(नए मकान नए परिवेश) भाग – षष्ठदश, (आठवां मकान , आगरा।)

आदमी मुसाफिर है, आता है, जाता है।
आते-जाते रस्ते में यादें छोङ जाता है,
क्या साथ लाए, क्या तोङ आए,
रस्ते में हम क्या क्या छोङ आए,
मंजिल पे जाके याद आता है।

अब हम विभवनगर पहुंच गए थे। अभी तक मकान मालिकों के साथ रहने का अनुभव बहुत सुखद नहीं रहा था।
परंतु विभवनगर के इस मकान में हमारा सबसे सुखद अनुभव था। मकान मालिक के व्यवहार में बहुत अपनापन था।यहाँ दो साल बहुत शांति से बीते थे।गुड़गांव में भी मकान मालिक किराएदारों को अधिक सुविधा देते थे और अब अग्रवाल परिवार के साथ रहकर लगा कि आगरा में भी किराएदारों को भिन्न नहीं समझा जाता है।
यह दो मंजिला मकान था। नीचे की मंजिल में मकान मालिक रहते थे। ऊपर हमारे दो कमरे थे, दोनों कमरे बङे थे। दोनों कमरों के बीच में किचन थी।किचन भी बङी थी।
वास्तव में यह एक छोटा कमरा या बङा स्टोर था। हमारे लिए एक स्लेब और सिंक लगा कर उसे किचन बना दिया था। उसी में हमने अपना फ्रिज रखा था।घर बहुत साफ था, उसे सजाने संवारना अच्छा लगता था।कमरों में अलमारियों थी।ऊपर पहुँचते ही पहले छत थी व छत के एक तरफ ड्राइंग रूम, फिर किचन व उसके साथ बैडरूम था। तीनों एक- दूसरे के साथ जुङे थे। एक कमरे में प्रवेश करके, अंदर ही अंदर किचन व दूसरे कमरे में जा सकते थे।
तीनों के दूसरे दरवाजे बाहर छत पर खुलते थे, बैडरूम के दूसरा दरवाजे के खुलने पर जाल था, जिससे नीचे रहने वालों को रोशनी मिल सके। जाल के ठीक नीचे उनका आंगन था।इसी जाल से हम आशा भाभी (श्रीमती अग्रवाल से बातें करते थे।) ऊपर जाल के एक तरफ शौचालय था, दूसरी तरफ स्नानघर था।

अग्रवाल परिवार खानदानी बिजनेसमैन थे। उनकी आगरा के सदर बाजार में दो दुकानें थी। तभी एक अन्य दुकान विभवनगर के पास शहीद नगर में अपने बेटे के लिए खुलवा दी थी। गर्मियों में गुलाब का शरबत नीचे आंगन में ही बनता था व दुकानों पर बिकता था।
पुरानी परंपरा के अनुसार बङे भाई यानि अग्रवाल साहब ने अपने परिवार के व्यापार को संभाला था।
उनका छोटा भाई भी हमारे घर के ठीक सामने रहता था। छोटा भाई बङे भाई का बहुत सम्मान करता था। बिजनैस साझा था तो दोनों परिवारों का खर्चा बङे भाई ही देखते थे।

दोनों भाईयों में जितना प्रेम था, उतना ही जिठानी देवरानी एक- दूसरे से दूर भागती थीं आशा भाभी अपनी देवरानी पूष्पा भाभी को नीचा दिखाने का कोई मौका नहीं छोङती थीं पुष्पा भाभी भी अपनी जिठानी से दूर रहना पसंद करती थीं।
यूं सभी त्योहार-पूजा एक साथ होता था। पता नहीं, आशा भाभी को पुष्पा भाभी से क्या परेशानी थी? वह पुष्पा भाभी के हर काम में नुक्ताचीनी निकालती थीं ।उनके अनुसार उनकी देवरानी को घर-बच्चे संभालने नहीं आते थे।

पुष्पा भाभी इससे बहुत परेशान रहती थीं। पति घर की राजनीति में पङना नहीं चाहते थे। सुबह जल्दी जाकर रात देर से घर आते थे।
दोनों भाइयों की आयु में बहुत अंतर था। पुष्पा भाभी के बच्चे छोटे थे। तीन बेटियाँ और एक बेटा। तीनों बेटी स्कूल में पढ़ रही थी। बेटा बहुत छोटा था, मीशु की आयु का था।मीशु और उसने एक साथ एक छोटे स्कूल में जाना शुरू किया था।
आशा भाभी के दो बेटे और एक बेटी थी। बेटी की शादी हो गई थी, उसके भी एक बेटी थी। बङा बेटा पूना में इंजीनियरिंग पढ़ रहा था। छोटा बेटा भी काॅलेज में था, उसके पैर में पोलियो के कारण लचक थी। उसी के लिए उन्होंने शहीद नगर में एक दुकान खोली थी।
इस नई दुकान के लिए पूरा घर-खानदान मेहनत करता था। आशा भाभी भी जाकर बैठती थी।

आशा भाभी की मेहनत व अक्ल से मैं लाजवाब थी।घर में एक कामवाली रखी थी, परंतु वह स्वयं घर में हर तरह के स्वादिष्ट पकवान बनाती थीं । सर्दियों में तो प्रतिदिन भिन्न-भिन्न स्वादिष्ट पकवान बनते थे।
मुझ से कहती कि कैसे सरदी मनाती हो? जो बाजरा व मक्का के पकवान बनाना नहीं जानती हो। हर त्योहार पर उनके घर से आने वाली खुशबू से मन सुगंधित हो जाता था, फिर जब प्लेट लग कर हमारे पास आती तो हम उनके कायल हो जाते थे।

इसके अतिरिक्त वह घर से सिलाई का छुटपुट काम भी पति से छूपकर करती थी या पति अनदेखा करते थे।
वह कहती थीं, ” अरे ये मर्द लोग तो हिसाब से पैसे देते हैं, मैं अपना काम करती हुं तो मेरा हाथ खुला रहता है। बेटी-दामाद व नवासी के लिए, कुछ करने का मन होता है, तो कर पाती हुँ।

फिर नई दुकान खुली है, नए काम को जमने में कम से कम एक वर्ष तो लगता है और मेहनत व किस्मत मिलाकर दो वर्ष और लग जाते हैं ।कम से कम 2-3 वर्ष का धैर्य रखना पङता है, नए काम का अच्छा रिजल्ट मिलने में……।”
उनकी इस बात को मैंने गांठ में बाँधा था।
आशा भाभी जितना अच्छा खाना बनाती थी, उतना अच्छा बोलती भी थी व जो बोलती वो खरा होता था।वह सबकी मदद करती थी, हर मौके पर वह सबके साथ मौजूद रहती थी, पूरी गली में उनका सम्मान था।

वह आयु में मुझ से बङी थी इसीलिए तो मेरे मन में उनके लिए सम्मान था ही पर उनके स्वभाव और व्यवहार ने मेरे मन पर अमिट छाप छोङी थी।
उन्होंने संयुक्त परिवार का हर सूख दुख झेला था। घर की बङी बहु के सभी दायित्व खुशी-खुशी निभाए थे। कभी-कभी वह मेरे पास आकर बैठती थी या जबरदस्ती मुझे अपने पास बुला लेती थी, हम सीढ़ियों पर बैठ जाते थै।वह सबसे नीचे सीढ़ी पर मैं सबसे ऊपर सीढ़ी बैठते थे। वह अपने जीवन संघर्ष की कहानी सुनाती, जिन पर कभी वह हँसती और कभी मन खराब होने पर उन यादों पर कङवी भी हो जाती थी।

मुझे बातो-बातों में घर चलाने की शिक्षा भी देती थी। बच्चों की परवरिश पर भी उनकी छोटी-छोटी सीख बहुत याद आती है। उन्होंने समझाया,” माँ की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण होती है, जहाँ कभी पिता पीछे हो तब माँ को अपने बच्चों के लिए खङा होना पङता है। उन्हें दुनिया को समझने के लिए, संघर्ष क्षेत्र में कूदने के लिए, माँ का ही विश्वास और हौसला मिलना चाहिए ।

जब मेरे करंट लगा, मेरे लिए काम करना कठिन था।बिना कहे वह मेरी तकलीफ समझ गई थीं, बोली,” धीरज रखो, हिम्मत मत हारना, यह समय निकल जाएगा।” उनके इस वाक्यांश ने मेरा आत्मविश्वास बढ़ाया था।

आशा भाभी जितनी मीठी सबके साथ थी, न जाने क्यों उतनी ही कङवी वह अपनी देवरानी पुष्पा के साथ थी। दोनों भाइयों का रिश्ता राम-भरत के समान था तो जिठानी – देवरानी का रिश्ता कुनैन की गोली था।
पुष्पा भाभी यूं तो अपनी जिठानी की बुराई नही करती थी पर उनकी नुक्ताचीनी से परेशान थी।
वह कहती, “मैं अपनी जिठानी जैसी होशियार नहीं हुँ,पर अपने घर के काम मैं ही करती हुँ। उनके देवर तो सुबह-सवेरे जाकर रात देर घर लौटते हैं । घर-बाहर मैं ही संभालती हुँ।”
न जाने क्यों आशा भाभी को अपनी देवरानी की कमियों को दुनिया में बखान करने की आवश्यकता थी। आशा भाभी के गुण तो सर्वसिद्ध थे। उन दोनों के बीच किसी प्रतिस्पर्धा का अर्थ नहीं था।
मेरे साथ तो पुष्पा भाभी का व्यवहार भी बहुत अच्छा था, आशा भाभी को कोई परेशानी नहीं थी , यदि मैं पुष्पा भाभी के पास चली जाती या पुष्पा भाभी मेरे पास आ जाती थीं। आशा भाभी आत्मविश्वासी व अनुभवी महिला थीं, वह मेरे स्वभाव की निष्पक्षता और तटस्थता को समझती थीं। अतः उन्हें मुझ से कोई खतरा नहीं था।

पुष्पा भाभी के तीन बेटियाँ थी। सबसे छोटी तो अक्सर सेतु और मिंटू के साथ खेलती थी। एक बेटा था, जो मीशु के बराबर था।
बेटे का नाम सारांश था, पूरे परिवार का लाडला था, अपने ताई-ताऊ के आँखों का तारा था। वे सब ही जब सारांश के लिए कोई चीज़ लेते तो मीशु के लिए भी लेते थे।
दोनों परिवार के बच्चों में आपस में बहुत प्यार था। आशा भाभी अपने देवर के बच्चों को व पुष्पा भाभी अपनी जिठानी के बच्चों पर अपना स्नेह अर्पण करतीं थी । सिर्फ द्वेष जिठानी-देवरानी के बीच ही था।यह कोई नई बात नहीं थी, इतिहास के पन्नों पर जिठानी – देवरानी के ऐसे रिश्तों के किस्से लिखे मिल जाएंगे ।
धीरे-धीरे मुझे पता लगा कि सारांश पुष्पा भाभी का अपना बेटा नहीं है, सारांश को गोद लिया गया था।शायद इसी कारण ताई-ताऊ सारांश पर अधिक ही लाड दिखाते थे। दुनिया-समाज को यह दिखाना आवश्यक था कि गोद लिए बच्चों को अपने बच्चों से कम नहीं समझना चाहिए ।
पर कभी-कभी जेठ- जिठानी के स्वाभाविक वाक्यांश भी पुष्पा भाभी को तीर की तरह चुभ जाते थे।जैसे-” सारांश, तु हमारे पास रह, तेरी माँ तुझे मारेगी, वह तुझे प्यार नहीं करती है।”
मैं हैरान थी कि तीन बेटियाँ थी, फिर एक बेटा क्यों गोद लिया है? क्या बेटे की लालसा इतनी बङी होती है या फिर कोई और बात?
एक दिन मौका मिला, तो पुष्पा भाभी ने अपना दर्द-ए-हाल बयां कर दिया था। उन्होंने जो बताया, उसके अनुसार उन्होंने तीन बेटियों के बाद चौथे बच्चे के लिए मना कर दिया था। उन्होंने कहा,” बेटे की लालसा में चौथा बच्चा! मेरे में तकलीफ़ उठाने की हिम्मत नहीं थी।”

जब उनकी छोटी बेटी 6 वर्ष की थी, तब अपने छोटे भाई का वंश और नाम चले, इसके लिए अग्रवाल साहब ने कोशिश कर एक नवजात शिशु (लङका) लाकर, पुष्पा भाभी की गोद में डाल दिया था पुष्पा भाभी की इच्छा के विरुद्ध हुई इस घटना ने पुष्पा भाभी को क्षुब्ध कर दिया था। उनके लिए तो बेटियाँ ही बेटे समान थी।

उन्होंने स्वीकार किया कि आरंभ में तो उन्हें बहुत गुस्सा था, परंतु बेटियों ने अपने इस छोटे भाई को खुशी-खुशी अपनाया था, बङी बेटी जो अपने भाई से 13-14वर्ष बङी थी, अपने भाई का बहुत ध्यान रखती थी। उस समय शायद ही बेटियाँ अपनी माँ के तर्क व व्यवहार को समझ सकती थी।
धीरे-धीरे उन्होंने इस बच्चे को अपना लिया था। इस समाज में एक स्त्री को अपनी खुशी से माँ बनने का अधिकार भी नहीं होता है। कानून एक औरत को गर्भ धारण करने, न करने का हक देता है, पर कानून को समाज कब समझता है? औरत की बेबसी और ममता पर यह घटना कुठाराघात थी।

पता नहीं कब और किसने शुरू किया कि वंश बेटे से चलता है।जवाहर लाल नेहरू का नाम इंदिरा गाँधी से ही चला है, उनके वंशज नेहरू परिवार ही माने जाते हैं।
फिर वंशवाद , जातिवाद इत्यादि मनुष्य की मानसिकता को संक्रीण बना रहें है।
पुष्पा भाभी को समझ आ गया था कि यह दूसरे का बच्चा है, उसका लाड-प्यार और ध्यान नहीं करेंगी तो, अवश्य दुनिया उसे उनसे पराया कर देगी।

हमारे दाएं व बाएं तरफ गुप्ता परिवार ही थे।दोनों परिवार परस्पर रिश्तेदार थे।दाएं तरफ गुप्ता जी दो भाई थे। बङे भाई ऊपर के भाग में रहते थे, छोटे भाई नीचे रहते थे।उनके बङी उम्रदराज माता-पिता भी थे। दोनों भाई अपने माता-पिता का बहुत ध्यान रखते थे, सास के बहुत नखरे थे, इसीलिए एक समय का खाना बङी बहु बना कर खिलाती थी, दूसरे समय का छोटी बहु बनाती थी।सास का अपने बेटे-बहुओं पर बहुत रौब था।पोते – पोती बङे थे। बङे भाई के बच्चों की तो शादी भी हो गई थी और छोटे भाई के बच्चे भी शादी योग्य थे।

यूं तो दोनों बहुएं सास की बुराई तो न करतीं परउनके किस्से हँस कर सुनाती थी। जो समय गुज़र गया, उसमें कष्ट भी था, तो भी क्या? अब तो बीत गया तो उसे हँस कर याद करना चाहिए।

बाएं तरफ के पङोसी गुप्ता जी, इन्हीं बुजुर्ग सास के छोटे भाई थे।अतः वह अपना रौब अपने भाई और उसके परिवार पर भी रखती थीं ।

इन गुप्ता अंकल के तीन बेटे थे। दो बेटे विदेश में थे व एक बेटे की असमय मृत्यु हो गई थी। गुप्ता अंकल अपने स्वर्गवासी पुत्र के परिवार को संभाल रहे थे।स्वर्गीय पुत्र के दो बेटे थे, जो उस समय दसवीं , आठवीं में पढ़ते थे।गुप्ता अंकल की पेंशन आती थी।स्वर्गवासी पुत्र किसी प्राइवेट कंपनी में काम करता था अतः उसकी पत्नी को कोई पेंशन या नौकरी का लाभ नहीं मिला था।विदेश में रहने वाले बेटे, अपने भाई के परिवार के लिए खर्चा भेजते थे, उन्हें विश्वास था कि इन बच्चों की जिंदगी उनके चाचा-ताऊ बना देंगे। बच्चे भी विदेश जाने के सपने देख रहे थे।

विधवा बहु ने शायद समाज के लिए, अपनी विधवा माँ को अपने पास रख लिया था। बहु के कोई भाई नहीं था, पर चाचा के लङके बहुत मानते थे व माँ को खुशी-खुशी अपने पास रखना चाहते थे।लेकिन परिस्थिति देख, उन्होंने माँ को बेटी के पास छोङ दिया था।माँ को बेटी के घर कोई परेशानी न हो तो माँ को खर्चा भी देते थे। समाज की यह भी रीत है कि बेटी के घर का खाना नहीं होता है। गुप्ता अंकल अपनी बूढ़ी विधवा समधिन से कुछ लेना नहीं चाहते थे।अतः माँ बेटी को पैसा देती थी।

आशा भाभी ने बताया कि विजया (विधवा बहु) के पास भी यही पैसे होते थे। चूँकि गुप्ताजी घर का सब खर्चा संभालते थे और जरूरतों का भी ध्यान रखते थे, पर बहु के हाथों में कुछ पैसा नहीं देते थे, कभी समझते भी नहीं थे कि उसकी भी कुछ व्यक्तिगत जरूरतें या शौक हो सकते हैं ।

गुप्ता अंकल इंसान तो बहुत अच्छे थे, इस बुढ़ापे में जवान बेटे का गम और फिर उसके परिवार की जिम्मेदारी, बहुत हिम्मत के साथ उठा रहे थे। कहीं छोटी नौकरी भी करते थे।घर में किसी प्रकार की कमी नहीं होने देते थे।

परंतु मर्द कहाँ समझ पाते है कि घर में रह रही औरत को भी पैसा चाहिए। शौक तो दूर की बात जरूरत भी नही समझते है। कुछ भी कहे, पर पैसा भी आत्मविश्वास और हिम्मत देता है।

विजया भाभी बहुत सीधी महिला थी, अपने ससुर का बहुत एहसान मानती थी, पर एहसान की आवश्यकता ही क्यों पङी? गुप्ता अंकल अपनी बहु से अर्थोपार्जन के लिए कोई काम करा सकते थे।परंतु पुरानी सोच कि घर की बहु कोई काम क्यों करें ?

आशा भी विजया भाभी की परेशानी समझती थी, अतः सिलाई-बुनाई का काम जो वह स्वयं करती थी, विजया भाभी को भी गुप्ता अंकल से छिपाकर देती थीं ।

औरत को अपनी स्थिति संभालने के लिए, घर में ही लङाई लङनी पङती है।आपको अपना हक, आपके अपनों से ही लेना पङता है।
जब हम गुड़गांव शिफ्ट हुए, तब गुप्ता जी ने हमें खाने पर बुलाया था। यहाँ भी आस-पङोस में सबसे अच्छा रिश्ता बना था।आने से पहले मैं सभी परिवारों से मिलकर आई थी, लखनऊ की तरह यहाँ से भी विदाई भाव-भावभीनी थी।

फिर से गुड़गांव पहुँचने से पहले मुझे बुदकी परिवार के विषय में अवश्य लिखना चाहिए । बुदकी साहब कश्मीर एम्पोरियम के मैनेजर थे। जब उनका परिवार कश्मीर से आया, तब गलती से वह हमारे घर पहुंच गया था। तभी उनकी पत्नी का स्वभाव व अपनापन बहुत अच्छा लगा था। कश्मीर से विस्थापित पंडितों का दर्द इनसे मिलकर गहरा जाना था।

परिवार में उनके दो बेटे व एक बेटी थी। वे शहीद नगर में किराए के मकान में रहने लगे थे। शहीद नगर व विभव नगर पास-पास थे। उनकी सलाह पर ही हमने अपने बच्चों का एडमिशन विभव नगर के इस स्कूल में कराया था। उनके बच्चे भी उसी स्कूल में पढ़ते थे।
जब हमारा मन होता था, हम उनसे मिलने जाते थे। उनसे उनकी संस्कृति, परंपराओं का ज्ञान हुआ था। शिवरात्रि उनका विशेष पर्व होता था।

मिसेज बुदकी बहुत प्यार से मिलती थी, बहुत सादा रहन-सहन, दिखावटीपन बिलकुल नहीं था। बैठने के लिए जमीन पर ही गद्दे होते थे, उस पर सफेद चादरें बिछी होती थी।
हमारे बच्चों का उनके घर बहुत मन लगता था। मिंटू-मीशु का तो मिसेज बूदकी विशेष लाड करती थी। वह मुझे कश्मीर की बातें बताया करती थीं । कश्मीर छोङने का दर्द उनकी बातों से झलकता था, अपना मकान, अपनी ज़मीन छोङने का दर्द…….

हम छोङ आए उस ज़मीं को,
जो हमारा आशियाँ था।
आज इस नई ज़मी को,
हमने अपना जहां बना लिया है।
हमारे दर्द को कोई क्या समझे,
हमने तो इस दर्द को अपना बना लिया है।
आज उस विराने स्वर्ग में,
हमारे बचपन, हमारी जवानी की,
दास्ताने गूंजा करती है।
वो दिन भी आएगा,
कोई पुरातत्वविद खोद उस ज़मीं से,
पाएगा हमारे पुर्वजों की कहानियां ।

(नए मकान नए परिवेश) (भाग-पंचदश) सातवाँ मकान (आगरा)

चलो अभिष्ट मार्ग में सहर्ष खेलते हुए,
विपत्ति विप्र जो पङे उन्हें ढकेलते हुए।
घटे न हेल मेल हाँ, बढ़े न भिन्नता कभी,
अतर्क एक पंथ के सतर्क पंथ हो सभी।
तभी समर्थ भाव है कि तारता हुआ तरे,
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।
(मैथिलीशरण गुप्त)

यह नया मकान श्री पम्बु का था। उनके दो बेटियां थी। बङी बेटी रमा का विवाह जयपुर में हुआ था। छोटी बेटी उमा एम.ए. इकनॉमिक्स पढ़ रही थी। पम्बू साहब भी आर्म्स फैक्टरी में काम करते थे। यह परिवार एक आदर्श परिवार था। परिवार के सभी सदस्य अपने फर्ज धर्म समझकर निभाते थे। हमारी परिस्थिति व समस्या को समझ कर, उन्होंने हमें अपना मकान किराए पर दिया था। अतः मेरे उस कठिन समय में उन्होंने मेरा ध्यान अपना धर्म समझ कर रखा था। आज सोचती हुँ तो लगता है कि उनका कर्ज मैं उतार ही नहीं सकती थी। ईश्वर ने ही देवस्वरूप लोगों के करीब मुझे रखा था।

श्री पम्बू बुद्धिमान व मेहनती व्यक्ति थे। जितने मेहनती पम्बू साहब थे उतनी ही मेहनती उनकी पत्नी थी । वह एक धर्मनिष्ठ कर्तव्यपरायण गृहणी थीं।

परिवार के सभी सदस्य -एक-दूसरे के सुख दुख व पसंद-नापसंद का ध्यान रखते थे। रात को घर आते ही पम्बू साहब अपनी पत्नी व पुत्री से पूछते कि आज उन दोनों के पसंदीदा
सीरियल में क्या हुआ। वह स्वयं सीरियल नही देखते थे। सिर्फ यही नहीं रात को सभी मिलकर उनकी पसंद के ज्ञानवर्धक या अन्य कार्यक्रम देखते थे।

उनका भी एक दरवाजा पीछे आंगन में खुलता था, जहाँ से वह मोटर चलाने आती थी। माँ- बेटी अक्सर मेरे पास आकर गप्प लगाती थीं ।वे दोनों उनके यहाँ जितने किराएदार रह कर गए थे, उनकी पूर्ण दास्तान सुनाती थीं । कुछ तो मुझे अब भी याद है।वे भी चाहती तो मेरी तरह एक किताब लिख सकती थी। या शायद उनकी दास्तानों ने मुझे अपनी इन यादों की पोटली खोलने को प्रेरित किया हो।

परंतु मिसेज पम्बू को संभवतः अपने से या समाज से नाराजगी थी। उनके दो बेटियाँ थी और उनकी बेटी के भी बेटी थी।अतः वह लङकों से चिढ़ रखती थी। पर साथ ही उन्हें चिन्ता थी कि उनकी बेटी रमा के दूसरी संतान बेटी न हो जाए।

वह एक बहुत ही संकीर्ण बात बार-बार कहती थी, सुनकर दुःख होता था, जवाब इसीलिए नहीं देती थी कि जानती थी, इनकी बङी बेटी रमा व उसके पति समझदार हैं ।मुझे उनकी सोच पर दया आती थी।
वह कहतीं, “जब भ्रुण जांच की वैज्ञानिक पद्धति है, तो क्यों दो बेटियों को जन्म दिया जाए। पहली बेटी तो ठीक है, परंतु दूसरी संतान के समय मैं रमा की जांच करा दूंगी।(तब भ्रुण जांच पर कानून नहीं बना था और लोग इसी तरह मनमानी कर रहे थे।) लङका होगा तो ठीक और जांच में लङकी पता लगी तो उसे दुनिया में क्यों लाया जाए।”
वह एक दयावान, नेक स्त्री थी, पर औरतों पर सामाजिक बंदिशों व तकलीफों ने उनके विचारों को कलुषित कर दिया था।

मीशु ने जब घुटने के बल चलना शुरू किया, तब मौका मिलते ही वह उनकी तरफ निकल जाता और उनके सामान से छेड़छाड़ करता था। वह मीशु को पसंद नहीं करती थी, एक तो लङका दूसरे वह उन्हें एक नंबर का शैतान व बदमाश दिखता था।
जब उनकी नातिन आती जो मीशु से कुछ महीने बड़ी थी, तब मिसेज पम्बू का व्यवहार बहुत अजीब हो जाता था।

मीशु थोड़ा बङा हुआ तो वह और उनकी नातिन साथ खेलते थे। दोनो ही अपने-अपने खिलौनों से मिलकर खेलते थे। परंतु पम्बू आंटी को चिन्ता रहती कि मीशु कहीं उसका खिलौना अपने पास न रख ले। तब मीशु सिर्फ 11/2साल का था।

एक दिन उनकी नातिन का कोई खिलौना नहीं मिल रहा था, तब पम्बू आंटी का व्यवहार बहुत भिन्न था। मैं आंटीजी की बहुत इज्जत करती थी और उनके व्यवहार का उतावलापन समझ में आ रहा था। कई बार दादी-नानी, दादा-नाना अपने पोते- नातिन के प्यार में इतना डूब जाते है कि भूल जाते हैं कि वह दूसरों का अपमान कर रहे हैं । मीशु तो छोटा था पर…..।

खिलौना तो उन्हें अपने घर मिल गया था। पर अब हमारे बीच एक कङवी दीवार बनने लगी थी। अब इस मकान को बदलने का समय आ गया था।
यह मकान मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण था, मीशु का जन्म यहाँ हुआ था और पम्बू परिवार से बहुत कुछ सीखने को मिला था। आस-पड़ोस में भी हमारा अच्छा मेलजोल हो गया था।

जब इस मकान में शिफ्ट हुए तब सेतु का आर्मी पब्लिक स्कूल में एडमिशन हो गया था। मीशु के जन्म के कुछ समय बाद मिन्टू भी पास ही एक स्कूल में जाने लगा था।
हमारे घर के ठीक सामने बत्राजी का मकान था, बत्रा जी का पोता सुमित भी आर्मी स्कूल में सेतु के साथ पढ़ता था।

मीशु के जन्म के समय कानपुर से बङी दीदी व डौली आए थे। डौली ने सब काम संभाला था। डौली की दोस्ती उमा से हुई थी। आसपास में सभी उसे जान गए थे। डौली और एस. के. के मिलनसार स्वभाव के कारण आसपास में सभी मुझे भी जान गए थे।

सुमित की मम्मी से मेरी अच्छी दोस्ती हो गई थी। सुमित और सेतु व मिंटू और उनकी बेटी सोनल साथ में खेलते थे। सोनल मिन्टू से एक साल बङी थी।
मिसेज पम्बू व अन्य मिन्टू और सोनल की दोस्ती का मज़ाक भी बनाते थे।माना कि मज़ाक ही होता था, पर यही हमारी सामाजिक सोच को दर्शाता है। एक लङका व एक लङकी की दोस्ती पर निगाह उठाना समाज का बहुत गहरा व गंभीर स्वभाव है। इस तरह हम अनजाने ही बच्चों के मन में ऐसी दोस्ती व लङके व लङकी के आपसी रिश्ते पर कई प्रश्न छोङ देते हैं।

सुमित के पापा से एस. के. की अच्छी मित्रता हो गई थी। इस तरह हम दोनों परिवार का बहुत घनिष्ठ संबंध बन गया था।

बत्राजी के पङोस में सरदारजी रहते थे, उनके चार बेटियाँ थी, सुना था कि बेटियों की शादी की चिन्ता में सरदारनी बिमार रहती थी। हमारे समाज में विवाह ही जीवन का उद्देश्य मान लिया गया है।वाहे गुरु की कृपा से हमारे सामने ही तीनों बङी बेटियों का विवाह हो गया था। सबसे छोटी सेतू से बङी थी व आस-पड़ोस के सभी बच्चों की नेता थी, सेतु को यहाँ भी बहुत अच्छा लगता था।

सरदारजी के किराएदार श्रीवास्तवजी थे। उनके बेटे का नाम ‘बाघा’ था। मैंने मिसेज श्रीवास्तवा से पूछा था कि उन्होंने अपने बेटे का नाम ‘बाघा’ क्यों रखा? उन्होंने बताया ” मैं उसे प्यार से बाघा पुकारती हुँ, पर उसका नाम आकाश है। बंगाल के क्रांतिकारी जतिन्द्रनाथ मुखर्जी को लोग ‘बाघा जतिन’ कहते थे। बिहार में भी ‘बाघ बहादुर’ की एक सच्ची कहानी प्रसिद्ध है।”
बाद में मैंने ‘बाघ बहादुर’ नाम की एक पिक्चर देखी थी।

बत्रा जी के चार बेटे थे, सुमित की माँ दूसरे नंबर की बहु थी। बङे दो बेटे यहाँ रहते थे, दोनों छोटे आगरा से बाहर थे। बाद में सबसे छोटा बेटा भी आ गया था।सुमित की मम्मी की किचन अलग थी। बङी बहु व छोटी बहु सास के साथ ही थी।ससुर की मृत्यु के बाद छोटी बहु की भी किचन अलग कर दी थी।

घर की सबसे बङी बहु टीचर थी। सुंदर व समझदार थी, ऐसा सब वहाँ कहते थे। परंतु मुझे सुमित की मम्मी ही अधिक समझदार दिखती थी, जो यह देखते, समझते हुए कि सास बहुओं में भेदभाव करती हैं, यहाँ तक कि बच्चों में भेदभाव करती है, चुप रहती थी।
सास के कोई बेटी नहीं थी, इसलिए बङी बहु को तो बेटी ही माना व वैसे ही लाड किया था।बङी बहु को तो पानी का गिलास भी भरकर देती थी।

पर दूसरी बहु को बहु ही माना था और बहु पर पूर्ण सख्ती की थी।यह बहु नौकरी नहीं करती थी तो घर का सारा काम भी बहु से कराया जाता था।
फिर ससुरजी ने समझदारी से दूसरे बेटे को उसी घर में अलग कर दिया था। अब दूसरी बहु सास की सभी सहेलियों के लिए एक तेज बहु थी। मिसेज पम्बू को मेरी व सुमित की मम्मी की दोस्ती पसंद नहीं थी। हमारे बीच मनमुटाव का यह भी एक कारण था।

मकान मालिक का यह भी एक रवैया होता है। वह नहीं चाहते कि उनके किराएदार आस-पड़ोस में अधिक व्यवहार करें। या फिर उतना या उनसे व्यवहार करें जिन्हें वे पसंद करते हैं ।
मेरा स्वभाव तो अभी भी रिजर्व था, फिर तीन बच्चें, इतना काम…. बाहर निकलने का समय नही था, पर सुमित की मम्मी को मैं पसंद आ गई थी। वह सभी कार्यों में बहुत चुस्त थी। अतः सभी काम शीघ्र निबटा कर मेरे पास आ जाती थीं ।मैं काम करती रहती थीं और वह अपनी बातों से मेरा मन बहलाती थी। जब मिंटू और बुलबुल के स्कूल से आने का समय होता तब वह घर जाती थी, बच्चों की पढ़ाई वह स्वयं देखती थी।

हमारे घर की दाएं दीवार के साथ एक बनिया परिवार का मकान था, सभी बेटे बहु साथ रहते थे।बिजनेस भी साझे में था। बनिया परिवार में एक विशेषता होती है, पूरे परिवार का या कहीं एक खानदान का बिजनेस साझे में होता है, तथा यह संयुक्त परिवार में ही रहना पसंद करते हैं ।इन्हें न एकल व्यापार पसंद होता है, न ही एकल रहना अच्छा
लगता है।

घर के मर्दो को घर की किचन राजनीति से कोई मतलब नहीं होता है। यह स्पष्ट होता है कि लङकर रहो या शांति से, पर रहना सबको संयुक्त ही है। यह घर भी ऐसा ही था, घर की सर्वेसर्वा सास ही थी। सास या माँ को घर के फैसले लेने का अधिकार होता है उसमें पुरूषों का कोई दखल नहीं होता है।

घर के दूसरी तरफ झांई जी का मकान था। झांईजी का स्वभाव बहुत अच्छा था, उन्होंने अपने सनकी पति के सख्त व्यवहार को बहुत बर्दाश्त किया था।
उनके तीन बेटे थे, बङा बेटा चंडीगढ़ में व दूसरा बेटा धनबाद रहता था। सबसे छोटे बेटे की शादी नहीं हुई थी, पिता की मृत्यु के बाद घर के एक भाग में उसने दैनिक जरूरतों की एक दुकान खोल ली थी।

झांईजी के पति का स्वर्गवास हमारे उस मकान में शिफ्ट होने के बाद हुआ था। पति की मृत्यु के कुछ समय बाद उन्होंने आस- पङोस में जाना शुरू किया था। काका(छोटा बेटा) की दुकान खुलने के बाद वह दुकान पर भी बैठती थी।

मिंटू को बहुत प्यार करती थी। अक्सर मेरे पास आती थी, उन्हें मेरे हाथ की चाय बहुत पसंद थी। मुझे अपने पति की बातें बहुत गर्व से सुनाती थी, कभी उनकी बुराई नहीं करती थी।
मिसेज पम्बू से मुझे उनके जीवन का दुख पता चला था।
पति के जीवित रहते वह अपने मायके से संबध नहीं रख सकी थी।पति के स्वर्गवासी होने पर ही भाईयों ने आना शुरू किया था व वह भी कई वर्षों के बाद अपने मायके गई थी।अब मायके में माता-पिता नहीं रहे थे।

मुझे लगा कि पति की मृत्यु ने उनकी अनकही इच्छाओं को पुरा कर दिया था। काका का विवाह हुआ और तीसरी बहु का सुख पाया था। चंडीगढ़ गई , फिर धनबाद भी गई, अपने दोनों बेटों के सुख को देख आत्मा संतुष्ट हुई। पर धनबाद से लौटी तो बिमार थी, लीवर के केंसर ने उनकी जीवन लीला को समाप्त किया था। ऐसा लगा मानों ईश्वर ने उन्हें दो वर्ष खुली हवा में सांस लेने व आज़ादी को महसूस करने के लिए दी थी।

आर्मी पब्लिक स्कूल का अनुभव अच्छा नहीं रहा था। मिन्टू और सेतु का विभवनगर के एक स्कूल में दाखिला करा दिया था। और हम विभव नगर शिफ्ट हो गए थे।

नारी तु तो शक्ति है,
क्यों तु अपना अस्तित्व मिटाने चली है?
नारी तु तो दुर्गा है, नारी तु तो योद्धा है,
क्यों पङी कमज़ोर तु अपने लिए?
चल अब अस्त्र उठा अपने लिए।
यह तेरा मान नहीं, यह तेरा स्वाभिमान नहीं ।
यह निरकुंशता खोखली है।
अपनी शक्ति को पहचान।
क्यों तु अपने अस्तित्व पर संदेह करती है।
नारी तु तो शक्ति है।

(नए मकान नए परिवेश) (भाग-चतुर्दश) (छठा मकान) (आगरा)

आज फिर अपनी कुछ निशानियाँ, अजनबियों के लिए छोङ,
यह खानाबदोश आगे बढ़ चले हैं।
अपनी यात्रा के अगले पङाव पर बाँधेंगे अपने तंबु,
जहाँ उन्हें कुछ अजनबियों के उसी पङाव से रह कर,
गुज़र जाने के अहसासों के साथ अपने को जीवन्त रखना होगा।
खानाबदोश अपने गीत गाते होंगे और स्थानीयवासी उन गीतों को गुनगनाते रहेंगे, ऐसे इन अज़नबियों से एक रिश्ता निभाते रहेंगे।

एस.के का लखनऊ से तबादला हो गया था।हमने लखनऊ से निकलने की तैयारी आरंभ करी व निश्चित तिथि पर हमने सबसे विदा ली तब सभी पङोसी हमसे मिलने आए थे। सबसे मिलनसार पङोसी हमें लखनऊ में ही मिले थे। करण की मम्मी ने हमारे रास्ते के लिए खाना भी पैक किया था। मिसेज सिंह ने हमारा विदाई भोज किया था। मैं वहाँ से निकलते हुए भावविह्लल हो गई थी।

आगरा उत्तरप्रदेश का प्रसिद्ध ऐतिहासिक नगर तथा पर्यटन स्थल है। यह नगर यमुना नदी के तट पर एक शहर है।1504 में सिकंदर लोदी ने अपनी राजधानी को दिल्ली से आगरा स्थानांतरित किया था।
आगरा में विश्व के सात अजूबों में एक ताजमहल स्थित है। इस नगरी में अनेक स्मारक है।बाबर की विरासत को आगे बढ़ाने वाले अकबर, जहांगीर एवं शाहजहां के संरक्षण में आगरा कला, संस्कृति, शिक्षा एवं व्यापार का सबसे अहम केंद्र बनकर उभरा था।आगरा संगरमर एवं पत्थरों पर की गई महीन नक्काशी से युक्त शिल्पकारी का भी महत्वपूर्ण केंद्र है।

आगरा में मकान तो अच्छी कालोनी में मिला था पर एक ही कमरे का था । मकान तो अच्छा व बङा था, उसमें मकानमालिक व एक अन्य किराएदार भी रहते थे।
सुबह-सवेरे छः बजे हम वहाँ पहुँच गए थे। आगरा मैं पहले भी आई हुई थी, अतः आगरा की उबङ-खाबङ सङकों से परिचित थी । परंतु लखनऊ की साफ-सुथरी, बङी, चौङी, सङकों के बाद आगरा की सङकों को देख तौबा हो रही थी। उसी प्रकार लखनऊ के स्वतंत्र दो कमरे के फ्लेट के बाद यह एक कमरा…. सोचा थोङे समय बाद बदल लेंगे।

गैलरी से होते हुए, हम मकान के पिछले भाग में गए थे।
गैलरी में ही बाथरूम व शौचालय थे और किसी के साथ शेयर भी नहीं करना था।मन को शांति मिली पर अभी अशांति का विषय सामने आना था।
एस.के. दो दिन पहले ही सारा सामान रखवा गए थे, फिर हमें लखनऊ लेने गए थे। तो जब हम कमरे में पहुंचे तो देखा कमरा सामान से अटा पङा था, बैठने क्या खङे होने की भी जगह नहीं थी । एक बार लगा कैसे इस कमरे में इतना सामान समाएगा। यूं गृहस्थी एक ही कमरे से शुरू की थी, पर कब सामान बढ़ गया पता ही नही चला।

मकान के ठीक सामने भैंसों का तबेला भी था, खैर हम पीछे थे तो इतना महसूस नहीं होता था।
कमरे के दूसरी तरफ एक अन्य दरवाजा भी था, जो पीछे आंगन में खुलता था । यहाँ आंगन को आंगन ही कहते थे। यहाँ भाषा में हिन्दी की खङी बोली का ही अंदाज़ था। सेतु शीघ्र ही लखनवी अंदाज भूल गया था।बच्चे आसानी से नई जगह व नई भाषा अपना लेते हैं।

आंगन में ही हमारे कमरे के साथ किचन थी, किचन में सामान रखने के लिए ऊपर टांड बने थे। कमरे में भी ऐसी व्यवस्था थी।कुछ सामान बिना खोले वहीं जमा दिया था। कमरे और किचन से आंगन में एक टीन की शेड दी थी। हमार बङा ट्रंक वही रखा जा सका था। बाद में वहाँ बच्चों के खाने- खेलने की अच्छी व्यवस्था हो गई थी।
आंगन के दूसरी तरफ जेट पम्प लगा था। पीने का पानी वहीं से लेकर भरना होता था। किचन और बाथरूम के नलों में सिर्फ टंकी का पानी आता था।किचन के साथ एक अन्य दरवाजा भी था जो मकान- मालिक के भाग में खुलता था और वे जब चाहे उस आंगन में आ सकते थे।
यह व्यवस्था हमें सुबह-सुबह जाते ही पता नहीं लगी थी। हम तो कमरे में जगह बनाने में जुट गए थे। बच्चों के खाने-पीने की व्यवस्था करनी थी। किसी तरह बच्चों को बैठाने की व्यवस्था कर, किचन का जरूरी सामान व स्टोव लगाना आवश्यक था।

एस. के. बच्चों के दूध नाशते का प्रबंध करने बाजार गए थे।
तभी देखा जेट-पम्प चल गया है, मैंने देखा सब जल्दी-जल्दी आकर अपना पानी भर रहे थे। मेरा तो अभी सामान ही नहीं खुला था। किसी तरह एक डोल लेकर पहुंची ही थी और पानी भर ही रही थी कि मकान मालकिन मिसेज जैन की बेटी ने आकर मोटर बंद कर दी थी। मैंने उससे कहा कि” मैं तो अभी पानी भर ही नहीं पाई हुँ, पर उसने टका सा जवाब दिया कि मोटर बंद करने का टाइम हो गया है।मोटर सिर्फ 10-15 मिनट ही चली थी।

