स्वर्गिक यात्रा

ऐसा माना जाता है कि एक माँ अपनी सबसे छोटी संतान के साथ अधिक जुङाव रखती है।
हालांकि मैं इस तथ्य से सहमत नहीं हुं, चूंकि हमारी माँ का अपनी सभी संतानों से एक समान जुङाव व विश्वास था।
पर जब कोई उस जुङाव व विश्वास को अनदेखा कर गया हो, तब एक माँ का ह्रदय यह समझ सकने में असहाय था कि यह कैसे हो सकता है ?

सबसे छोटी संतान (छोटे पुत्र) को लापता हुए, 29 वर्ष हो गए थे, उसके जाने को सबने स्वीकार किया था, यह ही मान लिया था कि वह अब इस दुनिया में नहीं है।(उसके न होने के प्रमाण भी थे)।

पर एक माँ प्रमाण नहीं मानती, वह सिर्फ अपने विश्वास को समझती है।
वह तो अंत तक उसकी राह देखती रहीं थी।

वह यह मानती थीं कि वह उनके साथ लुकाछिपी का खेल खेल रहा है ।जैसे कृष्ण अपनी माता के साथ खेलते थे।

‘यह कदंब का पेङ अगर माँ होता यमुना तीरे,
मैं भी उस पर बैठ कन्हैया बनता धीरे-धीरे ।’

उन्होंने इस लुकाछिपी के खेल को ही सच माना था।
जब यह जान लिया कि अंतिम समय सामने हैं , तब एक बार फिर ह्रदय विकल हुआ, ‘ उससे मिलने के लिये , कितने सवाल……एक बार आँख भर देखने के लिए।’

फिर अपनी इस विह्वलता को शांत कर, इस लुकाछिपी में ही अपनी संतान का सुख स्वीकार कर, अपने को समझा लिया कि’ मैं न सही, पर वह मुझे देख रहा है और वह मेरे अंत समय को जान जाएगा।’

‘ज़ख्म जो कभी नहीं भरा’

तुम हो आस-पास मेरे,

यह विश्वास ही नहीं ,जानती हूँ ,

कि देखा है,पहचाना है,

क्या?

गर लगा कि तुम ही हो तो!

सोचा-‘जरूर पुकारोगे,’

और, क्यों न चाहूँ?

तुम पुकारो मुझे-

तुम ही ने तो किया था भ्रमित!

क्या नहीं जानते थे तुम?

कुछ अलग जुङाव,

कुछ अलग अनुभूति ,

बहुत -सा अपनापन-

सबसे समभाव रहते हुए भी,

तुम कुछ अलग, निजी,

फिर भी चले गए न!

चलो……………..

अब तो बीता लंबा समय…….

थक गई………………… !

पुकारो न! मम्मी !

तृप्त आत्मा दें तुम्हें भी

‘आशीष’

क्रमश: