्दों से बात नहीं करनी चाहिए थी।
मैं और पापा मित्र नहीं थे, पर मैं उनसे बहुत खुल कर बात कर लेता हुँ। मैं हमेशा अपनी जरूरतों के लिए उनसे पैसे मांगता रहता था, हमारी शिक्षा के लिए अपनी समस्त जिम्मेदारी उन्होंने पूर्ण की थी। बेशक उन्हें हमारे विषयों के प्रति न केवल अरुचि अपितु नाराज़गी रही हो ।

मैं तब सिर्फ आठ वर्ष का था, जब माँ मेरे और दीदी के साथ हमारे घर से अलग दूर एक मकान लेकर रहने लगी थी। माँ ने हमारा एडमिशन अपने कला विद्यालय में करा दिया था। दीदी को माँ के विद्यालय में पढ़ना अच्छा नहीं लगा था, पर मैं खुश था। एक तो माँ पास में थी, दूसरे यह कला विद्यालय होने के कारण यहाँ सभी कलाओ में प्रशिक्षण की समुचित सुविधाएँ थी। यह विद्यालय हमारे पहले विद्यालय से अलग था, क्योंकि यहाँ कलाओं के साथ विद्यार्थी को विभिन्न खेलों में विद्यार्थी की रुचि अनुसार भाग लेने के लिए प्रोत्साहित किया जाता था। यही कारण था कि बाद में दीदी को यह विद्यालय बहुत पसंद आ गया था। वह बहुत अच्छी हाॅकी खिलाङी बन कर विद्यालय टीम के साथ दूसरे शहरों में खेलने जाती थी।

मुझे पापा से दूर रहना बहुत अखरा नहीं था, पर कुछ याद है कि दीदी कुछ समय तक माँ से नाराज़ रहीं थी। बाद में जब हम दोनो इस योग्य हुए कि उन दिनों की बात आपस में कर सकते थे, तब दीदी ने स्वीकार किया कि आरम्भ में वह माँ को समझ नहीं सकी थी। हालांकि मैं हैरान था क्योंकि मैं तो माँ को हमेशा समझता था, उनकी तकलीफ पहचानता था।
हम प्रत्येक शनिवार व रविवार पापा के साथ बिताते थे। दादा-दादी, चाचा व बुआ सबसे मिलते थे। जबकि मेरा मन होता माँ भी साथ हो, पर माँ ने आरम्भ में ही पूर्ण सच्चाई के साथ समझाया था कि “तुम्हारे माँ और पापा साथ नहीं रह सकते हैं, तुम्हें मम्मी और पापा दोनों मिलेंगे व उनका प्यार भी, पर अलग-अलग । कई बार सबको हर चीज नहीं मिलती है।” कई वर्षो बाद एक बार माँ ने हँसते हुए कहा, “तुम दोनो ने मेरे लिए त्याग किया है।”

यह सच्चाई थी कि हम पापा से दूर नहीं हुए थे। उनसे बराबर मिलते व प्रतिदिन फोन पर बातें करते थे।
यह बात तो दीदी ने भी स्वीकार की थी कि जब हम साथ रहते थे, तब हम पापा के साथ इतना समय नहीं बिताते थे। शनिवार- रविवार को भी पापा को अक्सर अपने कुछ काम होते थे, बहुत कम वह हमारी बातें ध्यान से सुनते थे। लेकिन अलग रहने पर सिर्फ शनिवार- रविवार ही मिलते पर पापा पूरा समय हमें देते थे। वह अपने सभी काम पहले ही निबटा देते ताकि हमें अपना पूरा समय दे सके।वह हमारे साथ खेलते, घुमाते और हमारी पढ़ाई भी देखते थे।

पर आरम्भ में ऐसा नहीं था, वह शुरू में हमसे मिलने के लिए इतने उत्सुक नहीं होते थे और जब मिलते तो अक्सर झुँझलाए और और गुस्से में होते थे। फिर भी हम उनसे मिलना चाहते व शनिवार की प्रतीक्षा बेताबी से करते थे, मैं तो शुक्रवार से ही अपना बैग लगाने लगता था। मुझे उत्सुकता होती कि वह अकेले कैसे रहते हैं? अपना घर, कमरा सब देखने व वहाँ रहने का मन होता था। पर माँ के बिना उस घर में रहना, सोना अच्छा नहीं लगता था। जबकि इस नए मकान में पापा की कमी नहीं लगती थी। वैसे मैं कल्पना करता था कि अगर पापा भी यहाँ आए तो वह कहाँ सोएँगे? उनका सामान कहाँ रखा जाएगा। पर उनके बिना बुरा भी नहीं लगता था। क्योंकि यहाँ उनकी हमें आदत नहीं थी। मेरा मन होता माँ से कहुँ कि कभी वह भी हमारे साथ अपने घर चलें, पर नहीं कहता क्योंकि याद आ जाता उनका वह चेहरा जब उन्होंने कहा,
” कई बार सबको हर चीज़ नहीं मिलती है।” उस चेहरे में दुःख से अधिक अपराध बोध अधिक था।
मैं अक्सर सोचता था कि क्या उन्हें अपना घर याद नहीं आता होगा? फिर बहुत दिन बाद जब माँ ने अपना मकान बनाया और अपने किराए के फ्लेट से निकल कर हमने माँ के बनाए नए मकान में शिफ्ट किया था। माँ बहुत खुश थी।
पर जैसा दीदी, कहती है, ” तु बात करते हुए सही समय का ध्यान नहीं रखता है।”
मैंने माँ की बहुत बङी खुशी के समय उनसे सवाल किया, ” क्या आपको कभी अपना घर छोङने के बाद उस घर और पापा की याद नही आती थी?।”
सवाल करते ही, मैंने देखा दीदी मुझे गुस्से से देख रही थी। और मेरी माँ! हमेशा की तरह शांत जैसे वह मेरे अंदर के सभी सवालों को जानती-पहचानती थी। इसीलिए उत्तर बहुत सहजता और सरलता से दिया था अब तो चेहरे पर कोई उदासी व अपराधबोध भी नहीं था।
” हम 12 वर्ष साथ रहे थे। वह मकान तुम्हारे पापा और मैंने बहुत शौक से बनाया व सजाया था, इसीलिए घर व गृहस्थी की याद आती थी, पर उनकी याद ? मैं स्वयं हैरान रही हुँ कि कभी उनकी याद तो दूर, जीवन में उनकी कमी भी महसूस नहीं हुई। ”
फिर एक गहरी सोच के साथ बोली,” शायद यही कारण था, हमारे अलग होने का…। ”
माँ के इतना कहते ही मुझे बचपन की वह छोटी घटना याद आई, हम सो रहे थे कि मेरी आँख खुल गई थी, पापा गुस्से में चिल्ला रहे थे। मैं महसूस करने लगा था कि पापा आजकल माँ से नाराज़ रहते थे, उनसे गुस्से में ही बात करते थे। उन दिनों मुझे उनसे डर लगने लगा था।
यह डर कहीं न कहीं अभी भी मन में ज़मा है। पापा हम पर कभी गुस्सा नहीं करते थे पर क्योंकि मैं समझता था कि माँ पापा के गुस्से के कारण ही उनसे अलग हुई थी, इसीलिए यह डर दर्द के रूप में मेरे अंदर ऐसे बसा था कि उससे अलग होना असंभव था। मैं हैरान हुँ कि मैंने आज उनसे यह कैसे कह दिया था?
माँ को नहीं बताया, बताने पर नाराज़ तो नही होंगी, पर यह जरुर कहेंगी कि आजकल बच्चे अपने माता-पिता से अधिक खुले होते हैं इसीलिए आसानी से उन पर अपना आक्रोश प्रकट कर देते हैं।
माँ भी कोई बहुत उदार विचारों की नहीं हैं, आजकल के बच्चों के life style पर उनकी टिप्पणियाँ सुनने को मिलती रहती है। पिछले दो वर्षो से माँ और मेरे बीच अच्छी तरह बातचीत हो पाती है, उससे पहले तो मात्र बहस ही होती थी। यूँ तो मैं बचपन से ही माँ से ही जिद करता था और उनके न मानने पर गुस्सा करता व रूठता भी था। पर हम माँ- बेटे के बीच यह सब इतना स्वाभाविक था कि हमें कभी लगा नहीं कि मेरे व्यवहार में कोई त्रुटि है।

लेकिन जब मैं 15-16 वर्ष का हुआ तो मेरी माँ एक जासूस माँ बन गई थी। ऊपर से उदार दिखती ,पर चोरी- छिपे मेरी पूरी खोज-बीन रखती थी, इसी कारण मेरी उनसे झिकझिक हो जाती थी। अब तो हँसी भी आती है, यह माता-पिता भी कितने डरे रहते हैं!

माँ को भी हर समय डर रहता कि मैं किसी गलत रास्ते में न पङ जाऊँ। टी. वी. सीरियल व अन्य कार्यक्रमों में वह जो भी देखती उसका प्रभाव मेरे प्रति उनके व्यवहार में प्रकट होने लगता था। मेरी अनुपस्थिति में वह मेरे सामान की तलाशी लेती थी। मेरे दोस्तों पर कङी निगरानी रखती थी ।जब मैं काॅलेज जाने लगा तब मेरी माँ मेरे नए मित्रों से इतने प्रश्न करती कि वे मेरे घर आने से कतराते थे। विशेष तौर पर लङकियों से मेरी दोस्ती उनके लिए सबसे बङी परेशानी का सबब होता था। बचपन से हम लङकियों के साथ पढ़ रहें थे , वे भी हमारी मित्र होती थी, सब कुछ माँ जानती थी, फिर भी उन्हें घबराहट रहती थी। मेरी हर नई लङकी से दोस्ती पर वह अपनी पैनी नज़र रखने लगी थी । वह हर लङकी को मेरी गर्लफ्रेंड बना देती थी और उन्हें लगता कि मेरा उससे सभी तरह का रिश्ता बन गया है। एक दिन मुझे बहुत गुस्सा आया जब मैं अपने मित्र निलेश की बहन रिया से बात कर रहा था और माँ ने देखा तो मुझ से उनका सवाल था, ” क्या रिया भी तेरी गर्लफ्रेंड है?” मुझे बहुत गुस्सा आया था।
और मैंने बहुत दुःख से कहा था कि ” आप मेरे चरित्र को गिरा हुआ समझती हो कि मैं हर लङकी को अपनी गर्लफ्रेंड बना लेता हुँ।”
फिर दीदी ने मुझे समझाया था कि” माँ को फ्रेंड और गर्लफ्रेंड में अंतर नहीं पता है।”
मैं आश्चर्यमिश्रित निगाहों से दीदी को देख रहा था।
” माँ युनिवर्सिटी में पढ़ी हैं।लङके-लङकियाँ साथ पढ़ते थे। ऐसा कैसे हो सकता है कि वह लङके और लङकी की मित्रता नहीं समझती हो।”

मेरे मन में आए सवाल का जवाब दीदी ने तुरंत दिया,” हमारे माता-पिता के समय में यह कहा जाता था और जिसे वह आज भी सच समझते हैं, कि ‘लङका- लङकी कभी दोस्त नहीं हो सकते हैं।’
“उनके विचार से उनका आपसी रिश्ता सिर्फ आकर्षण का होता है, इसीलिए अगर उनमें गहरी दोस्ती है तो वह प्रेमी-प्रेमिका ही होते है।”
दीदी की बात सुनते ही मेरे मुहँ से निकला, ” क्या बकवास है? पर अब जब ये बङे लोग अनुभवी हो चुके है, तब भी इसी धारणा को सच मानते हैं? माँ से तो मैं यह उम्मीद नहीं कर सकता था ।”

दीदी बोली,”माँ के समय भी अधिकांश लङकियाँ लङकों से कम बात करती थी, ग्रुप में लङके- लङकी होते पर गहरी दोस्ती उसी से होती जिसके साथ वाकई प्रेम होता या यूँ कहुँ कि गहरी दोस्ती का अर्थ- अंत में उनका विवाह होना ही चाहिए।” दीदी सोशयोलोजी में तब एम.ए कर रही थी, इसीलिए वह अपने समाजशास्त्र के ज्ञान को अच्छी तरह परखती रहती थी।
अपनी बात आगे बढ़ाते हुए और थोङा हँसते हुए बोली, ” यह जो आजकल फिल्मों में दिखाते है कि गर्ल फ्रेंड और बाॅय फ्रेंड मिले और उनके बीच रिश्ता हर सीमा पार कर गया है। उसे ही लेकर ये लोग अपने बच्चों के लिए भयभीत होते हैं।”
मैं सुनते ही पहले तो हँसते-हँसते लोट-पोट हो गया, फिर गुस्सा आया कि,” माँ क्या सोचती है? मेरे बारे में उन्हें यह डर सताता है ? फिर यह तो हम लङके- लङकियों पर अत्याचार है। मैं अभी सिर्फ बी.ए. द्वितीय वर्ष में ही हुँ।”
फिर दीदी से पुछा,” क्या तुम्हारे लिए भी ऐसा सोचती हैं? या अपनी लङकी शरीफ और दूसरी के चरित्र को कुछ भी कह दो, मेरी माँ का यह नारीवाद है?, इतना थोथा! जो डर मेरे लिए लगा वह तुम्हारे लिए नहीं लगा?”
दीदी ने जो जवाब दिया उस पर मैं हैरान था और वाकई तब नहीं समझा था पर धीरे-धीरे अब समझ चूका हुँ।

दीदी ने कहा,” मै जैसे-जैसे बङी होती गई वह मेरी दोस्त बनती गई और खुलकर हर बात समझाती थी, दुनिया का सच्चा और कङवा स्वरूप भी और साथ ही उसका विश्वसनीय रुप भी बताती थी। मैं उनसे अपनी सब बातें करती हुँ, अपने दोस्तों( लङका व लङकी ) के बारे में बताती हुँ, हम चर्चा करते हैं, हमारे विचार कई बार मेल नहीं खाते….। पर बात करने के कारण हमारे बीच कोई गलतफहमी नहीं होती है।”
” इन माता-पिता को अपने बेटो के लिए एक अन्य चिन्ता यह भी होती है कि उनका बेटा किसी नशे की आदत का शिकार न हो जाए जैसे ड्रग्स, सिगरेट, शराब आदि। लङकों की संगत पर अधिक निगरानी रखी जाती हैं, लङकियों के लिए ऐसी चिन्ताएँ कम होती हैं ।”

अब मेरा अगला प्रश्न या बैचेनी भरी उलझन,” पर जब मैं बङा होता गया माँ मेरी दोस्त क्यों नहीं बनी, क्यों हर बात खुल कर नहीं समझाई, दुनिया तो जैसी लङकियों के लिए बुरी वैसे लङकों के लिए भी, वह तो जैसे मुझ पर सिर्फ शक करती है और यह तकलीफदायक है।”
दीदी ने कहा,” कारण सिर्फ इतना कि कभी लङकों से दोस्तों की तरह बात नहीं करी तो बात करनी आती नहीं है। बेशक उनके पुत्र हो पर हो तो पुरूष ही न! झिझक की दीवार बीच में बनी रहती है। वह तुमसे बात करना चाहती हैं पर कर नहीं पाती है और यही उलझन तुम दोनों के बीच उलझाव पैदा करती है।”
मैंने फिर कुछ खीझते हुए कहा,” अब इस दीवार और उलझाव का क्या करें?”
दीदी बोली, ” मैं बनती हुँ तुम दोनो के बीच एक कङी और तुम भी कोशिश करना, उनसे लङना बंद करो और बात करो अगर तुम्हें लगता है कि तुम बङे हो गए हो। वैसे भी तुम तो दावा करते हो कि तुम माँ को समझते हो।”
“मैं तुम दोनो को एक कहानी पढ़ने के लिए दूँगी, किसी ने अपने ब्लाॅग में भेजी है। कहानी का नाम है ‘किशोर माँ’। ऐसा लगता है कि जैसे तुम दोनो माँ- बेटे की कहानी हो। किशोर वय का बेटा जो अपने अंदर के बदलाव से परेशान, कुछ उलझा हुआ और अपने को बहुत समझदार मानता है। माँ उसे बच्चा माने यह बात उसे नापसंद है।और उसकी माँ उससे भी अधिक परेशान, दुनिया भर के मिथ उसे सच लगते हैं, अपने किशोर बेटे के हाथ से निकल जाने का डर….। माँ- बेटे के बीच की टकराहट घर की शांति भग करने लगती है।
यह कहानी जरूर इस स्थिति में तुम दोनो की भूमिका स्पष्ट करेगी।”

इन सब कोशिशों के बाद भी थोङा समय लगा पर धीरे-धीरे मेरे बङे होने के साथ माँ से मैं खुल कर बात कर लेता हुँ। उनके मन के भय भी दूर हो गए हैं । यूँ मैं दीदी को छेङता रहता हुँ ,” तुम सब कुछ तो माँ को नहीं बताती हो।”

माँ ने आज की पीढ़ी को समझना चाहा है, ऐसा नहीं कि वह हमारी पीढ़ी के प्रत्येक बदलाव से सहमत हो, पर वह हमें समझना चाहती हैं और जब हम चर्चा करते हैं तो हम भी उनकी पीढ़ी को समझने का प्रयास करते हैं।
पर पापा में जिद है, वह नए विचारों का स्वागत भी नहीं करते है। वह अपने समय के परिवर्तित विचारों को समझ नहीं पाए थे तो हमारी पीढ़ी को कैसे समझ पाएँगे। हमें ही उन्हें समझना होगा। ( यह भी दीदी ने समझाया है)

यूँ भी पापा ने मुझ पर अविश्वास नहीं दिखाया था, जब मैंने काॅलेज जाना शुरू किया तब भी उनका व्यवहार सामान्य रहा था। शायद इसलिए कि हम कम मिलते थे। मेरे कुछ मित्रों के तो पिता ही बहुत सख्त और शक्की थे और कुछ मित्रों के माता- पिता दोनो ने ही जीना मुश्किल कर दिया था। जैसे हम बङे ही बिगङने के लिए हुए हैं।

पापा को तो नाराज़गी थी कि मैं बी. एफ.ए. कर रहा हुँ। मैं जब भी उनसे मिलता वह मुझे यही समझाने की कोशिश करते कि कला में अपना जीवन समर्पित करना मेरी सबसे बङी भूल है। मेरे मित्रों पर या मेरी जीवन शैली पर वह कभी बात नहीं करते थे।
मैंने कभी उन्हें अपने मित्रों से नहीं मिलाया हैं ।अंदर यह भय है कि वह मेरे मित्रों को पसंद नहीं करेंगे। मुझे याद है कि दीदी पर कितनी बुरी बीती थी जब दीदी अपने मित्रों के साथ पापा के पास गई थी।
दीदी के बारहवीं के रिजल्ट की खुशी में पापा ने घर पर एक छोटी-सी पार्टी रखी थी व दीदी को अपने सभी मित्रों को निमंत्रित करने को कहा था। पापा ने तो सहेलियों शब्द का प्रयोग किया था पर दीदी ने अपने सभी मित्रों(लङके व लङकियों) को निमंत्रित कर लिया था।

माँ ने थोङा आगाह भी किया था कि लङको को पापा के पास न लेकर जाए। पर दीदी ने कहा, ” हमारा पूरा ग्रुप है, ऐसा मैं नहीं कर सकती हुँ। फिर पापा जानते हैं कि लङके भी हमारे साथ पढ़ते हैं, तो वे भी हमारे दोस्त हुए ।”

दीदी के मन में माँ के लिए तब भी घर छोङने की नाराज़गी शेष थी। बिना कहे वह अपनी मुखमुद्रा से अपना यह दर्द ज़ाहिर कर देती थी।पता नहीं क्यों दीदी को वे सब बातें याद नहीं है जो मैने महसूस की थी, जबकि दीदी मुझ से बङी थी। दीदी को यही लगता था कि माँ ने घर छोङने में जल्दी की थी, उन्होंने हमारे बारे मे नहीं सोचा, सिर्फ अपने लिए सोचा और हमसे हमारा घर छूट गया था।

अतः माँ ने दीदी को तो फिर कुछ नहीं समझाया पर बुआ को इस स्थिति से अवगत करा दिया था। माँ ने अपने ससुराल के रिश्तों से नाता पूर्णतः तोङा नहीं था , बुआ से तो उनका विशेष स्नेह था।
पार्टी के दिन पापा बहुत खुश थे और चूंकि बुआ ने पहले ही उनसे सब स्थिति स्पष्ट कर दी थी अतः उन्होने दीदी के सभी दोस्तों का खुशी-खुशी स्वागत किया था। लेकिन दीदी को अपने मित्रों के साथ हँसते-बोलते देख उनका गुस्सा बढ़ने लगा था। फिर जिस तरह उन्होंने दीदी को घूर कर देखा तो दीदी पूर्णतः काँप गई थी। कुछ ही देर में सभी को पापा के बदलते व्यवहार को समझने में देर नहीं लगी थी।

पार्टी के खुशनुमा वातावरण में बदली छा गई थी। हम पार्टी से उस दिन वापिस आ गए थे जबकि हम वहाँ रुकने के इरादे से गए थे। दीदी तो बहुत दुखी थी और मुझे बहुत डर लग रहा था, बहुत दिनों बाद लगा, माँ को भी हमारे साथ होना चाहिए था।

जब शुरू में हम पापा से मिलने आते थे और रात उनके साथ बिताते थे तब…… पापा बहुत खुश हो कर हमसे नहीं मिलते थे और रात को तो गुस्से में चीखते- चिल्लाते, माँ के लिए अनाप-शनाप बकते, हम दोनों डरकर एक-दूसरे का हाथ पकङकर सोने का नाटक करते थे।

मैंने ही शायद एक दिन माँ को सब बताया था, नहीं, मुझे याद है, दीदी ने मुझे माँ को कुछ भी बताने से मना किया था।( दीदी के विचार से ये सब माँ के कारण हो रहा है।) पर एक दिन जब पापा के पास से हम लौटे तो मैं बहुत डरा हुआ था और मुझे बुखार आ रहा था। माँ ने बहुत प्यार से कुछ पुछा और मेरे मुँह से थोङा सा वह भेद निकल गया था।माँ ने मेरे दो शब्दों से पूरी कहानी समझ ली थी। फिर मुझे याद है कि पापा मुझ से मिलने आए थे और वायदा किया था, अब वह हमें कभी नहीं डराँएगे। बाद में पता चला था कि दादी ने भी उनसे कहा, ” बीबी तो छोङ कर चली गई है,अब बच्चे भी खोना चाहता है?”

उसके बाद पार्टी के दिन फिर वही डर जागा था। बुआ ने समझ कर चाचा के साथ हमें घर भेज दिया था। घर आने पर हमेशा की तरह हमने माँ को कुछ नहीं बताया था पर माँ के चेहरे पर बहुत उदासी थी। उन्होंने बहुत बाद में बताया था कि फिर उस दिन पापा का फोन उनके पास आया था कि “माँ ने दीदी को बिगाङ दिया है।”

इस घटना के बाद दीदी ने माँ को समझना शुरू किया था। मेरे साथ पापा की कोई ऐसी बात नहीं हुई है, फिर भी मैंने उन्हे नाराज़ कर दिया था।

दायरे सोच के

(प्रथम अध्याय – करण)

– किरकिराता सुख –

आज दुष्यंत नाराज़ हो कर गया है। अब वह मुझसे मिलने बहुत कम ही आ पाता है। जब वह छोटा था तब मैं उससे व विचित्रा से प्रत्येक शनिवार- रविवार को मिलता था। नैना से अलग होने के बाद मैं बच्चों से इसी तरह मिलता था। अब बच्चे बङे हो गए है तो अपनी सुविधानुसार वह स्वयं मुझसे मिलने आ जाते हैं। विचित्रा तो सप्ताह में एक बार आ ही जाती है। दुष्यंत मनमौजी है, और उसका काम भी ऐसा है इसीलिए कभी तो सप्ताह में दो-तीन बार आ जाता है और कभी दो-दो महीने उसकी शक्ल नही दिखती है। पर फोन पर उससे बात होती रहती हैं।

यूँ तो मैं अपने अतीत को अक्सर ही खंगाल लेता हुँ। पर इस बार दुष्यंत के शब्द मेरे कानों में बज रहे हैं और दिमाग बार-बार अतीत का विशलेषण कर रहा है।

उसका कहना था,” आप और माँ बहुत अलग हो और आप तो कुछ समझना ही नहीं चाहते हो।” सिर दर्द होने लगता है। अतीत आँखों के सामने घूम रहा है और मैं दृष्टा बना सब देखने लगा हुँ।-
हमारे बीच प्रेम नहीं हुआ, यूँ तो न तो वह प्रेम के बारे में जानती थी, न मै ही जानता था। वह मुझे अच्छी लगी थी, इसीलिए हमारा विवाह हुआ था, उसे मैं अच्छा लगा या नहीं मुझे आज तक पता नहीं, अरेंज मैरिज़ में शायद यही होता है। जो भी हो शादी के आरंभ के दिन हमने एक दूसरे के प्रति प्रेम अभिव्यक्त करने की कोशिश में बिताए। पर जल्दी ही हम सिर्फ एक-दूसरे के साथ रहने की समस्त रस्में निभा रहें थे और इस तरह सभी रस्मों को निभाते हुए हमारे बच्चें हुए, वह और मैं बच्चों की परवरिश करने में लग गए। अब मैं उसे उतना पसंद नहीं करता था, वह भी….। उसे मुझ से जो उम्मीद थी वो मैं पूरी नहीं कर रहा था, वह भी….। पर ज़िन्दगी आराम से चल रही थी। मैं ऑफिस जाता, वह घर व बच्चों की देखभाल करती। हम विवाहित जीवन के सभी धर्म निभाते। कभी हमारे घर कोई मेहमान आता तो वह हमारे तालमेल की प्रशंसा करता। हमें अच्छा लगता। मैने उसे कभी नही कहा कि अब वह मुझे अच्छी नहीं लगती, उसने भी नही कहा…। हमारा परम धर्म सिर्फ बच्चों की परवरिश था, इसीलिए एक दूसरे के लिए किसी भी भावना पर ध्यान भी नहीं था।

मैं अब उसे पसंद नहीं करता यह भी मन के किसी कोने में बंद था। उसके साज-श्रंगार पर भी मेरा ध्यान नहीं जाता था। उसके प्रति एक निर्विकार और निर्लिप्तता थी। ऐसा नहीं कि मेरे अंदर का रोमांसिज्म खत्म हो गया था। दूसरी औरतों और लङकियों के प्रति अभी भी मेरे अंदर कुआँरे व लङकपन वाले भाव उल्लसित होते थे। मैं बहुत इत्मीनान से बेख्याली की ज़िन्दगी जी रहा था। मुझे लगता था कि मैं अपने परिवार के प्रति समस्त जिम्मेदारी और कर्तव्य बखूबी पूरे कर रहा हुँ। मैं उसे पसंद नहीं करता पर मुझे उसकी आदत थी। मैं किसी ओर के हाथ का खाना क्या चाय भी पसंद नहीं करता था, वह मेरी पसंद जानती थी। वह मेरी सारी जरुरतें समझते हुए उन्हें खुशी खुशी पूरा करती थी। मुझे उससे कोई शिकायत नहीं थी। मैं ऐसा ख्याल उसके लिए भी रखता था। मुझे कोई भी वजह नही नज़र आती थी कि उसे मुझ से शिकायत है ।

लेकिन एक दिन मेरी बेख्याली ज़िन्दगी में उसने खलल डाल दिया, उसने बताया कि उसने शहर के एक प्रतिष्ठित कला विद्यालय में नौकरी ले ली हैं और अगले दिन से उसे जाना है। पहले तो मैं भौचक्का रह गया फिर गुस्सा आया कि वह नौकरी करना चाहती है। और अब नौकरी शुरू भी करने जा रही है।
उसने कहा, ” आप, मेरी बात पर ध्यान ही कहाँ देते हो? मैंने आप को इस विद्यालय का अखबार में आए विज्ञापन के बारे में बताया था।”
आगे बोली,” मैंने शादी से पहले भी कहा था कि मैं काम करना चाहुँगी, अभी तक बच्चे बहुत छोटे थे और उन्हें संभालने वाला कोई नहीं है। पर अब मैं काम कर सकती हुँ।”
मैं अभी अपने पति होने के दंभ से भरा था। पर जानता था, वह सही कह रही है। और लगा कि अभी तक गृहस्थी की जो व्यवस्था चल रही है वो गङमङा जाएगी।

अभी तक मैं घर से बाहर काम पर जाता था तो निश्चित होता था कि घर व बच्चों को संभालने के लिए वो है। ऑफिस जाने से पहले इत्मीनान से तैयार होता, नाशता इत्यादि सब तैयार मिलता था, ऑफिस से लौट कर भी आराम था, मैं तो एक गिलास पानी भी भरकर नहीं पीता था।
और जैसा मैं जानता हुँ कि ये औरतें घर से बाहर अपनी स्वतंत्रता ढूँढती है, यह भी जब दूसरी आत्म निर्भर स्त्रियों से मिलेगी तो इसके व्यवहार में भी बदलाव आएगा। मुझे लग रहा था कि घर की शांति खत्म हो सकती है।
मैंने सोचा कि उसे समझाऊँ, परंतु उसके चेहरे पर दृढ़ता और आत्मविश्वास झलक रहा था। मेरे प्रति भी उसमें गहरा विश्वास नज़र आ रहा था उसे दूर-दूर तक अंदेशा नहीं था कि मैं विरोध कर सकता हुँ। पर अपना पतित्व निभाते हुए मैंने इतना तो आदेशात्मक स्वर में कह ही दिया कि-
” घर की व्यवस्था में कोई फर्क नहीं पङना चाहिए।मुझ से किसी सहयोग की अपेक्षा मत रखना।”
उसने कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की, सिर्फ मुस्करा दी शायद मेरे से उसे यह भी उम्मीद थी। अगले दिन मैने देखा उसने अपने सहयोग के लिए एक कामवाली बाई रख ली है।
धीरे-धीरे उसने घर व नौकरी सुचारू रुप से संभाल ली थी। वह प्रसन्न रहती थी, मै हैरान था कि बच्चे भी प्रसन्न थे। सिर्फ मैं ही परेशान व चिङचिङा रहता था। उसका यह स्वंतत्र व स्वावलंबी स्वरुप मेरे दिल पर बरछियाँ चलाता था। जहाँ वह मेरे ध्यान में कभी नहीं होती थी, अब मैं हर समय उसी के विषय में सोचता था।
वह सुबह तैयार होती तो मैं ध्यान देता कि उसने क्या पहना और कैसा मेकअप किया है। उसका स्मार्ट और सुंदर दिखना मुझे परेशान करता जबकि स्वभावतः वह सिम्पल रहना पसंद करती थी तो उसका मेकअप और पहनावा बहुत सामान्य व स्वाभाविक होता था, फिर भी मैं उसे टोक देता और अपनी खीझ प्रकट करने में बिलकुल नहीं हिचकिचाता था।
मुझे स्वयं समझ नहीं आ रहा था कि मुझे क्या हो रहा है?

पहले शायद ही मैंने उसके कार्य में रूचि दिखाई थी। वह अपनी कलात्मक रुचि और शिक्षा का अनुसरण करते हुए घर की साज-सज्जा करती थी, जिसकी प्रशंसा मन में करते हुए भी मैं यही मानता कि यह उसका कर्तव्य है, साथ ही कलात्मक वस्तुओं के निर्माण में उसकी फिजुलखर्ची पर चेतावनी भी देता था। पहले मैं ऑफिस से आकर, टी.वी. देखता उससे औपचारिक बातें करता और रात के खाने के बाद सैर करने जाता वह कभी मेरे साथ नही होती थी, बाहर पङोसी मित्रों से मिलता उनसे दुनियावी बातें करता और घर आकर सो जाता था।
पर अब मैं उससे बात करना चाहता था, इसलिए नहीं कि मैं उसमें और उसके कार्य मैं रुचि लेने लगा था। नहीं, मेरी दिलचस्पी सिर्फ इतनी थी कि वह अपने कार्य स्थल में किससे मिलती है और पुरुष सहकर्मियों के साथ कैसा व्यवहार है? वह भी बिना संकोच और खुल कर सहजता से बताती व मेरे से सलाह भी लेती । मैं यह जताता कि वह पहली बार घर से बाहर निकली है अतः नही जानती कि दुनिया कितनी खराब है? सिर्फ पुरुष ही नहीं अपितु महिलाएँ भी कितनी चालाक होती है।वह पूर्णतः मुझ से सहमत न होते हुए भी मेरे अनुभव का सम्मान करती, मैं भी अपने अनुभवों की कहानियों में सच्चाई कम व मिर्च-मसाले ज्यादा लगाता था। कभी ऐसा लगता कि वह किसी विशेष स्त्री या पुरुष के साथ अधिक जुङ रही है तो मैं यह प्रमाणित करने की कोशिश करता कि वह विशेष एक ध्रुत प्राणी है जो उसके भोलेपन का लाभ उठाना चाहता है।
लेकिन कुछ समय बाद मैने उसमें बदलाव महसूस किया, अब वह मुझ से अपने सहकर्मियों और कार्य के बारे में कम बात करती थी। मेरे कुछ पूछने पर वह संक्षिप्त जवाब देती थी ।उसे काम करते हुए एक वर्ष से ऊपर हो गया था और मेरी चिङचिङाहट और दोगलेपन को भी….।

जी हाँ, दोगलापन…. मैं जो अपने को उच्च शिक्षित और आधुनिक मानता था, आज अपनी पत्नी के नौकरी करने पर बौखलाया हुआ था। उसे सहयोग व प्रोत्साहित करने के स्थान पर, उसके काम में बाधा उत्पन्न करने व निरुत्साहित करने से नहीं चूकता था।

इसीलिए उसमें यह बदलाव था, मैं सब जानता समझता था पर अपने अहंकार को कम नहीं कर सकता था। ऐसा नहीं कि उससे मेरा व्यवहार अनदेखा व अनसमझा हो। उसने शांति से बात करने की कोशिश की, कई बार अपना विरोध प्रकट भी किया, मुझे आगाह किया कि मेरा व्यवहार बच्चों पर गलत प्रभाव डाल रहा है। पर मैं उसे ही दोषी ठहराता व समझाता कि वह नौकरी छोङ दे तो फिर सब पहले जैसा होगा। पर उसने स्पष्ट कहा कि यह असंभव है
अभी तक हम शांति से साथ रह रहे थे, मैं विश्वास के साथ कह सकता हुँ कि हम साथ सिर्फ निभाने के लिए नहीं रह रहे थे अपितु खुशी-खुशी और अपने सभी दायित्वों को सहजता से पूर्ण करते हुए रह रहे थे। हमारे ह्रदय में एक -दूसरे के लिए प्रेम था या नहीं कुछ कहा नहीं जा सकता पर हमारे दिल में अपने रिश्तें का सम्मान था, इस विवाहित जीवन पर पूर्ण निष्ठा थी।
लेकिन अब मैं महसूस कर रहा था कि रिश्ते के जिस सम्मान के धागे ने हमें जोङा हुआ था,उसके कसाव में ढील आ रही है। मैं यह भी देख रहा था कि विवाहित जीवन पर हमारी निष्ठा भी बिखरी जा रही है।
और मेरी अशिष्टता बढ़ती ही जा रही थी, मैं भूल रहा था कि मेरा अंहकार मेरी सभी मर्यादित सीमाएँ तोङ रहा है। और उस रात की अगली सुबह….। मैं जानता था कि मुझे शर्मिंदा होना चाहिए पर मैंने बेशरमी की चादर ओढ़ी हुई थी। सोचता हुँ कि क्यों नहीं जान पा रहा था? मेरे अपने हाथों मेरी बगिया उजङ रही थी ।