मैं बहुत विश्वास के साथ मिसेज जैन के पास गई कि वह मेरी प्रार्थना स्वीकार कर लेंगी और पांच मिनट मोटर चला देगी, जिससे मैं इतना पानी तो भर लूं कि खाना बना सकु।

लेकिन मिसेज जैन तो ऊसूलों की बहत पक्की निकली, किसी प्रकार मेरी बात सुनने को तैयार नही थी—–एक ही रट —–“हम आपके लिए रूल नहीं बदल सकते हैं। एक अन्य किराएदार भी रहते हैं ।” मैंने उन्हें याद दिलाया कि आपने हमें पहले यह रूल नहीं बताया था, छोटे बच्चों के लिए एक बाल्टी तो भरने दीजिए । तब मेरे बच्चों पर दया करके उन्होंने अपनी एक बहुत छोटी पानी से भरी बाल्टी पकङा दी थी। मन हुआ सारा पानी उनके सिर के ऊपर डाल कर आ जाऊं ।पर संयम से काम लिया। समझ तो आ गया था कि स्थान ही नहीं, लोग भी तंग मिले हैं। जहाँ पानी को लेकर हिसाब-किताब ——– गुजारा कठिन था।

खैर उस दिन पानी भी बाहर से लाया गया था। फिर उनके ऊसूलों का सम्मान करते हुए, पानी की समस्या को गहन न बनने देने का प्रयास करने लगी थी।चूँकि मोटर देर तक नहीं चलती थी तो टंकी भी पूरी नहीं भरती थी। धीरे-धीरे समझ आया कि मिसेज जैन व मिसेज शर्मा(दूसरी किराएदार) टंकी के पानी को भी अपनी बाल्टियों में भर लेतीं थी।

यह तो अच्छा था कि हमारे बाथरूम में कार्पोरेशन के पानी का नल लगा था। जिसमें सुबह – शाम व दोपहर में भी थोङी देर पानी आता था। जो पीने के लिए बिलकुल नहीं था ।सरकार सुविधाएं तो देती है, पर संचालन ठीक से न होने के कारण सब अधूरा ही रह जाता है।अगर काॅरपोरेशन का पानी साफ होता तो कठिनाई नहीं होती, हम गुङगांव और लखनऊ में काॅरपोरेशन के पानी का प्रयोग पीने के लिए भी करते थे।पङोस में भी सब काॅरपोरेशन का पानी ही पीते थे। जेट पम्प कहीं नहीं था। तब आज की तरह आरो भी नहीं होते थे।पर गुङगांव में पानी कम आता था व किचन में काम करने में कठिनाई थी। तब पानी स्टोर करने के लिए एक छोटी टंकी किचन में रख ली थी। लखनऊ में भी पानी समय समय से आता था।वहां भी वह टंकी बाबाथरूम में रख ली थी, पानी स्टोर रहता था तो मैं अपनी सुविधानुसार काम कर पाती थी।
यहाँ भी बाथरूम में वह टंकी रख ली थी।बाकि बाल्टी इत्यादि बर्तन भी भर लेती थी। इस समस्या का समाधान कर ही लिया था।

सेतु का पास के स्कूल में दाखिला करा दिया था। मकान मालिकन से तो मैंने दूरी बना रखी थी, अलबत्ता वह अपनी मीठी व झूठी मुस्कान के साथ कभी -कभी मेरे पास आ जाती थीं । मिन्टू उनके छोटी बेटी-बेटा के लिए खिलौना बन गया था। मिसेज जैन भी उसका बहुत लाङ करती थीं। मै काम करती तब वह उनके पास खेलता रहता था।
मिसेज जैन के तीन बेटियाँ और दो बेटे थे।बङी बेटी का विवाह आगरा से बाहर हुआ था।मंझली बेटी का विवाह हमारे सामने हुआ था। छोटी बेटी काॅलेज में पढ़ती थी। जैन साहब आर्म्स फैक्ट्री में काम करते थे, उन्होंने अपने बङे बेटे को भी उसी फैक्ट्री में लगवा दिया था। छोटा बेटा अभी स्कूल में ही पढ़ता था।

दूसरी किराएदार मिसेज शर्मा से मेरी दोस्ती हो गई थी।वह हलवाई की बेटी थी। घर में ही खोया बनाती थी। विभिन्न मिठाइयाँ व समोसे आदि पकवान भी बहुत स्वादिष्ट बनाती थीं ।
शर्मा जी बैंक में अकाउंट आॅफिसर थे। अपने माता-पिता के लाडले छोटे बेटे थे। माता-पिता के लिए वह आज भी छोटे ही थे और उन्हें भी इससे कोई आपत्ति नहीं थी। अतः घर- दुनिया की जिम्मेदारी उनके पिता व पत्नी ही निभाते थे। वह अपनी पत्नी को घर खर्च के पैसे थमा कर निश्चित हो जाते थे। मिसेज शर्मा को कोई कमी व जरूरत होती तो वह अपने ससुर से ही कहती थी। ससुर की जायदाद अच्छी थी वह अपने छोटे बेटे यानि शर्मा जी को बुद्ध मानते थे। जबकि शर्मा जी की अपने आॅफिस में बहुत साख थी ।

यूं वह थे तो बहुत सादे व लापरवाह व्यक्ति कि उनकी पत्नी सर्दियों में उनके चेहरे पर अपने हाथ से क्रीम लगाती थीं।मुझे बहुत हँसी आती थी कि कोई पुरूष कैसे अपनी पत्नी के सामने भी बच्चा बना रह सकता है।

और मिसेज शर्मा जब उनकी बाइक साफ करती थीं तो मैं सोचतीं कि कुछ औरतें क्यों इतनी कर्मनिष्ठ होती हैं । जो अपने पतियों को उनका स्वयं का काम भी नहीं करने देती हैं ।कहते हैं न! पहले माता- पिता ने बिगाङा फिर पत्नी के लाड ने कसर पूरी कर दी और यह पुरूष बङा नहीं हो सका।

शर्मा जी शायद अपने पिता व पत्नी से इतना प्यार करते थे कि उनकी लाड भरी ज्यादतियाँ मुस्कराते हुए झेल जाते थे।

क्रीमवाला एपिसोड इत्तफाक से मेरे सामने ही घट गया था, और उनकी झेंपी मुस्कान देख मुझे भी झेंप आ गई थी । पति-पत्नी का यह अंतरंग क्षण बीच आंगन में न घटा होता तो इस मनोरम दृश्य की खूबसूरती की मैं दर्शक न बनती। पत्नी की लाड भरी तिनकती डाँट और पति का झेंपना।

मैं हैरान रह गई थी जब एक दिन मैंने सुना उनके पिता शर्मा जी को अपने आॅफिस में छुट्टी की अर्जी देने की सलाह दे रहे थे व उसमें क्या और कैसे लिखना है यह ज्ञान भी दे रहे थे और शर्मा जी सिर्फ गर्दन हिलाते हुए उनके सामने से निकल गए थे।

मिसेज शर्मा ने बताया कि उनके ससुर जी की भी दुकाने हैं और शर्माजी दुकानें संभालना नहीं चाहते थे, पढ़ाई में होशियार थे, एम़ काॅम. करके,सरकारी बैंक की नौकरी कर ली थी। व्यापारियों की सोच में नौकरी से मिलने वाला सीमित वेतन अपर्याप्त ही होता है।पुत्र लाडले के साथ जिद्दी भी थे,अतः उन्होंने अपने मन का काम ही किया था।
उनके दो बेटियाँ थी, बङी बेटी शिखा सातवी में और छोटी श्वेता पांचवी में पढ़ती थी। मिंटू थोङा बोलने लगा था और श्वेता को टीनु कहता था। दोनों बच्चों का दोनों लड़कियों के साथ बहुत मन लगता था।

कानपुर में जगन (बङी ननद का बेटा) की शादी फरवरी में थी। हमारा परिवार इस मकान में रमने लगा था।
फरवरी में कानपुर गए, तभी मैंने जाना कि मैं फिर गर्भवती थी। पहली दो गर्भावस्था में बहुत तकलीफ रही थी, तीसरी बार बहुत घबरा रही थी। मैं दो बच्चों के साथ संतुष्ट थी, बेटी की भी अब चाह नहीं थी।

अबार्शन में भी शारीरिक तकलीफ़ के साथ मानसिक तकलीफ़ भी बहुत होती है। मिंटु से पहले उस अबार्शन में अनुभव किया था।
अतः यही निश्चय किया कि आरंभ से ही किसी अच्छी डा. की निगरानी में रहा जाए व उसे अपनी शारीरिक परेशानी बताई जाए। संयोग से डा. अच्छी मिल गई थी।उसकी सलाह से काम व खान-पान पर ध्यान देने लगी थी।
तभी मैंने जाना कि मिसेज शर्मा भी गर्भवती थी। तीसरे बच्चे के जन्म के लिए वह भी तैयार नहीं थी अतः घबरा रही थी, फिर श्वेता तो दस वर्ष की हो गई थी। उन्हें शर्म भी महसूस हो रही थी।
शायद मेरी हिम्मत बनी रहे, इसीलिए उनका साथ मिला था। उन्होंने मुझ से कहा था कि आपको बेटी की चाह है और मुझे बेटे की तमन्ना है।पर हम दोनों की यह इच्छा पुरी नहीं होगी। मिसेज शर्मा ने इसी कारण गर्भावस्था का समय तनाव में काटा था। मैंने डिलीवरी से पहले ही मकान बदल लिया था। बहुत दिन बाद उनसे एक मेले में मुलाकात हुई थी। उन्होंने अपनी तीसरी बेटी से मिलाया था।उस समय भी वह उदास थी।
समाज की निर्ममता का भय माँओं के मन में समाया रहता है, यह भय ही मिसेज शर्मा के चेहरे पर दिखता था।
उस मकान से निकलने का कारण पानी की समस्या और मिसेज जैन का कुटिल व्यवहार था।
गर्मियों में पानी की समस्या अधिक हो गई थी।मैं अब पानी भरने का काम स्वयं नहीं कर सकती थी। डा. की सलाहनुसार इस बार भी शरीर को अधिक से अधिक आराम आवश्यक था। अब हर काम के लिए एक माई रख ली थी।गर्मियों में जगन अपनी नवनवविवाहित पत्नी सुषमा को लेकर आया था। मेरी परेशानी देख अपने मामा को मकान बदलने की सलाह दे कर गया था।

फिर जगन की बङी बहन नीरू अपने पति आनंद जी व बच्चों के साथ रहने आई थी। पानी की समस्या उस पर मकान मालकिन का कूटिल व्यवहार देख शांत रहने वाले आनंद जी को भी गुस्सा आ गया था। नीरू ने कहा, “मामाजी, अभी मकान देखो और हमारे सामने बदल लो, मामीजी के लिए इस हालत में बहुत मुश्किल होगी।”

ईश्वर कृपा से मकान मिला, मकान में दो छोटे कमरे थे, पर अपार्टमेंट की तरह सब अंदर ही था। अतः छोटे बच्चे के साथ बाहर हवा में निकलने नहीं पङेगा। यहाँ भी गैलरी से जाकर पीछे की ओर हमारे कमरे थे।कमरे एक-दूसरे से जुङे थे।
कमरों के पीछे के दरवाजे, पीछे आगन में खुलते थे। यहाँ भी आंगन में ही जेट पम्प लगा था पर बाथरूम व रसोई के नलों में भी पम्प का पानी आता था, अतः बाहर से पानी लाने की समस्या नहीं थी। टंकी भी पूरी भरी जाती थी व जरूरत पर दुबारा पम्प चला दिया जाता था।
चूंकि मकान मालिक व उनका परिवार सज्जन दीखते थे, हमने इस मकान में अपनी रिहायशी बदलने का फैसला लिया था।
नीरू व आनंदजी का पूर्ण सहयोग मिला था।अतः मकान बदलने में कोई परेशानी नहीं हुई थी नीरू ने तो रसोई का सारा सामान लगा दिया था। मैं नीरू व आनंनदजी की हमेशा शुक्रगुजार हुँ।

जुलाई1992 में हम नए मकान में आए थे और 13अक्टूबर 1992 में मीशु का जन्म हुआ था।सब कुछ बहुत शांति से व तनावरहित रहा था।

यह जीवन है, इस जीवन का यही है -रंग-रूप
कुछ कष्टों के बाद ही मिलते है अनुपम सुख।

(नए मकान नए परिवेश) (भाग- त्रयोदश) (लखनऊ)

हम एक ही वर्ष लखनऊ रहे थे। समय बहुत अच्छा बीता था। पर वहाँ एक दुखद घटना घट गई थी।

हमारे घर के ठीक सामने प्रोफेसर साहब का मकान था। वह लखनऊ विश्वविद्यालय में इंग्लिश के प्रोफेसर थे। परंतु ग्रामीण परिवेश के कारण उनकी पत्नी कम पढ़ी-लिखी थी। प्रोफेसर साहब में अपने ज्ञान का बहुत दंभ था । अपनी पत्नी को वह सम्मान की दृष्टि से नहीं देखते थे। पैसे की कोई कमी नहीं थी, फिर भी उनकी पत्नी इधर-उधर पैसे मांगती नज़र आती थी। अपने पति से क्षुब्ध होने के कारण उनका व्यवहार बहुत अजीब व अटपटा दिखता था। फिर भी वह अक्सर मेरे पास आती थी और अधिकांशतःअपने पति व बङे बेटे के विषय में बात करती थी।

उनके दो बेटे और एक बेटी थे।बङा बेटा 16 साल का था, दसवीं में पढ़ता था, बेटी 10 वर्ष की थी, छोटा बेटा सिर्फ 3वर्ष का था।
श्रीमती प्रोफेसर का कहना था कि प्रोफेसर साहब को जितना अपनी बेटी व छोटे बेटे से प्यार हैं,उनसे आधा भी वह अपने बङे बेटे से प्रेम नहीं रखते हैं ।