कुछ समझता कि वह मेरे सामने थी। बिलकुल शांत, निश्चल, दृढ़ और शक्तिवान। उसने कहा कि वह कुछ बताना चाहती है। मैंने सोचा अब इसका सच सामने आएगा। यह भी कि इसे अपनी गलती समझ आ गई है और अब यह नौकरी भी छोङ देगी, फिर घर पहले जैसा हो जाएगा। मन में जो थोङा बहुत अपराधबोध था वह भी खत्म हो गया, अपना किया सब जायज नजर आने लगा था। लेकिन मैं कितना बङा मुर्ख! जान ही नहीं पाया कि ……। अब बाँध टूट चूका है। मेरा घर, मेरा सुख दरिया में बहने जा रहा है। मैंने स्वयं बाँध में सुराख किए थे।

वह बोल रही थी और मेरी समझ में कोई बात नहीं आ रही थी, सब कुछ सिर पर से निकल रहा था। वह अपने सम्मान की बात कर रही थी जो उसे मुझ से नहीं मिला था। वह मेरे द्वारा दिए उन अपमान के घुँटों की बात कर रही थी जो उसने घर की खुशी के लिए पिए थे।

मैं बेशक उच्च शिक्षित था, आधुनिक था पर मेरी सोच पर समाज के पारंपरिक संस्कार हावी थे इसीलिए मैं यही जानता था कि मेरा उसके प्रति जो भी व्यवहार रहा है जिसे वह अपने मान- अपमान के साथ जोङ रही थी वह एक पति का अधिकार था। फिर मैंने कभी हिंसा की सोची भी नही है,दुनिया के पति तो क्या नहीं करते…।

अंत में उसने बहुत सहजता से कहा वह दोनो बच्चों के साथ जा रही है। बच्चों को वह दूसरों का सम्मान करना सिखाना चाहती है।सिर्फ बच्चों को उच्च शिक्षा नहीं देनी हैं, उच्च संस्कार भी देने है। आधुनिक वस्त्रों और आधुनिक तकनीकि की जानकारी मात्र से कोई आधुनिक नही हो जाता है, सोच भी व्यावहारिक रुप में बदलनी होती है। हाँ, व्यवहारिक रुप से क्योंकि आपकी सोच आपके व्यवहार के धरातल पर सटीक उतरनी चाहिए।

वह चली गई, मैं कई दिन अपमान और गुस्से की आग में झुलसता रहा था। सभी मेरे को तिरस्कार की दृष्टि से देख रहे थे, मेरे दोस्त ही नहीं मेरी माँ और मेरी बहन भी …. अपितु नाराज़ भी थे। पर मेरे पिता ! जिनके संस्कार मुझे विरासत में मिले थे, जबकि मैं तो यह मानता था कि मैं उनसे अच्छा पति हुँ, उन्होनें भी अपनी बहु का पक्ष लेते हुए स्त्री सम्मान पर मुझे भाषण दिया ।
बच्चों को एक घर देने का अहसास करते हुए मैं उससे समझौता करने और एक पति की जिम्मेदारी की तहत उसे वापिस लाने पहुँचा था। पर मैं समाज के इस बदलते हुए स्वरुप को और स्त्री में आई प्रगति को कहाँ समझ पा रहा था।

कई वर्ष बीत गए अकेले रहते हुए, बच्चों से मिलता हुँ वे मेरा आदर करते हुए मेरा मान बनाए रखते हैं क्योंकि उन्होंने दूसरों का सम्मान करना सीखा है। मैं ही उनके आगे अपने को बौना महसूस करता हुँ।
बच्चे बङे हो गए है, दोनों ने अपनी पसंद का कार्य चुना है। विचित्रा काॅलेज में लेक्चरार है। अपनी माँ की तरह स्पष्ट सोच की स्वामिनी है। मुझ से कुछ दूरी बनाए रखते हुए भी, मेरी चिन्ता व देखभाल के प्रति कर्तव्यनिष्ठ है।
दुष्यन्त बचपन से ही शरारती व बातुनी है। वह अपनी माँ की तरह कला प्रेमी है। मेरी सोच आज भी यही है कि यह सब कला इत्यादि शौक के लिए तो ठीक है पर आजीविका….।लङकियाँ इसे आजीविका बना सकती है, पर लङकों के लिए, यह सब अज़ीब है, मैंने उसे कहा था कि डाक्टर, इंजीनियर न सही, पर वकील, आई.ए.एस अधिकारी अथवा किसी बैंक का उच्चाधिकारी तो बन ही सकता था। वह अपना समय चित्रकारी, फोटोग्राफी करने व उनकी प्रदर्शनी करने में बिताता है।

कितनी बहस की थी उसने उससे जब वह उसे कोई अच्छी नौकरी करने की सलाह दे रहा था।23 वर्ष का हो रहा है,मैंने उसे एम.बी.ए करने के लिए जोर दिया था। तब बोला,” पापा, आप कैसी बात कर रहें है, आप जानते हैं कि मैंने ललित कला से स्नातक की डिग्री ली है।”
” फ्रांस की एक युनिवर्सिटी से कला क्षेत्र में ही आगे पढ़ाई करना चाहता हुँ। बैंक से शिक्षा के लिए कर्ज़ मिल जाता है पर कुछ अपने पास से भी देना होता है। मैं इसीलिए आपके पास आया था, पर आप तो….।”
मैं कभी उस पर गुस्सा नहीं करता पर उस समय न जाने क्या हुआ? “बेटा भी नैना के पदचिन्हों पर ही चलेगा।”
यह ख्याल मन में आते ही मैं उबल पङा और बोला,” यह सब तुम्हारी माँ के कारण है, वह तुम्हें मनमानी करने से रोकती नहीं, स्वयं उसने पूरा जीवन मनमानी की है और तुम दोनो को भी यही सिखाया है। मेरे पास रहते तो कभी मैं तुम्हें इस दिशा में जाने नहीं देता।”

मेरी बात से दुखी हो दुष्यन्त बोला,” पापा, आज तक नहीं समझा था कि हम साथ क्यों नहीं रहते, कभी आपसे और माँ से जानने की कोशिश भी नही की थी। यही सोचा यह आप दोनो का मामला है। आप दोनो से भरपूर प्यार मिल रहा था। पर आज सब समझ आ रहा है। आप दोनो बहुत अलग हो। आप तो कुछ समझना ही नहीं चाहते हो।।”

दुष्यन्त नाराज़ हो कर चला गया।और मैं यही सोचता रहा कि क्या वाकई मै गलत हुँ।

क्रमशः

सीखने-सिखाने की कोशिश- (भाग-12)

रहिमन मनहि लगाईं कै, देखि लेहू किन कोय।
नर को बस करिबो कहा, नारायन बस होय।

सामान्यतः हम उन बच्चों को प्रतिभाशाली कहते हैं, जो किसी भी विशेष क्षेत्र में सर्वोतत्म कार्य कर दिखाते हैं, हम उनके लिए तालियाँ बजाते हैं, उनके नाम अखबार और मीडिया में प्रसिद्ध होते हैं।
मेरे विचार से तो सभी बच्चे प्रतिभाशाली हैं। पिछले दिनों एक माँ ने मीडिया में एक पोस्ट डाली थी। उसके बेटे ने बारहवीं कक्षा में 60% अंक प्राप्त किए थे, वह अपने बेटे पर गर्व महसूस कर रही थी। एक माँ से अधिक कौन अपने बच्चे की प्रतिभा को पहचान सकता है? उस माँ ने यह कहने का प्रयास किया है कि सिर्फ 90%-100% अंक प्राप्त करने वाले विद्यार्थी ही प्रतिभाशाली नही होते है। यह सिर्फ आपके दिमाग में उपस्थित नंबरों का खेल है।