वहाँ सभी पङोसनों का यही विचार था कि श्रीमती प्रोफेसर के कारण उनका घर बर्बाद हो रहा था।मुझे उनसे दूर रहने की सलाह दी गई थी । अतः मैं सिर्फ उनकी श्रोता थी। प्रोफेसर ज्ञानी पुरूष थे(अथार्त दुनियावी ज्ञानी)। पूरे मोहल्ले में उनका बहुत मान था, यह जानते हुए भी कि प्रोफेसर साहब अपने बङे बेटे के साथ बहुत सख्त है, लोगों को कमी श्रीमती प्रोफेसर में ही लगती थी।

श्रीमती प्रोफेसर की कहानी तो उन्होंने स्वयं सुना ही दी थी, परंतु जो कुछ भी उन्होंने बताया था और जो कुछ भी वहाँ घटा था, उसके बाद और आज भी जब विचार करती हुँ तो ऐसा मानती हुँ कि अपने बेटे की मृत्यु के लिए अगर कोई जिम्मेदार थे तो वह प्रोफेसर ही थे।

श्रीमती प्रोफेसर तो प्रोफेसर साहब के सख्त व्यवहार व अनुशासन से विद्रोही हो गई थी, पर बङे पुत्र के साथ जो भी बीतता था, उसका विरोध करते हुए भी रोक नहीं पाती थी, प्रोफेसर साहब के लिए उनकी पत्नी अनपढ़ समान थी। बङे पुत्र को बचपन से वह स्वयं पढ़ाते थे, छोटी से छोटी गलती पर भी कङी से कङी सजा देते थे।

उन्होंने बताया था कि बेटा 9-10 वर्ष की आयु में पिता की सख्ती से घबराकर घर से भाग गया था, पर किसी प्रकार ढूँढ लाया गया था।

प्रोफेसर साहब की सख्ती में विशेष फर्क नहीं पङा था। बाद में छोटे भाई-बहन का अधिक लाड होता देख वह और भी क्षुब्ध हो गया था।पिता को अपने बङे बेटे से इतनी उम्मीदें थी कि उसके प्रति उनका प्रेम कहीं दलदल में फंस गया था और साथ ही बेटा भी उसमें धंसता जा रहा था।

पिता की सख्ती ने लङके को बहुत सहमा दिया था, ऊपर से सहमापन उसे अंदर से विद्रोही बना रहा था। पर काश यह विद्रोह सही राह पकङ पाता।

उसने माँ से कह दिया था कि पिता की सख्ती ऐसी ही रही तो वह चिन्ता न करें,वह घर से भागेगा नहीं , चूंकि वह जानता है, पिता उसे ढूंढ लाएंगे ।

माँ को बिना बताए आने वाला संकट शंकालु कर देता है।
माँ का मन आशंकित तो हुआ था । शायद इसीलिए वह सबको अपनी कहानी सुनाती थी, पर कौन समझता है? कौन किसके पचङे में पांव फंसाता है। एक औरत का यूं दर-दर पति की आलोचना करना अच्छा गुण नहीं माना जाता है।

वह पढ़ाई में मन नहीं लगा पा रहा था, प्रोफेसर साहब की जिद कि उन जैसे ज्ञानी का पुत्र पढ़ाई में पीछे कैसे रह सकता है? नतीज़न अर्धवार्षिक परीक्षा में फेल होने पर उसने अपने को घर में ही खत्म कर लिया था। माँ ही नहीं पिता भी हाथ मलते रह गए थे।

इस घटना ने सभी को हिला दिया था, पर लोग नहीं बदले थे, दो महीने बाद होली पर, श्रीमती प्रोफेसर ने बेटी को होली खेलने भेज दिया था, शाम को भी वह बच्ची जब अपने नए वस्त्र पहन, सहेलियों के साथ घूमने निकली तो आस-पङोस उस माँ पर प्रश्न उठा रहा था, कैसे वह बङे बेटे के गम को अनदेखा कर, अपने छोटे बच्चों का मन पूरा कर सकती हैं।
लोगों के उलाहने व दुनियावी परंपराएं कहाँ किसी का दर्द समझ पाते हैं ?

जो ऐसे ही चले जाते हैं

वो सब जो चले जाते हैं,
कितना दर्द छोङ जाते हैं ,
वो सब जो ऐसे ही चले जाते हैं
छटपटाती आत्माएँ , बिलखते दर्द ,
क्या वो देख पाते हैं ?
नासूर बनते हैं , जख्म उनके,
जिन्हें वो पीछे छोङ जाते हैं ।

(नए मकान नए परिवेश) (द्वादश) (पांचवा मकान) (लखनऊ)

लखनऊ को नवाबों का शहर कहा जाता है। प्राचीन काल में इसे लक्षमणपुर कहा जाता था। माना जाता है कि अयोध्या के श्रीराम ने अपने छोटे भाई लक्ष्मण को लखनऊ भेंट किया था।
लखनऊ के वर्तमान स्वरूप की स्थापना नवाब आसफद्दौला ने 1775 में की थी।1850 में अवध के अंतिम नवाब वाजिदअली शाह को ब्रिटिश की अधीनता स्वीकार करनी पङी थी।
यह भारत के सर्वश्रेष्ठ आबादी वाले राज्य उत्तर प्रदेश की राजधानी है। इस शहर के बीच गोमती नदी बहती है।
लखनऊ शहर अपनी खास नज़ाकत और तहज़ीब वाली बहु सांस्कृतिक खूबी के लिए जाना जाता है।यहां संगीत और साहित्य को हमेशा संरक्षण दिया गया है।कत्थक नृत्य का यही केंद्र है। हिंदी कवि गोष्ठियाँ और उर्दू के मुशायरे दोनों ही इस शहर की पहचान है।
मोतीमहल, बङा इमामबाङा, हजरतगंज मार्केट यात्रियों के आकर्षण बिंदु है। इसे पूर्व का स्वर्ण नगर और शिराज़-ए-हिंद भी कहा जाता है । टूंडे कबाब और मक्खन मलाई मिष्ठान विशेष लजीज है
यह दशहरी आम के बागों तथा चिकन की कढ़ाई के काम के लिए भी जाना जाता है।
यहां की हिंदी का लखनवी अंदाज़ विश्व प्रसिद्ध है। मेरी ताई लखनऊ में जन्मी थी। पर बरसों दिल्ली
में रहने के पश्चात भी उन्होंने अपनी लखनवी बोली को अपनी ज़ुबान से मिटने नहीं दिया था। मैं हमेशा उनकी भाषा से प्रभावित रहती थी।

लखनऊ एच. ए. एल काॅलोनी में श्री श्रीवास्तवा के मकान को हमने किराए पर लिया था। वह अपनी पत्नी सहित हमसे मिलने आए थे। हम भी एक बार उनके घर गए थे। उनके चार बेटियाँ थी, उनकी पत्नी बहुत चुप और तनाव में रहती थीं ।
अधिकांशतः देखा गया है कि औरतें ही पुत्र न होने का दुख पालती हैं। इसके विपरीत श्रीवास्तवजी खुश रहते थे। अपनी बेटियों को उच्च शिक्षा दिला रहे थे।
सिर्फ एक माँ को नहीं सुनना पङता पिता को भी समाज पुत्र न होने के ताने देता है। मुझे एक परिचिता ने बताया था कि उसे पुत्र का दबाव न पति की ओर से था, न सास-ससुर की ओर से था। पर पति के दोस्त उनका मज़ाक बनाते कि वह एक भी पुत्र पैदा नहीं कर सका है। एक सामाजिक मिथ है कि पुत्र जन्म भी पुरूषत्व की पहचान है। पति परवाह नहीं करते थे व ऑपरेशन करने की सलाह देते थे । परंतु अब वह अपनी जिद और पुत्र की आशा में पांच बेटियों की माँ थी।
पति का नाम पुत्र से ही चलेगा, ऐसी उसकी तमन्ना थी। अपने नाम की चिन्ता नही , पर पति का नाम पीढ़ियों तक चले वाह री, परंपरा !

लखनऊ के मकान में मैं बहुत खुश थी। स्वतंत्र मकान ( कोई अन्य परिवार साथ नहीं )। दो कमरे, साथ में किचन, बाथरुम ,बीच का स्थान डाइनिंग के लिए प्रयोग में आता था। चारों तरफ लाॅन, पीछे की ओर हमने कुछ सब्जियां उगाई थी।आगे टमाटर, गुलाब, गेंदे के पौधे, पपीते का पेङ भी था। हरी-हरी घास पर बैठना अच्छा लगता था। शाम को सेतु बाहर खेलता, मैं वहीं बगीचे में मिंटू के साथ बैठती थी। मिंटू घूटनों चलता और लाॅन में बहुत खुश रहता था, टमाटर तोङ कर खाता था। सर्दियों में भी धूप में बहुत आनंद आता था। सुबह-शाम पेङ पौधों में पानी डालना बहुत अच्छा लगता था।

वहाँ सभी मकान एक – समान बने थे, सभी ने बहुत सुंदर लाॅन बनाए थे । हमारे मकान में किराएदार ही रहते रहे थे, इसीलिए लाॅन एरिया का फर्श अच्छा नहीं बना था। हमारा मकान जैसा अलाॅट किया गया था, वैसा ही था, उसमें कुछ सुधार नहीं किया गया था। बाकी सभी मकानों में सुधार हुआ था। किसी-किसी का लाॅन तो बहुत सुंदर था, कुछ ने माली रखा था और कुछ महिलाएं स्वयं संभालती थी। हमारे सामने श्रीमती सिंह ग्रामीण परिवेश से संबंध रखती थी, बागबानी की अच्छी जानकारी रखती थी। वह प्रतिदिन अपना कुछ समय बागबानी में लगाती थी। एच. ए. एल के सभी कर्मचारी सुबह 7 बजे ऑफिस चले जाते थे। उसके बाद महिलाएं अपना घर व बगीचा संभालती थी।

सिंह भाभी के दो लङके व एक लङकी थी। लङकी का नाम डौली था, सबसे पहले वह ही हमसे मिलने आई थी।सेतु मिंटू को उसका साथ अच्छा लगता था। वहाँ आसपास अधिकांशतः लङकियाँ थी, आरंभ में सेतु को उनके साथ खेलना अच्छा नहीं लगता था। बाद में वे सब लङकियाँ उसे अपने साथ ले जाती थी। सेतु का बातचीत का लहजा भी लखनवी हो गया था। कुछ समय बाद सेतु को एक हमउम्र दोस्त मिला था ‘करण’।

इस काॅलोनी में सभी लोग बहुत मिलनसार थे। कई लोग हमसे मिलने स्वयं आए थे। त्योहारों का आनंद तो हमने लखनऊ में ही जाना था। दीपावली की शाम को सभी लोग समय से तैयार हो कर अपने घरों से बाहर निकल आए थे। हम नए थे, तो सभी हमें विशेष रूप से मिलने आए थे, बाहर बुला कर ले गए थे।सबके साथ दीवाली मनाने में बहुत आनंद आया था। कोई औपचारिकता नहीं थी, न ही दिखावटी आवभगत और चमकदमक थी, सिर्फ अपनापन था।
होली पर भी सभी महिलाएं मुझे बुलाकर ले गई थी। मैं पहली बार महिला टोली के साथ घर-घर होली मनाने गई थी। सेतु बच्चों की टोली में था और एस. के. पुरूषों की टोली में गए थे। मुझे बहुत आनंद आया था।ऐसी होली मैंने कहीं नहीं खेली थी। कोई व्यर्थ का छिछलापन नहीं था, एक अत्यंत सुरक्षित व स्वस्थ वातावरण में सिर्फ गुलाल से खेली थी होली।
शाम को भी सेतु को सब बच्चे अपने साथ ले गए थे। हर घर में बच्चे जाते खाते- पीते मस्ती कर रहे थे। सेतु भी बहुत खुश था। मम्मी-पापा के बिना मित्र टोली में घूमने का उसका अनुभव बहुत आनंददायक था।

थोङे समय में ही कुछ परिवारों के साथ मेरा अच्छा मेलजोल हो गया था। सामने श्रीमती सिंह, उनके पङोस में एक हिमाचली परिवार था, नाम याद नहीं, पर उनसे बहुत ही स्नेहिल संबध बने थे।

हमारे साथ श्रीमती कानपाल रहती थी। अध्यापिका थी, उनके व्यक्तित्व से मैं बहुत प्रभावित थी। उनके बच्चे भी छोटे थे। उनका संयुक्त परिवार था। वह बच्चों के बालपन से ही उनके स्वतंत्र व्यक्तित्व विकास को महत्व देती थीं बच्चों को स्वयं पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करती थी। बच्चे अपने होमवर्क स्वयं करें, अपने काम स्वयं करें।मुझे भी सही लगा था कि बच्चों को आरंभ से जिम्मेदार बनाना आवश्यक है। सेतु और उनके बच्चे शाम को बाहर साथ खेलते थे। मैं तब भी उन पर ध्यान देती थीं। वह कहती थी मै आपके कारण निश्चित रहती हुँ।

यह शहर अलग था,
इसकी नज़ाकत, नफासत अनोखी थी।
इसकी संस्कृति अपनत्व से भरी थी।
एक नई तहज़ीब भरी जीवन सीख थी।

क्रमशः

(नए मकान नए परिवेश) (भाग- एकादशम्) (मामी जी)

गुङगांव जीवनयात्रा मामी जी के बिना पूर्ण नहीं हो सकती है।
अपितु यूं कहना चाहिए कि मामीजी के बिना मेरा जीवन वृतांत अधूरा है।
कुछ रिश्तों का संबध आपके पूर्वजन्म से होता है।मामीजी से मेरा रिश्ता भी हमारे पूर्वजन्म से जुङा है।
हमें छाबङा साहब के मकान में शिफ्ट हुए अधिक समय नहीं हुआ था, छाबङा साहब भी तब दिल्ली शिफ्ट नहीं हुए थे।

उस उतरती शाम को जब अंधेरा धीरे-धीरे गहराने लगा था, मैं रसोई में रात के खाने की तैयारी में लगी थी, तभी एक आवाज़ मीठी पर जोरदार थी, मेरे कानों तक पहुँची थी। मैं हैरान थी, कोई मेरा नाम पुकार रहा था।

“क्या यहाँ कोई शिखा रहती हैं?” मेरा नाम! स्पष्ट उच्चारण !साथ में सम्मान की महक भी थी। मैं सोच रही थी कि गुङगांव में कौन मुझे मेरे नाम से पुकार रहा है? मेरा नाम तो पतिदेव भी नहीं पुकारते थे!

रसोई से बाहर आई, देखा एक सांवली महिला आयु लगभग 35-40 की होगी, गैलरी में खङी थीं। हँसते हुए उन्होंने पुछा,” आप शिखा? शांति जीजी की बेटी हो न!” मैंने उत्तर दिया “हाँ” और तुरंत याद आया कि गोपाल मामा (मम्मी का मायका जयपुर का है।) की ससुराल गुङगांव की है और मम्मी कह रही थी कि मामा से उनकी ससुराल का पता पूछकर मुझे बताएंगी।

यानि यह महिला गोपाल मामा की सरहेज (साले की पत्नी) थी। नाम- मीरा। हमारे लिए तब से मामी जी हो गई थी।वह अपने ननद और ननदोई के आदेश पर मेरी खैर खबर लेने आई थी।रिश्ता दूर का है, पर वह अपनों से भी बढ़कर है।

गुङगांव में जब भी मायके की याद आए, तो पहुंच जाती थी, ‘मामीजी के घर’। तब उनके पति अथार्त मामाजी(गोपाल मामा के साले) से अधिक परिचय नहीं हो पाया था। मामीजी की सास जो अब मेरी नानी थी, हम से बहुत प्यार से मिलती थी और हम से मिलकर बहुत खुश होती थी।

मिंटू के जन्म की कहानी भी मामीजी के बिना अधूरी है। मेरी तबियत अचानक खराब हो गई थी।टेलिफोन के साधन भी बहुत सुगम नहीं थे, अतः मम्मी भी तुरंत नहीं आ सकती थीं ।
उस वक़्त मामीजी सारी रात मेरे पास रही थी, दिलासा देती रहीं थी।
सुबह-सुबह अपने घर जाकर बच्चों को स्कूल भेज कर वापिस आई थीं और मेरे पास हास्पिटल में रहीं थी, दर्द के समय ऐसा लग रहा था, मेरी माँ मेरे पास है। मिंटू को सबसे पहले उन्होंने ही गोद मेें लिया था।

आज भी उनका टेलिफोन आ जाए, तो लगता है, मन की सारी चिन्ताएं दूर हो गई हैं ।वह जीवन की अनमोल सीखें बातों-बातों में समझा जाती हैं ।

हम दोनों ने ही एक- दूसरे के जीवन- संघर्ष को बहुत करीब से जाना व समझा है। मैं बहुत कम बोलती हुँ, फिर भी मामी जी बिना कहे मेरे मन की व्यथा समझ जाती हैं । अब मिलना इतना सरल नहीं रह गया है, फिर भी जब संभव होता है,हम फोन पर अपना हाल सुन समझ लेते हैं। सेतु की शादी में मामीजी का सहयोग ऐसा था कि जैसे मम्मी की कमी पूरी कर दी हो।

ऐसा लगता है कि पिछले जन्म में वह अवश्य मेरी माँ या बङी बहन होगी।

रिश्ते अनाम होते हैं,
रिश्ते पहचान होते है,
हमारे मन की साध के,
हमारे दिल के अरमान के,
यह तो जन्मांतर होते है।

1990 अगस्त में हम गुङगांव से लखनऊ की ओर बढ़ चले थे। मामीजी व सभी पङोसियों से भावभीनी विदाई ली।

आज फिर अपनी कुछ निशानियाँ, अजनबियों के लिए छोङ,
यह खानाबदोश आगे बढ़ चले हैं।

(नए मकान नए परिवेश) भाग-दशम् (हमारे पङोसी-2)

ये चाँद बीते ज़मानों का आईना होगा,
भटकते अब्र में चेहरा कोई बना होगा,
उदास राह कोई दास्ताँ सुनाएगी,
करोगे याद तो, हर बात याद आएगी।

सेठी साहब की बङी बेटी दिल्ली रहती थी, अक्सर छुट्टियों में आती तो उसकी बेटी हनी हमारे घर भागी आती थी।सेतु और हनी हमउम्र थे। दोनों में बहुत अच्छी दोस्ती थी।
उनके किराएदारों से भी हमारे अच्छे संबध थे।

उस समय हम इसी मकान में नए आए थे, तब एक दिन एक पतली- दुबली सांवली 18-19 साल की लङकी एक बच्चे को ढूंढते हुए, हमारे घर आई थी, उसकी गोद में एक 2 वर्षीय बेटी भी थी, मैंने पुछा, ” कितना बङा बेटा है?” वह बोली,”चार साल” और मुझे हैरानी में छोङ चली गई थी।

पर उससे अधिक अचंभित छाबङा आंटी के वक्तव्य ने कर दिया था, बोली,” सौतेली माँ कहाँ बच्चों का ध्यान रख पाती हैं।” 18वर्षीय बच्ची और सौतेली माँ! बहुत अजीब लगा।

छाबङा आंटी ने कहानी बताई , ” यह तो इन दोनों बच्चों की मौसी है। इसकी बङी बहन बहुत सुंदर थी, जैसे पहाङी लोग होते हैं । यह तो सांवली है, कैसे भी हिमाचली नहीं लगती है।
एक बारिश के दिन इसकी बङी बहन अपनी बेटी को घर पर सुलाकर, अपने बेटे को स्कूल लेने गई थी। रास्ते में बिजली के खंभे से लटकते तार से उसका छाता टकरा गया और करंट के कारण उसकी तुरंत मृत्यु हो गई थी।

बङी बहन की मृत्यु के बाद, इसके जीजा से इसका विवाह कर दिया गया था। माता- पिता नहीं है और भाई- भाभी ने अपना बोझ इस तरह उतार दिया था। ”

पर जीजा जो अब उसके पति थे, अच्छे थे। उन्हें संध्या (सौतेली माँ) से शादी का गिल्ट भी था। गांव का रिवाज़ और बच्चों की परवरिवश की समस्या भी थी। फिर सोचा, मौसी ही सौतेली मां होगी तो बच्चों को प्यार मिलेगा।

यह -छोटी-सी सौतेली माँ, को बङी बहन से ही माँ का प्यार मिला था।वह भी उसके बच्चों के प्रति संवेदनशील थी।

थोङे दिनों में वह मेरी अच्छी दोस्त बन गई थी।
वह बच्चों को लेकर मेरे पास आ जाती थी। और अपने मन का हाल कह जाती थी।
यह पहाड़ी ग्रामीण कन्या थोङी-बहुत शिक्षित थी।पर शहरी रिवाजों से परिचित नहीं थी।मेरा भी उससे स्नेहपूर्ण लगाव हो गया था।

उसने बताया कि जब बङी बहन की शादी हुई, उस समय वह बहुत छोटी थी।जीजा को अब इसे पत्नी के रूप में स्वीकार करने में हिचक थी, दिवंगत पत्नी का शोक और उसकी यादें इतनी जल्दी कैसे मिट सकती थी।

वह बताती कि आरंभ में उसे सब संभालने में बहुत कठिनाई आ रही थी। पर पति उससे कोई शिकायत नहीं करते थे व स्वयं सब संभालते लेते थे। उससे कहते, ” तु भी तो बहुत छोटी है।”

पर संध्या खुश थी, गांव का वातावरण खुला होने पर भी बंदिशे थी। धीरे-धीरे वह सब सीख रही थी।

कुछ दिनों के बाद उसके पति का स्थानांतरण हो गया था। मुझे उसके जाने का दुःख था तो खुशी भी थी, उसका परिवार अपने दुखद अतीत की गली से निकल गया था। इस गली में उसकी तुलना बङी बहन से की जाती थी और उसकी पहचान सिर्फ एक सौतेली माँ के रूप में ही थी।

मुझे खुशी थी कि उसने अपने इस नए जीवन को अपना लिया था और उसे समझदार पति से एक अच्छी समझ मिली थी।

उनके जाने के बाद सेठी अंकल ने उस हिस्से को वधवा भाभी को दिया था। उनके दो बच्चे थे, इंदू 10 वर्ष की और अमित 8 वर्ष का था। इस मकान में आते ही वह फिर गर्भवती थी। वह बहुत शर्म व झिझक महसूस कर रहीं थी। हमने उन्हें समझाया था कि वह अपने तीसरे बच्चे का स्वागत प्रसन्न मन से करें ।

वह बहुत सुघङता से घर संभालती थी।सरकारी कर्मचारी के वेतन में घर चलाने के लिए बहुत सुझ-बुझ चाहिए। सीमित आय में खर्चे भी सीमित रखने होते है। एक गृहणी के लिए आवश्यक नहीं कि वह नौकरी करे, एक गृहणी भी नौकरी कर सकती है। पर अपने घर व बच्चों पर पूर्ण ध्यान देने के लिए वह नौकरी का विचार त्याग देती है। बहुत कम होते है, जो महिलाओं के इस त्याग का सम्मान करते हैं।

मिसेज वधवा सभी काम स्वयं करती थी, शिक्षित थी, बच्चों को ट्यूशन न भेजकर स्वयं पढ़ाती थी। वधवाजी अपनी पत्नी के सहयोग का सम्मान करते थे व घर के कामों में उनकी मदद भी करते थे।
वह मुझे भी घर संभालने की सीख देती थी।

अभी उनका सबसे छोटा बेटा अजय एक वर्ष का भी नहीं हुआ था कि एक दुर्घटना में वधवा साहब के दिमाग में चोट लगी थी, वह अपनी याददाशत भूल गए थे, कई दिन अस्पताल में रहे थे। मिसेज वधवा ने मुस्कराते हुए, हिम्मत के साथ इस कठिन परिस्थिति का सामना किया था।

1990 में जब हम लखनऊ गए तो उनसे बिछुड़ने का वाकई दुख था। बाद में गुङगांव लौटने पर उनसे मुलाकात हुई थी। वही सादगी, वही अपनापन, जीवन की जद्दोजहद को इतनी सरलता से स्वीकार किया था कि चेहरे को देखकर लगता था, आयु वहीं ठहर गई हो।

हम1986-1990 तक छाबङा अंकल के मकान में ही रहे थे। गली में सभी से अच्छा मेलजोल हो गया था। हम प्रति वर्ष जून मास में रामायण पाठ करते थे, तब सभी गली के लोग आते थे। सेतु के चौथे जन्मदिन पर भी पूरी गली आई थी। ये सभी पङोसने आयु में मुझ से बङी थी, इन सभी ने मुस्कराते हुए यह आशीर्वाद दिया कि “अब सेतु का कोई भाई- बहन आना चाहिए।”
आशीर्वाद फलीभूत हुआ और मिंटू प्रसाद स्वरूप मिला था।

आज भी सबके स्निग्ध चेहरे आँखों के सामने से गुजर रहे हैं ।

बरसता-भीगता मौसम धुआँ-धुआँ होगा
पिघलती शमों पे दिल का मेरे गुमां होगा।
हथेलियों की हिना, याद कुछ दिलाएगी,
करोगे याद तो, हर बात याद आएगी।

आस्था की मम्मी से भी मधुर संबध बने थे। उनके बगल में वह विधवा अध्यापिका, मिसेज मेहरा सादगीपूर्ण सुंदर व सौम्य चेहरा। सिर्फ मैं नहीं सभी कहते सुंदरता इसे कहते हैं ।

उनके साथ के घर में थी मिसेज खन्ना, दोनों पति- पत्नी अध्यापक थे। विद्यालय से आकर थोङा आराम करके, वह घर के सभी काम करती थी। कहती, ” कामवाली आप लोग रखे, हम अगर इनका इंतजार करती रहीं, तो नौकरी नहीं कर सकते हैं ।
उनके सामने बुजुर्ग चौपङा दंपत्ति थे, जब भी मिलते आशीर्वाद की वर्षा करते थे। हमारी धार्मिक निष्ठा की प्रशंसा करते थे।

हमारे घर के ठीक सामने मास्टर जी का मकान था। उनका मकान बहुत सुंदर बना था। उनके एक बेटा व एक बेटी थे। बेटा आर्मी में था, फिर दामाद भी आर्मी आॅफिसर ही ढूंढा था। इन हरियाणवी माता-पिता का दिल बहुत बङा होता है। इनके कारण ही हम देशवासी सुरक्षित रह पाते हैं।

बहुत साल बाद जब हम उस गली में गए, तब देखा, उनके घर का लाॅन एरिया उजाङ पङा था। घर के वीरानेपन को देख मन द्रवित हो गया था। मिसेज सेठी ने बताया कि मास्टरसाहब का बेटा आतंकवादियों की मुठभेड़ में शहीद हो गया था।

अपने आंगन को कर उजाङ,
करते हैं देश को आबाद,
इन शहीदों को हमारा सलाम।
अपने मन को कर वीरान,
गर्व से करते हैं, अपने सपूतों का बलिदान,
इन माता-पिता को हमारा शत-शत प्रणाम।

क्रमशः

(नए मकान नए परिवेश) भाग-नवम (हमारे पङोसी-1)

जीवन में पङोस और पङोसियों के महत्व पर एक बङा लेख लिखा जा सकता है। भारतीय संस्कृति में यह माना जाता है कि अगर पङोस अच्छा है तो कोई चिन्ता की बात नही है क्योंकि आपके सुख-दःख में रिश्तेदार बाद में आते हैं, पहले पङोसी ही खङे होते हैं ।

आज के दौर में भी जब लोग मिलनसार नही रहे हैं, अपनी प्राईवेसी पर अधिक जोर रहता है, तब भी बुरे वक्त पर पङोसी याद आते हैं व पङोसी भी अपना धर्म निभाते हैं ।
यह मेरी खुशकिस्मती रही कि हमें हमेशा पङोस अच्छा मिला है।
अतः गुङगांव से लखनऊ निकलने से पहले उस गली के सभी पङोसियों पर एक नजर तो डालनी ही होगी।