प्रत्येक विद्यार्थी जो मेहनत करता है, पुरज़ोर कोशिश करता है, वह प्रतिभाशाली है, सफलता असफलता के साथ प्रतिभा को नही जोङा जा सकता है। सीखने की इच्छा और आगे बढ़ने की निरंतर कोशिश प्रतिभा परखने के मापदंड हो सकते हैं।

चींटी कितनी बार चढ़ी और कितनी बार गिरी यह महत्वपूर्ण नहीं है, महत्वपूर्ण यह है कि उसने हार नहीं मानी और कोशिश बकरार रखी।

वे बच्चे जिनकी परिस्थितियाँ विकट होती हैं, साधन व सुविधाएँ मामूली व न के बराबर होती है, वे भी सपने देखते हैं व कोशिश करते हैं और मेहनत करते हैं। महत्वपूर्ण यह नहीं कि वे कितने सफल होते हैं? सफलता के आंकङे से उनकी प्रतिभा को आंका नहीं जा सकता है। वे सपने देखते हैं, फिर उनकी मेहनत ही उनको प्रतिभाशाली बना देती हैं। वे अपनी परिस्थितियों व संघर्ष के लिए शिकायत नहीं करते हैं पर बदलाव के लिए निरंतर प्रयास करते हैं। इनकी यही प्रतिभा इन्हें भीङ से अलग खङा कर देती है।

नितिन, सीलु, महीप, प्रेमा और उसकी बहनें आदि, ऐसे कितने बच्चे हैं, जिनमें सीखने की इच्छा और जीवन में आगे बढ़ने का जज्बा कूट-कूट कर भरा होता है। ये वे बच्चे होते हैं, जो दूसरे के जीवन से अपने जीवन की तुलना नहीं करते हैं। अपने जीवन की सच्चाई को स्वीकार करते हुए उससे पूर्णतः संतुष्ट रहते हुए, अपने कठिन पथ पर आगे बढ़ते हैं।

प्रेमा के पिता मज़दूर है और माँ घर- घर जाकर लोगों के घर का काम करती हैं। इस वर्ग के पिता, समाज के सबसे नकारा व्यक्ति होते हैं। दिन- भर मज़दूरी करते हैं, फिर दिन भर की कमाई से शराब पीते हैं। इन्हें अपने परिवार की जिम्मेदारी का अहसास नहीं होता है।

इस वर्ग में माँ मेहनती और हिम्मतवाली होती है, और अपने बच्चों का जीवन सुंदर बनाने का सपना देखती हैं। प्रेमा की माँ ने भी अपनी चार बेटियों का जीवन उज्जवल करने का सपना देखा और बेटियों ने उसका साथ देते हुए उस सपने को पूर्ण किया था।

प्रेमा और उसकी बहनें सरकारी विद्यालय में पढ़ती थी, कई बार शाम को माँ की सहायता करने आती थी, ट्युशन पढ़ती और अपने घर का काम भी करती थी।
प्रेमा की बहन को स्कूल की हाॅकी टीम में चुना गया और पिता के विरोध के बाद भी माँ ने अपनी बेटी का दृढ़ता से साथ दिया था। अपने समाज के विरोध की चिन्ता न करते हुए अपनी बेटियों की शिक्षा पूर्ण करने के साथ, उनके अपने पाँव पर खङे होने के बाद ही उनका विवाह किया था।

ममता अपनी बेटी सीलु को स्कूल पढ़ने नहीं भेज सकी थी। सीलु का पिता शराबी नहीं था, घर की जिम्मेदारियों के प्रति सजग होते हुए भी, वह परंपरावादी था। वह अपनी बेटियों को स्कूल भेजना नहीं चाहता था। पर ममता ने अपनी बेटियों को शिक्षित करने की ठान रखी थी।

सीलु एक समाजसेवी संस्था के विद्यालय में पढ़ने जाती थी। पिता के विरोध के बावजूद ममता उसे स्वयं उस विद्यालय तक छोङने जाती थी।

सीलु भी जब समय होता अपनी माँ के साथ दूसरे घरों में काम करने आती थी। एक दिन ममता ने मुझ से कहा,” आप सीलु की पढ़ाई देखिएगा, इसके पापा कहते है,” तु इसे पढ़ने तो भेजती है, पर इसे कुछ आता नहीं है।” “पर सीलु परीक्षा में तो नंबर लाती है, इसकी अध्यापिका भी इसकी प्रशंसा करती है। यह तो घर पर भी बहुत पढ़ती है।”

एक दिन सीलु अपनी किताबें लेकर मेरे पास आई। मैंने उसे उसकी हिन्दी के पाठ पढ़ने को कहा, उसने पाठ बहुत अच्छी तरह पढ़ा था। उस पाठ के प्रश्नों के उत्तर भी रटे हुए तोते की तरह सुना दिए, फिर बिना देखे, लिख कर भी दिखा दिए। दीपावली का प्रस्ताव जैसा अध्यापिका ने लिखाया बिलकुल वैसा सुनाया भी और लिखकर भी दिखा दिया था, लिखाई बहुत साफ और एक भी शब्द गलत नहीं लिखा था।
इंगलिश में भी ‘My teacher’ पर दस लाइनें सही लिख कर दिखाई, पर पाठ नहीं पढ़ सकी थी। छोटे- छोटे शब्द पढ़ लेती थी।
सवाल भी सब आते थे, वह जमा, घटा गुणा और भाग भी बिना कठिनाई के करती थी।

फिर भी मेरे मन में कुछ शंका थी। मैंनै उसे हिन्दी के अखबार से कुछ पढ़ने को कहा, वह पढ़ नहीं सकी थी। अलग काॅपी में कुछ आसान शब्द लिखकर दिए, वह उन्हें भी नहीं पढ़ सकी थी। जिन पाठों को रटे हुए तोते की तरह पढ़ व लिख भी रही थी, उन्हीं पाठों के शब्दों को बीच- बीच में से पढ़ाने पर वह कठिनाई से कुछ शब्द ही पढ़ सकी थी। उसके अक्षर ज्ञान व मात्राओं की परीक्षा लेने पर उसने शतप्रतिशत सही उत्तर दिए थे। अब समझ नहीं आया कि फिर वह पढ़ क्यों नहीं सकती थी?