‘ करोगे याद तो हर बात याद आएगी,
गुजरते वक्त की हरमौज ठहर जा आएगी’

हम इस मकान में चार वर्ष रहे थे, आस-पड़ोस में सभी से हमारे संबध अच्छे बन गए थे। पङोसियों से अच्छे सबंध बनाने का श्रेय मैं हमेशा एस.के को
देती हुँ। उनका मिलनसार स्वभाव शीघ्र ही सबको प्रभावित करता था

हमारे दाएं तरफ का मकान एक सरदार परिवार का था, 1984 के दंगों ने उन्हें गुङगांव से निकलने को विवश कर दिया था।
उन्होंने अपना मकान एक अग्रवाल परिवार को किराए पर दिया था।
अग्रवाल परिवार संयुक्त परिवार था, सास, तीन बेटे, दो बहुए, एक छोटी कुआंरी ननद थी।
ससुर नहीं थे तो घर की सारी जिम्मेदारी बङे बेटे ने संभाल रखी थी। अपने पति की इस जिम्मेदारी को गरूर सहित निभाते हुए, परिवार पर अपना दबदबा बङी बहु ने अपने सहज अधिकार के तौर पर लिया था।
घर का सभी काम दोनों बहुएं मिलकर करती थी,पर छोटी बहु अधिक दबी नजर आती थी, उसी के दो बच्चे थे। बङी बहु नि:संतान थी।
सास और छोटी ननद से मेरी दोस्ती हुई थी। सास समझदार थी, उन्होंने फैसला ले रखा था कि बेटी की शादी के बाद बेटों को अलग कर देगी और स्वयं छोटे बेटे के साथ रहेगी।

अग्रवाल परिवार के जाने के बाद यह मकान मिस्टर तनेजा ने खरीद लिया था। मिस्टर तनेजा का परिवार मैनपुरी से शिफ्ट हो कर आया था। मिस्टर तनेजा मुलतः गुङगांववासी थे। बच्चों की उच्च शिक्षा के लिए, उन्हें एक जगह स्थापित करने के उद्देश्य से यह मकान खरीदा गया था। परिवार यहाँ शिफ्ट हो गया था पर उनकी नौकरी मैनपुरी में थी, वह स्वयं महीने में एक बार परिवार से मिलने आते थे।

मिसेज तनेजा के लिए पति के बिना परिवार की देखभाल करना एक चुनौती थी, अतः वह हमेशा तनाव में रहती थी। उनके दो बेटी व एक बेटा था। बङी बेटी बारहवीं कक्षा में पढ़ रही थी, बेटा आठवीं कक्षा और छोटी बेटी दूसरी कक्षा में पढ़ रही थी।

मिसेज तनेजा के हमेशा तनाव में रहने के कारण, उनके घर में अशांति बनी रहती थी ।गली में कोई उन्हें पसंद नहीं करता था। मेरे पास वह बेझिझक आती थी ,हम अपना सुख-दुख बांटते थे। पर फिर याद नहीं किस कारण हमारे बीच बात-चीत बंद हो गई थी। शायद मेरी रिश्ते बढ़ाने की अपनी सीमा रेखा थी, जिसे मैं किसी को लांघने नहीं देती थी।

लेकिन तभी एक घटना ने मेरे दिल मेें उनके लिए सम्मान बढा दिया था। यह मेरे दूसरे बेटे मिंटू के जन्म के बाद की बात है। सेतु को बुखार आ रहा था।तेज बुखार उसके दिमाग में चढ़ गया और वह बेहोश हो गया था।हम तुरंत उसे लेकर डाक्टर के पास भागे थे। हमें परेशान जाता देख मिसेज तनेजा ने मिस्टर तनेजा (उस समय गुङगांव में थे) को हास्पिटल भेजा था, मिस्टर तनेजा ने एस. के. को कुछ रूपये पकङाते हुए कहा,” हमने सोचा आप घबराकर भागे हैं , पता नहीं अचानक इस समय पैसे है कि नहीं । संकोच न करें और अन्यथा न लें ।”
मैंने हमेशा मिसेज तनेजा का आभार माना है, हम फिर मित्र बन गए थे।
बुरे वक्त पर जो काम आए वह ही सच्चे मित्र होते हैं।

मिसेज तनेजा ने अपने मकान में आगे के भाग में एक कमरा किराए पर दिया था। उस कमरे में वंदना व राकेश रहने आए थे। उनका बेटा मनु सेतु से छोटा था। कपिल, सेतु और मनु एक साथ खेलते थे। यह महज इत्तफाक था या इसके पीछे कोई मनोवैज्ञानिक कारण भी हो सकता है। हमारे बाएं तरफ के मकान में वधवा भाभी ( इंदू की मम्मी) ने बेटे को जन्म दिया था और उसके लगभग एक साल बाद उषा ने बेटी को और तीन महीने बाद वंदना ने बेटे को जन्म दिया था। फिर हमारे घर मिंटू आया था।

कहा जाता है कि छोटे भाई-बहन के माँ की गोद में आने से बङे बच्चों पर मनोवैज्ञानिक प्रभाव पङता है, पर कपिल, मनु और सेतु पर बहुत ही सकारात्मक असर हुआ था। वे अब अपने को अधिक आजाद महसूस कर रहे थे। जब हम माएँ अपने नवजात शिशुओं के साथ व्यस्त रहते तब ये बच्चे अपना मनमाना जीवन जीते थे। उसी आजादी ने कपिल को एक चोट दी थी। गेट पर खेलते हुए कपिल गिर गया था और सिर फट गया था, कपिल को लेकर एस. के. डाक्टर के पास भागे थे, साथ बदहवास उषा गई थी। कपिल के सिर पर टांके आए थे। दो दिन बाद फिर कपिल खेलने के लिए मैदान में था। बच्चे जल्दी ही तकलीफ भूल जाते है।

हमारे मकान के बाएँ तरफ सेठी साहब का मकान था । मिसेज सेठी एक सरकारी विद्यालय में अध्यापिका थी। बहुत हल्के- हल्के चलती थी, पैरों में तकलीफ थी। प्रतिदिन रिक्शे से स्कूल जाती थी। मुझे वह बहुत अच्छी लगती थी, जब भी मिलती बहुत प्यार से मिलती थी। उनके दो बेटी और एक बेटा था।

गुड़गांव के इन मकानों की विशेषता थी कि यहाँ आंगन बङे होते थे। फ्लेटवासी, आजकल की पीढ़ी तो आंगन शब्द से परिचित भी नहीं हो सकती है।

मुझे अपनी दादी का पुरानी दिल्ली का मकान याद आ जाता है।घर का दरवाजा खुलते ही आंगन होता था। उसी आंगन में बङे-बङे कार्यक्रम होते थे। मेरे और छोटी बहन के फेरे उसी आंगन में हुए थे।
गुड़गांव के बङे खुले आंगन देख, दिल खुश हो जाता था। हमने भी इसी मकान के बङे आंगन में देवीजागरण किया था।

सेठी साहब के मकान के आंगन के बाएं तरफ एक कमरा और किचेन था। जिसे वह किराए पर उठाते थे। आंगन के दूसरी तरफ उनके कमरे थे।कमरों के आगे दालान भी था पहले ऐसे ही मकान बनते थे, आंगन उसके बाद दालान फिर कमरे होते थे। आजकल तो कहा जाएगा कि खाली जगह छोङ कर, जगह बेकार कर दी है।
अभी भी HUDA के नियम अनुसार आगे- पीछे बेङे (आंगन) बनाना अनिवार्य है।

यह महज इत्तफाक ही था कि चार साल में सेठी साहब के दो किराएदार आए और उनकी पत्नियों से मेरे गहरे सबंध बने थे।

कुछ भूली- बिसरी यादें,
जब मन को छूकर जाती है,
मन भीग जाता है,
कितने अनाम रिश्ते,
तब जग जाते हैं,
यादें गिली हो, मुस्काती है।

क्रमशः

(नए मकान नए परिवेश) भाग अष्टम ( एक नई जीवन दृष्टि )

सेतु ढाई साल का हो गया था, वह मेरी गोद से बाहर निकलने को बेकल हो रहा था। उसे दोस्त चाहिए थे, जिनके साथ वह अपने जैसे खेल खेलता, शैतानी करता, नई- नई खोज करता।
लेकिन घर के आसपास बच्चें नहीं थे । पङोस की आठ वर्षीय इंदु और उसका सात वर्षीय भाई अमित अक्सर सेतु के साथ खेलते थे। पर उनके लिए सेतु एक छोटा मनभावन खिलौना था।
मुझे लगता कि उसके हमउम्र साथी होने चाहिए।

मैं अभी उसे स्कूल के अनुशासन में बाँधना नहीं चाहती थी।स्कूल में उसे हमउम्र साथी तो मिलते पर उन्मुक्त वातावरण नहीं मिल सकता था।
और मेरी मुराद पुरी हुई, जब कपिल आया था।

उन बुजुर्ग दंपत्ति के जाने के बाद, उन कमरों में कपिल अपनी माँ उषा के साथ रहने आया था।

कपिल सेतु का हमउम्र बहुत प्यारा व शरारती बच्चा था। कपिल के पिता डॉक्टर थे और माँ हाउस वाइफ थी। यह परिवार गुड़गांव के ही पास किसी गाँव से आया था। डॉ. साहब की डाॅक्टरी गांव में अच्छी चलती थी, या यूं कहें कि उन्होंने अपना जीवन अपने गांव को समर्पित किया था। अतः वह अपने परिवार के साथ शहर में शिफ्ट नहीं हुए थे।

मैंने एक कहानी पढ़ी थी, जिसमें नायिका अपने परिवार के विरोध को अनदेखा कर, अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा देने के लिए, बच्चों को लेकर अकेली शहर आ जाती है।
इस कहानी में भी कपिल की माँ उषा, अपने बेटे के व्यक्तित्व के विकास के लिए,अकेली गुडगांव आकर रहने लगी थी।
अंतर यही था कि उसे अपने पति व परिवार का पुरा समर्थन व सहयोग प्राप्त था । डॉ. साहब सप्ताह में एक बार उनसे मिलने आ जाते थे। अक्सर रात के ग्यारह बजे आते और सुबह पांच बजे चले भी जाते थे।
डाॅ. साहब का परिवार, अपने गाँव का एक प्रतिष्ठित परिवार था, गांव में उनका बहुत मान था। डाॅ. साहब ने कभी शहर आकर प्रेक्टिस करने की नहीं सोची थी, वह बहुत मन से अपने गाँव के लोगों की सेवा कर रहे थे।
गाँव में इनका संयुक्त परिवार था। परिवार के सभी सदस्य मिलकर सभी काम संभालते थे। एक- दूसरे की योग्यता का सम्मान व आपसी अटूट विश्वास अद्वितीय था। उसके ताया ससुर -खेती-बाड़ी संभालते थे। उसके पिता ससुर हिसाब-किताब देखते थे। चाचा ससुर के जिम्मे बाहर के काम थे।
चाचा ससुर ही समय- समय पर आते और उषा और कपिल की जरूरतें संभालते थे।

एक चचेरी ननद गुङगांव में ही रहती थी, वह और उसके पति हर समय उसकी कठिनाई में उसके सहारे थे। अतः डॉ. साहब उषा और कपिल की ओर से पुर्णतः निश्चित थे।। वे इत्मीनान से अपनी डाक्टरी सेवा पर ध्यान दे पा रहे थे।

उषा कोई ग्रामीण महिला नहीं थी। वह दिल्ली शहर में पली बङी थी। उसके पिता का तबादला होता रहता था, अतः उसकी परवरिश में अनेक शहरों की संस्कृति का प्रभाव था। उसने ग्रामीण जीवन शादी के बाद ही जाना समझा था।

उषा ने Home science में डिग्री प्राप्त की थी। उषा सुंदर व स्मार्ट थी। दिल्ली शहर की लङकी के लिए ग्रामीण ससुराल ही क्यों चुनी गई थी ? हम दुनिया है, जो सीधी बात को भी भेदना चाहते हैं ।

सोचा प्रेम में सब संभव है, अगर उषा सुंदर थी, तो डाॅ.साहब भी कम न थे, इस पर सज्जनता चेहरे पर चमकती थी। भावुक प्रेमिका अपने प्रेमी के साथ कहीं भी रहना पसंद करती हैं।

पर यह प्रेम विवाह नहीं था। अब माता-पिता ने क्यों कर अपनी बेटी के लिए ग्रामीण परिवेश व उसकी कठिनाइयों को चुना था ?