उसे अक्षरों व मात्राओं को स्वयं मिलाकर पढ़ना नहीं आ रहा था। यह उसकी विलक्षण प्रतिभा ही थी कि जब कक्षा में पाठ पढ़ कर सुनाया जाता था, तभी उसे पाठ कठंस्थ हो जाता था। उसके दिमाग में शब्दों के चित्र तो बनते थे, तभी वह लिख भी सकती थी, पर उन शब्दों का निर्माण कैसे हुआ, उसको जानने की कोशिश व इच्छा उसमें नहीं थी। वह मेहनत रटने में कर रही थी।

परंतु सीलु जैसे मेहनती बच्चे जब अपनी गलती समझ जाते हैं, तब वह सुधारने में भी पूर्ण लगन से कोशिश करते हैं। एक कठिनाई थी कि सीलु की भाषा साफ नहीं थी, ग्रामीण उच्चारण उसे नए शब्द सीखने में बाधा उत्पन्न कर रहा था ।अतः अंग्रेजी के शब्द सीखने में उसे अधिक कठिनाई आ रही थी। पर निरंतर अभ्यास व मेहनत से सीलु ने अपनी सभी कमियों में सफलता प्राप्त करी थी। मुझे किन्ही कारणों से उस मकान से शिफट होना पङा था। सीलु को छोङने का मुझे बहुत दुख था, वह भी परेशान थी कि उसकी पढ़ाई कैसे होगी?
पर मुझे विश्वास है कि वह हार मानने वालों में से नहीं है। अवश्य ही वह अपने सपने पूरे करेगी।

नितिन अपने माता-पिता व छोटे भाई नितिश के साथ गाँव से शहर आया था। नितिन के पिता ने शहर में माली का काम करना शुरू किया व माँ ने किसी के घर आया का काम ले लिया था। नितिन व नितिश दोनों का प्रवेश एक छोटे प्राइवेट स्कूल में करा दिया गया था। माता-पिता दोनो अल्प शिक्षित थे। नितिन के दूसरी कक्षा में प्रवेश करने पर उन्होंने उसे मेरे पास भेजना शुरू किया था।

प्रथम दिन नितिन आया और फर्श पर बैठ गया जबकि अन्य बच्चे कुर्सी पर बैठे थे। सब बच्चे हैरान- परेशान उसे नीचे बैठा देख रहे थे, वे सब समझ रहे थे कि वह अपने शौक से नीचे नहीं बैठा है, अपितु अपने को निम्न दर्जे का समझ कर उसने नीचे फर्श पर बैठना उचित समझा है।

मैंने उसे बुलाया और अपने पास कुर्सी पर बिठाया तो सभी बच्चो के चेहरे खिल गए और नितिन के चेहरे पर शर्मीली मुस्कान खिल गई थी।
इस बच्चे को उसकी परिस्थिति का इतनी अच्छी तरह ज्ञान कराया गया था कि वह कभी दूसरे बच्चों की कीमती रंगबिरंगी पेंसिल-रबङ इत्यादि वस्तुओं पर निगाह उठा कर भी नहीं देखता था। हमेशा अपनी वस्तुएँ ही प्रयोग में लाना पसंद करता था।

एक अन्य गुण उसमें था कि वह सिर्फ अपनी पढ़ाई पर ध्यान देता था। अन्य बातुनी बच्चे बातें करते, शैतान बच्चे एक-दूसरे को परेशान करते या आपस में लङते भी थे। पर वह किसी पर ध्यान नहीं देता था, न दूसरे ही उसे परेशान करते थे। पर सभी बच्चे उसे पसंद भी करते थे, चूंकि वह तटस्थ रहता और समय पर दूसरों की सहायता भी करता था। जब वह जरूरी समझता तब बातचीत में भाग भी लेता था विशेष रूप से जब मै कोई विषय समझा रही होती थी, वह अपनी शंकाएँ मेरे सामने निःसंकोच रखता था।

एक दिन हम तैराकी पर बात कर रहे थे। गर्मी की छुट्टियाँ शुरू हो गई थी और कुछ बच्चे तैराकी सीखना चाहते थे। इस बात पर चर्चा हो रही थी कि स्वीमिंग पुल का पानी साफ होना चाहिए व तैराकी एक व्यायाम भी है।
तभी मैंने नितिन को देखा, वह अपने काम में व्यस्त होते हुए भी, सबकी बातें ध्यान से सुनते हुए धीमे-धीमे मुस्करा रहा था।
मैंने उससे पूछा, ” तुम छुट्टियों में अपने गाँव जाओगे?”
वह बोला,” हाँ, इसीलिए छुट्टियों का काम जल्दी- जल्दी पूरा कर रहा हुँ।”
मैंने पुछा,” तुम्हें तैरना आता है?
मेरा जवाब उसने शर्माते हुए दिया, ” हाँ, मेरी नानी के गाँव के साथ ही नदी बहती है।”
उसकी बात सुनकर सभी बच्चे दंग थे। मैंने नितिन से कहा कि तुम सबको अपने तैराकी के अनुभव बताओ।

नितिन ने बताया,” मैं बहुत छोटा था जब मेरे मामा मुझे नदी पर ले जाते थे, उनके साथ ही हाथ- पैर चलाते हुए मै तैरना सीख गया था, उसके बाद जब भी मौका मिलता, मैं अपने मित्रों के साथ जरूर तैरने जाता हुँ।छुट्टियों में मुझे गाँव जाना अच्छा लगता है, हम सुबह जल्दी उठते हैं, खेतों में घूमने जाते हैं, नदी में तैरने जाते हैं।”
मानव ने पूछा, ” नदी का पानी साफ होता है?, गंदे पानी में बीमार पङ सकते हैं।”
नितिन ने कहा,” न मैं और न ही मेरे दोस्त कभी बीमार पङे हैं, मेरे दोस्त गाँव में ही रहते हैं, रोज ही तैरते हैं।”
खुशबु ने पुछा,” तुम तैरते हो तो क्या खाते हो? मैं जहाँ तैरने जाती हुँ, वहाँ डाइटिशियन ने मेरी मम्मी को बताया कि तैरना सीखने के लिए विशेष क्या- क्या खाना चाहिए।”
नीतिन बोला,” मैं तो कुछ विशेष नहीं खाता जो नानी और मम्मी खाना बनाती है, वही खाता हुँ। मम्मी और नानी को पता भी नहीं चला था कि मैं और मेरा छोटा भाई कब तैरना सीख गए।”
” इस मौसम में जो भी फल गाँव में लगते हैं, हम वही खाते हैं। गाँव में तो बहुत मजा आता है, हम पेङो पर भी चढ़ते है और दूर- दूर तक दौङ लगाते हैं।”
पहली बार नितिन इतना बोल रहा था और शहरी बच्चें बहुत ध्यान से उसकी बात सुन रहे थे।

नितिन को हर नया काम सीखने में रूचि थी । जब मैंने उससे कहा, ” तुम्हें कुछ समझ न आए तो बार- बार मुझ से पूछ सकते हो, और देर तक यहाँ मेरे पास बैठ कर पढ़ सकते हो।”
तब यह सुन कर वह बहुत खुश हुआ । वह तीन साल मेरे पास पढ़ा था । दूसरे बच्चे उससे अच्छे स्कूल में पढ़ रहे थे परंतु नितिन उन सब बच्चों से होशियार था, वह रटता नहीं था, समझता था ।

मुझे मकान बदलना था, मैंने नितिन से पूछा कि, “अब कहाँ पढ़ोगे?”
उसने पूर्ण आत्मविश्वास से जवाब दिया,” अब तो मुझे पढ़ने का तरीका समझ आ गया है, अपने आप पढ़ लूँगा और छोटे भाई को भी पढ़ा लूँगा।”

कबीर कहते हैं- ” जिन खोजा तिन पाइया, गहरे पानी पैठ,
मैं बपुरा बूडन डरा,रहा किनारे बैठ।