इन सवालों के उत्तर जो उषा से मिले उसके सार में समाज की परिपाटियाँ ही थी और कुछ नहीं ……।

विवाह की अनिवार्यता और वह भी सही उम्र में होना आवश्यक है । सही उम्र निकल गई तो उत्तम जीवनसाथी मिलना कठिन हो जाएगा, विशेषकर लङकियों के लिए. …… लङकियों के जन्म के साथ ही उसका विवाह …. उसके लिए उचित घर- वर की तलाश, एक बहुत बङी जिम्मेदारी, माता-पिता के लिए होती है।

हिन्दुस्तानी माता-पिता यह बहुत दृढ़ता से मानते है कि अपने बच्चों के वे ही भाग्य निर्माता हैं और फिर भी कमी हो जाए तो माना जाता है , ‘ ईश्वर की यही इच्छा होगी।’ पर बच्चों को अपने भविष्य निर्माण में भागीदार नहीं बनाते हैं।

उषा सुंदर थी, पर सुंदरता के मापदंड से ही विवाह सही उम्र में हो जाए, यह आवश्यक नही है। माता-पिता के पास धन की कमी न थी । पर उचित घर-वर नहीं मिल पा रहा था, फिर छोटी बेटी का कद भी बङा होता जा रहा था। उस पर रिश्तेदार ! उनके पास बात करने के लिए एक ही विषय या यूं कहें फिक्र… उनके अपनों के बच्चों का विवाह . ..।

डॉ. साहब व उनके परिवार की सज्जनता व शराफत प्रसिद्ध थी।
यह सोचा कि हमारी संस्कारी लङकी ग्रामीण जीवन की कठिनाइयों को पार कर लेगी। लङकी भी क्यों न करेगी? वह संस्कारी लङकी भी अपने लिए थक चुके माता-पिता को अपनी जिम्मेदारी से मुक्त करना चाहेगी।

एक सुंदर ख्याल यह भी रखा गया कि डॉ. साहब भी कब तक गाँव में ही प्रेक्टिस करेंगे, शहरी आमदनी उन्हें आकृषित करेगी ही और वह शहर आ जाएंगे।
उसने चार साल ग्रामीण जीवन को समझा व पति के मन को भी समझा और अपनी नियति को भी जाना…. फिर गुङगांव अकेले रहने का फैसला लिया।

उसे ससुराल वाकई अच्छी मिली थी। कुएँ से पानी भरना हो या मसाले पीसने हो….. घर में अन्य सदस्यों की सहायता तत्परता से मिलती थी। उसके इस फैसले पर खुशी-खुशी स्वीकृति मिलने में कठिनाई तो हुई पर अंततः सबने एकजुट हो उसको अपना सहयोग और मान दिया था ।

अपने माता-पिता व भाई-बहन सबको उसने अपने इस एकाकी घर में निमंत्रित किया था। अपनी माँ की दी हुई सुंदर कीमती क्राकरी पहली बार निकाली, “गांव के बुजुर्ग ऐसी क्राकरी में खाना नहीं खाते हैं । वे तो व्यंजन भी देसी पारंपरिक ही खाना पसंद करते हैं “।अक्सर ऐसे वाक्यांश उसके मुहँ से सुने जाते थे।

इसका अर्थ यह भी नहीं कि वह खुश नहीं थी, उसने अपने वैवाहिक जीवन को सच्चे दिल से स्वीकार किया था।
वह तो कभी ऐसे ही कोई क्रीच जाग जाती थी। अपने शहरी आधुनिक शहरी रिश्तेदारों के सामने जब अपने ग्रामीण ससुरालवालों की तुलना भी अनजाने ही कर जाती थी।इन ग्रामीणों की सज्जनता व मानवता पर उसे गर्व भी कम नहीं था।

अब उसके मायके से कोई न कोई उसके एकाकी जीवन के संघर्ष को समझने आ ही जाता था। यह तसल्ली भी करता कि डॉ. साहब भी जल्दी ही शहर शिफ्ट हो जाएंगे। पर ऐसा नहीं हुआ, वह अपने गाँव को छोङ नही सके थे।
उषा ने भी अपने इस संघर्ष को स्वीकार कर लिया था।यह कहना अधिक उचित होगा कि उसने अपने पति के जीवन उद्देश्य को गहराई से समझा था।

गुङगांव शिफ्ट होते ही उसने कपिल को पास ही एक play school में प्रवेश करा दिया था। कपिल जब रोता हुआ स्कूल जाता तब मैं सेतु को देख खुश होती कि वह अभी आजाद है।

कपिल संयुक्त परिवार से आया था। अतः वह बहुत जिद्दी था । वह अपने परिवार की कमी महसूस करता था।
उषा कपिल के सभी खिलौने ताले में बंद रखती थी और कपिल को उन खिलौनों से कमरे के अंदर ही खेलने देती थी। क्यों ?
मैं सेतु को बाँधकर रखना नही चाहती थी, फिर वह इसी मकान में ही बङा हो रहा था। सिर्फ कमरे में ही खेलना उसका स्वभाव नहीं था ।
सेतु कपिल के साथ अपने खिलौनों से खेलना चाहता था, पर कपिल ने छीनना और शेयर न करना सीखा था। मैं सेतु को दबाना नहीं चाहती थी और न बच्चों की बात पर झगङा करना पसंद था।
कुछ दिनों बाद सेतु और कपिल का गुङगांव के एक प्रतिष्ठित स्कूल में प्रवेश हो गया था।दोनों एक साथ स्कूल जाते थे। आरंभ में घर से जाते हुए कपिल बहुत रोता था और सेतु खुश- खुश जाता था। हम बहुत खुश थे कि हमारा बेटा बिलकुल नहीं रोता है। परंतु जब P.T.M में गए तो पता चला कि स्कूल में कपिल तो खुश रहता था पर सेतु रोने लगता था और बार- बार कपिल के पास बैठने की जिद करता था।
धीरे-धीरे सेतु और कपिल अच्छे दोस्त बन गए थे। दो साल बाद अगस्त 1989 में कपिल को एक छोटी बहन मिली और दिसंबर में सेतु को एक छोटा भाई मिला । सेतु और कपिल अब और शरारती हो रहे थे।
उषा अपनी इस नई जिम्मेदारी को खुशी-खुशी निभा रही थी। आस-पङोस और चचेरी ननद का परिवार उसकी कठिनाइयों में सहायक थे।डाक्टर साहब का वह ही रूटीन था। उषा और बच्चों को भी अब उसकी आदत हो गई थी।
1990 में हमारा स्थानांतरण लखनऊ हो गया था । हमने सोचा था कि हमारा गुङगांव वापिस लौटना नहीं होगा। पर नियति सात साल बाद फिर गुङगांव ले आई थी तब पता चला उषा ने वहीं पास ही एक मकान खरीद लिया था।

जब समझ लिए हो मन,
तब क्या चिंता करना,
तुम जियो अपना जीवन सार,
मैं हुँ तुम्हारे साथ,
पर मुझे भी पूरा करना है,
अपना जीवन साध।
जो तेरा सार वो मेरा सार,
जो मेरा साध वो तेरा साध।

हम भिन्न नहीं अभिन्न है,
यही जाना जीवन थार।

नए मकान नए परिवेश ( भाग- सप्तम) ( कुछ नए अजनबी )

एक वक्त आता है जब बच्चे माता-पिता के प्रेम की छांव से निकल कर, उस सुरक्षित दहलीज़ को त्याग कर, जीवन के सत् को समझने के लिए, नए रास्तों पर निकलते हैं।
मैं अभी तक अपनों के बीच रहती आई थी।पङोसी भी इतने अपने कि पता नहीं था कि वे पङोसी थे या रिश्तेदार।अपनों का अपनत्व ही जाना था। अजनबियों के साथ व्यवहारिकता की समझ नहीं थी। शादी के बाद ससुराल अजनबी, पति अजनबी और साथ ही आस-पड़ोस भी अजनबी था।

शादी को तीन वर्ष हो गए थे, कुछ-कुछ व्यवहारिकता की समझ बनने लगी थी।अजनबी जिन्दगी, जीवन को नई समझ देने लगी थी।यह स्वीकृति मन और दिमाग को हो गई थी कि माता-पिता की ऊंगली छूट गई है। तब स्वतः जीवन के प्रति अपनी मौलिक दृष्टि बनने लगी थी।

मैं दिल्ली से एक महीने बाद लौटी थी। घर का नक्शा बदला हुआ था। सामने दो अजनबी बुजुर्ग थे। प्रत्येक व्यक्तित्व के प्रभाव से परिवेश भी प्रभावी होता है। अतः घर में प्रवेश करते ही परिवेश में आए बदलाव को महसूस किया था। छाबड़ा परिवार की तरह चहकता हुआ परिवेश अब शांत और थका हुआ महसूस हो रहा था।

आंगन में छाबङा जी के बङे कमरे के सामने एक फोल्डिंग बैड पर एक उम्रदराज बुजुर्ग बैठे थे।और हमारी छोटी रसोई के सामने एक कमर झुकी, पतली कमजोर उम्रदराज बुजुर्ग महिला बैठी अपना काम कर रही थी। इन दोनो के बीच एक पांच वर्षीय कन्या अचंभे से मुझे और सेतु को देख रही थी।

इन अम्माजी का कद बहुत छोटा था और बाबुजी उनसे दुगने लंबे थे।
मुझ से और सेतु से मिलकर दोनों बुजुर्ग बहुत खुश हुए थे। थोङी देर में अम्माजी मेरे लिए पानी व बिस्कुट नमकीन ले आई थी,उन्हें पता था कि चाय मेरे लिए नुकसानदायक है, इसलिए ठंडा शरबत बना लाई थी। उनके इस सदव्यवहार से मैं नि:शब्द थी।

मैं अम्माजी से बहुत प्रभावित थी, कमर झुकी थी,पर धीरे-धीरे सभी काम करती थी, कपङे धोना, खाना बनाना, बर्तन व सफाई सभी काम स्वयं करती थी। वह बहुत कम पानी में साफ और झकाझक कपङे धोती थी, जैसे किसी डिटर्जेंट पाउडर का विज्ञापन होता है। सबसे बङी बात थी कि वह खुश रहती थी, दिखता था कि थक जाती हैं पर कभी उफ करते नही देखा था।

मेरे से उनकी दोस्ती हो गई थी। वह अपने मन की बात मुझसे कह देती थी। ये सिंधी पंजाबी थे, रेवाड़ी के किसी गांव से आए थे। भाषा भी वैसी बोलते थेl मुझसे हिन्दी में बात करती थी पर अधिकांश शब्द हरियाणवी सिंधी होते थे।

अम्माजी के दो बेटियाँ और एक बेटा था, बङी बेटी सोनीपत रहती थी, छोटी बेटी गुङगांव में ही रहती थी।वह ही जब समय मिलता सुबह-शाम माता-पिता से मिलने आती थी व अपनी माँ के काम में मदद भी कर जाती थी।

अम्माजी का बेटा दिल्ली में रहता था, अक्सर सपरिवार उनसे मिलने आता था। उसके एक बेटी थी, जो अम्माजी के साथ रहती थी। दो जुङवां बेटे थे जो तीन साल के थे। शायद जुङवा बच्चों को संभालने की परेशानी को देख पोती दादी-बाबा के पास रहने लगी थी।
बहु मार्डन थी, मैंने उसे कभी अम्माजी की मदद करते नहीं देखा था। अम्माजी भी उसके साथ मेहमानों की तरह व्यवहार करती थी।

अम्माजी- बाबुजी बच्चों के आने से बहुत खुश हो जाते थे।बेटा बहु पोती दीक्षा को अब अपने पास रखना चाहते थे।इस बात पर बाबुजी बहुत दुखी व नाराज़ थे। पांच वर्षीय दीक्षा हमेशा दादा-दादी के साथ ही रही थी, अतः वह भी जाना नहीं चाहती थी। जब भी बेटा आता तब वह बाबुजी को समझाता कि “दीक्षा का अब हमारे साथ रहना जरूरी है।”

बाबुजी को लगता कि ” बेटा स्वार्थी है जब उसे जरूरत थी उसने दीक्षा को उनके पास छोङ रखा था, अब जब वे दीक्षा के मोह में बंध चुके हैं, तब वह उसे हमारे पास से ले जा रहा है। उन दोनों के अकेलेपन का दीक्षा ही सहारा थी।”

कई बार औरतें जो बात व्यावहारिक रूप से समझ पाती है, उसे मर्द समझना नहीं चाहते हैं या समझ नहीं पाते हैं।शायद मैं गलत भी हो सकती हुँ, यह औरत- मर्द की बात नहीं है, अपितु प्रत्येक के व्यक्तिगत व्यक्तित्व की बात हो सकती है।

अम्माजी ने मुझे कहा था,” मुझे भी दीक्षा से उतना ही मोह व प्रेम है, जितना तुम्हारे बाबुजी को है, मैंने ही उसे गोद में रखा संभाला है।
पर एक दिन तो उसे अपने माता-पिता के पास जाना ही है, हम कब तक रहने वाले हैं, अभी उसे बुरा लगेगा पर और बङा होने पर अधिक बुरा लगेगा। हमारी पोती अवश्य है पर अमानत तो बेटे-बहु की ही है न! फिर अब मुझ से भी कहां इतना काम संभलता है। इसके माता-पिता इसकी अच्छी परवरिश कर सकते हैं ।”

हमारे सामने उनकी बङी बेटी व बच्चे उनके पास छुट्टियां बिताने आए थे। उसकी विदाई के समय, उन्होंने रिवाज़ के अनुसार उसे कुछ उपहार दिए थे।उसके उपहार देख, उनकी छोटी बेटी उनसे नाराज हो गई थी।

अम्माजी ने दुःखी हो मुझे बताया था,” बहुत मुश्किल है, बङी बेटी सोचती है कि छोटी बेटी हमारे करीब रहती है तो उसे हम अक्सर कुछ न कुछ देते रहते होंगे, जिससे वह वंचित रह जाती है।
छोटी बेटी इसलिए नाराज़ है कि इतने गिफ़्ट एक साथ हम कभी उसे नहीं देते हैं।”

अम्माजी अपने आर्थिक सामर्थ्य के कारण दुःखी नहीं थी ।उनके मन के संताप का कारण, उनकी बेटियों की नासमझी थी। जिन्हें अपने माता-पिता का प्रेम आज भी धन व उपहार में दिखता था।

इन बेटियों के व्यवहार से जो अशांति मिलती थी, उसने उनकी अपनी बेटियों से मिलने की इच्छा को मंद कर दिया था।

इस बुजुर्ग दंपत्ति को अब किसी से कुछ नहीं चाहिए था। अब अपने बच्चों के लिए एक ही आशीर्वाद था, ‘ अपने-अपने परिवार के साथ सुखी रहें।’
वे अपने जीवन के अंतिम पड़ाव में सिर्फ शांति चाहते थे।

समझ नहीं आता कि हिंदूस्तानी संतानें हमेशा अपने माता-पिता से लेना ही क्यों चाहती हैं। तभी तो कई-कई बीघा जमीनें छोटे-छोटे टूकङों में बंट जाती है।

अम्माजी व बाबुजी सिर्फ छः महीने हमारे साथ रहे थे, दीक्षा अपने माता-पिता के पास चली गई थी तो वे लोग अपने गाँव वापिस चले गए थे । रविन्द्र भी दिल्ली चला गया था।

बीता वक्त गुजर गया,
जो करना था वो कर दिया,
जो होना था वो हो गया,
न कोई उथल-पुथल, न कोई उलझन है,
न कोई नाराजगी, न कोई शिकायत है,
अब तो शांति पथ पर बढ़ना है,
समय है अब थोङा,
तो अब अपने लिए भी है जीना।